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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह30 / 94

तीसरा अध्याय · कथा 30

जोगी की सिद्धि के सम्बन्ध में शब्द

बिश्नोई गंगा पार का ढोसी आय डेरो लीय एक नागो जोगी, एक सिला उपरे बठो, आप हाल ज्यों सीला हाल, ष्सिनोइयाँ आय जांभाजी ने अरज की,वडा भोली कह विराह्यटियो मुसाणियो थ, मनख जमवारो उही गुव थ। जाम्भोजी श्री वायक कहनाथोजी

कहने लगे-हे शिष्य! एक समय गंगापार से बिश्नोइयों की जमात श्रीदेवजी के दर्शन करने के लिए सम्भराथल पर आयी। उन्होंने मार्ग में विश्राम हेतु ढोसी की पहाड़ी पर डेरा डाला। वहाँ पर उन्होंने एक योगी को देखा था। उसके बारे में देवजी से इस प्रकार से पूछने लगे-हे गुरुदेव! हम लोग जब आपके पास आ रहे थे, वहाँ मार्ग में ढोसी की पहाड़ी पर हमने आसन लगाया था। वहीं पर हमने एक आश्चर्य देखा था। आप तो अन्तर्यामी हैं। अन्दर की बात जानते हो। वहाँ पर वह योगी पहाड़ी पर बैठा था। वह पहाड़ को भी हिला देता था। उसमें क्या करामात थी? क्या वह सचमुच में ही आपकी ही तरह कोई पहुँचा हुआ योगी है या पाखण्डी है। श्री देवजी ने बतलाया-वह नागा जो आपने देखा है वह विरोटिया है। श्मशान भूमि में बैठकर भूत-प्रेतों की पूजा करता है। इसी पाखण्ड से ही अपनी सिद्धि दिखाता है। वह सिला ऊपर बैठा हुआ स्वयं आप हिलता है, तो सिला भी साथ में हिलती है। ऐसी युक्ति उसने बना रखी है। इसने तो अपना जीवन व्यर्थ में ही खाह्य दिया है। योग संन्यास के नाम पर मात्र दिखावा एवं छलकपट के सिवा कुछ भी नहीं है। दुनिया बहुत भोलीभाली है। उसके पाखण्ड जाल में फंस जाती है। आप लोग देखकर के ही आ गये। उसके जाल में नहीं फंसे। यही बड़ी बात है। कुछ लोग आसन पर बैठते हैं। ध्यान समाधि का बहाना करते हैं। किन्तु अन्दर झूठ कपट से भरे रहते हैं। तथा कुछ अन्य वास्तव में सच्चे योगी होते हैं। बुगलों की टोली में कोई कोई हंस भी होता है। सभी त्याज्य भी नहीं हैं, तो सभी ग्राह्य भी नहीं हैं। जो लोग सत्य मार्ग पर चलते हैं, वे लोग ही इस कच्ची काया को छोड़कर बैकुण्ठ की प्राप्ति करते हैं। उस पद्भम पद को प्राप्त करते हैं। जहाँ से वापिस मृत्युलोक को आना नहीं होता। ऐसा कहते हुए शब्द सुनाया-

शब्द-24 ओ३म्-आसण बैसण कूड़ कपट्टण, कोई 2 चीन्हत बोजू वाटे।

बोजू वाटे, जे नर भया, कांची काया छोड़ कैलाशे गया।।