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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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दूसरा अध्याय · कथा 11

दूदोजी को परचा देना

जम्भेश्वरजी ग्वाल-बालों के साथ गऊ आदि पशु धन को लेकर वन सें लौट आये थे। बालक वहीं जम्भेश्वरजी के पास खेल रहे थे। क्योंकि गऊ आदि पशुओं को पानी पिलाने का कार्य जाम्भोजी के ही अधीन था। कुएँ पर पानी पीने की जगह सीमित थी। पशु धन अत्यधिक था। गाय, भैंस, बकरी, ऊँट आदि। पानी तो सभी को ही पिलाना है। सभी प्यासे हैं। किन्तु पहले कौन पियेगा? प्रतीक्षा कौन करेगा? सभी इकट्ठे तो पानी पी भी नहीं सकते। इसीलिए बारी-बारी से जल पिलाने का कार्य जाम्भोजी कर रहे थे।

जो लोग पशुपालन करते हैं, वे ही जानते हैं कि यह कार्य कितना कठिन है। न तो वहाँ पर कोई अन्य सहयोगी है और न ही पास में कोई लट्ठी-डंडा है और न ही कोई भागदौड़ हो रही है। केवल हाथ की अंगुलियों के इशारे से पशुओं को पानी पिला रहे हैं। यह पीपासर वासियों के लिए तो कुछ भी अचम्भे की बात नहीं थी। यह तो नित्यप्रति होता था। किन्तु किसी अजनबी के लिए तो अवश्य ही आश्चर्यजनक घटना ही थी। वह अजनबी भी कोई साधारण आदमी नहीं था, जोधपुर नरेश राव जोधा का पुत्र दूदा था।

पीपासर के कुएँ पर एक तरफ तम्बू लगाकर बैठा हुआ, अपने भाग्य को कोसता था। कहीं कोई सहारा भी नहीं था। न ही कहीं कोई प्रकाश दिखाई देता था। चारों ओर अंधकार ही अंधकार दिखाई देता था। यहाँ पीपासर में कुछ अलौकिक ज्योति का दर्शन करके अपने को धन्य भागी मान रहा था।

वि.सं. 1519 में दूदे के बड़े भाई वरसिंग ने दूदे को देसोटो दे दिया था। अपने देश राज्य से निकाल दिया था। वरसिंग और दूदा अपने पिता जोधा की आज्ञा से मेड़ते का राज-काज देखते थे। किन्तु दोनों भाइयों में आपस में नहीं बनी। बड़े भाई ने छोटे भाई को निकाल दिया था। दूदा दुःखी होकर अपने बड़े भाई बीका के पास जा रहा था। थोड़े से सिपाही साथ में तथा तम्बू घोड़ा आदि थे। और तो राजकुमार के पास कुछ भी नहीं था। यदि पास में राजपाट, भूमि, धन आदि होते तो अहंकार में अन्धा हो जाता। यहाँ पीपासर के कुएँ पर कुछ भी नहीं देख पाता।

जब भगवान् अपने भक्त को अपने बास बुलाते हैं, तो उसका धन छीन लेते हैं, ताकि अहंकार से निवृत्त हो सके, और कुछ देख सके। कुछ सुन सके। यही दूदे के साथ हुआ था। दूदे ने देखा कि ये अबोल पशु भी एक साथ बड़े प्रेम से खड़े हुए अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। क्योंकि इनके सामने कोई देव खड़ा है। किन्तु हम मनुष्य इतनी सी मर्यादा को नहीं समझ पा रहे हैं। एक-दूसरों से झगड़ने को तैयार हैं। पहले हम, पहले हम। यह मेरा है। मेरा ही यहाँ अधिकार है। भाई-भाई आपस में झगड़ते हैं। एक-दूसरों को मारने- मरने को तैयार हो जाते हैं। यह कैसा मानव जीवन है? इन पशुओं की तरह हम भी यदि किसी एक परम पुरुष की शरण लेते, तो झगड़ा समाप्त हो जाये। हमसे भी बड़ा कोई और है, जो हमें श्वांस देता है। भोजन, अन्न, जलादि देकर हमारा जीवन बचाता है, तो कुछ शाँति का अनुभव किया जा सकता है। अन्यथा तो हम इन पशुओं से भी गये-गुजरे हैं। इन पशुओं ने परमेश्वर का सान्निध्य प्राप्त किया है। दूदा संध्या, पूजा-पाठ करके निवृत्त हुआ और इस आश्चर्यजनक घटना को ध्यान से देखता रहा।

दूदे ने देखा कि एक बालक खेजड़ी के पेड़ के नीचे बैठा हुआ हाथ की अंगुलियों से इशारा दे रहा है। जब सात अंगुलियाँ दिखाता है, तो उन सैकड़ों पशुओं में से सात गायें ही निकलकर जाती हैं। बाकी सभी जहाँ है, वहीं खड़ी रहती हैं। दुबारा दस अंगुलियाँ दिखाता है, तो दस बकरियाँ ही जाती है, बाकी वहीं बैठी या खड़ी रहती हैं। पाँच अंगुलियाँ के इशारे से पाँच भैंसे जाती है। सभी पशु यंत्रवत खड़े रहते हैं। बारी-बारी से जल पीते हैं। वापिस आकर शीश झुकाते हैं। दूसरी तरफ तृप्त होकर खड़े हो जाते हैं। ज्यूँ छक आई सारी।

दूदे ने हाथ जोड़कर अपने तम्बू में बैठे ही बैठे आदेश किया। यह तो अवश्य ही हमारे ईष्ट देवता हैं। हम लोगों का इन्हें प्रणाम कहना उचित्त ही होगा। मेरे भाई ने तो मुझे निष्कासित कर ही दिया। अब मेरा सहारा कौन है? इनके निकट जाऊँ और अपनी व्यथा कथा कह दूँ। जब ये पशु भी इनकी आज्ञा का पालन करते हैं, तो मेरा भाई बरसिंग क्यों नहीं मानेगा? यहाँ तो मेरा कार्यसिद्ध हो जायेगा। मुझे किसी अन्य भाई की सहायता लेकर खून खराबा करने की शायद आवश्यकता नहीं पड़ेगी। किन्तु यहाँ पर तो सम्पूर्ण गाँव के लोग मुझे देख रहे हैं। यहीं पर जाकर इनके चरण पकड़ लूँ और मेरा कार्य न बने तो अपमान ही होगा। ये लोग मुझ जैसे दुःखी व्यक्ति का दुःख और भी बढ़ा देंगे। ये लोग मेरी हँसी उड़ायेंगे। बिना विचारे झटिति आगे कदम न उठाये। यदि कार्य सफल न हो तो लोगों में हँसी का पात्र बन जाता है।

अभी तो यह छोटा बालक ही है। ग्रामपति लोहटजी ठाकुर का बेटा है। मैं एक राजपुत्र हूँ। आयु, विद्या, बल में मैं इनसे श्रेष्ठ हूँ। यहाँ मिलना ठीक नहीं होगा। अब मैं अपना पूजा-पाठ कार्य पूरा कर लेता हूँ। यह बालक गऊवें चराने वन में जायेगा, वहाँ एकान्त में मिलूँगा और अपना दुःखड़ा सुनाऊँगा।

गायें जल पीकर जंगल में चरने हेतु चल पड़ी थी। पीछे-पीछे जाम्भोजी भी चल पड़े थे। दूदे ने देखा कि अब तो गाँव से बाहर चले गये हैं। किन्तु आँखों से ओझल नहीं हुए हैं। अभी थोड़ी दूर ओर जाने दो। मैं अपनी तुरंग बछेरी पर सवार होकर पहुँच जाऊँगा। दूदे ने किसी साथी को कुछ भी नहीं कहा और अपनी मनपसंद तेजस्वी घोड़ी पर सवार होकर उत्तर की तरफ, जिधर जाम्भोजी गये थे, उधर ही घोड़ी हाँक दी।

आगे-आगे गऊएँ, पीछे-पीछे जाम्भोजी तथा उनके पीछे राव दूदा, छेती-फासला उतना ही, जितना पीपासर से थी। न तो आँखों से ओझल हुए हैं और न ही पहुँच सके हैं। दूदे ने सोचा-आज मेरी घोड़ी दौड़ नहीं रही है। मैं पहुँच नहीं पा रहा हूँ। घोड़ी के चाबुक मारा कि जल्दी पँहुच जाऊँ। अभी पकड़ लूँ। घोड़ी, छलांग मारने लगी। वायु की भाँति तेज दौड़ने लगी। किन्तु ज्यों-ज्यों घोड़ी भागने लगी, त्यों-त्यों दूर ही दूर श्रीदेव दिखाई देने लगे। अब तो कहीं आँखों से ओझल न हो जाये। फिर मैं कहीं का भी नहीं रहूँगा। अपने साथियों को तो छोड़ आया। मैं अकेला क्या कर सकूँगा?

वेद भी जिनके बारे में नेति-नेति कहते हैं। मैं मूर्ख-गँवार उनका अपनी शक्ति द्वारा कैसे पार पा सकता हूँ। ज्यों-ज्यों अपनी अल्प शक्ति के द्वारा उस महान् को पकड़ने का प्रयत्न करूँगा, त्यों-त्यों डूबता ही जाऊँगा। दूर ही होता चला जाऊँगा। उनकी प्राप्ति हेतु तो अहंकार को त्यागना ही होगा। समर्पण भाव से शरण ग्रहण करनी ही होगी। तभी कहीं पार पाया जा सकता है। वहाँ तक पहुँचने की योग्यता आ सकती है। अभी तो मैं उनकी कृपा का अधिकारी से ही नहीं बन पाया हूँ। अभिमान को छोड़कर ही पहुँचा जा सकता है। मेरी यह तेजस्वी घोड़ी, पसीने से तरबतर हो गयी है। मैं इसके ऊपर सवार भी अत्यंत खिन्न हो गया हूँ। इस प्रकार की सवारी से क्या लाभ, जो मंजिल तक नहीं पहुँचा सके? ऐसा विचार करके दूदा घोड़ी से नीचे उतर गया। परमात्मा से मिलना है, तो नीचे उतरना ही होगा। अपनी अहंकार-ममता को त्यागना ही होगा। यही परमात्मा के मिलन में बाधा बनती है।

दूदे ने अपने अंगोछे से दोनों हाथ बाँध लिये। हाथ जुड़े रहे। वहाँ पहुँचूँ तब तक खुल न जाये। बार-बार जोड़ना-तोड़ना ठीक नहीं है। एक बार जुड़ गये, तो फिर जुड़ ही गये। पुनः टूट न जाये। पैरों के जूते उतार दिये। नँगे पाव, घोड़ी को पीछे खींचते हुए, थोड़ी दूर ही भागे थे कि सम्भराथल पर भगवें भेष में दूदे ने जाम्भोजी के दर्शन किये।

भगवाँ भेष देखकर दूदे ने आदेश (प्रणाम) किया और अपने सिर को झुकाया। सिर की पगड़ी उतारकर सद्गुरु के चरणों में रख दी। स्वयं समर्पित हो गये। पीछे कुछ भी नहीं रखा। जो कुछ है, वह आपके ही चरणों में है। मेरा अपना कुछ भी नहीं।

पाघ मेल्हरू चरन पकरेहु, दे मन्त्र शिष कीजिये।

कृपा रावरी पाऊँ अटल पद, देख दरशन जीजिये।

देहुं भेख अलेख मो कहुँ, जगत में जस लीजिये।

पर्शेउ जम्भ नरेश फिर करि, भेख मोरा राखीजिये।

जाम्भोजी ने कहा-हे दूदा! तुम वापिस जाओ। मेड़ता के राजा बनो। प्रजा का पालन-पोषण करो। दूदा बोला-हे महाराज! मेरे बड़े भाई ने मुझे देश निकाला दे दिया है। मेरा मुँह काला करके मुझ निरपराधी को निकाला है। अब मैं कैसे वापिस जाऊँ? यदि आपकी कृपा हो तो यह असंभव कार्य भी संभव हो सकता है। अन्यथा तो मेरा अन्त होना निश्चित ही है।

जाम्भोजी ने कहा-हे दूदा! मेरी बात पर विश्वास करो। आज से तुम नरेश हो। मैंने जो कह दिया वही होगा। यदि तुम्हें मेरी बात पर विश्वास नहीं हो तो तुम यहाँ से वापिस जाओगे, तब नागौर के उत्तरी दरवाजे पर तुम्हें दो घुड़सवार मिलेंगे। वे तुम्हें वापिस बुलाने के लिए आयेंगे। वहाँ से आगे बढ़ोगे, तो मूण्डवा के तालाब की पाल पर तुम जहाँ तम्बू गाड़ोगे, वहीं तुम्हें अपार स्वर्णधन मिलेगा। रुपयों आदि के टोकणे मिलेंगे। वह तुम ले लेना। वह तुम्हारा ही धन है।

दूदा बोला-हे महाराज! मेरा भाई मुझ पर क्रोधित हुआ है, अभी भी मुझे खाने के लिए दौड़ता है, यह मैं देखता हूँ? यह कैसे सम्भव होगा?

जाम्भोजी बोले-हे दूदा! सुनो! जब से तुम वहाँ से छोड़कर आ गये हो, तभी से वह विनम्र हो गया है। यहाँ पर आने से तुम्हारा भी गर्व गलित हो गया है। तुमने अपनी अहंकार की प्रतीक पगडी समर्पित कर दी है। यह सभी कुछ नम्रशीलता से ही सँभव हुआ है। दोनों ओर से पत्थर से पत्थर टकराता है, तभी आग प्रकट होती है। आग से जल टकराये, तो आग बुझ जाती है। रंग को देखकर, रंग बदलता है। यह सभी कुछ कृष्ण चरित्र से ही संभव हुआ है।

दूदा ने पुनः प्रार्थना की कि हे गुरुदेव! आप मुझे अपने भेष का चिह्न स्मृति के रूप में भेंट दीजिये। वह तो मेरे यहाँ शान्ति-शक्ति के प्रतीक रूप में रहेगा तथा आगामी आने वाले शत्रुओं का मैं सामना कर सकूँ इस हेतु मुझे शस्त्र प्रदान कीजिये। आपकी अपार कृपा होगी, तो मैं न्यायपूर्वक राज्य करते हुए प्रजा का पालन कर सकूँ। विधर्मियों से लड़ने हेतु मुझे ऐसा सम्बल प्रदान कीजिये।

जम्भेश्वर कृपा करी, लियो भेख सिरधार।

काठ मूंठ कर्ता करी, तद सूँपी तरवार।

पलटेउ मूंठ पलक में, सकल गएउं भ्रम भाज।

खांडो भेख जूं राखहो, तब लग अवचल राज।।

जाम्भोजी महाराज ने दूदे को अपना भेष-वस्त्र दिया तथा एक केर वृक्ष की लकड़ी दी और कहा कि यह केर की लकड़ी ही तुम्हारे लिए तरवार है। जब तुम इसे कार्य हेतु प्रयोग करोगे, तो यह खाण्डा-तरवार बन जायेगा। ये दोनों वस्तुएँ जब तक रखोगे, तब तक तुम्हारा राज्य अडिग रहेगा। राव दूदा ने ये दोनों वस्तुएँ लेकर, सादर प्रणाम करते हुए, अपने को कृत-कृत्य अनुभव करते हुए वापिस मेड़ते के लिए प्रस्थान किया।

दूदा को मार्ग में दो घुड़सवार बुलाने वाले मिल गये। मूण्डवा के तालाब पर सोने के भरे हुए चरू प्राप्त हुए, जैसा श्रीदेव ने कहा, वैसा ही फल प्राप्त करके वापिस मेड़ता पहुँच गये। वहाँ पर श्री देव की प्रेरणा से बरसी ने दूदे का स्वागत किया और उन्हें राज्य सौंप दिया। राव दूदा ने बहुत समय तक राज्य किया। जम्भेश्वरजी की आज्ञा का पालन किया।