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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह58 / 94

नवां अध्याय · कथा 58

बूढ़े के प्रति शब्दोपदेश

जोय।” एक बिश्नोई आय कै, पूछै भेद विचार।

बेटा बेटी कुटुम्ब सूं, मोह न छूटे लिंगार।

घर मां ही मुक्ति भी हो, सो तुम कहो मुरार।

बूढे ऐसे बुझियो, जीव का करो उद्धार।

श्री जम्भेश्वरजी सम्भराथल पर विराजमान थे। एक बूढा नाम का खिलेरी गोत्र का बिश्नोई आया और उन्होंने पूछा- हे गुरु देव! मैं अब वृद्ध हो गया हूँ, मरने की तैयारी चल रही है, किन्तु बेटा-बेटी, पौत्र आदि का मोह नहीं छूट रहा है। ज्यों-ज्यों बुढापा आता जाता है, त्यों-त्यों तृष्णा अधिक बलवती होती जा रही है। आप यदि घर बार छोड़ कर संन्यास की बात कहें तो मेरे लिये ठीक नहीं होगी। मैं किसी भी प्रकार से प्राचीन परम्परा (संन्यास) ग्रहण करने के योग्य नहीं हूँ। घर परिवार के बीच में ही रह कर मुक्ति हो जाये ऐसा विचार बतलावे। इस प्रकार से बूढे ने जीव का उद्धार किस प्रकार से होवे यह पूछा था। श्री देव जाम्भेश्वरजी ने शब्द सुनाया-

शब्द-102 ओ३म् विष्णु विष्णु भण अजर जरीजै, धर्म हुवै पापां छूटीजै।

हरि पर हरि को नाम जपीजै, हरीयालो हरि आण हरूं।

हरी नारायण देव नरूं।

आशा सास निराश भईलो, पाईलो मोक्ष दवार खिणूं।

हे वृद्ध पुरुष! इस समय आप कोई अन्य साधना करने में समर्थ नहीं हो क्योंकि वह अवस्था चली गयी है। तिलों में से तेल निकल गया है। अब तो घर परिवार में रहते हुए ही, विष्णु-विष्णु इस महा मंत्र का जप करो। घर परिवार में बहुत कुछ हानि-लाभ, अर्थ-अनर्थ होगा, किन्तु तुम उनमें भाग न लो। बाह्य सांसारिक उपद्रवों से उत्तेजित न होवे। अंदर की शाश्वत शांति भंग न होने पावे। तुम्हें जो काम क्रोध, लोभ, मोह, सदा ही जलाते रहे हैं। उन्हें तुम पहले ही जला डालो। अर्थात् जरणा करो।

विष्णु का जप एवं जरणा कर लोगे तो धर्म होगा। धर्म होगा तो पापों से छूटेगा। धर्म ज्ञान रूपी अग्नि, पाप रूपी पुराने घास को जला डालेगी। इस प्रकार से लगातार अबाध गति से हरि का जप करो। अन्य कल्पित देवता को छोड़ कर, केवल एक हरि का ही जप करो। यही जीवन का लाभ है। अवश्य ही लाभ प्राप्त कीजिए और सतपन्थ के अनुयायी बनिये। यह सतपन्थ ही तुम्हें परमात्मा के धाम तक पहुँचा देगा। वहाँ से वापिस लौट कर नहीं आना पड़ता।

हे बूढा! अब तो तुम हरिमय ही हो जाओ। जहाँ देखो, वहाँ हरि विष्णु ही नजर आवे। कण कण में विद्यमान हरि हरियाली रूप में देखो। हरि आण, हरि की माया प्रकृति में ही तो वही सत्ता रूप से दर्शनीय है। विवेक द्वारा पानी का पानी, दूध का दूध कर देखो। सार तत्त्व ग्रहण करलो और संसार को त्याग दो।

हरि नारायण विष्णु ही देवताओं के भी देवता है। सभी के प्राण रूप से विद्यमान होकर सभी का पालन पोषण करते हैं। वही हमारे सर्वस्व हैं। उनका आधार ही तुम्हें जीवन गति, युक्ति, मुक्ति प्रदान करेगा। केवल एक विष्णु की प्राप्ति की आशा ही उत्तम आशा है। अन्य संसार की आशाओं से निराश हो जाईये। क्योंकि संसार प्राप्ति की इच्छा अब तक किसी की पूर्ण नहीं हुई है। एक आशा की पूर्ति यदा कदा हो भी जाती है, तो आगे हजारों आशाएँ और खड़ी हो जाती हैं, कहाँ तक पूर्ण करेंगे। इसलिए आशा रूपी फांसी में न बंध कर, विष्णु का जप करें। हे बूढा! अवश्य ही मुक्ति को प्राप्त होना है, तो इस शब्द को धारण करले। इस प्रकार से बूढे को शब्द सुनाया। युक्ति-मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया।