दसवां अध्याय · कथा 66
रावण गोयंद को चोरी से निवृत्त करना
नाथोजी उवाच -एक समय श्री देवजी सम्भराथल पर अपने शिष्यो के सहित विराजमान थे। उनके पास एक विचित्र झगड़ा लेकर कुछ लोग उपस्थित हुए। श्री देवजी ने दैविक शक्ति द्वारा उस झगड़े को निपटाया। हे वील्ह! उस चरित्र को मैंने अपनी आँखो से देखा था। वील्हो उवाच-हे गुरुदेव! वह दिव्य चरित्र क्या था? इस कथा को मुझे विस्तार से बतलाने का कष्ट करें। आपकी वाणी द्वारा सुन कर के मैं धन्य हो जाऊँगा। ऐसी वील्होजी की प्रार्थना सुनकर कथा झोरड़ा की नाथोजी ने सुनाना प्रारम्भ किया।
रावण गोयंद दो भाई सोतर में झोरड़ा गाँव के रहने वाले थे। उनकी गोत्र भी झोरड़ा थी। उन्होंने चोरी करने का ही कार्य धन्धा अपना रखा था। रावण गोयंद ने चोरी बहुत की थी। एक घड़ी भी नहीं रुके थे। कभी भी रूक कर अपने नीच कर्म के बारे में सोचा नहीं था।
एक समय दोनों भाई सिन्ध देश में चोरी करने के लिये गये थे। मार्ग में कोई गाँव तथा जल मिलने की संभावना नहीं थी। इसलिये वो दोनों एक चमड़े की बनी हुई दीवड़ी जल भरने की,साथ में लेकर चलते थे। उन्होंने उस दीवड़ी को तो मार्ग में किसी पेड़ पर टाँग दी थी और स्वयं सिन्ध देश में चोरी करने हेतु चले गये। सोचा था कि वापिस आकर जल पी लेगे और अपने देश चले जायेंगे।
वे दोनों भाई सिन्ध देश में पहुँचे और वहाँ से उन्होने दो सुन्दर घोड़ी चुराई। दोनों दो घोड़ी लेकर वापिस चल पड़े और वहाँ आ पहुँचे जहाँ पर जल रख कर आये थे।
गिलहरी ने उस चमड़े की दीवड़ी को काट दिया। जल बिखर गया। रावण गोयंद ने दीवड़ी को खाली पाया। उन्हें प्यास लगी थी। बहुत ही प्रयास से वहाँ तक पहुँचे थे कि जल पीयेंगे, किन्तु जल नहीं मिला। बिना जल के प्राण निकलने को हो रहे थे। इस जल, वायु, अन्न पर आधारित शरीर को जिन्दा रखना कठिन था।
गोयंद कहने लगा- हे भाई! अब क्या करें? जल बिना तो प्राण एक पलक में ही निकलने वाले हैं। यहाँ से 60 कोश तक कोई गाँव नहीं है। इस समय तो जल के बिना तो एक कदम भी चलना कठिन है। इस समय हम बहुत ही दुःखी हो रहे हैं। अन्य कोई उपाय न देखकर देवी-देवताओं का स्मरण करने लगे। किन्तु किसी भी देवी देवताओं से कार्य नहीं बना। जल की प्राप्ति होवे, तो जीवन बचे।
तब रावण दुःख में भरकर बोला- अब मैं प्यास से व्याकुल हो रहा हूँ। एक क्षण भी जीवन जीने में असमर्थ हूँ। ऐसा कोई प्रत्यक्ष देवता नहीं है, जिसका स्मरण करने से वर्षा होवे। जल प्राप्ति का एक ही उपाय है कि किसी भी प्रकार से वर्षा होवे। बिना प्रत्यक्ष देवता के वर्षा होना असंभव है। यदि कोई है तो बतलावो। भाई, उनको भी याद कर ले, जिससे वर्षा हो सके।
गोयंद कहने लगा-हे भाई सुनो! इस समय तो सम्भराथल पर श्री जाम्भोजी विराजमान हैं। इस समय तो यहाँ के प्रत्यक्ष देवता जाम्भोजी ही हैं। उनका स्मरण करें तो हो सकता है कि अपना जीव बच जाये। इस प्रकार से दोनों ने विचार किया और अन्य देवी देवताओं को छोड़कर केवल जम्भेश्वरजी की शरण ग्रहण कर ली। श्रीदेवजी का ही ध्यान किया। प्रार्थना करने लगे-
हे देव! हमारी रक्षा करो, हमारी रक्षा करो। इस प्रकार की प्रार्थना करते हुए कुछ समय ही व्यतीत हुआ कि आकाश में बादल दिखाई दिये। बादल चारों तरफ से एकत्रित होकर गर्जना करने लगे और बूँदें गिरने लगी। प्यासे जनों को बूँदें अमृत तुल्य लगी। वहीं पर ताल में एक खां था, वह भर गया। दोनों भाईयों ने स्नान किया, जल पिया। अपने पशुओं को भी जल पिलाया। जल पिया। आनन्द को प्राप्त हुए। ऐसे जम्भेश्वरजी ने उनकी रक्षा की।
दोनों घोड़ी लेकर वहाँ से चल पड़े। इसी प्रकार से उनके हृदय पर पड़ा हुआ अज्ञानता का ताला खुल गया। वहाँ से चलते-चलते सम्भराथल पर आ गये। जाम्भोजी का दर्शन किया। कहने लगे यही हैं वो प्रत्यक्ष देव जिन्होंने बिना ही बादल वर्षा करवायी। हमारे प्राण बचाये हैं। हाथ जोड़कर परिक्रमा की और कहने लगे-श्रीदेव हरि ने हमारी रक्षा की है।
रावण कहने लगा- हे देव गति करो। चौरासी के चक्कर से छुड़ाओ। श्रीदेवजी-जीवनयुक्ति, मृत्यु पर मुफि का मार्ग बतलाते हुए कहने लगे। हे रावण गोयंद! चोरी-जारी कभी नहीं करना। हृदय में विष्णु का ध्यान करना। विष्णु का ही जप करना। दोनों समय संध्या वेला में हरि का भजन, संध्या करना। विष्णुविष्णु ऐसा उच्चारण करना, यही महामंत्र है। प्रातःकाल नित्य स्नान करना। भूल करके भी झूठ नहीं बोलना। इसी प्रकार से नित्य नियम कर्तव्य कर्म करो। इससे तुम्हारी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होगा।
हे वील्हा! इस प्रकार से रावण गोयंद झोरड़वासी सोतर के रहने वाले दोनों भाइयों ने चोरी करना छोड़ दिया। जम्भगुरु की वन्दना करने लगे। इससे उनके पाप मिटने प्रारम्भ हो गये। वे तो चोरी कर्म करने वाले मध्यम थे, श्रीदेवजी ने उनको उत्तम साधु बनाया। वे तो कुकर्मी, चोरी का धन खा कर अपना निर्वाह करने वाले थे। इस संसार में ऐसे असाधु पुरुषों को श्रीदेवजी ने साधु पुरुष बनाया। शील स्नान से काया को पवित्र किया। आन देवता को छोड़कर देवजी के शरण में आया। सिर मुण्डवाकर बिश्नोई पन्थ में सम्मिलित हो गये। जीव की अज्ञानता मिट गयी। भाविक होकर जीवन व्यतीत करने लगे। जम्भेश्वरजी के नियमों पर चलते हुए कुछ समय व्यतीत हो गया। रावण गोयंद वृद्धावस्था को प्राप्त हो गये। खेती बिणज व्यापार करते थे। किन्तु कुछ खास लाभ नहीं मिलता था। पहले चोरी के धन से जीवन यापन हो रहा था, किन्तु अब तो बुढ़ापा आ गया था। ऊपर से अकाल भी पड़ चुका था। खेतों में अन्न भी नहीं हुआ था। अन्य कुछ कार्य करने में असमर्थ भी हो गये थे। एक तो अकाल पड़ा। दूसरा बुढ़ापा भी आ गया। आँखों से दिखाई भी कम ही देता था। यदि बुढ़ापे में घृत मिल जाता तो कुछ शरीर में ताकत भी आ जाये, तो कुछ कार्य मजदूरी करे। जीवन निर्वाह हो सके। भूखे से तो भजन बनता नहीं है, क्या किया जाये?
दोनों भाई विचार करने लगे। हम लोगों ने सिर मुंडवाकर सतपंथ में प्रविष्ठ हो गये। नियमों का भी पालन भलीभांति कर रहे हैं। किन्तु घर में भूख आ गयी। इसका इलाज तो नहीं हो पा रहा है। उस दिन वर्षा हुई थी। हमारे प्राणों की रक्षा भी हुई थी। क्या पता यह वर्षा जाम्भोजी ने करवायी थी या अपने आप हो गयी थी? यह भी अब तक कुछ पता नहीं चल सका है?
जाम्भोजी देवता हैं या नहीं? एक बार परीक्षा कर के देखेंगे। यदि अबकी बार हम नहीं पकड़े जायेंगे तो चोरी करना पुनः प्रारम्भ कर देंगे और यदि पकड़े गये तथा जाम्भोजी ने हमें छुड़वा दिया तो जानेंगे कि जाम्भोजी असली देव हैं। ऐसा विचार करके दोनों भाई चोरी करने के लिए निकल पड़े।
रोल गाँव में आकर सांय की वेला में रुके। गाँव के अमरे जाट के घर पर आसन लगाया। अमरे जाट ने पूछा- कहो, तुम कौन हो? कहाँ से आये हो? तब रावण कहने लगा- हे भाई! हम तो साधु सदृश ही बिश्नोई पंथ के अनुयायी हैं। जाम्भोजी ने हमें साधु पंथ में सम्मिलित किया है। घर में कुछ अन्न धन की कमी आ गयी है। प्रदेश जायेंगे, कुछ कमाई करेंगे। आज की रात्रि में तुम्हारे घर पर विश्राम करेंगे। सुबह आशीर्वाद देकर ही जायेंगे।
साधु भक्तों के सदृश आये हुए अतिथियों को देख कर जाट ने झोंपड़ा खोल दिया। चारपाई बिछा दी और कहा- बैठिये, विश्राम कीजिये। वे दोनों भाई लट्ठियाँ धर कर बैठ गये। इस प्रकार से संध्या का समय हुआ, तब दोनों भाई हाथ पैर धोकर संध्या करने बैठ गये। जब एक घड़ी रात्रि व्यतीत हो गयी, तब भी संध्या से उठे नहीं।
जाट कहने लगा- आप हमारे अभ्यागत हो, पहले भोजन करो। फिर हमारे हाली पाली बाल बच्चे भोजन करेंगे, तब दोनों ने सिर हिला दिया। भोजन करने से इंकार कर दिया क्योंकि संध्या कर रहे थे। मुख से बोल नहीं रहे थे। ऐसा ही अमरे ने समझा।
कुछ समय पश्चात् अमरो फिर कहने लगा-आप लोग भोजन क्यों नहीं करते? हम लोग आपकी प्रतीक्षा में हैं। तब गोयंद कहने लगा-हम तो रात्रि में भोजन करते नहीं हैं, क्योंकि चतुर्मास आ चुका है। हम तो दिन में ही भोजन करते हैं। हमारा नियम क्यों तुड़वाते हो? अमरो कहने लगा- यदि आप लोग भोजन नहीं करेंगे तो हम लोग भूखे को घर में रहने ही नहीं देंगे। यह भूख की हत्या हम क्यों लें। उसी समय हाली पाली तथा अमरे का बड़ा पुत्र भी देखने के लिए आ गया था। अमरे और उन दोनों के वाद विवाद मिटाते हुए बड़े पुत्र ने कहा-पिताजी! कोई बात नहीं है। यदि अब भोजन नहीं करते तो कोई बात नहीं, किन्तु सुबह भोजन करके जायेंगे। रावण गोयंद ने भी बात स्वीकार कर ली। अमरो शांत हो गया।
सभी छोटे-बड़ों ने भोजन किया और रात्रि में सभी सो गये। तब रावण गोयंद उठ खड़े हुए और अच्छे बैलों की जोड़ी को खोला, उनकी रास पकड़ी और घर से बाहर हो लिये। नागौरी बैल थे। घर से निकलते हुए, बड़े वेग से कूदते हुए चले। रावण गोयंद उन्हें लेकर उत्तर की तरफ चल पड़े। जब बैलों के बिदकने की आवाज हुई तब गाँव के बड़े बूढे लोग जग गये। बैलों के पैरों की ध्वनि सुन कर कहने लगे किस के बैल रस्सी तुड़वा कर भाग गये या कोई चोर ले गया? अमरे ने जग कर अपने बैलों को देखा तो आश्चर्यचकित हो गया, न तो वहाँ बैल थे और नहीं वे आये हुए मेहमान,
अमरो कहने लगा- सफेद रंग, सीधे सींगों वाले मेरे प्रिय बैल कितने सुंदर थे। वे कितने तेजस्वी थे। किन्तु इस समय यहाँ पर नहीं है। उन्हें कौन ले गया? वे आये हुए हमारे मेहमान भी नहीं हैं। न जाने वही तो कहीं न ले गये है? वे तो अपने को साधु पुरुष बतला रहे थे। यह कैसे हो सकता है? शाम को उन्होंने भोजन भी नहीं किया था। इसका मतलब भी अब समझ में आ गया है। वे मेरा नमक खाकर मेरी चोरी कैसे करते?
गाँव के लोगों ने एकत्रित होकर कहा-आप चिंता न करें। हम अभी पीछे जाते हैं। जहाँ पर भी गये हैं, वहीं से ले आते हैं, आपके बैल और चोर अभी आपके सामने होंगे। इस प्रकार से पैरों की खोज लेकर उत्तर दिशा की तरफ चले।
रावण गोयंद बैलों को लेकर जा रहे थे। काफी दूर निकल गये थे कि रात्रि व्यतीत हो गयी। ब्रह्म मूहूर्त का समय आ गया। रावण गोयंद से कहने लगा- एक घड़ी की रात्रि रह गयी है। अब तो हमारा स्नान संध्या का समय हो गया है। जाम्भोजी ने नियम बतलाया था। उस नियम का पालन तो करें। कुछ तो जाम्भोजी के वचनों से डरें। इस प्रकार कहते हुए अपने पास में जल की दीवड़ी को खोली और दोनों ने झट पट स्नान किया और संध्या करने बैठ गये। अभी तो नियम ही पूरा करना था। अति शीघ्र आगे जाना था। पीछे से कहीं पकड़ने वाले नहीं आ जायें। संध्या करके उठे तो देखते है कि पीछे से बाहरू आ रहे हैं। बाहरू-पकड़ने वाले को देखा तो धैर्य खो गया।
कहने लगे- ये लोग तो पीछे आ गये हैं। हम पकड़े गये। आज हमें ये लोग चोट मारेंगे। अब हमें कौन बचायेगा? चोरी हमने की तो उसका फल हमें मिलेगा ही। अब डरने से क्या होगा? इस समय तो भाग भी नहीं सकते। इस समय तो केवल सम्भराथल स्वामी का ही स्मरण करें। वही हमें बचायेगा, तभी बचेंगे। यह कुबध हमने अपने आप ही खेली है। इस प्रकार से तो श्री देवजी चोरो का मित्र नहीं है। एक बार हमें बचाया था। क्या बार-बार हमें बचायेगा? हह्य देव! हमने अपराध किया है। अब हम आपकी ही शरण में हैं पूर्ण रूपेण श्री देवजी के ही शरणों में हो जाये। अपनी तरफ से जोर जबरदस्ती या सामना नहीं करना है। शरणागति पूर्ण रूपेण ही करनी है। ऐसा कहते हुए स्वकीय अभिमान को छोड़ कर सद्गुरु जाम्भोजी के ही शरण में हो गये।
इस प्रकार से साधु सज्जनों की करुणा पुकार दयालु श्री जांभोजी ने सुन ली। अपने भक्तों की रक्षा करने के लिए उन सफेद रंग के बैलों को काला कर दिया और सीधे सींगों को टेढा-भीला कर दिया। बाहरू नजदीक आ पहुँचे थे। बैलों को देखकर बिलखने लगे। अति दुःख से कहने लगे- यह क्या हुआ, वे मेहमान हमारे घर में ठहरे थे। वे तो वही हैं। बैलों के पैरों के निशान भी वही हैं। खोज नहीं भूले। किन्तु बैल वही नहीं हैं। पंचों देखो तो सही। यह भी आश्चर्य ही है।
बाहरू ने पूछा-आप कौन हैं? रावण ने कहा- हम तो जाम्भोजी के शिष्य बिश्नोई पंथ के पथिक साधु पुरुष हैं। पंचों ने कहा- हे भाइयों चोट नहीं मारना। डरकर के दूर रहना। निरपराध साधु पुरुष का कहीं अपमान कर बैठे, तो ये हमें भष्म कर देंगे। इस समय क्या करना चाहिये? ये बैल हमारे हैं या अन्य किसी के? इसका फैसला कौन करेगा? रावण गोयंद तथा बाहरूओं ने विचार किया और सभी लोग बैलों सहित सम्भराथल पर चले आये। जम्भेश्वरजी के दर्शन हुए और बाहरू विनती करते हुए कहने लगे-
हे देवजी! ये बैल किसके हैं? हमारे हैं या किसी और के? किन्तु हम यह लीला समझ नहीं पाये हैं, ये बैल हमारी घर की गाय के जन्मे हैं। हमने ही इन्हें पाल-पोसकर बड़ा किया है, रस्सी भी वही है। सींगों में रस्सी की दी हुई गाँठ भी वही है, सभी कुछ वही है किन्तु बैलों का रंग और सींग वही नही है। अब आप ही फैसला करें।
जम्भेश्वरजी ने कहा-इन बैलों को आप इन कंकेहड़ी वृक्ष की परिक्रमा करवावो। तुम्हारा न्याय हो जायेगा। उन लोगों ने जैसा कहा था वैसा ही किया। कंकेहड़ी वृक्ष की परिक्रमा करवायी। तब जैसे थे वैसे वापिस पलट गये।
श्री देवजी के समीप आने से माया द्वारा निर्मित नकली रूप कैसे स्थिर रह सकता था? श्री देवजी के पास तो असली रूप में प्रगट होना होता है। इस प्रकार से काले रंग से पुनः सफेद रंग में बदल दिया और भीला का पुनः सीधे सींग कर दिया और कृष्ण चरित्र करके रोला- झगड़ा मिटा दिया। सम्भराथल पर जितने आने वाले बाहरू थे, सभी को स्वर्ग प्रदान किया।
रावण गोयंद को श्री देवजी कहने लगे-हे रावण गोयंद! इस बार तो मैंने तुम्हें बचा लिया है। किन्तु अब की बार नहीं बच पाओगे। बार बार नहीं होगा। श्वेत वर्ण से स्याह” सद्गुरु ने सीख दी और कहा-तुमने एक या दो चोरी नहीं की है। तुमने दो सौ अस्सी चोरियाँ की हैं तुमने ऊँट, घोड़ी, घोड़ा चुराये हैं तुमने उनके मालिकों को भयंकर दुःख दाह पैदा किया है। उसका फल तो तुम्हें भोगना ही पड़ेगा। मैं तुम्हारी चोरी का अवगुण बताता हूँ।
एक तो तुमने तुरंग बछेरी चुराई थी। वह पूर्व जन्म में तुम्हारी बहिन थी। तुमने अपनी बहन के थाप की मारी थी। वही बछेरी बन कर बैर लेने के लिए वापिस आयी थी। जब तुमने बछेरी चुराई थी तो तू पकड़ा गया था। तुमने उत्तर दिशा से जाल की लकड़ी तोड़ी थी जब तू भागने लगा था, तब पकड़ा गया और जिस हाथ से थाप की मारी थी, वही हाथ तेरा काट दिया था। यह सहनाण सच्चे हैं तो स्वीकार करले। जिस दिन तेरा हाथ कटा, उसके बाद भी तुमने एक सौ चालीस चौरियाँ की। उससे भी तुम्हें अकल नहीं आयी। जिसका पशु हरण करोगे, जिसको दुःख दोगे, तो तुम्हें दुःख ही मिलेगा।
तुम यह जानते हो कि यह वैर भाव यही समाप्त हो जायेगा। ऐसा नहीं है। वैर तो सदा सदा ही नया होता जाता है। चाहे युग भी बीत जाये तो भी वैर भाव मिटता नहीं है। इस प्रकार से रावण गोयंद ने चोरी छोड़ दी और गुरु की शरण में आये। साधु की संगति हरि की भक्ति संसार सागर से पार उतारने वाली है। यदि किसी को लाभ लेना है तो समय रहते चूके नहीं। हे वील्ह! धन्य ऐसे सतगुरु जिन्होंने चोरों को भी साधु बनाया।
सेख सदो न परचाय गाय छुड़ाई, दंत कथा घणी थ। जाम्भोजी श्री वायक कह-
शब्द-106 ओ३म् सुणरे काजी सुणरे मुल्ला, सुणियो लोग लुगाई।
नर निरहारी एक लवाई, जिन यो राह फुरमाई।
जोर जरब करद जे छाड़ो, तो कलमा नाम खुदाई।
जिनके साश्च सिदक इमान सलामत, जिण यो भिस्त उपाई।
कर्नाटक के राजा शेख सदू को परचा दिखा करके रास्ते पर लाये, वह गऊ हत्यारा था। उसके प्रति शब्द सुनाया-
हे काजी, हे मुल्ला सुनो! तथा अन्य भी स्त्री-पुरुष सभी सुनो। नर रूप में आये हुए निरहारी कैवल्य ब्रह्म ने ही यह सतपंथ बताया है। आप लोग जीवों पर जोर जबरदस्ती से करद चला कर उनकी हत्या करते हो। यह पाप कर्म छोड़ दो, तो तुम्हारा पढा हुआ कलमा खुदा के नाम होगा। तुम्हारे से विपरीत जिस पुरुष के पास सच्चाई ईमानदारी, धर्म सलामत है, वही स्वर्ग को प्राप्त कर सकेगा।