दूसरा अध्याय · कथा 8
बाल-लीला
जाम्भोजी ने सात वर्ष तक बाल लीलाएँ की थीं। बाल्यकाल जीवन का प्रथम सोपान है। बाल्यवस्था से ही यदि संस्कार अच्छे दिये जायेंगे तो संस्कार जीवनपर्यन्त साथ रहेंगे। किस प्रकार से बाल्य-जीवन व्यतीत करना चाहिये। ये भिन्न-भिन्न प्रकार की शिक्षाएँ जाम्भोजी ने अपने जीवन से देने की महत्ती कृपा की है।
हे गुरुदेव! जाम्भोजी द्वारा दी गयी बाल्य लीला की शिक्षाओं के बारे में मैं पूर्णतया अनभिज्ञ हूँ। आप मुझे पृथक्-पृथक् समझाने की कृपा करें। मैं भी तो अभी बाल्यावस्था को पार नहीं कर पाया हूँ। वैसे तो ज्ञान की दृष्टि से देखा जाये तो सभी बालक ही हैं। जिन्होंने सम्पूर्ण वेद,शास्त्र,दर्शन, पुराण आदि पढ़ लिये हैं, किन्तु गुरु जाम्भोजी के बारे में कुछ नहीं जाना है, वह ज्ञानी की दृष्टि में तो बालक ही है। आयु चाहे कितनी ही पार कर जाये। जाम्भोजी ने कहा भी हैघणा
दिना का बड़ा न होयबा, बड़ा न लंघिबा पारूं।
उत्तम कुली का उत्तम न होयबा, कारण किरिया सारूं।
नाथोजी उवाचः- हे शिष्य! जब पीपासर के ठाकुर लोहटजी को वृद्धावस्था में सन्तान की प्राप्ति हुई हो तो खुशी का ठिकाना न रहा। लोगों को आश्चर्य हुआ कि इस वृद्धावस्था में तो बालक का जन्म होना असंभव ही है। जितने लोग, उतनी ही बातें हुई। कुछ समझदार लोगों ने कहा कि- यह असंभव नहीं पूर्णतया संभव है। क्योंकि त्रेता में अयोध्या के राजा दशरथ के भी तो चार संतानें वृद्धावस्था में ही हुई थीं। लोहटजी की तरह उनके भी संतान नहीं थी। किसी ऋषि के शुभ आशीर्वाद से यज्ञ द्वारा चार सन्तानें हुई? वे जगत्प्रसिद्ध भगवान् राम,लक्ष्मण,भरत,शत्रुध्न कहलाये।
सामान्य रूप से जन्म लेना, मरना यह तो प्राकृतिक रूप से चलता ही रहता है। जब कुछ अनहोनी होती है, तो उसमें अवश्य ही कुछ अप्राकृतिक, कुछ ईश्वरीय होता है। हे भाइयों! आप चिंता न करें। हमारे राजा साहब के पुत्र हुआ है तो अवश्य ही कोई चमत्कार ही होगा। हमारे गाँव का तो सौभाग्य ही है जो ऐसा अचंभा ही हुआ। हम लोग भी चलते हैं, खुशी में सम्मिलित होते हैं। इसी बहाने से उस अद्भुत बालक का दर्शन भी संभव हो सकेगा। हे मित्रो! यह समय हमारे घर पर बैठकर केवल बातें करने का नहीं है। गाँव-गाँव, घर-घर से लोग छोटे-बड़े, सभी लोहटजी के घर एकत्रित होकर खुशी मना रहे हैं। खुशी तो स्वयं प्रकट होगी, क्योंकि भगवान् कृष्ण-विष्णु स्वयं ही अवतार लेकर पीपासर नगरी में पधारे हैं।
भगवान् तो स्वयं आनन्द स्वरूप हैं। यह आनन्द पीपासर तथा जीव रूप से सभी शरीरों में भी तो विराजमान हो रहा है। उस अन्दर बैठे हुए सत्चित आनन्द की झलक मिली है। तभी तो आनन्द का उत्सव हो रहा है। जब वह अन्दर बैठा हुआ ही गायब हो जाता है, तो यह देह मृत हो जाती है। उसका तो राम ही निकल गया, तो पीछे क्या रह गया? मृत शरीर को ढ़ोने के अलावा कुछ भी नहीं होता।
लोहट एवं हांसा देवी को भी आज खुशी का, आनन्द का पार नहीं है। आगन्तुकों को बधाइयाँ बाँट रहे हैं। मानों सभी कुछ लुटाने को तैयार हैं। किन्तु एक को छोड़कर। यह नया शिशु आया है, यह तो हमारे जीवन का आधार है। इसके अलावा सभी कुछ धन-दौलत, गायें आदि देने के लिए प्रस्तुत हैं। भगवान् ही आ गये हैं, तो अन्य धन-दौलत की क्या आवश्यकता है? जब तक भगवान् की प्राप्ति नहीं थी तभी तक ये वस्तुएं प्रिय लगती थी। दूसरों को अपनी प्रिय वस्तु कैसे दी जा सकती है किन्तु अब परमप्रिय भगवान् का पदार्पण हो चुका है। उनके सामने अन्य वस्तुएँ नगण्य हो चुकी हैं। जिनका कुछ भी महत्व नहीं है, वे वस्तुएँ दी जा सकती हैं। इसीलिए लोहटजी दोनों हाथों से लुटा रहे हैं।
बधाइयाँ ग्रहण करने वाले नट,भाट,ब्राह्मण,नाई आदि बड़े प्रेम से ग्रहण कर रहे हैं। उन्हें आज तो थोड़ा ही मिला है, तो भी संतोष हो रहा है। अन्य दिनों में तो संतोष नहीं होता था। जितना भी अधिक दिया जाता था, उतनी ही तृष्णा,इच्छा,वासना ज्यादा बढ़ जाती थी।
आज तो वे लोग संसार की वस्तु ग्रहण नहीं कर रहे हैं। ये वस्तुएँ धनादिक तो मात्र बहाना है। ये लोग तो उस परमपिता परमात्मा को ही ग्रहण कर रहे हैं। जब वह परमात्मा ही आत्मा से मिलन करता है, तभी आत्मा भी सत्चित् आनन्द को प्राप्त हो जाती है। आत्मा के सोये हुए भाव जागृत हो जाते हैं। क्यों न संतोष होगा? यदि परमात्मा की प्राप्ति किसी वस्तु के बहाने से हो रही है। जहाँ स्वयं भगवान् आये हैं, वहाँ तृष्णा, दुःख,द्वन्द्व का क्या काम?
ग्राम की वृद्धा तथा युवतियाँ भी लोहट के आँगन में गीत गा रही हैं। लोहट का लाला अजर-अमर रहें, यशस्वी होवे, लोहट के कुल को आगे बढ़ाये, ये सभी शुभकामना करती हुई, आशीर्वाद प्रदान कर रही थीं।
हांसादेवी भी भगवान् से प्रार्थना कर रही थीं। हे देवाधिदेव! आपने मुझ पर बड़ी कृपा करी है, जो मुझे इस अवस्था में इतना सुन्दर पुत्र प्राप्त हुआ है। यदि आपकी इतनी अपार कृपा नहीं होती, तो आज मुझे यह शुभ दिन देखने को नहीं मिलता। मेरे पति कभी प्राण त्याग देते। उनके बिना मैं एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकती थी। आपको बार-बार नमन है।
यह तो निश्चित ही है कि वन में एक योगी ने हमें आशीर्वाद दिया था। उनकी कृपा से ही आज हमारा घर रोशनी से जगमगा रहा है। अन्यथा तो अंधेरा ही था। हे मेरे परमेश्वर! यहाँ तक तो खुशी प्रगट कर दी है, किन्तु मुझे संदेह हो रहा है, भविष्य के बारे में। मैंने अभी-अभी जन्मघूंटी पिलाने की कोशिश की है। किन्तु यह तो पीता ही नहीं है। बिना कुछ ग्रहण किये यह बालक कैसे जीवन धारण करेगा? इस बात का तो अब तक किसी को भी पता नहीं है।
वैसे तो मैं जानती हूँ कि यह बालक तो वही योगी है, जो स्वयं हमें तपस्या से निवृत्त कर आया है। योगी लोग तो ऐसा सुनते हैं कि समाधि ले लेते हैं। बिना अन्न-जल, श्वांस के भी युगों-युगों तक जीते हैं। किन्तु यह नवजात मेरा छोटा सा बेटा कैसे जियेगा? पहले की बात और है अब तो यह शिशु है। घूंटी पिलाने की कोशिश करती हूँ, किन्तु यह तो पीता ही नहीं है। क्या मेरे में कुछ दोष है? मैं तो एक माँ हूँ, और कुछ भी नहीं। माँ का तो मन प्रसन्न तभी होता है, जब बेटा कुछ खाए-कुछ पीये।
कहीं यह स्वयं जगत का पालन-पोषणकर्त्ता भगवान् विष्णु तो नहीं आ गया? मैं इसे क्या खिलाऊँ- पिलाऊं? वह तो सम्पूर्ण जगत को खिलाने-पिलाने वाला है। मैं भी कितनी अज्ञानी हूँ। उस विष्णु की माँ बन बैठी हूँ। जो सभी की चिंता करते हैं। मैं उसकी चिंता करने लगी।
मुझे भी अहंकार आ गया है। भक्तिभाव चला गया है। क्या भगवान् कभी अहंकारी से कुछ ग्रहण करते हैं? मुझे तो “मैं” भाव को त्याग करके, प्रेम से कुछ समर्पण करना होगा। तभी कुछ भगवान् ग्रहण कर सकते हैं।
हो सकता है कि पतिदेव ने मुझे अभी-अभी अंधली कहा है। क्या मैं सचमुच अंधी तो नहीं हो गयी हूँ। घूंटी पिलाने का प्रयत्न करती हूँ किन्तु ठीक से मुख में पिला नहीं पा रही हूँ। मुझे तो कुछ दिनों से सचमुच ही दिखाई कम देने लग गया है। इस समय तो मैं किंकर्तव्य विमूढ़ हो गयी हूँ। कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है। क्या करूँ क्या न करूँ? क्यों न ग्राम की वृद्ध महिला को बुला लूँ। वह दाई का कार्य करती है। उन्हें मालूम है कि नवजात शिशु को प्रथम घूँटी किस प्रकार पिलाई जाती है? मैं तो सर्वथा अनुभव हीन हूँ, मुझे क्या पता? मेरे तो यह प्रथम तथा अन्तिम एकमात्र संतान हुई है। मैं भी अज्ञतावश असंभव कार्य को करने में प्रवृत्त हुई हूँ। यदि कोई कार्य स्वयं न कर सके, तो दूसरों से पूछ लेना चाहिए। दूसरों से करवाने में क्या शर्म की बात है?
अच्छा, तो मैं अभी बाहर बैठी हुई महिला गीत गा रही हैं, उन्हें अन्दर बुलाती हूँ। यह घूँटी का कार्य उन्हें सौंप देती हूँ। हांसा देवी की आज्ञा स्वीकार करके नवजात शिशु का दर्शन करने अनेकों महिलाएँ सूतिका गृह में प्रवेश कर गयीं।
आपस में कहने लगीं-हे सखी! अच्छा है तुम्हारा बेटा तो कितना सुन्दर सलौना दिव्य रूप, ये तो साक्षात् कन्हैया ही तुम्हारा बेटा बनकर आ गया है। हम तो सुन्दर रूप को देखकर बलैया लेती है। जुग-जुग जियो हांसा के लाल। कितना अच्छा होता यह पहले ही आ जाता। न जाने आने में इतनी देरी क्यों की? अब तक जवान हो जाता। लोहट-हांसा दादा-दादी हो जाते। कौन जाने भगवान् की लीला के बारे में, न जाने वे क्या करना चाहते हैं? कौन जाने कि यही ठीक के लिए हुआ है।
हमें आगे-पीछे से क्या लेना? जो वर्तमान में सुख मिल रहा है, उससे हम वंचित क्यों होवें? जितना चाहे उतना लूट लें। यही ठीक रहेगा। अन्यथा तो आगे-पीछे के चक्कर में यह वर्तमान ही चला जायेगा। हांसा बोली-हे सखियो! मेरी व्यथा भी सुनो! यह बालक तो जैसा आपने कहा है, कन्हैया ही अवतार लेकर आ गया है। ऐसा मुझे भी आभास होता है। किन्तु यह बालक तो कुछ भी खाता-पीता नहीं है। इसने तो अब तक जन्म घूंटी भी नहीं ली है। अब तुम्हीं बतलाओ कि यह बालक जीवन किस प्रकार धारण करेगा?
सखियाँ कहने लगी-हे देवी! यदि ऐसी बात है तो तुम हमें पहले बतलाती। हम बड़ी-बूढ़ी यहाँ एकत्रित हैं। घूंटी देने में कुशल हैं। अभी पिलाएँ देती हैं। लाओ बालघूंटी। हांसा ने बालघूंटी उस वृद्धा के हाथ सौंप दी तथा धैर्य धारण कर लिया। अब ये सखियां अवश्य ही पिला देगी। यह तो मेरी ही भूल थी, जो मैंने इन्हें पहले नहीं बुलाया।
एक वृद्धा ने घूंटी हाथ में ली और बड़े ही अहम्भाव से जाम्भोजी को पिलाने लगी और कहने लगीन्- जब मैं जीवित नही रहूँगी, तो इस गाँव की साख मिट्टी में मिल जायेगी। किन्तु क्या देखती है सीधा मुख पर हाथ नहीं जा रहा है। कभी तो नाक पर जा टिकता है। तो कभी थोडी पर जा टिकता है। कभी ललाट से जा टकराता है। दूसरी देवी पास में खड़ी देखते हुए हँस रही है। कहने लगी-हे माता! तुम हट जाओ। तुम्हें अब पता नहीं चला कि वृद्धावस्था आ गयी है। हाथ काँपने लगे हैं। तुम्हें दिखलाई भी कम ही देता है, तुम्हें मुख का तो पता ही नहीं है। तुम तो कभी थोडी पर, कभी नाक पर या कभी ललाट पर हाथ फेर रही हो, वहाँ मुख कहाँ है अब तो अपनी चौधर छोड़ दो। भगवान् का भजन करो। तुम्हारे वश की बात नहीं है। रुक जाओ मैं पिलाती हूँ।
दूसरी सखी ने घूंटी का कटोरा हाथ में लिया और देखा कि कहीं मैं भी उसी तरह हंसी का पात्र न बन जाऊँ। ध्यान से देखा तो हजारों मुख दिखाई देने लगे। कौन-कौन से मुख में घूंटी दी जाये। सहस्त्र शीर्षा पुरुषा जो हजारों मुख वाले भगवान् हैं, उन्हें कैसे एक मुख से तृप्त किया जा सकता है? भगवान् को आहुति देना है, तो हजारों-लाखों मुखों में भोजन का ग्रास देवें। तभी भगवान् के पास पहुँचता है। केवल मंदिर में भोग लगाने से कार्य नहीं चलेगा। भगवान् तो विराट् स्वरूप हैं। सभी के शरीरों में विद्यमान हैं। सभी को तृप्त करते हैं। शरीरधारी जीवों का अन्न-जलादि से तृप्त करें तथा देवताओं को यज्ञ द्वारा तृप्त करें। यही शिक्षा जाम्भोजी ने, जीवन घूंटी न लेकर जन समाज को प्रदान की थी। किन्तु पीपासर की नारियाँ तो यही समझ रही थी कि हम इस बालक को घूंटी देंगी।
पास खड़ी हुई नारियाँ भी अपना-अपना कौशल दिखाने लगी, किन्तु कोई सफल नहीं हो सकी। भगवान् ने संकेत दिया कि आप लोग भगवान् के बंदों को, देवताओं को, जो तुम्हें वायु, जल, आकाश,तेज आदि प्रदान करते हैं, उन्हें आहुति दो, तभी भगवान् प्रसन्न होंगे। तुम्हारा दिया हुआ सहर्ष स्वीकार करेंगे। किन्तु ग्रामीण इस बात को समझ नहीं पाये। सभी नारियाँ हार करके वापिस अपने घरों को लौट आयी।
आज के आँखों देखे आश्चर्य को एक-दूसरे से कहने लगीं-भले ही लोहटजी को वृद्धावस्था में पुत्र प्राप्त हुआ है, किन्तु यह बालक तो अपने बालकों जैसा साधारण बालक नहीं है। इसके शरीर में जो ज्योति छिटक रही है। देखा तुमने। हे सखी! तुमने देखा, उस घर में दीपक भी नहीं था, तो भी प्रकाश हो रहा था। वहाँ तो कुछ बात ही दूसरी है। हम तो अपने घर लौट आयी, किन्तु वह बालक तो हमारे हृदय में बस गया है। बाहर निकालने की, उसे भूलने की कोशिश कर रही हूँ किन्तु वह तो भूला ही नहीं जा सकता। उसे देखकर तो हमें सुध-बुध ही न रही। घर-परिवार सभी कुछ ही विस्मृत हो गया।
हे सखी! उसमें कुछ न कुछ तो जादू अवश्य है। क्यों न होगा? वह स्वयं तो कृष्ण कन्हैया ही यशोदा का लाल, हांसा का लाल बनकर आया है। ये बिचारी गोपियाँ जिन्हें लोग दोष लगाते हैं? दुनियां के लोग क्या जाने, उनकी दशा को। “घायल की गति घायल ही जाने जे कोई घायल होई।” आज हमें पता चला है कि वे गोपियाँ कृष्ण के विरह में क्यों तड़पती थीं?
चलो! घर का कार्य भी तो करना है। केवल गोपियाँ बनने से तो पेट की भूख नहीं मिटेगी। मन की भूख तो देवदर्शन से मिट जायेगी, किन्तु पेट की भूख तो अन्न का भोजन करने से मिटेगी। कल भी जायेंगी। कन्हैया का दर्शन करके जीवन का लाभ उठायेंगी।
कैलाश पर्वत पर तपस्या में लीन भगवान् शिव से पार्वती ने कहा- हे देव! समाधि खोलिये! जिस भगवान् विष्णु की आप उपासना करते हैं। वे आपके आराध्य देव निराकार होते हुए भी साकार रूप धारण करने में कुशल हैं। उन्होनें अबकी बार फिर से नया चरित्र (खेल) रचा है। आप जाकर देख तो आओ। पूर्व अवतारों के अवसर पर तो आप अतिशीघ्र दर्शनार्थ जाया करते थे। अबकी बार उदासीनता क्यों?
हे देवी! अभी जाता हूँ। मुझे पता है। मैंने समाधि में ही सभी कुछ जान लिया है। अब जो तू कहती है, तो मुझे अवश्य ही जाना है। यह तो तूने मेरे मन की ही बात कह दी।
संध्या वेला में सभी नारियां अपने-अपने घरों को चली गयी थीं। उन्हें बहुत सा घर का कार्य करना था। गायों को दुहना, भोजन बनाना, संध्या वंदन करना आदि। ऐसे अवसर पर हांसा अकेली घर में थी। बालक के बारे में सोच रही थी। यह कैसे जीवन धारण करेगा? इसने तो दुग्धादि कुछ भी ग्रहण नहीं किया है। इस बालक के तो भगवान् ही मालिक हैं। वे ही बचायें तो ही बच सकता है।
उसी समय घर में एक योगी ने प्रवेश किया। हांसा ने देखा-हाथ में डमरू , जटाजूट धारी, माला जपता है वह दिगम्बर वेशधारी। हांसा ने सामने जाकर स्वागत किया। आइये महाराज! आइये! हम आपकी क्या सेवा करें? भोजन दुग्धादि ग्रहण करके हमें कृतार्थ करें। हम गृहस्थ हैं। आप हमें अपना धर्म निभाने का सुअवसर प्रदान करें।
आप कौन हैं? आप कहीं स्वयं भगवान् विष्णु, ब्रह्मा या शिव तो मेरे घर पर योगी के रूप में नहीं आ गये हैं? यदि ऐसा है, तो आज बड़ी धन्य भागी हूँ। मैं आज कृतार्थ हो गयी हूँ। मेरा जीवन सफल हो गया। भगवान् शिव बोले-ऐसा ही है! तेरे घर पर तो इस समय तीनों देवता आ गये हैं। यह जो तुम्हारा बालक है, वह तो साक्षात् सृष्टि का पालन-पोषणकर्त्ता भगवान् विष्णु है। इस समय तुम्हारे पतिदेव लोहटजी तो ब्रह्मा के रूप में हैं और तुम्हारे सामने खड़ा मैं स्वयं शिव कल्याणकारी हूँ। इन तीनों को हे देवी! तू प्रत्यक्ष देख! हे ब्रह्माणी! तुम तो स्वयं मायास्वरूपा हो। भगवान् विष्णु स्वयं कुछ नहीं करते। वे तो वेमाता-ब्रह्मा से जैसा चाहते हैं, वैसा कार्य करवा लेते हैं।
पूर्व में बहुत बार भी भगवान् ने ऐसे ही नये-नये असंभव अनहोने रूप धारण किये थे। जैसे नृसिंह, वराह, कच्छ, वामन इत्यादि। मैं तो स्वयं आश्चर्यचकित हूँ कि भगवान् न जाने कैसे-कैसे विचित्र अवतार लेते हैं। अच्छा है! इस बार तो तुम्हें अपनी माता स्वीकार किया है। मैं देखता हूँ तुम्हारे लाला को कि ये तो मानव रूप में ही हैं। यह तुम्हारा बेटा तो सुन्दरता में तो राम-कृष्ण से भी अधिक है। यह मरुदेश कुछ विचित्र था, किन्तु अब तो वृन्दावन-अयोध्या बन गया है।
यह स्वाभाविक ही है कि नवजात शिशु कुछ खाये-पीये नहीं, तो माता-पिता परिजनों को चिंता होगी ही। घर में सभी कुछ पदार्थ विद्यमान हो किन्तु भूख ही न लगे तो फिर सभी पदार्थ व्यर्थ है। इसलिए हे देवी! तुम्हें भी अच्छा नहीं लगता, बिना दुग्धपान किये, बच्चे का रहना। मेरा बेटा अधिक दूध-मक्खन खाये, जल्दी बड़ा हो जाये।
मैं तुझे बतला देता हूँ कि यह साधारण बालक नहीं है। अभी द्वापर में कृष्ण ही थे। वे ही तुम्हारे आये हैं। उस समय ब्रजभूमि में गायें चराते हुए माँ यशोदा तथा अन्य गोपियों के प्रेम की अधिकता के कारण दूध, मक्खन, दही, मलाई आदि पदार्थ कुछ ज्यादा ही जीम लिये थे, अब तक तो वही नहीं पच पाये हैं। उस समय ज्यादा जीम लेने से इस समय व्रत करना पड़ेगा। यह तो प्रकृति का नियम है कि, पहले ज्यादा खा जाओ, तो फिर खाना-पीना बंद। उपवास करो। और क्या इलाज है? यही कह रहे हैं क्योंकि इस जन्म में ये भोजन-पान नहीं करेगे। निराहारी रहेंगे। इस बात को तुम सत्य जानो। हांसा हाथ जोड़े खड़ी योगी की बात सुनती रही, बीच में कुछ भी नहीं बोली।
हांसा कहने लगी-क्या मेरा बेटा कभी भोजनपान नहीं करेगा? यदि ऐसा है तो जीवनधारण कैसे करेगा? हे योगी! मैं यह जानना चाहतद्ध हूँ कि इस कलयुग में अन्नमय प्राण है, तो बिना अन्न-जल के कैसे जियेगा?
हे देवी! आप चिन्ता न करें, ये तो सभी जगत के आधार हैं। म्हापण को आधारूं हमारा तथा इनका जीने का क्या आधार हो सकता है? क्योंकि हम ही तो सम्पूर्ण सृष्टि के आधार हैं। हम तो परलोक के शरीरधारी हैं। हमें जो शरीर प्राप्त है, यह इस लोक का नहीं है। इस शरीर को जीवित रखने के लिए किसी वस्तु की आशश्यकता नहीं है। हमारे यहाँ तो जीवन का आधार अमृत है। उस अमृत का हम देवता पान करते हैं। उसी के प्रभाव से युगों-युगों तक जीते हैं। ये जो तुम्हारे पुत्ररूप में आये हैं ये अलौकिक है। इनका भोजन, रहन-सहन, कार्य-कलाप, जन्म-कर्म सभी कुछ दिव्य विचित्रता से भरे हुए हैं।
हे देवी! आपने वृद्धावस्था में पुत्र प्राप्त किया है। आपको मोह कुछ ज्यादा ही है। मोह को छोड़कर ज्ञान की दृष्टि से देखिये तो आपको असलियत का पता चल जायेगा। ये स्वयं भगवान् विष्णु ही तुम्हारे आये हैं। बारह करोड़ प्रह्लाद पंथ के बिछुड़े हुए जीवों को पार उतारने के लिए। जब इनका कार्य हो जायेगा, तो एक क्षण भी नहीं ठहरेंगे। आप लोग इन्हें समझ नहीं पा रहे हैं। क्योंकि भगवान् की माया बड़ी बलवान है। भले ही आप लोग पुत्र रूप में देखिये, वह तो तुम्हारे पुत्ररूप में रहने को राजी हैं। वे तो सभी प्रकार से राजी हैं। जैसा आप चाहें वैसा सम्बन्ध जोड़ें। भगवान् तो स्वयं कहते हैं कि हम जगत के माता-पिता, दादा-परदादा, पुत्र-पुत्री, सखा आदि रूप में विद्यमान हैं।
ऐसा कहते हुए योगी अदृश्य हो गये। न जाने किधर गये? हांसा पीछे देखने लगी, किन्तु कहाँ से आये? कहाँ गये? कुछ पता नहीं। पीछे पछताने लगी। मैं कैसी अज्ञानी, मूढ़ हूँ? स्वयं शिव भगवान् मेरे घर पर आये। उनकी बातें ही बातों में उलझी रही। कुछ खाने पीने भिक्षा देने की भी सुध नहीं रही। उन्होंने तो बहुत प्रकार की भोजन की बातें ही बतलाई थी। क्या करूँ मैं तो अपने लाला की चिंता में ही रही।
हांसा ने यह समाचार लोहटजी को सुनाया। तब लोहटजी ने पैरों के निशान देखे कि कौन आया था? यह कैसी बातें कर रही है? यहाँ तो किसी के पैरों के निशान नहीं है। मैं कैसे मान लूँ कि कोई योगीपुरुष आया था।
संत वचन सुन हरष अति, भई पुत्र की जान।
कछु प्रसन्न कछु चिंत मन, हरि माया बलिवान।।
माता हांसा ने अपने प्रिय पुत्र को पीढ़े पर सुला दिया और आप स्वयं चारपाई पर सो गयी। प्रेम की अधिकता होने से माँ स्वयं पास में ही सोयी थी। कहीं बालक को कछु हो न जाय। माँ नींद में भी बालक की रक्षा करती है, सचेत रहती है। न जाने कुछ क्या हो जाय? माँ को नींद कम ही आती है। फिर भी नींद तो अपना प्रभाव अवश्य ही जमायेगी। सावधान रहते-रहते नींद की एक झपकी माता हांसा को आ गयी।
सत्वगुण सम्बन्ध होने से तो शांति रहती है। रजोगुण आने से कुछ करने की वासना जाग्रत होती है। उत्पादन शीलता आती है। तब नींद उड़ जाती है और तमोगुण का साम्राज्य होते ही नींद, आलस्य, प्रमाद छा जाता है। माता हांसा भी तमोगुण से आवृत्त हो गयी, जिससे नींद की झपकी आ गयी।
थोड़ी देर के पश्चात् जग गयी और स्वाभाविक रूप से अपने प्राणप्रिय पुत्र को देखने के लिए हाथ पीढ़े पर गया। आश्चर्य! हाथ से बालक का स्पर्श नहीं हो रहा है। पीढ़ा खाली है। क्या हो गया मेरे लाल को? कौन ले गया? उठकर देखा तो सचमुच में ही बालक पीढ़े पर नहीं है। कहीं नीचे तो नहीं गिर गया है? पहले की तरह घर में प्रकाश भी तो नहीं है। अंधेरे में कुछ भी तो नहीं दिखता। क्या करूं? प्रकाश के लिए दीपक जलाऊँ। हांसा ने दीपक जलाकर देखा। घर में कहीं भी दिखाई नहीं दिया।
तुरंत लोहटजी को जगाया। उठिये! बालक को तो कोई ले गया है। घर में नहीं है। मैंने तो पीढ़े पर सुलाया था, किन्तु अब तो वहाँ पर नहीं है। क्या पता कोई कुत्ता, भेड़िया उठाकर ले गया हो। लोहटजी झटपट क्रोधित होकर उठे और कहने लगे- मैं अभी देखता हूँ कौन कहाँ से ले गया तथा किधर गया है? अभी मैं पैरों के निशान देखता हूँ जहाँ भी जिधर भी गया है, मैं पीछा करके पकडूंँगा। लोहटजी बड़े चिन्तित हुए कहाँ देखूँ क्या करूँ? लोहटजी कहने लगे क्या तुमने किसी को घर में आते जाते देखा है जो आरोप लगा रही है कि कोई स्यावज बालक को ले गया। हांसा बोली-मैंने देखा तो नहीं, क्योंकि मैं तो नींद में थी। कैसे देखती? किन्तु जागने पर देख रही हूँ कि मेरा बालक नहीं है। लोहटजी ने विचार किया कि-कहीं स्वप्न तो नहीं आ रहा है? कहीं मोह की आधिकता में इसकी बुद्धि भ्रमित तो नहीं हो रही है? चलूँ मैं स्वयं चलकर देखूं। लोहटजी ने घर में जाकर देखा तो बालक पीढ़े पर सोया हुआ है।
लोहटजी कहने लगे-अये! अंधली! इधर आकर देख। यह तेरा प्यारा लाल सोया हुआ है। तू कहती है कि कोई ले गया, आगे ऐसी व्यर्थ की बातें न किया कर। हांसा कहने लगी-हे पतिदेव! आप मुझे अंधली क्यों कहते हैं, आप स्वयं ही आकर देखिये! मैंने बालक को पीढ़े पर पूर्व मुख करके सुलाया था। किन्तु अब पश्चिम की तरफ मुख हो गया है। इतना यह छोटा सा बालक कैसे पूर्व से पश्चिम की तरफ हो गया? अवश्य ही कहीं गया है, या कोई ले गया है। इस समय वापिस सो गया है, या कोई सुला गया है। मैं आप से सत्य कहती हूँ कि थोड़ी देर पहले यह बालक पीढ़े पर नहीं था। भगवान् ही जाने इस बालक के बारे में तो। न जाने क्या-क्या आश्चर्यजनक लीला है? परमात्मा की अपार कृपा से यह अलौकिक बालक हमें प्राप्त हुआ है।
वील्हा उवाचः- हे गुरुदेव! अभी-अभी आपने कहा कि जाम्भोजी थोड़ी देर के लिए लुप्त हो गये। हांसा को भी दिखाई नहीं दिये। बहुत परेशान हुई तथा लोहटजी पिता हैं, उनको उसी स्थान पर दर्शन हुए। यह क्या लीला है? थोड़ी देर के लिए कहाँ चले गये थे तथा इस लीला से क्या शिक्षा देना चाहते हैं? कृपा करके बतलायें।
नाथोजी उवाचः- हे शिष्य! असली बात तो भगवान् ही जाने, क्या पता, वो क्या करना चाहते हैं, किन्तु मानव तो अनुमान ही लगा सकते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि स्वयं जाम्भोजी विष्णु ही हैं। विष्णु की अर्द्धागिनी (भार्या) लक्ष्मी हैं। पूर्व अवतारों में विष्णु-लक्ष्मी साथ रहे। जैसे सीताराम, रुक्मणि-कृष्ण आदि। इस बार तो भगवान् लक्ष्मी को पीछे ही छोड़ आये। साथ में आने की अनुमति प्रदान नहीं की थी।
स्वयं जाम्भोजी ने कहा है कि त्रेतायुग में सीता मेरे साथ थी राघों सीता हनुमत पाखो, कौन बंधावत धीरूं।। द्वापर में रूक्मणी साथ थी- आतर पातर राही रुखमणी, मेल्हा मन्दिर भोयो। इस कलयुग में तो मैं अकेला हूँ- रहा छड़ा सी जोयो। इस समय तो अवधूत के रूप में ही रहूँगा। तभी मेरा कार्य पूर्ण हो सकेगा। लक्ष्मी को साथ नहीं लाये। यही कारण था।
भगवान् विष्णु कहाँ गये? कुछ दिनों से लक्ष्मी को सेवा का अवसर प्रदान नहीं कर रहे हैं। कहीं राजा बलि के बंधन की तरह स्वयं ही कहीं बंधन को स्वीकार तो नहीं कर लिया है? मैं जाकर देखूँ ऐसा विचार करते हुए लक्ष्मीजी, जब सम्भराथल पहुँची। लक्ष्मी ने भगवान् को विश्वभर के स्थान पर ही ढूँढ़ा। क्योंकि भगवान् विष्णु का यही पुरातन स्थान है। भगवान् विष्णु पीपासर में लोहट के घर पालने में सो रहे हैं।
कहीं लक्ष्मी यहीं पर आकर अपना आसन जमा लेगी, तब तो कार्य में बाधा उत्पन्न होगी। ऐसा विचार करके स्वयं विष्णु ही लक्ष्मी से मिलने के लिए सम्भराथल पर पहुँच गये। पीछे हांसादेवी की आँखें खुल गयी। देखा, हमारे प्राणप्यारे कहाँ गये? कहीं लक्ष्मी मोहवश हमसे छीन न ले। जिस प्रकार से बलि से भगवान् को छीना था।
भगवान् ने लक्ष्मी को समझाया कि हे देवी! इस समय यहाँ तुम्हारी आवश्यकता नहीं है। कुछ दिनों के लिए मैं यहाँ अवधूत योगी बन करके इस देश में विचरण करूँगा। अपना कार्य पूर्ण करके शीघ्र ही वापिस चला जाऊँगा। तब तक के लिए क्षमा करो। अब तुम वापिस प्रस्थान करो। मैं भी वापिस जाता हूँ। ऐसा दिव्य चरित्र भगवान् ने दिखाया था।
हांसा ने तो पूर्व परम्परा के अनुसार अपने बेटे का मुख पूर्व की ओर करके सुलाया था, किन्तु जाम्भोजी कहते हैं कि अइयालो अपरम्पर बाणी हम तो तुम्हारी प्रचलित परम्परा से ऊपर उठकर वार्ता करते हैं। पूर्व दिशा में तो पहले भी अवतार हो चुके हैं, अब पश्चिम की बारी है। यह जांगळ देश सदा से उपेक्षित ही रहा है। यहाँ न तो संतों की वाणी है न ही कोकिल कूजती है और न ही वेद वाणी। न ही यज्ञादिक शुभकर्म ही यहाँ दिखाई देते हैं। ऐसे देश में मैं आया हूँ। यही संकेत दिया है। इसलिए तो पूर्व से पश्चिम मुख करके लेटे हैं।
मरुभूमि में चारों ओर अमावस्या ही थी। अज्ञान-अंधकार का ही साम्राज्य था। उस रात्रि के घने अंधकार में एक किरण प्रगट हुई थी। जिस प्रकार से अमावस्या के पश्चात् चन्द्रमा प्रतिदिन बढ़ता है और पूर्णिमा को पूर्ण सोलह कला से सम्पन्न हो जाता है। उसी प्रकार हांसा कुमार की कला भी दिनोंदिन बढ़ने लगी। प्रतिदिन कुछ नया इतिहास-चरित्र देखने को मिलता था। ग्रामवासी क्या समझें? भगवान् की माया से आश्चर्य चकित हो जाते थे। कहते थे कि, है तो कोई अचम्भा ही।
वील्हा उवाचः- हे गुरुदेव! अभी-अभी आपने कहा कि भगवान् जाम्भोजी चन्द्रकला की तरह बढ़ने लगे, समय आने पर पूर्णमासी बन जायेंगे। सम्पूर्ण सोलह कलाओं से युक्त हो जायेंगे। यह बात भी ठीक है। किन्तु मुझे यह संदेह है कि जो बढ़ते हुए पूर्ण हो जायेंगे, वे पूर्ण होने के पश्चात् क्षय को भी प्राप्त होंगे। जैसे चन्द्रमा पूर्णमासी के बाद घटना प्रारम्भ हो जाता है। अमावस्या को बिल्कुल निश्तेज, अस्तित्वहीन हो जाता है। ऐसे ही यदि विष्णु अवतार जाम्भोजी हो जायेंगे, तो फिर सामान्य जन व उनमें क्या अन्तर होगा?
नाथोजी उवाचः- हे शिष्य! जैसा तुमने कहा है, सामान्य मानव की तो यही गति है। प्रथम विकास, उसके बाद स्थिर और अन्त में विनाश। किन्तु भगवान् विष्णु में यह बात नहीं है। प्रथम विकास, द्वितीय स्थिरता ही रहती है। उनका विनाश नहीं होता। “जिंहि का किसा बिनाणी” उसका विनाश कैसा? इसलिए तो भगवान् तथा उनके अवतार कभी वृद्ध नहीं होते। सदा बाल्यावस्था में यति रहते हैं। दया धर्म थापले, निज बाला ब्रह्मचारी। बालै निरंजन गौरख जती। सदा ही बाल्यावस्था में रहने वाले गोरक्षक यति। स तु सर्वेषाम् गुरु कालेन अनवच्छेदात्। वह तो सभी का गुरु है। जो काल से परे है। अर्थात् काल उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। ऐसे भगवान् अपने शरीर को उतरोत्तर उन्नति को प्राप्त करवा रहे थे।
लोहटजी की एक बहन थी तांतू। वह ननेऊ में विवाहित थी। भाई के पुत्ररत्न हुआ है। बहन को अत्यंत प्रसन्नता हुई। आज मैं भुआ हो गई हूँ। मेरे भतीजा हुआ है। उसे देखने के लिए पीपासर जाऊँगी। वह समय की प्रतीक्षा कर रही थी। वह शुभ समय आ गया। साथ में अपने पतिदेव तथा सेवकों को लेकर तांतू पीपासर पहुँची। लोहट हांसा को समाचार मिला कि बहन आ रही है। उन्होंने बहन-बहनोई की आगवानी की। सत्कार करने के बाद कुशल समाचार पूछा- भोजन-जल से तृप्त किया।
तांतू बोली- भैय्या एवं भाभीजी! यह तो तुम्हारा बड़ा ही सौभाग्य है, जो इस अवस्था में पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई है। मुझे भी बहुत दिनों से भतीजे का दर्शन करने की लालसा थी। आज मैंने दर्शन किये हैं। मैं तो कृतार्थ हो गयी। मैंने तो जन्म लेने का फल प्राप्त कर लिया है।
भैय्याजी! मैं अपने भतीजे के लिए छोटी सी भेंट-कुर्ता, टोपी, कुछ आभूषण आदि ले आयी हूँ, मैं अपने ही हाथ से पहनाना चाहती हूँ। यदि आप आज्ञा दें तो पहना दूँ। लोहटजी बोले-हे बहन! ये भी कोई पूछने की बात है! भुआ के हाथ के बनाये हुए, प्रेमरस में भीगे हुए, दिव्य वस्त्र, अलंकार, मेरा बेटा पहनेगा, तो उसे किसी प्रकार की दृष्टिदोष, भूत-प्रेत आदि चेड़े नहीं लगेंगे। तुम्हारा तो यह आशीर्वाद ही होगा, जिसको पाकर हम तथा यह नन्हा तुम्हारा भतीजा कृतकृत्य हो जाएगा। अवश्य ही पहना दो।
चलो, मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ। कुछ सहारा दूँगा। वैसे तो बहुत ही हल्का है। गोद में उठाने में कुछ भी भार मालूम नहीं पड़ता, किन्तु हे बहन! जैसे हम वृद्ध हैं, वैसे तुम भी तो वृद्धावस्था को प्राप्त हो गयी हो। ऐसा कहते हुए दोनों भाई-बहन ने भवन में प्रवेश किया जहाँ श्रीदेव पलने में लेटे हुए विचारमग्न थे। पीछे बीते हुए काल को देख रहे थे। कहाँ अयोध्या, कहाँ दवारिका और कहाँ इस समय का यह पीपासर।
विखा पड़ंता पड़ता आया, पुरुष पूरा पूरूं।
जे रिण राहे सूर गहीजै, तो सूरस सूरा सूरूं।
वचनों को निभाने के लिए ये संयोग-वियोग, सुख-दुःख तो चलते ही रहेंगे। जो व्यक्ति इन द्वन्द्वों की परवाह नहीं करता है, वही पूरा पुरुष है। युद्धभूमि में जाकर शूरवीरता दिखलाए वही तो शूरवीर कहलाता है। अन्यथा तो चारपाई पर पड़ा-पड़ा डींग हाँकता रहे, वह काहे का शूरवीर है? ऐसे ही कुछ विचारमग्न होकर जाम्भोजी एकटक दृष्टि से देख रहे थे। लोहट तांतू ने इसी रूप में देखा था। भुआ ने पास जाकर कपड़े पहनाने के लिए बालक को गोदी में लेने लगी, किन्तु उन्हें तो हिला भी नहीं सकी। उठाकर गोदी में लेना तो असंभव ही था। तांतू ने सोचा, क्या बात है? क्या मैं इतनी बलहीन हो गयी हूँ, जो इस छोटे से बालक को नहीं उठा सकी। अभी तो मैं गाय दुहती हूँ, रोटी बनाती हूँ, जल से भरे हुए बड़े-बड़े घड़े उठा लेती हूँ, आज मुझे क्या हो गया? क्या यह बालक इतना वजनदार हो गया? अभी तो भैय्या ने कहा था कि बहुत ही हल्का है।
तांतू कहने लगी- भैय्याजी! आप लोग बार-बार यही कहते हो कि हमारा बेटा अन्न, दूध, जलादि कुछ भी ग्रहण नहीं करता। तुम लोग झूठ क्यों बोलते हो? तुम्हें झूठ बोलने में लज्जा नहीं आती है? यह तुम्हारा बालक तो मेरे से हिलता भी नहीं है। उसे उठाना तो दूर की बात है। मुझे देखो! मैं कोई इतनी दुबली- बलहीना तो नहीं हूँ, जो इसह्य उठा नहीं सकूँ। इसमें तो बहुत भार है।
लोहट कहने लगे- हे बहन! तू दूर हट जा। मैं अभी उठा लेता हूँ। मैं रोज ही गोदी में लेकर घूमता हूँ। बिल्कुल ही वजन नहीं है। ऐसा कहते हुए लोहट ने बालक को उठाने की कोशिश की, किन्तु वह भी हिला-डुला नहीं सके। बहुत जोर लगाया, थककर पसीने से लथपथ हो गये। थककर बैठ गये। यह क्या हो गया? मेरे लाला को जो इतना वजन? मुझे अपने आप पर भरोसा नहीं हो रहा है। क्या मैं वही हूँ, जो पहले था? क्या हो गया मुझे और मेरे बेटे को? क्या बात हुई? क्या चूक हो गयी मुझसे, जो मैं अपनी गोदी खाली देख रहा हूँ? मेरा बेटा आज मुझसे रूठ गया है। मेरे पास आना नहीं चाहता।
हे बेटा! यह तुम्हारी भुआ तो पहली बार ही आई है, इसकी तरफ तो ध्यान दो। इस प्रकार से प्रयास रत दोनों भाई-बहन को देखा, तो हांसा भी आ गई और कहने लगी-इस छोटी सी बात के लिए इतने चिंतित क्यों हो रहे हो? मैं अभी गोदी में ले लेती हूँ। हे ननदजी! आप अपने उपहार भेंट कर देना। ऐसा कहते हुए हांसा अपने प्रिय लाला को उठाने लगी, किन्तु क्या देखती है कि वह तो भारी वजनदार हो गया। उठाना तो दूर की बात हिला भी नहीं सकी। हांसा ने अपनी ताकत का अपमान समझा, फिर से ताकत लगायी किन्तु वे टस से मस नहीं हुए। हांसा भी हारकर दूर जाकर बैठ गयी। तीनों के कुछ भी समझ में नहीं आया कि क्या हो रहा है।
उसी समय ही खेल खिलाने वाली दासी आयी और उसने सभी के देखते ही देखते लोहट लाला को गोदी में उठा लिया। वे इतने हल्के रूई के समान हो गये। सभी ताली बजाकर हंसने लगे। खुशियाँ प्रकट करने लगे। कहने लगे-हमारे में ही कहीं भूल हुई है। यह बालक तो वास्तव में बहुत ही हल्का है। तांतू बोली-आपकी बात सत्य है। इसका शरीर तो पवन, तेज सदृश निर्भार ही है।
वील्हा उवाचः-हे सतगुरु! जाम्भोजी महाराज ने ऐसा क्यों किया? जैसा आपने कहा कि भारी (बोझवान) बन गये। माता,पिता,भुआ को ऐसा चरित्र दिखाने का क्या प्रयोजन था? कृपया समझाइये।
नाथोजी उवाचः-हे शिष्य! भगवान् की लीला अपार है। साधारण प्राणी कैसे उनकी लीला का पार पा सकते हैं? फिर भी मैं कहता हूँ। श्रवण करो! भगवान् यह कहना चाहते हैं कि हे शरीरधारियो! तुम अहंकार ना करो। यही तुम्हें डुबा देगा। जैसा कि मैं भुआ हूँ, मेरा ही इस पर अधिकार है। मैं ही इसे उठाऊँगी। मैं ही इसका पालन-पोषण करूँगी। मैं ही इसकी सर्वस्व हूँ। यदि मैं न होऊँ, तो इसका जीना असंभव है। मैं ही इसका लाड-प्यार, दुलार करूँ। मुझे ही ये प्राप्त हो। दूसरों को न हो। यह जो मैं पना है, यह खतरनाक है। दूसरे पर जबरदस्ती हावी हो जाता है। भगवान् ने देखा कि ये माता-पिता भुआदि तो अहंकार में इतने डूब गये हैं, इन्हे कैसे उबारें? केवल मात्र इतने का ही मेरे ऊपर आधिपत्य हो, यह असहनीय है। भगवान् ने बताया कि मैं तो ईश्वर हूँ। सभी का ही हूँ। सभी मेरे हैं। मैं सभी का हूँ। मैं तो कुछ भी भेदभाव नहीं देखता। किन्तु ये लोग भेदभाव की दृष्टि को मजबूत कर रहे हैं। इसे गिराना चाहिये। इनको बता देना चाहिये कि मैं तो सभी का हूँ। किन्तु जो मेरे दास हैं, उनका मैं विशेष प्रिय हूँ। वह चाहे छोटा हो चाहे बड़ा हो, गरीब हो, चाहे धनवान हो।
गुणिया म्हारा सुगणा चेला, म्हे सुगणा का दासूं।
सुगणा होयसी सुरगे जायसी, नुगरा रह्या निरासूं।।
वह दासी थी। क्योंकि उसमें दास भाव था। वह पूर्णतया समर्पित थी। किसी प्रकार का अहं नहीं था। यह भगवान् जानते हैं। जब दासी पास में आयी तो भगवान् स्वयं ही दास के पास चले गये। दास यदि एक कदम भगवान् की तरफ बढ़ाते हैं, तो भगवान् दस कदम बढ़ा देते हैं। यही तो उनकी प्रतिज्ञा है। किन्तु जो अहंभाव लेकर भगवान् की प्राप्ति की कोशिश करता है, तो वह भगवान् के पास ही नहीं पहुंँच पाता। यही शिक्षा देना भगवान् का अभिप्राय है।
वैकुण्ठवासी भगवान् विष्णु जब शयन करते हैं, तो क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर सोते हैं। लक्ष्मीजी भगवान् के पैर दबाती हैं। भगवान् को तो केवल शेष नाग की शय्या से ही संतोष करना पड़ता है। किन्तु यहाँ मृत्युलोक में तो स्वयं भगवान्जी हिंडोलने में हींड रहे हैं। यहाँ मृत्युलोक की कुछ विशेषता तो अवश्य ही है। वहाँ तो लक्ष्मी पैर दबाती है किन्तु यहाँ तो सभी पीपासर वासी ही नहीं पशु,पक्षी आदि भी सेवा करने के लिए लालायित है। एक पलक सेवा का अवसर मिल जाये तो धन्य-धन्य हो जाये।
जिनको वायु देवता झूला झुला रहे हैं। सूर्य देवता प्रकाश रूप से स्वयं प्रकाश ग्रहण कर रहे हैँ। सौम्य शांत भाव से उदित होकर सभी जनों को जीवन प्रदान करा रहे हैं। यह धरती माता भी अपने ऊपर चरणों को देखकर धन्य हो गयी। सम्पूर्ण औषधियाँ फल फूल सुगन्धी से भर गयी। बादल आकर पर्जन्य करते हैं। जल ही जीवन है, सभी के जीवन को उन्नतिशील बनाते हैं। आकाश शब्द को ग्रहण करके उसका विस्तार करते हैं। चारों ओर खुशियाँ ही खुशियाँ बरस रही है।
लोहटजी के घर में भी भगवान् आये हैं, तो गायें दूध अधिक देने लग गयी हैं। पहले जो बर्तन थे, वे छोटे पड़ गये हैं। बछ़डों को भरपेट दूध पिलाया जाता है, तब भी बर्तनों में नहीं समाता। हांसादेवी घर में अकेली ही तो है। उन्हें ही तो घर का सम्पूर्ण कार्य करना होता है। कभी दही बिलौती हैं। साथ ही साथ दूध भी गर्म हो रहा होता है। कभी गायें दुहने का समय, तो कभी भोजन बनाने का समय। अभी नन्हा तो पालने में झूल रहा है।
लोहटजी वृद्ध हो गये हैं। तो भी उन्हें गायें चराना अच्छा लगता है। वे अपना कार्य नहीं छोड़ सकते। एक दिन लोहट का लाला हिंडोलने में हींड रहा था। उधर हारे (चूल्हा) में दूध चढ़ा दिया था। दूध गर्म हो रहा था। घर में तो केवल एक माता हांसा ही थी, वह भी किसी कार्यवश घर से बाहर गयी हुई थी। दूसरा घर में कोई भी नहीं था। स्वाभाविक रूप से चूल्हे में आँच तेज हो गयी थी और दूध गर्म होकर उफनने लगा। उसे अब कौन बचायेगा? दूध की हंडिया खाली हो जायेगी। लोहट-हांसा दुःखी होंगे। क्योंकि माता को पूत से भी दूध प्यारा होता है। दूध को बचाने के लिए पूत की उपेक्षा की जाती है। भगवान् ने हिंडोलने में सोये हुए देखा कि यह तो ठीक नहीं हो रहा है।
द्वापर युग बीते को अभी थोड़े ही वर्ष हुए हैं। उस समय भगवान् ने अपनी माता यशोदा को देखा था कि वह दही बिलो रही थी। कन्हैया गोद में बैठकर दूध पी रहे थे। उधर दूध उफनने लग गया। माता यशोदा ने कन्हैया को गोदी से नीचे उतारकर, झटिति दूध बचाने भाग पड़ी थी। जाम्भोजी उस माता को भूले नहीं थे। कहीं यह माता हांसा भी वैसा ही व्यवहार न करे कि देखो ऐसा मेरा पुत्र जो उफनते हुए दूध को देखता ही रहा। उसे बचा ही नहीं सका। उस समय तो कन्हैया माता के चले जाने पर बहुत क्रोधित हुए थे और डंडा मारकर दही की मटकी फोड़ दी थी। यशोदा ने बड़ा भारी दुःख मनाया था और कन्हैया यानि अपने ही बेटे को बाँध दिया था। कहीं अबकी बार भी मुझे न बाँध दे, उस माता यशोदा का बंधा हुआ तो मैं इस समय जन्म लेकर आया हूँ। अबकी बार यह माता हांसा मुझे बाँध देगी तो मुझे फिर से जन्म लेकर आना पड़ेगा। क्योंकि यह तथा वह दोनों एक ही हैं।
मैं कहीं फिर से बन्धन में न पड़ जाऊँ। ऐसा विचार करके हिंडोलने से नीचे उतर करके उफनते हुए दूध का ढ़क्कन उतार दिया तथा बड़े भारी बर्तन को चूल्हे से नीचे रख दिया। दूध को बचा दिया और माता के आने से पूर्व ही वापिस पलने में जाकर लेट गये।
भगवान् ने बतलाया कि ध्यान रखो! दुनिया में दुःख की आँच लगेगी। उस आँच के बिना तो तुम पक्के नहीं हो सकते। तुम्हें पकने के लिए आँच की आवश्यकता है। यह भी ध्यान रखो। आँच उतनी अधिक भी न हो जाये, जिससे तुम्हारे में उफान आ जाये। धैर्य छूट जाये। आपे से बाहर हो जाये। ऐसा कुछ न करो, जिससे यह दूध का बर्तन ही खाली हो जाये। सभी कुछ काम, क्रोध,मैं लुटा दो। यदि आँच आ भी जाये, तो सावधान रहो। कहीं इस क्रोध रूपी आंच की भी जरूरत है। इसके बिना भी कार्य नहीं चलेगा। किन्तु सीमित मात्रा में ही ठीक होता है। जितनी आवश्यकता हो उतना ही श्रेयस्कर है।
यद्यपि मानव अवश है। ऐसा संयोग आ ही जाये, जब पानी नाक तक पहुँच जाये। तब डूबने से अवश्य ही बचाव करे। उस आँच को तो हम समाप्त नहीं कर सकते। हम स्वयं ही कारण नहीं है तो कोई और भी कारण हो सकते हैं। इसीलिए जाम्भोजी ने कहा है- जे कोई आवे हो हो करता, आपज हुइये पाणी। हम स्वयं अपना बचाव कर सकते हैं, अपने दूध को स्वयं बचा सकते हैं। दुनिया के काम, क्रोध, ईर्ष्या को मिटा नहीं सकते।
माता हांसा अपना कार्य करके आयी तो क्या देखती है-दूध की कढ़ावणी आग से नीचे रखी पड़ी है, बेटा तो हिंडोलने में हींड रहा है। चूल्हे में कुछ उफना है। आग पर दूध गिरा है। दूध की सुगन्धी आ रही है। यह कार्य किसने किया? बाहर से न तो कोई आया और न ही कोई गया हैं। किसी के भी आने-जाने के पैरों के निशान नहीं हैं।
यह मेरा लाला तो बहुत ही छोटा है। इससे तो यह कार्य होना असंभव है। अभी तो पैरों से चलना ही नहीं सीखा है। हांसा ने हारे और पालने के बीच में जाकर पैरों के निशान देखे। ये तो पैरों के नन्हे-नन्हे चिन्ह मेरे ही लाला के हैं। इसने ही यह कार्य किया है। माता के मन में खुशी छा गयी। हांसा ने तुरंत तसला लेकर पैरों के निशान ढ़क दिये। आज शाम जब पतिदेव आयेंगे, तब दिखलाऊँगी। मुझे रोज-रोज अंधली कहते हैं। मेरी इन आश्चर्यजनक बातों पर विश्वास ही नहीं करते।
शाम को जब लोहटजी घर पर आये, तब उन्हें ले जाकर चरण चिन्ह बतलाये और कहा आज बहुत बड़ा कार्य मेरे लाला ने किया है। आपको विश्वास ही नहीं होता था। अब आप इन कुं कुं चरणों को देखिये और मेरी बात पर विश्वास कीजिये। फिर से मुझे अंधली मत कहना। लोहटजी ने आश्चर्ययुक्त होकर देखा और हांसा की बात को सत्य माना।
लोहटजी पीछे की एक-एक लीला का स्मरण करने लगे। जब जंगल में योगी ने दर्शन दिया था। उसने पुत्र होने का वरदान दिया था। वे सभी बातें स्मरण करने लगे। हे देवी! अवश्य ही यह हमारे यहाँ द्वापर युग का कृष्ण कन्हैया आया है। किन्तु हम तो इन्हें अपने पुत्र भाव से ही स्मरण करते हैं। यह तो हमारी मोह- माया ही है। यदि मोह-माया से ऊपर उठकर देखें, तो हमें भी वही विष्णु कृष्ण कन्हैया का दर्शन होगा। जो भी हो, जैसा भी हो। हम तो कृतार्थ हो गये। इनकी कृपा से आज पीपासर में उत्सव हो रहा है। सभी मानव,पशु,पक्षी,पेड़-पौधे,कीट-पतंग आदि प्रसन्नचित हैं। सभी में नये उत्साह का संचार हुआ है। क्यों न होगा, जहाँ जिस देश में स्वयं भगवान् आ जायें, वहाँ किस बात की कमी रह जाती है।
हे देवी! सभी कुछ आनन्द होते हुए भी यह बालक कुछ खाता-पीता नहीं है। बिना अन्न-जल के यह जीवन धारण कैसे करेगा? वैसे तो मैं देखता हूँ कि हमारा लाला अब तो घुटने के बल चलने वाला है। शरीर में तो तेज दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है। बिना दूध पिये भी इतनी वृद्धि को प्राप्त हो रहा है।
हम तो भूल ही जाते हैं अभी कुछ महीने पूर्व ही तो योगी शिव बाबा आये थे। उन्होनें दर्शन करके कहा था, ये तो साक्षात् विष्णु ही हैं। ये इस मृत्युलोक का अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे। फिर भी युगों-युगों तक जीवन धारण करेंगे। इनका भोजन तो अमृतपान है। ये स्वयं समर्थ हैं। दूसरो के आधार की इनको आवश्यकता नहीं है। ऐसी बात कही थी। फिर भी हम तो ठहरे मृत्युलोक के प्राणी, अन्न-जल पर जीने वाले। हमें तो संतोष ही तब होगा, जब यह हमारी तरह तीन समय भोजन करने लगे।
अब तो जाम्भो बालक घुटने के बल पर चलने लग गये थे। माता हांसा जब “घुटरुन चलत रैन तनु मंडित” देखती तो आनन्द मंगल को प्राप्त हो जाती हैं। माता गाय दूहती तो चलते-चलते पास में आ जाते। माता कहती बेटा दूर रहो। मैं अभी गाय दूहती हूँ, ये गायें तुम्हें मारेगी। मैं अभी-अभी आयी मेरे लाला। मेरे लाला को गोद में लूंगी, ऐसी बात सुनकर वहीं रूक जाते। मैय्या आयेगी, गोदी में लेगी, ऐसा क्यों? मैं क्या स्वयं समर्थ नहीं हूँ? मुझे दूसरे के आधार की आवश्यकता नहीं थी? ऐसा एक दृष्टि से सोचते रहते, वहीं रुके हुए न आगे न पीछे।
एक समय बछड़े सभी घर की गोहर से बाहर निकल गये। चारों ओर पीपासर में बिखर गये। जिसको जहाँ अच्छा लगा, वहीं चले गये। कुछ बछड़े अपनी माताओं का दुग्धपान करने लगे, कुछ भागने लगे। इन्हें अब कौन वापिस बुलायेगा? एकत्रित करेगा? घर में तो हांसा के सिवाय ओर कोई नहीं था। हांसा घर से बाहर नहीं जा सकती थी। दूसरा कोई लाने वाला नहीं था।
माता के संकट को जाम्भोजी ने पहचाना और दीवार पकड़कर खड़े हो गये। बछड़ों की तरफ देखा कि कौन कहाँ गया है? उछल कूद कर रहा है। वहीं से हाथ का इशारा किया, तो बछड़े वापिस आते हुए हांसा ने देखा।
जिस प्रकार से भागकर गये थे, स्वयं को आजाद महसूस कर रहे थे। उसी वेग से वापिस आकर बंधन को स्वीकार करने के लिए दौड़े चले आ रहे थे। हांसा ने देखा कि ये तो आजाद बछड़े, मेरे से तो पकड़ में नहीं आते थे, किन्तु मेरे लाला की तो सैनी से ही दौड़े चले आते हैं।
उसी समय हांसा भी बछड़ों का नाम ले लेकर पुकारने लगी। आ जाओ मेरे काले, हीरे, मोती, रामा श्यामा आदि। तुम्हें तुम्हारा मालिक बुला रहा है। असलियत में तो यह मेरा होनहार बेटा ही तुम्हारा स्वामी है। हम तो दो दिन के मेहमान हैं। बछड़े वापिस घर में स्थित गोहर में प्रवेश कर गये। जाम्भोजी ने किवाड़ ढंक दिये। यह कैसी भगवान् की अद्भुत लीला है।
न जाने क्या संदेशा देना चाहते हैं? बछड़ों से शायद यह कह रहे हों कि अब तुम्हें चराने वाला वही द्वापर युग वाला कृष्ण कन्हैया आ गया हूँ। हे बछड़ो! अब तुम चिंता न करो। थोड़े से बड़े हो जाओ। मैं तुम्हें चराने के लिए सम्भराथल ले जाऊँगा। वहीं तुम्हारी हमारी वार्ता होगी। मेरे रहते हुए अब तुम्हें जंगल में किसी प्रकार के व्याघ्र, नाहर (भेड़िया) आदि का भय नहीं होगा।
हे बछड़ो! तुम्हारी पूर्व मिलन की वासना पूर्ण नहीं हुई थी। मैं तुम्हें निराधार छोड़कर के मथुरा चला गया था। उसके बाद पुनः मिलन नहीं हुआ। अभी तुम्हारी वासना पूर्ण हो जायेगी। तुम लोग भी शीघ्र ही मानव शरीर धारण करके पार हो जाओगे। यह तुम्हारा अन्तिम जीवन है। अब तो तुम मेरी भाषा समझ नहीं पा रहे हो, किन्तु शीघ्र ही मनुष्य जीवन धारण करके समझ जाओगे। अपना कर्तव्य कर्म निर्धारण कर लोगे।
माता हांसा को सूचित किया कि हे माता! अब तुम चिंता न करो। मैंने स्वयं ही तुम्हें माता-पिता स्वीकार किया है। मेरे प्रति तुम्हारी गहरी निष्ठा थी और मैं भी तुम्हारे वचनों में बंध गया था। इसलिए मैं तुम्हारा बेटा बनकर आया हूँ। हे माता! मुझे भी कर्म बन्धन स्वीकार करने होते हैं। अपना कर्तव्य निभाने हेतु विभिन्न रूप धारण करके आना होता है। इसीलिए मैं आया हूँ। सभी लौकिक व्यवहार करूँगा। पिताजी वृद्ध हो गये हैं। बछड़े तथा गो चारण करके उनको सुख प्रदान करूँगा। उनकी चिंता हरण करूँगा। माता हांसा इन गहराइयों को क्या समझे? किन्तु इतना तो समझ ही गयी कि मेरे लाला ने बड़ा भारी कार्य किया है। मेरे कार्य में सहयोग प्रदान किया है।
शाम को लोहटजी घर आये तब हांसा ने ये सभी व्यतीत बातें बतलाई। दोनों दम्पति बड़े ही प्रसन्न हुए। लोहटजी ने गोदी में उठाकर मुख चूम लिया और कहा- यह बालक साधारण नहीं है अवश्य ही स्वयं भगवान् ही मेरे कुल को पवित्र करने के लिए आये हैं।
अनेकानेक दिव्य लीला करते हुए जाम्भोजी दो वर्ष की आयु को पार कर गये। माता-पिता, भाई-बन्धु जन बड़े प्रसन्न हुए। कहने लगे-यह कैसा बालक है? पता नहीं चलता, बिना खाये पिये कैसे जीवन धारण करता है? अन्य बालकों से ज्यादा ही बढ़ रहा है। न जाने इसे क्या मिलता होगा? बाहर से तो कुछ भी आहार ग्रहण करता हुआ दिखता नहीं है। अन्दर से ही ब्रह्म रस ग्रहण करता है। जिसके प्रताप से योगी लोग युगों-युगों तक जीते हैं। यह तो कोई पूर्ण योगी ही है या इसके ऊपर किसी देवी देवताओं का प्रकोप भी हो सकता है। अभी तो यह बालक काफी बड़ा हो गया है। इसके कान बिंधवाने चाहिये। क्योंकि यह बड़ा तो होगा ही, विवाह करेंगे तो कानों में कुण्डल अवश्य ही होना चाहिये। बिना कान बिंधे तो कोई इन्हें अपनी कन्या भी देने वाला नहीं होगा। देखो भाई! सभी प्रकार का लोकाचार तो होना आवश्यक है। लोहटजी स्वयं तो सचेत नहीं हो रहे हैं तो क्या हुआ? हम सभी चलकर सचेत कर देते हैं। समय-समय पर सभी कुल कृत आचार होना चाहिये। यह हमारे कुल-परिवार की मर्यादा है। सभी ग्रामीण लोग लोहटजी के पास पहुँचे और पूर्व विचारित बातों से अवगत करवाया।
लोहटजी ने अपने कुल परिवार के भलाई की बात सहर्ष स्वीकार की और कान बेधने वाले को एक दिन घर पर बुलाया। कान बेधने वाले ने सुई धागा आदि हाथ में लेकर कान बींधने के लिए हाथ पकड़ा तथा दूसरे हाथ से कान पकड़कर बेधने की तैयारी की। लोहटजी ने भी कुछ सहारा दिया कि कान बिंधेगा तो शायद पीड़ा होगी, बच्चा छुड़ाकर भाग जायेगा।
कान से सुई पार करके वह धागा भी कान में डाल दिया और कान में कुर्की मोती डालकर कार्य पूर्ण कर दिया और बेधने वाला निश्चित हो गया। किन्तु क्या देखता है, तुरंत ही कुर्की मोती नीचे गिर पड़े। पास में बैठे हुए लोगों ने देखा कि कान टूट गया है। बेधने वाला ठीक से नहीं बेध सका। ऐसी अवस्था देखकर सभी भयभीत हो गये। यदि इसने कान तोड़ दिया है तो बड़ा ही अनर्थ किया है।
बेधने वाला कुछ भी समझ नहीं पाया। दूसरा कान भी बेध डाला। कुर्की मोती डाली तो वह भी नीचे गिर पड़ी। बेधने वाले ने देखा कि मेरे साथ धोखा हो गया। मैं चूक गया। ठीक से बेध नहीं सका। अभी मैं दुबारा बेध देता हूँ। ज्योंही दुबारा कान पकड़कर देखा तो कान में छेद ही नहीं है। कुछ समझ में नहीं आता। अभी-अभी मैंने छेद किसमें किये? ये कान तो ज्यूं के त्यूं विद्यमान हैं।
जिनका शरीर पांच तत्त्वों से बना हुआ ही नहीं है, उसके हाड, मांस, मज्जा आदि कैसे बनेंगे? केवल देव शरीर तेज प्रधान ही है। तेज में छेद कैसे हो सकता है? छेद तो पृथ्वी प्रधान शरीर में हो सकता है। हम लोगों का शरीर पृथ्वी प्रधान है। इसलिए तो अन्न की महत्ती आवश्यकता है। उसके बिना हम जी नहीं सकते। देवता का शरीर तेज प्रधान होता है। इसलिए देवता को पुष्ट करने के लिए घृत की आवश्यकता होती है। गो घृत से हवन करते हैं। देवता उसे ग्रहण करके पुष्ट होते हैं। वे हमें जल वायु तेज आदि प्रदान करते हैं उससे हम पुष्ट होते हैं। इस प्रकार हमारा तथा देवताओं का परस्पर सम्बन्ध है। होम हित चित प्रीत सूं होय, बास बैकुण्ठा पावो।
वह बेचारा कान बेधने वाला साधारण व्यक्ति नहीं समझ पाया कि यह क्या हो रहा है? मैं क्या करने जा रहा हूँ वहाँ से उठकर बिना दक्षिणा लिये ही चुपचाप अपने घर को चला गया। पास में बैठे हुए गाँव के लोग भी देखते ही रह गये, कुछ भी समझ में नहीं आया। कान क्यों नहीं बिंधे गये इसका भेद कोई नहीं जान सका।
उस अलेख को कौन लख सकता है? केवल शुष्क बुद्धि से यदि जानने की कोशिश करेंगे तो उसे जानना असंभव है। बुद्धि के साथ ही साथ हृदय भी खुला हो, सद्भावना और प्रेम-श्रद्धा से वह जाना जाता है। भक्त्या मामभिजानाति, यावन्यचास्मि तत्त्वतः भक्ति भाव से ही जो तत्त्व है, उसे जाना जा सकता है। वह जो है, जैसा है। तर्क की कसौटी पर कसा नहीं जा सकता। “खरतर गोठि निरोतर वाचा, रहिया रुद्र समाणी।”
आभूषण आदि तो कुछ भी धारण नहीं किया। क्योंकि भगवान् ने यह बतलाया कि यह शरीर ईश्वरीय देन है। अपूर्व है। भूतो न भविष्यति। सुन्दरता में तो कोई भी इसकी बराबरी में नहीं है। ईश्वर ने इनको खूब सजाया है। किसी प्रकार की कमी नहीं छोड़ी है। इसे आप लोग सजाने के बहाने विकृत मत करो।
भगवान् ने कहा, हम तो वैसे ही बहुत सुन्दर हैं। ज्यादा कुछ बनावटी पना हम नहीं चाहते हैं। ये द्विधा वृत्ति ठीक नहीं है। अन्दर बाहर एक रस ही ठीक है। शरीर का बाह्य भाग तो आभूषणों द्वारा सुसज्जित कर लेंगे। किन्तु अन्तर के गुणों को प्रगट नहीं करेंगे। उनका विकास नहीं करेंगे, तो कुछ भी हासिल नहीं होगा। अन्य लोग आपके शरीर की सुन्दरता से प्रसन्न कदापि नहीं हैं। आपके सद्गुणों से प्रसन्न होते हैं। मोरे मन ही मुद्रा, तन ही कंथा, जोग मार्ग सह लीयो।
कान तो श्रवणेन्द्रिय है। इससे सत्य वचन श्रवण करो। यही इसका आभूषण है। कान बींधकर मुरकी आदि डालकर अवरोध खड़ा मत करो। केवल सुनना ही है। कान तक शब्दों को पहुँचाना ही इतिश्री नहीं है। सुनने के पश्चात् मनन, निदिध्यासन, फिर दर्शन होगा। यहाँ तक आपकी पहुँच होवे, तभी कान सार्थक है।
केवल कुण्डल डालने से कानों में सार्थकता नहीं आयेगी। स्वर्णाभूषणों के बंधन में पड़कर सत्य से मुख नहीं मोड़ो। सत्य इस बाह्य दिखावे से कहीं दूर है। इसको अतिक्रमण करके सत्य तक पहुँचा जा सकता है। ऐसी ही कुछ जीवन संजीवनी वार्ता से अपने सम्बन्धी जनों को परिचित करवाया था। वे सीधे- सादे, भोले-भाले लोग, कितना ग्रहण कर सके यह तो भगवान् ही जाने।
लोहट हांसा आपस में विचार करने लगे-अब तो अपना बेटा बड़ा हो गया है। जैसा अन्य बालक बोलते हैं, वैसे तो कुछ बोलता ही नहीं है। पता नहीं कुछ बोलता तो है किन्तु क्या बोलता है? हमें तो उनकी बात समझ में नहीं आती। सभी लोग इनको तो गहलो-गहलो कहते हैं।
लोहटजी ने कहा-हे देवी! तुम ज्यादा चिंता मत करो। लोगों की बात क्यों सुनती हो? तुमने तो स्वयं ही चरित्र देखा है। इतने छोटे से बालक ने बड़े-बड़े कार्य किये हैं। हमारा बेटा तो बहुत ही बुद्धिमान है, किन्तु लोगों की दृष्टि साफ नहीं है। वे तो अपने जैसा ही देखना चाहते हैं। जैसा हम बोले, वैसा ही यह बोले। भोजन करे इत्यादि किन्तु वैसा तो हमारे पुत्र में कुछ नहीं है, इसलिये गहला कहते हैं?
हाँसा बोली-हे पतिदेव! मैंने सुना है कि अपने ग्राम में अपने कुलदेवता के मंदिर में भोपा-तांत्रिक आया हुआ है। वह तो बड़े-बड़े रुग्ण लोगों का रोग ठीक कर देता है। आज रात्रि में जागरण होगा। कल सुबह भूत-प्रेत बाधा वाले लोग उनके पास जा रहे हैं। अपने-अपने कष्ट दूर करवा रहे हैं। आप भी अपने बच्चे को लेकर जाइये, क्या पता किसी भूत,प्रेत, देवी,देवता का दोष होगा तो वह भोपा दूर कर देगा। बच्चा भोजन करने लगे, अन्य बच्चों की भांति मुझे माँ कहे। इस कुल का संवर्द्धन करे।
लोहटजी ने कहा-यदि तू कहती है तो मैं लेकर सुबह ही जाऊँगा। किन्तु मुझे इन पाखण्डी भोपटों पर कतई विश्वास नहीं है। मेरी समझ में तो हमारा बालक बिल्कुल ठीक है। यह तो पूर्व जन्म का कोई योगी- अवधूत है। ब्रह्मरस भोगी है। इन्हें क्या लेना-देना संसार तथा सांसारिक भोगों से? यह तो तुम्हारी तपस्या का कोई फलोदय हुआ है, जिस वजह से तुम्हारा पुत्र बनना स्वीकार किया है। मुझे तो तपस्या के समय में योगी का दर्शन तथा वरदान पर पूर्ण विश्वास है। उनकी वार्ता निष्फल नहीं होगी। तुम स्त्री स्वभाव के कारण जल्दी घबरा जाती हो, धैर्य को धारण करो।
प्रातःकाल लोहटजी अपने लाला को अपनी अंगुलि पकड़ाकर भोपा के स्थान को ले चले। आगे भीड़ लगी थी। कई गाँवो के लोग अपना-अपना दुःख दूर करवाने के लिए एकत्रित थे।
लोहटजी ने जाकर अपनी अर्जी पेश की और कहा कि हे भोपाजी! यह मेरा बेटा साथ में है। इसे कुछ रोग लग गया है। पता नहीं क्या हुआ है? वह दिनों दिन चन्द्रकला की तरह बढ़ रहा है, किन्तु वह कुछ भी खाता-पीता नहीं है। इसे अब तक अन्य बालकों की भांति बोलना चाहिये था, किन्तु वैसा नहीं बोलता। पता नहीं, इसके अन्दर कोई देवता ही बैठा हुआ बोल रहा है? इसे लोग गहला-गहला कहने लगे हैं। आप ठीक कर दीजिये। मैं आपको मुँहमाँगी बधाई दूँगा। जो भी उपाय करना है, वह आप अवश्य ही करें।
भोपा कुछ बोलने को तैयार था, किन्तु उससे पूर्व ही जाम्भोजी बोले- रे भोपा! आज तुमने कितने जीव मारे? इनको मारकर क्या कार्य करना चाहता है?
भोपा बोला- आज मैंने ग्यारह जीव मारे हैं। तुम्हारे गाँव पर भूत-प्रेत कुपित थे। उनको भेंट चढ़ाकर प्रसन्न किया है।
जाम्भोजी बोले- क्यों झूठ बोलते हो? तुमने तेरह जीव मारे हैं और ग्यारह बतला रहे हो।
भोपा कहने लगा- अरे बालक! तुम्हें क्या पता है? मैंने तो ग्यारह बकरियाँ मारी हैं, तेरह कदापि नहीं। ये सभी लोग मेरे साक्षी हैं।
जाम्भोजी कहने लगे- दो बकरियाँ गर्भवती थी, उन्हें भी तुमने मारा था। उनके गर्भ के दो बच्चे भी तो मर गये। जब उनकी माँ को तुमने मार दिया, तो उनके बच्चे भी तो तुम्हारी वजह से मर गये। ऐसी वार्ता सुनकर भोपा घबरा गया। लज्जित होकर कुछ भी बोल नहीं सका। अपनी भूल नजर आने लगी।
जाम्भोजी बोले- हे पिताजी! आप यहाँ से वापिस चलिये। आप इनकी पाखण्ड लीला देख रहे हैं। ये लोग जीव हत्यारे हैं। अपना पेट भरने के लिए दूसरे जीवों की हत्या करते हैं। इनके पास कुछ भी नहीं है। ऐसा कहते हुए वापिस घर चले आये।
जाम्भोजी ने तभी से देखा कि यहाँ पर कितना पाखण्ड फैला हुआ है। कितने लोग पाखण्ड करके पेट भराई करते हैं। इसे जड़ मूल से उखाड़ना होगा। भगवान् के नाम पर भूत-प्रेत, देवी-देवताओं की पूजा करके लोगों को भ्रमित करते हैं। इन्हें सत्पंथ का पथिक बनाना होगा।
एकत्रित ग्रामीण लोगों का समूह कहने लगा-चलो, अपनह्य भी चलते हैं। जिसको हम गहला-गहला कहते थे, उन्होनें बिना देखे ही तेरह जीवों की हत्या के बारे में भोपे को बतला दिया। भोपे को निरुत्तर कर दिया। अब भाईयों! अपने यहाँ पर पाखण्ड नहीं चलेगा। किन्तु लोहट के लाला को यह पता कैसे चल गया? इस बात का तो किसी को कुछ पता नही। जैसा अपने ठाकुर साहब कहते है वैसा ही हमें करना चाहिये। हम लोग वास्तव में भूल गये, अच्छा हुआ जो आज चेत गये। आगे पुनः ऐसी भूल नहीं करेंगे। तान्त्रिक भोपों ने तेरह जीवों की हत्या कर दी। उसका भण्डाफोड़ जाम्भोजी ने कर दिया। बिना आँखों देखे, जीवों की संख्या सही बताकर उस भोपे को चमत्कृत कर दिया।
लोहटजी ने विचार किया कि अब बेटा स्याना हो गया है। हिन्दू धर्म के रीति-रिवाज के अनुसार चूड़ाकरण संस्कार कर देना चाहिये। जब बालक समझदार हो जाये, तभी यह संस्कार करवाना चाहिये। अब तो बेटा छोटे बालक की तरह नहीं है। यह तो बड़े-बूढ़ों से भी ज्ञान में बढ़-चढ़कर है। वैसे तो संस्कार की आवश्यकता नहीं है। ये तो स्वयं ज्ञान स्वरूप ही है। स्वयं ज्योतिरूप हैं। दीपक को देखने के लिए दूसरे दीपक की आवश्यकता नहीं होती,फिर भी लोक मर्यादा का पालन तो अवश्य ही करना चाहिये।
लोहटजी ने संस्कार करवाने हेतु हरजी ब्राह्मण को बुलाया। ब्राह्मण का आदर सत्कार किया। छत्तीस प्रकार के व्यंजन बनाये। ब्राह्मण तथा कुटुम्ब परिवारजनों को खूब जिमाया। लोहटजी ने हरजी से प्रार्थना करते हुए कहा-हे भू देव! मेरा यह बेटा सभी कुछ जानता है। लोग इसे वैसे ही गहला-गहला कहते हैं। किन्तु यह तो बहुत ही ज्ञानी योगी पुरुष है। वैसे तो इनका संस्कार करना सूर्य को दीपक दिखाना है, फिर भी आप हमारे कुल-कर्म अनुसार उसका चूड़ाकरण संस्कार कर दीजिये। मंत्र जनेऊ आदि जो कुछ आपको करना है, वह कर दीजिये।
हरजी ने कहा-आप ऐसा करें कि संस्कार करने हेतु घृत, गुड़, आखा, अनाज आदि ले आइये और बालक को मेरे पास बुलाइये। मैं जनेऊ संस्कार कर देता हूँ। इसे द्विज बना देता हूँ।
हे लोहट! आपने ठीक कहा कि संस्कार अवश्य ही करवाना चाहिए। क्योंकि प्रथम जन्म दाता तो माता-पिता होते हैं। किन्तु दूसरा जन्म गुरु संस्कार के द्वारा करवाता है। जैसा पण्डितजी ने कहा, वैसा पूजा का साज समान जुटाया और जाम्भोजी को हाथ में नारियल देकर पुरोहित के पास भेजा।
हरजी पुरोहित ने ज्यों ही जाम्भोजी का हाथ पकड़ने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया, उन्हें चतुर्भुज रूप में दर्शन हुआ। पुरोहित ने अपना सौभाग्य माना कि मैं आजन्म प्रयत्न करता रहा हूँ, किन्तु भगवान् विष्णु का दर्शन नहीं हो पाया। आज मैं लोहट के बालक के रूप में विष्णु का दर्शन कर रहा हूँ। अच्छा हुआ। मैं यहाँ पर उपस्थित हूँ। अबे इन्हें शिष्य बनाना ही चाहिये। विष्णु है तो भी अच्छा हैं। मैं विष्णु का गुरु बनूँगा। क्योंकि पूर्व में भी तो वशिष्ठ ने रामजी को अपना शिष्य बनाया था। अब मुझे उन्हीं रामजी को शिष्य बनाने का पुनः अवसर मिला है। इस समय तो मैं ही वशिष्ठ हूँ यह बालक जाम्भोजी ही रामजी है।
हाथ में यज्ञोपवीत ग्रहण करके जाम्भोजी के गले में सूत का धागा डाला। हरजी देखता है कि वह जनेऊ तो नीचे गिर पड़ी। हरजी ने नीचे पड़ी हुई जनेऊ को पुनः हाथ में लिया और देखा कि गाँठ खुल गयी है इसलिये यह नीचे गिर गयी है। अब मैं दुबारा गाँठ लगाता हूँ। पुरोहित अज्ञानता में है। जो हृदय की ग्रन्थी-गांठ खोलने के लिए आया है, उसे ही गाँठ में बाँध रहा है। श्रीदेव को ऐसा स्वीकार्य नहीं होगा, किन्तु पुरोहित ने पुनः गांठ लगायी। फिर माप करके देखा तो छः अंगुल छोटी पड़ गयी। फिर से नया धागा लाये नापकर पूरा किया गाँठ लगायी, और गले में जनेऊ डाली किन्तु क्या देखता है...... शरीर पर जनेऊ टिक ही नहीं रही है।
पुरोहित के सभी प्रयत्न विफल हो गये, प्रयत्न करने पर भी जनेऊ नहीं डाल सका। पुरोहित ने ध्यान से देखा तो शरीर में हाड, माँस आदि धरती एवं जल के तत्व नहीं है। केवल वायु, आकाश एवं तेज तत्व् से निर्मित शरीर को देखा। विचार किया कि इस शरीर पर जनेऊ पहनायी नहीं जा सकती। इस पृथ्वी तत्व से बनी जनेऊ को धारण करने वाला शरीर भी तो पृथ्वी तत्त्व का ही होना चाहिए। पुरोहित चुपचाप उठकर घर की तरफ चला। उपस्थित लोग हँसने लगे। पुरोहित का अँहकार गिर गया। शिष्य बनाने आया था, किन्तु शिष्य बनकर घर की तरफ चला। उस दिन से लोहट एवं पीपासर के लोगों का ब्राह्मण के प्रति अश्रद्धा का भाव हो गया।
वील्हा ने पूछा- हे गुरुदेव! आप यह कृपा करके बतलाइये कि जाम्भोजी महाराज ने पुरोहित से जनेऊ धारण क्यों नहीं किया? यह तो हिन्दू धर्म के मुख्य संस्कारों में आता है! जाम्भोजी तो हिन्दू धर्म की मर्यादा के रक्षक थे। फिर उन्होंने स्वयं ही मर्यादा भंग क्यों की? इसमें अवश्य ही कुछ राज होगा।
नाथोजी बोले- हे शिष्य! सर्वप्रथम तो यह विचारणीय विषय है कि जनेऊ का क्या अर्थ है? जनेऊ संस्कार को उपनयन कहते हैं। इसका सीधा सा यही अर्थ है कि उप-समीप,ने-अन अर्थात् आत्मा को परमात्मा के निकट लाना। जो परमात्मा से अभी दूर है उसे निकट लाया जा सकता है। किन्तु जो परमात्मा के अति निकट है या स्वयं ही परमात्मा स्वरूप है, उसे निकट लाने का कोई अर्थ नहीं है। पीसे हुए को दुबारा क्या पीसना? साधारण व्यक्ति जो अभी परमात्मा से दूर है, उसे ही यह निकट लाने के लिए यह उपनयन संस्कार है।
जब विप्र जनेऊ धारण कर लेता है तो वह अहंकार को स्वीकार कर लेता है। मैं ब्राह्मण हूँ। अर्थात् सर्वोत्तम हूँ। इस प्रकार की भ्रान्ति को स्थान देता है। जो एक साधक के लिए प्रतिकूल है। इसे अस्वीकार करने का अर्थ है कि मैं भी इन सामान्य पुरुषों की तरह एक मानव तनधारी जीव हूँ। सभी में समता की दृष्टि का प्रचार प्रसार होगा, जिससे ज्ञान की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होगा। गले में सूत का धागा डालना तो बंधन स्वीकार कर लेना है। यह जीव तो सदा मुक्ह्म् अविनाशी है। इसे बन्धन में डालने की प्रक्रिया जाम्भोजी को कतई स्वीकार नहीं है। उनका आने का प्रयोजन तो जीवों को मुक्ति प्रदान करना है। जाम्भोजी ने इस प्रक्रिया द्वारा यह बतलाया है कि अब तुम लोग जन्म-जन्मान्तरों के बन्धन से मुक्त हो जाओगे। अब तुम्हें गले में फाँसी डालने की आवश्यकता नहीं है। इतने जन्मों तक डाली गयी है। इसलिए तो तुम जन्म मरण के चक्कर में चल रहे हो। अब मैं तुम्हें मुक्त कर दूँगा। यह तीन धागों वाली जनेऊ, तीन देवता, तीन गुणों की प्रतीक है। इसे धारण करें। किन्तु जाम्भोजी का कहना है कि तीन देवता को बाह्य मत समझो। ये तीनों तो मेरे ही स्वरूप हैं। मैं ही विष्णु स्वरूप होकर पालन-पोषण करता हूँ। ब्रह्मा रूप होकर सृष्टि की उत्पति करता हूँ और शिव रूप होकर सँहार भी करता हूँ।
हे जीवो! तुम तीनों देवता स्वरूप हो। तुम्हारे से ये भिन्न नहीं है। वे तो तुम्हारे रग- रग में समाये हुए हैं। इसलिए तो तुम लोग जब सत्त्व गुण सम्पन्न होते हो तो विष्णु बन जाते हो। पालन-पोषणकर्त्ता स्वयं शांत स्वरूप। जब रजोगुण में स्थित होते हो, तो ब्रह्मा बन जाते हो। उस समय सृष्टि के उत्पतिकर्त्ता तुम बन जाते हो तथा तमोगुण में होते हो तो शिव बन जाते हो जो स्वयं विनाशशील हो जाते हो। ये तीनों देवता तुम्हारे अन्दर ही हैं। तुम्हीं तीनों देव, तीनों गुणों से युक्त हो। यह तुम्हें समझना है। केवल बाह्य दिखावे मात्र से कुछ भी नहीं होगा।
छः अंगुल ओछी हो जाती है, इसमें भी बहुत कुछ रहस्य भरा हुआ है। हमारे यहाँ छः आस्तिक दर्शन प्रसिद्ध है वे है छः दर्शन ईश्वर, जीव एवं जगत के बारे में बताते हैँ। अंगुली द्वारा बताया कि यह तुम्हारा मार्ग है, इस मार्ग से चलिये तो पंहुच जाओगे। तुम्हारी यह जनेऊ हमारे दर्शन शास्त्रों के सामने बहुत ही छोटी पड़ जायेगी। तो कुछ भी संकेत नहीं देती है। जो स्वयं ही ढ़की रहती है। वह दूसरों की क्या मार्गदर्शक बन सकेगी? दर्शनशास्त्र कहीं ज्यादा श्रेष्ठ है। इस बात को प्रकट करने के लिए छः अंगुल जनेऊ छोटी पड़ जाती है।
पुरोहित स्वयं को ज्ञानी समझकर पीपासर के स्त्री-पुरुषों के सामने अपनी औकात बता रहा था। किन्तु उसकी सभी क्रियाएँ असफल हो गयी थी। जिससे ज्ञान का अँहकार गिर पड़ा था। पंडित का लज्जित होना तो स्वाभाविक ही था। अपने जीवन में प्रथम बार ही इतने लोगों के सामने अपनी असफलता देख रहा था। जिसको देखकर ग्रामीण लोग हँसने लगे थे।
ये लोग यह बता रहे थे कि हे पुरोहित! अब तेरा पाखण्ड जाल यहाँ पर सफल नहीं होगा। हमें तो वह परिपूर्ण परमेश्वर मिल गया है। हमें किसी प्रकार का भय नहीं है। हम निर्भय होकर हंँसते हैं। “हरष न खोइये” सदा खुश रहिये। हर प्रकार की परिस्थिति में हमें खुशी रहना, हमें सिखा दिया है। इसलिए हम तो सदा ही सुख-दुःख में हँसते रहते हैं।
उस दिन पीपासर के ग्रामवासियों ने ब्राह्मण को मानना छोड़ दिया। क्योंकि अब वो जान गये थे। बिना जाने केवल मानना तो अंधरे में लट्ठ पटकना है। अब तो प्रकाश हो चुका था। अज्ञान (अंधकार) निवृत्त हो चुका था। पुरोहित तो केवल मानने की बात तक ही सीमित था। एक बार अनुभव हो जाये, तो फिर मानने का सवाल ही कहाँ उठता है? मानने से तो जानना बेहतर है।
जाम्भोजी की लीला का रहस्य साधारण पीपासर ग्रामवासी जनों के समझ में नहीं आता था। जब नित्य नये चरित्र देखते, तो सभी को अच्छे लगते थे। संसार के कार्यकलापों से सदा ही उदासीन रहते थे। व्यावहारिक वार्ता के इच्छुक नहीं थे। जो भी बोलते थे, वह आध्यात्मिक विषयक वार्ता थी।
छोटे-छोटे पीपासर के बालक खेलने के लिए जाम्भोजी के पास आने लगे थे। उनके साथ खेलने के लिए चले जाते थे। उनके साथ घुल-मिल नहीं पाते थे। दूर बैठे हुए द्रष्टा बनकर उनको देखते रहते थे। ये बालक खेलें या मैं खेलू कोई अन्तर नहीं है। खेल को खेल की तरह ही खेलना आवश्यक है। केवल दृष्टा बनकर खेलते रहे।
यह संसार भी एक खेल ही है। भगवान् स्वयं खेल रहे हैं। किन्तु द्रष्टा (साक्षी) बनकर के। इसलिए स्वयं इस खेल में लिपायमान नहीं होते। हमें भी इसी प्रकार से लिपायमान नहीं होना है। जल में कमलवत निर्लेप निर्मोही,सुख-दुःख,हानि-लाभ,जीत-हार,सर्दी-गर्मी इत्यादि द्वन्द्वों में समता आ जाये, यही जीवन जीने की विधि है। यही जाम्भोजी ने बतलाई है।
अन्य बालक तो खेल खेलते थक जाते हैं। भूख-प्यास सताने लगती है तो वापिस अपने-अपने घरों को लौट आते हैं। किन्तु लोहट लाला वहीं पर बैठे एकान्त में ध्यान-समाधि में मग्न हो जाते हैं। अन्य बालक तो दूध-दही आदि में रस लेते थे। उसके प्रभाव से जीवन धारण करते थे। किन्तु जाम्भोजी के जीवन का आधार अमृत रस था। उस अमृत रस की प्राप्ति समाधि में ही हो पाती थी। उस प्रकार का नित्यप्रति का कार्यक्रम होने लगा।
जब अन्य बालक खेल समाप्त करके घर चले जाते। माता हाँसा चिन्तित होती कि अब तक मेरा बेटा आया नहीं, दूसरे बालक तो आ गये हैं, स्वयं जाती और हाथ पकड़ करके ले आती। जब तक कोई लेने नहीं जाता तब तक ही बैठे ध्यानमग्न रहते।
बालक बछड़े चराने वन में जाते थे, किन्तु पीपासर से दूर नहीं जाते थे। जाम्भोजी भी इनके साथ बछड़े चराने जाया करते थे। वहीं पर बछड़े हरी-हरी घास चरते, उछल-कूद करते, उन्हें देखकर बालक भी उत्सव मनाते, खेलते-कूदते, अनेकों प्रकार से किलोल करते हुए समय व्यतीत करते थे। सायं समय गायों के लौटने से पूर्व वापिस घर लौट आते थे।
एक दिन वन में सभी बालक एकत्रित होकर सिंह-बकरी का खेल खेलने लगे। आज उन्होंने जाम्भोजी को भी खेल में सम्मिलित कर लिया था। आज तो उमंग विशेष हो रही थी। कुछ नया ही करने का भाव बन गया था। खेलने को सहर्ष तैयार हो गये थे। बालकों ने कहा-हे जम्भेश्वर! आज आप हमारे साथ खेल खेलेंगे। यह हमें मालूम हुआ है। हम सभी सिंह-बकरी का खेल खेलेंगे। आप प्रथम सिंह बनें। हम सभी बकरी बनते हैं। हम बकरी, सिंह से बचाव हेतु प्रयास करेंगे। आप सिंह बनकर हमें खाने का प्रयास करेंगे। हमें पकड़ने का उद्योग आपका होगा, हमारा बचने का प्रयास होगा।
प्रथम हमें छुपने का अवसर दीजिए फिर आप सिंह बनकर ढूंढ़ लीजिये। बालकों की आज्ञा स्वीकार की और असली सिंह बन गये। बालकों ने देखा लोहट का लाला तो वहाँ नहीं है, किन्तु उस जगह एक सिंह प्रकट हो गया है। यह तो हमें तथा हमारे बछड़ों को खा जायेगा। देखो-देखो। कैसे जीभ लपलपा रहा है? इसकी आँखें कैसे जल रही हैं? हमारी तरफ देखकर कैसे घूर रहा है? अपने को बचाओ। स्वयं की रक्षा करो। यहाँ से भागो। किन्तु अब भागकर भी कहाँ जाओगे? अब तो हमारी रक्षा स्वयं भगवान् ही कर सकते हैं।
हे सिंह! हमने तुम्हारा क्या अपराध किया है, जो तुम हमें खाने के लिए दौड़ आये? हमारे देवता! लोहट के लाल भी गये, हमंह्य बचाओ! कहीं तुम स्वयं ही सिंह तो बनकर नहीं आये हो? हम डर के मारे काँप रहे हैं। कुछ भी नहीं सूझ रहा है कि क्या करें और क्या न करें? हमने तुम से कब कहा था कि असली सिंह बन जाओ। हम तो खेल ही तो खेल रहे थे। नकली सिंह की बात थी। हम भी तो नकली बकरी बने थे। हम कोई असली बकरी थोड़े ही है और तुम तो असली सिंह बन गये। अब हम हाथ जोड़ते हैं। आपके पैरों में पड़ते हैं। हमें बचाओ-हमारे बछड़ों का बचाओ।
हे नृसिंह! हमारी रक्षा करो, हमारी आँखों के सामने से हट जाओ। हम तुम्हारा तेज देखने में असमर्थ हैं। हे वन देवता! तुम हमारे वन से चले जाओ! यहाँ फिर कभी मत आना। यहाँ तो हम लोग खेलते हैं। हमारे बछड़े हरी-हरी घास चरते हैं। यहाँ पर तुम्हारा क्या कार्य है? इस प्रकार से सभी बच्चे व्याकुल हो उठे और कुछ-कुछ कहने लगे किन्तु देवमयी रहस्य को कोई नहीं समझ सके।
जम्भेश्वरजी ने देखा कि बच्चे खेल खेलना चाहते हैं, किन्तु ये तो सिंह रूप देखकर ही घबरा गये हैं। इन्हें निर्भय कर देना चाहिये। मैं तो यह खेल ही खेल रहा था, किन्तु ये लोग मेरे खेल को समझ नहीं पाये। अच्छा है, जब ये बच्चे कह ही रहे हैं तो गहरे वन में चले जाते हैं। मेरे यहाँ से चले जाने से ही इनका भला होगा। मुझे तो वही कार्य करना है, जिससे सभी का भला होवे। ऐसा विचार करते हुए सिंहरूपी जाम्भोजी धीरे धीरे वन की ओर चले गये। बालक पुनः प्रसन्न होकर खेल खेलने लगे, किन्तु अब तो खेल में कुछ सार नहीं था, जो खेल में रस था वह तो चला गया। अब तो हृदय केवल चर्म का थैला ही रह गया था। अन्दर जो प्राणरस जीवनी शक्ति थी वह तो चली गयी, केवल शरीर को हिलाने डुलाने से क्या प्राप्त होने वाला था। इसलिए सभी बालक खेल से निवृत्त होकर वापिस अपने-अपने घरों को चले गये। माता हाँसा का बेटा नहीं आया, अन्य बालक तो अपने-अपने घरों को लौट आये।
हांसा अन्य बालकों के पास पहुँची और उनसे पूछा-क्या बात है, मेरा लाला नहीं आया? आप लोग उन्हें अकेला कहाँ छोड़ आये? तुम्हेंऐसा तो नहीं करना चाहिये था।
बालक कहने लगे-हे माता! तुम हमें झूठा ओलाणो-आरोप मत दे। हमने नहीं छोड़ा, किन्तु वह तुम्हारा बेटा ही हमें छोड़कर चला गया।
दूसरा बालक कहने लगा-हम तो सभी साथ में मिलकर सिंह, बकरी का खेल खेलते थे। हमने कहा कि तुम सिंह बनो, हम बकरी बनते हैं। किन्तु तुम्हारा लाडला तो हमारे देखते-देखते ही असली सिंह बन गया।
तीसरा बालक कहने लगा-हमें भी झूठा ओलाणो मत दे, जब वह वन में जा रहा था, तब हमने पीछे से हेला भी दिया कि वापिस आ जाओ। किन्तु हमारी तो बात ही नहीं सुनी।
चौथा बालक कहने लगा-मैं बताऊँ तुझे! हमने कहा था कि तुम असली सिंह क्यों बने और यदि बन गये हो तो वापिस बालक जैसे थे, वैसे बन जाओ और यदि नहीं बनते हो तो यहाँ से चले जाओ। हम डर के मारे काँप रहे हैं। हमारे कहने से ही वन में गया था।
पाँचवाँ कहने लगा-वह तो मैंने देखा कि बिना मार्ग ही उजड़ जा रहा था। अब पता नहीं कहाँ गया है? मार्ग-मार्ग चले तो खोज की जा सकती है, किन्तु बिना मार्ग तो खोज असम्भव है।
बालकों द्वारा इस प्रकार की वार्ता श्रवण करके लोहट-हाँसा ढूंढ़ने के लिए गये, किन्तु बालक जहाँ पर खेल खेलते थे, वहाँ पर बालकों के तो पैरों के निशान थे, किन्तु जम्भेश्वरजी के कहीं पैरों के निशान नजर नहीं आये। उधर सूर्यास्त हो गया। रात्रि ने आ घेरा था। इसलिए लोहट हांसा वापिस घर लौट आये। वह रात्रि युग के समान व्यतीत हुई। प्रातःकाल होते ही लोहट हाँसा ने वन में जाकर खोजबीन की, तो वह सम्भराथल पर बैठे ध्यान लगा रहे हैं। दम्पत्ति ने देखा तो अपार सुख की प्राप्ति हुई। हाथ पकड़ करके घर ले आये। पीपासर के लोग सभी देखने के लिए आये। खुशियाँ मनाई। बहुत-बहुत बधाइयाँ बाँटी। मंगल गीत गाये।
पींपासर के लोगों ने पूछा- यह जाम्भा बालक कहाँ मिला? लोहट ने बतलाया कि थल पर बैठा था। ईश्वर के ध्यान में था। इन्हें संसार की स्मृति नहीं थी। ऐसा ध्यान तो यह लगाता ही है। कोई नयी बात नहीं हैं। किन्तु सिंह बनकर दूर वन में जाने वाली बालकों की बात पर ग्रामीणजनों ने सहसा विश्वास नहीं किया। एक मानव शरीर धारी कैसे सिंह बन सकता है? ये बालकों की बातें क्या पता सच्च हैं या झूठ हैं?
कोई कहने लगा कि यह तपस्वी है। कोई कहने लगा कि यह तो युगों-युगों का योगी है। कोई कहने लगा कि यह तो साक्षात् विष्णु है। कोई कहने लगा कि यह तो यशोदा का पुत्र कन्हैया ही है। अन्यथा तो यह ऐसे दिव्य चरित्र कहाँ से दिखाता? कोई-कोई नास्तिक कहने लगा-छोड़ो इन बातों को। यह तो बावला है। इसे हमारी जैसी बुद्धि-ज्ञान प्राप्त नहीं है। जितने मुँह उतनी ही बातें होती थी।
यह क्या है? कौन है? इस बात को कोई जान नहीं पाया। सभी अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार निर्णय कर रहे थे। यदि बालकों की बात सत्य मान ली जाय तो यह सिँह बना था, क्या प्रयोजन था, इस बात को जानने की क्षमता नहीं थी।
नाथोजी कहने लगे-हे शिष्य! भगवान् की लीला अपरम्पर है किन्तु कभी-कभी पूर्व की लीला भगवान् दोहराते हैं। सतयुग में भगवान् ने नृसिंह रूप धारण किया था, प्रह्लाद भक्त की रक्षा की थी और उनके पिता हिरण्यकश्यपु को मार गिराया था। इस समय भी भगवान् खेल ही कर रहे थे, उन बालकों को वही नृसिंह रूप दिखाया था। उन्हें यह समझाया था कि मेरे अनेक रूप हैं, मैं वही नृसिंह हूँ।
हे बालको! आप लोग प्रह्लाद पंथी हो। तुम्हें मैं लेने के लिए आया हूँ। मैं तुम्हें ग्रहण करूँगा। अपने पास सत्यलोक में ले जाऊँगा। आ जाओ। मेरे पास में खेल खेलते हैं। अन्तिम जीत तो हमारी ही होगी, किन्तु बालक तो बालक ही ठहरे। वे क्या जानें नृसिंह अवतार को, वे तो डर ही गये।
भगवान् ने बतलाया कि मैं जो भी कार्य करता हूँ, वह असली ही करता हूँ। नकली कार्य के लिए यहाँ अवकाश नहीं है। दुनिया के लोग तो दिखावा करते हैं। मैं इस दिखावे, पाखण्ड का खण्डन करने हेतु यहाँ पर आया हूँ। तुम लोग भ्रमित हो गये हो। तुम्हारा सत्य-असत्य का विवेक नष्ट हो गया है। उसकी पुनः स्थापना हेतु मैं आया हूँ। जब तुम लोगों ने कहा सिंह बनो, तो मैं सिंह बन गया था। आपने देखा होगा कि मैंने किसी को मारा नहीं, किन्तु तुम लोग भय से कम्पित हो गये। मैं तुम्हारे पापों को कम्पित करके उन्हें बाहर निकाल दूँगा। तुम्हारी हृदय की धड़कन बढ़ जायेगी। तुम्हारे पाप जगह छोड़कर भाग जायेंगे। इसीलिए तो मैंने यह विकराल रूप तुम्हें दिखलाया था, किन्तु तुम लोग समझ नहीं पा रहे हो। न भी समझो तो भी मेरे समर्पण हो जाओ।
आप लोगों ने देखा होगा कि मैं तुम्हारे समर्पित हूँ। जैसा तुमने कहा, वैसा मैंने किया। जब तुमने कहा कि सिंह बन जाओ। तब मैं सिँह बन गया और जब तुम डर गये तब तुमने कहा यहाँ से चले जाओ, तो मैं चला गया। इसमें मेरा कोई भी दोष नहीं है। मैं पूर्णतया तुम्हारे आधीन हूँ। गुणिया म्हारा सुगणा चेला, म्हें सुगणा का दासूं।
धर्म की स्थापना हेतु सिंह भी बनना पड़ेगा। बिना कठोरता ग्रहण किये पापी दुष्टजन काबू में नहीं आते हैं। उन्हें सन्मार्ग में लाने के लिए साम, दाम, दण्ड तथा भेद की नीति अपनानी होगी। इसमें कुछ कष्ट भी होगा, किन्तु उसका फल सदा ही मीठा होगा। यदि पहले ही सुख चाहता है, उसका परिणाम कड़वा ही होगा। तपस्या का फल सदा ही मधुर होता है।
खेल खेलना भी एक रोचक तथा तथ्य युक्त कर्म है। परमात्मा ने सृष्टि की रचना भी खेल खेलने के लिए की है। सभी शरीरधारी अवतारों ने अपने-अपने तरीके से खेल खेला है। आदि सूत्रों से ऐसा ज्ञात होता है कि एकाकी न रमते अकेले से खेल नहीं खेला जाता। उसे भी एक से अनेक होना होता है। तभी खेलरूपी कार्य सम्पन्न होता है। यह सम्पूर्ण सृष्टि तथा उतार चढ़ाव सुख-दुःख सभी कुछ खेल ही है।
विशेष रूप से बाल्यावस्था तो ब्रह्म के अति निकट है। क्योंकि बाल्यावस्था में खेल-खेलने की प्रवृत्ति स्वाभाविक है। ब्रह्म स्वयं क्रीड़ारूप आनन्द ही है। वहीं बालक भी आनन्दस्वरूप ही होता है। इसलिए बालक स्वतः ही सभी के लिए प्रिय होता है। ब्रह्म भी सभी के लिए आनन्द स्वरूप है।
सभी पीपासरवासी जाम्भोजी के आनन्द से आनन्दित होते थे। एक बात की कमी उन्हें कष्ट भी देती थी कि यह बालक अन्य बालकों की भाँति बोलता नहीं है। पाँच समय भोजन, दुग्धाहार नहीं लेता। यदि हमारी तरह यह व्यवहार करे तो कितना अच्छा होता, हम लोग कृत्य-कृत्य हो जाते, अपना जीवन सफल कर लेते।
कुछ पता नहीं, लोहटजी समझदार होते हुए भी अपने इस प्रकार के मौनी बेटे के लिए कोई उपाय क्यों नहीं करवाते? इस समय नागौर में एक पूरबिया पुरोहित आया हुआ है। सुना है कि देवी की आराधना करता है। हम क्षत्रिय भी देवी के उपासक हैं। लोहटजी ने देवी की उपासना नहीं करवाई थी, इसलिए हो सकता है कि देवी माता कुपित हो गयी हो। बालक के लिए स्वयं अड़चन के रूप में खड़ी हो गयी होगी।
भाइयो! लोहट कंजूस है। कहीं रुपये खर्च न हो जाये, इसलिए कोई उपाय तंत्र-मंत्र आदि पुरोहित को बुलाकर नहीं करवाते। पुरोहित ने तो इस लोहट के लाला का नाम भी जम्भेश्वर रखा था, जो यह नाम, यथा नाम तथा गुण से युक्त है। पुरोहितजी को तो यह बालक जम्भेश्वर ही दिखाई दिया था फिर भी अम्बा कभी कभी अपने स्वामी स्वयंभू से रूठ भी जाती है।
इस बार भी हो सकता है रूठ गयी हो और बालक रूप जम्भेश्वर से कुछ अपना स्वार्थ सिद्ध करवाना चाहती हो। यदि पुरोहित अम्बा देवी को प्रसन्न करे और दोनों में समझौता हो जाये तो कुछ समय के लिए यह अम्बा का ईश्वर, यहाँ मृत्युलोक मह्य अम्बा से बिछुड़ कर रह सके, हमें कल्याण के मार्ग पर अग्रसर कर सके।
ग्रामीणजन कहने लगे-भाइयो सुनो! लोहट तथा हांसा तो मोह तथा प्रेमवश जम्भेश्वर को लाड-प्यार में जाम्भा कह करके पुकारते हैं उनके देखा देखी हम भी ऐसा ही कहते हैं। असल में तो वह क्या है, यह तो वही जाने।
लोहटजी ने कर्ण परम्परा से ग्रामीणजनों की यह वार्ता सुनी और हांसा से कहने लगे-हे देवी! गाँव के लोगों की बातें तो बड़ी विचित्र हैं। कोई कुछ कहता है और कोई कुछ और ही कथन करता है। जितने मुख उतनी ही बातें, हम लोग क्या करें, और क्या न करें?
वैसे तो अपना लाडला बिल्कुल ठीक है, बहुत ही अच्छा है, किन्तु लोगों के कथन तथा मैं स्वयं ही अनुभव करता हूँ कि यह बालक सामान्य नहीं है। हमें कोई उपाय तो अवश्य ही करवाना चाहिये। हमारे कुल देवता हमारे पर प्रसन्न नहीं हैं, पता नहीं क्यों हमारे से विरोध बाँध रखा है?
यह बालक तो हमें वृद्धावस्था में छापर के वन में एक योगी के आशीर्वाद से प्राप्त हुआ है। वह योगी ही हमारे घर को तथा कुल को पवित्र करने के लिए आया है। मैं ऐसा मानता हूँ। मेरे पास-धन दौलत, दूध-घी, अन्न आदि के भण्डार भरे हुए हैं, यह किसलिये? यह सभी कुछ अपनी सन्तान के लिए ही तो होता है। किन्तु यह पुत्र तो कुछ खाता-पीता भी नहीं है, फिर क्या काम आयेगा? मेरा मन तो तभी प्रसन्न हो, जब यह पाँच समय भोजन करे। अन्य साधारण बालकों की भाँति जीवन यापन करे। हो सकता है कि ये हमारे देवीदेवता ही इन्हें रोक रहे हो। इसकी भूख-प्यास स्वयं पी जाते हो। न जाने मेरे बेटे पर ये लोग क्यों कुपित हो रहे हैं? मेरी तपस्या का फल इन्हें अच्छा क्यों नहीं लगता? देवता तो स्वभाव से ही ईर्ष्यालु होते हैं। मेरी सम्पत्ति, मेरा सुख, आँगन में बालक की किलकारी इनसे नहीं देखी जाती।
मैं नागौर जाता हूँ और खेमनराय पूरबिये को यहीं ले आता हूँ। उससे मंत्र पढ़वाऊँगा। देवता को प्रसन्न करवाऊँगा। देवी प्रकोप को शांत करवाऊँगा। ऐसा कहते हुए हाँसा से अनुमति लेकर प्रातःकाल ही चले और साँझ होने से पूर्व ही नागौर पहुँच गये। नागौर में जाकर पूरबिये पुरोहित का पता पूछा राजपोर में स्थान बताया।
लोहटजी ने विचार किया-राजदरबार में रुका हुआ है, तो पुरोहित तो कोई बहुत उच्चकोटि का सिद्ध होगा। लोहटजी प्रातःवेला में पुरोहित के पास पहुँचे और प्रणाम किया। पुरोहित ने आदर-सत्कार करते हुए आने का कारण पूछा। लोहटजी ने बतलाया कि हमारे एक ही पुत्र है। वह सामान्य बालकों की तरह नहीं है। वैसे तो सामान्य बालकों से भी कहीं अधिक सयाना है, किन्तु फिर भी हम आपके पास आये हैं। आप इन्हें अन्य बालकों की तरह ही कर दीजिये। मेरी तथा बालक की माँ तथा सम्पूर्ण प्रजा की यही भावना है।
हमें तो यह विचित्रता अच्छी नहीं लगती। ये लोग कहते हैं, यह बालक ऐसा क्यों है? कई-कई लोग तो ऐसा कहते हैं कि इस पर देवता का प्रकोप है। कोई देवता ही इसमें प्रवेश करता है, तभी कुछ अनहोनी बात करता है। किन्तु सच पूछो तो मेरा तो मत यह है कि यह स्वयं ही देवता है। कुछ ऐसी उच्चकोटि की ही ज्ञानवार्ता करता है। हमारे तो समझ के ही बाहर की बात है। कुछ खाना-पीना तो आवश्यक नहीं है। देवता तो अमृतपान करते हैं। उसके प्रताप से युगों-युगों तक जीते हैं। मैं तो बस इतना ही जानता हूँ। बाकी आप जानें।
हे पुरोहित! इस बारे में तो आप ही मेरे से अधिक जानते हैं। हमें क्या करना चाहिये, जिससे मेरा बालक ठीक हो जाये? खेमनराय पुरोहित ने अनुमान लगाया कि यह ग्रामपति ठाकुर है। अच्छी दक्षिणा मिलेगी, क्यों छोड़ी जाये?
पुरोहित कहने लगा- आप ठाकुर साहब चिन्ता न करें। मैं आपके बालक को बिल्कुल ठीक कर दूँगा। किन्तु दक्षिणा के रूप में दो गाय तथा सौ रुपया नगद लूँगा। तंत्र-मंत्र द्वारा देवी की आराधना करूँगा। यदि आपको स्वीकार हो तो चलूँ।
लोहटजी ने कहा- शीघ्र चलिये! आपके पास पुस्तक कपड़े आदि हैं, तो मेरी गाड़ी में रख लीजिये तथा आप स्वयं बैठिये। जो आप कहेंगे वही मैं करूँगा। आप हमारे पुरोहित हैं। हम आपके यजमान हैं। ऐसा कहते हुए पुरोहित को गाड़ी में बैठाकर, प्रातःकाल चले शाम को पीपासर पहुँच गये।
पीपासर में गऊ के गोबर से घर लिपवाया। आँगन के बीच में एक चौक पुरवाया। कुम्हार के घर से चौसठ छेद वाला कलश बनवाकर मँगवाया। एक कलश जल का भरकर रखवाया। एक सौ आठ चौमुख दीपक मंगवाये इत्यादि। सभी सामान एकत्रित करवाकर, रविवार प्रातःकाल ही स्वयं पुरोहित चौकी पर रेशमी गद्दी बिछाकर के बैठा तथा बालक जम्भेश्वर को धरती पर बिठाया। सभी दीपक तेल से भरवाये तथा उनमें रूई की बत्ती बनाकर चौमुखी ज्योति का प्रयत्न किया। प्रातः ही तंत्र-मंत्र-स्तोत्र पढ़ना प्रारम्भ किया। दोपहर तक पढ़ते रहे। चुन-चुनकर उड़द फेंकते रहे। फूँ-फूँ की ध्वनि पुरोहित बार-बार करता रहा। सूर्य देव तपने लगा। गर्मी में पुरोहित बेहाल हो गया। कुछ अन्य कार्य करता रहा, जिससे लोहट को विश्वास हो जाये कि कुछ कार्य हो रहा है।
जाम्भोजी कुछ नहीं बोल रहे हैं। केवल पुरोहित की पाखण्ड लीला देखते हुए मंद-मंद मुस्करा रहे हैं। ज्यों-ज्यों पुरोहित निस्तेज होता जाता है, त्यों-त्यों जाम्भोजी अधिक तेजस्वी होते जाते हैं। अपनी मंत्र विद्या असफल देखकर पुरोहित उदासीन होता जा रहा है, किन्तु अब तक मंत्र विद्या द्वारा दीपक जलाकर अन्तिम कार्य करना बाकी ही था।
पुरोहित ने कहा- अभी मैं दीपक जला लेता हूँ, फिर मैं कार्य सफल करूंगा। बिना दीपक ज्योति के देवी-देवता प्रसन्न नहीं हो रहे हैं, क्योंकि इस पर कोई देवता जबरदस्त रूठा हुआ है। ऐसा कहते हुए एकसौ आठ चौमुख दीपक उपस्थित थे। उनमें रूई तेल भरकर जलाने का प्रयत्न करने लगा। परंतु ज्यों-ज्यों जलावे, त्यों-त्यों बुझ जावे। यदि रूई, तेल, बाट, दीपक तथा वायु रहित स्थान सभी कुछ ठीक-ठाक है, किन्तु दीपक नहीं जलते, यह भी कोई आश्चर्य ही है। पुरोहित ने ऐसा आश्चर्य जीवन में प्रथम बार ही देखा था।
हाथ जोड़कर विनती करने लगा-अब तो मैं हार गया। मेरे से यह बालक ठीक नहीं होगा। देवता लोग इससे रुष्ठ हैं। उन्हें मनाने के लिए कुछ और उपाय करना पड़ेगा। ऐसा कहते हुए पुरोहित उठ खड़ा हुआ।
जाम्भोजी ने सुना कि यह पुरोहित तो कुछ अन्य उपाय की बात कर रहा है। यह सात्त्विक पूजा छोड़कर अवश्य ही कुछ तामसी पूजा यहाँ पर ही तुम्हारे सामने ही करेगा। पूर्व पुरोहित की भाँति यह श्मशान सेवी बकरों की बलि भी चढ़ा सकता है। यह कार्य प्रारम्भ करे, इससे पूर्व ही इसे कुछ अलौकिक चमत्कार दिखाकर के उस कार्य से निवृत्त करना चाहिये।
वहाँ से उठे। एक बालिका सूत कात रही थी। उसके पास से कच्चा धागा लिया। कुम्हार के घर से कच्चा मिट्टी का घड़ा लिया। कुएँ पर पहुँचकर धागा घड़े के बाँधकर कुएँ में लटकाया और जल निकालकर वहाँ से जल से भरा हुआ घड़ा लेकर वापिस अपने घर पहुँचे और दीपकों में जल डाला। अग्नि देवता को आज्ञा प्रदान की। चुटकी बजाई। सभी दीपक एक साथ जल उठे।
उस पुरोहित तथा एकत्रित सभी ग्रामवासियों ने देखा। सभी ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया। जय-जयकार करते हुए कहा-जाम्भाजी बोले-हे पुरोहित! अभी आप ठहरो! तुमने कहा था यदि दीपक जल जाये तो मैं बुलवा सकता हूँ। ठीक कर सकता हूँ। अब तो यह देख, दीपक बिना तेल घी के ही जल गये हैं। ठीक कर दे। देवताओं को राजी कर दे। मेरे माता-पिता को प्रसन्न कर दे। ये सभी ग्रामवासी बाल,वृद्ध, स्त्री-पुरुष तुम्हारे मुख की तरफ देख रहे हैं, चुप क्यों बैठे हो? कुछ तो उपाय करो।
पुरोहित लज्जित होकर कहने लगा- हे देव! अब तो आप स्वयं ही बोलिये। हम तो संसार के अज्ञानी जीव है। उदरपूर्ति के लिए पाखण्ड करते हैं। यह मैं जो देख रहा हूँ यह कोई साधारण बालक का कार्य नहीं है। आप कौन हैं? क्या आप स्वयं शिव,ब्रह्मा या विष्णु इन तीनों में से कोई एक हैं? या गोरख, दतात्रेय, शुकदेव मुनि में से कोई एक है जो भी आप हैं, स्वयं ही हमें बतलाइये। जिससे हमारा संशय निवृत्त हो जाये। आपने तो हमारे देखते ही देखते-
बांभण न परचो दीखाल्यो काच करवे नीर राख्यो।। काची माटी का दीवटीया कराय। जामा जल पुरायो हुकम सू दीया जगाया। तैसे में श्री वायक कह्यौ। जम्बेश्वरजी ने प्रथम शब्द उस समय सुनाया।
सबद श्री वायक-(1) ओ३म्-गुरु चीन्हो गुरु चीन्ह पुरोहित, गुरु मुख धर्म बखाणी।
जो गुरु हाह्ययबा सहजे शीले शब्दे नादे वेदे, तिहि गुरु का आलिंकार पिछाणी।
छव दर्शन जिंहि के रूपण थापण, संसार बरतण निजकर थरप्या,
सो गुरु प्रत्यक्ष जाणी।
जिहि के खरतर गोठ निरोतर बाचा,रहिया रुद्र समाणी।
गुरु आप संतोषी अवरा पोखी, तंत महारस वाणी।
के के अलिया बासण होत हुतासण, तांमै खीर दूहीजूं
रसूवन गोरस घीय न लीयूं, तहाँ दूध न पाणी।
गुरु ध्याईये रे ज्ञानी, तोडत मोहा, अति खुरसाणी छीजत लोहा।
पाणी छल तेरी खाल पखाला, सतगुरु तोड़े मन का साला।
सतगुरु है तो सहज पिछाणी, कृष्ण चरित्र बिन काचै करवै
रह्यो न रहसी पाणी।। 1।।
उस तथाकथित ज्ञानी पुरोहित तथा सभी जनों को सम्बोधित करते हुए गुरु शब्द का सर्वप्रथम उच्चारण किया है। यह शब्द मंगल वाचक, शुभ कारक,भगवान् विष्णु का ही बोधक है। उन छः दर्शनों के द्वारा जानने योग्य गुरु परमात्मा को पहचानो। उसी से ही तुम्हारा कल्याण का मार्ग प्रशस्त होगा।
जिस गुरु ने संसार रूपी बर्तन (घड़ा) अपने ही हाथों से बनाया है, उस गुरु की पहचान करो। जिस गुरु परमात्मा के बारे में बड़े-बड़े विद्वानों की गोष्ठियाँ भी निरु त्तर (चुप) हो जाती है, वेद भी जिसे नेति नेति कहते हैं, उस गुरु परमात्मा को पहचानो। वह गुरु आत्मा रूप से सर्वत्र विद्यमान है। स्वयं गुरु संतोषी है तथा दूसरों का पालन-पोषण करने वाला विष्णु रूप है, उस गुरु को पहचानो।
जो ब्रह्मा रूप से सृष्टि करता है और शिव-रुद्र रूप से संहार करता है। उस गुरु को तुम पहचानो। जिस गुरु की वाणी मधुर एवं रसयुक्त है। कई-कई लोग कच्चे बर्तन की भांति पूर्णतया निर्दोष है, उन्हें गुरु रूपी प्रथम शब्द उच्चारण अग्नि के संयोग से पकाने के लिए, स्वयं ज्ञान रूपी दूध-जल धारण करवाने हेतु गुरु उपस्थित है, पहचानो।
सारहीन गोरस-मट्ठा जिसमें से घी रूपी तत्व निकल चुका है। ऐसे उपेक्षित समाज के लोगों में पुनः रस भरने हेतु, सतगुरु बनकर विष्णु आये हैं, उन्हें पहचानो।
रे ज्ञानी! गुरु का ध्यान कर, गुरु को पहचान, उसी से ही सम्बन्ध स्थापित कर। वह गुरु तेरे मानसिक, शारीरिक, संताप को हरण कर लेगा। तेरे मोह को तोड़ देगा, जिस प्रकार से खुरसाणी पत्थर लोहे के जंग को काट देता है।
यह तेरा शरीर ही जल से भरी हुई चमड़े की पखाल की तरह है। कभी भी छेद हो जायेगा। यह शरीर जीर्ण-शीर्ण, त्रुटित हो जायेगा। जलरूपी जीव उसमें से निकल जायेगा। सतगुरु तेरे मानसिक संशय, भ्रम, अज्ञानता, आदि शूल-कष्टों को काट देगा।
हे पुरोहित! यदि तुम्हारे सामने बेठा हुआ यह बालक सतगुरु है तो सहज में ही पहचान कर लेना, क्योंकि बिना कृष्ण चरित्र के कच्चे घड़े में न तो कभी जल ठहरा है और न ही कभी ठहरेगा। कृष्ण चरित्र से अनहोनी भी होनी हो जाती है। असंभव भी संभव हो जाता है।
जम्भेश्वरजी ने कहा-हे पिताजी! यह ब्राह्मण आशा लेकर आया है। यह यहाँ से धन हेतु निराशा लेकर न लौटे। गोदान तथा रुपये देकर इसकी इच्छा पूरी करो। क्योंकि यह पुरोहित अपनी आजीविका हेतु यह कार्य करता है। इसीलिए इसकी आजीविका में बाधा उत्पन्न न हो।
भगवान् तो सभी को जीविका प्रदान करते हैं। चोर,डाकू,पाखण्डी आदि सभी को भोजन मकान वस्त्रादि सुविधाएँ प्रदान करते ही हैं। आप भी इसे निराश न कीजिये।
लोहटजी ने अपने वचनानुसार दो गाय एवं सौ रुपये दक्षिणा के दिये। ब्राह्मण प्रसन्न होकर वापिस घर को लौटा। किन्तु इस घटना को कभी भूल नहीं सका। सदा-सदा के लिए अपने को बदल लिया। शुद्ध क्रिया, सात्विक भाव से हवन यज्ञादिक कार्य में प्रवृत्त हुआ। पाखण्ड क्रिया को सदा के लिये छोड़ कर सत्य धर्म में प्रवृत्त हुआ। इस प्रकार से गुरु जाम्भोजी की यह बाललीला इस प्रकार से पूर्ण हुई। आगे गोचरण लीला प्रारम्भ होती है।