नवां अध्याय · कथा 62
झाली रानी का जाम्भा सरोवर पर आना
नाथोजी उवाचः- हे शिष्य! जाम्भोलाव की महिमा को चितौड़गढ़ के राणा सांगा एवं उनकी माता झाली रानी ने सुनी। जाम्भोजी से साक्षात्कार तो पूर्व में दोनों कर चुके थे। किन्तु जाम्भा सरोवर का दर्शन स्पर्श करना चाहते थे। उन्हें ज्ञान हुआ कि इस समय श्रीदेवजी तालाब खुदवा रहे हैं। छः महीने से वहीं पर ही हैं, अच्छा अवसर था।
रानी अपने बेटे से कहने लगी-हे बेटा! यदि तुम्हें राजकाज में फुर्सत हो तो एक बार जाम्भोलाव तालाब में स्नान करने की मेरी प्रबल इच्छा है। वहीं पर ही श्री विष्णु जाम्भोजी का दर्शन भी सुलभ हो सकेगा। सांगा कहने लगा-हे माताजी! इस समय मुझे राजकार्य में समय नहीं है। मैं फिर कभी जाऊँगा। आप चली जाइये। मैं आपकी सेवा के लिए कुछ सेवकों को भेज दूँगा। हम राज घराने के लोग हैं हमें वहाँ देवजी के पास खाली हाथ नहीं जाना श्चाहिये। जो तुम उचित समझो, भेंट लेकर अवश्य ही जाओ।
झाली रानी अपने सेवकों के साथ चितौड़ से एक संदूक में जाम्भोजी के लिए दिव्य भेंट लेकर चली थी। सहज रूप से चलते हुए श्रियारी गाँव में तम्बू लगाया। भोजनादिक करने के पश्चात् रानी एवं उनके सेवक सो गये। रात्रि में मेणा लोग जाम्भोजी की भेंट सन्दूक चुरा ले गये। रानी ने जम्भगुरु को याद किया। हे देव! आपको दी जाने वाली भेंट चोर ले गये। यह कैसे हो सकता है? अनधिकारी चोर आपकी भेंट को छू सके। यदि ऐसा हुआ तो आपकी सिद्धि का ष्ठया होगा? वे आठ चोर थे, जो चोरी कर ले गये। जाम्भोजी के प्रकोप के भाजन बने। जाम्भोजी ने उन्हें शिक्षित करने हेतु अंधा कर दिये। पाँच दिन तक अंधे ही रहे। आँखें नहीं खुलीं। तब सचेत हुए और सन्दूक ज्यों की त्यों ले जाकर रानी को सौंप दी, तभी उनकी आँखें खुली।
रानी से उन चोरों ने प्रार्थना की कि हे रानीजी! आप हमें क्षमा करें, हमने जाम्भोजी की करामात देख ली है। आप देवी क्षमा की मूर्ति हैं। हमारी नादानी पर ध्यान नहीं देंगी। अब हमें छुट्टी देवें, पुनः ऐसी भूल नहीं करेंगे।
झाली राणी वहाँ से चलकर सम्भराथल आयी। सम्भराथल पवित्र भूमि का दर्शन किया। तीन रात विश्राम कर वहाँ से झींझाले साथरी का दर्शन किया। वहाँ से चलकर एक रात्रि खींदासर में विश्राम किया। वहाँ पर उदोजी के दर्शन हुए। वहाँ से जैसला तथा भींयासर होते हुए जाम्भोलाव तालाब पर रानी पंहुची।
सतगुरुदेव जाल वृक्ष के नीचे कमलासन पर विराजमान थे। दिव्य प्रेमरूपी भेंट सतगुरु के आगे रखी। हाथ जोड़कर प्रणाम किया। झाली अपने स्वामी साक्षात् विष्णु का दर्शन करके अतिप्रसन्न हुई। जम्भेश्वर की आज्ञा से जाम्भोलाव में स्नान करके अपने को पवित्र किया। तालाब की कुछ दूरी पर तम्बू तनवाये। सांयकाल में संतों को निमंत्रण देकर जागरण करवाया। प्रातः काल श्री जम्भेश्वर जी के कर कमलों से कलश की स्थापना करके पाहल अमृत का पान किया। अनेकों प्रकार के मिष्ठान्न भोजन संत भक्तों को जिमाया, वस्त्र दान दिया।
सौ रुपया की मिट्टी निकलवायी। तालाब के चारों तरफ वस्त्र बिछा करके महोत्सव किया। वही वस्त्र संतों को प्रसाद के रूप में प्रदान किया। इस प्रकार से झाली रानी ने सूत फेराया। वस्त्र दान करके अपने जीवन को सफल किया। इस प्रकार से झाली रानी ने आठ दिनों तक जाम्भोलाव पर निवास किया और श्रीदेवजी से आज्ञा लेकर वापिस प्रस्थान करते समय पूछा-
झाली राणी पूछियो, देव तणे दरबार।
अयोध्या में आनन्द घणा, सुखी किसा करतार।
श्रीदेवजी ने झाली के प्रति शब्द सुनाया-
शब्द-111 ओ३म् खरड़ ओढ़ीजै, तूंबा जीमीजै, सुरहै दुहीजै।
कृत खेत की सींव मलीजै, पीजै ऊंडा नीरूं।
सुरनर देवां बंदी खानै, तित उतरीबा तीरूं।
भोलब भालब टोलम टालम, ज्यूं जाणो त्यूं आणो।
मैं बाचा दई प्रहलादा सूं, सु चेलो गुरु लाजै।
कोड़ तेतीसूं बाड़े दीन्हीं, तिनकी जात पिछाणो।
झाली रानी ने पूछा हे देव! अब आप यहाँ बागड़ देश में कैसे हो? पूर्व जन्म अयोध्या में तो बड़े आनन्द में थे।
श्रीदेवजी ने शब्द सुनाते हुए कहा-यह बागड़ देश तथा यहाँ के लोग एवं समय का प्रभाव ये अपनी विशेषता तो प्रकट करेंगे ही। इस समय तो यहाँ पर खरड़-मोटा ऊ नी-सूती कपड़ा ओढ़ा जाता है। किन्तु अयोध्या में तो ऐसा नहीं था। वहाँ पर तो मखमल के वस्त्र ओढ़े व पहने जाते थे। यहाँ पर भोजन के लिए तूंबा जो कड़वा होता है, वह भी खाया जाता है। किन्तु वहाँ अयोध्या में अमृत भोजन था। यहाँ पर बागड़ देश में सुरह गाय का दूध दूहा जाता है। किन्तु अयोध्या में तो कामधेनु थी। इच्छित दूध देने वाली। यहाँ की गऊ वें अल्प मात्रा में दूध देती हैं। वहाँ त्रेतायुग में तो अयोध्या में हम थे। वहाँ पर तो सम्पूर्ण धरती ही हमारी थी। समुद्र ही सीमा थी। किन्तु यहाँ कलयुग के बागड़ देश में सीमाएँ बहुत ही छोटी हो गयी हैं। अपनी ही खेत की सीमा में ही रहना होता है। पृथ्वी के छोटे छोटे टुकड़े हो गये हैं। भूमि के लिए मर रहे हैं। उस समय रामावतार में ऐसा नहीं था। पीने के जल का अभाव यहाँ पर है। जल मिलना दुर्लभ है। बहुत ही गहराई में खोदेने से जल प्राप्त होता है। वही जल पिया जाता है। किन्तु उस समय राम रूप में हम थे तो जल सर्वत्र सुलभ था। इस समय जल नीचे चला गया है तथा कहीं पर खारा भी हो गया है। उस समय मधुर स्वच्छ जल सुलभ था।
उस समय त्रेतायुग में तेतीस प्रमुख देवता रावण की कैद में बन्द थे। रावण उनसे अपनी इच्छानुसार कार्य लेता था। सूर्य देवता रावण की रसोई पकाता था। अग्नि देवता कपड़े धोता था, पवन देवता बुहारी देता था। ब्रह्मा देवता आटा पीसते थे। रोग बुढ़ापे को रावण ने बाँध रखा था। मृत्यु को कुएँ में डाल रखी थी। उनको मुक्त करवाने के लिए मुझे वनवास हुआ। सीता का हरण हुआ। रावण की मृत्यु हुई। वे लोग पार उतर गये। इसलिए ही लंका में एकत्रित हुए थे। वह राम-रावण युद्ध पार उतारने का किनारा था।
हे झाली! उस समय तो हम भी इसी प्रकार से रहे। अत्यंत सुखी थे। द्वापरयुग में भी गुरु जाम्भोजी कहते हैं कि मैं भोलम भालम टोलम टालम के रूप में आया था। मैंने देखा था कि उस समय मथुरा के लोग गोप- ग्वाल बाल, अत्यंत भोले-भाले सरल जीवन जीने वाले हैं। उनके साथ रहना मुझे अच्छा लगा था। वहाँ पर वृन्दावन में मैंने रास रचाई थी। वह तो अत्यंत ही मोहक थी। ब्रह्म जीव का साक्षात् करने वाला वह दिव्य खेल था। मैंने ऐसे ही समझा था, ऐसे ही वो लोग अधिकारी थे। वैसा ही दिव्य रूप कृष्ण का धारण करके मैं आया था। वहाँ के दिव्य आनन्द का तो आर पार ही नहीं है।
हे रानी! मैंने ये अवतार क्यों लिये? इसमें भी कोई कारण अवश्य ही है। जब सतयुग में हिरण्यकश्यपु को मारने के लिए मैंने नृसिंह रूप धारण किया था। उस समय मैंने हिरण्यकश्यपु को मारा था और प्रह्लाद को वचन दिया था कि तुम्हारे तेतीस करोड़ अनुयायियों का मैं चार युगों में उद्धार करूँगा। इकवीस करोड़ तो तीन युगों में पार पहुँच गये। अब कलयुग में बारह करोड़ अवशिष्ट है उनका उद्धार करने हेतु मैं आया हूँ। यदि प्रह्लाद चेले को दिया हुआ वचन मैं पूरा नहीं करूँगा तो सु चेलो और गुरु दोनों ही लज्जित हो जायेंगे। मैं उन बिछुड़े हुए प्रह्लाद पंथी जीवों की जाति जानता हूँ उस समय के वे जीव इस समय यहाँ बागड़ देश में जन्म लेकर आये हैं। उनके स्वभाव को मैं पहचानता हूँ, उन्हीं जीवों का उद्धार करना मेरा परम कर्तव्य है। वे जीव भी यही बागड़ देश में शरीरों को धारण करके रम रहे हैं। मैं उनको पार पहुँचाऊँ गा। यह मेरी प्रतिज्ञा है। गुरु शिष्य पहले तो प्रतिज्ञा करे, फिर प्रतिज्ञा तोड़ दे, तो दोनों ही लज्जित हो जाते हैं।
हे वील्हा! इस प्रकार से श्रीदेवजी ने झाली रानी को उनके मन की शंका का निवारण करते हुए वहां से विदाई दी। कपिल सरोवर खुदाई का कार्य श्री देवजी ने स्वयं करवाया और वापिस सम्भराथल चले आये। लगातार छः महीने श्रीदेवजी का जाम्भोलाव पर ही विराजमान रहना और ज्ञान,ध्यान, तीर्थ महाक्रश्वय की चर्चा करना ये सभी बातें मैंने तुझे बतलायी है।