मुख्य सामग्री पर जाएँ
गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह72 / 94

दसवां अध्याय · कथा 72

मृगछाला पावोड़ी कांय फिरावों

जोगी सब भेला हुआ, आया मारू देश।

भस्म लगाई देह में, लम्बे बढाए केश।

जोगी जब डेरा किया, हिमटसर में आय।

सतगुरु को जब खबर हुई, सन्मुख मिले तांह।

जोगी तब बोले नहीं, सतगुरु कियो आदेश।

धूनी पावड़ी पवन पाणी, सब ही कियो अलेख।

हे वील्ह! लोहापांगल एवं लक्ष्मणनाथ आदि मण्डली को अनेकानेक शब्द पूर्व में सुनाये थे। इस समय भी नाथों की मण्डली सम्भराथल पर आयी थी। ज्यों-ज्यों चर्चा फैलती गयी, त्यों-त्यों अनेक साधु मण्डली सम्भराथल पर आती रहती थीं। कोई अद्भुत बात जब कानों में पड़ती है, तो स्वभाविक रूप से उसे जानने की जिज्ञासा प्रगट होती है। योगियों की जमात मरुस्थल देश में भ्रमण करने के लिए आयी थी। उन लोगों ने देह में भस्म लगा रखी थी। लंबे लंबे केश बढा रखे थे। विचित्र वेश भूषा एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़, स्वयं को ही पूज्य बनाने की लालसा, अनेक बाह्य आडंबर करवाती है।

उन योगी लोगों को स्वयं का तो कुछ पता नहीं है कि हम क्या कर रहे है? मद में अन्धे हो रहे थे। जाम्भोजी को परास्त करने हेतु सम्भराथल की तरफ बढ रहे थे। जिन गाँवों में आसन लगाते, वहाँ के लोगों को अपनी सिद्धि द्वारा आतंकित करते और अपना कार्य सिद्ध कर रहे थे। एक गाँव से दूसरे गाँव में पहुँचना, कई लोग धूणी लगा कर बैठते, कई लोग पंच अग्नि तापते थे। कई लोग इसके विपरीत भयंकर सर्दी में जल धारा अपने उपर डलवाते। गर्मी में भयंकर पाँच धूणा लगा कर तपते थे ये सभी क्रियाएँ ज्ञान मुक्ति में बाधक थी। किन्तु लोगों में वाह वाही खूब हो रही थी। इसीलिए ही तो ये लोग आडंबर करते थे।

योगी लोगों ने हिमटसर में आकर डेरा लगा लिया। वहीं के किसी व्यक्ति ने जाम्भोजी को खबर भेजी कि पूर्व की तरह इस बार भी सिद्धों की जमात आपको दुःख देने के लिए आ रही है। आप स्वयं ही इसका उपाय करें।

सद्गुरु जाम्भोजी ने कहा- ये योगी लोग न जाने कितनी दूर से कष्ट उठा कर आये हैं। वे तो हमारे मेहमान हैं। मैं उन्हें यहीं सम्भराथल पर ही बुला लाता हूँ। हे शिष्य गणो! आप लोग उनके लिए सावन-भादव कड़ाहे चढा दो। इनके लिए जल्दी से भोजन बनादो। जाम्भोजी उन योगियों के पास गये। वहाँ पर जाकर आदेश कहा-किन्तु कोई भी योगी बोला नहीं, परन्तु योगियों की तरफ से धूनी, पवन, पावड़ी ने आदेश आदेश कहा! चारों तरफ से आदेश की ध्वनि सुनकर योगी लोग लज्जित हो गए। उठ कर चल पड़े।

देवजी सम्भराथल पर विराजमान हुए, योगी लोग भी घेर कर बैठ गए। साथरियों ने देखा कि आकाश में मृगछाला एवं पावड़ी घूमती हुई दीख रही है। आश्चर्य चकित होकर पूछा कि हे देव! यह क्या हो रहा है।? ये मृगछाला एवं पावड़ी निराधार घूम रही हैं। यह किस की करामात है? श्री देवजी ने कहायह तो उन उपस्थित योगी लोगों की सिद्धि का परिचय है। किन्तु इतना ही पर्याप्त नहीं है। यह तो उन की साधारण सी बात है। बच्चों का ही खेल है। इससे आप लोग भ्रमित नहीं होना। इससे भी अधिक सिद्धि का प्रदर्शन किया जा सकता है। किन्तु इस समय आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार से कहते हुए श्री देवजी ने शब्द सुनाया-

शब्द-116 ओ३म् आयसां मृगछाला पावोड़ी कांय फि रावो,

मतूंत आयसां ऊगंतो भाण थंभाऊं।

दोनों परबत मेर उजागर, मतूंत अधबिच आन भिड़ाऊं।

तीन भवन की राही रुक्मण, मतूंत थल सिर आंण बसाऊं।

नवसै नदी निवासी नाला, मतूंतो थल सिर आन बहाऊं।

सीत बहोड़ी लंका तोड़ी, ऐसो कियो संग्रामो।

जां बांणे म्हे रावण मार्यो, मतूंत कोवंड सोखा हाथे सांहै।

कैरूं पांडव जांदम जोधा, मतूंत गढ़ हथनापुरि आंणि दिखाऊं।

अति अनेरा बाग सवाया, मतूंत सोवन मृगा करि चराऊं।

अति अनेरा पावस पांणी, मतूंत घण पाहंण बरसांऊ।

आयसां! मृगछाला पावोड़ी कांय फि रावो, मतूंतो उगंतो भांण थंभाऊं।

हे आयस! आप लोग मृगछाला एवं पावड़ी अधर आकाश में क्यों घुमाते हो? इससे अपनी सिद्धि प्रगट कर रहे हो। श्री देवजी कहते हैं कि वह भी मेरे सामने? यदि मेरी इच्छा हो तो मैं उगते सूर्य को भी रोक सकता हूँ। यदि मैं चाहूँ तो तुम्हारी इस सिद्धि को मन्द करने के लिए दोनों पर्वत जो उदयगिरी एवं सुमेरू हैं उन्हें भी बीच में लाकर आपस में भिड़ा दूँ। एक पूर्व छोर पर है, दूसरा पश्चिम छोर पर है। किन्तु दोनों को एकत्रित किया जा सकता है।

तीन भवन की राणी रुक्मिणी है तीन भवन अर्थात् तीनों लोक की लक्ष्मी रुक्मिणी को मैं यहाँ सम्भराथल पर लाकर बसा दूँ। यदि मेरी इच्छा हो तो हो सकता है। नौ सौ नदियाँ एवं उनमें मिलने वाले सम्पूर्ण नाले-झरने जो अन्यत्र कहीं दूर दूर बह रहे हैं, यदि मेरी इच्छा हो तो मैं उन सभी को यहाँ समराथल पर लाकर बहा दूँ।

हे आयस! मैंने राम रूप में अवस्थित होकर सीता को लंका से वापिस लाया था। तथा लंका को तोड़ डाला था। ऐसा भयंकर संग्राम किया था। जिन बाणों से मैंने रावण को मारा था। वही धनुष बाण इस समय मैं अपने हाथों में धारण कर लूँ। यह हो सकता है, किन्तु यह होना या न होना मेरी इच्छा पर ही निर्भर करता है।

कौरव, पाण्डव और यादव योद्धा जिन्होंने महाभारत युद्ध लड़ा था, किन्तु इस समय वे एक भी यहाँ धरती पर नहीं हैं। उस समय हस्तिनापुर में थे। यदि मेरी इच्छा हो तो उन्हें पुनः हस्तिनापुर में लाकर दिखा दूँ। वैसे गए हुए वापिस लौट कर ज्यों के त्यों नहीं आते। किन्तु मेरी सिद्धि से तो यह असम्भव कार्य भी सम्भव हो सकता है।

हे योगी! यहाँ सम्भराथल पर इस समय बाग बगीचे लगे हुए नहीं हैं, किन्तु मेरी इच्छा हो तो मैं अभी अति सुंदर हरे-भरे बाग लगा दूँ। और उसमें असम्भव है सोने का मृग, किन्तु मैं सोने का मृग बनाकर उसे बाग में चरा दूँ। वैसे तो वर्षा ऋतु में सामान्य वर्षा स्वाभाविक होती है। किन्तु यदि मैं कुछ विशेष करना चाहूँ तो वर्षा जल की जगह पत्थर भी बरसा सकता हूँ। हे आयस! मृगछाला पावड़ी क्यों घूमाते हो? यदि मेरी इच्छा हो तो मैं उगता हुआ सूर्य भी रोक सकता हूँ।

जोगी तब ऐसे कही, सुनो स्वामीजी बात।

जोग सिद्धि हम भी लई, सतगुरु केरे पास।

योगी कहने लगे- हे स्वामी जी! हमने भी योग सिद्धि की प्राप्ति सद्गुरु के पास से की है। हम कोई साधारण गुरु के चेले नहीं हैं। आप तो सभी कुछ कर सकते हैं, किन्तु कुछ तो हम भी कर सकते हैं। श्री जाम्भोजी ने शब्द सुनाया-

शब्द-117 ओ३म् टूका पाया मगर मचाया, ज्यूं हंडियाया कुता।

जोग जुगत की सार न जाणी, मूंड मूंडाय बिगुता।

चेला गुरु अपरचै खीणा, मरते मोक्ष न पायों।

हे आयस! आप लोग भ्रमित हो रहे हैं। आपको सिद्धि कहाँ मिली है? आप लोगों को घर-घर घूमने से रोटी के टुकड़े मिल जाते हैं। उस भिक्षा के अन्न को खाकर लड़ाई-झगड़े, वाद-विवाद में उलझे रहते हो। जिस प्रकार से घर-घर हांडने वाला-घूमने वाला कुत्ता, टुकड़ा खाकर लड़ता, झगड़ता, भौंकता है। आप लोगों ने योग मुक्ति का सार नहीं जाना। केवल सिर मुंडवा लिया है। अब तुम्हारी बात पर विश्वास किसी को नहीं हो रहा है। तुम्हारी यह तो गति नहीं है। यह तो दुर्गति हो गयी है।

इस प्रकार से जीवन जीते हुए तो गुरु और चेला दोनों ही बिना साधन के, ज्ञान प्राप्त किए बिना ही मर जायेंगे। ऐसे गुरु शिष्य को मोक्ष नहीं होगा। इस प्रकार से ये दो शब्द नाथ योगियों के लिए श्री देवजी ने कहे थे। और भी बहुत से शब्द कहे थे। उनमें आगे का शब्द हे वील्हा मैं तुम्हें सुनाता हूँ।