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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह31 / 94

तीसरा अध्याय · कथा 31

सिकन्दर शील हकीकत जाग्यो

वील्होजी उवाचः-हे गुरुदेव! मैंने सुना है कि श्री जम्भदेवजी ने दिल्ली के बादशाह सिकंदर लोदी को शील एवं हक की कमाई का उपदेश दिया था। उसे शुद्ध पवित्र बना दिया था। वह किस प्रकार से? कृपा करके बतलाने का कष्ट करें।

नाथोजी उवाचः-हे शिष्य! एक समय गंगा पार के बिश्नोइयों की जमात सम्भराथल पर श्रीदेवजी के दर्शनार्थ आ रही थी। चलते-चलते उन्होंने अपना आसन यमुना के किनारे दिल्ली में लगाया। वहाँ पर जमात के लोगो ने प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में पवित्र यमुना में स्नान किया और सूर्योदय की वेला में हवन करने हेतु बैठै थे।

सभी ने मिलकर सस्वर शब्दों का उच्चारण किया। जिसकी मधुर ध्वनि दिल्लीवासियों ने सुनी। वेद वाणी सदृश कर्णप्रिय ध्वनि को श्रवण करके दिल्ली के लोग स्वतः ही खिंचते चले आये। दिल्ली निवासियों ने यह प्रथम बार ही सुना था। उन श्रोताओं में हासम और कासम नाम के दो दर्जी भी थे। जो बादशाह के कपड़े सीलने वाले थे। वे भी चले आये। बड़े ही प्रेमभाव व ध्यान से उन्होंने ध्वनि श्रवण की। जब हवन पूर्ण हो गया, तब उन्होंने पूछा-

हे महात्माओं! आप लोग कहाँ से आये और कहाँ को जा रहे हो? आपकी वाणी बहुत ही सुमधुर है। हम भी आपकी तरह ही गाना चाहते हैं तथा हवन ज्योति का दर्शन चाहते हैं। कृपा करके बतलाओ। इसके लिए हमें क्या करना होगा?

जमात के लोगों ने बतलाया- हम लोग गंगापार से आये हैं और आगे बागड़ देश सम्भराथल पर जहाँ साक्षात् विष्णु ने ही अवतार लिया है, वहाँ पर दर्शन, स्पर्श एवं शब्द श्रवणार्थ जा रहे हैं। वहीं पर जीयां ने युक्ति मुवां ने मुक्ति की प्राप्ति होती है। हासम-कासम ने कहाँ-यदि ऐसी बात हैं तो हम भी आपके साथ चलेंगे। किन्तु हम तो मुसलमान हैं। आपके अवतारी विष्णु हिन्दुओं के देवता हैं। हमें भी आपकी तरह अपनायेंगे क्या?

बिश्नोइयों ने कहा-उनके यहाँ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं है। जो उनके नियमों पर चलता है, वही उनको प्रिय है। जाति-पाति, छोटे-बड़े का भेदभाव नहीं है। आप लोग हमारे साथ चलें। श्रीदेवजी का दर्शन करके जीवन का लाभ उठायें। ऐसा कहते हुए हासम कासम ने भी उन जमात के साथ बागड़ देश के लिए प्रस्थान किया।

कुछ दिनों के पश्चात् सम्भराथल पर पहुँचे और श्रीदेवजी के दर्शन किये। जैसा जमाती लोगों ने बखान किया था, वैसा ही हासम कासम ने अपनी आँखों से देखा। श्री देवजी से उपदेश लेकर कुछ दिनों पश्चात् हासम-कासम मण्डली के साथ वापिस दिल्ली लौट आये और अपना कार्य प्रारम्भ कर दिया। रोजी रोटी हेतु कपड़े सिलते और विष्णु का जप करते। उनतीस नियमों का पालन भली-भांति करते। धीरे-धीरे यह बात बादशाह के पास पहुँच गयी। किसी व्यक्ति ने बादशाह के पास जाकर बतलाया कि तुम्हारे राज्य में दो दर्जी हिन्दुओं की जमात की संगति से काफिर हो गये। उन्हें दण्डित करना चाहिये। अन्यथा देखादेखी अन्य लोग भी बिगड़ जायेंगे। समय रहते यदि बीमारी का ईलाज न किया जावे तो फिर काबू में आना मुश्किल है।

सिकन्दर बादशाह ने आदेश दिया कि उन दोनों को मेरे सामने राजदरबार में हाजिर किया जावे। मैं स्वयं उन्हें देखूँगा। किस प्रकार से इन्होंने धर्म परिवर्तन कर लिया है? हासम-कासम को सिकन्दर के सामने दूसरे दिन हाजिर किया गया।

बादशाह ने पूछा-आप कैसे धर्म परिवर्तन करके विधर्मी हो गये हो? हासम-कासम ने बतलाया-हे राजन्! हम तो विधर्मी नहीं हुए हैं, किन्तु असलियत में तो धर्मी ही अभी हुए हैं। अब तक तो केवल धर्म का बाह्य रूप ही पकड़े हुए थे। अभी हमने धर्म के तत्त्व को जाना है। मानव मात्र के लिए कोई धर्म भिन्न नहीं होता। मानवता का तो हे राजन्! एक ही धर्म होता है। यही धर्म हमने अपनाया है।

इसी धर्म को ग्रहण करने के लिए हम लोग बागड़ देश सम्भराथल गये थे। वहाँ पर तो साक्षात् ईश्वर (अल्ला) ही विराजमान हैं। अच्छा हुआ जमाती लोगों की संगति से हमें भी परम लाभ हुआ है। हे बादशाह! यदि आप भी अपना भला चाहते हैं, तो केवल ईश्वर की ही शरण ग्रहण करो। वह ईश्वर-अल्ला दो हो ही नहीं सकते। एक ही है। हमें भी पहले भ्रम था। किन्तु वहाँ पर जाने से हमारा भ्रमः स्वतः ही मिट गया। उनकी ओजस्वी, ज्ञानभरी वाणी में ही कुछ ऐसा जादू है, जो तुरंत परिवर्तन कर देती है। उनका दर्शन तो सूर्य सदृश तेजस्वी हैं, जो हमारे पापों को जला डालता है।

हासम-कासम द्वारा ऐसी वार्ता श्रवण करके बादशाह ने आदेश दिया कि इन दोनों को काल कोठरी (जेल) में डाल दो। खाने के लिए माँसाहार-गौ माँस डाल दिया जावे। यदि न खायें तो भूखे ही मरने दिया जावे। मैं देखूँगा। इनका गुरु छुड़ाता है कि नहीं। यदि छुड़ाने आयेगा तो दर्शन करूँगा और परीक्षा भी। यदि इन्हें छुड़ाने नहीं आयेगा तो अपने को करुणानिधि कैसे कह सकते हैं? ये अन्दर पड़े हुए मर जायेंगे। अन्य कोई इनके मार्ग का अनुसरण नहीं करेगा। हासम-कासम जेल में पड़े हुए हरि से पुकार करने लगे-हे जगत पालक विष्णु! हमने सम्पूर्ण दुनिया का सहारा छोडकर केवल आपका सहारा लिया है। क्या हम यहाँ इसी तरह ही आपके रहते हुए मर जायेंगे? यदि आपका स्मरण करते हुए मर भी गये तो कोई हानि नहीं है, क्योंकि जो परमात्मा का स्मरण करता हुआ, अन्त समय में प्रस्थान करता है, वह उन्हीं को प्राप्त होता है। यदि आपने हमें मरने नहीं दिया, जीवित बचा लिया तो भी जियेंगे और भगवान् से अनन्य प्रेम जुड़ जायेगा। जियेंगे तो युक्तिपूर्वक, मरेंगे तो मोक्षलाभ। दोनों हाथों में लंÂ है।

इस प्रकार से प्रार्थना करते हुए हासम-कासम काल कोठरी में पड़े हुए भगवान् को धन्यवाद दे रहे थे। उन्होनें कोई शिकायत नहीं की। जिस भी प्रकार से वह रखे, उसी प्रकार से रहने के लिये राजी थे। इस प्रकार से जो भी प्रत्येक परिस्थितियों में रहना स्वीकार करले तो उन्हें किसी भी प्रकार से दुःख नहीं दिया जा सकता। हासम-कासम प्रसन्नचित थे।

बादशाह ने देखा कि इन्हें किसी प्रकार से दुःखित नहीं किया जा सकता। ये तो वास्तव में भक्त हैं। किन्तु इन्हें छोड़ा भी नहीं जा सकता, क्योंकि भगवान् के भक्तों को कष्ट दिया जावे तो भगवान् स्वयं आते हैं। इस निमित्त दर्शनलाभ भी होगा। कुछ वार्तालाप भी होगी। इससे अच्छा अवसर मिलना असंभव ही है। ऐसा विचार करते हुए बादशाह समय की प्रतीक्षा करने लगा।

दीनबन्धु, दीनानाथ, भक्तवत्सल भगवान् ने अपने भक्तों की ध्वनि सुनी और सिकन्दर को सचेत करने के लिए अपने शिष्य रणधीर को साथ लेकर दिल्ली की तरफ रवाना हुए। स्वयं तो अपने सिद्धि बल से स्वयं ही बिना सवारी ही जा सकते थे, किन्तु अपने प्रिय शिष्य को दिल्ली दरबार का दर्शन करवाना था, इसलिए अपने मनसा रूपी ऊँट पर बैठकर चले थे।

दिल्ली राजदरबार में रात्रि के समय आकाश मार्ग से ऊँट उतरा। जिस पर दो सवार थे। जब राजदरबार में ऊँट को बिठाया, तो ऊँट के बोलने की आवाज आयी। बादशाह झट जग गया। देखा कि यहाँ राजदरबार में ऊँट कहाँ से आ गया? क्या किसी ने दरवाजे खोल दिये? जिसने भी यह कृत्य किया है, उसे जीवित नहीं छोड़ूँगा।

बादशाह निद्रा से उठा था। अभी कुछ धुन्धला ही दिख रहा था। भगवान् श्री जाम्भोजी ज्योतिस्वरूप से प्रकाशमान थे। सम्पूर्ण महल में दिव्य प्रकाश फैल गया था। किन्तु जाम्भोजी एवं सिकन्दर के बीच जल की धारा खिंच गयी थी। उन्हें स्पष्ट दिखलाई नहीं दिया कि यह क्या हो रहा है? इतना तेज बादशाह सहन नहीं कर सकता था। इसलिए ही जल की धारा खिंच गयी थी। मंद-मंद ज्योति का दर्शन सिकन्दर ने किया।

सिकन्दर ने पूछा-हे ज्योतिपुरुष! तुम यहाँ कैसे आये? कौन हो, जो मुझे आश्चर्यचकित कर रहे हो? जाम्भोजी ने कहा-मैं इन दोनों साधुओं को छुड़ाने के लिए आया हूँ। मैं कौन हूँ, यह जानना तेरे लिए असंभव है। बड़े-बड़े ज्ञानी,योगी भी जिनके बारे में ठीक से नहीं जान सकते, उनके बारे में तू क्या पूछता है? बादशाह चरणों में गिर पड़ा। दोनों हाथ जोड़कर खड़ा हुआ। प्रार्थना करने लगा-

हे देव! मैं तो अज्ञानी हूँ। राजकाज में उलझा हुआ, मैं आपको कैसे जान सकता हूँ। यदि आप स्वयं ही कृपा करें और बता दें, तो ही मेरे जैसे प्राणी जान सकते हैं। आपने स्वयं ही मेरे महल में आने की कृपा की है। हासम-कासम भी धन्यवादी है, जो आपके शिष्य बने हैं। मैं भी आपके बताए हुए मार्ग पर चलकर अपने जीवन को कृतार्थ करूँगा। हे देव! मुझे कुछ ज्ञान ध्यान का मार्ग बतलाइये। श्री जम्भेश्वरजी ने कहा-

हे बादशाह! यदि तुम्हें जीवन का सुख लाभ प्राप्त करना है तो सर्वप्रथम हासम-कासम को मुक्त कर दे, तू बादशाह है। तेरा प्रथम कर्त्तव्य बनता है कि हक की कमाई पर विश्वास कर। शील व्रत का पालन कर। राजकाज में रहकर भी जनता से जो कर के रूप में लेता है, उसमें तुम्हारा कुछ भी हक नहीं है। जनता का धन जनता की भलाई हेतु खर्च करना तुम्हारा कर्तव्य है।

सिकन्दर बोला-हे देव! यदि कर द्वारा प्राप्त धन में से अपने लिये खर्च नहीं करूँगा तो भूखा मर जाऊँगा। मेरे पास अन्य कोई साधन नहीं है। मैं अन्य कुछ उपाय भी नहीं जानता हूँ।

जम्भेश्वरजी ने कहा-मैं तुम्हें वस्त्र देता हूँ। इस वस्त्र की तुम टोपियाँ बनाकर बेचते रहना। यह वस्त्र अखूट है। इससे जो भी कमाई हो जाये, वही तुम्हारी आजीविका का साधन बनेगी। इस प्रकार से सिकन्दर को उपदेश देकर वहाँ से अन्तर्ध्यान हो गये। आकाश मार्ग से जाते हुए सिकन्दर ने ज्योति ही देखी, सम्पूर्ण महल एवं दिल्ली नगर प्रकाशित हो रहा था।

प्रातःकाल राजदरबार में सिकन्दर आसीन हुआ। अन्य उमराव-मंत्री लोग एकत्रित हुए। सिकन्दर की आँखों से अश्रुधारा बह रही थी। रात्रि की दिव्य घटना को भूल नहीं पा रहा था। आज मंत्रियों ने बादशाह को देखा था, जो पूर्व दिनों की तरह नहीं था।

रणधीरजी के हाथ की छड़ी जो राजमहल में छूट गयी थी, उसे सभी के सामने दिखाते हुए उनसे पूछाक्या आप लोग जानते हैं कि यह छड़ी किस वृक्ष की है तथा किस देश की है? कहाँ से आयी है और कौन लाया है? उस समय उपस्थित जन समूह में से कोई भी नहीं बता सका। सभी आश्चर्यचकित नेत्रों से बादशाह को निहारने लगे।

बादशाह ने कहा-आप लोग मेरी आज्ञा से हासम-कासम को यहाँ पर हाजिर करो। उनकी बेड़ी काट दीजिये। उन्हीं की कृपा से मैं आज कृत-कृत्य हुआ हूँ। हासम-कासम जेलखाने से छूटकर राजा के सामने हाजिर हुए।

बादशाह ने पूछा-हे हासम-कासम! क्या तुम जानते हो कि यह जो मेरे हाथ में छड़ी है, यह कहाँ से आयी है और किसकी है? यदि ठीक से बतला दोगे तो मैं तुम्हें मुक्त कर दूँगा। हासम-कासम बोले-हे राजन्! यह छड़ी तो फोगवृक्ष की है। जहाँ पर श्री जाम्भोजी विराजमान होते हैं। उस बागड़देश में यह वृक्ष बहुतायत से होता है। जब हम बागड़ देश में गये थे, वहाँ पर हमने दर्शन किये हैं। यह तो तुम्हारा सौभाग्य ही है जो तुम्हें इस पवित्र वृक्ष की एक ही टहनी का दर्शन हुआ है। इसको यहाँ तक लाने वाले के दर्शन से भी तुम कृतार्थ हुए हो। हमने भी दिव्य ज्योति का प्रकाश हृदयस्थ किया है। उन्हीं के प्रताप से हे राजन्! हमारी बेड़ियाँ खुल गयी हैं। आप भी अपनी कैद काट डालिये। यह सुनहरा अवसर आपके हाथ से निकल जायेगा। बादशाह ने हासम-कासम को अपना गुरु मान लिया और उन्हें सादर क्षमायाचना करते हुए मुक्त कर दिया। हासम-कासम के सामने गौ माँस रखा था। उस माँस की पुनः जीवित गऊ बन करके जेल से बाहर चली गयी। बादशाह आश्चर्यचकित होकर देखता ही रह गया।

बादशाह नित्यप्रति टोपियाँ सीलता और बाजार में बेचकर अपनी आजीविका चलाता। अपनी कमाई का अन्न लाता और स्वयं पीसता और पकाता। पराया अन्न लेना छोड़ दिया। राजा के इस नियम से तंग आकर बहुत सी रानियाँ तो राजा को छोड़कर चली गयी। एक ही उनके पास में सेवा में रह गयी थी। वह भी इस प्रकार की कठिन सेवा से परेशान हो चुकी थी। एक दिन वह भी अपने पिता के घर चली गयी और कहने लगी-

हे पिताजी! अब मेरे से भी पति के साथ कठोर परिश्रम नहीं होता। मेरे ये कोमल हाथ देखिये! मैंने कभी इन हाथों से कार्य नहीं किया है। किन्तु इस समय मुझे आटा पीसना, भोजन बनाना, बर्तन साफ करना, सफाई करना, कपड़े धोना इत्यादि कितने कार्य करने पड़ते हैं। मैं कार्य करने की कतई आदी नहीं हूँ। मेरे हाथ फट गये हैं। मैं बेहाल हूँ। किसी प्रकार से मेरे पति को समझाइये। अन्यथा मैं उनके पास नहीं रह सकती।

उस बेगम के पिता ने एक रात्रि में बादशाह को मारने के लिए शयनकक्ष में प्रवेश किया। वहाँ देखता है कि बादशाह के तो हाथ पाँव पहले से ही अलग पड़े हैं। ऐसा देखकर वापिस लौट आया और मारने की इच्छा छोड़ दी। उसने प्रातःकाल देखा कि बादशाह तो राजदरबार में उपस्थित हैं। वही बादशाह रात्रि में मर चुका था, किन्तु दिन में जीवित था। क्या जाने भगवान् की लीला को, जो पहले ही मर चुका है। स्वयं के अहंकार को त्याग दिया है, एक की ही शरण में हो चुका है। उसे मारने वाला दुनियां में कोई नहीं है। अपनी बेटी से कहने लगा-

हे बेटी! तूं बादशाह की सेवा कर। यह तो कोई पैगम्बर ही है। जैसा मैंने देखा है वैसा तो कोई साधारण आदमी हो ही नहीं सकता है। वह तो तुम्हारा पति परमेश्वर ही है। तुम तो इनकी सेवा से ही पार हो जाओगी।

बादशाह अपने इष्टदेव जम्भेश्वर की महिमा का बखान करता। हिन्दू और मुसलमान दोनों धर्मों की आलोचना करता था। सभी उमराव चुप रह जाते कोई बादशाह की बात का प्रत्युत्तर नहीं देता था। बादशाह के तो असली रंग चढ़ गया था।

एक समय बादशाह रुग्ण हो गया। उस दिन टोपी नहीं बना सका। हक की कमाई होती तो भोजन करे। बेहक का भोजन नहीं करता था। बादशाह भूखा रहे। प्रजा भोजन करे यह कैसे हो सकता था। सभी मंत्रीगण एकत्रित हुए, उन्होंने कहा-

हे राजन्! आप आज्ञा दो तो आपकी नगरी में जिसके पास हक की कमाई का अन्न है, वहाँ से लाया जाये और आप भोजन करें। बादशाह की आज्ञा पाकर नगरी में खोजा गया। एक बुढ़िया जो सूत कात रही थी, उसके पास जाकर निवेदन किया कि तुम्हारा अन्न हक्क का होगा तो आप राजा को देवे,राजा तुम्हें मुद्रा देंगे और भोजन करेंगे। बुढ़िया ने हक की कमाई का अन्न देना स्वीकार तो किया किन्तु कहने लगी-

जैसा राजा चाहता है वैसा तो अन्न मेरा नहीं है। क्योंकि जिन रुपयों से यह अन्न खरीदा गया है, वे रुपये सूत कात कर बेच कर लायी थी। किन्तु उस दिन मेरे दीपक का तेल समाप्त हो गया था। उसी समय ही पड़ौसी की मसाल जल रही थी। उसके प्रकाश से मैंने सूत काता था। उसी सूत के रुपयों का यह अन्न है, जो मैं दे रही हूँ। आप चाहे तो ले जा सकते हैं। मंत्रियों ने वह बुढ़िया का अन्न लाकर बादशाह को दिया किन्तु बादशाह ने नहीं लिया।

भगवान् नाम का एक ब्राह्मण सिकन्दर के राजदरबार में आया। बादशाह ने पूछा-हिन्दू धर्म बड़ा या मुसलमान? भगवान् ब्राह्मण ने कहा-जो ईश्वर को याद करे और ईमान पर दृढ़ रहे, वही बड़ा है। धर्म कोई छोटा-बड़ा नहीं होता। तब बादशाह ने कहा कि- तुम मुसलमान हो जाओ। जब सभी धर्म बड़े हैं, तो मुसलमान होने मंह्य क्या हर्जा है। ब्राह्मण बोला-यदि मेरे तीन प्रश्नों का उतर मिल जाये, तो मैं हो सकता हूँ। बादशाह ने काजी को बुलाया और कहा-आप इन ब्राह्मण के प्रश्नों का उतर दें और इन्हें मुसलमान बनायें। काजी ब्राह्मण को अपने घर ले गया। उनके प्रश्नों का तो उत्तर नहीं दे सका, किन्तु ब्राह्मण की हत्या कर दी। बादशाह के पास न तो काजी ही लौटकर आया और न ही ब्राह्मण।

एक दिन भगवान् ब्राह्मण का लड़का भागबली सिकन्दर के दरबार में आया और अर्ज करने लगा- हे बादशाह! न तो मेरे पिता ही अब तक लौटकर आये हैं और न ही उन तीन प्रश्नों का उत्तर ही अब तक हमें मिला है। तुम्हारे काजियों ने मेरे पिता की हत्या कर दी है। आप न्यायकारी हैं, हमारा न्याय करें।

बादशाह ने काजियों को बुलाया और भागबली की बात की सच्चाई जाननी चाही। काजियों ने अपनी भूल स्वीकार कर ली। तब बादशाह ने फटकार सुनायी। धर्मविरुद्ध आचरण करने के लिए दण्डित किया।

बादशाह ने कहा-हे भागबली! तुम्हारे पिता की हत्या इन काजियों ने की है। इसका दण्ड तो मैं इनको दूँगा ही, किन्तु तुम्हारे प्रश्नों का जवाब तो अर्न्तयामी श्री जाम्भोजी ही दे सकते हैं। तुम्हें उन्हीं के पास ही जाना होगा। यदि तुम्हें जाम्भोजी पर सहसा विश्वास नहीं हो रहा है तो मैं तुम्हारे साथ अन्य लोगों को भेजूँगा और एक करोड़ रुपयों का दिव्य रत्न सात पर्दों में बंद करके राजकीय मुहर लगा दूँगा।

जाम्भोजी सभी कुछ बिना खोले वस्तु एवं उसका मोल बतला देंगे। तुम्हारे सभी प्रश्नों का उत्तर तुम्हें मिल जायेगा। उसी समय ही सैफन खाँ कजलिये ने भी अपनी शंका दूर करने के लिए जाम्भोजी के पास जाने की इच्छा प्रगट की तथा राजदरबार में एक शाह-सेठ भी अपना न्याय करवाने हेतु उपस्थित हुआ।

शाह कहने लगा-हे बादशाह! मेरे साथ एक बनिया है। उसे मैं आपके पास लेकर आया हूँ। इस बनिये ने मेरे से धन लिया था, किन्तु अब दे नहीं रहा है। आप कृपा करके मेरा धन वापिस दिला दीजिये।

बनिया कहने लगा-हे राजन्! मैंने इससे धन लिया था, किन्तु वह तो तुरंत ही चोर ले गया। मेरे कार्य में आया ही नहीं। मैं कहाँ से इसे धन वापिस लौटाऊँ । मेरे पास तो कानी कौड़ी भी नहीं है। चोर इसका ही धन चुरा ले गया, मैं क्या करूँ, आप ही फैसला कीजिये।

बादशाह ने कहा-आप लोग सभी सम्भराथल ही जाइये। वहीं सभी समस्याओं का समाधान संभव है। ऐसा कहते हुए वह सहू, बनिया, भागबली और सैफन खां सभी मिलकर सम्भराथल चले गय। जाम्भोजी ने बिना ह्य गठड़ी खोले ही रत्न का मोल तथा वस्तु का नाम बतलाया। राजा की मोहर ज्यों की त्यों बनी रही। वह एक करोड़ का रत्न भी निकाल लिया और उसी जगह पर दो करोड़ का दूसरा रत्न एवं नारियल वापिस अन्दर रख दिया।

सभी की शंका का समाधान किया। वे लोग वापिस मोहर लगी हुई पोटली लेकर आये, बादशाह के सामने रखी। बादशाह ने देखा कि हमारी वस्तु तो जाम्भोजी ने भेंटस्वरूप स्वीकार कर ली और हमें आशीर्वाद रूप में दुगुना प्रसाद भेजा है। यह जीवन तो स्वीकार किया है और परलोक भी मेरा बन गया है। इस प्रकार से जम्बूदीप ऐसो चर आयो, इसकन्दर चेतायो, मान्यो शील हकीकत जाग्यो, हक की रोजी ध्यायो। काजी को ज्ञान बताया- काजी ने आकर सिकन्दर को बतलाया कि जैसा आप कहते हैं, वैसा ही आपके पीर पैकेम्बर है। मैंने देखा है कि उनको भूख प्यास, नींद आदि षट्उर्मियाँ नहीं सताती। उनके शरीर में छाया, माया, पाँव के निशान आदि अन्य लोगों की भाँति नहीं हैं। मैंने देखा कि अन्तर्यामी है। दूसरे के मन की बात जानते हैं। उनकी शक्ति का कोई थाघ नहीं है। ये तो सच्चे गुरु हैं। सच्चा पंथ ही बतलाते हैं।

भागबली को भी उत्तर देकर शांत किया है। उन्होनें भागबली को बतलाया था कि जो तुमने पूर्व जन्म में किया था, वही इसी जन्म में प्राप्त कर रहे हो और जो इस जन्म में प्राप्त करोगे, वह विष्णु के नाम जप से अनन्त गुणा बढ़ जायेगा। कर्जा और वैर कभी मिटता नहीं है। आगे से आगे बढ़ता जाता है। तन, मन, वचन, कर्मणा से किसी के प्रति बुरी भावना नहीं करोगे। किसी का अनिष्ट भी नहीं चाहोगे, तो जीवन में युक्तिपूर्वक जीओगे और मरने पर मुक्ति की प्राप्ति होगद्ध।

मन में ईश्वर का नाम और परोपकार करो। वचन सत्य बोले, वह साधु जन भवसागर से पार उतर जाता है। हिन्दू-मुसलमान का ईश्वर-अल्ला तो एक ही है। व्यर्थ के विवाद में पड़कर दोनों ही अपने को बर्बाद न करें। इस प्रकार से सिकन्दर को ज्ञान देकर मुक्ति को पहुँचाया।