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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह2 / 94

पहला अध्याय · कथा 2

बिश्नोई पंथ एवं प्रहलाद

समय बड़ा ही बलवान है। हम लोग इस काल को चार विभागों में बाँटते हैं। वैसे तो काल-समय बाँटा ही नहीं जा सकता है। फिर भी काल गणना की सुविधा के लिए सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग तथा कलियुग प्रसिद्ध है। 17 लाख 28 हजार वर्षों का सतयुग, 12 लाख 96 हजार वर्षों का त्रेतायुग, 8 लाख 64 हजार वर्षों का द्वापर युग तथा 4 लाख 32हजार वर्षों का कलयुग होता है।

सतयुग सृष्टि के आदि का है। इस युग में शरीर धारी भगवान् विष्णु प्रकट होते हैं। वही निराकार विष्णु जब सृष्टि का प्रारम्भ, स्थिर एवं विनाश करना चाहते हैं, तब सर्वप्रथम विष्णुरूप में प्रकट होते हैं। उन्हीं शेषशायी भगवान् विष्णु की नाभि से कमल प्रकट होता है। उसी कमल में ब्रह्मा बीज रूप से प्रगट होते हैं। वह ब्रह्मा सृष्टि के रचियता हैं। स्वयं विष्णु सृष्टि के पालन-पोषण करते हैं। शिव रूप से सृष्टि का संहार करते हैं। एक ही सत्ता के तीन नाम प्रसिद्ध हैं, क्योंकि कार्य तीन ही करते हैं। भगवान् की इच्छा का खेल ही यह सम्पूर्ण सृष्टि है।

ब्रह्माजी से मरीचि ऋषि हुए तथा मरीचि के कश्यप हुए। कश्यप के दो पत्नियाँ थी-दिति और अदिति। अदिति के जो संतानें हुई वे आदित्य देवता कहलाए तथा दिति से जो संतानें हुई वे दैत्य कहलाई। बड़ी विचित्र बात है कि पिता एक ही किन्तु संतान दैत्य और आदित्य। अपने स्वभाव गुणों से राक्षस एवं देवता बन गये। इसी समय भी प्रायः ऐसा ही हो रहा है।

वील्होजी ने पूछा कि- हे गुरुदेव! यह कैसे संभव हुआ कि एक पिता देव-दानवों का होते हुए भी संतान में एकता क्यों नहीं हो सकी? क्या माता-पिता भी अपनी प्रिय संतानों में भेदभाव रखते हैं?

नाथोजी उवाच- माता-पिता तो अपनी संतानों में भेदभाव नहीं रखते, किन्तु संतानों का जन्म, कर्म एवं भाग्य अपने-अपने साथ ही पैदा होता है। इसमें जन्म भी कारण बन जाता है। बच्चा जब अपनी माँ के गर्भ में प्रवेश करता है, वह समय भी बहुत महत्वपूर्ण योगदान देता है। एक समय की बात है कि जब कश्यप ऋषि ध्यान में बैठे थे, उसी समय उनकी धर्मपत्नी दिति उपस्थित हुई और उन्होनें अपने पति से ऋतुदान की याचना की। ऋषि संध्या के लिए तैयार थे, किन्तु पत्नी इस कुवेला में ऋतुदान की याचना कर रही थी।

ऋषि ने अपनी पत्नी को बहुत प्रकार से समझाया कि यह वेला ऋतुदान की नहीं है। यह तो संध्या वेला है। इस समय तो परमात्मा का ध्यान, जप, ब्रह्मचर्य पालन एवं हवन करना चाहिए। इसके अतिरिक्त (कांयरे मूर्खा तैं पालंग सेज निहाल बिछायो) यह विपरीत कार्य नहीं करना चाहिए। इस समय राक्षस लोग भ्रमण करते रहते हैं। उनसे आकृष्ट हो जावोगी। मर्यादा का उल्लंघन करोगी, तो तुम्हारे होने वाली संतान राक्षस ही होगी।

दिति कामातुर थी। उसने ऋषि की बात का उल्लंघन किया। ऐसे समय में गर्भ में जो बालक आया था, वह राक्षस ही स्वभाव से था। ऋषि ने कहा हे दिति! तुम्हारे जो संतान होगी, वह राक्षस ही होगी, क्योंकि तुमने नियम को तोड़ा है। सम्पूर्ण सृष्टि नियम से ही चलती है। जहाँ नियम टूट जाता है, वहीं उपद्रव एवं विनाश उपस्थित हो जाता है। दिति ने अपने पति कश्यप के वचनों को सुना और घबरा गयी। अब क्या हो सकता है? बेटा राक्षस हो जाए तो माँ के दुःख का कोई पार नहीं होता। दिति ने प्रार्थना करते हुए कहा हे पतिदेव! इस पाप का प्रायश्चित कैसे होगा? ऋषि ने ध्यान लगाया और देखा कि दिति के गर्भ में जो बच्चा है, वह तो राक्षस ही होगा, किन्तु इसका पुत्र तथा हमारा पौत्र होगा, वह ईश्वर का परमभक्त होगा। तीन लोकों को जीतने वाला होगा। इसलिए देवी तुम निश्चिंत हो जाओ। परमात्मा को स्मरण करो। वही तुम्हारी रक्षा करेगा। समय आने पर दिति के गर्भ से दो जुड़वाँ बालक पैदा हुए। प्रथम बालक हिरण्याक्ष तथा दूसरा बालक हिरण्यकश्यपु के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इनके संसार में आते ही बहुत सारे अपशकुन होने लगे। दुनिया दुःख से त्राहि-त्राहि करने लगी। माता दिति ने तो अपने पुत्र के जन्म अवसर पर खुशी ही मनाई थी। क्योंकि माँ के तो अपने बेटे ही सर्वस्व होते हैं। चाहे कैसे भी क्यों न हो?

वील्होजी ने पूछा- हे गुरुदेव! कुछ वर्ष पूर्व ही तो सृष्टि की संरचना हुई थी। इस प्रथम शुभवेला में ये दो राक्षस कैसे पैदा हो गये? ये दोनों कौन थे? जो इस प्रकार से जन्म लेकर दुनिया को दुःख देने के लिए तैयार थे, आप तो इनके पूर्व की जन्म की कथा वृतान्त अवश्य ही जानते होंगे, क्योंकि सद्गुरु जाम्भोजी भगवान् के आप अतिनिकट रहे हैं। यदि इस विषय में आप जानते हैं तो अवश्य ही बतलाने का कष्ट करें।

नाथोजी कहने लगे- हे शिष्य! भगवान् विष्णु का वैकुण्ठ प्रसिद्ध है। सदा ही वहाँ भगवान् चतुर्भुजी पालनपोषण कर्ता, विराजमान रहते हैं। उस धाम में पहुँचने के लिए योगी लोग सदा ही ध्यान, ज्ञान, पूजा- अर्चना करते हैं। उसी धाम में जाने के लिए एक बार सनकादिक चारों भाई जो सदा ही पाँच वर्षों की अवस्था में रहते हैं, जाने के लिए तैयार हुए। जब पाँचवें दरवाजे से प्रवेश करने लगे, तब वहाँ पहले से ही उपस्थित जय और विजय नाम के पहरेदारों ने अन्दर प्रवेश करने से रोक दिया। सनकादिकों का आदर- सत्कार करना चाहिये था। किन्तु उन्हें अप्रिय शब्दों द्वारा फटकारते हुए कहने लगे- तुम लोग विष्णुपुरी में प्रवेश करने योग्य नहीं हो। तुम्हारा कुरूप तथा दिगम्बर ही वेश है। तुम वस्त्र ही धारण करना नहीं जानते। विष्णुपुरी में प्रवेश कैसे कर सकते हो? वैसे तो सनकादिक पूर्ण ज्ञानी थे। उन्हें मान-अपमान से कुछ भी लेना देना नहीं था। फिर भी उन परहेदारों को अनधिकारी मानकर उन्हें उनके कर्तव्य का बोध कराया और कहा-जय विजय! तुम दोनों मृत्युलोक में जाओ। वहाँ जाकर अपनी दुष्टता प्रकट करो। यहाँ तो सज्जन व्यक्ति का होना चाहिये। तुम्हारा यहाँ क्या काम है? तुम लोग मृत्युलोक में जाकर राक्षस बन जाओ! यही कारण था कि जय-विजय को मृत्युलोक में आना पड़ा और राक्षस बनकर अपना समय पूरा करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

भगवान् विष्णु सदा ही अपने प्रिय भक्तों के सहायक हैं। सनकादिकों का ही समर्थन किया और कहा इन संतों के वचन ही प्रमाण हैं। जय-विजय ने बहुत प्रकार से प्रार्थना की और कहा- हे देव! हमने भूल की है तथा हम क्षमा माँगते हैं। इन परम ऋषियों के वचन प्रमाण हैं। हे विष्णो! हमारा वापिस आना कब और कैसे होगा, आप कृपा करके अतिशीघ्र ही हमें वापिस बुलाइयेगा।

भगवान् ने कहा- तुम्हें जीवन जीना है। मृत्युलोक में, किन्तु खेल की तरह ही। यदि इस संसार में खेल को सत्य मानकर इसमें लिप्त हो गये, तो वापिस आने में बहुत ही देर लग जायेगी। तुम सावधान रहना। भूल मत करना। किन्तु तुम्हारे वश की बात कहाँ है? तुम तो अवश्य ही करतूत करोगे। संसार में सहयोग की भावना से तुम्हारा जीना मुझे दिखलाई नहीं दे रहा है। इसलिए तुम विरोधी जीवन जीओगे। तुम्हारे बराबर का अन्य कोई शत्रु तुम्हें नहीं मिलेगा, तो तुम मुझ विष्णु से हद्ध विरोध ठानकर अपनी ताकत का प्रदर्शन करोगे। इसलिए तीसरे जन्म में तुम्हारा आगमन हो सकेगा और यदि सहयोग भाव, भक्ति, श्रद्धा से जीवन जीओगे तो सात जन्म वापिस आने में लग सकते हैं। क्योंकि विरोधी भी अपने शत्रु को याद रखता है, मित्र भी अपने मित्र को याद रखता है। प्रेमी मित्र तो अपने सुहृदय प्रिय को भूल जाता है, किन्तु शत्रु कभी भूलता नहीं है। दिन-रात, आठों पहर याद रखता है। यह ध्यान की तीव्रता एवं मन्दता पर निर्भर है। इसलिए जय-विजय तुम दोनों मृत्युलोक में जाओ। इन संतों का शाप शिरोधार्य करो तथा तीन जन्मों को पूरा करके वापिस लौट आओ।

इतनी बातें कहते ही जय-विजय का दैविक शरीर लोप हो गया। मृत्युलोक में कश्यप की पत्नी दिति के गर्भ से दो बच्चे हुए, उनका नाम हिरण्याक्ष एवं हिरण्यकश्यपु रखा गया, जो सृष्टि के आदि में भयंकर राक्षस भगवान के विरोधी हुए।

शिष्य वील्हा ने अपने गुरु नाथोजी से पूछा-हे गुरुदेव! यह जानने की मेरी प्रबल इच्छा है कि जयविजय ने इस धरती पर आकर क्या उपद्रव किया, जिससे भगवान को अवतार लेना पड़ा? क्या भगवान् अपनी इच्छा मात्र से ही राक्षसों का विनाश करने में सक्षम नहीं हो सकते? क्योंकि भगवान् तो सर्वसमर्थ हैं। उनके लिए तो कुछ भी अकरणीय नहीं है। भगवान स्वयं ही ऐसा क्यों करते हैं? आप मेरे इस संशय को निवृत्त कीजिए।

नाथोजी अपने परम शिष्य से इस प्रकार कहने लगे- हे शिष्य! पहली बात तो यह है कि भगवान स्वेच्छा से ही अवतरित होते हैं। अपना स्वयं का अनेक रूपों में परिवर्तन कर लेना तो उनकी अपनी इच्छा ही है। दूसरी बात यह है कि भक्तों की श्रद्धा भगवान् के प्रति बढ़े इसलिए भगवान् निराकार से साकार रूप में आकर साक्षात् दर्शन, स्पर्श एवं वार्तालाप करते हैं, जिससे भक्तों की निष्ठा दृढ़ हो सके। राक्षसों के अभिमान को भी भगवान् प्रकट होकर चूर-चूर कर देते हैं। अन्यथा उन्हें भी कैसे पता चले कि हमारे से ऊपर कोई और भी सत्ता विद्यमान है। हम तो उसकी एक कला की बराबरी भी नहीं कर सकते। वरदान या श्राप के कारण भी भगवान स्वयं आकर अपने वचनों को पूरा करते हैं तथा अपना कर्त्तव्य निभाते हैं। सृष्टि का कालचक्र यथावत चलता रहे, जीओ और जीने दो, के सिद्धांत को भगवान स्वयं आकर स्थित करते हैं।

सभी का पालन-पोषण होवे, उसमें कोई विघ्न उपस्थित करे, तो भगवान् से सहन नहीं होता। वे स्वयं झटिति किसी भी रूप में प्रकट हो जाते हैं और अपना कार्य स्वयं कर लेते हैं। जैसे माँ अपने शिशु के कष्ट को स्वयं अपने ऊपर लेकर, सभी प्रकार से रक्षा करती है। भगवान् कहीं माता, तो कहीं पिता तथा भाई- बन्धु-सहायक का पाठ अदा करते हैं।

हिरण्याक्ष एवं हिरण्यकश्यपु ये दोनों बड़े ही उपद्रवकारी थे। जहाँ-तहाँ देखो, दूसरों को दुःख देने में ही अपना सुख मानते थे। हिरण्याक्ष तो बड़ा ही वीर था। हाथ में गदा-शस्त्र लेकर पृथ्वी पर भ्रमण के लिए निकल पड़ा और युद्ध के लिए ललकारने लगा था। हिरण्याक्ष की भीषण हुँकार का जवाब देने वाला कोई नहीं था। वह किससे लड़े? दूसरों को दुःख दिये बिना उसे चैन नहीं पड़ता था। इस पृथ्वी पर उसे बराबरी का कोई मिला ही नहीं, जिससे युद्ध कर सके। भगवान विष्णु ही एक योद्धा हैं, जो युद्ध में उसे आनन्द दे सके। किन्तु विष्णु उसे कहाँ मिले और कब मिले तथा कब अपनी ताकत का आजमाईश कर सकूँ।

विष्णु नहीं मिले तो क्या हुआ? विष्णु की बनाई हुई यह कृति धरती है। इससे ही छेड़खानी की जाये। विष्णु स्वयं ही अपनी दुर्दशा देखकर आ जायेंगे और मैं अपनी इच्छा युद्ध करके पूर्ण करूँगा। ऐसा विचार करके हिरण्याक्ष ने सम्पूर्ण धरती को जल में डुबाने का प्रयास प्रारम्भ किया। धरती पर जल ही जल कर दिया जाये जिससे न तो अन्न पैदा होगा और न ही कहीं पर मनुष्यों को रहने की जगह मिल सकेगी। लोग दुःखी होंगे। विष्णु से पुकार करेंगे। रोयेंगे-चिल्लाएंगे, तब कहीं भगवान विष्णु आयेंगे। तब मुझे अपनी इच्छा पूरी करने का अवसर मिलेगा। यही किया हिरण्याक्ष ने। धरती को जल में डुबो दिया। ब्रह्मादि देवता भगवान् विष्णु से पुकार करने लगे। विष्णु ने प्रकट होकर देवताओं को दर्शन दिया। उन्हें धैर्य बंधाया कि तुम लोग चिंता मत करो, मैं पहले से ही तैयार हूँ। जब पाप का घड़ा भर जायेगा, तब फूटेगा। अभी फूटने ही वाला है। देवता लोग अपने-अपने स्थान पर लौट आये।

भगवान् विष्णु ने अपनी प्रकृति-माया को वशीभूत करके, अपनी ही इच्छा से देश-काल परिस्थिति के अनुसार शूकर का रूप धारण किया और पुष्कर में धरती को जल से ऊपर उठाते हुए प्रकट हुए। वहीं पर पाताल लोक से पीछे-पीछे दैत्य हिरण्याक्ष आ रहा था। दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। भगवान् ने पृथ्वी को जल से बाहर निकाला। पृथ्वी को अन्न पैदा करने की योग्यता प्रदान की और उजड़े हुए लोगों को पुनः बसाया। दैत्य से भयंकर युद्ध किया और उसे मार गिराया। देवताओं ने जय-जयकार की। दुष्ट राक्षस हिरण्याक्ष को भगवान् ने शूकर रूप धारण करके मार दिया। भगवान् ने यह बड़ी विचित्र लीला की।

पुत्र का इस प्रकार मारा जाना सुनकर दिति शोक से व्याकुल हो गयी। अपने दूसरे बेटे को पास में बुलाकर कहने लगी- बेटे! अब तो तुम ही मेरे एक सहारे हो। मेरे लाल! तुम्हारे भाई को तो साक्षात् विष्णु ने ही शूकर रूप धारण कर मारा है। वह विष्णु के साथ युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गया है। अब तुम्हें भी वही कार्य करना चाहिये, जो तुम्हारे भाई ने किया। जब तक विष्णु जिन्दा रहेगा, तब तक तुम्हें भी सुख से नहीं जीने देगा। अपने कुल परिवार की अभिवृद्धि भी नहीं होने देगा। तुम ऐसा कार्य करो कि तुम्हारा जन्मजात शत्रु मारा जाये और तुम निष्कटंक होकर राज्य करो। किन्तु विष्णु के जीवित रहते हुए यह असंभव है। अब तो तुम्हारा बैरी। विष्णु बन ही गया है। तुम्हारा भाई हिरण्याक्ष अप्रतिम वीर था। जो सम्पूर्ण धरती को तोलता था। उसकी हत्या शूकर रूप धारण कर विष्णु ने ही की है। अन्यथा एक मामूली सा शूकर जानवर तुम्हारे भाई को कैसे मार सकता है? हमारे किये हुए कार्य पर तो विष्णु ने पानी फेर ही दिया। अब हमें भी शान्त नहीं रहना चाहिये। हमें भी विष्णु के कर्त्तव्यों पर पानी फेर देना चाहिये।

अपनी माता की बात सुनकर पहले तो हिरण्यकश्यपु कुछ घबराया। किन्तु धैर्य धारण करके अपनी माता को धीरज बंधाते हुए कहने लगा- हे मात! आपकी आज्ञा शिरोधार्य है। मुझे अपनी जान की बाजी लगा देनी पड़े तो भी पीछे नहीं हटूँगा। पहले विष्णु को मारूँगा, फिर अन्न-जल ग्रहण करूँगा।

ऐसा कहते हुए दैत्यराज हाथ में गदा लेकर विष्णु को मारने के लिए वैकुण्ठ धाम की तरफ अबाध गति से चल पड़ा। भगवान् विष्णु ने देखा कि दैत्यराज बड़े ही क्रोध से भरकर युद्ध करने की इच्छा से आ रहा है। इस राक्षस को अब तक यह पता नहीं है कि भविष्य में क्या होने वाला है? भगवान् तो जानते थे कि अब तो युद्ध को टालना है। जब युद्ध का समय आयेगा, तो अवश्य ही युद्ध होगा। अब तक समय नहीं आया है। इस समय तो इसे शांत करना चाहिये। ऐसा विचार करके भगवान् विष्णु हिरण्यकश्यपु के हृदय में प्रवेश कर गये। अब दैत्य तो भगवान् को बाहर देखता है, किन्तु विष्णु तो दैत्य के हृदय में प्रवेश कर गये हैं। कैसे मिलेंगे? जहाँ पर है, वहाँ पर तो खोजता नहीं है। जहाँ पर नहीं है, वहाँ पर खोजता है। यही सभी की विडम्बना है।

भगवान वैकुण्ठ में मिले नहीं, दैत्य वापिस लौट आया। अपने साथियों की सभा बुलाई और कहने लगा-भाई लोगो? यह बतलाओ कि आततायी विष्णु कैसे मरे? सभी दैत्यों ने मिलकर विचार किया-इस प्रकार से प्रत्यक्ष युद्ध में मायावी विष्णु मारे नहीं जा सकते। उनको मारने का एक ही उपाय है जिससे जीवित विष्णु तुरंत मारे जा सकते हैं। केवल डाली-पत्तों में पानी डालने से पेड़ हरा भरा नहीं हो सकता। जब तक कि उसके मूल में सिंचाई न की जावे। ये देवता तो डाली-पत्तों की तरह हैं। इन सभी का मूल तो विष्णु है। स्वयं विष्णु तो सभी का मूल है। उनका मूल, कोई नहीं है। मूल रूप विष्णु को काटने से डाली रूप देवता स्वयं ही कट जायेंगे।

सर्व मूल रूप विष्णु को मारने का एक ही उपाय हो सकता है कि विष्णु की बनाई हुई मर्यादा को मिटा दिया जावे। इससे विष्णु मरे हुए के समान ही हो जाएगा। जो लोग हवन-पूजा, पाठ,शास्त्र-अध्ययन, भजन-कीर्तन तथा नियमों का पालन करते हैं, ये ही विष्णु के मूल हैं। इन्हें ही बन्द करवा दिया जावे। इससे विष्णु स्वतः कमजोर हो जायेंगे। यदि जीयेंगे तो भी मरे हुए जैसे शक्तिविहीन हो जायेंगे। तब तो अपना ही आदेश-राज्य चलेगा। हम स्वयं ही भगवान्-सम्राट बन जायेंगे। विष्णु तथा उनके चाटुकार देवताओं को मार गिरायेंगे। हम ही एकछत्र साम्राज्य करेंगे हमारे ही विधि विधान इस लोक में चलेंगे।

ऐसा विचार करते हुए सभी दैत्य एकत्रित हुए और गाँव-नगरों को चारों तरफ से घेर लिया। विष्णु की मर्यादा उठवा दी और अपनी राक्षसी मर्यादा स्थापित करने का प्रयास होने लगा। स्वयं हिरण्यकश्यपु अपने साथियों को इस कार्य के लिए नियुक्त कर वन में तपस्या करने के लिए चला गया।

हिरण्यकश्यपु ने ब्रह्माजी को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की। ब्रह्माजी हमारे पितामह हैं। वही हमें वरदान देकर शक्तिसम्पन्न बनायेंगे। दिव्य शत वर्षों तक घोर तपस्या की। ब्रह्माजी प्रसन्न हुए तथा वरदान माँगने को कहा-तब हिरण्यकश्यपु ने अपनी तपस्या का फल साक्षात प्रगट देखा और कहने लगा- मैं आपका पौत्र प्रणाम करता हूँ यदि आप मेरी तपस्या से प्रसन्न हो गये हैं, तो मुझे ऐसा वरदान दीजिये जिससे मैं अजर अमर हो जाऊँ। ब्रह्माजी ने कहा तथास्तु! ऐसा ही होगा। किन्तु हे तपस्वी! मैं तुम से यह जानना चाहता हूँ कि इस तेरी माँग का क्या अर्थ है? जरा मुझे खोलकर बताओ ताकि मैं तुम्हें ठीक से जो तुम माँगो, वही दे सकूँ।

प्रसन्नता से प्रफुल्लित दैत्यराज माँग दुहराते हुए कहने लगा- सुनो! मैं दिन में नहीं मरूँ, रात्रि में भी नहीं मरूँ,मैं अन्दर भी नहीं मरूँ, बाहर भी नहीं मरूँ, नर से भी नहीं मरूँ, नारी से भी नहीं मरूँ, घाव से भी नहीं मरूँ, शस्त्र से भी नहीं मरूँ, देव से भी नहीं मरूँ, दैत्यों से भी नहीं मरूँ। हे प्रभु! आप यदि मेरे पर प्रसन्न हो गये हैं, तो इनमें से मुझे कोई नहीं मार सके। ऐसी व्याख्या सुनकर ब्रह्माजी ने वरदान दिया और अन्तर्ध्यान हो गये।

हमारा राजा वरदान लेकर, शक्ति सम्पन्न होकर वापिस लौटा है। ऐसी वार्ता सुनकर दैत्यों की खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा और दिनों दिन अपराध को बढ़ावा देने लगे। यह सभी कुछ उस सृष्टि के नियंता- परमेश्वर की इच्छा से हो रहा था। किन्तु दैत्य इस बात को समझने में असमर्थ थे। जिससे दिनों- दिन उपद्रव बढ़ते ही जा रहे थे।

वील्होजी ने पूछा- हे गुरुदेव! तब तो यह सिलसिला रुकने का नाम ही नहीं ले रहा होगा? दुनिया में त्राहि-त्राहि मच गयी होगी। तब तो भगवान् को अवतार लेना था। दैत्य वंश का विनाश करना था। भगवान् सर्वज्ञ होते हुए भी न जाने इतनी देर क्यों करते हैं? यह भगवान् के द्वारा कैसी परीक्षा, जिससे तबाही मचती हो?

नाथोजी महाराज बोले हे शिष्य! भगवान एक कार्य को एक ही बार करते हैं। दुबारा उसकी नकल कभी नहीं करते। अबकी बार तो कुछ नया करना था। इस बार तो भगवान् स्वयं नहीं आये, किन्तु पहले अपने भक्त को यहाँ पर भेजा था। भक्त एवं भगवान् में कितना गहरा सम्बन्ध है। भक्त के लिए भगवान आते हैं। यह बताने के लिए ही तो प्रथम प्रह्लाद को भगवान ने हिरण्यकश्यपु की पत्नी कयाधु के गर्भ में भेजा था तथा यह बताया कि मैं पीछे आऊँगा, पहले तुम जाकर भक्ति को दृढ़ करो। हिरण्यकश्यपु के अपराध को पराकाष्ठा तक पहुँचा दो।

फिर भगवान ने कहा-मेरा आना ठीक होगा। पिता राक्षस, बेटा भक्त देवता, कैसा यह मोहमाया का जाल? बाप-बेटे का सम्बन्ध, किन्तु वैचारिक मतभेद से किस प्रकार भक्ति का अंकुर फूटेगा और पनप सकेगा। यही परीक्षा है। जिसमें उत्तीर्ण हो जाये, तो समझो असली भक्त है।

माता कयाधु के गर्भ से हिरण्यकश्यपु के पुत्र के रूप में प्रह्लाद ने जन्म ले लिया। तीनों लोकों में खुशी का ठिकाना नहीं रहा। सम्पूर्ण प्रकृति खिल उठी, बाजे बजने लगे। मंगल गीत गाये जाने लगे। माता-पिता, कुटुम्बी जनों को यह आभास हुआ कि हमारे कुल दीपक आ गये हैं। अब हमारा कुल आगे बढ़ेगा। प्रह्लाद ही हमारे सर्वेसर्वा होंगे। देवता एवं भक्तजनों को भी अपार खुशी हुई। एक दूसरे को बधाइयाँ बाँटने लगे। अपने कुल-दीपक आ गये हैं। ठण्डी-ठण्डी हवा आती है, तो पीछे मेघ भी अवश्य ही आते हैं। प्रथम भक्त आये हैं तो पीछे अवश्य हमारे प्राणों के प्यारे भगवान् भी आयेंगे।

वील्हा ने अपने गुरु देव नाथाजी से पूछा-हे गुरु देव! आपने तो सुना ही होगा कि प्रह्लाद ने बहुत ही दुःख उठाया, किन्तु अपने पिता की आज्ञा नहीं मानी। ऐसा क्यों हुआ? माता-पिता की आज्ञा तो पुत्र को आँखें मूँद करके भी माननी चाहिए? प्रह्लाद को भगवान् की भक्ति की तरफ अग्रसर करने में किसका सहयोग था? ऐसा माना जाता है कि वहाँ उस समय तो असुरों का ही साम्राज्य था। भगवान् की भक्ति के तो वे लोग विरुद्ध ही थे। प्रह्लाद भक्त की पढाई-लिखाई कहाँ, किस प्रकार से हुई? जिससे प्रह्लाद के अंदर सोया हुआ बीज अंकुरित हो सका। अन्य भी बाल सुलभ लीलाएँ जो प्रह्लाद ने की थी, उनका विवेचन करें? मेरे मन में प्रभु परमात्मा एवं आत्मा के मिलन की कथा सुनने की अति जिज्ञासा है।

आपके अमृतमय वचनों से मैं तृप्ति को प्राप्त नहीं हो रहा हूँ। ऐसे जिज्ञासु शिष्य के वचनों को श्रवण करके गुरु जांभोजी विष्णु के परम भक्त-आचार्य नाथोजी ने विस्तार पूर्वक प्रह्लाद की कथा कहते हुए इस प्रकार से बोले-देखिए! इस असार संसार की क्या नियति है यह कुछ भी नहीं कहा जा सकता। परमात्मा किसके द्वारा क्या करवाना चाहते हैं, यह कहना अति कठिन है। फिर भी अपनी मति के अनुसार ही ऋषि महात्मा जन अपनी-अपनी बात कहते हैं। जिस कथा में भगवान् का परम पवित्र चित्रण न हो, उसे कथा ही नहीं कहना चाहिए और जिस व्यक्ति ने भगवान् की परम पवित्र लीला का श्रवण नहीं किया, उसका संसार में जन्म लेना ही व्यर्थ है।

जब प्रह्लाद बड़ा हो गया, तो माता-पिता ने प्रह्लाद को पाठशाला में पढने के लिए भेजा। दैत्य गुरु शुक्राचार्य को बुलाया और प्रह्लाद का हाथ गुरु के हाथ में सौंप दिया, और हिरण्यकश्यपु निश्चिंत हो गया। शुक्राचार्य ने अपने बेटे शण्ड और अमर्क से कहा कि प्रह्लाद को नीति और आसुरी विद्या सिखलाओ। अन्य दैत्य बालकों की भाँति प्रह्लाद को भी विद्या पढाना प्रारम्भ किया। प्रह्लाद ने प्रारम्भिक अक्षर ज्ञान श्रवण किया।

प्रह्लाद तो राज कुमार था। वह कोई सामान्य बालक तो नहीं था। अब तक प्रह्लाद की सोयी हुई आत्मा- धर्म जाग्रत भी नहीं हुआ था। ज्ञान तो बीज रूप में था। उस बीज को फलने-फूलने के लिए हवा,जमीन,पानी,मौसम आदि चाहिए था, वह प्राप्त नहीं था।

संयोग वश एक दिन प्रह्लाद घोड़े पर सवार हो कर नगर भ्रमण को निकला था। अपने पिता की राज्य व्यवस्था एवं प्रभाव देखने के लिए। एक जगह गरीब की झोंपड़ी के पास से होकर प्रह्लाद गुजर रहा था। उसी समय ही प्रह्लाद के कानों में ओम् की ध्वनि-विष्णु का नाम जप सुनाई पड़ा। प्रह्लाद ने प्रार्थना के उद्गार अपने पिता के राज्य में प्रथम बार ही सुना था। प्रह्लाद का घोड़ा वहीं रुक गया। आगे नहीं बढ़ सका। प्रह्लाद तत्काल घोड़े से नीचे उतर गया और झोंपड़ी में जाकर देखा तो दो व्यक्ति, पति-पत्नी आसन पर बैठे हुए भगवान् के नाम का जप कर रहे थे। वह उनकी ही ध्वनि थी।

अचानक प्रह्लाद के आ जाने पर जप नहीं रुका, किन्तु डर के मारे मौन भाव से। प्रह्लाद ने कहा-डरो मत। मैं आपसे यह जानना चाहता हूँ कि पूर्व में जो नाम की ध्वनि आ रही थी वह अब शांत क्यों? यदि कोई परमात्मा है, तो फिर डर क्यों? किसलिए यह नाम जप हो रहा है? क्या मेरे पिता के अतिरिक्त भी ईश्वर जैसी सत्ता हो सकती है, जिसका तुम नाम लेते हो। तुम्हें जो कुछ चाहिए, वह मेरे पिता राजा से ले सकते हैं। राजा ही ईश्वर होता है। कहिए क्या विपत्ति आई है?

उन दम्पति ने डरते-काँपते हुए कहा-हे राजकुमार! क्षमा करें। हमारी भूल हुई है। हमने आपके पिता का नाम एवं शरण छोड़ कर उस परम पिता परमात्मा की शरण ली है। हम तो कुम्हार हैं। मिट्टी के बर्तन बनाना हमारा कर्म है। हम अपनी ही भूल का पछतावा कर रहे हैं। हमने बरतन पकाने के लिए निहाई (आवा) में रख दिए और आग लगा दी। पूरा ईधन समाप्त हुए बिना आग ठंडी कैसे होगी? भूल से अंदर रहे हुए बिल्ली के छोटे बच्चे जल कर मर जाएँगे। उन्हें ईश्वर के बिना कौन बचाएगा? हे राजकुमार! जलती अग्नि से इन्हें न तो तुम बचा सकोगे, न ही हम और न ही तुम्हारे पिताजी। केवल एक पालन-पोषण कर्ता भगवान् विष्णु ही रक्षा कर सकता है। हमें घोर पाप से उबार सकता है। हम तो उन्हीं का स्मरण-भजन कर रहे हैं। अब आप हमें चाहे मारो या उबारो, यह आप पर ही निर्भर है।

प्रह्लाद को भी यह वार्ता प्रिय लगी और कहा-तब ठीक है। आप अवश्य ही परमात्मा-विष्णु का स्मरण कीजिए। किन्तु एक बात अवश्य ही सुनलो- मैं भी इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण चाहूँगा। जब तुम्हारे बर्तन पक जाएँ, तो पहले मुझे बुला लेना। फिर निहाई खोलना। मैं बिल्ली के बच्चों को जिंदा अपनी आँखों से देखना चाहता हूँ। अब तो मैं अपने घर जाता हूँ। आप लोग जितना प्रयत्न करना चाहें वह कर लेना। यदि ईश्वर-विष्णु रक्षा नहीं कर सका तो मैं आपको मृत्यु-दण्ड दूँगा। घाणी में पिलवा दूँगा। ऐसे कहते हुए प्रह्लाद अपने घर लौट गया।

इधर कुम्हार दम्पत्ति निश्चिंत होकर एक मन एक चित्त से भगवान् का स्मरण करने लगे। हार्दिक पुकार करने लगे। भगवान् बचाएँगे, तो ये निरीह प्राणी तथा हम भी बच जाएँगे। अन्यथा तो सभी का मरना निश्चित है। एक सप्ताह तक निरंतर हरि का स्मरण-पुकार की और सातवें दिन नियम से बर्तन पक गये तथा ठण्डे भी हो गये। निहाई खोलने का समय उपस्थित हुआ। प्रथम प्रह्लाद को बुलाया गया और उनके सामने ही बर्तन निकालने प्रारम्भ किए गए।

बिल्कुल पके हुए बर्तन निकलते जा रहे हैं। प्रह्लाद एक दृष्टि से निहार रहे हैं। वह चमत्कार न जाने कब होगा? उसकी प्रतीक्षा में खड़े हुए हैं। प्रह्लाद के देखते हुए वह समय शीघ्र ही उपस्थित हुआ और प्रह्लाद ने देखा- बाहर तो सभी बरतन पके हुए हैं, किन्तु बीच में कुछ बर्तन अभी कच्चे हैं। उन बर्तनों को उठाया, तो बिल्ली के बच्चे खेलते हुए दौड़ कर बाहर आये। यह देखकर कुम्हार दम्पत्ति को खुशी का ठिकाना ही न रहा। भगवान् को बहुत-बहुत धन्यवाद दिया। प्रह्लाद की उदारता का भी गुण-गान किया।

प्रह्लाद ने अपने छोटे से जीवन में यह प्रथम छोटी सी अलौकिक घटना प्रत्यक्ष देखी थी। आश्चर्य चकित नेत्रों से देखता ही रह गया। यह देख कर वापिस घर लौट आया। बाल हृदय पर जो अमिट प्रभाव पड़ा, वही अंत तक निकल न सका। प्रह्लाद का जीवन ही बदल गया। अब तो सर्वत्र ईश्वर का ही दर्शन होने लगा। माता-पिता तो केवल जन्म दाता हैं। किन्तु यह विचित्र कार्य करने वाला तो कोई और ही होगा, जिसका प्रमाण मैंने प्रत्यक्ष देखा है। बालक प्रह्लाद विद्या पढ़ने को गुरु स्थान-पाठशाला में तो अवश्य ही जाता, किन्तु गुरु के बताए हुए वचनों की तरफ ध्यान नहीं देता। बार बार गुरु उसे सम्बोधित करते हुए कहते-हे बालक प्रह्लाद तू अभी छोटा है, तुम्हें पता नहीं है, जैसा हम पढाते हैं, वैसा पढो।

असुरों की विद्या पढ लीजिए, जिससे सम्पूर्ण विघ्नों का नाश हो जाएगा। तुम्हें ही तो राजा बनना है। यदि हमारी बात पर अब ध्यान नहीं दोगे, तो बाद में पछतावोगे। यदि तुम्हारे पिता को इस बात का पता चल गया, तो वे हमें भी मारेंगे और तुम्हें भी मार गिरायेंगे।

प्रह्लाद ने अपने गुरु की एक बात भी नहीं मानी। उल्टा समझाते हुए कहा-हे गुरु जनो। आप मुझे क्षमा करें। आप जो मुझे विद्या सिखाना चाहते हैं, उस विद्या की मुझे आवश्यकता ही नहीं है। जो कुछ मुझे जानना था वह मैंने जान लिया है। अब कुछ भी मेरे लिए जानना शेष नहीं है। मेरे तथा तुम्हारे भी माता-पिता गुरु - बंधु जन, सभी कुछ वह विष्णु परमात्मा ही हैं। उसी एक को जानने से सभी कुछ जान लिया जाता है। और यदि उस एक को ही नहीं जाना, तो तुमने कुछ भी नहीं जाना। अन्य सभी बातें जानना व्यर्थ है। जिस देही में प्राण ही नहीं है, वह तो स्वतः मृत है। सभी ज्ञानों का प्राण स्वरूप ज्ञान तो ईश्वरीय ज्ञान ही है। वही तो मुझे प्राप्त हो चुका है। जो व्यक्ति खेती तो करता है, हल चलाता है, किन्तु उसमें बीज नहीं बोता है, वह खेती व्यर्थ है। उसी प्रकार से बिना भगवद् ज्ञान के अन्य ज्ञान तो व्यर्थ ही समझो। आप लोग तो पुस्तकों की देखी बात करते है। किन्तु मैं अपनी आँखों देखी कहता हूँ। इसमें संदेह कहाँ है?

जब गुरु जन प्रह्लाद की वार्ता श्रवण करके अनमने मन से घर चले गये, तब अन्य बालकों ने प्रह्लाद से पूछा-हे राजकुमार! यह विद्या तुमने कहाँ से प्राप्त की? अभी तो ऐसा अवसर दिखाई नहीं देता। हे प्रह्लाद! यह कार्य तो बड़ा ही जटिल है। यहाँ पर सभी का विरोधी बन कर, तुम कैसे जीवन जी सकोगे? कैसे विद्या पढ़कर राजा बन सकोगे? हमें तो इस बात पर संदेह है कि शायद तुम्हारा जीवित रहना भी मुश्किल जान पड़ता है। इसीलिए गुरु एवं राजा ही ईश्वर होता है। उनकी आज्ञा मानने से विघ्न नहीं होते अन्यथा तो अनेक विघ्नों का सामना करना पड़ेगा।

प्रह्लाद उवाच-हे साथियो! अभी आपको पता नहीं है। तुम बहुत भोले हो। जिन्होंने गर्भ में रक्षा की है, क्या वह अब बच्चा बनने पर रक्षा नहीं करेगा? यह सम्पूर्ण सृष्टि उसकी ही शक्ति विशेष से उत्पन्न होती है। उसी से स्थिर एवं प्रलय भी हो जाती है। भगवान् के हाथ लम्बे हैं, वे हमें उबारेंगे। तुम लोग श्रद्धा भक्ति विश्वास से उसी का स्मरण करो। तभी तुम्हारा भला होगा।

अपने जन्म से पूर्व की कथा प्रह्लाद ने अपने साथियों को बताते हुए कहा- जब मेरे पिताजी वन में तपस्या करने चले गए थे, तब मैं अपनी मां के गर्भ में था। अभी मैं अचेत अवस्था में बड़ा हो रहा था। तब देव राज इन्द्र ने सोचा कि एक तो दुष्ट तपस्या करने को चला गया, दूसरा यही उसी का ही अंश अपनी माँ के पेट में पल रहा है। जैसा बाप वैसा बेटा। क्यों न इस गर्भस्थ शिशु को नष्ट ही कर दिया जाए। न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी। न तो यह पैदा ही होगा न ही उपद्रव करेगा। देवराज इन्द्र मेरी माँ को अधीन करके स्वर्ग लोक में ले जा रहे थे। तभी मार्ग में नारदजी मिल गये।

उन्होंने पूछा- देवराज! यह क्या करने जा रहे हो। इस बेचारी अबला कयाधु को कहाँ ले जा रहे हो। इसका पति अभी तपस्या करने गया है। एक तो यह अबला-निराश्रिता तथा गर्भवती भी है।

इन्द्र के कहा-हे नारद! इस के गर्भ में जो बच्चा बड़ा हो रहा है, उसको जन्म के पूर्व ही नष्ट करने जा रहा हूँ। क्योंकि यह पुत्र भी पिता जैसा ही होगा। आग लगने से पूर्व ही कुआँ खोद लेना चाहिए। ऐसी नीति है। नारद तो तीनों कालों की जानने वाले देव ऋषि हैं। उन्हें मालूम था कि यह गर्भस्थ बालक कौन है? नारदजी ने इन्द्र से कहा कि आप इसे नष्ट करने की न सोचें। इसे मारने से तीनों लोक मर जाएँगे। यह बालक तुम्हारा देवताओं का भी संरक्षक है। देवराज! तुम इस बात से पूर्णतया अनभिज्ञ हो। मैं जानता हूँ। इसीलिए आदर सहित कयाधु को छोड़ दीजिए। इसके गर्भ में भगवान् का भक्त पल रहा है। शीघ्र पैदा होकर सम्पूर्ण दुनिया को भक्ति का पाठ पढाएगा। पुनः मर्यादा बाँधेगा। न जाने कितने ही जीवों का उद्धार करेगा।

इन्द्र को इस प्रकार समझाने पर मेरी माता को बंधन मुक्त कर दिया। वहाँ से नारदजी मेरी माता को ऋषियों के आश्रम में ले आये। वहीं पर उन्होंने मेरी माता को ज्ञान-ध्यान की बातें सुनायी थी। मैं तो अभी जन्म भी नहीं ले सका था। अपनी माँ के पेट में ही सभी प्रकार की ज्ञान-ध्यान की बातें सुनी थी। उस समय तो मैं पवित्र हृदय वाला कोरा कागज ही था। जो भी बात मेरी माता ने सुनी, मेरे हृदय पर ज्यों की त्यों अंकित हो गई। उन्हीं बातों का प्रभाव इस समय मेरे पर हो रहा है। उन्हीं बातों को स्मरण करके मैं आनंदित हो रहा हूँ। अब मुझे कुछ भी सुनने की अभिलाषा नहीं है। जो कुछ भी सुनना था, सुन लिया। जो कुछ भी जानना था, वह जान लिया। अब क्या जानना व सुनना शेष है?

बालकों ने पूछा-हे प्रह्लाद! आप हमें भी तो इतना ज्ञानी बना दीजिए, जितने आप स्वयं हो। हमें भी तो आपकी तरह गर्भ में ज्ञान क्यों नहीं हुआ? प्रह्लाद बोले हे बालको! यह तो तुम्हारी पात्रता पर ही निर्भर करता है। तुम्हारी माताओं को अच्छी संगति नहीं मिल पायी। असुरों की संगति करने से तुम्हारा मन असुरता को ग्रहण कर गया है। किन्तु घबराओ मत। धीरे-धीरे अभ्यास करते-करते एक दिन तुम भी अवश्य ही भगवान् की भक्ति रस से भर जाओगे। तब तुम्हें संसार तथा संसार सुख तुच्छ ही मालूम पड़ेंगे। अभी तो कुछ भी देरी नहीं हुई है। बहुत सुनहरा अवसर तुम्हारे पास है। इसका सदुपयोग तुम कर सकते हो।

एक दिन राजा हिरण्यकश्यपु ने अपने प्रिय पुत्र प्रह्लाद को अपने पास बुलाया। मुख चूमा। प्यार किया और अपनी गोदी में बिठाया तथा पूछा-बेटा! बतलाओ कि अब तुम्हें पाठशाला में रहते हुए बहुत दिन व्यतीत हो गये। तुमने कितनी विद्या पढ़ी तथा क्या पढ़ा? मुझे भी सुनाओ। मैं सुनना चाहता हूँ। तुम मेरे प्रिय पुत्र हो। इसलिए घबराने की आवश्यकता नहीं है। निडर होकर जो कुछ भी पढ़ा है, वह मुझे शीघ्र ही सुनाओ।

अपने पिता की बात सुनकर प्रह्लाद बड़े ही प्रसन्न हुए और कहने लगे-हे मेरे पूज्य पिता श्री! मैंने हरि का नाम हृदय में लिख लिया है और जंजाल सब छोड़ दिये हैं। एक हरि का नाम ही सुखदायी है। वह भगवान् ही सभी के माता-पिता सर्वस्व हैं। उनकी सत्ता से ही सम्पूर्ण सृष्टि का संचालन होता है। उस विष्णु को छोड़कर मैं किसका नाम लूं और किसकी शरण लूँ? वही मेरे तथा आपके जीवन आधार हैं। इसलिए हे मेरे दैहिक पिताश्री! आप भी उन्हीं का स्मरण कीजिये इसमें ही सभी का भला है।

ऐसी आश्चर्यजनक एवं विरोधी बात सुनकर हिरण्यकश्यपु आग बबूला हो गया और प्रह्लाद को गोदी से नीचे झटक दिया और कठोर वचनों से ताड़ना देते हुए वह भयंकर राक्षस कहने लगा-रे रे विप्रो! इस बालक को मेरे सामने से हटा लो! मैं इसे देखना ही नहीं चाहता। यह बालक तो अभी छोटा है, ये सभी करतूत इन गुरुओं की है जिन्होंने मेरे बालक को बिगाड़ दिया। मैंने तो उन पर विश्वास किया था किन्तु उन्होंने मेरे से विश्वासघात किया है। मेरा बैरी विष्णु, उसका ध्यान-नाम लेना सिखा दिया है। मेरा बेटा ही मेरे दुश्मन का नाम लेता है। इन लोगों ने मेरे घर में ही दुश्मन पैदा कर दिया है। घर में आग लगा दी है।

हिरण्यकश्यपु ने गुरु शुक्राचार्य के पुत्रों को बुलाकर प्रह्लाद का हाथ पकड़ाया। शुक्र के पुत्रों ने पाठशाला में लेजाकर साम, दाम, दण्ड, भेद की नीति से समझाने की कोशिश की। किन्तु प्रह्लाद ने उनकी एक भी नहीं मानी।

शुक्र ने आखिर हारकर प्रह्लाद को उनके पिता को सौंप दिया और कहा-यह तुम्हारा बालक हमसे नहीं मानेगा। हमने सभी प्रकार की नीति का आचरण करके देख लिया। पहले तो यह एक ही था, किन्तु अब इसकी देखादेखी अन्य सभी बालक विष्णु का ही नाम लेते हैं। हमारी एक भी बात नहीं मानते हैं। केवल प्रह्लाद की ही बात को स्वीकार करते हैं।

हिरण्यकश्यपु ने प्रह्लाद को पास में बुलाया, प्रह्यम से गोदी में बैठाया, मीठे-मीठे वचनों द्वारा स्वयं समझाने का प्रयास करने लगा। हिरण्यकश्यपु बोला-देख बेटा! तुम्हें मालूम नहीं है। हमारा यह राक्षस कुल ही सबसे बड़ा कुल है। यह उत्तम कुल श्रेष्ठ भी है। अपने से महान कोई नहीं है। मेरा भाई हिरण्याक्ष था। उसको विष्णु ने मारा था और तू विष्णु का नाम लेता है। जो मेरा शत्रु है। हे बेटा! जो मेरा शत्रु वह तेरा भी तो शत्रु है। शत्रु का नाम नहीं लेना चाहिये। यह नीति है। आज ही तू विष्णु का नाम लेना छोड़ दे, तो मैं तुम्हारे पर बहुत ही प्रसन्न होऊँगा। मैं तुम्हे आज ही राजतिलक दे दूँगा। अब तुम बड़े, तथा सयाने हो गये हो। यदि मेरा कहना नहीं मानोगे, तो मैं तुझे स्वयं अपने हाथों से मार गिराऊँगा। या तो राजा बन जाओ या मरने के लिए तैयार हो जाओ। दोनों में से एक फैसला तुम्हें करना ही होगा।

प्रह्लाद ने बिना किसी झिझक के कहा- हे पिताजी! आप अपने ढ़ंग से जो बात कह रहे हैं, वह अपनी जगह पर नीति युक्त है। मेरे लिये ये बातें अनुकूल नहीं हैं। जिन्होंने अमृत का पान कर लिया है, वह भला बताओ विष से क्या करे? आप अब तक उस अमृत से वंचित रहे हैं। इसलिए तो ऐसी बात कर रहे हैं। यदि आपको भी एक बार अमृत के आनन्द का अनुभव हो जाता, तो आप कभी ऐसा नहीं कहते। तब आप मेरा ही समर्थन करते। किन्तु मैं क्या करूँ? यह आपका दुर्भाग्य है!

राज-पाट तो नाशवान है। आज है, कल नहीं रहेगा। वह अटल राज तो भगवान् का सान्निध्य है, उसकी बराबरी यह तुम्हारा राज्य कभी नहीं कर सकता। मरने और मारने की बात तो जहाँ तक है, उसका कुछ पता नहीं है। कौन किसको मारता है और कौन मरता है? जिसने जन्म लिया है, उसकी मृत्यु ध्रुव है। जब मृत्यु आयेगी तो आयेगी ही, और नहीं आयेगी तो कौन लायेगा?

हे पिताजी! आप अपना अहँकार विसर्जन कीजिए और विष्णु को स्वीकार कीजिये तथा जीवन में खुश रहिये। क्यों किसी से विरोध बढ़ा रहे हैं। वह भी किसी सामान्य व्यक्ति से नहीं, सम्पूर्ण चराचर स्वामी भगवान् विष्णु से! हे पिताजी! आपकी और विष्णु की क्या बराबरी है? वे तो तीनों लोकों के राजा हैं। आप तो इस छोटे से राज्य का भी शासन नहीं कर पा रहे हैं। व्यर्थ का बैर विरोध बढ़ा रहे हैं। इसे यही पर ही शांत कीजिये और विष्णु से मित्रता स्थापित कीजिये।

मैंने स्वीकार किया है कि आपके भाई को विष्णु ने मारा था। किन्तु आप यह क्यों नहीं मानते कि आपके भाई ने दुनिया को दुःख देने का बीड़ा उठाया था। तो वह अपने कुकर्मों से ही मारा गया है। आप उसकी चिन्ता न करें। यदि इस प्रकार से आपका विरोध चलता रहा, तो वह दिन दूर नहीं, जो आपको भी आपके भाई के पास जाना पड़े। यह दो दिन का छोटा सा जीवन यूँ ही व्यर्थ में गंवाने के लिए नहीं है। आप तो पिताजी राज के मद में मस्त हो गये हैं। अब आपको तो कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान ही नहीं है। आप से मैं केवल निवेदन मात्र ही कर रहा हूँ। आप इस बात को अन्यथा न समझें।

एक पिता होने के नाते आप हमें सन्मार्ग का पथिक बनायें। अन्याय से दूर हटायें। किन्तु मुझे आपको उचित बात कहनी पड़ रही है। मेरे तो रोम-रोम में सर्वत्र रमण करने वाले राम प्रवेश कर गये हैं। इसमें उचित या अनुचित का मुझे तनिक भी ज्ञान नहीं हो रहा है। हो सकता है आपकी अपनी निजी बुद्धि के अनुसार मैं कुछ अनुचित भी कर रहा हूँ। किन्तु अब मेरे वश की बात भी नहीं है। आप स्वयं ही इस स्थिति को देख रहे हैं। मेरा ऐसा कोई विचार नहीं है कि मैं अपने पूज्य पिता से विरोध करूँ। लेकिन जो होनहार है, वही होगा।

आप अपने को समर्थ मान करके मेरे को तुच्छ बालक मानकर अपराध क्षमा करें। पिता तो बालक की न्याय सत्यता देखकर क्रुद्ध नहीं होते अपितु प्रसन्न ही होते हैं। किन्तु आप में ऐसी प्रवृत्ति देखने को नहीं मिल रही है।

प्रह्लाद के न्याययुक्त वचनों को हिरण्यकश्यपु ने सुना और झुंझलाकर कहने लगा-रे अनुचरो! इस दुष्ट बालक को मेरी आँखों के सामने से हटा लो। मैं एक क्षण भी इसे जीवित नहीं देखना चाहता। जिस उपाय से यह मारा जावे, ऐसा प्रयत्न करो। भृत्यगणों ने अपने राजा के वचनों को ही प्रमाण मानकर प्रह्लाद को अनेकों प्रकार से कष्ट देना आरम्भ किया, जिससे दुःखी होकर हरि का स्मरण त्याग दे अथवा मृत्यु को ही प्राप्त हो जाये।

प्रह्लाद को विषधर नागों द्वारा डसाया गया, ताकि जहर चढ़ जाये, भयभीत हो जाये। मर जाये, हमारे स्वामी का कार्य हो जाये। हमारे स्वामी हमें बहुत सा पुरस्कार प्रदान करेंगे। किन्तु जहर भी भगवान् की कृपा से अमृत हो गया। जिसके रोम-रोम में भगवान् रमे हो उसके विष भी क्या कर सकता है? पीने के लिए भी विष दिया गया किन्तु भगवान् का प्रसाद मानकर पी गये। कुछ भी नहीं बिगड़ा। दैत्य समूह प्रह्लाद की अमरता को देखकर घबरा गये।

प्रह्लाद को एक कुएँ में डाला गया। उस सूखे कुएँ में अनेकों विषैले साँप आदि थे, उनके काटने से मर जायेगा। कहीं बाहर न निकल जावे, इसके लिए ऊपर मिट्टी पत्थर डाल दिये गये, नीचे दबकर मर जाये, किन्तु वहाँ पर भी परमेश्वर ने रक्षा की। प्रह्लाद सकुशल बाहर निकल आये। यह प्रह्लाद कुएँ के अन्दर तो नहीं मर सकता, शायद कुछ देवता या मंत्र इसके सहायक सिद्ध हो रहे हैं।

अब इसे पहाड़ के ऊपर से गिरवायेंगे। तब देखते हैं, इसे कौनसा देवता तंत्र या मंत्र बचाते हैं? हमारे स्वामी का जिस प्रकार से भी प्रिय हो, हमें तो वही कार्य करना है। एक बहुत ऊँचे पहाड़ की चोटी पर ले जाकर हाथ-पाँव बाँधकर प्रह्लाद को नीचे गिरा दिया। गिरता हुआ, नीचे आता हुआ सभी ने देखा। सभी दैत्यों ने बड़ी खुशी मनाई थी। अब हम अपने कार्य में सफल हो गये हैं। इस पहाड़ की इतनी ऊँचाई से अब इसे कोई नहीं बचा पायेगा। प्रह्लाद झूले में झूलते हुए क्रमशः नीचे आ रहा है। नीचे की धरती जहाँ पर गिरना था, वह दूध के फेन-झाग की तरह कोमल हो गयी। प्रह्लाद उन्हीं कोमल फेनों में जिस प्रकार भगवान् विष्णु शेषनाग की शय्या पर सोते हैं, उसी प्रकार सोते हुए आनन्दित हो रहे थे। ऐसा आश्चर्य देखकर सभी अचम्भित हो गये।

इस बार दैत्यों के विचार में बात कुछ इस प्रकार से आयी कि-अग्नि सभी को जलाकर भस्म कर देती है क्यों न प्रह्लाद को अग्नि में जलाया जावे? यह मत सभी को पसन्द आया, इसके लिए उन्होंने एक लोहे का खम्भा अग्नि से तपा कर लाल कर दिया और प्रह्लाद को उस खम्भे से बाँध दिया।

प्रह्लाद लाल-लाल, तपता हुआ लोहे का खम्भा देखकर कुछ घबराये, किन्तु तुरंत देखते हैं कि उस तपे हुए खम्भे पर छोटी-छोटी चींटियाँ घूम रही हैं। उन्हें देखकर प्रह्लाद को दृढ़ निश्चय हो गया कि ये छोटी-छोटी चींटियां भी नहीं जल रही हैं, तो तेरा क्या बिगड़ेगा? उस तपते हुए लोहे के खम्भे को भी ईश्वर मानकर दोनों बाहुओं द्वारा आलिंगन किया और कहा-आइये मेरे प्रभु! इस बार आप इस रूप में भी आ गये। मुझे गले लगाने के लिए। धन्य हो मेरे प्रभु!

दैत्य अब तो पूरी तरह हार मान गये और हिरण्यकश्यपु से कहने लगे-यह तुम्हारा बेटा न तो हमसे मारा जायेगा और न ही किसी प्रकार से डरता ही है। हमने तो सभी यत्न करके देख लिया है। अब आप जैसा ठीक समझें, वैसा ही करें।

हे दैत्यराज! हमारा कहना मानो तो इस बालक से समझौता कर लो। यह बालक सामान्य नहीं है। यह तो कोई देवता ही है। जो न तो अग्नि, वायु, जल, पहाड़ से डरता है और न ही मरता है। हम तो पूरी तरह हार गये हैं।

वील्हा ने अपने सतगुरु नाथाजी से पूछा-हे गुरुदेव! आप कृपा करके आगे पुनः बतलाईये कि जब दैत्यों ने अपने सम्पूर्ण हथियार प्रह्लाद के सामने डाल दिये, तब हिरण्यकश्यपु ने क्या किया? क्या अपने अनुचरों के कहे अनुसार समझौता कर लिया था या अन्य कुछ उपाय अवशिष्ट थे, जिससे प्रह्लाद को मारा जा सके तथा यह बताने की कृपा करें कि सम्पूर्ण दैत्य समाज तो प्रह्लाद का पूरी तरह विरोधी था। एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखता था, जो प्रह्लाद का सहयोग करे। प्रह्लाद पंथ का पथिक बन सके। क्या हिरण्यकश्यपु के भय से भयभीत थे। यदि ऐसा ही था तो यह प्रह्लाद पंथ किस प्रकार से प्रकाशन में आया। ये बातें आप मुझे विस्तार पूर्वक बतलाईये! जिससे मेरी जिज्ञासा शाँत हो सके और मेरी श्रद्धा विष्णु परमात्मा के प्रति हो सके तथा मैं भगवान् का भक्त हो सकूँ।

वील्हा की भक्तिपूर्वक जिज्ञासा श्रवण करके नाथोजी अपने शिष्य के प्रति प्रेमपूर्वक इस प्रकार से कहने लगे-जब दैत्यों ने हिरण्यकश्यपु को यह कह दिया कि हम सभी आपके बालक को मारने में असमर्थ हैं, तब हिरण्कश्यपू चिन्ता में पड़ गया कि यह बालक अवश्य ही कोई देवता है। जो मेरे यहाँ बेटा बनकर आया है। यह मारा नहीं जायेगा, तो हो सकता है मेरे को मारकर मेरा राज छीन ले। अब क्या किया जाये? मारने के जितने उपाय थे, वे सभी कर लिये। अब तो डर के मारे रात्रि में नींद ही नहीं आ रही है। एक-एक पलक कल्प के समान व्यतीत हो रहा है। चिंता में हिरण्यकश्यपु थकने लगा था। ऐसा ही होता है। भगवान् के विमुखी, अहंकारी प्राणी को। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

हिरण्यकश्यपु चिंता में थक रहा है। एक दिन हिरण्यकश्पू की बहिन होलिका आ गयी और अपने लाडले भाई से पूछा-भाई! तुम दिनों-दिन थकते जा रहे हो, क्या बात है? तुम्हें इस असुर कुल में जन्म लेने से चिंता नहीं करनी चाहिये। हे भाई! मुझे बतलाओ मैं आपकी क्या सेवा करूँ? यदि मुझे सेवा का अवसर मिलेगा, तो मैं अपने आप को धन्यभागी समझूँगी। विपत्तिकाल में भाई-बहन एक दूसरे के सहयोगी होते हैं। तुम मुझे अपनी विपत्ति की बात निःसंकोच होकर कहो।

हिरण्यकश्यपु बोला-क्या कहूँ बहिन! मेरा बेटा प्रह्लाद, तुम्हारा प्रिय भतीजा ही मेरा शत्रु हो गया है। बाह्य शत्रु का तो मैं सामना कर सकता हूँ। उसे जड़-मूल से उखाड़ सकता हूँ। किन्तु मेरा ही पुत्र जब मेरा शत्रु बन जाये तो क्या किया जाऐ? मैं तो अपने ही दैत्यकुल को बढ़ाना चाहता हूँ। मैं अपने पुत्र को कैसे मार सकता हूँ? यही मेरे से होना कठिन है। हे बहिन! अन्य लोगों द्वारा तो मैंने उसे मारने, डराने, धमकाने के कई उपाय कर लिये हैं। किन्तु यह बालक न तो विष्णु की भष्ठित ही छोड़ता है और न ही राज-पाट,परिवार का लोभ इसे मेरी तरफ आकर्षित करता है। मेरा शत्रु विष्णु और यह विष्णु की भक्ति करता है। तुम्हीं बतलाओ-यह मेरे से सहन कैसे हो? जब तक यह प्रह्लाद मरेगा नहीं, तब तक मैं सुख-चैन से नहीं बैठ सकता।

होलिका बहन ने अपने भैया की कथा-व्यथा सुनी और कहने लगी-भाई साहब! आप चिंता न करें। तुम्हें इस बात का पता नहीं है कि “ काज पराया सीवला, जहाँ दुखे तहाँ पीड़” पराया कार्य ठण्डा ही होता है। दूसरा क्या जाने परायी पीड़ा को? जिसके पीड़ा होती है, दुःख भी उसी को ही होता है। मैं तुम्हारी बहिन हूँ, इसलिए तुम्हारी पीड़ा का निकटता से अनुभव करती हूँ।

सुनो! मैं तुझे भक्त प्रह्लाद के मरण का उपाय बतलाती हूँ। मैं महादेवजी के चरणों की पूजा-ध्यान करती हूँ। महादेवजी द्वारा मुझे वरदान प्राप्त है। मुझे एक शीतल वस्त्र (ओढ़ना) महादेवजी ने प्रदान किया है। जिसको ओढ़कर मैं अग्नि में बैठ जाऊँगी। मैं तो जलूँगी नहीं, किन्तु प्रह्लाद को गोदी में लेकर जला दूँगी। तुम लोग मेरे चारों तरफ लकड़ियां चिन देना और पूरा यत्न कर देना कि जब प्रह्लाद को आग की ताप लगे कहीं निकलकर भाग न जाये। पहरेदार खड़े कर देना, यह कार्य तुम शीघ्र करो।

मैं आज शाम को ही प्रह्लाद को लाड़-प्यार करते हुए शीतल ओढ़ना ओढ़कर प्रह्लाद को गोदी में लेकर बैठ जाऊँगी। आप लोग चारों तरफ लकड़ियाँ चिनकर के आग लगा देना। प्रह्लाद कहीं निकलकर भाग न जाये इसके लिए पूरा यत्न कर देना। निश्चित ही प्रह्लाद मारा जायेगा और मैं बचकर निकल आऊँगी। सदा-सदा के लिए तुम्हारा काँटा निकल जायेगा। तब तुम निश्चित होकर राज करोगे।

हिरण्यकश्यपु ने तुरंत सभी उपाय कर दिये। होली तैयार करदी और अपने अनुचरों को सावधान कर दिया। वह बोला खबरदार! यदि किसी प्रकार की लापरवाही की तो दण्ड दिया जायेगा। होलिका अपने भतीजे प्रह्लाद को गोदी में लेकर बैठ गयी। चारों तरफ से आग लगा दी गयी। लकड़ियाँ एवं होलिका धूधू कर जलने लगी। पहरेदरों ने सोचा कि प्रह्लाद जल रहा है। किन्तु वहाँ पर तो होलिका जल रही थी। होली जलाकर सभी दैत्य अपने-अपने घर लौट आये। हिरण्यकश्यपु को सूचना दे दी कि प्रह्लाद अग्नि में जल गया है।

होली के शाम को दैत्यों ने खुशी मनाई। आज प्रह्लाद का मरण हो गया है। उस अपार खुशी में यह किसी को भी पता नहीं चला कि होलिका कहाँ गयी। खुशी में कौन किस की परवाह करता है?

प्रह्लाद की माता कयाधु को यह पता चला कि आज मेरी ननद ही मेरे बेटे को मारने के लिए अग्नि में लेकर बैठ गयी है। दुःख की कोई सीमा ही नहीं रही। रोने लगी, विलाप करते हुए कहा-हे बेटा प्रह्लाद! अब तुम कहाँ हो? एक बार आओ, दर्शन दे जाओ। आज मेरा बेटा अपनी बुआ तथा पिता की वजह से अग्नि की भेंट चढ़ गया है। मुझे क्या मालूम था कि एक दिन ऐसा होगा। मैं पुत्रविहीन नारी कैसे अपना कलंकित जीवन जी सकूँगी। मैं अपनी ननदरानी को हाथ जोड़ती, पाँव पकड़ती, प्रार्थना करती तो क्या पता अपने पुत्र को बचा लेती। मेरे पति तो नर हैं तथा दैत्य भी हैं। वो क्या जाने माँ के हृदय की बात?

किन्तु हे ननद! तू तो एक माँ का हृदय लेकर आयी है। तुम्हारे से यह कैसे सम्भव हुआ? असंभव है कि एक नारी यह कार्य कर सके। पता नहीं मैंने कौन पाप कर्म किए थे, जिस वजह से मैं अपने ही सामने पुत्र की मृत्यु देख रही हूँ। यदि मेरे में ही सहृदयता होती तो मैं यह कार्य कदापि नहीं होने देती। स्वयं अपने प्राण त्याग देती किन्तु अपने बेटे को बचा लेती। किन्तु क्या कहूँ किससे कहूँ? अभी तो सब कुछ बीत चुका है। भगवान् ही इस समय तो मेरे बेटे के रक्षक हैं।

इससे पूर्व भी अनेकों बार भगवान् ने बचाया था। ये लोग तो अब तक कभी मार सकते थे। हे भगवान्! आप ही रक्षा कीजिये। मैं प्रातःकाल की वेला में प्रह्लाद के दर्शन नित्यप्रति की भांति करना चाहती हूँ। इस प्रकार से माता कयाधु एवं प्रह्लाद के अनुयायी लोगों ने भगवान का भजन करते हुए रात्रि व्यतीत की।

यह रात्रि, शोक रात्रि प्रह्लाद पंथियों के लिए कही जाती है। किन्तु हिरण्यकश्यपु पंथियों के लिए खुशी की रात्रि मानी जाती है। प्रातःकाल हुआ। दैत्य लोग सूर्योदय होने के पश्चात उठे और कहने लगे- देखो भाई! रात्रि के उत्सव में किसी को कुछ नुकसान तो नहीं हो गया है। अब तो सचेत हैं, किन्तु रात्रि में तो अचेत ही थे। सभी ने अपनी-अपनी उपस्थिति दी, सभी कुशल थे।

हिरण्यकश्यपु ने पूछा-क्या बात हैं? अब तक होलिका नहीं आयी। तुम तो सभी लोग आ गये हो। खुशी मना रहे हो। बिना बहिन के खुशी कैसी? दैत्यों ने देखा कि होलिका तो नहीं आयी किन्तु प्रह्लाद खेलता हुआ आता दिखाई दिया। दैत्यों के तो प्रह्लाद को देखते ही मानो सौ घड़ा ठण्डा पानी सिर पर गिर गया हो।

दैत्यों ने हिरण्कश्यपु को कहा-हे राजन्! जिसकी तुम आने की प्रतीक्षा कर रहे हो, वह होलिका लौटकर कभी नहीं आयेगी। जल बल कर राख हो गई है। वहाँ पर दो मुट्ठद्ध राख पड़ी हुई है। कहो तो लाकर दे दें। तथा जिसके आने की प्रतीक्षा तुम कभी नहीं करते, वह तुम्हारा शत्रु प्रह्लाद आ रहा है। हे राजन्। जैसा नियति का विधान है, वैसा ही होगा। ये सभी कार्य उलट पुलट हो गये।

हिरण्यकश्यपु ने कहा-रे दुष्टो! तुमने ठीक से पहरा नहीं दिया। प्रह्लाद निकल कर भाग आया। यह कैसे हुआ? दैत्यों ने कहा-हे राजन्! यहाँ विधि का विधान कुछ और ही है। किसी का कुछ जोर चलता ही नहीं है। जब पहरेदार खड़े थे, तब अग्नि लग चुकी थी। उसी समय जोरों की पवन चली थी, उस पवन ने सारा कार्य गड़बड़ कर दिया था। जो शीतल वस्त्र होलिका ने ओढ़ रखा था, वही वस्त्र पवन देवता ने प्रह्लाद को ओढ़ा दिया। जिसके प्रभाव से प्रह्लाद तो बच गया और बेचारी होलिका जलकर राख हो गयी। भगवान् का विरोध करने वालों की यही गति होती है।

हे राजन्! इसमें हमारा कोई दोष नहीं है। सभी कुछ तुम्हारा ही दोष है। जो राक्षस प्रभु की सत्ता को नहीं जानता था, वह तो दूसरों को ही दोषी ठहराता था। उन लोगों ने एक दूसरों पर कीचड़ उछाला। दोषारोपण किया। अपने तथा दूसरों को धिक्कार ही दिया। इस प्रकार से होली खेली गयी। भक्त प्रह्लाद के अनुयायी लोग तथा माता कयाधु ने खुशियाँ मनाई। बधाईयाँ बाँटी गई। इस प्रकार शांत सौम्यता से होली का त्योहार मनाया गया था।

प्रह्लाद के अनुयायी लोग आज भी उसी रूप में खुशी मनाते हैं। उसी होलिका के जलन और प्रह्लाद के ताकतवर होने के दिन से ही यह प्रह्लाद पंथ चला था। प्रह्लाद ने सतयुग में सर्वप्रथम कलश की स्थापना की थी। उस दिन असत्य-अन्याय की पराजय और सत्य की विजय थी। देरी से भले ही हो, किन्तु आखिर जीत तो सत्य की ही होती है। प्रह्लाद ने अपने सेवक अनुयायियों को एकत्रित किया और उन्हें कलश का अभिमंत्रित जल पाहल हाथ में देकर संकल्प करवाया।

प्रह्लाद ने कहा- सुनो बन्धु जनो! यह आपके हाथ में जल देवता है तथा आपके सामने यज्ञदेवता अग्नि है, चारों ओर सर्वत्र व्यापक पवनरूप परमेश्वर है, इन्ही प्रमुख देवताओं के सामने आप लोग संकल्प करो, अपने निजी जीवन का मार्ग स्वयं ही चुनो। तुम्हें हिरण्यकश्यपु का साथ देना है या मेरा साथ निभाना है। पिताजी के तरफ तो राज्य, सुख-सुविधा का लोभ है, किन्तु मेरी तरफ से कष्ट तथा तपस्या का दुःखमय जीवन है।

याद रखो! प्रारम्भ के कष्टदायी कार्य अन्त में सुमधुर फलदायी होते हैं। प्रारम्भ में सुखदायी कार्य परिणाम में विष की तरह होता है। आप लोग जल देवता को हाथ में लेकर संकल्पवान हो जाओ। उसी से ही देवता द्वारा तुम्हारी रक्षा होगी। आप लोग मेरे को देख ही रहे हैं। मैंने सत्य संकल्प कर लिया। अब चाहे कितना ही कष्ट आये। वे कष्ट मुझे दुःख नहीं दे सकते। जो लोग थोड़ी सी विपत्ति से ही डांवाडोल हो जाते हैं, वे कभी कुछ कार्य नहीं कर पायेंगे। जब आप सस्नेह मेरे पास आये हैं, तो मुझे लगता है कि आप मेंभी भक्ति का बीज विद्यमान है। किन्तु हिरण्यकश्यपु के भय के मारे अंकुरित नहीं हो पा रहा है। ये मेरे पिताजी तो भयंकर अकाल हैं, जो किसी को पनपनें ही नहीं देंगे।

हे बन्धु गणो! तुम्हें फलने-फूलने का पूर्ण अधिकार है। आज से सभी निर्भय हो जाओ तथा उस परमात्मा-विष्णु को याद करो। उसी को ही माता-पिता, भाई-बन्धु तथा राजा सभी कुछ स्वीकार करो। वही तुम्हारी रक्षा करेगा।

अग्नि से भी प्रह्लाद बच गया जिसको स्वयं होलिका भी नहीं जला सकी। हिरण्कश्यपु एवं उनके अनुचर भी उस प्रह्लाद का कुछ भी नहीं बिगाड़ सके। अवश्य ही कोई अलौकिक शक्ति कार्य कर रही है। हम भी उस परमशक्ति का आश्रय ग्रहण करें। वही हमारा अन्तिम लक्ष्य है। ऐसा विचार करते हुए अधिकतर जनता ने मन ही मन प्रह्लाद का अनुसरण किया। कुछ लोग तो अभी दबी जुबान से प्रह्लाद का समर्थन करते थे, क्योंकि अब तक हिरण्यकश्यपु का भय विद्यमान था तथा कुछ लोग खुलकर प्रह्लाद का समर्थन करते और हिरण्यकश्यपु के विरोध में खड़े हो गये। अब तक प्रभु की अनन्य भक्ति में सभी तो प्रवीण नहीं थे। अधिकारी भेद से ही भक्ति का मार्ग चुना था।

ऐसा कहा जाता है कि उस समय कुल जनसंख्या 33 करोड़ थी। उनमें पांच करोड़ ही प्रह्लाद के अनुयायी पूर्ण भक्त थे। बाकी तो डाँवा-डोल की स्थिति में थे। उनमें अब तक दृढ़ता नहीं आयी थी। ऐसी अवस्था में उत्तरोत्तर प्रह्लाद पंथ का विस्तार ही हो रहा था। हिरण्यकश्यपु की तरफ जनता मुँह मोड़ रही थी, क्योकि हिरण्यकश्यपु के पास केवल अहंकार के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था। प्रह्लाद के पास निर्मलता, सज्जनता, समर्पणता एवं ईश्वरीय दिव्यता थी। लोगों का समर्पित होना स्वाभाविक था।

हिरण्कश्यपु ने एक दिन प्रह्लाद को अपने पास बुलाया। प्रेम से बैठाया और कहने लगा- हे पुत्र! तू मेरे से विवाद मत कर। आज तक तुमने मेरी एक भी बात नहीं मानी। किन्तु आज तुम मेरे कहने से भक्ति छोड़ दे। मैं तुम्हें आज ही राजतिलक देकर राजा बना दूँगा। नहीं तो, मैं आज ही तुम्हें स्वयं मार डालूँगा। अब तक तो मैं पुत्र मोह के वशीभूत होकर स्वयं मारने को तैयार ही नहीं हुआ। तुमने राजद्रोह किया है। इसलिए मैं क्षमा नहीं करूँगा। मेरी प्रजा को भी तुमने बहला-फुसलाकर अपनी ही तरह विष्णु की भक्ति सिखला दी है। पहले तो तू अकेला था। किन्तु इस समय तुम्हारे चेलों की संख्या बढ़ गई है। मैंने यह सभी अपनी आँखों से देखा एवं कानों से सुना भी है। अब तेरा अपराध क्षमा करने योग्य कदापि नहीं है।

पिता की ऐसी अधार्मिक, क्रूर बातें प्रह्लाद ने सुनीं और कहने लगा-पिताजी! आप ऐसी बातें न करें। न तो मुझे राज-पाट तिलक चाहिये और न ही मुझे आपके कठोर वचनों से ही डर है। जो एक बार भक्ति अमृतरस का पान करले वह तुम्हारे राजपाट रूपी विष का क्या करे? इस मृत्यु को जानबूझकर गले क्यों लगाये?

मेरा कहना मानो तो एक बार आप भी विष्णु का स्मरण एवं समर्पित होके देख लीजिये। आपको भी आनन्द की कितनी अनुभूति होती है? फिर आप कभी ऐसी वार्ता नहीं करेंगे। भगवान् विष्णु बड़े ही दयालु हैं। आप पर भी अवश्य ही कृपा करेंगे। वे भगवान् तो भक्तवत्सल, दीन दयालु, अतिकृपालु हैं। अति दुराचारी, पापी से पापी को भी भगवान् ने अपना बना लिया। उन्हें सर्वोच्च पद प्रदान किया। आप निःसंकोच होकर शरण में आइये और जीवन को अमृतमय बनाइये।

बेटे प्रह्लाद ने पिता हिरण्यकश्यपु को सुन्दर व हितकर वचन कहे। किन्तु असुर बुद्धि पिता को ये वचन जहर की तरह लगे। उन्हें ग्रहण नहीं किया। प्रह्लाद को पकड़कर विश्वकर्मा द्वारा रचित जेल में डाल दिया। उनके जितने भी अनुयायी थे, उन्हें भी साथ में ही डाल दिया। प्रह्लाद के मुख्य अनुयायियों को ही जेल में डाला गया। अन्य साधारण लोगों को छोड़ दिया।

ऐसी विचित्र जेल विश्वकर्मा द्वारा विरचित थी। जहाँ पर अन्न-जल का नाम ही नहीं था। केवल सूर्य, वायु एवं आकाश ही था। इनसे ही जीने के लिए मजबूर कर दिया था। अन्न, जल, के बिना केवल श्वास के द्वारा जीना कितने दिन हो सकता है? आखिर तो एक दिन प्रह्लाद को अपने साथियों सहित मरना ही था।

अन्य प्रह्लाद के बंदी साथी तो ऐसी दशा देखकर घबरा गये। प्रह्लाद ने कहा-भाइयो! आप निश्चित रहो! जिसने हमको संसार में भेजा है, वही हमारा पालन-पोषण भी करेगा। आप लोग तो केवल विष्णु का ही ध्यान करो। बाकी कार्य वही करेगा। वह किस रूप में करता है, वह तुम देखते रहो। तुम्हें घबराने की आवश्यकता नहीं है। यदि वह हमें नहीं बचाना चाहेगा, तो हम कैसे बचेंगे और यदि वह बचाना चाहेगा, तो भला यह बतलाओ कि हमें मारने वाला कौन है?

सभी बंदी परमात्मा-विष्णु का ही ध्यान करने लगे। अन्य सभी आशाएँ छोड़ दीं। अब उन्हें मृत्यु का भय नहीं रहा। फिर हिरण्कश्यपु का भय कैसे हो सकता था? ओंकार की ध्वनि से आकाश गुंजायमान हो रहा था। उसी समय ही भगवान् विष्णु ने देवताओं को आदेश दिया कि मृत्युलोक में जाओ। वहाँ पर भक्त प्रह्लाद व उनके चेलों की रक्षा करो। इन्द्र देवता मेघ बनकर वर्षा करने लगे। वायु देवता शीतल सुगन्ध बनकर वायु का प्रसार करने लगे। सूर्य देवता- सर्दी-गर्मी की समानता प्रदान करने लगे। धरती माता उपजाऊ होकर धन-धान्य तथा फलों से परिपूर्ण हो गयी। अनेकों मेवा-मिष्ठान उपजने लगे।

परमात्मा चाहे तो क्या नहीं हो सकता। जो हम चाहेंगे, वही तो हमें मिलेगा। भगवान् की कृपा से जेल में भी मंगलाचार होने लगा। जेल में पड़े हुए एक वर्ष व्यतीत हो गया था। एक वर्ष पश्चात् हिरण्यकश्यपु ने अपने अनुचरों को पास में बुलाया और कहने लगा-हे अनुचरो! आप लोग जाकर देखिये, मेरा कुपुत्र अपने संगी-साथियों के साथ अब तक मर गया होगा। मैंने बाहर से सम्पूर्ण सामग्री बन्द कर दी थी। भूख से तड़प- तड़प करके मर गये होंगे।

अनुचरों ने जाकर दरवाजा खोलकर के देखा तो अन्दर भक्त लोग देवताओं की तरह बैठे हुए हैं। वे तो इतने तेजस्वी हो गये हैं कि सूर्य की भाँति दिखाई देते हैं। उन्हें आखों से देखा भी नहीं जाता। आँखें चकाचौंध हो गयी। अन्दर अन्न, जल,मेवा-मिष्ठान्न के भण्डार भरे हुए देखा। अनुचरों ने पुनः दरवाजा बन्द कर दिया और दौड़कर हिरण्यकश्यपु के पास गये और उन्हें सम्पूर्ण स्थिति से अवगत करवाया।

हिरण्यकश्यपु की स्थि्ति कुछ ठीक नहीं हुई। वह कुछ कहने लगा-यह कैसे हो सकता है?, उन्हें जीने की सामग्री किसने पहुँचाई? सच बताओ अन्यथा प्रह्लाद के पास ही पहुँचा दूँगा। अनुचर कहने लगे- महाराज क्षमा करें! यह तो सभी आपकी ही करामात है। यहाँ पर अन्य किसी का भी दोष नहीं है। आपको मालूम है कि बैर-भाव किससे कर रहे हैं? कहीं से भी पहुँच सकता है। वह तो सभी जीवों का पालण- पोषण करता है। उस विष्णु के लिए असंभव ही क्या है? आपने ही सम्पूर्ण परिस्थितियाँ पैदा की हैं। स्वयं आपने ही यह कुआँ खोदा है। इसमें जल तो नहीं मिलेगा, किन्तु पड़ोगे अवश्य ही। इस प्रकार से आप प्राणों को खो बैठोगे। आपको बचाने वाला इस समय कोई नहीं है। इस समय आपके सहायक न तो विष्णु हैं, न ही आपके कुटुम्बी या मित्र। आपके अतिरिक्त यहाँ सभी विष्णु के उपासक हैं। अब तो समय है। समय रहते हुए जो कुछ भी करना है वह कर लीजिये। अन्यथा पछताना पड़ेगा।

अनुचरों की न्याय-भक्ति युक्त वार्ता सुनकर हिरण्यकश्यपु और भी क्रोधित हो गया। वह साँप की तरह फन किए हुए ही बैठा था और उन अनुचरों ने फन पर पाँव रख दिया। वह फु फकार मारते हुए जहर उगलने लग। मानो वह स्वयं अग्नि की तरह सभी को जला देना वाला तो पूर्व ही था और उन अनुचरों ने जलती हुई अग्नि में घी डाल दिया। वह असुर भभक उठा और अपने ही अनुचरों पर क्रोध उतारतह्य हुए छाती पीटते हुए कठोर वचन कहने लगा।

आज ही मैं प्रह्लाद व उसके शिष्यों को मार डालूँगा। आज इस खड्ग से इन्हें कौन बचायेगा? स्वयं विष्णु आ जाये तो मैं उसको मारकर फिर प्रह्लाद को मारूँगा। तभी मेरी छाती ठण्डी होगी। मैं अपने भाई- बहिन की मौत का बदला ले सकूँगा। ऐसा कहता हुआ वह दैत्य हाथ में खड्ग लेकर प्रह्लाद को मारने के लिए दौड़ पड़ा। जैसे कहीं आग लगी हो, उसे बुझाने के लिए लोग दौड़ते हैं। वही कार्य हिरण्यकश्यपु ने किया। एक छोटी खिड़की को खोल दीजिये। मैं एक-एक को अपने ही हाथों से मौत के घाट उतारूँगा। दैत्य की आँखें क्रोध के मारे लाल लाल हो रही थी। सम्पूर्ण शरीर तन गया था। आपा खो बैठा था। मैं क्या करने जा रहा हूँ, इस बात की उसे सुध नहीं थी।

प्रह्लाद ने अपने साथियों से कहा-तुम अब रुको, आगे मत बढ़ो। मुझे आगे जाने दो, क्योंकि मेरे आगे बढ़ने से ही तुम्हारा भला होगा। अन्य संत-भक्त कहने लगे-पहले हम, पहले हम दैत्य की तलवार से कटेंगे और स्वर्ग प्रयाण करेंगे। प्रह्लाद ने कहा हे बन्धुओ! अभी तुम्हारे मरने का समय नहीं आया है। जैसा मैं कहता हूँ, तुम वैसा ही करो।

प्रह्लाद स्वयं सभी से आगे बढ़े। हिरण्यकश्यपु ने देखा कि सर्वप्रथम मरने के लिए मेरा ही पुत्र आ रहा है। तनिक सोचा। पुत्र मोह जागा तो मार नहीं सका। प्रह्लाद से कहा-तू अभी पीछे हटजा, पहले तेरे शिष्यों को आने दे। पहले उन्हें मौत के घाट उतारूँगा, पीछे तुम्हें मारूँगा। आज किसी को भी जिन्दा नहीं छोड़ूँगा।

प्रह्लाद ने कहा, पिताजी! आप इन बिचारे निरपराध जनों को क्यों मार रहे हैं? इन सभी का मूल तो मैं हूँ। मुझ मूल को ही प्रथम उखाड़िये। ये डाली-पत्ते तो स्वयं ही उखड़ जायेंगे। सूख जायेंगे। यदि इन डाली- पत्तों को ही काटते रहोगे, तो भी मूल जीवित रहेगा। वह पुनः डाली पत्ते युक्त हो जाएगा। उसे अपने बेटे की बात समझ में आ गयी और हिरण्यकश्यपु ने प्रह्लाद को खम्भे से बाँध दिया कि कहीं भाग न जाये।

भगवान् विष्णु सर्व व्यापक हैं। सभी का खेल देख रहे हैं। अपने भक्तों का तथा अपने शत्रुओं का भी। भगवान् ने अपनी व्यापकता प्रकट करने के लिए जिस खम्भे से प्रह्लाद को बाँधा था, उसी खम्भे में नृसिंह रूप में आकर प्रवेश हो गये। भगवान् स्वयं की लीला ही देख रहे हैं तथा स्वयं ही खेल रहे हैं। माया मोह से ग्रसित मानव-दानव बेचारे क्या जाने? प्रह्लाद को मारने के लिए हिरण्यकश्यपु ने खड़ग उठाया और पूछा- अब बताओ तुम्हारे विष्णु कहाँ हैं? पहले मैं तुम्हारे विष्णु को मारूँगा, फिर तुम्हें तथा तुम्हारे अनुयायियों को। अब बताओ-इस भयंकर खड़ग से तुम्हारी रक्षा कौन करेगा? प्रह्लाद ने कहा सुनो-

मोह में तोह में, खड्ग में, रहे खम्भ के मांही।

हरि विना खाली है नहीं, तव कर कोप डराहि।।

प्रह्लाद तुम क्या बोलते हो? क्या वह तुम्हारा विष्णु इस खड्ग, खम्भे तथा मेरे में भी है? यदि है, तो ठीक है। मैं एक बार विष्णु को खोजने के लिए बैकुण्ठधाम गया था, वहाँ तो मिले नहीं, किन्तु अब मेरा कार्य बन गया है। तुम्हारे कथनानुसार मैं प्रथम विष्णु को मारूँगा, मेरे भाई का बदला लूँगा। फिर तुम्हें मारूँगा।

हे शिष्य वील्ह! जिनकी मृत्यु निकट आ जाती है, वह इसी प्रकार से प्रलाप करता है। क्या यह प्रलाप इस समय करना उचित था। किन्तु मानव का स्वभाव है। मृत्यु निकट आने पर वह तो कुछ-कुछ बकता ही रहेगा। हिरण्कश्यपु क्रोध के वशीभूत था। जोर से खड्ग द्वारा खम्भे पर प्रहार किया। खम्भ टूट गया, प्रह्लाद का बंधन खुल गया। उसी खम्भे में से भयंकर गर्जना करते हुए भगवान् विष्णु ही नृसिंह रूप में प्रकट हुए। आधा नर, आधा सिंह, बड़ा ही विचित्र रूप था।

हिरण्यकश्यपु ऐसा विचित्र रूप पहली बार ही देख रहा था। आश्चर्यचकित होकर घबराने लगा। थर-थर काँपने लगा। खड्ग हाथ से छूटकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। क्योंकि मृत्यु को साक्षात् देख रहा था। मारने तो दूसरों को चला था, किन्तु देख रहा है स्वयं की मृत्यु को। थोड़ी देर के लिए तो भगवान् ने क्रीड़ा की और अन्त में हिरण्यकश्यपु को थका हुआ मानकर उसे मारने से पूर्व कुछ वार्ता करने लगे।

भगवान् नृसिंह ने पूछा-हे दैत्यराज! अब बताओ कौन किसको मारेगा? तुमने तपस्या करके जो ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया था, अजर-अमर होने के लिए, क्या इस समय वे वरदान पूरे नहीं हो रहे हैं? यह देख मैं कौन हूँ? नर हूँ या नारी? पशु हूँ या मानव? कोई शस्त्रधारी देव या दानव? अब बता तेरे को मारूँ या रुक जाऊँ।

तुमने माँगा था कि दिन में न मरूँ, रात्रि में न मरूँ। अब बताओ यह दिन है या रात्रि? इस समय तो यह संध्या वेला है। न तो दिन और न ही रात्रि। तुमने कहा था, न बाहर मरूँ न अन्दर। किन्तु तुम इस समय चौखट पर हो न तो अन्दर और न ही बाहर। तुमने कहा था कि शस्त्र से न मरूँ। इस समय मेरे पास कोई शस्त्र नहीं है, केवल नाखून ही हैं।

हे दैत्यराज! तुमने कभी इस रूप की कल्पना भी नहीं की होगी। तू अजर-अमर होकर घर आ गया तथा अत्याचार करने लगा। स्वयं को ही सभी कुछ मानने लगा। अभी मैं तेरे को मारता हूँ। ऐसा कहते हुए नृसिंह ने अपने तीखे नाखूनों से दैत्यराज हिरण्यकश्यपु की छाती चीर डाली।

भगवान् ने ऐसा भयंकर रूप धारण किया, ऐसा जानकर देवता लोग भी इस नवीन रूप का दर्शन करने आये। किन्तु किसी की हिम्मत नहीं पड़ी कि भगवान् के विकराल रूप के सामने खड़ हो सकें। स्तुति कर सके। देवताओं ने लक्ष्मी से कहा- हे देवी! तुम नित्यप्रति भगवान् की सेवा करती हो। सामने जाकर स्तुति करो, जिससे भगवान् प्रसन्न हो सके। यदि इस प्रकार के रूप को शांत नहीं किया, तो सम्पूर्ण संसार को लील जायेंगे। लक्ष्मी की भी हिम्मत नहीं हुई कि सामने जा सके। न जाने क्या हो? आज भगवान् बड़ी ही विकराल अवस्था में है।

लक्ष्मी ने कहा-बेटा प्रह्लाद! अब तो तुम्हीं हमारे एक सहारे हो, तुम पर भगवान् अतिप्रसन्न है, स्तुति करो। इन्हें यथास्थिति में लाने का प्रयत्न करो। प्रह्लाद ने भगवान् का उत्तम श्लोकों द्वारा स्तुति गायन किया, तब भगवान् प्रसन्न हुए।

प्रह्लाद को अपनी गोदी में बिठाया और कहा-बेटा! तुमने बहुत कष्ट उठाये। मैं जल्दी नहीं आ सका। मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत प्रसन्न हूँ। अब तुम जो कुछ भी माँगोगे, वही मैं दूँगा। तुमने भक्ति का मार्ग प्रशस्त किया है। तुमने सत्य का मार्ग पकड़ा है। कष्टों में भी तुमने धर्म को नहीं छोड़ा। तुम सच्चे भक्त हो। जो कुछ भी हो, अवश्य माँगो। प्रह्लाद ने हाथ जोड़ते हुए विनती की-

हे दीनानाथ! आपके सिवाय मुझे और कुछ भी नहीं चाहिये। आप ही मिल गये, तो मुझे सभी कुछ मिल गया। मेरे पिताजी अज्ञानतावश आपसे विरोध करते रहे हैं। आपसे विमुख हो जाने से उनकी कहीं दुर्गति न हो जाये। मेरे पिताजी को सद्गति मिले।

भगवान ने कहा-हे प्रह्लाद! कोई जीव भगवान् से भले ही विमुख हो जाये, किन्तु उनका ईश्वर कभी उनसे विरुद्ध नहीं होता। वह तो सभी का पालन-पोषण करता है। वह कैसे विरुद्ध होगा। तुम्हारे जैसे जिनके पुत्र हो, उन्हें सद्गति का संशय नहीं होना चाहिए। तुम्हारे पिता तीन युगों में तीन बार जन्म लेंगे। एक तो पूरा हो चुका है, अभी उनके दो जन्म और बाकी हैं। तीसरे जन्म में उनकी गति सुनिश्चित है। ऐसा ही उनके भाग्य का खेल है। उनकी चिंता तुम छोड़ो, तुम अपनी बात करो।

हे भगवन्! मेरे पिता तो अवश्य ही अन्यायकारी थे, किन्तु उनकी प्रजा 33 करोड़ है। उनका तो उद्धार होना ही चाहिये। ये तो बेचारे निरपराधी हैं। इस लोक में कोई भी व्यक्ति दुःखी न हो। ऐसा वरदान मैं माँगता हूँ। नृसिंह भगवान् ने बतलाया कि इस समय सतयुग में तो तुम्हारे साथ पाँच करोड़ का ही उद्धार होगा। तुम्हारे पक्के अधिकारी शिष्य तो इस समय पाँच करोड़ ही हैं। इस समय तो तुम इनसे ही संतोष करो। त्रेतायुग में सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र होंगे, उनके साथ सात करोड़ का उद्धार हो जायेगा। द्वापर युग में धर्मात्मा युधिष्ठिर होंगे, उनके साथ नौ करोड़ का उद्धार हो जायेगा। कलयुग में ऐसा धर्मात्मा-सत्यवादी राजा होना असंभव है। उस समय मैं स्वयं ही आऊँगा और शेष 12 करोड़ का उद्धार करूँगा। इस समय तो केवल पाँच करोड़ का ही उद्धार हो सकेगा। भगवान् नृसिंह का आश्वासन सुनकर प्रह्लाद अतिप्रसन्न हुए। जय-जयकार करने लगे।

अपने पिता की मृत्यु का कुछ भी शोक नहीं किया। भगवान् नृसिंह कहने लगे-प्रह्लाद! अब तक तुमने अपने लिए भी कुछ नहीं माँगा। कुछ अपने लिए भी तो माँग लो। प्रह्लाद कहने लगा- हे देव! मैं अपने लिये क्या माँगू? मुझे आप मिल गये तो सभी कुछ मिल गया। हे देव! आपकी भक्ति सदैव बनी रहे, यही मैं आपसे माँगता हूँ।

भगवान् ने कहा-यह तो पहले से ही तुम्हारे पास है। किन्तु मैं तुम्हें उपहार रूप में कुछ देना चाहता हूँ। इस समय तुम्हारे पिता की मृत्यु हो चुकी है। प्रजा राजा विहीन हो गयी है। अब तुम राज करो। यह मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ। इसे तुम स्वीकार करो। नीति से राज करते हुए प्रजा का पालन करो। प्रजा को सुख प्रदान करो। तभी तुम्हारे अन्य वरदान सफल होंगे। ऐसा कहते हुए भगवान् नृसिंह अन्तर्ध्यान हो गये।

वील्हा ने अपने गुरु नाथाजी से पूछा-हे गुरुदेव! अब आगे मैं प्रह्लाद पंथ के विस्तार की कथा एवं प्रह्लाद कुल परम्परा सुनना चाहता हूँ। भगवान् तथा भक्त की लीला श्रवण करने से मेरी श्रद्धा-भक्ति उत्तरोत्तर बढ़ती ही जा रही है।

नाथोजी उवाच- नाद तथा बिन्द यह दो प्रकार की परम्परा चलती है। प्रह्लाद का यह पंथ नाद परम्परा से है। इसका विकास क्रमशः हुआ है। इस समय का अंतिम पड़ाव, यह बिश्नोई पंथ है। जिसको मैं विस्तार से आगे बतलाऊँगा। गुरु शिष्य को नाद-मंत्र ही देता है। प्रह्लाद ने अपने शिष्यों को नाद-मंत्र ही दिया था। इसलिए यह बिश्नोई नाद परम्परा है। इस परम्परा में कुल जाति का महत्व नहीं है।

बिन्द परम्परा पिता के वीर्य-बिन्द से संतान होती है, जिनका शरीर से सम्बन्ध है। वह शरीर जिस कुल में पैदा होगा, वह उसी कुल का हो जायेगा। प्रह्लाद की बिन्द परम्परा में-प्रह्लाद के विरोचन (बहलोचन) हुए। ये भी प्रह्लाद जैसे ही धर्मात्मा थे। विरोचन एक बार ब्रह्माजी के पास ज्ञानप्राप्ति हेतु गये थे, साथ में इन्द्र भी गये थे। दोनों को प्रजापति ने ज्ञान दिया था। दोनों ही ब्रह्मज्ञानी बनकर लौटै थे।

राक्षस कुल में जन्म लेने से विरोचन अधूरा ही ज्ञान प्राप्त कर सका था। वह संसार एवं शरीर को ही आत्मा समझकर अपने को ब्रह्मज्ञानी मानने लगा था। इन्द्र देवता होने से पूर्णरूपेण आत्मज्ञान को प्राप्त कर सका था। यही देव और दानव में अन्तर है। विरोचन के पुत्र राजा बलि हुए। बलि ने अपने ऐश्वर्य-शौर्य से देवताओं को पराजित करके सम्पूर्ण राज्य प्राप्त कर लिया। बलि अनेक यज्ञ करके राज्य को स्थिर करने की अभिलाषा से प्रयत्नशील थे।

देव माता अदिति अपने पति कश्यप ऋषि के शरण गयी और अपने बेटे देवताओं की दुर्दशा देखकर रोने लगी। कश्यप ने कहा- देवी! धैर्य धारण करो। किसी भी प्रकार से देवाधिदेव भगवान् श्रीविष्णु को प्रसन्न करो। वही तुम्हारे कष्ट को दूर करेंगे।

अदिति ने बारह दिनों तक पयोव्रत किया। केवल दुग्ध आहार लेकर भगवान् की आराधना की। भगवान् प्रसन्न हुए और सामने साक्षात् प्रकट होकर वरदान दिया। अदिति ने भगवान् को ही पुत्र रूप में माँग लिया। समय आने पर भगवान् विष्णु ही बावन रूप में प्रकट हुए। देवताओं ने खुशियाँ मनाई। अपना उद्धारक स्वयं भगवान् ही बावन रूप में प्रकट हुए हैं। अब हमारा खोया हुआ राज्य अतिशीघ्र ही वापिस दिला देंगे। बावन भगवान् ने ब्रह्मचारी रूप में राजा बलि की यज्ञशाला में प्रवेश किया। बलि तथा अन्य लोगों ने देखा कि प्रदीप्त अग्नि की तरह यह कोई बाल सूर्य हो सकता है या स्वयं भगवान् विष्णु ही आज तो ब्रह्मचारी बनकर यज्ञशाला में पधारे हैं। सभी ने स्वागत किया। बलि ने आगे बढ़कर चरणों को धोया और यज्ञशाला में प्रवेश करवाया।

हाथ जोड़कर विनती करते हुए पूछा-आप हमारे अतिथि हो, आईये, बैठिये। जल-पान ग्रहण कीजिए। भगवान् बावन ने कहा-अच्छी बात है राजन्! आपने बैठने के लिए कहा है। किन्तु मैं बैठूँ कहाँ? आप प्रह्लाद के पौत्र होकर केवल वचनों द्वारा ही आदर नहीं करते? बैठने के लिए स्थान-भूमि भी देते हैं।

बलि ने बड़े गर्व से कहा-आपको भूमि चाहिये। कहो कितनी चाहिये? गाँव,नगर,देश या सभी धरती, राज्य आपको दे दूँ। मैं आपको दूँगा। जितना भी माँगोगे उतना ही दूँगा।

बावन बोले- हे बलि! इतना अंहकार करना अच्छा नहीं होता। मुझे तो तीन पैंड धरती दे दो। बहुत है मेरे लिए। मैं उसमें बैठ सकूँ। शयन कर सकूँ। मैं कोई लालची ब्रह्मचारी नहीं हूँ।

बलि ने कहा-हे भगवन्! इस प्रकार से थोड़ी भूमि माँगकर मुझे लज्जित न करें। उतनी धरती तो अवश्य ही माँग लो, ताकि अन्यत्र कहीं दूसरी जगह माँगने के लिए जाना न पड़े।

भगवान् ने कहा-केवल बातें करने से क्या होता है? पहले इतनी भूमि देने का संकल्प करके दे दो। बलि ने ज्योंहि तुरंत संकल्प करने के लिए जल उठाया, त्योंहि दैत्यगुरु शुक्राचार्य आ गये। बलि को समझाया-रे बलि! इसे देने का संकल्प मत कर, यह तुम्हे छोटा सा दिखता है किन्तु जब बढ़ने लगेगा तो तू इनकी पूर्ति नहीं कर सकेगा। तू जानता है कि यह कौन है? ये तो साक्षात् विष्णु हैं। तुम्हें ठगने के लिए आये हैं। अभी ही ना कर दे, आखिर तो ना कहना ही होगा।

बलि कहने लगा-हे गुरुदेव! आपकी बात तो सत्य है। किन्तु मैंने देने को कह दिया है। अब मैं ना कैसे कह सकता हूँ। बलि ने गुरु की बात नहीं मानी। हाथ में जल लेकर संकल्प कर लिया।

बलि ने कहा-हे देव! अब तीन पैण्ड भूमि नाप लीजिये! उसी समय ही बावन भगवान् ने अपना शरीर बढ़ाना प्रारम्भ किया। देखते ही देखते तीन लोकों में व्याप्त हो गया। एक पैण्ड से सम्पूर्ण पृथ्वी नाप ली। दूसरे पै.रू से स्वर्ग को नाप लिया। अब तीसरा पैर कहाँ रखे।

भगवान् ने गरुड़जी को आज्ञा दी। इस बलि को बाँध दिया जावे। बलि बँधन में आ गया। भगवान् ने कहा-अब तो तू कह रहा था कि थोड़ी और ले लो, अब इसको ही पूरी कर दो।

बलि कहने लगा-हे नाथ! आपकी महिमा आप ही जानो। अब तो मेरे पास देने को कुछ भी नहीं है। यह शरीर मेरा है। इसे नाप लीजिये। भगवान् ने बलि के पीठ पर पाँव रखा और उसे सुतल लोक में भेज दिया। बलि ने भगवान् के चरण पकड़ लिए।

बोले-अब कहाँ जाआगे? मैंने सर्वस्व आपको समर्पित कर दिया। भगवान् भी भक्त के वशीभूत हो गये। वहीं सुतल लोक में बलि के पास रहने लगे। इधर लक्ष्मी ने देखा कि भगवान् लौटकर नहीं आये। क्या बात है? लक्ष्मी भगवान् को छुड़ाने के लिए बलि के द्वार पहुँची। बलि के रक्षा सूत्र बाँधकर भाई बनाया और भाई से पुरस्कार रूप में विष्णु को छुड़ाकर ले आयी।

जाते समय बलि ने कहा-बहन! भगवान् विष्णु चार महीने तक मेरे पास रहे हैं, इसलिए सदा-सदा के लिए आगामी भी इसी प्रकार से मेरे यहाँ सुतल लोक में रहेंगे। बाकी आठ महीनों के लिए बहन तुम अपने पति परमेश्वर को ले जाओ। इनकी सेवा करो।

उस सुतल लोक से चलते हुए भगवान् ने कहा-हे बलि! तुम्हारा दिया हुआ परम दान व्यर्थ में नहीं जायेगा। इस समय तो यहीं सुतल लोक में राज्य करो। समय आने पर तुम्हें पुनः स्वर्ग का राज्य दिया जायेगा। तुम अवश्य ही इन्द्रपदवी से विभूषित होगे।

बलि का बेटा बाणासुर था। जिसने भगवान् कृष्ण से युद्ध किया था। भगवान् कृष्ण ने बाणासुर को पकड़कर छोड़ दिया था। बलरामजी ने कहा- हे कृष्ण! तुम बहुत ही भूल करते हो। काबू में आए हुए इस बाणासुर को मारा क्यों नहीं? बार-बार इसे कैसे छोड़ देते हो?

भगवान् कृष्ण ने कहा-हे बलराम! तुम्हें मालूम नहीं है। यह दैत्य प्रह्लाद कुल में जन्मा है। मैंने भक्त प्रह्लाद को वचन दिया था कि मैं तुम्हारे कुल में जन्म लेने वाले किसी को भी मारूँगा नहीं। उन्हें दिए हुए वचनों को निभाते हुए मैं इसे छोड़ रहा हूँ। ऐसा कहते हुए बाणासुर को छोड़ दिया था।

हे वील्ह! यह वंश परम्परा प्रह्लाद की बिन्द से चली है। अब मैं तुम्हें आगे प्रह्लाद की नाद परम्परा यानी शिष्य परम्परा के बारे में बताऊँ गा। इसी परम्परा से बिश्नोई पंथ जुड़ा हुआ है।