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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह25 / 94

तीसरा अध्याय · कथा 25

शोभाराम के प्रति शब्दोपदेश

वील्होजी उवाचः- हे गुरुदेव! सम्भराथल पर आसीन होकर श्री देवजी ने क्या-क्या कार्य किये? किन-किन लोगों को उपदेश दिये? यदि आप कहने में समर्थ हो और कथन करने योग्य कोई वार्ता हो तो अवश्य ही कहिये। भगवान् की लीला श्रवण करने से भगवान् के प्रति भक्ति का भाव उदय होता है। भक्ति से बढ़कर अन्य कुछ भी प्राप्त करने योग्य नहीं है।

नाथोजी उवाचः- हे शिष्य! भगवान् ने सम्भराथल पर विराजमान होकर अनेकानेक पापी एवं मूर्खजनों का उद्धार किया। उनमें से कुछ जनों के बारे में मैं तुम्हें बतलाऊंँगा, ध्यानपूर्वक श्रवण करो।

जब बिश्नोई पंथ की स्थापना हो चुकी थी, किन्तु इतना प्रचार-प्रसार अब तक नहीं हो पाया था। उस समय की बात है एक बिश्नोई कार्यवश केलणसर गाँव पहुँचा। रात्रि में विश्राम एवं भोजन हेतु वह शोभाराम सारण (जाट) के घर पर पहुँच गया। जिस समय वह बिश्नोई शोभाराम के घर पहुँचा, तो वह घर पर नहीं था। बिश्नोई ने जाकर बाहर झोंपड़े में आसन लगा लिया।

घर के अन्दर से शोभाराम की पत्नी आयी। उसने देखा कि घर में कोई अतिथि आया है। इसे भोजन पानी के लिए पूछना चाहिये। घर में आया हुआ तिथि तो देवता सदृश होता है। यदि उसको जल-अन्न एवं मधुर वचनों से संतुष्ट नहीं किया जावे, तो वह घर को जला देता है। घर की लक्ष्मी चली जाती है।

शोभा की नारी बोली- हे अतिथि! इस समय आप जल लो। संध्यादिक अपने नित्यकर्म से निवृत्त हो जाओ और थूली (दलिया) खिचड़ी तैयार है, खालो। मैं अभी लाकर देती हूँ।

बिश्नोई ने कहा-अशुद्ध वचन मत बोलो। यह जो तुमने कहा कि खालो, यह अशुद्ध वचन है। जैसा तुम्हारा वचन अशुद्ध है, वैसा ही तुम्हारा पकाया हुआ अन्न एवं जल है। मैं ग्रहण नहीं करूँगा। जैसा पीवै पाणी वैसी बौले वाणी।

यदि तुम्हें भोजन करवाना है, तो तुम ऐसा करो कि एक तो तुम मुझे डोरी-रस्सी तथा तांबे का घड़ा- बाल्टी दे दो। मैं कुएँ से जल स्वय ले आऊँगा तथा सूखा आटा दे दो। रसोई अपने हाथ से बनाऊँगा। अशुद्ध भोजन मैं नहीं करता। जब बिश्नोई अपनी बात कह रहा था, तभी शोभा भी आ गया और अपनी धर्मपत्नी से वार्ता सुनी तो कहने लगा-

हे भाई! तुम कौन हो? जो मेरे आगे चतुराई करते हो? मुझ से अधिक यहाँ पर शुद्ध-पवित्र कौन होगा? यदि खाना है तो दलिया खा ले जो पका रखा है, नहीं तो किसी और के घर चला जा। तब बिश्नोई कहने लगा-तू भी अशुद्ध जाटणी जैसा ही है। शोभा कहने लगा- मैं तो अशुद्ध ही हूँ, किन्तु तू शुद्ध कहाँ से आया? तू कोई ब्राह्मण प्रणधारी है क्या? जो काशी से चारों वेद पढ़कर आया। देखने में तो मेरे जैसा अनपढ़ ही दिखता है।

बिश्नोई बोला- हे शोभा! हम तो गुरु धर्म को मानते हैं। ब्राह्मण, जाट आदि हमारे लिए तो सभी समान ही हैं। यदि काशी से चारों वेद पढ़कर आया हुआ पण्डित भी आचार-विचार हीन है, तो हमारे लिए आचारहीन जाट जैसा ही है।

शोभा बोला- मैं देखता हूँ कि किस मोडे-साधु ने भरमाया है। इसलिए मेरे सामने आचार-विचार की बात करता है। मैं उस मोडिये को भी देख लूँगा कि कैसे लोगों को भ्रमित करता है। मेरे यहाँ तो सभी लोग आकर हाथ फैलाते हैं। बड़े-बड़े राजा, ब्राह्मण, क्षत्रिय, सेठ, सूफी, चारों वर्णों के लोग हमसे ही प्राप्त करते हैं। अब तक किसी ने भी मुझे आचार-विहीन नहीं कहा। किन्तु यह मोडा हमको नीच बताता है। मेरी निन्दा करता है। देखने में यह अर्द्धसाधु मालूम पड़ता है। पूर्ण यदि होता तो ऐसी बात नहीं करता।

बिश्नोई कहने लगा-हे भाई! क्यों व्यर्थ की बकवास करते हो। यह शब्द की लड़ाई लड़ने से कुछ भी नहीं मिलेगा। यदि कुछ सेवा करनी है, सुभ्यागत के महत्व को जानता है, तो मुझह्य जल लाने हेतु शुद्ध बर्तन दो और आटा दे दो। मैं भोजन बनाकर भोजन कर लूँ।

जाट कहने लगा- भावैं तो दलियों उठ खावहूँ, निं तो और घरां उठ जावहूँ। बिश्नोई उठकर बाहर जाने लगा। शोभा ने रोका इस प्रकार से जाओ मत। यहीं ठहरो। जो तुम्हें चाहिये सोई मिलेगा। इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। तुम्हारे गुरु ने तुम्हें सिखाया है। मैं उन्हीं से जाकर झगड़ा करूँगा। उन्हीं से जाकर पूछूँगा।

बिश्नोई को डोरी दी, तांबेड़ा दिया, कुण्ड से जल भरकर के ले आया। सूखा आटा ही लिया। गऊ बैठक में जाकर भूमि को शुद्ध करके चूल्हा बना करके, बर्तन साफ करके रसोई बनाई। रूखा-सूखा भोजन किया। गो ग्रास निकालकर गो को दिया। भगवान् के अर्पण करके भोजन को अमृत तुल्य मानकरके किया। शोभा ने देखा और कहा-

मैंने बड़े-बड़े यति, ब्राह्मण, साधु संन्यासी देखे हैं, किन्तु ऐसा पाखण्ड नहीं देखा। रात्रि को बैठकर जप करते हुए और सहजे सोवण पोहका जागण, प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान ध्यान करके बिश्नोई रवाना होने लगा और कहने लगा भाई! मेरे पर कृपा रखना। मैंने आपको कष्ट दिया, उसके लिए क्षमा करना। अब मुझे आगे का रास्ता बतला दो।

शोभा कहने लगा-मैं तुम्हारे साथ ही चलूँगा। तुम्हारे गुरु से जाकर बहुत ही झगड़ा करूँगा। ऐसा कहते हुए शोभा साथ में ही चल पड़ा। सम्भराथल पर जम्भेश्वर जी के दर्शन किये। शोभा ने देखा कि जम्भेश्वर जी संत सभा में विराजमान हैं। शोभाराम ने आकर इस प्रकार से कहा-

हे सतगुरु! हमें बतलाओ! कि आप क्यों लोगों को भ्रमित करते हैं? पाखण्ड क्यों सिखलाते हैं? इस समय तो आप स्वतंत्र हो, किन्तु जन्म दुबारा भी तो लेना पड़ेगा। उस जन्म में इस जन्म के किए हुए कर्म- फल दुःख भोगना पड़ेगा। इस प्रकार से पाखण्ड करोगे तो संसार सागर से पार नहीं उतर सकोगे, नरक में दुःख भोगना पड़ेगा।

जाम्भाजी ने कहा-हे शोभा! धर्म कीजिये! धर्म करने हेतु ही यह मानव शरीर मिला है। तू मेरी चिन्ता छोड़। अपनी चिन्ता कर! तू कहाँ जा रहा है? धर्म से बहुत ही दूर जा रहा है। शोभा बोला- धर्म क्या होता है? मैं दान-पुण्य बहुत ही करता हूँ। यही तो धर्म होगा। आप हमें क्या समझाओगे? मैं तो पहले से ही ज्ञानी हूँ। हम लोग दान पुण्य बहुत ही करते हैं। किन्तु किसको करें। यह जानना आवश्यक नहीं है।

हम लोग तो भोपा-भरड़ा, देवी-देवता के निमित्त दान बहुत देते हैं। हम लोग जप भी करते हैं। देवी देवताओं का नाम जपते हैं। पूजा-पाठ भैरू, देवी, भूत-प्रेतादिक की करते हैं। यदि आप परमेश्वर के जाप की बात कहें, तो कोई आवश्यक नहीं है। जो परमेश्वर का जप करता है, वह भी ऐसा ही है और जो नहीं करता है वह भी ऐसा ही है। करने वाले या न करने वाले में कुछ भी फर्क नहीं है। परमेश्वर का ही जप क्यों करे? वह कुछ देता हुआ तो दिखता नहीं है। जम्भेश्वरजी कहने लगे-हे मूढ़ (जड़) जाट! मेरी बात सुना मैं तेरे को भेद बताऊँगा। विष्णु परमेश्वर का जप करने से क्या फल है और भूत प्रेत आदि का जप करने से क्या फल है? ऐसा कहते हुए शब्द सुनाया-

शब्द-13 ओ३म्-कांय रे मुरखा तैं जन्म गुमायों। भुंय भारी ले भारूं।।

जा दिन तेरे होम नै जापनै तपनै किरिया, गुरु न चीन्हो पंथ न पायो।

अहल गई जमवारूं। ताती बेला ताव न जाग्यों, ठाढी बेला ठारूं।

बिंबै बैला विष्णु न जंप्यो, तातें बहुत भई कसवारूं।।

अहनिश आव घटंती जावै, तेरे श्वास सबी कसवारूं।

जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ते नर कुबरण कालूं।

जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो,ते नगरे कीर कहारूं।

जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ते कांध सहे दुःख भारूं।

जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो,ते घणतण करे अहारूं।

जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ताको लोही मांस विकारूं।

जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो,गावै गाडर सहरे सूवर जन्म 2 अवतारूं।

जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ओडा के घर पोहण होयसी पीठ सहे दुःख भारूं।

जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो,राने वासो मोनी वैसे ढ़ूके सूर सवारूं

जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ते अचल उठावत भारूं।

जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो,ते न उतरिबा पारूं।

जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ते नर दौरे घुप अंधारूं।

तांते तंत न मंत न जड़ी न बूंटी, ऊंडी पड़ी पहारूं।

विष्णु न दोष किसो रे प्राणी,तेरी करणी का उपकारूं।

मूरख कह देवजी! थार पोथी पतड़ो दीस नहीं थारो वेद कहो वेद को भेद कहो- जाम्भोजी श्रीवायक कहे-

शब्द-14 ओम्मअमोरा उपख्यान वेदूं, कणतत भेदूं, शास्त्रे पुस्तके

लिखणा न जाई। मेरा शब्द खोजो, ज्यूं शब्दे शब्द समाई।

हिरणा दोह क्यूं हिरण हतीलूं,कृष्ण चरित्र बिन क्यूं बाघ बिडारत गाई।

सुनही सुनहां का जाया, मुरदा बघेरी बघेरा न होयबा।

कृष्ण चरित्र बिन सीचाण कबही न सुजीऊ।

खर का शब्द न मधुरी वाणी,कृष्ण चरित्र बिन श्वान न कबही गहीरूं।

मुंडी का जाया मुंडा न होयबा,कृष्ण चरित बिन रीछा कबही न सुजीऊं।

बिल्ली की इन्द्री संतोष न होयबा, कृष्ण चरित्र बिन काफ रा न होयबा लीलूं।

मुरगी का जाया मोरा न होयबा,कृष्ण चरित्र बिन भाकला न होयबा चीरूं।

दंत बिवाई जन्म न आई,कृष्ण चरित्र बिन लोहे पड़े न काठ की सूलूं।

नींबड़िये नारेल न होयबा,कृष्ण चरित्र बिन छिलरे न होयबा हीरूं।

तूंबण नागर बेल न होयबा, कृष्ण चरित्र बिन बांवली न केली केलूं।

गऊ का जाया खगा न होयबा, कृष्ण चरित्र बिन दया न पालत भीलूं।

सूरी का जाया हस्ती न होयबा, कृष्ण चरित्र बिन ओछा कबहीं न पूरूं।

कागण का जाया कोकला न होयबा, कृष्ण चरित्र बिन बुगली न जनिबा हंसू।

ज्ञानी के हृदय प्रमोद आवत अज्ञानी लागत डासूँ।

मुरख कहे म्हे तो भोपा नु भरड़ा नु सांसी कंजर, डूम कलावंत ने घणो ही खवावां था। जाम्भोजी श्रीवायक कहे-

शब्द-15 ओ३म्म सुरमां लेणा झीणा शब्दूं, म्हे भूल न भाख्या थूलूं।

सो पति बिरखा सींच प्राणी,जिहिं का मींठा मूल समूलूं।

पाते भूला मूल न खोजो, सींचो कांय कुमूलूं।

विष्णु विष्णु भण अजर जरीजे,यह जीवन का मूलूं।

खोज प्राणी ऐसा बिनाणी, केवल ज्ञानी, ज्ञान गहीरूं।

जिंहि के गुणैं न लाभत छेहूँ।

गुरु गेवर गरबा शीतल नीरूं, मेवा ही अति मेऊं।

हिरदे मुक्ता कमल संतोषी, टेवा ही अति टेऊं।

चड़कर बोहिता भवजल पार लंघावै, सो गुरु खेवट खेवा खेहूँ।

मुरेख पूछ्या, जाम्भाजी कह्या-जमाती सुण्या।

एक पुरबिया कह-जाम्भाजी! छत्री र्तया, ऋषि तापस र्तया, वैस तरया, शूद्र र्तया, सु.यां नहीं। जाम्भोजी कह-जाति कुल कारण को नहीं, र्तया करणी सूं, भजन सूं र्तया, जाम्भोजी श्री वायक कह-

मूर्ख ने पूछा-जाम्भोजी ने जवाब दिया और जमात ने सुना-एक पूर्व देश का व्यक्ति कहने लगा- जाम्भाजी! क्षत्रिय तपस्या ज्ञान द्वारा पार उतर गये। ऋषि तपस्वी संसार सागर से पार उतरे हैं। वैश्य भी पार उतर सकते हैं किन्तु शूद्र संसार सागर से पार उतर जाये, यह तो सुना नहीं। जाम्भोजी ने कहा-ज्ञान, तपस्या, भक्ति करने में जाति कुल कारण नहीं है। जो शुभ कर्म करेगा, वही तिरेगा। शूद्र क्रिया से पार तिरेगा, भगवान् का भजन करने से पार उतरेगा। इस प्रकार कहते हुए जाम्भोजी ने शब्द सुनाया-

शब्द-16 ओ३म् लोहे हूँता कंचन घड़ियो, घड़ियो ठाम सुठाऊं।

जाटा हूँता पात करी लूँ,यह कृष्ण चरित परिवाणों।

बेड़ी काठ संजोगे मिलिया,खेवट खेवा खेहूँ।

लोहा नीर किसी विध तरिबा, उत्तम संग सनेहूँ।

बिन किरिया रथ वैसेंला, ज्यूं काठ संगीणीं लोहा नीर तरीलूँ।

नांगड़ भांगड़ भूला महियल, जीव हते मड़ खाईलो।

शब्द भावार्थ- जाम्भोजी ने बतलाया कि लोहे को मैंने कंचन बनाया है। ये अज्ञानी पुरुष लोहे जैसे ही थे, मैंने उन्हें ज्ञान की अग्नि में तपाकर सोना बना दिया है तथा सोने का आभूषण भी बनाया है। ये मानवता के भूषण बन गये हैं।

संगति से सभी कुछ सम्भव है। यह सभी कुछ कृष्ण चरित्र से ही संभव हुआ है। जिस प्रकार से लकड़ी का संयोग होने से लोहा भी जल से पार उतर जाता है। लकड़ी की नाव पर रखा हुआ लोहा जल में नहीं डूबता। उसी प्रकार से गुरुदेव कहते हैं कि मेरी संगति करने से ये लोग शुद्ध (पवित्र) हो गये हैं।

केवल ज्ञान सुनने मात्र से भी कुछ नहीं होता। वह तो स्वप्न सदृश ही होता है। ज्ञान को क्रिया में लाने से ही ये लोग उत्तम हो गये हैं। बिना क्रिया रथ बैठ जायेगा। आप लोग ज्ञानरूपी नौका में बैठ जाईये। बाकी तो गुरुदेव कहते हैं, मैं केवट रूप में तुम्हें पार ले जाऊँगा।

ये कुछ लोग नंगे रहने वाले, भांग खाने पीने वाले, क्या जाने कि ज्ञान क्या होता है\ कुछ राजा लोग भी अहंकार में भूले हुए हैं। जीवों को मारकर मुरदा खाते हैं। उनके पास सत्संगति कहाँ है।

जाट परच पाय लागौ, पाछेला पापां की पछतावों करण लागौ। सतगुरु की वाचा पूरी हुई। इस प्रकार से शोभाराम ने शब्द सुने। उनके हृदय की भ्रान्ति मिट गयी। सतगुरु के चरणों में प्रणाम किया। बिश्नोई बनने हेतु सतगुरु से पाहल लेकर सारण गोत्र का बिश्नोई बना। इस प्रकार से बिश्नोई पन्थ उत्तरोतर वृद्धि को प्राप्त होता रहा-