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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह35 / 94

तीसरा अध्याय · कथा 35

रामोजी सुराणा के प्रति शब्दोपदेश

वीश्नोइयां नु रामो सुराणौं वरज, क्रिया भजन सार क्योर नहीं। धरम किया निसतारौ होयसी वीसनोई नागौश्र सु राम न लीजे आया। वीसनोई कह जाम्भाजी भजन बिना क्रिया विना मुकते लाभ। जांभाजी श्री वायक कह-

शब्द-32 ओ३म् कोड़ गऊ जे तीरथ दानों, पंच लाख तुरंगम दानों।

कण कंचन पाट पटंबर दानों, गज गेंवर हस्ती अति बल दानों।

करण दधीच सिंवर बलराजा, श्रीराम ज्यूं बहुत करै आचारूं।

जां जां बाद बिवादी अति अहंकारी,लबद सवादी।

कृष्ण चरित बिन, नाहिं उतरिबा पारूं।।

नाथोजी उवाचः- श्रीदेवजी के पास सभी प्रकार के लोग, कोई शंका निवारण के लिए, कोई ज्ञान की प्राप्ति के लिए, कोई धन के लिए आया करते थे।

हे शिष्य! एक समय बिश्नोइयों की जमात शहर नागौर किसी कार्यवश गयी थी। वहाँ जमात से रामोजी सुराणा की भेंट हो गयी। वह बिश्नोइयों से विवाद करने लगा-कहने लगा कि जाम्भोजी तुम्हें शुद्ध आचरण, आचार-विचार, शुद्ध क्रिया-कर्म बतलाते हैं तथा विष्णु का भजन करना बतलाते हैं, इससे क्या तुम्हारी मुक्ति हो जायेगी? क्या आप लोग स्वर्ग पहुँच जाओगे? यह कोई धर्म नहीं है।

शास्त्रों में धर्म करना बतलाया है। धर्म का अर्थ दान होता है। बिना दिये, कहीं कुछ भी नहीं है। हम लोग दान देते हैं। इसलिए स्वर्ग-मुक्ति के अधिकारी हैं। केवल नहाने-धोने से क्या होता है? मछली जल में ही रहती है। ऐसी सुराणा की बात सुनकर बिश्नोई संशय में पड़ गये। यह रामो सत्य कहता है या जाम्भोजी सत्य कहते हैं? दोनों तो सत्य हो ही नहीं सकते है? कौनसा मार्ग हमें गन्तव्य स्थान को ले जायेगा?

बिश्नोई कहने लगे-रामाजी! आप हमारे साथ ही सम्भराथल चलिये। वहीं पर तुम्हारा हमारा निर्णय होगा। हमारे गुरुदेव ने बतलाया है कि विवाद नहीं करना। इसलिए हम तुम से विवाद तो नहीं करेंगे, किन्तु श्री देवजी अपना निर्णय कर देंगे, वहीं हमें स्वीकार्य होगा। ऐसा कहते हुए रामोजी के सहित जमात सम्भराथल पहुँची।

सभी ने श्रीदेव को प्रणाम किया और यथा स्थान बैठ गये। बिश्नोइयों ने कहा-हे महाराज! यह रामो हमें बहका रहा है। कहता है कि तुम्हारे नियम, भजन, क्रिया, स्नान आदि आदि महत्वहीन हैं। युक्ति-मुक्ति हेतु तो केवल दान पुण्य ही काम आयेगा। इसके बारे में आप ही प्रमाण है। हमें क्या करना चाहिये? इस प्रकार की जमात की बात सुनकर श्री देवजी ने शब्द सुनाया-जिसका भाव इस प्रकार से है?

हे रामा! यदि कोई महादानी गऊवों का दान तीर्थ में जाकर कर दे। पाँच लाख घोड़ों का दान कर दे। धान, स्वर्ण, वस्त्र आदि का भी दान कर दे। सूण्ड सूण्डाला सूं सज्जित हाथियों का भी दान कर दे तथा दान की पराकाष्ठा तक पहुँच जाये। अपनी ताकत से भी बढ़कर कोई दान कर दे। तो भी सबसे श्रेष्ठ दान शील स्नान का करना है। इन नियमों के बराबर दुनिया में कोई दान नहीं है। कर्ण,दधीचि, शिव एवं बलि राजा, ये सभी महान दानी थे। तथा राम की तरह सभी मर्यादा का पालन करने वाले थे। किन्तु पूर्णतया धार्मिक धर्म के मर्म को समझने वाले नहीं थे उन्होंने धर्म के एक अंग दान को ही अधिक महत्व दिया था। दान देने में अहंकार आजाता है। अहंकार परमात्मा से दूर हटाता है। इन लोगों ने दान का फल तो अवश्य ही प्राप्त किया, किन्तु मुक्ति को प्राप्त नहीं हो सके। दान अहंकार को विकसित करता है। अहंकार परमात्मा से दूर हटाता है। हुई का फल लीयो।

दान देकर के कहता है कि मैंने दिया। मेरे जैसा दानी अन्य कोई नहीं है। दान देकर पुनः धर्म कमाने का लोभ करता है तथा देते समय भी धर्म का लोभी स्वर्ग का सुख, यश का लोभ रहता है। यह अवस्था परमात्मा के समर्पित नहीं होने देती।

हे रामा! जब तक कृष्ण चरित्र से सम्बन्ध नहीं जोड़ेगा, तब तक संसार सागर से पार तो नहीं उतर सकता। कृष्ण चरित्र अर्थात् यह सम्पूर्ण सृष्टि परमात्मा की ही लीला है। हम तो उसी के ही एक अंग हैं। उसी का ही खेल वही सभी कुछ है। हम तो केवल निमित्त मात्र ही हैं। ऐसा विराट ज्ञान ही सदा सदा के लिए दुःखों से, जन्म मरण, बुढ़ापा रोग आदि से छुटकारा दिला सकता है। केवल दान से नहीं। दान सम्पूर्ण धर्म नहीं है। यह भी धर्म का एक अंग है। इसलिए दान करते रहना चाहिये। उससे भी धर्म होगा। धर्म ही जीवन में कल्याण कारक है।

रामोजी ने पूछा- हे देवजी! रामु कहै देवजी! एह जीव वले जांम कोई नहीं, आगै कोई मरि अर जायो नहीं- जाम्भाजी श्रीवायक कह-

शब्द-33 ओ३म् कवण न हूवा कवण न होयसी, किण न सह्यो दुःख भारूं।

कवण न गइया कवण न जासी, कवण रह्या संसारूं।

अनेक अनेक चलंता दीठा, कलि का माणस कौन विचारूं।

जो चित होता सो चित नाही, भल खोटा संसारूं।

किसकी माई किसका भाई, किसका पख परवारूं।

भूली दुनिया मर मर जावै, न चिन्हों करतारूं।

विष्णु विष्णु तू भणरे प्राणी, बल बल बारम्बारूं।

कसणी कसबा भूल न बहबा, भाग परापति सारूं।

गीता नाद कवीता नाऊं, रंग फ टारस टारूं।

फोकट प्राणी भरमे भूला, भल जे यों चीन्हों करतारूं।

जामण मरण बिगोवो चूकै, रतन काया ले पार पहूँचे

तो आवागवण निवारूं।। रामोजी ने कहा-हे देव! यह जीव पुनः जन्म ही नहीं लेता। अब तक कोई जीव मरने के बाद पुनः जन्म लेकर आया ही नहीं है। जो मर गया सो मर गया। यहीं सभी कुछ समाप्त हो जाता है। दुबारा जन्म किसका होता है? क्योंकि मरे हुए व्यक्ति ने तो वापिस आकर बतलाया नहीं है कि मैं पूर्व जन्म में कौन था? अब मैं यहाँ आया हूँ। पूर्व जन्म के सिद्धांत को कैसे मानें? इसलिए इस जन्म में यश,कीर्ति, धन-धान्य सम्पन्न होकर सुख प्राप्त कर लेना मेरी समझ में तो पर्याप्त है, आगे कुछ भी नहीं है। रामे की बात को श्रवण करके श्री जम्भेश्वरजी ने उपर्युक्त शब्द सुनाया-

हे रामा! इस संसार में कौन नहीं हुआ, अर्थात् बड़े-बड़े राजा-महाराजा, ऋषि-मुनि तथा अन्य भी छोटे-बड़े जन्म लेकर आये हैं। ये लोग कहाँ से आये हैं? यदि सभी जीव मरने के पश्चात् पैदा ही नहीं होते तो नये कहाँ से आते? वे ही जीव जिनका शरीर जीर्ण-शीर्ण हो गया, उसे छोड़कर नया धारण करके आते हैं। जन्म लेते हैं। अब तक जो आये हैं, आगे भी वही क्रम चलता रहेगा तथा जो आ गये हैं वे भी संसार में स्थिर कहाँ रहेंगे? चले ही जायेंगे। पुनः नये बनकर लौट आयेंगे। किन्तु पूर्व जन्मकी उन्हें याद नहीं रहती है, तो यह्य कैसे बतलायेंगह्य। ऐसा स्मरण न रहना ही ठीक है। ऐसा तुम स्वीकार कर लो। अन्यथा यह जीवन नहीं जी सकोंगे। पूर्व जन्म इस जन्म में अनेकानेक उपद्रव करेगा।

हे रामा! मैंने अनेकानेक चलते हुए देखे हैं। इस संसार को छोड़कर चले गये और वापिस भी आये हैं। इस प्रकार धारा जीवन-मरण चल रहा है। इस कलयुग में मानव की तो क्या कथा कहें, सतयुग में भी नहीं ठहर सके। यहाँ पर तो क्षणभर का ही तो जीवन है।

जो कुछ पहले था, वह अब नहीं रहा। जो अब है, वह आगे नहीं रहेगा। कुछ भी स्थायी नहीं है। सभी कुछ परिवर्तनशील है। कौन किसका भाई है? कौन किसका माता-पिता है? दुनिया भूल में पड़ी हुई है। इसी मोह-माया के बन्धन में पड़ी हुई बार-बार जन्म-मरण को प्राप्त हो रही है। यही वासना ही जन्म मरण के चक्कर को चलाये रखती है।

हे प्राणी! विष्णु का भजन कर! सम्पूर्ण जोर लगाकर, एकाग्रचित्त होकर उसी से अपनी निष्ठा, बल एवं मन लगावें। वही तुम्हारे जन्म-मरण के चक्र को काटेगा। सचेत होकर अपना जीवनयापन करे। जो भी भाग्य में होगा, अवश्य ही प्राप्त होगा। संसार की वस्तुओं के लिए ज्यादा चिंता में नहीं रहना।

गीता पढ़े, वह भगवान् की नाद वाणी है। वह गीता किसी कवि की कल्पनामात्र कविता नहीं है। गीता ने ही तो अर्जुन के संशय मोह को काट डाला था। तुम्हारे संशय जनित मोह को भी गीता काट डालेगी। जैसे फिटकरी जल के मेल को काट डालती है।

हे प्राणी! भूल में मत रहना। उस कर्त्ता का स्मरण कर। वही तुम्हारे जन्म-मरण के दुःखों को काट देगा। यह तुम्हारी रत्न सदृश दिव्य काया-जीव इसे लेकर पार पहुँच जायेगा। सदा सदा के लिए तेरा जन्म-मरण मिट जायेगा।

रामू कह देवजी विसन को जाप कीती हेक दा करीय। जाम्भाजी श्री वायक कह-

शब्द-34 ओ३म् फु रंण फुंहारे कृष्णी माया, घण बरसंता सरवर नीरे।

तिरी तिरन्तै तीर, जेतिस मरैं तो मरियों।

अन्नों धन्नों दूधू दहीयूं, घीयूं मेऊं टेऊं जे लाभंता।

भूख मरै तो जीवन ही, बिन सरियों।

खेत मुक्त ले कृष्णों अर्थो, जे कंध हरै तो हरियों।

विष्णु जपन्ता जीभ जु थाकै, तो जीभड़ियां बिन सरियूं।

हरि हरि करता हरकत आवै, तो ना पछतावो करियो।

भीखी लो भिखीयारी लो, जे आदि परम तत लाधो।

जांकै बाद बिराम बिरांसो सांसो, तानै कोण कहसी साल्हिया साधो।

रामोजी ने पूछा-हे सद्गुरु! आपने विष्णु का जप करना बतलाया था। किन्तु विष्णु का जप कितने दिनों तक किया जावे? जिससे मुक्ति की प्राप्ति हो सके। श्री देवजी ने शब्द सुनाया-हे रामो! जाप भजन पूजा-पाठ कितना दिन किया जावे, इसका कोई समय निर्धारित नहीं है। जिस प्रकार से वर्षा का भी कोई समय निश्चित नहीं है। कब आयेगी, कब जायेगी? कुछ पता नहीं है। जिस प्रकार से एक बूँद बूँद जल वर्षता है और सम्पूर्ण धरती को जल से परिपूर्ण कर देता है। इतनी बड़ी धरती, तालाब, नदी, नाले सभी जल से परिपूर्ण हो जाते हैं। इसी प्रकार से ही एक-एक नाम जपते-जपते ही अपार नाम राशि एकत्रित हो जायेगी। वह कितने दिनों में कब एकत्रित होती है, यह तो जप करने वाले पर निर्भर है।

जल से तालाब नदी भर जाते हैं। उसमें तैरने वाल तो तैरकर पार हो जाता है। कुछ लोग डूब जाते हैं। तो कुछ लोग किनारे प्यासे ही बैठे रह जाते हैं। उसी प्रकार जो नाम जप का महाक्रश्वय जानता है, वह तो पार उतर जाता है, अतिशीघ्र ही। तत खिण लहो इमाणो। जो जो नहीं जानता अज्ञानता के वशीभूत हो गया है, वह डूब जाता है। तथा कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अभी किनारे बैठे देख ही रहे हैं। संध्या भजन के निकट ही नहीं जाते।

इस संसार में धन-सम्पत्ति, अन्न-धन, दूध,घी, मेवा आदि पर्याप्त मात्रा में हैं किन्तु सभी कुछ होते हुए भी अभाग्यवान उन्हें प्राप्त नहीं कर सकता। उसी प्रकार से भगवान् के जप रूपी संपत्ति भी है, किन्तु उसे भी पापीजन प्राप्त नहीं कर सकते। सभी कुछ होते हुए भी यदि इन्हें प्राप्त नहीं कर सकते। यदि भूख मरे तो बिना जीवन के ही कार्य चलेगा। इस प्रकार मृतवत जीवन से क्या लाभ?

यदि धर्म के कार्य में जीवन ही चला जाये तो सुकर्म है लाभ में ही होगा। यदि विष्णु का जप करते हुए यदि जीभ थक जाये तो बिना जीभ के ही कार्य चलेगा। बिना जप की जीभ से तो न रहना ही ठीक है। जीभ की सार्थकता तो हरि के नाम का जप करने में ही है। हरि हरि करते हुए यदि किसी प्रकार की अड़चन- बाधा आती है, तो आने दें। ऐसा पछतावा न करें कि मैंने हरि का जप किया, मुझे बाधा क्यों आयी?

यदि भिक्षा भी माँगनी हो तो ऐसी माँगें जिससे जन्म-मरण के दुःख निवृत्त हो जायें तथा भिक्षा माँगने का अधिकार भी उसे ही है, जिसने परमतत्त्व की प्राप्ति कर ली है। अब तक जो वाद-विवाद, संशय, शोक, लोभ, मोह, ईर्ष्यादि से ग्रसित है। उसे साल्हिया (शुद्ध पवित्र, ज्ञानी, भक्त, साधु) कौन कहेगा?

इस प्रकार से रामो को शब्द सुनाया। शब्द सुनने से संशय निवृत्त हुआ और अपने घर जाकर अपने कुटुम्बी जनों को लेकर सम्भराथल पर आया। श्री देवजी से पाहल लेकर बिश्नोई बना।