तीसरा अध्याय · कथा 23
कथा गूगलिये की
नाथोजी ने अपने प्रिय शिष्य वील्होजी को बिश्नोई पन्थ स्थापना की कथा सुनाते हुए आगे पुनः कहा-हे शिष्य! मैंने जो तुम्हें बापेऊ गाँव की कथा सुनायी थी, उसी गाँव की कुछ विशेष बातें जो कहने से रह गयी हैं, वह तुम्हें बतलाता हूँ-
बापेऊ गाँव के लोगों ने मिलकर विचार किया कि हमें जीवन धारण करना है, तो जाम्भोजी की बात माननी होगी। वे परोपकारी, सुखकारी, त्यागी, संत महापुरुष हैं। हमारे गाँव तक चलकर आये हैं, तो उनकी यह निश्चित ही करुणा की भावना है अन्यथा उन्हें यहाँ क्यों आना होता? इनकी शरण में जाने से हमारे सभी दुःख कट जायेंगे।
कुछ लोग आश्चर्य कर रहे थे। उन्हें झटिति विश्वास नहीं हो रहा था। यह कैसे हो सकता है कि दुनिया को भोजन देगा। यह लोहटजी का बेटा तो भोलाभाला है। इन्हें अब तक पता नहीं है कि दुनिया बहुत बड़ी है। ऐसे ही लोगों को भ्रमित कर रहा है। खास भण्डारी विष्णु बिना क्या कोई सभी को अन्न खिला सकता है। सम्पूर्ण दुनिया अन्न की तरफ देख रही है। पार पड़े तब ही जाने, क्या सत्य है?
सतगुरु ने हंसकर कहा- आप चिन्ता न करें। मेरे पास सभी का पालन पोषणकर्त्ता विष्णु है। जब धरती पर वर्षा हो जायेगी, तो गायें पेट भर घास चरेंगी। बहुत दूध-दही-घी होगा। तथा तुम्हारे खेतों में बाजरी, मोठ, मतीरा, काकड़िया, तिल आदि धान फल फूल होंगे, तब तक मैं आपको दूँगा।
गुरु के वचन सत्य हैं। ऐसा विश्वास मानकर बापेऊ गाँव के लोगों ने गाँव की तरफ से पूरबे को तैयार किया। तुम ऊँट लेकर जाओ तथा ऊँट पर छाटी अढ़ाई मन की लेकर देवजी के साथ ही सम्भराथल पर पहुँच जाओ। इकान्तरे से, एक दिन छोड़कर दूसरे दिन। अढ़ाई मन की छाटी भरकर ले आओ (आज का तोल दो क्विंटल होता है)
पूरबा ऊँट लेकर देवजी के साथ ही सम्भराथल पर पहुँचा। वहाँ उन्होंने बहुत बड़ी अन्न की ढ़ेरी देखी। उसमें से बाजरी की छाटी (बोरी) भर करके पूरबे ने ऊँट पर लादी और वापिस अपने गाँव लौट आया और गाँव के लोगों को बाँटकर दे दिया। बिना तोले नापे पूरा अढ़ाई मन अन्न बराबर बंट गया।
बापेऊ गाँव के लोगों ने पूरबे से पूछा-पूरबा! बतलाओ तुमने क्या देखा? पूरबा बोला-मैं तो यहाँ से चलकर देवजी के पास गया था। वहीं पर मैंने अन्न की बहुत बड़ी ढ़ेरी देखी थी, उसी ढ़ेरी में से मैं छाटी भरकर ले आया हूँ। यह मेरी छाटी लगभग अढ़ाई मन की है, इसको मैंने भर ली। वहाँ से और बहुत सारे लोग ले जा रहे थे। वहाँ पर कोई भी ताकड़ियों से तोल नहीं रहा था और न ही कोई माप था। ऐसा कुछ भी नहीं देखा। वहाँ तो जम्भेश्वर जी के वचनों से ही तुलता है। घर पर लाकर बाँटने से भी पूरा ही बंटता है। अब अन्न आ गया है। गाँव के लोगों की भूख समाप्त हो गयी है। आप लोग चिन्ता मत करो। मैं इकान्तरे एक दिन छोड़कर दूसरे दिन जाऊँगा। इसी प्रकार से छाटी छालकर के ले आऊँगा। सतगुरु ने ढ़िगली (ढ़ेर) बता दी है। कितने भी लोग ले जाये किन्तु कम नहीं पड़ता और समाप्त होने का तो सवाल ही नहीं है। देवजी ने हमारे पर दया की है। जो ऐसे सतगुरु अपने देश गाँव में भेजे हैं जो हमारे तो साक्षात् विष्णु ही है। हे भाईयों! अपने लोगों ने गुरु के वचन स्वीकार किये हैं, उनके पंथ में सम्मिलित हुए हैं। अब तो उनको ही अपनी चिंता है। यदि उस दिन उनके वचन नहीं मानते, तो यहाँ से उठकर चले जाते। हमारी दुर्गति होती। बतलाओ तो सही उनके सिवाय हमारा रक्षक और कौन है?
इस प्रकार से कार्तिक माह व्यतीत होते ही सर्दी का मौसम आ गया। पूरी सर्दी भी जाम्भेजी द्वारा दी हुई बाजरी का भोजन करते हुए व्यतीत कर दी। आगे गर्मी का मौसम आने की तैयारी कर रहा था। ये दो महीने गर्मी के भी व्यतीत हो जायेंगे। अति निकट ही आषाढ़ का महीना आयेगा। भगवान् की कृपा से हमारे देश में भी वर्षा आयेगी। गायों के लिए हरा-हरा चारा होगा। हम लोग भी अपने अपने खेतों में हल चलायेंगे। बहुत ही अन्न उपजेगा।
तब तक खाली बैठे क्या करें? गाँव के लोग एकत्रित हुए और कहने लगे-हे भाइयो! जाम्भोजी महाराज हमें अन्न देकर हमारा भरण-पोषण करते हैं किन्तु अपने को भी खाली नहीं रहना चाहिये। कुछ न कुछ धन्धा अवश्य ही करना चाहिये। आगे श्रावण का महीना आ रहा है। खेती के लिए बीज चाहिये। पास में कुछ रुपये पैसा हो तो गृहस्थ परिवार में काम आते हैं। अपनह्य लोग सिन्ध में अपने अपने ऊँट लेकर चलते हैं। वहाँ से गेहूँ लायेंगे। कुछ अपने कार्य हेतु उपयोग में लेंगे तो कुछ व्यापार करके लाभ कमायेंगे। इस प्रस्ताव का सभी ने अनुमोदन किया।
जिनके पास अपने चार-पाँच ऊँट थे, वे तो लेकर तैयार थे। किन्तु खिलेरी गोत्र के कुछ लोग चिन्ता में पड़ गये क्योंकि घर में तो कुल दो ही ऊँट है। एक तो घर पर घर के कार्य हेतु रहना चाहिये। केवल एक ऊँट लेकर इतनी दूर जाने में कुछ भी लाभ नहीं था। अन्य तो इस समय में कोई भी देने को तैयार नहीं था। कौन देगा? सभी तो अपना-अपना कार्य करना चाहते हैँ।
खिलेरियों ने पूरब से कहा-हे पूरबा! आज तुम देवजी के पास जाओ तो उनसे एक ऊँट माँगकर ले आना साथ ही साथ गेहूँ खरीदने के लिए रुपये भी ले आना। तुम्हें पता ही है हम लोग सिन्ध देश में जा रहे हैं। जिन्होंने प्रदेश जाने से हमको रोका है। अब तक अन्न दिया है। वह एक ऊँट भी दे देंगे।
पूरबे ने सतगुरु के पास जाकर गाँव के लोगों की बात सुनाई और कहा हे देवजी! यदि आप इस समय उनकी माँग पूरी नहीं करोगे, तो ये हमारे लोग बहुत ही ठग हैं। वापिस मुड़ जायेंगे। आपको पीठ दिखा देंगे। इतने दिनों तक आपका अन्न खा-पी कर भी आपकी बात, आपका पंथ छोड़ देंगे। स्वीकार नहीं करेंगे।
हे देव! आपने तो अन्न दिया। उपकार किया, किन्तु यह कार्य हमारा कर दोगे तो हमारा कार्य बन जायेगा। हम सदा-सदा के लिए आपके हो जायेंगे।
देवजी ने कहा-हे पूरबा! आज तो तुम वापिस अपने गाँव चले जाओ। कल वहीं पर ही रहोगे। परसों जब आओगे, तब अपने गाँव से गूगल लेकर आना। पूरबा ने सतगुरु की बात स्वीकार करके अपने घर पर गया और सभी को अन्न बाँटा।
लोगों ने पूछा-पूरबा! देवजी ने क्या कहा? क्या वो ऊँट एवं रूपये देंगे? क्या तुमने पूछा? उन्होंने क्या क्या कहा? सभी समाचार बतलाओ। वे हमें कुछ देगह्य क्या, हमारा कार्य सफल होगा? पूरबा हंसकर कहने लगा-सतगुरु के साथ आपकी वार्ता करने से बड़ी प्रसन्नता हुई है। अब आपका कार्य बन ही गया समझो। उन्होनें गूगल एवं घी मंगवाया है। अब की बार मैं लेकर जाऊँगा। फिर देखते हैं कि क्या होता है। दूसरे दिन पूरबा सतगुरु के पास गया और गूगल घृत सतगुरु के हाथ में दिया।
देवजी सदा वन में ही रहते हैं। हरे वृक्ष की तो टहनी भी नहीं तोड़ते हैं। सूखा वृक्ष वहाँ कोई था ही नहीं। जब से सम्भराथल जंगल में आये हैं, वृक्ष सभी हरे-भरे हो गये हैं। शून्य में हरि ने हाथ फैलाया तो अग्नि आ गयी।
पूरबे ने देखा-सतगुरु ने यज्ञ किया। यज्ञ में गूगल घृत की आहुति प्रदान की। आकाश मार्ग से एक ऊँट आता हुआ पूरबे ने देखा। वह ऊँट सम्भराथल पर आकर बैठ गया था। बैठा-बैठा जुगाली कर रहा था। अन्यत्र अनेकों ऊँट बैठे जुगाली कर रहे थे। ये ऊँट तो ऊँटनी के जन्मे हुए तो नहीं हैं, क्योंकि इनके शरीर से गूगल की महकार आ रही है। यह तो निश्चित ही कृष्ण चरित्र से गूगल का ही ऊँट है। पूरबे ने ऐसी विचित्र लीला देखी और जय जयकार करने लगा।
हे सतगुरु! हम तो आपकी ही शरण में हैं। सतगुरु ने पूरबे को अनेक थलों पर बैठै हुए ऊँट दिखाये और कहा-जो तुम्हें अच्छा लगे, वही पकड़ लो। पूरबे ने उनमें से एक ऊँट जो अति सुन्दर, मजबूत, ताकतवर था, उसे पकड़ लिया। वह ऊँट बड़ा ही गुणी था। ऐसा ऊँट तो अब तक किसी ऊँटनी के जन्मा भी नहीं था। उसका रंग भी गूगल वर्ण का था, आँखें कज्जली थी। चलने में सभी से आगे था। जिस देव ने बिना ही ऊँटनी के ऊँट पैदा किया है, यह तो कोई मानव चरित्र तो हो ही नहीं सकता।
देवजी ने कहा-हे पूरबा! यह ऊँट तू अपने घर लेजा और किसी को कुछ चाहिये वही मिलेगा। पूरबा ने कहा-हे देवजी! हमें ऊँट तो मिल गया, किन्तु अब हमारे पास ऊँट पर काठी-पलाण एवं छाटी नहीं है। वह भी आप ही दे देवें तो अन्यत्र कहीं याचना न करनी पड़े। सतगुरु पूर्ण दाता हैं। सभी कुछ पूरबे को दे दिया। पूरबा लेकर अपने गाँव लौट चला।
चलते समय सतगुरु ने कहा-हे पूरबा! जब तुम्हारा कार्य पूर्ण हो जाये तो इसको वापिस लौटा जाना। इस ऊँट को देखकर मन में लोभ मत करना। यह गूगल से निर्मित है, सदा तुम्हारे पास रहने योग्य नहीं है।
पूरबा अपने गाँव गया। लोगों ने देखा पूरबा सतगुरु से विचित्र ऊँट, छाटी, पिलाण और रुपये भी लेकर आ गया है। लोगों ने कहा-चलो अब तो कार्य हो गया है। ऐसा कहते हुए सिन्ध देश में कणक लाने के लिए सैकड़ों ऊँट लेकर चल पड़े।
हे वील्हा! श्री जम्भेश्वरजी ने अपने लोगों को गूगलिया ऊँट प्रदान किया तब वहाँ से चल पड़े, प्रथम मंजिल पर डेरा लगाया। सांढ़ (ऊँटनी) ऊँट मिलकर कतार चली। एक योजन दूर तक गूगल की महकार आती थी। उन ऊँटों में गूगलिया ही सिरदार था। जहाँ भी जिस गाँव-नगर से गुजरते वहाँ के लोग गूगलिये को देखने आते। वहाँ पर कोई भी हवन नहीं करता था फिर भी गूगलिये ऊँट की महकार उन्हें खींचकर ले आती थी।
गूगलिया गुणवान ऊँट था। दर्शनीय था। उस ऊँट से व्यापार करने चले थे। व्यापार में किसी प्रकार की हानि होने का तो संदेह ही नहीं था। न ही उस ऊँट को कोई चोर ही ले जा सकता था, क्योंकि पास में आने से अंधा हो जाता था। इस प्रकार से वह जमात गूगलिये को लेकर सिंध देश पहुँच गयी। वहाँ पर सूंघे भाव से कणक खरीदी और अपने-अपने ऊँटों पर लाद करके वापिस अपने बागड़ देश के लिए जमात चल पड़ी।
गूगलिया सभी से आगे चलता। उसे मार्ग बताने की भी आवश्यकता नहीं होती थी। स्वयं ही मार्ग पकड़कर बागड़ देश के बापेऊ गाँव में अन्य सभी काफिले को लेकर कुछ ही दिनों में वापिस आ गया। सभी लोगों ने गूगलिये को देखकर आश्चर्य किया। कहने लगे-यह तो स्वयं जाम्भोजी के ही स्वरूप हैं। उनका ही बनाया हुआ गुणवान है। अब इसे चरा पिला करके सम्भराथल पहुँचा दो। उनका वचन पूरा करो। पूरबे नह्य रास निकाल करके सम्भराथल की तरफ गूगलिये को रवाना कर दिया। उस दिन के बाद कभी किसी ने भी गूगलिये को नहीं देखा।
सिन्ध देश से कणक ले आये। वह तो गुरुदेव की कृपा से अखूट ही थी तथा सम्भराथल से लाने का कार्यक्रम ज्यों का त्यों चलता रहा। आषाढ़ का महीना आ गया। भगवान् की कृपा से वर्षा हुई। गऊ आदि पशुओं के लिए भुरट, बेकर, सेवण, गंठिया आदि हरा घास हो गया। लोगों ने अपने अपने खेतों में बाजरी, मोठ, तिल आदि बीज बोये। दो महीने बाद भादवे में अनाज पककर घरों में आना प्रारम्भ हो गया तो भी अढ़ाई मन सम्भराथल से लाते रहे। इन्द्र ने वर्षा करी और हरियाली छा गयी। सभी लोग एकत्रित हुए और कहने लगे-
चलो अब श्री देवजी के पास सम्भराथल चलते हैं। उनसे हमने अन्न-धन आदि सभी कुछ लिया है। उनकी कृपा से यह दुष्काल निवृत्त हुआ है। अब आगे के लिए हमें क्या करना है, जिससे इस प्रकार से पुनः मोहताज न होना पड़े?
सम्भराथल पर गुरुदेव के पास जाकर उन लोगों ने बिश्नोई पंथ के उन्नतीस नियम पालन करने का संकल्प हाथ में जल-पाहल लेकर किया और विधिवत बिश्नोई पंथ में सम्मिलित हुए। युक्ति मुक्ति का मार्ग पकड़ा।
इस प्रकार से बिश्नोई पंथ प्रारम्भ हुआ। यह पन्थ सिद्धांत पर टिका हुआ है। जिसने भी इन सिद्धांत नियमों को अपनाया, वह सत्पंथ का अनुगामी बना। वह चाहे किसी भी देश, जाति का हो। जो भी सुजीव था, उन्हें ही इस पंथ से लगाव हुआ था। बाकी तो पास में ही खड़े देखते रहे।
घट ऊँधे बरसत बहु मेहा, नीर थयो पण ठालूं। घट को उल्टा किये बैठे रहे, वर्षा तो खूब हुई पर घड़ा खाली रह गया। आगे भी यह पंथ उत्तरोत्तर वृद्धि को प्राप्त होता रहा। वह किस प्रकार से? कौन कौन से लोग इस पंथ के सम्पर्क में आये। यह वार्ता आगे उत्तरोत्तर वृद्धि को प्राप्त होती रहेगी।