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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह91 / 94

बारहवाँ अध्याय का उतरार्द्ध · कथा 91

जोधपुर नरेश तख्तसिंह का ताम्र पत्र

वि.सं. उन्नीस सौ में जोधपुर के राजा तख्तसिंह थे। उन्हीं राजा के यहाँ सिद्धि नाम का सेवक था, जो राजा का अति विश्वसनीय था। अपनी चिकनी चुपड़ी बातों से राजा को अपने वश में कर के स्वकीय स्वार्थ सिद्धि कर लिया करता था।

एक समय शिकार करने के शौकीन सिद्धि साहब जोधपुर से निकले थे। अन्यत्र तो शिकार मिलना दुर्लभ था, क्योंकि हिंसक जन पहले ही चट कर चुके थे। वह भटकता हुआ जोधपुर के पास ही बिश्नोइयों के गाँव हिंगोली पहुँच गया। वहाँ जाकर देखा कि हरिणों की तो अनेक टोलियाँ विचरण कर रही थी। उसने हिंगोली गाँव के पास जाकर डेरा डाल दिया और वहीं पर प्रतीक्षा करने लगा। सिद्धि के देखते ही देखते एक हरिणों की टोली निर्भय होकर जल पीने के लिए आयी। और तालाब का स्वच्छ जल पीकर पुनः वन की तरफ जाने लगी, तो सिद्धि ने तुरंत एक हरिण पर गोली चला दी। सिद्धि को तो कुछ भी डर नहीं था किन्तु वह प्रथम गोली चूक गया था, वह हरिण को नहीं लगी। किसी प्रकार बंदूक की आवाज सुन कर हरिण तो वन की तरफ छलांग लगाते हुए आँखो से ओझल हो गया था। दूसरी गोली भर कर सिद्धि अखाड़े में तैयार होकर बैठा ही था। उसी समय ही गोली की आवाज सुन कर बिश्नोई लोग अपने अपने घर से लाठियाँ लेकर अकस्मात् निकल आये। और आगे आकर तालाब की पाल पर देखा कि एक शिकारी बैठा हुआ है। किसी हरिण को मारने की ताक में है।

तुरंत एक व्यक्ति ने जाकर सिद्धि साहब को सूचित करते हुए ईंट का जवाब पत्थर से देते हुए, एक लट्ठी की चोट जड़ दी। सिद्धि उन लोगों के क्रोध की स्थिति को देख कर वहाँ से किसी प्रकार से जान बचा कर भागा। बिश्नोई लोग भी अपना कार्य सफल हुआ मानते हुए अपने घरों को लौट गये।

सिद्धि चोट खाकर सीधा जोधपुर दरबार में राजा तखतसिंह के पास पहुँचा और जाकर अपनी व्यथा कथा बढा-चढा कर सुनाई। अनेकों प्रकार से बिश्नोइयों की निंदा की गयी और कहा गया कि वे लोग आज कल बहुत ज्यादा इतरा रहे हैं। राजकीय आज्ञा का भी उल्लंघन करने लग गये हैं। यदि आप स्वयं जाकर उन लोगों को सबक नहीं सिखायेंगे तो हो सकता है वे लोग आप के ही हाथ से ही निकल जाय, इसलिए समय रहते उनसे निपटना आवश्यक है।

राजा के सामने अपनी चाटुकारिता का प्रदर्शन भी इस प्रकार से किया। उन सिद्धि की बातों पर राजा ने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया और कहा- कभी मैं देखूँगा। ऐसा कहते हुए राज्य कार्य में निमग्न हो गये। एक दिन पुनः पिछली बात याद दिलाते हुए कहा- महाराज! आप तो राजा हैं। शिकार खेलना आपका धर्म है। कभी कभी मनोरंजन के लिए भी ही सही अवश्य ही वन में चलना चाहिये। शिकार सुलभ करवाना तो आपके सेवक का कर्तव्य है। आप निःसंकोच होकर मेरे साथ चलिये।

ऐसा कहते हुए राजा को उस दुष्ट ने मनाकर तैयार कर लिया और दूसरे दिन प्रातः काल ही चलने की तैयारी की। जब नगर से बाहर जाने लगे तब मंत्री महोदय ने पूछ लिया कि महाराज! आज इतनी जल्दी कहाँ जा रहे हैं? सिद्धिं साहब ने आगे बढ़कर कहा-

महाराज शिकार खेलने के लिए मेरे साथ जा रहे हैं। जा तो रहे हैं, सो ठीक है, किन्तु कहाँ जा रहे हैं? जरा बतलाओ तो सही मैं भी सुनूँ। सिद्धि ने कहा- हम बिश्नोइयों के गाँवो में हिंगोली जा रहे हैं। वहाँ पर एक ही जगह पर हरिणों की टोली मिलेगी। राजा साहब को मैं खूब शिकार खिलाऊँ गा। आप लोग निश्चिंत रहिये। मंत्री ने राजा साहब को संबोधित करते हुए कहा-

हे राजन! आप यदि इस अवस्था में हिंगोली जा रहे हैं तो वापिस घोड़े पर सवार होकर तो नहीं आ सकोगे। जीवित या मृत चार आदमियों द्वारा चारपाई पर लिटाकर ही लाना होगा। पहले चारपाई तथा आदमियों की व्यवस्था कर के जाइये। ऐसा जोरावर कौन है? जोधपुर नरेश से टक्कर लेगा और जीवित बच जायेगा, नहीं महाराज! कोई राजा नहीं है, किन्तु पीछे नहीं हटेंगे। ये तो स्वयं मर जायेंगे या आपको भी। इसलिए मेरा तो कहना केवल इतना ही है कि आप हिंगोली जा रहे हैं तो अकेले कदापि न जाइये।

राजा वापिस मुड़ गये और सेना को तैयार किया, साथ में दो हजार सैनिक लिए। घोड़ा, पैदल, हाथी द्वारा सजधज कर सेना चली। अनेकों अस्त्र शस्त्रों से सुज्जित होकर सेना चली। मानो किसी राजा पर विजय प्राप्त करने के लिए कूच किया हो अथवा अपने राज्य की सीमा में किसी विरोधी राजा ने हमला कर दिया हो। ऐसी तैयारी को देखते हुए आगे कोई न तो राजा था और न ही विरोधी। वहाँ तो केवल धर्म प्रेमी बिश्नोई थे।

हिंगोली के तालाब पर जाकर तम्बू गाड़ दिये। बिश्नोइयों के घरों के चारों ओर सैनिक पहरा देने लगे। कोई भी व्यक्ति घर से बाहर न निकल पाये। यदि कोई जबरदस्ती से निकलने की कोशिश करे तो उसको गोली मार दो, ऐसी ही राजाज्ञा सैनिकों को दी गयी।

सैनिक आज्ञा का पालन करते हुए अपने अपने मोर्चे संभाल लिये। बिश्नोइयों को घरो में ही कैद कर दिया किन्तु किसी को भी इस बात का पता नहीं चला कि यह क्या और क्यों हो रहा है? राजकीय सेना को देख कर सभी घबरा चुके थे। उन्हें यह तो भय हो गया था कि अब हमारे द्वारा रक्षित हरिणों की रक्षा न हो सकेगी। हो सकता है ये लोग इसी कार्य के लिए ही आये हों, तो भी कोई आश्चर्य नहीं है। हम कर भी क्या सकते है? हमारे हाथ पाँव तो बंध चुके हैं। शरीर निष्क्रिय हो चुका है। किन्तु फिर भी मन तो अब भी आजाद है, क्यों न सभी मिलकर हरि-कीर्तन करें, भगवान् विष्णु का नाम स्मरण करें। इस पंथ के रखवाले तो गुरु जाम्भोजी ही हैं। सभी ने अपने-अपने स्थानों में भगवान् का ही स्मरण किया।

सुबह से लेकर दोपहर तक तो इस प्रकार से घेरा लगा ही रहा। उधर सिद्धि और तख्तसिंह तालाब पर छिप कर अखाड़े में बैठ गये। मृग की प्रतीक्षा करते रहे। दोपहर दिन में एक मृगों का झुंड पानी पीने के लिए मस्ती के साथ उछल-कूद करता हुआ आया। दूर से आते हुए सिद्धि ने देखा और राजा को बतलाया, कि देखिये महाराज! अब अपने को यहाँ पर आने का कार्य सिद्ध होने वाला है। जिसकी हम प्रतीक्षा कर रहे है, वही मृगों की डार आ रही है। आप सचेत हो जाइये।

नरेश तख्तसिंह ने देखा कि सचमुच में ही सौंदर्य के प्रतीक प्रकृति का जीता जागता नमूना आ रहा है। इतने एक साथ और निर्भय युक्त हरिण तो राजा ने पहली बार ही देखा था। आँखे सौन्दर्य की ग्राहक होती हैं। जब उन्हें इच्छित स्वरूप मिल जाये तो फिर अपलक दृष्टि से ही निहारती हैं। आँखे तो आँखे ही हैं। वह चाहे राजा की हो चाहे भिखारी की हो।

मृगों के समूह ने तालाब में आकर भरपूर जल पिया और जुगाली करते हुए आगे-पीछे कतार लगाये हुए ज्योंही तालाब से बाहर निकले, त्योंही उस द्वारा प्रेरित राजा ने पिछले हरिण पर गोली चला दी किन्तु देव योग से कुछ ऐसी करामात हुई की गोली खाली चली गयी और हरिण चौकड़ी भरते हुए आँखो से ओझल हो गया।

राजा भी पीछा छोड़ने वाला कहाँ था? इसीलिए तुरंत घोड़े पर सवार होकर हरिणों का पीछा किया। हरिणों काह्य घोड़ा कहाँ पहुँच सकता था। फिर भी पहुँचना आवश्यक था। इसीलिए घोड़े के चाबुक मारा और घोड़ा ज्योंही छलांग मारने लगा, त्योंही घोड़ा और तख्तसिंह दोनों ही धरती पर लेटने लगे। घोड़ा तो बच गया था, चोट नहीं आयी, क्योंकि वह तो बिल्कुल ही निर्दोष था, वह तो अपने जातीय जीव को बचाना ही चाहता था, परन्तु लाचारी वश कर ही क्या सकता था?

तख्तसिंह नीचे गिर कर बेहोश हो चुका था। जब होश आया तो हाथ क¢धे से टूट चुका था। गुरु जाम्भोजी ने ही तख्तसिंह को सचेत किया था, उन्होंने ही यह शिक्षा दी थी कि हे राजन! यह कार्य तुम्हारे योग्य नहीं है। तुम स्वयं तो ठीक ही मालूम पडते हो, किन्तु दूसरों के बहकावे में आकर इस प्रकार से पाप कर्म करने को तत्पर हो जाते हो। इसीलिए ही तुम्हारे लिये यह दण्ड दिया गया है।

राजा दण्ड पाकर सचेत हुआ और सैनिकों को आज्ञा दी कि वापिस जोधपुर चलो। फिर कभी ऐसा कार्य मैं नहीं करूँगा। गुरु महाराज की कृपा से बिश्नोई स्वतंत्र हो गये। जो दूसरे के धर्म का भला नहीं चाहता, उसका भला कैसे हो सकता है?

तख्तसिंह ने बिश्नोइयों को अपने पास बुलाया और उन्हें यथा योग्य वस्त्र, आभूषण, भूमि, रुपये प्रदान करके सम्मानित किया और उनसे पूछा कि आप लोगों को कोई तकलीफ हो तो आप लोग मुझ से अवश्य ही कहिये। मैं दूर करूँगा। आपके धर्म पालन की दृढता से मैं बहुत ही प्रभावित हुआ हूँ। मैं भी आपके धर्म पालन में सहयोगी बन कर कुछ प्रायश्चित करना चाहता हूँ।

बिश्नोइयों ने कहा- महाराज! प्रथम तो हमारे सभी लोगों की शुभ कामनाएँ आप के साथ रहेगी और जाम्भोजी भगवान् की अपार कृपा भी होगी। इससे आप का हाथ पुनः ठीक हो जाये। तथा यहाँ पर हरे वृक्ष एवं वन्य प्राणियों को सदा ही खतरा बना रहता है, इन्हें बचाने के लिए हमें सदा ही संघर्ष करना पड़ता है यदि आप राजकीय सहयोग प्रदान कर सके तो वह कार्य सुलभता से हो सकता है। तख्तसिंह ने बिश्नोइयों से आज्ञा ली और जोधपुर जाकर ताम्र पत्र लिखवा कर बिश्नोइयों को दिया, जिसका विवरण इस प्रकार से है- “श्री परमेश्वर जी सत्य छै”

श्री राज- राजेश्वर महाराजाधिराज श्री तख्तसिंह जी वचनात थापन बिश्नोइयां रा गाँवाँ री सींव में नीली खेजड़ी कोई बाढण पावै नहीं, सिकार खेलण पावै नहीं, कोई नीली खेजड़ी बाढसी, सिकार खेलसी सो दरबार रो गुनैगार होसी। संवत उन्नीस सौ वैशाख बदी एक गढ जोधपुर।

इतनी प्रतिज्ञा करने वाले तख्तसिंह का हाथ पुनः जैसा था, वैसा ही जुड़ गया। राजा प्रजा ने आनंद मंगल से अपने जीवन को व्यतीत किया।