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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह4 / 94

पहला अध्याय · कथा 4

धर्मराज युधिष्ठिर

वील्हाजी ने पूछा-हे गुरुदेव! आपके द्वारा हमने प्रह्लाद पंथ एवं त्रेतायुग में हरिश्चन्द्र द्वारा स्थापित पंथ की वार्ता श्रवण की। आगे अब हम द्वापर युग में पंथ स्थापना की बातें सुनना चाहते हैं। भगवान् की निर्मल चरित्र गाथाएँ उत्तरोत्तर जिज्ञासा को अपने मुख से अमृतमय वचन सुनाकर शाँत कीजिये?

नाथोजी उवाच-हे शिष्य! मैं जो तुम्हें बतलाता हूँ, ये बाते मैंने सद्गुरु भगवान् जाम्भोजी से साक्षात् श्रवण की थी। वहीं बातें मैं तुझे बतला रहा हूँ। सुनो! द्वापर युग में चन्द्रवंशी राजाओं में महात्मा युधिष्ठिर बहुत ही प्रसिद्ध हुए। ये पाँच भाई पाण्डु के पुत्र थे। इनकी माता यशस्वी देवी कुन्ती थी। सबसे बड़े, युधिष्ठिर, उनसे छोटे भीम, अर्जुन, नकुल एवं सहदेव थे। तीन पुत्र कुन्ती के तथा दो पुत्र माद्री के थे। बचपन में ही इनके पिता का देहान्त हो गया था। माता कुन्ती ने ही पाल-पोष कर बड़ा किया था। इसलिए इन्हें कुन्तीपुत्र भी कहते हैं। जो पालन-पोषण कर, अच्छे संस्कार डाले, वह माँ उनके लिए सर्वस्व ही है।

दूसरे भाई दुर्योधन आदि धृतराष्ट्र के पुत्र थे। गांधारी उनकी माता थी। उनमें दुर्योधन सबसे बड़ा था। अन्य भाई दुःशासन आदि एक सौ थे। भाइयों में राज बँटवारे को लेकर राग-द्वेष होना स्वाभाविक ही था। उनके दादा भीष्मजी ने आधा-आधा राज्य बंटवारा करके दे दिया। वे चाहते थे कि आपस में भाई-भाई में खींचातान न हो, शांति बनी रहे।

क्योंकि धृतराष्ट्र राज्य के अधिकारी थे, किन्तु वे तो अंधे थे। भीष्मजी की आज्ञा एवं सहायता से हस्तिनापुर पर राज्य करते थे। उनका बेटा दुर्योधन बड़ा हो गया। उसे उन्होंने युवराज नियुक्त कर दिया। भीष्मजी ने पाण्डवों का भला चाहते हुए, उन्हें राज्य का कुछ भाग खाण्डव वन दे दिया। वहाँ पर पाण्डवों ने इन्द्रप्रस्थ नगरी बसाई। महात्मा युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हुआ। राजसूय यज्ञ किया। भगवान् कृष्ण जिनके मित्र थे, उनकी कृपा से बहुत सुंदर नगर बसाया था।

एक समय महाराज युधिष्ठिर ने यज्ञ महोत्सव किया। जिसमें सभी राजा, प्रजा, ऋषि, देवता आदि को आमंत्रित किया। साथ ही हस्तिनापुर के शासक भाई दुर्योधन को भी बुलाया। दुर्योधन ने यज्ञ समाप्ति पर नगर की शोभा देखी थी। तो आश्चर्य चकित रह गया। जहाँ जल था। वहाँ थल दिखाई दे रहा था और थल की जगह जल दिखाई दे रहा था। एक जगह तो घूमते हुए जल को थल मानकर पानी में गिर पड़े थे। दुर्योधन तुरंत खड़ा हो गया। सोचा कि किसी ने देख तो नहीं लिया है? किन्तु द्रौपदी तथा भीमसेन ने देख लिया था और दोनों हँस पड़े थे। उनके हँसने का मतलब दुर्योधन समझ गया था। यह हँसी कह रही थी कि अंधे का अंधा जन्मा है। उस समय बोले कुछ भी नहीं, किन्तु उस हँसी ने सब कुछ कह दिया। दुर्योधन आग बबूला हो गया और सीधा वहाँ से चल पड़ा। एक तो दुर्योधन वैसे ही द्वेष से भर गया था, उनकी सौम्यनगरी को देखकर। ऊपर से द्रौपदी तथा भीमसेन की हँसी ने अग्नि में घी का काम किया। वह अपने पिता धृतराष्ट्र के पास जाकर कहने लगा-मुझे आपने क्या दिया है मात्र खण्डहर? पाण्डवों ने कितनी सुन्दर राजधानी बनायी है। उन्होंने कितना सुन्दर यज्ञ महोत्सव किया। क्या ऐसा सुन्दर उत्सव हम नहीं कर सकते? अवश्य ही कर सकते हैं बेटा! ऐसा कहते हुए धृतराष्ट्र ने आज्ञा प्रदान कर दी। दुर्योधन ने पाण्डवों से बदला लेने के लिए यज्ञ महोत्सव प्रारम्भ कर दिया तथा पाण्डवों को निमंत्रण देकर बुला लिया। सरल स्वभाव पाण्डव दुर्योधन की चालाकी, ईर्ष्या को समझ नहीं पाये और हस्तिनापुर पहुँच गये। दुर्योधन ने अपने पिता धृतराष्ट्र से कहा-हे पिताजी! मैंने युधिष्ठिर से कई बार जुआ खेलने के लिए कहा है, किन्तु वह खेलने के लिए तैयार ही नहीं है। यदि आप आज्ञा दें, तो अवश्य ही खेलेगा। तब मेरा कार्य सिद्ध हो जाएगा। आप अवश्य ही आदेश दीजिए। आप की बात को टाल नहीं सकता। बड़ों की आज्ञा मानना अपना धर्म समझता है। वह धर्म भीरू अपना धर्म नहीं छोड़ेगा। आप मेरे पिता हैं, मेरा कार्य अपनाने में सहायक होंगे।

धृतराष्ट्र ने कहा- बेटा युधिष्ठिर! अवश्य ही मनोरंजन कर लो। भाई-भाई आपस में बैठोगे तो प्रेमभाव बढ़ेगा, कटुता मिटेगी। युधिष्ठिर ने अपने ताऊ की बात स्वीकार करके जु1ा खेला और जुए में सब कुछ हार गए। राज गया, पाट गया। अंत में अपनी प्रिया भार्या द्रौपदी को भी दाँव पर लगा दिया। स्वयं हारे हुए जुआरी द्रौपदी को भी हार गये। जुआ तो सभी कुछ समाप्त कर देता है। किन्तु खिलाड़ी जब खेलने बैठ जाते हैं, तो आगे पीछे कुछ भी नहीं सोचते। इसी दोष की वजह से पाण्डव हार गये। उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

द्रौपदी को भरी सभा में दुःशासन ले आया और उसे दासी कहकर के अपमान किया। चीरहरण करने के लिए साड़ी का पल्ला पकड़ कर खींचा गया, उसी समय भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वयं वस्त्र बनकर के द्रौपदी की लाज रखी। वहाँ पर उपस्थित भीष्म, द्रोण आदि कुछ भी नहीं बोल सके। सभी दुर्योधन के वशीभूत हो चुके थे। जिसका कोई रक्षक नहीं है, उसका भगवान् ही रक्षक है।

पाण्डवों को 12 वर्ष का वनवास तथा 13 वाँ वर्ष अज्ञात वास में रहने के लिए मजबूर किया गया। बनवास काल में पाण्डवों ने अधिकतर समय काम्यक वन तथा द्वैतवन में ही व्यतीत किया। यह वन जांगल देश में हस्तिनापुर तथा इन्द्रप्रस्थ से पश्चिम की ओर बताया है। यह वही जांगल देश है, जिसमें जाम्भोजी महाराज ने समराथल पर आसन लगाया था। इस समय का यह जांगलू उस समय जांगल देश के नाम से प्रसिद्ध था। उस समय का काम्यक वन इस समय जाम्भोलाव नाम से प्रसिद्ध है। उस समय का द्वेत वन इस समय दियातरा नाम से कहा जाता है।

उस समय इस वन में बड़े बड़े तालाब जल से भरे रहते थे। घना वन था। इसलिए वर्षा बहुत होती थी। वर्षा होती थी तो घना वन था। इस प्रकार धरती का संतुलन था।

पाण्डवों ने यहाँ जाम्भोलव पर रहकर तपस्या की थी तथा ऋषियों के सहयोग से बड़े-बड़े यज्ञ किए थे। धौम्य ऋषि ने यहाँ का माहात्म्य बतलाया था। इस पुण्यभूमि में यज्ञ करने से तुम्हारा खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त कर सकोगे। पुनः प्रतिष्ठा, शक्ति तथा यश की प्राप्ति कर सकोगे। उन्हीं ऋषियों के आज्ञानुसार ही पाण्डवों ने यहाँ यज्ञ करके अपने को यश-कीर्ति से मण्डित किया। इसलिए तो गुरु जम्भेश्वरजी ने इस भूमि को पवित्र बताया था। यहाँ पर तालाब खुदवाकर तीर्थ प्रकट किया था।

बनवास का अधिकतर समय पाण्डवों ने यहीं व्यतीत किया था। खोई हुई शक्ति पुनः अर्जित की थी। यहीं से अर्जुन दिव्य शस्त्रों की प्राप्ति हेतु इन्द्रलोक तक गया था और दिव्यशस्त्र प्राप्त कर सका था। यहीं पर रहकर जयद्रथ आदि कौरवों को पराजित किया था।

इसी वन में रहकर अनेक ऋषियों से भेंट की तथा उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया था। अनेकानेक राक्षसों का विनाश भी यहीं रहकर के किया था। यहीं से पाण्डव लोग तीर्थ यात्रा में निकले थे। वनवास काल में तीर्थयात्रा अवश्य ही कर लेनी चाहिए। सर्वप्रथम यहीं से ही पुष्कर जाने का वर्णन है। पुष्कर से आगे अन्य तीर्थों में भ्रमण करते हुए गंगा यमुना आदि तीर्थों में स्नान किया और अन्त में गन्धमादन पर्वत पर पहुँचे थे। जहाँ पर भीम की हनुमानजी से भेंट हुई थी। यहीं पर महाभारत का युद्ध होने का संकेत हनुमानजी ने दिया था। भीम के निवेदन करने पर कृष्ण-अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजमान रहने का वचन दिया था। इसलिए कृष्णार्जुन के रथ को कपिध्वज कहा है।

हे वील्ह! मैं तुम्हें वनवास काल की दो घटनाएँ सुनाता हूँ-ये घटनाएँ युधिष्ठिर के धर्म को दृढ़ करती हैं। जब पाण्डव लोग वनवास का समय ऋषियों के साथ व्यतीत कर रहे थे, तब पाण्डवों की प्रसन्नता दुर्योधन से देखी नहीं गयी। ईर्ष्यावश पाण्डवों को दुःख कैसे हो, दिन-रात यही सोचता रहता था। नई-नई योजनाएँ बनाता रहता था, किन्तु सफल नहीं हो पा रहा था।

एक दिन दुर्योधन के राज्य हस्तिनापुर में बड़े तपस्वी,क्रोधी दुर्वासा मुनि अपने 10 हजार शिष्यों को लेकर आ गये। दुर्योधन मुनि आये हैं, ऐसा जानकर अपने कुटुम्ब के सहित आगे बढ़कर दुर्वासा का स्वागत किया तथा भोजन के लिए निवेदन किया। दुर्वासा ने दुर्योधन की अतिथि सेवा से प्रभावित होकर भोजन करना स्वीकार किया तथा अपने शिष्यों सहित प्रेम से भोजन किया।

दुर्वासा जब प्रस्थान करने लगे, तब दुर्योधन ने प्रार्थना करते हुए कहा-हे मुने! आप कुछ दिनों तक मेरे यहाँ ठहरिये? मुझ सेवक को सेवा करने का अवसर प्रदान कीजिये? दुर्वासा भी सेवाभाव जानकर वहीं रुक गये और दुर्योधन की परीक्षा लेने लगे। मुनि दुर्वासा बड़े ही विचित्र स्वभाव के थे। कभी कहते कि मुझे अभी भूख लगी है, तुरंत भोजन चाहिए। जब कभी भोजन तैयार हो, तो कहे कि अब मुझे भूख नहीं है। हर बार दुर्योधन की अतिथि सेवा की परीक्षा लेते, किन्तु दुर्योधन आलस्य त्यागकर दिन-रात सेवा में तल्लीन रहता। अन्त में दुर्वासा दुर्योधन पर बहुत ही प्रसन्न हुए और उन्हें कोई वर माँगने का आदेश दिया।

दुर्योधन ने कहा-हे मुनि! यदि आप मेरी सेवा से प्रसन्न हो तो ऐसा कीजिये.......... कि जिस प्रकार आप दस हजार शिष्यों सहित मेरे अतिथि बने हैं, उसी प्रकार से मेरा बड़ा भाई युधिष्ठिर अपने भाइयों सहित वन में रहता है, आप उनके भी अतिथि बनिये। जब द्रौपदी अन्य सभी को भोजन करा चुकी हो तथा स्वयं भी भोजन कर चुकी हो, तभी आप जाइयेगा। जिस प्रकार से मेरे यहाँ आप समय असमय का विचार किए बिना तृप्त हुए हैं, ठीक उसी प्रकार से मेरे भाई को भी तृप्त कीजिए।

दुर्वासा मुनि ने दुर्योधन की बात को स्वीकार किया और कहा- ऐसा ही होगा। ऐसा कहते हुए वहाँ से चल पड़े। उस समय वहाँ पर उपस्थित दुःशासन, कर्ण, शकुनि आदि ने खुशी मनाई कि अब तो समझो कि अपना कार्य हो ही गया है। मानो कि पाण्डव मुनि के क्रोध से जलकर शीघ्र ही भष्म हो जाएँगे।

जब पाण्डव ऋषियों सहित भोजन कर चुके थे। द्रौपदी स्वयं भी भोजन कर चुकी थी। पाण्डव विश्राम कर रहे थे। ऐसे दोपहर के समय में दुर्वासा अपनी शिष्य मण्डली सहित युधिष्ठिर की कुटिया पर पहुँचे। युधिष्ठिर ने देखा कि मुनि लोग आये हैं। सामने जाकर उनका स्वागत किया। बैठने के लिए आसन दिया। मुनि से पूछा हे मुनि! मुझे ऐसा लगता है कि आप बहुत दूर से चलकर आये हैं। थके हुए मालूम पड़ते हो। पहले थकान मिटाइये। तब तक मैं आपके लिए भोजन बनवाता हूँ। कृपा करके भोजन निमंत्रण अवश्य ही स्वीकार कीजिये।

दुर्वासा कहने लगे-हे धर्मात्मा युधिष्ठिर! आपने ठीक ही कहा है-हम बहुत ही दूर से चलकर आए हैं। भूख भी बड़ी जोर से लगी है, हम सभी आज आपके यहाँ भोजन करेंगे, किन्तु विलम्ब न हो। अति शीघ्र ही भोजन तैयार करवा दीजिये। तब तक हम लोग नदी में स्नान,संध्या आदि नित्यकर्म करके शीघ्र ही आ रहे हैं। ऐसा कहते हुए मुनि लोग स्नान-संध्या के लिए चल पड़े। युधिष्ठिर कुटिया के अन्दर पहुँचे और द्रौपदी से कहने लगे- हे द्रुपद सुता! अभी-अभी दुर्वासा अपने 10 हजार शिष्यों सहित आये हैं, मैंने उनको भोजन का निमंत्रण दे दिया है। अति शीघ्र ही उनके लिए भोजन तैयार करो, अभी जल्दी ही आने वाले हैं।

द्रौपदी ने दुर्वासा का नाम सुना.............. आश्चर्यचकित होकर देखने लगी। आप क्या कह रहे हैं? क्या स्वयं दुर्वासा मुनि आ गये हैं? दस हजार शिष्यों के सहित? आपने भोजन के लिए कह भी दिया है? हे मेरे भगवान्! अब क्या होगा? भोजन कहाँ से बनाऊँ? इस समय तो मेरे पास कुछ भी नहीं है। जब वन से वनफल, शाकपत्ती आयेगी, तभी कुछ बनेगा। तब तक दुर्वासा प्रतीक्षा करेगा नहीं। निमंत्रण दिया हुआ ऋषि, वह भी दुर्वासा? माफ नहीं करेगा। आज तो मुनि के क्रोध की आग में जलकर भस्म हो जायेंगे।

युधिष्ठिर कहने लगे। द्रौपदी क्या सोचती हो? कुछ करो, अन्यथा दुर्वासा की क्रोधरूपी अग्नि से बच नहीं पाओगे। सभी सपने धरे के धरे रह जायेंगे। यह दुर्योधन की ही करामात है। द्रौपदी कहने लगी-इस समय मेरे पास कुछ भी नहीं है, मैं क्या खिलाऊँ? धर्मराज ने कहा-द्रौपदी! वो तुम्हारी सूर्यदेव द्वारा दी हुई बटलोई कहाँ है? उसमें बनाया हुआ भोजन अखूट होता है, उसी में से खिला दे सभी को।

हे नाथ! अब मैं क्या करूँ? मैं भोजन कर चुकी हूँ, यदि मैं भोजन न करती तो अवश्य ही दुर्वासा को मण्डली सहित भोजन करवा सकती थी। किन्तु 1ब क्या हो सकता है? अब तो मरना ही पड़ेगा।

हे द्वारिका के नाथ! श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे, अब तो आप ही हमारे उद्धारक हैं। आपके सिवा और कोई भी हमारे सहायक नहीं हैं। आप ही ने तो कौरवों की भरी सभा में मेरी रक्षा की थी। वही कृष्णा (द्रौपदी) आपकी बहन, मैं पुकार रही हूँ। अतिशीघ्र ही आ जाओ मेरे नाथ! पापी दुर्योधन ने ही तो दुर्वासा को यहाँ पर भेजा है। उसकी करतूत आज सफल हो जाएगी। हम लोग दुर्वासा की क्रोधाग्नि को सहन नहीं कर पायेंगे। इसी प्रकार से द्रौपदी ने भगवान् श्रीकृष्ण को पुकारा तो भगवान् अतिशीघ्र ही प्रकट हुए।

द्रौपदी से कहने लगे-बहिन! तुमने मुझे क्यों बुलाया है? द्रौपदी अपना दुःख रोने लगी.... भगवान् ने कहा- द्रौपदी! इस प्रकार का रोना-धोना छोड़कर पहले मुझे भोजन करवादे, मुझे भूख लगी है, इसके बाद मैं तुझसे बात करूँगा। भाई आया है, किन्तु तुम कैसी बहिन हो जो भोजन पानी कुछ भी नहीं पूछ रही हो?

द्रौपदी कहने लगी- हे कृष्ण! आज न जाने सभी को क्या हो गया, जो भूख ही भूख लग रही है। दुर्वासा को भी, आपको भी। इस भूख की निवृत्ति के लिए ही आपको बुलाया है और आप स्वयं ही अन्न की माँग कर रहे हैं? अब मैं कहाँ से खिलाऊँ? भगवान ने कहा- द्रौपदी! तेरे पास बहुत कुछ है। वह किसी के पास नहीं है। वह तुम्हारी बटलोई कहाँ है? उसमें कुछ होगा। वह लाकर मुझे दे दो। द्रौपदी ने वह बटलोई लाकर भगवान् के हाथों में दे दी और कहा कि देखो! कृष्ण! यह खाली है, इसमें कुछ भी नहीं है, जो तुम भोजन कर सको।

कृष्ण ने अन्दर देखा और एक पत्ता चिपका हुआ हाथ से निकालकर ले आये और द्रौपदी के देखते ही देखते मुख में रख लिया तथा चबाकर निगल गये। स्वयं भगवान् विष्णु सृष्टि के पालन पोषण कर्ता एक पत्ता, जो द्रौपदी के प्रेमरस भीना खाकर डकार ले ली। एक भगवान् के तृप्त होते ही सम्पूर्ण सृष्टि तृप्त हो गयी। दुर्वासा तथा उनके शिष्यों की कितनी सी औकात है? गुरु आप संतोषी अवरा पोखी.......।

बहुत देर हुई, दुर्वासा आये नहीं, ऐसा जानकर युधिष्ठिर ने सहदेव को भेजा कि मुनियों को शीघ्र ही बुला लावो। सहदेव अपने बड़े भाई की आज्ञा मानकरके अतिशीघ्र ही चला और वहाँ जाकर देखा, वहाँ पर न तो दुर्वासा ही है और न ही उनके शिष्य हैं। जिधर से आये थे, उधर ही वापिस जाने के पैरों के निशान दिखाई दे रहे थे।

दुर्वासा अपने शिष्यों सहित बहुत देर तक स्नान करते रहे क्योंकि आज युधिष्ठिर के यहाँ निमंत्रण है। इसलिए देर तक स्नान करोगे तो भूख अच्छी लगेगी, भोजन बहुत ही प्रियकर-रूचिकर लगेगा। दुर्योधन की भाँति पाण्डव भी अनेक प्रकार के स्वादिष्ट, सुपाच्य भोजन बनायेंगे। भूख अच्छी लगेगी तो खूब डटकर खायेंगे।

अधिक देर तक जल में खड़े रहने से सभी के पेट फूल गये, पेट में तो एक ग्रास की भी जगह नहीं बची थी। भोजन की रुचि समाप्त हो गयी थी। अधिक भोजन तो क्या कहें? पेट तो पहले से ही फटने लगा था। भूख नहीं अन्न जीमत कोण।

सभी शिष्य एकत्रित होकर कहने लगे कि इस समय तो भोजन की इच्छा कतई नहीं है। यदि पाण्डवों के यहाँ भोजन करने जायेंगे तो भीमसेन स्वयं तो अधिक भोजी (वृकोदर) हैं ही और दूसरों को भी अपनी रुचि के अनुसार भोजन अधिक ही खिलाता है। हमसे तो एक ग्रास भी नहीं खाया जावेगा। किन्तु अब क्या करें? चलो गुरुजी के पास चलकर निवेदन करते हैं। सभी एकत्रित होकर दुर्वासा के पास पहुँचे और निवेदन किया। हे गुरुदेव! आज तो हम सभी भोजन नहीं करेंगे। न जाने क्या हो गया है? हमारा पेट फटने जा रहा है। एक ग्रास लेने की इच्छा भी नहीं है।

दुर्वासा कहने लगे-यही हालत मेरी भी है। किन्तु युधिष्ठिर महाराज का निमंत्रण है, उसका क्या होगा? भीम रुष्ट हो जाएगा और यहाँ आयेगा, बुलाने के लिए, तब मुश्किल में पड़ जायेंगे। चलो! शीघ्रातिशीघ्र यहाँ से चल पड़ते हैं। ऐसा कहते हुए सभी वहाँ से उल्टी दिशा में प्रस्थान कर गये। जिस पर भगवान् की अनुकम्पा हो जाए, उनका तो बिगड़ा हुआ कार्य ही सुधर जावे, अनहोनी भी होनी हो जावे, यही तो कृष्ण चरित्र है।

हे मेरे जिज्ञासु! अब दूसरी घटना जो पाण्डवों के काल में घटित हुई वह मेरे से श्रवण कर! बारह वर्ष के वनवास का समाप्ति काल था। उसी समय पाँचों पाण्डव, द्रौपदी एवं ऋषियों के साथ एक वन से दूसरे वन में भटक रहे थे। तेरहवें वर्ष, अज्ञातवास को कहीं छुपकर बिताने की चिंता में थे।

उसी समय एक ब्राह्मण-ब्रह्मर्षि भागता हुआ पाण्डवों के पास आया। कहने लगा-आप पाँचों भाई वीर हो। मैं एक भारी विपत्ति में फंस गया हूँ। आप मेरा उद्धार कीजिये? युधिष्ठिर ने कहा-कहिये ऋषिवर! हम आपकी क्या सेवा करें?

उस ऋषि ने कहा-मैं नित्यप्रति यज्ञ करता हूँ। मेरा यज्ञ करने का साधन अरणी एक हरिण सींगों में फंसाकर ले भागा है। वह तो अभी यहीं से होकर गया है। वह देखिये अभी भागा जा रहा है। वह मेरी अरणी वापिस लाकर दीजिये। जिससे मेरा यज्ञकार्य लोप न हो। इस अरणी के द्वारा ही मैं अग्नि प्रकट करके नित्य यज्ञ करता हूँ। मेरा नित्य नियम भंग न हो, ऐसा कार्य आप कीजिए।

पाँचो भाई शस्त्र उठाकर उस हरिण के पीछे चल पड़े। आगे घने वन में जाकर वह हरिण तो लोप हो गया, कहीं दिखाई नहीं दिया। एक वृक्ष की छाया में पाँचों भाई बैठ गये। युधिष्ठिर ने कहा- वह हरिण तो न जाने कहाँ गया, दिखाई नहीं देता। हमें भी बहुत प्यास लगी है। कहीं जल मिल जाये तो पीकर प्यास बुझायें और आगे बढ़ें। धर्मराज ने नकुल से कहा-भइया! पेड़ पर चढ़कर देखो, कहीं जल दिखाई देता है तो जाओ! हमारे लिए जल ले आओ तथा अतिशीघ्र ही लौट आओ। नकुल ने पेड़ पर चढ़कर देखा तो थोड़ी दूर पर हरे भरे घने वृक्ष दिखाई दिये, जो जल होने की सूचना दे रहे थे। सारस, हंस आदि पक्षी उड़ते हुए देखकर नकुल ने कहा-भाई साहब! यहाँ से थोड़ी ही दूरी पर जल अवश्य ही है। मैं अभी जाता हूँ। आपके लिए जल लेकर वापिस आता हूँ। तब तक आप यहीं मेरी प्रतीक्षा कीजिए। ऐसा कहता हुआ नकुल तेजी से चला और शीघ्र ही तालाब पर पँहुचकर निर्मल जल का दर्शन किया।

नकुल को प्यास लगी थी, पहले मैं जल पी लूँ पीछे अपने भाइयों के लिए ले जाऊँ। नकुल ने ज्यों ही जल में प्रवेश किया, त्यों ही वृक्ष के पीछे से आवाज आयी-नकुल! सावधान! पहले मेरे प्रश्नों का जवाब दे। फिर जल पीना। अन्यथा तुम प्राणहीन हो जाओगे। मेरा इस सरोवर पर पहले से ही अधिकार है। नकुल ने कहा-तुम मुझे रोकने वाले कौन हो? मेरे सामने आओ।

नकुल को बड़ी प्यास लगी थी, उस बात की परवाह नहीं की। सोचा, पहले जल पी लूँ, फिर प्रश्नों का जवाब दूँ। ज्यों ही जल पीने को प्रवेश किया, जल को स्पर्श किया, त्यों ही जल से बाहर भूमि पर गिर पड़े, गिरते ही नकुल अचेत हो गये। बहुत देर हो गयी, नकुल लौटकर नहीं आया। युधिष्ठिर ने अपने भाई सहदेव से कहा-भाई! तुम जाओ! अपने भाई नकुल को ले आओ तथा जल भी ले लाओ। अब तक नकुल आया नहीं, क्या बात हुई? अतिशीघ्रता से आना, कहीं अपने भाई नकुल की तरह ही देरी मत कर देना। हम आपकी प्रतीक्षा में हैं।

सहदेव अतिशीघ्रता से जल लेने चला और कहा-मैं अभी गया और अभी लौटकर आया। सहदेव ने जाकर तालाब के जल को देखा और अतिप्रसन्न हुआ, किन्तु अपने भाई नकुल की ऐसी स्थिति देखकर चिंतित भी हुआ। क्या हुआ है इसे जो इस प्रकार से अचेत पड़ा है? किसी शस्त्र के निशान तो हैं नहीं, अच्छा, जो भी होगा, फिर निपट लूँगा। पहले जल तो पी लूँ?

ज्यों ही जल पीने के लिए जल में प्रवेश किया त्यों ही आवाज आयी....... सहदेव सावधान! जलपान नहीं करना? पहले मेरे प्रश्नों का जवाब दो, फिर जल पान करो? अन्यथा तुम्हारी भी वही दशा होगी जो तुम्हारे भाई नकुल की हुई है। सहदेव ने कहा-तुम मुझे रोकने वाले कौन हो? पहले मेरे सामने आओ। मुझे प्यास लगी है। मैं पहले जल पीऊँगा, फिर मैं तुम्हारे प्रश्नों का जवाब दूँगा। सहदेव ने ज्यों ही जल पीने की कोशिश की, त्यों ही अचेत होकर गिर पड़ा।

युधिष्ठिर ने अपने भाई अर्जुन से कहा-हे वीर! तुम्हारे भाई जल लेने के लिए गए थे, किन्तु अब तक लौटकर नहीं आये। तुम जाओ। अपने भाइयों को ले आओ तथा जल भी ले आओ। अपने भाई की आज्ञा शिरोधार्य करके अर्जुन गाण्डीव धनुष लेकर चला। किन्तु वहाँ जाकर क्या देखता है कि उनके दोनों भाई अचेत पड़े हैं। यह कार्य किसने किया? अर्जुन ने धनुष की टंकार की और विचार किया कि पहले जल पी लूँ, फिर उसे देखूँगा, जिसने मेरे भाइयों की यह गति की है।

अर्जुन ज्यों ही जल पीने लगा, त्यों ही आकाशवाणी हुई, हे अर्जुन! ऐसा जल पीने का साहस मत करना। नहीं तो तेरी भी वही गति हो जाएगी, जो तेरे दो भाइयों की हुई है। अर्जुन ने उस वाणी को नजरअंदाज किया तथा जल पीने की कोशिश की। जल पी नहीं सका। वहीं पर अचेत होकर गिर पड़ा।

बहुत देर हो गयी, अब तक लौट कर नहीं आया क्या बात है? अपने भाई को चिंतित देखकर भीम कहने लगा-भाई! अब तो मैं जाता हूँ। अपने भाइयों को ले आता हूँ तथा जल भी। भीम बड़े ही गर्व से चला। वहाँ जाकर देखा तो तीनों भाई अचेत पड़े हुए हैं। अपने भाइयों को उठाने की कोशिश की, किन्तु कोई नहीं उठा। इधर कोई व्यक्ति भी नहीं दिखाई देता, इनका किसी के साथ युद्ध हुआ है? ऐसा भी मालूम नहीं पड़ता। अभी पहले मैं जलपान कर लूँ, फिर इन्हीं के बारे में विचार करूँगा। प्यास के मारे बोला भी नहीं जा रहा है। गला सूख गया है। भीम ने ज्योंही जल पीने के लिए तालाब में प्रवेश किया, आवाज आयी.... भीमसेन सावधान! पहले जलपान नहीं करना, मेरे सवालों का जवाब देना है? अन्यथा वही गति तेरी हो जाएगी, जो तुम्हारे 3 भाइयों की हुई है। भीम ने उनके वचनों की परवाह नहीं की। ज्यों ही जल पीने लगा, अभी तो गले में पहुँचा भी नहीं था कि वहीं पर जल के किनारे मूर्च्छित होकर गिर पड़े।

चारों भाई अब तक लौटकर नहीं आये हैं क्या बात है? मैं स्वयं चलूँ। कुछ अनहोनी अवश्य ही हो गयी है। नहीं तो मेरे चारों भाई वीर हैं। उनका कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। युद्ध के मैदान में तो चाहे स्वयं इन्द्र-महादेव ही क्यों न आ जायें, उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। अब तो मैं अकेला रह गया हूँ। मेरे भाइयों के बिना मेरा जीवन व्यर्थ ही है। चलूँ, देखूँ, क्या हो रहा है? ऐसा विचार करते हुए स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर चल पड़े।

धर्मराज ने वहाँ तालाब पर जाकर देखा कि चारों भाई मृतक की भाँति पड़े हुए हैं। ऐसा लगता है कि यहाँ पर भी दुर्योधन पहुँच गया है। हो सकता है, कहीं दुर्योधन ने जल में जहर तो नहीं मिला दिया है? यदि जहरयुफ जल पीते तो इनका रंग नीला पड़ जाता, ये तो अचेत पड़े हुए हैं। शरीर की स्थिति तो ज्यों की त्यों है। इनके शरीर पर घाव भी नहीं हुआ है। अतः युद्ध की तो सम्भावना ही नहीं है।

प्यास बहुत ज्यादा लगी है। पहले जल पीकर प्यास बुझाऊँ। फिर विचार करूँगा कि इन्हें क्या हुआ है? इनका इलाज क्या हो सकता है? युधिष्ठिर ने ज्यों ही जल पीने की कोशिश की त्यों ही पूर्ववत आकाशवाणी हुई......... हे धर्मराज युधिष्ठिर! पहले मेरी बात सुनो? फिर जल पीना! मेरा यह स्वच्छ सरोवर है, इसका जल तुम्हें पीने का कोई अधिकार नहीं है। तुम धर्म की महत्ता जानते हो, इसलिए मैं तुम्हें कह रहा हूँ कि अनधिकार चेष्टा मत करो। यदि करोगे तो तुम्हारी वही गति हो जाएगी, जो तुम्हारे चारों भाइयों की हुई है। पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो, फिर जल पीओ।

धर्मराज बोले, हे बाणी के बोलने वाले! जो तुम कहोगे, वही मैं करूँगा। जो तुम्हारी वस्तु केवल तुम्हारे लिए निश्चित है, उसमें मेरा कोई अधिकार नहीं है। तुम मेरे सामने तो आओ। मैं तुम्हारे से वार्ता करना चाहता हूँ। किन्तु बिना सम्मुख हुए वार्ता कैसे हो सकती है? तुम यह बतालाओ कि तुम मुझसे वार्ता पूछने वाले कौन हो? क्या कोई देवता,राक्षस, गन्धर्व, यक्ष, मानव आदि में से कोई भी हो, जो भी हो, मेरे सामने तो आओ।

उसने कहा-मैं यहीं इन्हीं शृक्षों पर रहने वाला यक्ष हूँ। तुम्हारे भाइयों की दुर्गति भी मेरी वजह से ही हुई है। उन्होंने मेरी बात की अवहेलना की थी। दूसरे के अधिकार की वस्तु पर जबरदस्ती की है।

यक्ष ने प्रकट होकर इस प्रकार से युधिष्ठिर से प्रश्न पूछे। यक्ष ने पूछा- सूर्य को उदित कौन करता है? उसके चारों और कौन चलते हैं? उसे अस्त कौन करता है? और वह किसमें प्रतिष्ठित है?

युधिष्ठिर बोले- ब्रह्म सूर्य को उदित करता है। देवता उसके चारों ओर चलते हैं। धर्म उसे अस्त करता है और वह सत्य में प्रतिष्ठित है। इत्यादि अनेकों प्रश्न यक्ष ने पूछे और इनका समुचित उत्तर युधिष्ठिर ने दिया।

युधिष्ठिर के उत्तर ज्ञानवर्द्धक थे। उनको सुनकर यक्ष बहुत ही प्रसन्न हुआ और कहने लगा- हे युधिष्ठिर! तुम्हारे चारों भाइयों में से किसी एक को तुम जिंदा कर लो, यह वरदान मैं तुझे देता हूँ।

युधिष्ठिर बोले- हे यक्ष! यह जो श्याम वर्ण, अरुण नयन, सुविशाल शाल वृक्ष के समान ऊँचा और चौड़ी छाती वाला महा बाहु नकुल है, यही जीवित हो जाय।

यक्ष ने कहा- राजन्! जिसमें दस हजार हाथियों के समान बल है, उस भीम को छोड़कर तुम नकुल को क्यों जि4ाना चाहते हो? तथा जिसके बाहुबल का पाण्डवों को पूरा भरोसा है उस अर्जुन को छोड़कर नकुल को जिन्दा करने की इच्छा क्यों है?

युधिष्ठिर ने कहा- यदि धर्म का नाश किया जाय तो वह नष्ट हुआ धर्म ही कर्ता को नष्ट कर देता है और यदि उसकी रक्षा की जाय तो वही कर्ता की भी रक्षा कर लेता है। इसी से मैं धर्म का त्याग नहीं करता। मेरा विचार है कि वस्तुतः सबके प्रति समान भाव रखना परम धर्म है। लोग मेरे विषय में ऐसा ही समझते हैं कि राजा युधिष्ठिर धर्मात्मा है।

मेरे पिता की कुन्ती और माद्री दो भार्याएँ थी। वे दोनों ही पुत्रवती बनी रहे, ऐसा मेरा विचार है। मेरे लिए जैसी कुन्ती है, वैसी माद्री भी है। इन दोनों में कोई अन्तर नहीं है। मैं दोनों माताओं के प्रति समान भाव ही रखना चाहता हूँ। इसलिए नकुल ही जीवित हो जाय।

यक्ष ने कहा-भरतश्रेष्ठ! तुमने अर्थ और काम से भी समता का विशेष आदर किया है। इसलिए तुम्हारे सभी भाई जीवित हो जाय। ऐसा यक्ष के कहते ही चारों भाई पुनः जीवित हो गये। एक क्षण में ही उनकी भूख-प्यास समाप्त हो गयी।

युधिष्ठर ने पूछा-हे भगवन्! आप कौन हैं? कोई देवश्रेष्ठ हैं? आप यक्ष ही हैं, ऐसा तो मुझे मालूम नहीं पड़ता? क्योंकि मेरे सभी भाई बलवान हैं, बुद्धिमान हैं। आप मात्र युद्ध में तो इन्हें मार नहीं सकते। ये मरे हुए जैसे अवश्य ही थे, किन्तु अब तो बिल्कुल स्वस्थ होकर उठ खड़े हुए हैं। ऐसा लगता है कि अभी गहरी नींद से सोकर उठे हैं। आप क्या हमारे सुहृद हैं या हमारे पिता तुल्य हमारे रक्षक हैं?

यक्ष ने कहा-धर्मराज! मैं तो तुम्हारा पिता धर्म ही हूँ। मैं तुम्हें देखनके लिए आया हूँ। यश,सत्य,दान,शौच, मृदुता, लज्जा, अचंचलता, दान,तप और ब्रह्मचर्य ये सभी मेरे शरीर है तथा अंहिसा, समता, शांति, तप, शौच और अमत्सर इन्हें तुम मेरा मार्ग समझो। तुम मुझे सदा ही प्रिय हो। यह बड़ी प्रसन्नता की बात है कि तुम्हारी शम,दम,उपरति,तितिक्षा और समाधान इन पाँच साधनों पर प्रीति है तथा तुमने भूख-प्यास, शोक, मोह और जरा-मृत्यु इन छः दोषों को जीत लिया है। हे पुत्र! तुम्हारा मंगल हो। मैं धर्म हूँ और तुम्हारा व्यवहार जानने के लिए ही आया हूँ। निष्पाप राजन्! तुम्हारी समदृष्टि के कारण मैं तुम्हारे पर प्रसन्न हूँ। तुम अभीष्ट वर माँग लो? जो मेरे भक्त हैं, उनकी कभी दुर्गति नहीं होती।

युधिष्ठिर ने कहा-हे भगवन्! पहला वर तो यही माँगता हूँ कि जिस ब्राह्मण की अरणी सहित मन्थन काष्ठ को मृग लेकर भाग गया था, उसके अग्नि होम का लोप न हो जाय। यक्ष ने कहा-राजन्! उस ब्राह्मण के अरणी सहित मन्थन काष्ठ को तो तुम्हारी परीक्षा के लिए मैं ही मृग रूप में लेकर भाग गया था। यह मैं तुम्हें देता हूँ। तुम कोई दूसरा वरदान और माँग लो।

युधिष्ठिर बोले-हम बारह वर्षों तक वन में रहे,अब तेरहवाँ वर्ष आ लगा है। अतः ऐसा वर दीजिए कि इसमें हमें कोई पहचान न सके। धर्मराज बोले-हे राजन्! यह वर मैं देता हूँ। तुम लोग इस पृथ्वी पर इसी रूप में विचरोगे तो भी तुम्हें कोई नहीं पहचान सकेगा। किन्तु आप लोग अपनी सुविधानुसार जैसा चाहे वैसा रूप बना सकते हो। आप, मैं, जो चाहे, जैसा चाहे, वैसा रूप बना सकते हैं।

हे राजन्! इसके अतिरिक्त भी अन्य कोई तीसरा वरदान भी माँग लो। मैं तुम्हें सहर्ष दूँगा। युधिष्ठिर बोले- हे भगवन्! आप स्वयं मेरे बारे में मेरे से अधिक ज्ञाता है। मेरी धर्म में निष्ठा सदा बनी रहे। किसी प्रकार से स्वार्थ में पड़कर मैं धर्म को न छोड़ूँ। मुझ में कभी दुर्गुण न आ जाये। मैं कभी लोभ-मोह और क्रोध के वशीभूत न हो जाऊँ तथा सदा दान,तप और सत्य में प्रतिष्ठ रह सकूँ। ऐसी आपकी कृपा मेरे ऊपर सदैव बनी रहे। धर्म ने तथास्तु कहते हुए धर्मराज की बात का समर्थन ही किया। स्वयं धर्म ही यक्ष रूपधारी ऐसा कहते हुए वहाँ से अन्तर्ध्यान हो गए। पाण्डव वापिस आश्रम में आ गये। इस प्रकार से पाण्डवों ने अपने धर्म का निर्वाह किया।

दूसरे दिन ही पाण्डवों ने सभी यति तपस्वी, ऋषि-मुनियों को हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए कहा- अब हम आपसे बिछुड़कर अज्ञातवास को जायेंगे। आप लोग हमें क्षमा करें। हम आप लोगों की सेवा नहीं कर सकेंगे। ऐसा कहते हुए पाचों पाण्डव- द्रौपदी, धौम्य ऋषि के साथ राजा विराट के वहाँ जाकर तेरहवाँ वर्ष अज्ञातवास पूरा करने की योजना बनायी। उन सभी ने पहले तो अपने शस्त्र एक शमी (खेजड़ी) वृक्ष पर बाँध दिये और पाँचों भाई तथा द्रौपदी ने धर्म के बताए हुए नियमानुसार वेश बदल कर राजा विराट के यहाँ पर एक वर्ष व्यतीत किया।

पाण्डवों का वनवास काल पूर्ण हुआ। भगवान् कृष्ण दूत बनकर कौरवों की सभा में जा पहुँचे। उन्होंने धर्म के अनुसार पाण्डवों के लिए उनके हक की माँग की किन्तु दुर्योधन ने कृष्ण के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। उस सभा में दूत कृष्ण ने कहा-यदि आप आधा राज नहीं देते तो उन्हें पाँच गाँव ही दे दीजिये, पाण्डव शांति चाहते हैं। दुर्योधन ने यह प्रस्ताव भी ठुकरा दिया।

भगवान् ने कहा-दुर्योधन! तू ही बतलादे क्या देगा? दुर्योधन ने कहा-सुई की नोक टिके, इतनी जगह भी नहीं दूँगा। यदि युद्ध होगा, तो मैं उसके लिए भी तैयार हूँ। दुर्योधन ने तो दूत बनकर गये कृष्ण को भी बाँधने का प्रयत्न किया। वह कब शांति चाहता था? भगवान् कैसे बंध सकते हैं? भक्तों के बंधन में तो भले ही आ जाये, किन्तु दुर्योधन जैसे अंहकारी के बंधन को स्वीकार नहीं करेंगे।

भगवान् कृष्ण ने पाण्डवों को जाकर के दुर्योधन की करतूत सुनायी और बताया कि युद्ध अवश्यंभावी है। भगवान् ऐसा कहकर द्वारिका चले गये। कौद्भव तथा पाण्डवों ने सेना एकत्रित करना प्रारम्भ कर दिया। इस उद्योग में दुर्योधन भगवान् कृष्ण के पास द्वारिका जा पहुँचा सैनिक सहायता के लिए। पीछे-पीछे अर्जुन भी पहुँच गया। अर्जुन ने देखा कि भगवान् सोये हुए हैं। किन्तु दुर्योधन मेरे से पूर्व ही आकर सिर की तरफ बैठ गया। भगवान् उठकर देखते हैं तो पहले अर्जुन दिखाई दिया। श्रीकृष्ण ने अर्जुन का स्वागत किया। तब दुर्योधन कहने लगा-हे भगवन्! पहले मैं आया था। मेरा स्वागत होना चाहिए था। भले ही तुम पहले आये हो, किन्तु मैंने पहले देखा अर्जुन को है। इसलिए प्रथम स्वागत अर्जुन का है। पीछे तुम्हारा भी है। कहिये! अपने आने का प्रयोजन? दुर्योधन ने कहा-आप हमें युद्ध में सहायता प्रदान कीजिए, इसलिए मेरा आना हुआ है। भगवान् ने कहा-अर्जुन! मैं दोनों का बंटवारा कर देता हूँ। एक तरफ तो मेरी नारायणी सेना रहेगी, दूसरी तरफ मैं अकेला रहूँगा। किन्तु मैं शस्त्र धारण नहीं करूँगा। दुर्योधन ने कहा-हे कृष्ण! आप तो मुझे नारायणी सेना ही दे दीजिये! दुर्योधन तो सेना लेकर चला गया।

तब भगवान् ने अर्जुन से कहा-हे अर्जुन! तुम चुपचाप क्यों बैठ रहे? दुर्योधन ने बाजी मार ली, तुम कुछ बोले भी नहीं? मैंने तो तुम्हें पहले मौका दिया था। तू अर्जुन क्या चाहता हैं? हे कृष्ण! आप स्वयं ही मेरे को दे दीजिये। मैंने तो अभी कहा था कि मैं शस्त्र नहीं उठाऊँगा। मुझे शस्त्र रहित से तुम क्या करोगे? हम आपको अपना सारथी बनायेंगे और अपने जीवन का सम्पूर्ण भार आपको सौंप देंगे। हम निश्चिंत होकर युद्ध करेंगे। यदि हार होगी तो आपकी, और जीत होगी तो आपकी।

धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में दोनों ओर से सेना एकत्रित हो गयी। शंख नगाड़े बज चुके थे। अर्जुन ने सारथी कृष्ण से कहा-हे कृष्ण! मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिये। मैं देख लूँ कि मुझे किसके साथ युद्ध करना है। सारथी कृष्ण ने महारथी अर्जुन की आज्ञा मानी और दोनों सेनाओं के बीच में रथ खड़ा कर दिया और बताया कि-हे अर्जुन! ये तुम्हारे दादा, गुरु, मामा, चाचा, भाई-बन्धु आदि खड़े हैं। इनको देख और युद्ध के लिए तैयार हो जा। अभी शंख बज चुका है। अर्जुन ने अपने प्रियजनों को देखा और मोहग्रस्त हो गया।

कहने लगा- हे कृष्ण! मैं युद्ध नहीं करूँगा। मैं अपने ही जनों को मारकर जीना भी नहीं चाहता, न ही राज करना चाहता। वनवासी होकर अपना गुजारा भिक्षा से कर लूँगा। ऐसी विकट परिस्थिति में भगवान् ने अर्जुन को गीता सुनाई और अर्जुन के मोह को भंग किया तथा युद्ध के लिए पुनः तैयार किया। दोनों ओर से घमासान युद्ध हुआ, जिसमें सभी वीर मारे गये। अन्त में केवल पाँच पाण्डव, सात्यकि, कृष्ण ये सात तो पाण्डव पक्ष से युद्ध भूमि से लौटकर वापिस आये। कौरव पक्ष की तरफ से कृपाचार्य, कृतवर्मा और अश्वत्थामा ये तीन वीर ही बच पाये।

पाण्डवों ने युद्ध पश्चात् राज्य किया। वह राज उन्हें सुख नहीं दे सका। खून की नदियाँ बहाकर उनमें स्नान करने जैसा राज्य पाण्डवों को अच्छा नहीं लगा। अपने प्रपौत्र अभिमन्यु के बेटे परीक्षित को राज देकर पाँच पाण्डव एवं द्रौपदी हिमालय की ओर चले, इनका अंतिम यहीं मुकाम हो गया।

एक दिन युधिष्ठिर ने द्रौपदी सहित अपने भाइयों को बुलाकर कहा- अब अन्तिम काल आ गया है, अब हमें यहाँ से प्रस्थान करना चाहिये। किसी भी राजा को अपने राज सिंहासन पर बैठे-बैठे नहीं मरना चाहिए। भाइयो! काल की गति बड़ी विचित्र है। हमारे कुल परिवार में ऐसा कोई राजा नहीं हुआ जो घर में खटिया पर पड़ा हुआ मरा हो। कौड़ निनाणवे राजा भोगी, गुरु के आखर कारण जोगी। माया राणी राज तजीलो, गुरु भेटीलो जोग सझीलो, पिण्डा देख न झुरणा। अब हमें भी वन की तरफ प्रस्थान कर देना चाहिए।

युधिष्ठिर की बात का सभी ने समर्थन किया और कहा, ऐसा ही होगा। पाँचों पाण्डव सहित द्रौपदी ने पूर्व वनवास की भाँति पुनः वल्कल वस्त्र धारण किये और नगरी से विदाई ले ली। नगर के लोगों ने अश्रुपूरित नेत्रों से विदाई दी और वापिस नगरी में लौट आये। नगरी से बाहर निकलकर पाँचों पाण्डव प्रथम तो दक्षिण दिशा में चले। समुद्र किनारे तक की यात्रा की।

वहाँ अग्निदेव ने अर्जुन से कहा- हे अर्जुन! मैं वही अग्नि हूँ, सप्त जिना वाली, जो मैंने खाण्डव वन को जलाया था। अब जो तुम्हारे पास जो यह गाण्डीव धनुष है, इसे तुम पास मत रखो। मुझे वापिस लौटा दो। मैंने ही तुम्हें प्रदान किया था। अर्जुन तथा अन्य सभी भाइयों ने अपने अपने शस्त्र जल में समर्पित कर दिये। वरुण देवता को गाण्डीव धनुष वापिस सौंप दिया।

पाण्डव लोग अन्तिम तीर्थ यात्रा करते हुए दक्षिण से पश्चिम की ओर बढ़े तथा वहाँ से हिमालय में प्रवेश किया। पाण्डव लोग मार्ग में आगे बढ़ते ही जा रहे थे। पाँच पाण्डव, सती द्रौपदी तथा पीछे एक कुक्रता भी आ रहा था। यह न जाने कहाँ से पीछे लग गया? किन्तु यह तो हस्तिनापुर से पीछे-पीछे चला आ रहा है। सभी नगरवासी पीछे रह गये, किन्तु यह कुत्ता पीछा नहीं छोड़ रहा था। यह तो प्रत्येक कार्य को बड़ी ही सावधानी से निरीक्षण करता है। यह देखकर पाण्डवों को आश्चर्य होता था, किन्तु पाण्डव आगे बढ़ते ही जा रहे थे।

वेदव्यासजी ने पाण्डवों को बतलाया था कि आप लोग हिमालय में जाओ, तो वहाँ केदारनाथ में भगवान् शिव तथा बद्रीनाथ में भगवान् विष्णु के दर्शन अन्त समय में होना आवश्यक है। आप लोगों ने युद्ध भूमि में अनेक लोगों का वध किया है। वहाँ दिव्यदेवों के दर्शन से आपको शान्ति मिल सकेगी। पूज्य वेदव्यासजी की आज्ञा को शिरोधार्य करके पाण्डव लोगों ने प्रथम हरिद्वार से हिमालय में प्रवेश किया। ऋषिकेश होते हुए पाण्डव लोग हिमालय की दिव्य छटा निहारते हुए गुप्त काशी पहुँचे। वहाँ की ऐसी प्रसिद्धि है कि शिवजी वहाँ गुप्त हो गये। इसलिए उस स्थान का नाम गुप्त काशी पड़ा। पाण्डव लोग धुन के पक्के थे। उन्हें शिव का दर्शन करना है तो करना ही है, ऐसा विचार करके आगे बढ़े।

उच्च हिमालय शिखर वर्तमान में केदारनाथ के नाम से प्रसिद्ध है। वहाँ पर पाण्डव लोग पहुँचे किन्तु वहाँ पर भी शिव दर्शन दुर्लभ हो गये। पाण्डवों ने निराश होकर भी लक्ष्य का परित्याग नहीं किया। युधिष्ठिर ने भाई भीम से कहा-भीम! तुम ऐसा करो कि इधर हिमालय में भैंसे हरी-हरी घास चर रही है, इनके साथ एक भैंसा घास चर रहा है। तुम इन भैंसों को इधर से उधर निकालो, मुझे लगता है कि यहीं कहीं इन भैसों में शिवजी भैंसा बन करके विचरण कर रहे हो? हम पापीजनों को दर्शन देना नहीं चाहते, किन्तु हम लोग दर्शन किये बिना आगे नहीं बढ़ सकते?

नकुल सहदेव से कहा- भाई भीम तो पर्वत के दोनों तरफ पैर रखकर खड़े हो जायेंगे और तुम लोग इन भैंसों को भीम के पैरों के नीचे से निकालो? इनमें जो शिव होगा वह भीम के पैरों के नीचे से नहीं निकलेगा। यही हमारी परीक्षा तथा पहचान होगी। युधिष्ठिर की युक्ति काम आयी। जैसा धर्मराज ने कहा था, वैसा ही किया। जो शिव भैंसे के रूप में था वह पीछे रुक गया। आगे नहीं बढ़ा। दूसरी भैंसे तो भीम के पैरों के नीचे से निकल गयी। वहीं पर पाण्डवों ने पैर पकड़ लिये उस शिव ने भैंसे के रूप में नीचे धरती में अपना सिर गड़ा दिया। पीछे का भाग वहीं पर रह गया। इसी का दर्शन इस समय केदारनाथ में हो रहा है। पीछे पूँछ के भाग को केदार बोलते हैं। यहीं केदार दर्शन, मन्दिर में इस समय विद्यमान है।

भैंसे की थुम्भी तुंगनाथ में विद्यमान है। थुम्भी को ही तुंग बोलते हैं। यह तुंगनाथ बद्री-केदार के बीच में बहुत ही ऊँची पहाड़ की चोटी है। जहाँ पर तुंग दर्शनीय है। आगे का मुँह का भाग नेपाल के काठमाण्डू में दर्शनीय है। इस प्रकार से तीनों जगहों पर पाण्डवों ने दर्शन किया और आगे बढ़े।

अन्तिम यात्रा में भगवान् विष्णु के दर्शन करने चाहिये। यहाँ से थोड़ी दूर ही भगवान् नर-नारायण बद्री के नीचे विराजमान हैं। यह पवित्र स्थान भगवान् का धाम है। इस धाम के दर्शन की इच्छा से पाण्डव लोग पहुँचे। जहाँ पर भगवान् स्वयं ही नर नारायण के रूप में विराजमान हुए। ऐसे दिव्य स्थान का दर्शन कर सभी प्रकार की अभिलाषा पूरी करेगा। अन्त समय में यह दर्शन मुक्ति प्रदान करेगा। बद्रीनाथ के दर्शन करके पाण्डव लोग आगे बढ़े।

अलकनन्दा नदी के किनारे-किनारे जा रहे थे। आगे चारों तरफ बर्फ तथा पहाड़ आ गये। कहीं भी रास्ता दिखाई नहीं दिया। वहाँ से पश्चिम की तरफ चले, किन्तु आगे सरस्वती नदी का उद्गम स्थान आ गया। नदी को पार कैसे किया जावे? बहुत ऊँचे पर्वतों के बीच में से बहुत ही गहराई में नदी बहती है। आगे जाने का कोई मार्ग न पाकर भीम ने एक बड़ी भारी शिला उस नदी पर रखकर पुल बनाया और उस पुल से पाँचों पाण्डव पार हो गये। अब भी वह पुल विद्यमान है, जिसे भीम पुल कहते हैं। इस समय यह पुल बद्रीनाथ से थोड़ी दूरी पर विद्यमान है।

अलकनन्दा के किनारे-किनारे पाण्डव आगे बढ़े। वहाँ से आगे वसुन्धरा को देखा, जो बहुत ही ऊंचाई से गिरने वाली जल की धारा है। वहीं से अपने को जल कण बिन्दुओं से पवित्र करते हुए आगे बढ़े। पाण्डवों ने आगे स्वर्गारोहण किया। अलकापुरी से अलकनन्दा का उद्गम है। ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते गये, त्यों-त्यों केवल बर्फ ही बर्फ रह गयी, उस बर्फ पर चलना साधारण मानव के वश की बात नहीं है। पाण्डवों का शरीर ठण्डा होकर शून्य होने लगा तथा एक-एक करके गिरने लगे। शरीरों को त्यागने लगे। सर्वप्रथम द्रौपदी ठण्ड से शून्य होकर गिर पड़ी। पाण्डव थोड़ी देर के लिए रुक गये। भीम ने पूछा- हे धर्मराज! यह कैसे हुआ? द्रौपदी ने अपना साथ छोड़ दिया। हम तो सशरीर स्वर्ग में जा रहे थे किन्तु द्रौपदी के साथ ऐसा क्यों हुआ? हमारा साथ क्यों नहीं निभाया?

युधिष्ठिर बोले- हे भीम! हम लोग आगे बढ़ें। द्रौपदी की चिंता मत करो। यह सशरीर तो स्वर्ग में नहीं जा सकी, किन्तु इसकी जीवात्मा हम से पूर्व ही पहुँच चुकी है। भइया! यह द्रौपदी घर की लक्ष्मी थी। इसको तो सभी के प्रति समभाव रखना चाहिये था, किन्तु यह अर्जुन के प्रति ज्यादा ही मोहग्रस्त थी। अर्जुन को महत्त्व ज्यादा देती थी। बस इस एक दोष के कारण हमारा साथ नहीं निभा सकी। हम लोग आगे बढ़ें।

ऐसा कहते हुए युधिष्ठिर आगे बढ़ गये। कुछ आगे बढ़े ही थे कि बर्फ में ठण्डा होकर सहदेव गिर पड़ा। सहदेव को गिरा हुआ देखकर भीम ने फिर पूछाः भइया! थोड़ा रुककर यह तो बतलाओ कि यह सहदेव सदा ही हमारी सेवा में रहता था, कभी भी इसने अपनों से बड़ों की बात को अस्वीकार नहीं किया। आज सहदेव की यह गति कैसे हो गयी?

युधिष्ठिर ने कहा भाई भीम! आगे बढ़ो! इसकी चिंता तुम मत करो। तुम्हारे इस भाई की दुर्गति नहीं होगी। यह इस पाँच तत्त्व के शरीर को छोड़ चुका है। इसका जीव स्वर्ग में पहुँच चुका है। इसे तो सशरीर स्वर्ग में जाना था, परंतु इसे यह अहंकार था कि मेरे बराबर और कोई विद्वान् नहीं है। इसी गर्व की वजह से ही इसकी यह हालत हुई है। अपने आगे बढ़ो।

ऐसा कहते हुए युधिष्ठिर आगे बढ़ गये। कुछ दूरी तक आगे चलने पर नकुल भी गिर पड़ा। भीम ने पूछा-भइया! यह नकुल भी अपनी आज्ञा पर चलता था। संसार में सुन्दरता में तो इसकी बराबरी करने वाला कोई नहीं था। सदा धर्म का पालन करने वाला यह अपना प्रिय भाई नकुल क्यों गिर पड़ा? इसने अपना साथ छोड़ दिया? जरा रुकिये? मुझे यह बताते जाइये।

युधिष्ठिर ने कहा-भाई भीम! यद्यपि सर्वगुण सम्पन्न यह तुम्हारा भाई नकुल था। किन्तु इसमें भी एक ही दोष है कि वह अपने को सभी से सुन्दर समझता था। इसी एक अहंकार की वजह से यह सशरीर स्वर्ग में नहीं जा सका, किन्तु जीवात्मा द्वारा तो अपने से पूर्व ही पहुँच चुका है। आप लोग आगे बढ़ें। जिन्होंने शरीर त्याग दिया है, उनकी चिंता न करें।

आगे-आगे युधिष्ठिर चल रहे हैं- पीछे-पीछे भीम तथा भीम के पीछे गाण्डिव धनुष धारी अर्जुन तथा सभी से पीछे एक कुत्ता चल रहा है। भीम ने पुनः रोका और कहा भाई युधिष्ठिर! यह अपना प्रिय भाई अर्जुन, जो विश्वप्रसिद्ध धनुषधारी था, यह तो बड़ा ही सरल, सौम्य, शुद्ध पवित्रात्मा था। यह तो भगवान् कृष्ण का प्रिय सखा था, जिसके बल पर ही तो हमने सम्पूर्ण पृथ्वी जीत ली थी। वह भाई अर्जुन तो गिर पड़ा है। अपना साथ छोड़ दिया है। आप कृपा करके इसके बारे में भी बतला दीजिये? ऐसा क्यों हुआ? इसे तो सशरीर स्वर्ग में जाना चाहिये था?

युधिष्ठिर बोले-भइया सुनो! यह भाई अर्जुन तो अप्रतिम वीर था, किन्तु फिर भी दुनिया में बड़ा-बड़ी है। अर्जुन के पास जो पौरुष था, वह उसका स्वयं का नहीं था। वह तो भगवान् कृष्ण का ही दिया हुआ था। किन्तु अर्जुन अज्ञानतावश अपना ही मानता था। पराई वस्तु लेकर उसे अपना मान लेना, उस पर व्यर्थ का अहंकार करना यही दोष अर्जुन में था। इसी कारण से सशरीर अर्जुन स्वर्ग में नहीं जा सका। यह तो अशरीरी होकर शीघ्र ही पहुँच जायेगा। अपने को अर्जुन के बारे में या अन्य किसी के बारे में चिंता नहीं करनी चाहिये। सभी अपने-अपने कर्मों का ही फल प्राप्त करते हैं। इस अन्तिम निर्णय में किसी का कोई वश नहीं चलता है।

भीम जैसा बलवान् भी बर्फ के आगे शिथिल होने लगा। पैर लड़खड़ाने लगे, बेहोशी को प्राप्त होकर स्वयं भीम भी थोड़ी दूरी पर गिर पड़ा। भीम ने पीछे से आवाज लगायी-भइया! धर्मराज! मेरी भी एक बात सुनते जाओ? मैं भी अपने प्राणों को त्यागने को तैयार हूँ। मेरे में भी कोई दोष हो, तो बताते जाइये। मैं क्यों आपका साथ छोड़ रहा हूँ? युधिष्ठिर ने कहा- भाई भीम! तुम्हारे में भी एक ही दोष था कि तुम अपने को बहुत बड़ा बलवान मानते हो। जिस कारण से तुम यहीं रह गए। आगे नहीं बढ़ सके। गर्व ही मानव को ले डूबता है। यह अहंकार ही मनुष्य को आगे बढ़ने में बाधा खड़ी करता है। तुम इस दोष को जीवनभर नहीं समझ पाये, इसलिए तुम शरीर छोड़कर स्वर्ग पहुँच जाओ।

अब तो अकेले धर्मराज ही आगे बढे। सभी भाइयों ने तथा धर्मपत्नी ने साथ छोड़ दिया, किन्तु वह कुत्ता अब भी पीछे-पीछे चल रहा है। धर्मराज अब तक थोड़ी दूर आगे बढे ही थे कि सामने स्वयं देवराज इन्द्र ही अपना रथ लेकर खड़े हैं। देवराज ने युधिष्ठिर का स्वागत किया। बहुत-बहुत धन्यवाद दिया, यहाँ तक आने के लिए।

इन्द्र ने कहा-धर्मराज! मैं स्वयं स्वर्गाधिपति देवराज इन्द्र आपके लिए रथ लेकर आया हूँ। आप अति शीघ्र बैठिए और चलिए। मेरे साथ आपके बंधुजन हैं और आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। तुम्हारे बंधुजन तो भौतिक शरीर को त्याग करके गये हैं, परन्तु आप सशरीर चलिए। वहाँ पर तुम्हारे बंधुजन तुम से मिलेंगे।

युधिष्ठिर ने कहा-अच्छी बात है। मैं अवश्य ही चलूँगा, किन्तु मेरे साथ तो मेरा भक्त कुत्ता है। इसे भी साथ ले चलूँगा। मेरे साथ इसे भी चलने की आज्ञा प्रदान कीजिए। इन्द्र ने कहा-हे धर्मराज! केवल आप ही स्वर्ग में जाने के अधिकारी हैं, क्योंकि आप में ही केवल मेरी तरह ऐश्वर्य,पूर्णलक्ष्मी, सिद्धि की प्राप्ति हुई है। इस कुत्ते में नहीं है, तो यह कैसे जा सकता है? इस कुत्ते को तो अपने रथ पर नहीं बैठाऊँगा। आपके लिए ही मैं आया हूँ। इस कुत्ते को त्यागने में भी कोई दोष नहीं है।

युधिष्ठिर ने कहा-भगवन्! आर्य पुरुष से अधार्मिक, निम्न श्रेणी का कार्य होना कठिन है। मुझे ऐसी श्री- लक्ष्मी आदि की प्राप्ति भले ही न हो, जिसके लिए मेरी शरणागत आये हुए को परित्याग करना पड़े।

इन्द्र ने कहा-हे धर्मराज! कुत्ता रखने वालों के लिए स्वर्ग लोक में कोई स्थान नहीं है। उनके यज्ञ करने तथा कुवा-बावड़ी आदि बनाने का जो पुण्य होता है, उसे क्रोधवश नाम के राक्षस हर लेते है। इसीलिए सोच विचार करके कार्य करो। इस कुत्ते को छोड़ दो। ऐसा करने में कोई निर्दयता नहीं है।

युधिष्ठिर ने कहा-ऐसा मेरा सदा का ही व्रत है कि जो असहाय हो, भक्त हो, जो डरा हुआ हो, मेरा दूसरा कोई सहारा नहीं है, ऐसा कहते हुए आर्त्त भाव से शरण में आया हो, अपनी रक्षा करने में असमर्थ हो, अपने प्राण बचाना चाहता हो, ऐसे पुरुष को मैं कभी नहीं त्याग सकता।

इन्द्र ने कहा-हे वीरवर! मनुष्य जो कुछ दान, स्वाध्याय अथवा हवन आदि पुण्य कर्म करता है, उस पर यदि कुत्ते की दृष्टि पड़ जाए तो उसके फल को क्रोधवश नामके राक्षस हर ले जाते हैं। इसीलिए इस कुत्ते का त्याग कर दो। इसी से ही तुम्हें देव लोक की प्राप्ति होगी। तुमने भाइयों तथा प्रिय पत्नी का परित्याग करके अपने पुण्य कर्मो के फल स्वरूप देव लोक को प्राप्त किया है। फिर इस कुत्ते को क्यों नहीं छोड़ देते? सभी कुछ छोड़ कर भी इस कुत्ते के मोह में फंस गए।

युधिष्ठिर ने कहा-हे भगवन्! इस संसार में जो प्राण त्याग कर चुका है, उसके साथ मेल-मिलाप कैसा? वे मेरे भाई तो शरीर छोड़ गए हैं। जब तक जीवित थे, तब तक मैंने अपनी धर्म पत्नी व भाइयों का साथ नहीं छोड़ा था। मरे हुए को जीवित करना मेरे वश की बात नहीं है। किन्तु हे इन्द्र! शरण में आये हुए को भय देना, स्त्री का वध करना, ऋषि-मुनि, भक्तों से धन लूटना, और मित्रों के साथ द्रोह करना ये चार अधर्म और भक्त का त्याग दूसरी ओर हो, तो मेरी समझ में यह अकेला ही उन चारों के बराबर है।

इस प्रकार से इन्द्र ने युधिष्ठिर को अनेक युक्तियों द्वारा समझाने का प्रयत्न किया, किन्तु युधिष्ठिर अपने धर्म से विचलित नहीं हुए। स्वयं धर्मराज ही कुत्ते के रूप में थे। जो वहीं प्रकट हो गए और कुत्ता लोप हो गया। धर्मराज ने युधिष्ठिर का धर्मयुक्त आचरण देखकर बड़े ही प्रसन्न हुए और कहने लगे-हे राजेन्द्र! तुमने अपनी सदाचार बुद्धि एवं सम्पूर्ण प्राणियों के प्रति होने वाली दया के कारण अपने पिता का नाम उज्ज्वल किया है।

बेटा! एक बार पहले मैंने द्वैतवन में भी परीक्षा ली थी। जबकि तुम्हारे सभी भाई पानी लाने के लिए गए थे तथा वहीं मर गये थे। उस समय तुमने कुन्ती एवं माद्री दोनों माताओं में समानता की इच्छा रखकर अपने सगे भाई भीम और अर्जुन को छोड़कर केवल नकुल को जीवित रखना चाहा था।

इस समय भी कुत्ता मेरा भक्त है। ऐसा सोचकर तुमने देवराज इन्द्र के रथ का परित्याग कर दिया। अतः स्वर्गलोक में तुम्हारी समता करने वाला कोई नहीं है। इसलिए तुम्हें अपने इसी शरीर से अक्षय लोक की प्राप्ति हुई है। तुम परम उत्तम गति को पा गये हो। ऐसा कहते हुए धर्म, इन्द्र, मरुद्गण,अश्विनीकुमार, देवता एवं ऋषियों ने युधिष्ठिर को रथ में बिठाया और वे सभी अपने-अपने विमानों पर आरूढ़ होकर स्वर्गलोक को चले गये।

इन्द्र के रथ पर बैठे हुए राजा युधिष्ठिर अपने तेज से पृथ्वी एवं आकाश को देदीप्यमान करते हुए बड़ी तेजी से ऊपर की ओर जाने लगे। उस समय सकल लोकों का वृत्तान्त जानने वालह्य कुशल वक्ता देवर्षि नारदजी ने देवमण्डल में उपस्थित होकर उच्चस्वर में कहा-जितने राजर्षि स्वर्ग में आये हैं, वे सभी यहाँ उपस्थित हैं, किन्तु कुरुराज युधिष्ठिर अपने सुयश से सभी की कीर्ति को आच्छादित करके विराजमान हो रहे हैं। अपने यश, तेज और सदाचार रूप सम्पत्ति से तीनो लोकों को आवृत करके अपने भौतिक शरीर से स्वर्ग लोक में आने का सौभाग्य पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर के सिवा और किसी राजा को भी प्राप्त हुआ है, ऐसा मैंने कभी नहीं सुना है।

हे युधिष्ठिर! पृथ्वी पर रहते हुए तुमने नक्षत्र एवं ताराओं के रूप में जितने तेज देखे हैं, वे सभी ही ये देवताओं के हजारों लोक हैं। इनकी ओर देखो। नारदजी की बात को श्रवण करके युधिष्ठिर ने कहा-मेरे भाइयों को भला या बुरा जो भी स्थान प्राप्त हुआ है, उसी को मैं भी पाना चाहता हूँ। इसके सिवाय दूसरे लोकों में जाने की मेरी इच्छा नहीं है।

इनके ऐसा कहने पर देवराज इन्द्र ने कहा- महाराज! तुम अपने शुभ कर्मों द्वारा प्राप्त इस स्वर्गलोक में निवास करो। मनुष्य लोक के मोहपाश में बंधे हुए, अब तक क्यों खिंचे चले आ रहे हो? तुम्हें जो उत्तम लोक की प्राप्ति हुई है, यह दूसरे मनुष्य के लिए दुर्लभ है। तुम्हारे भाइयों को ऐसा स्थान प्राप्त नहीं है। अब तक मनुष्य लोक की भावना तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ रही है। यह स्वर्ग लोक है, इन स्वर्गवासी देव ऋषियों और सिद्धों की ओर तो दृष्टि डालो।

देवराज इन्द्र की इस प्रकार की बात सुनकर राजा युधिष्ठिर ने इस प्रकार से कहा-अपने भाइयों एवं सत्वगुण सम्पन्ना देवी द्रौपदी के बिना मैं एक क्षण भी रहना नहीं चाहता। वह चाहे स्वर्ग हो या अन्य लोक? मेरे भाई एवं सभी मेरे बन्धुओं ने मेरे लिए युद्ध भूमि में हंँसते हुए प्राणों का त्याग किया है। वे चाहे पक्ष के हों चाहे विपक्ष के हों। इस समय तो मेरा शत्रु मुझे कोई नहीं दिखता। जिन्होंने मेरे लिए सर्वस्व अर्पण कर दिया है उन्हें मैं इस समय कैसे भूल सकता हूँ? सुख या दुःख, नरक या स्वर्ग हम सभी मिलकर ही भोगेंगे। मैं अकेला सुख भोगने की तो कल्पना ही नहीं कर सकता।

धर्मराज युधिष्ठिर ने स्वर्ग में जाने के बाद देखा कि दुर्योधन स्वर्गीय शोभा से सम्पन्न हो देवता एवं साध्यगणों के साथ एक दिव्य सिंहासन पर बैठकर सूर्य के समान देदीप्यमान हो रहा है। उसका ऐसा ऐश्वर्य देखकर युधिष्ठिर सहसा वापिस लौट पड़े और कहने लगे-हे देवताओ! जिसके कारण हमने अपने मित्र एवं बन्धुओं का युद्धभूमि में संहार कर डाला था, तथा जिसकी प्रेरणा से निरंतर धर्म का आचरण करने वाली हमारी धर्मपत्नी द्रौपदी को भरी सभा मंह्य गुरुजनों के सामने घसीटा गया, ऐसे दुर्योधन के साथ में मैं स्वर्गलोक में नहीं रहना चाहता। ऐसी युधिष्ठिर की विरोधयुक्त बातें सुनकर नारदजी हंँस पड़े और बोले- हे धर्मराज! स्वर्ग में आने पर मृत्यु लोक का बैर विरोध नहीं होता। अतः तुम्हें दुर्योधन के सम्बन्ध में ऐसी बात कदापि नहीं कहनी चाहिये। स्वर्ग लोक में जितने श्रेष्ठ राजा रहते हैं तथा देवता भी राजा दुर्योधन का विशेष सम्मान करते हैं।

यह सत्य है। उसने तुम्हें सदा ही कष्ट पहुँचाया है। फिर भी इस वीर ने युद्धभूमि में लड़ते हुए प्राणों का परित्याग किया है। अतः इसके द्वारा आप लोगों को जो भी क्लेश प्राप्त हुआ है, उसे आप भूल जाओ और इनके साथ न्यायपूर्वक मिलो। ध्यान रखो, यह स्वर्ग लोक है। यहाँ आने पर पहले का वैर नहीं रहता।

नारदजी के ऐसा कहने पर राजा युधिष्ठिर ने कहा- हे ब्रह्मन्! जो महान व्रतधारी,महात्मा,सत्यप्रतिज्ञ,विश्व विख्यात वीर और सत्यवादी थे, उन मेरे भाइयों को कौन से लोक प्राप्त हुए हैं? उन्हें मैं देखना चाहता हूँ। सत्य पर दृढ़ रहने वाले कुन्ती पुत्र महात्मा कर्ण को,धृष्टद्युम्न को,सात्यकि को तथा अन्य वीरों को मुझे देखने की इच्छा है। इनके अतिरिक्त और भी अन्य राजा, क्षत्रिय धर्म के अनुसार युद्ध में मारे गये हैं, वे सभी कहाँ है? उनका तो यहाँ पर दर्शन भी नहीं हो रहा है।

इस प्रकार से युधिष्ठिर ने देवताओं से कहा-हे देवगणो! क्या? ये सभी मेरे बन्धुगण इसी लोक को प्राप्त हुए हैं? यदि वे यहीं पर ही हैं, तो मैं भी यहीं रहूँगा अन्यथा एक क्षण भी मुझे यहाँ रहने का अधिकार नहीं है और यदि वे यहाँ पर नहीं आये तो उनके बिना मैं यहाँ कैसे रह सकता हूँ? क्योंकि युद्ध के पश्चात् जब मैं अपने मृत सम्बन्धियों को जलांजलि दे रहा था, उसी समय मेरी माता कुन्ती ने कहा कि-बेटा! कर्ण को भी जलांजलि दे देना।

माता की यह बात सुनकर जब मुझे यह पता चला कि कर्ण भी मेरा भाई था, तब से मुझे उनके लिए बहुत दुःख होता है। यह सोच कर तो मैं और भी पश्चात्ताप करता हूँ कि महामना कर्ण के दोनों चरणों को माता कुन्ती के चरणों के समान देखकर भी मैं उनका अनुगामी क्यों नहीं हो गया था? यदि कर्ण हमारे साथ होते, तो हम इन्द्र को भी युद्ध में परास्त कर देते। वे सूर्यनन्दन कर्ण इस समय जहाँ कहीं भी हों, मैं उनका दर्शन करना चाहता हूँ।

अपने प्राणों से भी प्यारे भीमसेन, अर्जुन,नकुल सहदेव तथा धर्मपरायणा द्रौपदी को देखना चाहता हूँ। यहाँ रहने में मेरी तनिक भी इच्छा नहीं है। यह मैं आप लोगों को सच्ची बात बता रहा हूँ। हमारे जो वृद्ध गुरुजन थे। भीष्म,द्रोण,मामा शल्य, ये सभी तो समर्थ वीर क्षत्रियधर्म के मेरूदण्ड थे। उनके बारे में भी जानना चाहता हूँ। वे हमारे पूजनीय वृद्धजन न जाने कहाँ होंगे? भाइयों से अलग रहकर मुझे स्वर्ग से भी क्या लाभ? जहाँ मेरे भाई हैं, वहीं स्वर्ग है। मैं इस लोक को स्वर्ग नहीं मानता।

देवताओं ने कहा- हे राजन्! यदि उन लोगों में तुम्हारी श्रद्धा है, तो चलो विलम्ब न करो। हम लोग देवराज इन्द्र की आज्ञा से हर तरह से तुम्हारा प्रिय करना चाहते हैं। ऐसा कहते देवताओं ने अपने दूतों को आज्ञा दी कि इन महाराज युधिष्ठिर को अपने सगे सम्बन्धियों के दर्शन कराओ। तत्पश्चात् युधिष्ठिर उन दूतों के साथ साथ आगे बढ़े, जहाँ उनके भाई भीमसेन आदि थे। आगे-आगे देवदूत चल रहे थे, पीछे-पीछे युधिष्ठिर। वह देवदूत उनको ऐसे दुर्गन्धयुक्त मार्ग में ले गया, जहाँ से पापी लोग ही उधर को जाते हैं। वहाँ सभी ओर घोर अंधकार छाया हुआ था। चारों ओर से दुर्गन्ध ही दुर्गन्ध आ रही थी। इधर-उधर सड़े हुए मुर्दे दिखाई दे रहे थे। जहाँ-तहाँ बाल और हिंयाँ पड़ी हुई थी। लोहे सदृश चोंच वाले गिद्ध मण्डरा रहे थे। सुई के समान चुभते हुए मुख वाले पर्वताकार प्रेत सभी ओर घूम रहे थे। उन प्रेतों के शरीर से रुधिर बह रहा था। किसी के बाहु, उरू,पेट और हाथ पैर कट गये थे। बड़ा ही भयानक दृश्य वहाँ का था। धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर बहुत चिन्तित होकर उस मार्ग के बीच में से होकर निकले। उन्होनें देखा- वहाँ खोलते पानी से भरी हुई एक नदी बहती है जिसके पार जाना बहुत ही कठिन है। दूसरी ओर तीखे पतों से परिपूर्ण असिपत्र नामक वन है। कहीं गरम-गरम बालू बिछी है। कहीं तपाये हुए लोहे की बड़ी-बड़ी चट्टाने हैं। सब और लोहे के घड़ों में तेल उबल रहा है। जहाँ तहाँ पैने काँटों से भरे हुए सेमल वृक्ष हैं। जिनको हाथ से छूना भी कठिन है। इन सभी के अतिरिक्त पापियों को यहाँ पर अनेक प्रकार की यातनाएँ दी जाती हैं।

उन पर भी युधिष्ठिर की दृष्टि पड़ी। वहाँ की दुर्गन्धी से तंग आकर युधिष्ठिर ने देवताओं से कहा- हे देव! ऐसे मार्ग पर मेरे को अभी कितनी दूर और चलना है? तथा मेरे भ्राता कहाँ हैं? धर्मराज की यह बात सुनकर देवदूत वापिस लौट पड़ा और बोला, बस। यहीं तक आपको आना था महाराज! देवताओं ने मुझ से कहा था कि जब युधिष्ठिर थक जाये तो उन्हें वापिस लौटा लाना। अतः अब मैं आपको वापिस ले चलता हूँ क्योंकि अब आपको आगे चलना ही नहीं है। लगता है आप थक गये हैं, तो मेरे साथ आइये।

युधिष्ठिर उस बदबू से विकल हो रहे थे। इसलिए घबराकर वापिस लौटने का ही निश्चय किया। वे ज्यों ही उस स्थान से लौटने लगे, त्यों ही उनके कानों में चारों से दुःखी जीवों की यह दयनीय पुकार सुनाई पड़ी।

हे धर्म नन्दन! आप हम लोगों पर कृपा करके थोड़ी देर यहीं ठहर जाईये। आपके आते ही परम पवित्र हवा चलने लगी है, इससे हमें बड़ा सुख मिला है। हे कुन्तीनन्दन! आज बहुत दिनों के बाद आपका दर्शन पाकर बड़ा आनन्द मिल रहा है। अतः क्षणभर और ठहर जाइये। आपके रहने से यहाँ की यातना हमें कष्ट नहीं पहुँचाती।

इस प्रकार से वहाँ कष्ट पाने वाले दुःखी जीवों के भांति-भांति के दीन वचनों को सुनकर युधिष्ठिर को बड़ी दया आयी। उनके मुँह से सहसा ओह निकल पड़ा। इन बेचारों को बड़ा कष्ट है। यों कहकर के वे वहीं ठहर गये। फिर पूर्ववत दुःखी जीवों का आर्त्तनाद सुनाई देने लगा। किन्तु वे पहचान नहीं सके कि ये किनके वचन हैं।

जब किसी तरह उनका परिचय समझ में नहीं आया, तो युधिष्ठिर ने उन दुःखी जीवों को सम्बोधित करके पूछा- आप लोग कौन हैं? और यहाँ किसलिए रहते हैं? उनके इस प्रकार पूछने पर चारों ओर से आवाज आने लगी- मैं कर्ण हूँ, मैं भीमसेन हूँ, मैं अर्जुन हूँ,मैं नकुल हूँ, मैं सहदेव हूँ, मैं द्रौपदी और हम लोग द्रौपदी के पुत्र, इस प्रकार अपने-अपने नाम बताकर सब लोग विलाप करने लगे। यह सुनकर राजा युधिष्ठिर विचार करने लगे........ दैव का यह कैसा विधान है? मेरे महात्मा भाई भीमसेन आदि कर्ण, द्रौपदी के पुत्र तथा स्वयं द्रौपदी ने भी ऐसा कौनसा पाप किया था, जिसके कारण इन्हे यहाँ दुर्गन्धपूर्ण भयानक स्थान में रहना पड़ रहा है? ये सभी पुण्यात्मा थे। जहाँ तक मैं जानता हूँ, इन्होनें कोई पाप नहीं किया था। फिर किस कर्म का फल है, जो ये लोग नरक में पड़े हुए हैं?

मेरे भाई सम्पूर्ण धर्म के ज्ञाता, शूरवीर, सत्यवादी तथा शास्त्र के अनुकूल चलने वाले थे। उन्होंने क्षत्रिय धर्म पर रहकर बड़े-बड़े यज्ञ किए और बहुत सी दक्षिणाएँ दी हैं। फिर भी ऐसी दुर्गति क्यों हुई है? मैं इस समय सोता हूँ, या जागता हूँ? मुझे चेता है या नहीं? कहीं ये मेरे चित्त का विकार और भ्रम तो नहीं है?

इस प्रकार से सोच विचार करते हुए राजा युधिष्ठिर ने देवदूत से कहा-तुम जिसके दूत हो, उसके पास लौट जाओ। मैं वहाँ नहीं चलूँगा। अपने मालिकों से जाकर कहना-युधिष्ठिर वहीं रहेंगे, मेरे यहाँ रहने से मेरे भाई बन्धुओं को सुख मिलता है। युधिष्ठिर के ऐसा कहने पर देवदूत देवराज इन्द्र के पास चला गया। युधिष्ठिर ने जो कुछ कहा वहीं जाकर इन्द्र से निवेदन कर दिया।

हे शिष्य! धर्मराज युधिष्ठिर को उस स्थान में खड़े हुए एक मुहूर्त भी नही बीतने पाया था कि इन्द्र आदि देवता वहाँ आ पहुँचे। साक्षात् धर्म भी शरीर धारण करके युधिष्ठिर से मिलने के लिए आये। उन तेजस्वी देवताओं के आने से वहाँ का सम्पूर्ण अंधकार मालिन्य दूर हो गया। पापियों की यातना का दृश्य कहीं दिखाई नहीं दिया। फिर से शीतल, मन्द, सुगन्ध वायु चलने लगी।

इन्द्र सहित मरुद्गण, वसु, अश्विनीकुमार, साध्य, रुद्र, आदित्य तथा अन्य स्वर्गवासी देवता, सिद्धों और महर्षियों के साथ एकत्रित हुए। उस समय सांत्वना देते हुए इन्द्र ने कहा- महाबाहो! अब तक जो हुआ सो हुआ, अब इससे आगे कष्ट उठाने की आवश्यकता नहीं है। आओ, हमारे साथ चलो। तुम्हें बहुत बड़ी सिद्धि मिली है। साथ ही अक्षय लोकों की प्राप्ति हुई है। तुम्हें जो नरक देखना पड़ा है, इसके लिए क्रोध नहीं करना।

मनुष्य अपने जीवन में शुभ और अशुभ दो प्रकार के कर्मों की राशि एकत्रित करता है। जो पहले शुभ कर्मों का फल भोगता है, उसे पीछे नरक भोगना पड़ता है। और जो पहले ही नरक का कष्ट भोग लेता है, वह पीछे स्वर्गीय सुख का अनुभव करता है। जिसके पाप कर्म अधिक हैं और पुण्य कर्म थोड़े हैं, वह पहले स्वर्ग सुख को भोगता है तथा जिसके पुण्य अधिक, पापकर्म थोड़े हैं, वह पहले नरक का कष्ट भोगता है पीछे स्वर्गीय सुखों को भोगता है। इसी नियम के अनुसार तुम्हारी भलाई सोचकर ही मैंने तुम्हें नरक दर्शन करवाया। तुमने अश्वत्थामा की मृत्यु की बात कहकर छल से द्रोणाचार्य को उनके पुत्र की मृत्यु का विश्वास दिलाया। इसलिए तुम्हें भी छल से नरक दिखलाया। तुम्हारे पक्ष के जितने भी राजा युद्ध में मारे गये हैं, वे सभी स्वर्गलोक में पहुँच गए हैं।

महान् धुरंधर शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ कर्ण भी, जिनके लिए तुम सदा दुःखी रहते हो, वह कर्ण उत्तम सिद्धि को प्राप्त हुए हैं। तुम्हारे दूसरे भाई तथा अन्य तुम्हारे पक्ष के राजा भी अपने-अपने योग्य स्थानों को प्राप्त हुए हैं। उन सभी को चलकर देखो और अपनी मानसिक चिंता को त्यागकर मेरे साथ विहार करो। अपने किए हुए पुण्य, कर्म, दान, तप के फल भोगो। राजसूय यज्ञ द्वारा जीते हुए समृद्धिशाली लोकों को स्वीकार करो।

युधिष्ठिर! तुम्हें प्राप्त हुए सम्पूर्ण लोक राजा हरिश्चन्द्र के लोकों की भांति सब राजाओं के लोकों से ऊपर हैं। उन्हीं में तुम विचरण करो। जहाँ राजऋषि मान्धाता, राजा भागीरथ और दुष्यंतकुमार भरत गये हैं। उन्हीं लोकों में निवास करके तुम भी दिव्य सुख का उपभोग करो। महाराज! वह देखो! त्रिभुवन को पवित्र करने वाली देवनदी मन्दाकिनी सामने ही दिखाई दे रही है। उसके पवित्र जल में स्नान करके तुम दिव्य- लोक में जा सकोगे। यहाँ गोता लगाते ही तुम्हारा मानव स्वभाव दूर हो जाएगा। तुम्हारे मन के शोक-संताप, ग्लानि और वैर आदि सभी मिट जाएँगे।

देवराज की बात समाप्त होने पर शरीर धारण करके अए हुए साक्षात् धर्म ने कहा-बेटा! तुम्हारा धर्म विषयक अनुराग, सत्य भाषण, क्षमा और इन्द्रिय संयम आदि गुणों के कारण मैं तुम पर बहुत ही प्रसन्न हूँ। यह मेरे द्वारा तीसरी परीक्षा हुई है। किसी भी युक्ति से कोई तुम्हें अपने स्वभाव से विचलित नहीं कर सकता। द्वैतवन में अरणीकाष्ठ का अपहरण करने के पश्चात् यक्ष के रूप में मैंने ही तुम से प्रश्न पूछे थे। वह तुम्हारी पहली परीक्षा थी। उसमें तुम भली भांति उत्तीर्ण हो गए थे। फिर द्रौपदी सहित तुम्हारे सभी भाइयों की मृत्यु हो जाने पर कुत्ते का रूप धारण करके तुम्हारी दूसरी बार परीक्षा ली थी, उसमें भी तुम्हें सफलता मिली थी।

यह तुम्हारी परीक्षा का तीसरा अवसर था, किन्तु इस बाद्भ तुम अपने सुख की परवाह न करके भाईयों के हित के लिए नरक में रहना चाहते थे। अतः तुम हर तरह से शुद्ध प्रमाणित हुए। तुम में पाप का नाम भी नहीं है। इसलिए स्वर्ग का सुख भोगो। तुम्हारे भाई नरक के योग्य नहीं है। तुमने जो उनको नरक भोगते हुए देखा है, वह देवराज इन्द्र द्वारा प्रकट की हुई माया थी। अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव और सत्यवादी शूरवीर कर्ण इनमें से कोई भी नरक में जाने के योग्य नहीं है।

भरत श्रेष्ठ! आओ अब मेरे साथ चलकर त्रिलोक गामिनी गंगाजी का दर्शन करो। धर्म के इस प्रकार कहने पर राजर्षि युधिष्ठिर ने धर्म तथा समस्त स्वर्गवासी देवताओं के साथ जाकर मुनिजन वन्दित परम पावन देवी गंगाजी में स्नान किया। स्नान करते ही उन्होनें मानव शरीर का त्याग करके दिव्य देह धारण कर लिया। उनके हृदय का शोक-संताप और वैरभाव जाता रहा।

तत्पश्चात् वे देवताओं से घिरकर महर्षियों से स्तुति सुनते हुए धर्म के साथ-साथ उस स्थान को गये, जहाँ उनके भाई, पाण्डव और धृतराष्ट्र के पुत्र क्रोध त्यागकर आनन्दपूर्वक निवास कर रहे थे।

वील्हा उवाचः हे सद्गुरु देव! मैंने आपके श्रीमुख से भक्त प्रह्लाद, सत्यवादी हरिश्चन्द्र एवं धर्मराज युधिष्ठिर के बारे में विस्तार से कथा सुनी। किन्तु उपरोक्त ये सभी बातें, जो आपने कहा था कि पाँच करोड़ का उद्धार प्रह्लाद के साथ सतयुग में हुआ था। सात करोड़ का उद्धार हरिश्चन्द्र के साथ त्रेतायुग में हुआ तथा नौ करोड़ का उद्धार द्वापरयुग में युधिष्ठिर के साथ हुआ। अन्य शास्त्रों में तो ये बातें सुनने में नहीं आती? ये बातें आप ही कहते हैं या अन्य शास्त्र भी इनका वर्णन करते हैं। कृपा करके स्पष्ट कीजिए।

नाथोजी ने कहाः हे वील्ह! यह तुम्हारी बात ठीक है कि अन्य शास्त्रों में इन महापुरुषों की कथा विस्तार से आयी है, किन्तु पाँच,सात,नव करोड़ की बात नहीं होगी। जो बात शास्त्रों में नहीं कही गयी है वे ही बातें बताने के लिए विष्णु जाम्भोजी के रूप में अवतरित हुए थे। जो कुछ पहले कहा जा चुका था, पुनः कहने की क्या आवश्यकता थी?

जाम्भोजी ने कहा है- शास्त्रे पुस्तके लिखणा न जाई, मेरा शब्द खोजो ज्यूं शब्दे शब्द समाई। यही गुरु जम्भेश्वरजी की विशेषता थी। जो न कही हो किन्तु कहना आवश्यक है, ऐसी गूढ़ रहस्य की बातें कहना ही वेद कथन है। इसलिए तो शब्दवाणी को पाँचवाँ वेद कहा जाता है। जो बात पहले कही जा चुकी है, दुबारा उसे कहना वेद नहीं है। वह तो नकल है।

गुरु जाम्भोजी ने किसी की नकल नहीं की है। जो भी कहा है, वह सत्य आँखों देखी बात कही है। अन्य विद्वान् लोग सुनी-सुनायी या वेद शास्त्रों की बातें पढ़कर आगे बखान करते हैं। जिन्होंने आँखों द्वारा नहीं देखा, वह स्वयं प्रमाण नहीं है। वह पर प्रमाण है। किन्तु जिन्होंने स्वयं देखा है, परखा है, अनुभव किया है और कथन किया है, वह स्वयं प्रमाण है। जाम्भोजी स्वयं प्रमाण हैं।

उन्होंने कहा है- रावण सो कोई राव न देख्यो, हनुमत सो कोई पायक न देख्यो, सीत सरीखी तिरिया न देखी। यहाँ देखने की बात है। अन्यत्र सुनने की बात है।

वील्हा उवाचः सतयुग में भगवान् विष्णु ने नृसिंह के रूप में अवतार लिया। त्रेता में राम रूप में अवतार लिया तथा द्वापर में स्वयं कृष्ण रूप में अवतार लेकर आये। इसी बात को जाम्भोजी ने कहा है। किन्तु मुझे संशय इस बात का हो रहा है कि जाम्भोजी ने पाँच,सात,नव करोड़ के उद्धार तथा कलश स्थापना की बात क्रमशः प्रह्लाद, हरिश्चन्द्र एवं युधिष्ठिर से क्यों जोड़ी? इन अवतार पुरुषों से जोड़नी चाहिए थी? ये अवतार ही तो अपने-अपने युग का प्रतिनिधित्व करते हैं।

नाथोजी उवाचः हे विद्वन्! प्रथम बात तो यह है कि जाम्भोजी ने तो जैसी घटना घटित हुई थी, उसी का ही विवरण दिया है। ऐसा क्यों हुआ? इसके बारे में तो भगवान् स्वयं ही जान सकते हैं, फिर भी मैँ अपनी समझ के अनुसार तुम्हें बताने का प्रयास करूँगा। ध्यानपूर्वक सुनो! कोई भी कार्य संसार में भगवान् अपने हाथों से नहीं करते, जो कुछ भी उन्हें करना होता है, तो किसी को निमित्त अवश्य ही बनाते हैं।

महाभारत के युद्ध में अर्जुन को भगवान् ने निमित्त बनाया था। त्रेतायुग में भी भगवान राम ने रावण को मारने के लिए लक्ष्मण, सीता तथा हनुमान को निमित्त बनाया था। सतयुग में भी राक्षसों को मारने के लिए प्रह्लाद को निमित्त बनाया था। संसार के राजा उस समय प्रह्लाद,हरिश्चन्द्र एवं युधिष्ठिर ही थे। यथा राजा तथा प्रजा जैसा राजा होता है वैसी प्रजा भी होती है। राजा का ही प्रजा अनुकरण करती है। प्रजा के लिए राजा ही भगवान् होता है। भगवान् स्वयं यश के भागी नहीं बनते, अपने प्रिय भक्तों को ही यश प्रदान करते हैं। गुणिया म्हारा सुगणा चेला, म्हें सुगणा का दासूं। यः मद् भक्तः से मे प्रियः भगवान् कहते हैं कि मेरा भक्त मुझे बहुत ही प्यारा है। मैं ऐसे भक्तों का दास हूँ। क्योंकि वे मेरे भक्त मेरे दास है। भक्तों के लिए मेरे लिए अदेय कुछ भी नहीं है। मैं उनको देता हूँ। वे मेरे लिए सभी कुछ समर्पित कर देते हैं। उनके योग एवं क्षेम का मैं वहन करता हूँ।

हे वील्हा! इसलिए तो भगवान् स्वयं कलश की स्थापना करते हुए भी स्वयं अकर्ता बन जाते हैं। और अपने भक्तों को कलश स्थापना का महत्वपूर्ण कार्य सौंप देते हैं। इन तीन युगों के प्रतिनिधि ये राजा हुए हैं। इन्होनें अनेकों कष्टों को सहन करते हुए भी धर्म की मर्यादा नहीं छोड़ी। इन्हें परीक्षा की अग्नि में तपाकर शुद्ध कनक बनाया है। इनमें किंचित भी खोट रहने की संभावना नहीं है। ऐसे लोग ही धर्म की मर्यादा बाँध सकते हैं। सद्गुरु ने कहा भी है- पहले किरिया आप कमाईये तो औरां ने फरमाईये।

वील्हा उवाचः हे गुरुदेव! आपने मुझे यह बतलाया है कि 33 करोड़ लोग प्रह्लाद के समय सतयुग में थे, उन में से पाँच करोड़ तो प्रह्लाद को गुरु मानकर पार उतर गये अर्थात् मुक्ति को प्राप्त हो गये। बाकी बचे हुए आगे तीन युगों में पार हो जायेंगे, किन्तु यह कैसे पता चला कि आने वाले तीन युगों में जो पार उतर जायेंगे, ये वे ही जीव हैं जो प्रह्लाद के अनुगामी थे? वे तो और भी हो सकते हैं। उनका पता लगाना भी तो टेढ़ी खीर है।

नाथोजी बोलेः अपने लिए तो अवश्य ही जीवों की जाति पहचानना कठिन है, किन्तु परमात्मा के लिए तो सामान्य सी बात है। जिस प्रकार से बहुत सी गायों में से हम अपनी गाय पहचान लेते हैं, उसी प्रकार से असंख्य जीवों में अपने जीव हैं, उन्हें पहचानना है। वे ही संस्कारी जीव पार उतर गये हैं। श्री देवजी ने कहा भी है- क्रोड़ तेतीसूं बाड़े दीन्ही, तिन की जात पिछाणी। मैंने उनकी जाति को पहचान लिया है। जाति अर्थात् स्वभाव से पहचान की जा सकती है। परमात्मा सर्वज्ञ हैं। सभी जीवों की जाति जानते हैं। हम लोग अल्पज्ञ हैं, इसलिए शंका होनी स्वाभाविक ही है।

ये सभी अपनी-अपनी साधना पर ही निर्भर करता है। जो ज्यादा भक्ति भाव में ओत-प्रोत थे। अब किनारे लग ही चुके थे। उन्हें तो मात्र एक अन्तिम धक्का लगना था। वे कूदने के लिए तैयार ही थे। उनकी तो सतयुग में परमात्मा की महाज्योति से जीव की अल्प ज्योति मिल गयी। किन्तु अब तक कुछ कच्चे थे, पकने में कुछ समय लगेगा। उन्हें पुनः त्रेता द्वापर तथा कलयुग में जन्म लेना पड़ा। उन्हें सचेत करते हुए बतलाया था कि तुम प्रह्लाद पंथी हो। तुम्हारा मार्ग ही दूसरा है। तुम्हें तो पुनः सागर में प्रवेश करना है। अब तुम्हारा समय आ गया है। इस प्रकार से जाग्रत करके उन्हें पार उतार दिया।

वील्हा उवाचः आपने जो कलश स्थापना के बारे में कुछ कहा है, मैं ठीक प्रकार से कलश स्थापना के महत्व को जानना चाहता हूँ। इसमें कुछ कहने योग्य कुछ गुह्य ज्ञान हो तो आप मुझे अवश्य ही बतलाने का कष्ट करें? कुछ ऐसी बातें है जो बिना जाने तृप्ति नहीं होती?

नाथोजी उवाचः वैसे तो ऊपर से देखने से तो कुछ भी विशेष दिखलाई नहीं पड़ता, जल से भरा हुआ मिट्टी का घड़ा ही तो है। किन्तु इसमें बहुत कुछ गम्भीर ज्ञान छिपा हुआ है। दरअसल में तो यह कलश ही सृष्टि का रूप है। इसी कलश में जल भरा हुआ है। पृथ्वी भी भीतर-बाहर जल से ओतप्रोत है। जल से ही सम्पूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति होती है। जल में भगवान् विष्णु शरीर धारी सर्वप्रथम प्रकट होते हैं। उन्हीं विष्णु की नाभि से कमल प्रकट होता है। कमल से सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा प्रकट होते हैं। तीन गुणों की सम्पूर्ण सृष्टि है। ये तीन गुण सत्व, रज तथा तम हैं। इन्हीं तीन गुणों के प्रतीक तीन देवता हैं। सत्व पालन पोषण क र्ता विष्णु, रज रचयिता ब्रह्मा और तम सहांर कर्त्ता शिव।

गंगा यमुना और सरस्वती नदियाँ भी जल रूप में ही हैं। तेतीस करोड़ देवता भी जल में ही देवत्व रूप से विराजमान हैं। वही जल कलश में भरा जाता है। इन्हीं देवताओं का आनान किया जाता है। तब वह जल देवरूप हो जाता है। उसी अभिमंत्रित जल को पाहल कहा जाता है। जो भी पाहल ग्रहण करता है, वह मानो देवता को ही ग्रहण कर रहा है। ये देवता हमें शक्ति प्रदान करते हैं। हमें सद्गुणों से सम्पन्न बना देते हैं। हम स्वयं देव ही बन जाते हैं। जल की विशेषता है कि वह दूसरों के गुणों को ग्रहण करता है। वह कलश में स्थित जल कोरे मिट्टी के घड़े से पृथ्वी का गुण सुगन्धी ग्रहण करता है। काठ की माला जल में घुमाई जाती है। वह जल काष्ठ के मनकों से भगवान् के नाम का स्मरण ग्रहण करता है। तांबे के पैसों से तांबे का गुण तथा तत्कालीन की सभ्यता को ग्रहण करता है। ऋषि थाप्या गति ऊधरे कलश की स्थापना करने वाले ऋषि प्रह्लाद, हरिश्चन्द्र, युधिष्ठिर आदि जैसे पवित्र आत्मा से उनके अन्दर स्थित भक्ति, सत्य, धर्म को जल ग्रहण करता है। पास में ही परमात्मा की ज्योति जलती है, हवन होता है। उस हवन की तेजस्विता, उष्णता तथा प्रकाश जल ग्रहण करता है। इसी प्रकार से सृष्टि के सभी गुणों को जल ग्रहण करता है। जिसको भी इस प्रकार का अभिमंत्रित जल दिया जायेगा, पाहल पान करने वाला हाथ में जल लेकर संकल्प करता है कि मैं सभी दुर्गुणों का त्याग करूँगा। सद्गुणों से सम्पन्न होऊँगा। ऐसे संकल्पवान पुरुष के लिए पान किया हुआ पाहल सद्गुणों से परिपूर्ण कर देता है। संसार में जीने की युक्ति प्रदान करता है और मृत्यु पर मुक्ति प्रदान करता है।

जल देवता है। जल ही जीवन है। वह जल कलश यानि सृष्टि से भरा हुआ है। उस जल को अभिमंत्रित किया गया है। अन्दर शुभ भावना से अमृतमय बनाया गया है। इस प्रकार के अमृतमय जल का पान करते हुए, जाम्भोजी महाराज कहते हैं कि 21 करोड़ पार पहुँच गए हैं। उन्हीं प्रह्लादपंथी जीव जो 12 करोड़, यहाँ मरुभूमि में जन्म लेकर आ गये हैं। उनको भी पाहल पिलाकर उनकी सद्गति करनी है।

यह सतपंथ जो प्रह्लाद के समय में स्थापित हुआ था, वह तीन युगों को पार करता हुआ अब कलयुग में अटक गया है, उस भूले हुए पंथ की उन प्रह्लाद पंथियों को याद दिलानी है। उन्हें इस संसार सागर से पार कर देना है। वैसे तो लोग बहुत ही लम्बा मार्ग तय कर आये हैं। किन्तु उन्हें अपने मार्ग का ख्याल नहीं है। अब तो उन्हें दूसरे की ही जरूरत है। अंगुलि द्वारा संकेत की ही जरूरत है। वे शीघ्र ही जग जायेंगे। जिन्हें अभी सोना है, वह तो सोयेगा ही। वे लोग इधर इस मार्ग में नहीं आयेंगे। क्योंकि उन्हें अब कोई जन्म और भी लेने पड़ेंगे। कहा भी है- जुग जागो जुग जाग पिराणी, कांय जागंता सोवो।