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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह19 / 94

तीसरा अध्याय · कथा 19

बिश्नोई पंथ की स्थापना

नाथोजी अपने प्रिय सुयोग्य शिष्य वील्होजी के प्रति इस प्रकार कहने लगे-हे शिष्य! पूल्होजी के स्वर्ग दर्शन के पश्चात् जम्भेश्वर जी सम्भराथल पर ही विराजमान रहने लगे थे। संसार में अवतार लेकर आये हुए बहुत समय व्यतीत हो गया था। उस समय वि. सं. 1542 प्रारंभ हो गया था सिद्धेश्वर जी ने चौतीस वर्ष व्यतीत कर दिये थे, किन्तु प्रह्लाद पन्थी जीवों के उद्धार का प्रमुख कार्य करना तो बाकी ही पड़ा था सम्भराथल पर बैठे हुए विचार मग्न रहते। समय की प्रतीक्षा कर रहे थे। समय से ही अधूरे कार्य पूर्ण हो जाया करते हैं। समय से पूर्व बहुत सारे कार्य पूर्ण नहीं हो पाते हैं।

मरुभूमि में उस समय महा अकाल पड़ा। इस देश में वर्षा की तो वैसे ही कमी रहती है। इस वर्ष तो लोगों अक्षय तृतीया से ही आकाश की तरफ देखना प्रारम्भ कर दिया था कि कहीं पर बादल आते हुए दिखाई देते हैं क्या? ज्यों समय आगे गुजरता गया त्यों-त्यों प्रतीक्षा अधिक से अधिकतर होती जाती थी। इस प्रकार से प्रतीक्षा करते हुए ,शून्य में देखते हुए लोगों ने ज्येष्ठ, आषाढ, श्रावण,भादवा तथा आसोज भी व्यतीत कर दिया, किन्तु कहीं भी आकाश से जल की एक भी बूँद नहीं टपकी।

सम्पूर्ण मण्डल में भारी अकाल पड़ा। इस दौरान न तो कहीं बिजली चमकी और नही कहीं गर्जना सुनाई दी। सम्पूर्ण दुनिया में त्राहि-त्राहि होने लगी। दुर्भिक्ष पड़ जाने से दुनिया भूख मरने लगी। कई-कई जीव गरीबी के कारण बहुत दुःखी हो गये थे। भूख का दुःख कब तक सहन किया जा सकता है ? कहीं से भी अन्न मिलने की सम्भावना नहीं दिख रही थी। जब तक अन्न कोठे में था, तब तक तो जैसे-तैसे समय को व्यतीत किया जा सकता था, लेकिन अन्न का ज्यों ही अभाव आ जाता हैं, कोठे खाली दिखते हैं तो यह पेट भी दुगुना भूखा हो जाता है। ऐसा ही चारों ओर हाहाकार मच गया था।

भूख से मरेंगे, इसमें कुछ भी संशय नहीं है । कुछ लोगों के पास थोड़ा कुछ गुजारे लायक था तो भी वे छिपाकर बैठ गये थे । इस समय तो भूखा रह लेंगे, लेकिन आगे तो काम आयेगा । अज्ञानी कृपण लोग अन्न पास में होते हुए भी भूख मरने को तैयार थे ।

गाय आदि पशु भी तो अकाल की दशा में भूख के कगार पर पहुँच चुके थे। उनके मालिक स्वयं ही भूखे रहेंगे, तो उन निरीह पशुओं को कौन खिलायेगा? फिर वन में विचरण करने वाले जीव तो कहीं कुछ न कुछ अपनी जिवारी के लिये हासिल कर ही रहे थे, क्योंकि पशु स्वभावतः संग्रह नहीं करता है। वह तो वर्तमान में जीता है। आज ठीक है। यह समय ठीक है। वैसी कल की चिन्ता नहीं है। कल के लिये न तो संग्रह करेगा और न ही कल के लिये जियेगा। इसलिए मनुष्य की अपेक्षा पशु सुखी है। किन्तु मानव इस सिद्धान्त के विपरीत है। आज में नहीं जीना कल के लिये आज जी रहा है। परन्तु कल का कुछ भी पता नहीं है। इसलिये मानव पशु से ज्यादा दुःखी है।

कल क्या होगा, आज तो ठीक ही है। इस प्रकार से सौ वर्षों के लिये पहले से ही जुगाड़ कर लेने की कोशिश में जीता है। यही दुःख का कारण भी है। कुछ लोगों के पास तो आज के लिये भी खाने को कुछ नहीं था। कल की आशा क्या करे। अन्य कुछ लोगों ने अन्न का संग्रह कर लिया था। कल के लिये भी आज भूखे रह लेंगे, किन्तु कल से पेट भरकर खायेंगे। यह अव्यवस्था चारों ओर फैल गयी थी। उन्हें लूट-पाट का खतरा भी सता रहा था। भूखा आदमी क्या नहीं कर सकता है? इस प्रकार से इस मरुदेश में रह कर जीना तो कठिन था।

कुछ गाँवों के लोग एकत्रित हुए और विचार करने लगे-भाइयों! क्या करें कैसे जियेंगे? यहाँ पर रहने से तो भूखे मर जायेंगे। हमने सुना है कि यहाँ से बहुत दूर मालवा देश है, वहाँ पर प्रत्येक वर्ष अच्छी वर्षा होती है। कभी अकाल नहीं पड़ता है। यदि हम लोग जीने के लिये यह अपनी मातृभूमि-देश छोड़कर मालवा चले जायेंगे तो कैसा रहेगा? हम जानते है कि अपनी मातृभूमि छोड़ना कष्टदायी है, किन्तु प्राणों की रक्षा करने का भी तो अपना प्रथम कर्तव्य है , वैसे तो श्री रामजी ने कहा भी है।

यद्यपि स्वर्णमयी लंका , न मे लक्ष्मण रोचते ।

जननी जन्म भूमिश्च , स्वर्गादपि गरीयसी ।।

कुछ गाँवों के लोगों ने एक समूह बना कर अपने-अपने छकड़ों, ऊँटों पर सामान लाद कर के समूह रूप से गायों आदि पशुओं को आगे करके रवाना हुए। वे लोग सम्भराथल के नीचे के मार्ग से होकर जा रहे थे।

जाम्भोजी ने सम्भराथल के ऊपर से देखा कि इतना बड़ा समूह जा रहा है। यह देश छोड़कर, इस प्रकार से तो यह सम्पूर्ण देश ही खाली हो जायेगा। मैं तो देख रहा हूँ कि ये तो सभी प्रह्लाद पंथी जीव हैं। इन्हें तो चेताना है। ये ही यहाँ से चले जायेंगे तो फिर मेरा यहाँ इस देश में आना इतने वर्षों तक यहाँ पर रहना क्या होगा? ये लोग थोड़ी सी विपत्ति आने से ही व्याकुल हो गये है। आगे मैं देख रहा हूँ। यहाँ के निवासियों के लिये सुनहरा अवसर है। इनको रोकना चाहिये। ऐसा विचार करते हुए श्री देवजी सश्वभराथल से नीचे उतरे और उनके मार्ग को रोककर खड़े हो गये। और उनसे कहा-भाई लोगो! ठहर जाओ! आगे मत बढो। मैं तुम्हारी सहायता करने आया हूँ। मैं जानता हूँ। तुम भूखे हो और भूखे भजन न होय गोपाला, लेलो अपनी कंठी माला।

लोगों ने कहा-महाराज! आप हमें क्यों रोक रहे हो? यहाँ आप देख नहीं रहे हो, भयंकर अकाल पड़ गया है। हम लोग मालवे जा रहे हैं। आपके पास देने को कुछ है क्या? जो हम लोगों की भूख मिटा सके? आप तो स्वयं ही हमारे गृहस्थी के आधार पर जीवन जीते हैं। हमारे घर से ही आपको अन्न मिलता है। आप कहाँ से इन सभी को खिलाओगे? हम आपको जानते हैं। खास शिव भण्डारी बिना यहाँ अन्न की पूर्ति होना असम्भव ही है।

सिद्धेश्वरजी ने कहा-हे लोगो! आप ऐसी छोटी बातें मत करो। मेरे पास सब कुछ है। तुम यहाँ से चले जाओगे, तो क्या अकाल समाप्त हो जायेगा? क्या इस समस्या का समाधान हो सकेगा? यदि हो जाता है, तो आप भले ही चले जाओ। क्या आप लोग बता सकते हो कि तुम्हारे इस देश में अकाल क्यों पड़ा?

हे महाराज! हमें तो इस बात का ठीक से पता नहीं है किन्तु सुनते हैं कि हमारा कोई पाप है, जिस वजह से इन्द्र देवता हमसे रूठे हैं। वर्षा नहीं होती है। अकाल पड़ता है। देवजी ने पूछा-यह बतलाओगे क्या? कि कोनसा पाप है जिससे इन्द्र देवता रुष्ठ हो जाते हैं? तथा वर्षा नहीं होती है। यह कहना कठिन है महाराज! आप ही बतलायें तो ठीक होगा। सिद्धेश्वरजी ने बतलाया कि सुनो-तुम लोगों ने वृक्ष काट लिये हैं। इस धरती को नंगा कर दिया है। ये वृक्ष ही वर्षा लाते हैं। ये वृक्ष ही तुम्हारे जीवन का आधार हैं। तुमने अपने मूल का ही छेदन कर दिया है। तो अब कैसे फू लोगे फ लोगे?

जहाँ पर भी हरियाली होगी, वहीं पर वर्षा होगी, तथा जहाँ पर भी वर्षा होगी वहाँ पर हरियाली होगी। ये एक दूसरे के पुरक हैं। किन्तु मानव ने इस प्रकृति में विकृति पैदा कर दी है। जो ठीक प्रकार से एक दूसरे के सहयोगी बन कर के खुशहाली लाते थे, वे अब विकृत हो गये हैं। एक-दूसरे से रूठ गये हैं। यह सभी कुछ कार्य तो तुमने ही किया। यही तुम्हारा पाप है। जहाँ पर वन होगा, वहीं पर मानव, पशु-पक्षी आदि बहुतायत से होंगे। सुखी जीवन व्यतीत करेंगे।

दरखत जब अपनी श्वांस छोड़ता है, तो उसे पशु-पक्षी, मानव आदि ग्रहण करके पुष्ट होते हैं। तथा मानव पशु पक्षी आदि अपनी श्वांस छोड़ते हैं, उसे पीकर वृक्ष पुष्ट होते हैं। इस प्रकार से एक दूसरे का गहरा सम्बन्ध है। एक के बिना दूसरा जीवित नहीं रह सकता। इसलिये तुम लोगों ने हरे वृक्ष काटकर बहुत बड़ा अपराध किया है, इसी पाप का फल तुम लो3 भोग रहे हो।

दूसरा कारण यज्ञ भी है जहाँ पर यज्ञ होगा वहाँ पर इन्द्र वर्षा करेगा। तुम लोगों ने यज्ञ की जगह तम्बाकु, चरस, अफीम, गांजा आदि के धुएँ से पर्यावरण को दूषित किया है। देवता यज्ञ में उठी हुई यज्ञ धूम की पवित्र सुगन्धी ग्रहण करते हैं, वे तुम्हें वर्षा के द्वारा तृप्त करते हैं। परस्पर जो देवता व मानव का पवित्र भाव था, वह यज्ञ न करके तुमने तोड़ दिया है। इसे पुनः स्थापित करो, तभी तुम्हारे यहाँ पर वर्षा होगी। कभी अकाल नहीं पड़ेगा। यही तुम्हारा दूसरा सबसे बड़ा पाप है। इससे वर्षा नहीं हो रही है।

उपस्थित जन समूह ने कहा-महाराज! आपने जो ज्ञान की बाते बतलाई हैं, ये हमें अच्छी लगी है। किन्तु भूख तो अभी लगी है। इसका कोई तुरन्त इलाज है तो अभी बतलाओ? कब वृक्ष लगेगें व कब वर्षा होगी? कब हमारे खेत निपजेंगे? कब हमारी भूख मिटेगी? इस समय यज्ञ करने के लिये भी हमारे पास कुछ नहीं है। यज्ञ भी तो समय-समय पर किया हुआ फलदायी होता है। अब तो वर्षा का मौसम भी चला गया है। ये कार्य भी तो समय पर करने के हैं। इस समय तुरन्त कोई इलाज बताओ, जिससे हमारी क्षुधा की निवृत्ति हो सके।

जम्भेश्वरजी ने कहा-हे भक्तो! आप इस समय चिन्ता न करें, मेरे पास अन्न का ढेर है। मैं आपको भर पेट भोजन दूँगा। ये तुम्हारे पशुधन भी यहाँ पर भूखे नहीं रहेंगे, इन्हें घास-जल आदि मिलेगा। यह सश्वभराथल जंगल सभी को सब कुछ देगा। यदि आप लोगों को विश्वास नहीं हो रहा है तो मेरे साथ सम्भराथल पर चलो, मैं तुम्हे अन्न की ढेरी दिखाता हूँ। ऐसा कहते हुए उन लोगों को सम्भराथल पर ले गये और सात अन्नों की सात अलग-अलग ढेरियाँ दिखाई और कहा कि जिसको जितना अन्न चाहिए, यहाँ आकर उतना अन्न ले जाइये। किसी को भी भूख से मरने की नौबत नहीं आने दी जायेगी।

लोगों ने जाकर अन्न की ढेरी तो अवश्य देखी, किन्तु वे तो छोटी-छोटी ही थी। आपस में काना फू सी होने लगी-इतने लोगों के लिये ये ढेरियाँ ज्यादा दिन नहीं चलेंगी। इन बाबा लोगों का क्या भरोसा, न जाने कब यहाँ से उठकर चल पड़े? हमें पता भी नहीं चलेगा। तब हम क्या करेंगे? आगे के रहेंगे न पीछे के। वैसे ये बाबाजी झूठ तो नही बोलते हैं तथा इनको झूठ बोलकर हमसे लेना भी क्या है? किन्तु अन्न लेने से पहेले ये बातें स्पष्ट कर लेनी चाहिये।

जम्भदेवजी से उपस्थित उन लोगों ने पूछा-हे महाराज! हमें इन छोटी-छोटी ढेरीयों को देखकर तो सहसा विश्वास तो नहीं हो रहा है। इधर जनता को देखते हैं तो बहुत ही ज्यादा है। अन्न बहुत ही कम है। क्या सभी लोगों के लिये प्रयाप्त होगा? नया अन्न खेतों में निपजने में तो बहुत ही देरी है। जब तक हमारे खेतो में नया अन्न निपजेगा, तब तक दोगे या बीच में ही गुरु देव ने कहा-आप लोग निश्चित रहो, मेंरे पास एक बहुत बड़ा साहूकार है वह देगा। उससे बढकर दुनिया में साहूकार कोई नहीं है। ये तुम्हे छोटी-छोटी ढिगलियाँ दीख रही हैं, किन्तु यह अखूट है। ज्यों-ज्यों आप ले जायेंगे, त्यों-त्यों ये बढती जायेंगी। ज्यों ही ज्यादा ले जाओगे, त्यों ही ज्यादा बढेंगी।

मैं तुम्हारे सामने सच कहता हूँ कि आप लोग मेरे कहने अनुसार चलोगे, तो तुम्हें एक दो वर्ष नहीं सदा- सदा के लिये अन्न देता रहूँगा। तुम नहीं जानते कि मैं कौन हूँ। मैं ही तो सृष्टि का कर्ता वह साहूकार हूँ तथा पालन-पोषण कर्ता स्वयं विष्णू हूँ। तुम्हारे उद्धार हेतु यहाँ पर आया हूँ। अब तुम लोग अपने जीवन का भार मेरे उपर छोड़कर निश्चित हो जाओ। अपने-अपने गाँवों को वापिस लौट जाओ। जो भी आपके साथ यहाँ पर नहीं आये हैं। उन्हें भी यह शुभ समाचार दे देना।

इस समय तो आप लोग अन्न-जल द्वारा भूख-प्यास मिटाओ। जब तुम लोग तृप्त हो जाओगे तो मैं तुम्हें कुछ अन्य ज्ञान ध्यान की बाते बताऊँगा। नित्य प्रति यहाँ से अन्न ले जाया करो। ऐसा कहते हुए उन लोगों को तो वापस लौटा दिया।

कुछ ही लोग यहाँ पर चलकर आये हैं, किन्तु अन्य गाँवों की स्थिति भी अच्छी नहीं है। वहाँ जाकर भी देखना चाहिये कि किस प्रकार से लोग अपना जीवन यापन कर रहे हैं। धर्म-कर्म के बारे में लोगों का क्या ख्याल है? ऐसा विचार करके श्री जम्भदेवजी सम्भराथल से थोड़ी दूरी पर ही स्थित बापेऊ गाँव पहुँचे।

गाँव में प्रवेश किया तब गाँव के बारे में जानकारी मिली। गाँव के बाहर ही भेड़ -बकरी की खाले पेड़ो पर सूख रही थी। लगता है यह जानवर अकाल की वजह से नहीं मरे हैं। इन्हें मारा गया है। इसलिये इस गाँश के लोगों के माँसाहारी होने में कोई संदेह नहीं है। गाँव के अन्दर प्रवेश किया तो देखा कि लोग आ जा रहे हैं। कई लोग तो सामने से आकर निकल जाते, लेकिन उन लोगों ने नवण प्रणाम या आदेश आदि कुछ भी नहीं किया। नमन प्रणाम के गुणों से ये लोग परिचित भी नहीं थे।

कुछ लोग आपस में बातें कर रहे थे। एक दूसरे से जाम्भोजी का परिचय पूछ रहे थे। जिसकी जैसी समझ है, वैसा ही बतला रहे थे, कोई कह रहा था कि यह तो पीपासर के ठाकुर लोहटजी के पुत्र हैं। कोई कहता था कि यह तो गूँगे हैं, किसी ने कहा कि यह तो आजकल पीपासर छोड़कर सम्भराथल पर रहने लग गये है। जितने लोग उतनी बातें, परन्तु कोई भी पास में आकर यहाँ आने का कारण नहीं पूछते थे।

बापेऊ गाँव में खिलेरी, यादव, भाटी इत्यादि किसान लोग सीधे-साधे अपनी खेती करके आजीविका चलाने वाले रहते थे। उन्हें ज्ञान से कुछ भी लेना देना नहीं था। अब तक उनके गाँव में सत्य का मार्ग बताने वाला तो कोई नहीं आया था। उन्हें क्या दोष दिया जाये? उन लोगों का खान-पान भी भ्रष्ट ही था। दयादान के बारे में वे लोग कुछ भी नहीं जानते थे। भेड़ -बकरी आदि को मारकर खा जाया करते थे। जीवों पर दया करना वे लोग कुछ भी नहीं जानते थे।

वे लोग सुबह जल्दी स्नान करने के बारे में भी पूर्ण रूप से अनभिज्ञ थे। देवी-देवता के नाम भूत-प्रेत, भेरूं भोमिया की पूजा करते थे। इन्हें अपने कुल का देवता बतलाते थे। विष्णु के नाम का सार नहीं जानते थे। वे लोग भ्रम की सांकल में बंधे हुए थे। इनका भ्रम टूटे तो दुःखों से छूटे। अपनी कमाई का धन कुपात्रों को देकर नष्ट कर देते थे। जाम्भोजी ने कहा-आप इस समय चिन्ता न करें। मेरे पास अन्न का ढेर है। मैं आपको भर पेट भोजन दूँगा। ये तुम्हारे पशुधन भी यहाँ पर भूखे नहीं रहेगे। इन्हें घास जल आदि मिलेगा। यह सश्वभराथल जंगल सभी को सब कुछ देगा।

यदि आप लोगों को विश्वास नही हो रहा है तो मेरे साथ सम्भराथल पर चलो। मैं तुम्हे अन्न की ढेरी दिखाता हूँ। ऐसा कहते हुए उन लोगों को सम्भराथल पर ले गये और सात अन्नों की सात अलग-अलग ढेरियाँ दिखाई और कहा कि जिसको जितना अन्न चाहिए, यहाँ आकर उतना अन्न ले जाइये। किसी को भी भूख से मरने की नौबत नहीं आने दी जायेगी।

सत्य झूठ का कुछ भी पता नहीं था। कपट कुलोभ से पाप के वशीभूत हो जाते थे। कभी कोई भी कष्ट आता तो भोपा भरड़ा से पूछते कि हमारे दुःखों का कारण एवं निवृत्ति का उपाय बताओ। वे उन्हें उल्टे मार्ग में डाल देते। उन्हीं से धन तो ले लेते और पाप के मंझ में डालकर डुबो देते। ऐसी दशा जाम्भोजी ने देखी थी। गुरु जी ने विचार किया कि ये लोग तो ऊर्जावान, शक्तिमान है, किन्तु इनकी शक्ति का दुरुपयोग हो रहा था। कुछ स्वार्थी लोग इन्हे अपने स्वार्थ पूर्ति हेतु सतपंथ से दूर ले जा रहे हैं। देखो ये लोग तो प्रह्लाद पंथी जीव हैं। लेकिन यह्य लोग इस समय कुसंगति से दूषित हो गये हैं। इन्हे सद्मार्ग का पथिक बनाना है। उन जीवों का कोई कर्म उदय हो गया था,जिससे उनकी नगरी में स्वयं विष्णू आये है। अन्यथा मुनि लोग जन्मों-जन्मों तक प्रयत्न करते रहते हैं, फिर भी इस प्रकार से आकर सम्भालते नहीं हैं। डूबते हुए को बचाने आये हैं। अवश्य ही कुछ नया कार्य होने जा रहा है। पाप और भूख मिटाने के लिए नगरी में स्वयं देवता ही आये हैं।

नर-नारी सन्मुख आते, किन्तु नमन करना भी नहीं जानते। बिना प्रेम के ही आकर बैठ जाते। जो प्रेम उत्साह होना चाहिये था, वह नहीं था। जैसा कि कोई संत महापुरुष नगरी में आया है, तो उनसे कुछ ज्ञान की बात पूछना चाहिये। किन्तु ये लोग धर्म-कर्म के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे। बिना जाने पूछे भी क्या? कुछ है समझ में ही नहीं आती थी।

वे लोग तो जाम्भोजी को अभी भी गूँगा ही मानते थे। पूर्व जन्म का पाप अब भी उन्हे सद्मार्ग का पथिक बनने से रोक रहा था। लोगों ने विचार किया कि हम भाटी खिलेरी हैं। ये तो हमारे ही नाती-धेवते हैं, क्योंकि इनकी माँ तो हमारे ही कुल की है। हम अपने भानजे से क्या पूछे? हम तो इनसे कुछ अधिक ही जानते हैं। ये तो हमारे घर के ही योगी है। कोई दूसरे गाँव परिवार के होते तो सिद्ध होते। हम उनके पाँव पूजते।

जब उन गाँव के लोगों ने कोई सुपथ की बात नहीं पूछी तो देवजी ने स्वयं ही बात चलाई कि हे गाँव के लोगो! बुजुर्गो एवं मेरे साथियो! “ रहस्यौ का जास्यौ जीवारा” आप लोगों को मालूम ही है कि भयंकर दुर्भिक्ष पड़ गया है। यहीं रहोगे या कहीं अन्यत्र जाओगे? अपने जीवन जीने हेतु क्या करोगे?

लोगों ने कहा-हे महाराज! महा भूख आ गई है। यह तो सुबह खाते हैं, तो शाम को लग जाती है। रात्रि को खाकर सोते हैं, तो सुबह को लग जाती है। यहाँ पर रहने में डर लगता है। एक टुकड़ा भी यहाँ पर खाने को नहीं मिलेगा। हम ही क्यों? सारी दुनिया ही इस भंयंकर अकाल में भयभीत हो गई हैं। बिना अन्न के तो किसी से भी नहीं रहा जाता है। समय पर भूख तो अन्न की माँग करती है।

लोग कहने लगे-अन्न के बिना तो साधु-संत, सिद्ध-देव भी नहीं रह सकते। उन्हें भी समय पर अन्न चाहिये। हम तो धान की ही कोठी हैं। अन्न के बिना तो लोग तो भूखो मर कर, मर जायेंगे। हम तो महाराज मरना नहीं चाहते हैं। जीना चाहते हैं।

जम्भदेव जी बोले-आप लोग बिना जाने, सोचे-समझे इस प्रकार की बातें न कहें, अन्न जल के अभाव में कौन मर गये? उनकी संख्या बतलाओगे? पालण-पोषण कर्ता भगवान् विष्णु सभी को देते हैं। किसी को भी भूख प्यास से नहीं मरने देते। जब सर्व पालक सभी को रोजी-रोटी देता है, तब आप लोग कैसे कह सकते हैं कि भूख से मर गये। ये जितने भी पशु-पक्षी, कीट-पतंग, छोटे-बड़े सभी का पालन पोषण करने वाले वही हैं, फिर आप क्यों ऐसा बोलते हैं?

आप लोग यह बतलाइये कि आपके इस गाँव के लिये नित्य प्रति कितना अन्न चाहिये। लोग कहने लगे,महाराज! सवा मन अन्न यदि इस गाँव को मिलता रहे तो हमारे यहाँ से कोई भी यह गाँव छोड़कर नहीं जायेगा । देवजी ने कहा - आप लोग कोई भी मालवे मत जाओ । यदि तुम्हारा विचार यहीं रहने का है तो मेरे पास एक साहूकार है, वह तुम्हें अन्न देगा। जिसको जितना चाहिये उतना देगा। सवा मन से कहीं ज्यादा चाहिये तो भी देगा। अन्न देकर मोल भी नहीं माँगेगा।

ग्रामीण जनों ने पूछा कि महाराज! आपके पास साहूकार ऐसा कौन है, जो इतने लोगों को मुफ्त में अन्न देगा? साहूकार तो देगा। लेकिन वे तो ब्याज सहित वापिस माँगेगा, तब हम कहाँ से देंगे? तथा हमें आपका भी विश्वास कम ही हो रहा है। क्या पता बाबाजी का? आप उठकर चल देंगे, तो हमें पीछे आपका साहूकार कैसे देगा? हम तो कहीं मंझधार में डूब जायेंगे। न तो इधर के रहेंगे और न ही उधर के रहेंगे। त्रिशंकु की भांति बीच में ही लटक जायेंगे।

जम्भ यति ने कहा-आप लोग मेरी बात पर विश्वास करो। मेरे पास जो साहूकार है, वह कोई सामान्य साहूकार नहीं है, जैसा कि तुम समझते हो। वह तो जगत का पालन कर्ता स्वयं विष्णु ही है। वही विष्णु इस संसार में सब जगह व्याप्त है तथा इस संसार का पालन-पोषण भी वही करते हैं तथा वह प्रभु तुम्हारे शरीर में विद्यमान रहता है। तभी तुम जीवन जीते हो ।

यदि इन्द्र देवता तुम्हारे पर रूठ गये तो क्या हुआ, देवताओं के भी देवता विष्णु तुम्हारे पर प्रसन्न हैं। वह तो तुम्हें देगा कि इतना देगा जो तुम्हारे पास कमी नहीं पड़ेगी । मेरी एक बात और भी सुनो । आप लोग चारो दिशाओं में ढिंढोरा पिटवा दीजिये। कोई भी अन्न के अभाव में भूखा न रहे। मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी भी सकुशल रहे। सभी की पूर्ति वह विष्णु ही करेगा। आप लोग कल से ही अन्न लाना प्रारम्भ कर दो।

जन समूह ने कहा-हे देवजी! आप हमें अन्न देंगे,इसके एवज में हमें क्या करना होगा? यदि आपकी कोई शर्त हो तो हमें बतला दीजिये,क्योंकि जो भी वायदे होने हैं, वे पूर्व ही सभी के सामने ही हो जाये अन्यथा आगे जाकर कोई न कोई झगड़ा खड़ा हो जायेगा।

जम्भदेवजी ने कहा-सुनो! मैं भी अपनी बात तुम्हें बता देता हूँ। यदि आप राजी हो तो करना अन्यथा हम तो वापिस चले जाते हैं सम्भराथल, आप चले जाये मालवे। प्रथम तो तुम्हे नित्य प्रति स्नान करना चाहिये। वह भी प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व ही। बाद स्नान तो कोई स्नान नहीं है । दूसरा नियम यह कि मैं आपको जब अन्न दूँगा तो आप किसी जीव की हत्या नहीं करोगे। तीसरा नियम यह होगा कि किसी भी प्रकार के नशे से दूर रहोगे। इन धुआँ धकड़, माँस-मदिरा से दूर रहोगे। यदि ये नियम धारण करोगे तो मैं तुम्हे अन्न दूँगा, अन्यथा मैं कुपात्रों को दान नहीं देता। इन लक्षणों से जो युक्त है, वह मेरी दृष्टि में सुपात्र है।

कुपात्र कूं दान जु दियों,जाणै रैण अंधेरी चोर जु लियो ।

चोर जु लेकर भाखर चढियो,कह जिवड़ा तै कैने दीयों ।

लोगों ने कहा-महाराज! यह स्नान का नियम तो ऐसा कोई जरूरी नियम नहीं है। करे तो ठीक न करे तो ऐसा कोई नुकसान नहीं है। इस समय कार्तिक का महीना प्रारम्भ होने जा रहा है। सर्दी चमक गयी है। पूरे चार-पाँच महीने भयंकर सर्दी पड़ेगी। सर्दी में स्नान करना कठिन होगा। हम तो मर ही जायेंगे। हमने तो कभी स्नान किया भी नहीं है। अब कैसे हो सकेगा? यदि हम ठण्डे जल में स्नान करते हुए ठण्डे हो गये तो फिर यह तुम्हारा अन्न कौन खायेगा ?

हे दीनानाथ! हमने तो सुना और देखा है कि हमारी तो यह परंपरा रही है कि स्नान तो तीन ही प्रमुख है,पहला स्नान तो जब बालक जन्म लेता है तो दाई करवा देती है। दूसरा स्नान विवाह पर होता है। उस समय नाई करवा देता है,तीसरा स्नान अन्तिम स्नान है वह भाई करवा देता है। इनसे अतिरिक्त न तो कोई हमने देखा है न कोई हमने सुना है। और न ही कोई परंपरा आवश्यक है। हे देवजी! आप यह कहतें है कि धूंआ धकड़ छोड़े और यज्ञ करें,क्या फर्क पड़ता है धुँआ तो धुँआ ही होता है। चाहे वे यज्ञ का हो या तम्बाकू का हो? जीवों की हत्या करना तो क्षत्रियों का काम है, इसे कैसे परित्याग करें ?

जम्भेश्वरजी ने कहा-पहले आप लोग सम्भराथल से अन्न लाकर भोजन करें। बाद में मैं आप लोगों को अमृत पाहल पिलाऊँगा। जिससे आप लोगों का अन्तःकरण शुद्ध होगा। तभी तुम्हारे अन्दर शुद्ध भाव जन्म लेगा। तुम्हें इन दुर्व्यसनों से घृणा होगी। तभी स्वतः ही दुर्गुण छूटेंगे। उनकी जगह सम्मुणों का वास होगा। इसलिये आप लोग कार्तिक लगते ही अष्टमी के दिन आ जाना। वहाँ पर मैं तुम्हे अच्छी-अच्छी बातें बतलाऊँगा। पवित्र पाहल देकर बिश्नोई पन्थ की स्थापना करूँगा। आप लोग इस बात की सूचना सभी गाँवों में पहुँचा दें। अभी तो मैं चलता हूँ आप लोगों में से कोई एक आदमी मेरे साथ अन्न लाने के लिये चले तथा अन्न लाकर सभी लोगों को अन्न जिमाये। आप लोग मेरी बात पद्भ विश्वास करोगे तो मैं तुम लोगों को देवता बना दूँगा। सभी प्रकार के दुःखों से सदा-सदा के लिये छुटकारा दिला दूँगा। ऐसा कहते हुए सिद्धेश्वरजी सम्भराथल पर विराजमान हुए ।

सम्भराथल पर कुछ लोग तो अपने स्वार्थ हेतु तथा कुछ लोग परमार्थ हेतु आना जाना प्रारंभ हो गया था। कार्तिक बदि अष्ठमी के दिन सवा प्रहर दिन चढे पंथ स्थापना का सुयोग था। इसलिये सैंकड़ों लोगों को जहाँ-तहाँ गाँवों नगरों में भेजे। उन लोगों को यह कहकर भेजा कि सम्भराथल पर स्वयं जश्वभेश्वर जी बिश्नोई पंथ की स्थापना कर रहे हैं। आप लोग अष्टमी के दिन अवश्य आयें। जैसे आपको सुविधा हो, वैसे आप लोग पहुँचे। वहाँ पर अन्न धन्न,लक्ष्मी तथा रूप व गुण और मुक्ति प्राप्त होगी। जिसको जो चाहिये, वह मिलेगा। वहाँ पर इन वस्तुओं का भण्डार भरा हुआ है। जो भी वस्तु आप लोगों को चाहिये, वह जम्भद्वार पर हाजिर होकर प्राप्त करे ।

“ अन्न धन ज्ञान भक्ति अरू मोखा,मोपे राजे पाँचू थोका ।

इन चीजूं का भरिया भण्डारा,चाहो सो आवो जम्भ द्वारा ।। ”

जाम्भेजी की आज्ञा शिरोधार्य करके उस समय अनेक गाँवों के सभी प्रकार के लोग आये। उनमें ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य तीन वर्णो के लोग बहुतायत से थे। जिन-जिन गाँवों के लोग वहाँ पर आये थे और बिश्नोई पंथ का अनुगमन किया था। उनकी गौत्र तो वही रह गयी थी। उन्होने तो केवल पंथ-धर्म स्वीकार किया था। जिन-जिन गौत्रों के लोग वहाँ पर एकत्रित हुए थे, उनकी गौत्र इस प्रकार थी-

अत्री,अखीवड़, अवतार, अडोल, अग्रवाल, अडीग, अभीर, अहीर, आंजणा, आमरा, आंवरा, आयस, इहराम, ईडग, ईसराम, ईयार, ईसरवाल, उत्कल, उदाणी, गोदारा, ऐचरा, ऐरण, कड़वासरा, कर्णेटा, करीर, कबीरा, कलवाणिया, कसवां, काकड़, कालीराणा, कासणियां, कासिल, किंकर, किरपण, कुपासिया, कूहाड़, कूकणा, केरू, खदाह, खड़हड़, खाती, खावा, खासा, खिलेरी, खीचड़, खारा, खेरा, खोखर, खोथ, गरुड़, गर्ग, गाट, गावाल, गीला, गुजेला, गुरेसर, गुरु , गोड़, गोदारा, (खरिंगिया, सोनगरा, धोलिया, बन्नड़, उदाणी) गोभिल, गोयत, गोयल, गोरा, चंदेल, चांगड़, (सुथार) चाहर, चोटिया, चौहान, जंवर, जटराणा, जांणी, जांगू, जाखड़, जाजूदा, जागी, जीवावल, झांग, झांस, झांझणा, झासला, झूरिया, झोदकण, झोरड़, टांडी, टाडा, टुहिया, (टुसिया) टोकसिया, डागर, डारा, डूडी, डेलू, ढांढणियां, ढढरवाल, ढाका, ढूकिया, (डहूकिया) तंवर, तगा, तरड़, तायल, तांडी, तांडा, ताला, तुंदल, तेतरवाल, तोला, थलवट, थालोड़, थोरी, दइया, दड़क, दिलोइया, दूगेसर, देहड़ू, देवड़ा, दोतड़, धत्तरवाल, धामा, धायल, धारणियां, नाथ, नाड़ा नाई, निरवाण, नैण, पंवार, पड़िहार, पठान, पड़ियाल, परवाल, पारस, पटोदिया, (सुथार) पालड़िया, पुरवार, पुहिया, पूनिया, पेदड़ा, पोकरण, पोटलिया, पाटोदिया, बजाज, बछियाल, बडोदा, बटेसर, बरड़, बल्डकिया, बरदायी, बाबल, बावरा, बासणियां, बिडंग, बिच्छू, बिलादरू, बुरड़क, बूड़िया, बेरवाल, बोला, भूवांल, भट्ट भलूड़िया, भीलूमियां, भूवांल, भार8ाज, ़भांभू, भाखर, भाडेरा, भादू, भूट्टा, भेजावत, मंडा, मतवाला, मल्लाहा, माहेश्वरी, महिया, मांझू, माचरा(माजरा), मातवी, माल, मालीवाल, मूंड, मूंढ, मंडा, मेवरा, मेटला, मोगा, मोहिल, रसा, राठौड़, रायल, रावत, राव, राहड़, रूबावल, रेवाड़, रोज, रोहज, ललेसर, लटियाल, लांम्बा, लुहार, लेघा, लेधा, लोल, लोहमरोड़, वड़ियार, वागोतर, वटेसर, वाना (विडाऱ), वणियाल, वरा, विडासरा, विलोणियां, विलाला, वरयाल, वात्सल्य, वदिता, संन्यासी, सराक, सहू, सरावक, सारस्वत, सांई, सांखला, सांवक, सारण, सिघल, सियाक, सिंवर खिंया, सिरड़क, सिरड़िया, सीगड़, सींवर, सीलक, सीवल, श्रीमाली, सिंहल, सिसोदिया, सुथार, सुनार, सेवदा, सेनूड़िया, सोढा, हरड़ू, हाडा, हूमड़ा, हूडा, ब्राह्यण, क्षत्रिय, वैश्य आदि। इन उपरोक्त गौत्र के बिश्नोई बने थे। तथा आगे भी यह क्रम जारी था।

वील्होजी उवाच-हे गुरु देव! आपके कथनानुसार विभिन्न गोत्र (जातियों) के लोग कार्तिक मास की अष्टमी से आना प्रारंम्भ हुए थे,इतने लोगों के लिये भोजन जल आदि का प्रबन्ध भी तो श्री सिद्धेश्वरजी ने कृबण चरित्र से ही किया होगा। ऐसा मैं समझता हूँ। आगे मैं यह जानना चाहता हूँ कि श्री देवजी के पास ऐसा कौनसा मंत्र तथा तरीका था, जिससे सभी को एक ही पंथ पर चलने के लिये मजबूर कर दिया । अन्यथा इस देश के लोग सर्वथा अज्ञानी (विमूढ) थे। किसी की बात को मानने के लिये ही तैयार नहीं थे।

नाथोजी उवाच-हे शिष्य! जब सर्वत्र यह खुश खबरी फैल गई कि सम्भराथल पर जाम्भोजी महाराज अन्न-धन्न, लक्ष्मी, रूप, गुण और स्वर्ग, मुक्ति के दाता हैं, तो लोग कुछ तो दुःखी थे। इसलिये दुःख दूर करने के लिये आये थे,तथा कुछ भूखे थे, उन्हे भूख मिटानी थी। तथा कुछ लोग स्वर्ग-मुक्ति-प्राप्ति हेतु भी आये थे। तथा कुछ थोड़े से लोग ज्ञान श्रवणार्थ आत्म ज्ञान की प्राप्ति हेतु भी यहाँ पर आये थे। निष्प्रयोजन तो कोई यहाँ पर क्यों आता?

सर्वप्रथम श्री देवजी ने सम्भराथल पर कार्तिक वदी अष्टमी को विशाल यज्ञ का आयोजन किया था,क्योंकि अकाल पड़ा हुआ था। वातावरण दूषित हो चुका था। देवता नाराज थे। उन्हें आहुति प्रदान करनी थी। लोगों को यज्ञ के लिये प्रेरित करना था। यज्ञ के पास एक मिट्टी का कलश रखा गया था। उसमें शु) जल भर कर के रखा गया था। उसके नीचे बाजरा भर के रखा गया था। जो सभी के लिये खा7+ पदार्थ था। यह कलश पूर्वोत्तर कोण में रखा गया था, क्योंकि उस जल में वरुण देवता का आह्वान किया गया था। ओम् जदू वासरूपम् ” इत्यादि गोत्राचार द्वारा।

अग्नि प्रज्वलित करके विभिन्न देवताओं को मंत्रों द्वारा, अग्नि में स्वाहा कहते हुए आहुति प्रदान की थी। यज्ञ का कार्य सम्पन हो जाने पर श्री देवजी ने वहाँ उपस्थित जन समूह में से अपने ही शरीर सम्बन्धी चाचा पूल्होजी को पास बुलाया था। क्योंकि चाचा पूल्होजी कुछ दिन पूर्व स्वर्ग देख चुके थे। उस समय भी धन सम्पत्ति का दान करके संसार के मोह से निवृत्त हो चुके थे। वानप्रस्थ बन कर के अपने जीवन को साधना में ही व्यतीत कर रहे थे। उनसे बढकर वहाँ उस समय और कोई पवित्र आदमी नहीं था। पूल्होजी ज्ञान वृद्धवयोवृद्ध तथा सदाचारी साधक थे ।

उनका हाथ अपने हाथ में लेकर कलश पर रखा,हाथ में बाजरी एवं उस युग की प्रतीक मुद्रा-ताँबे का टका तथा ईश्वर स्मरणी माला को रखा,ये तीनों ब्रह्मा विष्णु महेश के प्रतीक है। श्री जम्भेश्वरजी ने सभी के लिये सभी से अनुमती लेकर कलश पूजा मंत्र का उच्चारण किया,वह इस प्रकार से है-