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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह90 / 94

बारहवाँ अध्याय का उतरार्द्ध · कथा 90

तारोजी भक्त द्वारा जीव रक्षा

तारोजी भक्त सदा ही संध्या, वंदन, स्नान, ध्यान एवं हवन करके ही भोजन करते थे। सदा ही जिनके यहाँ अतिथि सुभ्यागत का आदर- सत्कार होता था। गुरु जाम्भोजी में पूर्ण श्रद्धा-भक्ति थी। उनतीस नियमों का पालन करने में सदा ही तत्पर रहते थे। जीवों पर दया भाव ही अपना परम धर्म समझते थे । वे तो एक सच्चे बिश्नोई ही थे।

उस समय वि.सं. उन्नीस सौ के लगभग की बात है, जब बिश्नोई लोग राजस्थान की मरुभूमि से उठकर “जहाँ बूठो तहां बाहिये” की नीति अपनाते हुए पंजाब में जाकर बस गये थे। इधर तो राजपूतों का राज्य था, किन्तु मरुभूमि से बाहर वर्तमान हरियाणा पंजाब में अंग्रेजों का राज था। अंग्रेज तथा मुसलमान इन दोनों से बिश्नोई लोग पीड़ित थे। धर्म की रक्षा करने में कठिनता हो रही थी, परन्तु फिर भी अपने धर्म पर डटे हुए थ।

राजपूताने के लोग तो बिश्नोइयों के रहन-सहन, रीति-रिवाज, धर्म-कर्म के बारे में जानते थे, किन्तु अंग्रेज लोग राजमद में अंधे हो गये थे। वे कब किसी हिन्दुस्तानी की परवाह करने वाले थे। जो भी मन में आया वही अत्याचार प्रजा पर करते थे।

इधर हांसी हिसार के आस पास बिश्नोइयों की बस्ती थी। वहीं पर शीशवाल गाँव में तारोजी राहड़ भी रहा करते थे। एक समय तारोजी अपने खेत में कार्य कर रहे थे। उसी समय ही उनके आस पास हरिणों की टोली निर्भय होकर विचरण कर रही थी। पशु भी तो प्रेम भाव को पहचानते हैं। हिंसक तथा अहिंसक का भेदभाव समझते हैं। जहाँ शिकारी लोग बसते हैं, वहाँ हरिण पलायन करके, जहाँ दयावान लोग बसते हैं, वहाँ आकर विचरण करने लग जाते हैं। ऐसा ही दृश्य वहाँ तारो जी के आस पास का था।

एक बार हरिणों का शिकार करने के लिए अंग्रेज अफ सर इधर-उधर भटकता हुआ बिश्नोइयों के गाँव शीशवाल में पहुँच गया। क्योंकि अन्यत्र तो शिकार मिलनी दुर्लभ थी। वे दुष्ट लोग पहले ही खा चुके थे। कुछ बचे हु, इधर बिश्नोइयों की शरण ग्रहण की थी। इसलिए वह अंग्रेज अफ सर भी उन हरिणों के पीछे- पीछे शीशवाल तक पहुँच गया था। बिश्नोइयों के गाँवो में निर्भय होकर विचरण करते हुए उन्होंने देखा तो आश्चर्यचकित हो गया और तुरंत बंदूक भर के हरिण के ऊपर गोली चला दी। वह गोली हरिण को नहीं लगी।

उसी समय ही तारोजी अपने खेत में कार्य कर रहे थे, ज्योंही बंदूक की आवाज सुनी, त्योंही आगे बढ़ कर झट उस अफ सर को रोक दिया। कहने लगे रुक जाओ, फिर गोली नहीं चलाना। वह तनिक रुक कर तारे को डाँटते हुए कहने लगा- दूर हट जाओ! मेरा शिकार जा रहा है। यदि उसमें विघ्न डाला, तो मैं तुझे भी उसी गोली का शिकार बना दूँगा।

तारे ने मृत्यु को सामने खड़ी देखी थी। फिर भी कुछ भी परवाह नहीं की और पुनः उस अंग्रेज को रोकते हुए अति निकट पहुँच गये। वह तो मदान्ध था। किसी भारतीय को क्या समझता था?

झट से दूसरी गोली चला दी। ज्योंही उस अफ सर ने घोड़ा दबाया, बंदूक की आवाज गुंजायमान हुई त्योंही तारे भक्त ने अपनी लाठी का प्रयोग अंग्रेज ऊपर कर दिया। लट्ठी लगते ही अंग्रेज धरणी पर गिर गया। हरिण तो वन में भाग चुका था। हरिण की रक्षा हो गयी। अपने सामने हत्यारे से बचा लिया और एक ही चोट से उस अफ सर को धूल चटा दी।

वह तो वहाँ से चुपके से उठ कर अपने घोड़े पर सवार होकर वहाँ से भागा और हाँसी जाकर ही दम लिया। तारो अपने खेत में अपना कार्य करने लग गया। उस अफ सर ने हांसी जाकर तुरंत ही तारे की गिरफ्तारी का वारंट जारी करवा दिया। दूसरे दिन ही पुलिस वारंट एवं हथकड़ी लेकर शीशवाल में तारे के पास पहुँच गयी। और बंदी बना कर हांसी जेल में डाल दिया। न तो कोई फ रियाद करने वाला ही था और नहीं कोई सुनने वाला ही था। जेल में पड़े हुए भगवान् गुरु जाम्भोजी का ही स्मरण करते रहे।

जब भोजन का समय आया, तब नौकर भोजन लेकर उपस्थित हुआ, तब तारोजी ने भोजन करने से मना कर दिया। जेल अफ सर ने आकर पूछा- क्या बात है? आप भोजन नहीं करेंगे? तारो जी ने कहा- मैं गुरु जाम्भोजी का शिष्य बिश्नोई हूँ। प्रथम तो स्नान, फिर संध्या, उसके बाद हवन करके, फिर भोजन करूँगा। जब तक ये नियम नहीं निभेंगे, तब तक मैं भोजन नहीं करूँगा। जेल अधीक्षक ने समझाया कि इस प्रकार से तो तुम भूख मर जाओगे। तुम्हें पता है कि तुम्हारे जुर्म के अनुसार तुम्हें सात महीने की जेल हो गयी है। यदि जिंदा रहना है, तो खाना ही होगा। अन्यथा सात महीने भूखे तो जीवित नहीं रह सकोगे।

सात महीने ही क्यों? चाहे सात साल भी मुझे जेल में रहना पड़े किन्तु मैं अपने धर्म को नहीं तोड़ सकता। यदि आप मुझे भोजन करवाना चाहते हैं, तो मुझे मेरे धर्म-कर्म पूर्णतया निभाने दीजिये। जेल अधिकारी ने अपनी असमर्थता प्रगट कर दी, तो तारोजी ने भी अपनी असमर्थता प्रगट कर दी। इस प्रकार से तारोजी ने सात दिन रात भूखे ही जेल में रह कर व्यतीत कर दिये। अधिकारियों ने सजग होकर पहरा देकर अच्छी प्रकार से जांचा और परखा था। सातवें दिन गुरु महाराज की कृपा से जेल के ताले खुल गये और सातवें दिन बाहर आ गये। धर्मो र6ाति रक्षितः” आप धर्म की रक्षा करोगे, तो धर्म आपकी रक्षा करेगा।

अंग्रेज अफ सरों को भी तारोजी की दृढता के सामने झुकना पड़ा। और कभी भी बिश्नोइयों के गाँवो में शिकार खेलना छोड़ दिया। अंग्रेज सरकार ने अनेकों प्रमाण पत्र भी लिख कर दिया था, जो अब भी मौजूद है। यह सभी कुछ बिश्नोइयों की धर्म परायणता औ जीव रक्षा से ही संभव हुआ था।