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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह56 / 94

नवां अध्याय · कथा 56

धन की असारता के सम्बन्ध में शब्द

एक राजा तब आयकै, ऐसी करी जो बात

अर्थ गर्थ वाहन घणा, सुनिये सतगुड बात

दान पुण्य नीकै करै, सो क्यूं समझे देव।

अब तो सतगुरु दाखबो, जो पावा म्हे ही भेव।

सद्गुरु देव से शब्द श्रवणार्थ न्यात जमात सम्भराथल पर विराजमान थी। हे वील्हा! उसी समय देखा कि एक राजा सम्भराथल पर देवजी के पास आया।

देवजी से कहने लगा-हे सद्गुरु ! मेरी बात भी सुनो। मैं एक राजा हूँ। मेरे पास जो कुछ भी हाथी, घोड़ा, वाहन, सेना, शस्त्र, धन आदि होना चाहिये, वह सभी कुछ मेरे पास है। दान पुण्य भी मैं बहुत ही करता हूँ। दुनिया वाले मुझे जानते हैं। किन्तु आप मुझे नहीं जानते हैं। इतना तो मेरे पास है। अन्य क्या होना चाहिये यह आप बतलावे। श्री जाम्भोजी ने शब्द सुनाया-

शब्द-100 ओ३म् अर्थूं गर्थूं साहण थाटूं, कूड़ा दीठो ना ठाठों।

कूड़ी माया जाल न भूलीरे राजेन्द्र, अलगी रही ओजूं की बाटो।

नव लख दंताला बार करीलो, बार करे कर बंद करीलो।

बंद करे कर दान करीलो, दान करे कर मन फूलीलो।

तंत मंत बीर बेताल करीलो, खायबा खाज अखाजूं।

निरह निरंजन नर निरहारी, तऊ न मिलबा झंझा भाग अभागूं।

हे राजन्! यह धन-दौलत, हाथी, घोड़ा आदि का ठाठ बाट सभी कुछ झूठा है। जो वस्तु स्थायी नहीं है, उसका ठाट बाट कैसा? झूठी माया जाल में भूलना नहीं। इस माया जाल में फंस जाओगे तो सदा के लिए ही फंसे रह जाओगे। कभी बाहर नहीं निकल सकोगे। माया जाल से दूर ही रहना।

सत्य मार्ग का अन्वेषण करो तथा उसी से ही मन को जोड़ो। तुम कहते हो कि मैंने दान बहुत दिया है। यह बतलाओ बहुत कितना होता है? यदि नौ लाख दंताला हाथियों को एकत्रित करके उन्हें बंद करके और सभी का ही दान करो और दान करके मन में प्रफुल्लता लाओ। कि मैंने बहुत किया है। तथा तंत्रमंत्र वीर बेताल आदि की साधना करो। अखाद्य मांसादि का भोजन करते हो तो तुम्हें निरंजन,निराकार, नर निरहारी विष्णु की प्राप्ति तो नहीं हो सकेगी।

परमात्मा की प्राप्ति करना ही मानव तन का मुख्य कर्तव्य है। वह बिना साधना के नहीं मिल सकेगा। कोई कोई विरला मनुष्य होगा जो उसे प्राप्त कर सकेगा। दूसरे तो अभागी ही होगे जो खाली रह जायेंगे।