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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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दूसरा अध्याय · कथा 13

राव जोधा को बैरीसाल नगाड़ा देना

वील्होजी ने पूछा-हे गुरुदेव! जोधपुर के राजकुमार उधरण तो शब्द श्रवण करने का अधिकारी मालूम पड़ता है तभी तो उन्हें बहुत ही गम्भीर अर्थयुक्त शब्द सुनाए। उधरण ने वापिस जोधपुर लौटकर नरेश राव जोधा को भी ये बातें-घटना सुनाई होगी। क्या? जोधा भी कभी दर्शनार्थ या सिद्धि परिचय जानने हेतु श्री देवजी के पास नहीं आया?

नाथोजी बोले- हे वील्हा! यह कैसे हो सकता है कि राव जोधा यह सभी कुछ जानने के बाद भी न आये? इससे पूर्व भी जोधा अपने बेटे दूदा को राज्य प्राप्ति का वरदान सुन चुका था। दूसरी बार अपने भतीजे उधरण के द्वारा जाम्भोजी की महिमा जान चुका था। जोधा स्वयं भी संसार के नित्यप्रति के झगड़ों से दुःखी था। ऐसी अवस्था होने पर भला कौन ऐसा अभागी होगा, जो जाम्भोजी के पास नहीं आयेगा?

जम्भेश्वरजी वन में गऊवें चराते थे। वि.सं. 1526 के लगभग किसी समय जोधा वन में आकर जाम्भोजी से भेंट की थी, अपने दुःखों को सुनाते हुए कहने लगा- हे देव! मैं आपके बारे में बहुत कुछ सुन चुका हूँ। आपने मेरे ही परिवार के भतीजे एवं पुत्र को तो कृतकृत्य कर दिया। मैं भी दुःखियारा आपके पास आया हूँ।

आप से शक्ति की भीख माँगता हूँ। क्योंकि मैंने देख लिया है कि आप जय अम्बेश्वर हो, अम्बा शक्ति या ईश्वर विष्णु-शिव हो। आप मुझे अपनी शक्ति लक्ष्मी प्रदान कीजिये, जिससे मैं राज्य की व्यवस्था ठीक से कर सकूँ। बिना लक्ष्मी के तो कुछ भी विकास नहीं कर सकता तथा शक्ति के विना न तो मैं शत्रुओं से लड़ सकता और न ही प्रजा का पालन कर सकता। चोर लुटेरों आदि अपराधी जनों को शक्ति से ही दबाया जा सकता है प्रजा की रक्षा मैं कर सकूँ, न्याय का राज्य करूँ, प्रजा सुखी होवे, ऐसा वरदान दीजिये।

जम्भेश्वर जी बोले-हे जोधा! इस समय हमारे पास यह बेरीसाल नगाड़ा रखा है। हमारे ग्वाल-बाल इसी नगाड़े को बजाकर गोचारण करते हैं। सभी ग्वाल-बाल इसी नगाड़े की ध्वनि सुनकर खेलने के लिए एकत्रित हो जाते हैं। ये लोग नगाड़ा बजाकर ही खेल खेलते हैं। गऊ आदि पशुधन यहाँ चराते हैं। यहाँ पर वन्य हिंसक जीवों का भी भय बना रहता है।

जब ये लोग नगाड़ा बजाते हैं तो वन्य हिंसक जीव भाग जाते हैं या कहीं जाकर छिप जाते हैं या गहरी नींद में सो जाते हैं। हमारे पशुओं पर हमला नहीं करते। इस अलौकिक दिव्य नगाड़े को जोधा तुम ले जाओ।

न्यायपूर्वक प्रजा का पालन करो। जब तुम्हारे पर कोई अन्य राजा या शत्रु चढ़ाई करके तुम से युद्ध करने के लिए आ जाये तो तुम यह नगाड़ा बजाकर युद्ध करने के लिए सेना सहित चढ़ाई कर देना। उस समय तुम्हारे नगाड़े की आवाज सुनकर तुम्हारा शत्रु उत्साह हीन हो जायेगा। या तो हिंसक जीवों की भांति भग जायेगा या फिर तुम्हारे से युद्ध भी करे तो भी जीत तुम्हारी होगी। राज्य लक्ष्मी की उतरोत्तर वृद्धि ही होगी। तुम्हारे यहाँ खुशहाली बनी रहेगी। ऐसा कहते हुए स्वयं जाम्भोजी ने जोधा को नगाड़ा प्रदान किया। इसका नाम भी बैरी साल ही रखा गया। यथा नाम तथा गुणों से सम्पन्न भी किया गया।

जोधा जाम्भोजी द्वारा प्रदत्त नगाड़ा लेकर वापिस जोधपुर पहुँचा और अपने राज्य के विकास में लग गया। अनेक लड़ाइयों को जोधा ने अपने बाहुबल एवं जाम्भोजी के आशीर्वाद से जीता।

वील्हाजी उवाचः-हे गुरुदेव! मैंने सुना है कि यह बेरीसाल नगाड़ा वर्तमान में बीकानेर के गढ़ में सुरक्षित रखा हुआ है। वहीं पर उस नगाड़े की पूजा होती है। यह जोधपुर से बीकानेर कैसे आ गया?

नाथोजी उवाचः-हे शिष्य! इसका भी कारण अवश्य है। वि.सं. 1544 में राव जोधा अपने पुत्र बीका के पास बीकानेर आया था। अपने पुत्र द्वारा बनाया हुआ नया किला, राज-पाट को देखकर जोधा अति प्रसन्न हुआ था।

अपने बेड़े बेटे जोधा ने कहा-पहली बात तो यह है कि तुम अपने भाइयों में सभी से बड़े हो, और तुमने अपना अलग राज्य भी जम्भेश्वर की कृपा से बसा लिया है। अपने कुल परिवार के इष्टदेवता तो ये सम्भराथल वासी जम्भेश्वरजी ही है। उनको कभी भूलना मत। दूसरी बात यह है कि अपने भाइयों से जोधपुर राज्य से भाग माँगना मत। तुम्हारे पास बहुत कुछ है।

यह जोधपुर भी तुम्हारी पैतृक संपत्ति अवश्य ही है। उसमें तुम्हारा हक भी है। किन्तु अपने भाइयों के लिए छोड़ देना। तीसरी बात यह है कि लाडनूं का परगना जो इस समय तुम्हारे पास है, वह भी जोधपुर का ही है। इसे वापिस जोधपुर को ही लौटा दे। ये तीन मेरी शर्तें है, इनको तुम अपने पिता के सामने स्वीकार करो।

बीका बोला- हे पिताश्री! ये तीनों शर्त्तें मुझे स्वीकार हैं, किन्तु एक अर्ज मेरी भी सुन लो। सर्वप्रथम जाम्भोजी द्वारा दिया हुआ बेरीसाल नगाड़ा मुझे प्रदान कीजिये। क्योंकि आपने तो इस नगाड़े के प्रभाव से अपने राज्य का विस्तार किया है, अब मैं भी करना चाहता हूँ। दूसरा आप मुझे स्वतंत्र राज्य के राजा की मान्यता प्रदान करे। तीसरा आपके राज्य के जो पूजनीय छत्र, राजमुकुट, चंवर, तख्त, आसन आदि मुझे प्रदान करें। यदि आप मुझे ये वस्तुएं प्रदान करेंगे, तो मैं आपकी आज्ञानुसार आपके वचन निभाऊँगा।

जोधा ने ये तीनों शर्त्तें स्वीकार की और वापिस जोधपुर को प्रस्थान किया। समय पर ये तीनों चीजें जोधा बीकानेर नहीं भेज सका, क्योंकि जोधा की आकस्मिक मृत्यु हो गयी थी। कालान्तर में बीका ने जोधपुर पर चढ़ाई करके ये वस्तुएँ हासिल की थी। जिनमें बेरीसाल नगाड़ा भी एक विशेष था। बीका ने अपने राज्य की पूजनीय धरोहर मानकर अपने किले में सुरक्षित रखा। इस प्रकार से यह नगाड़ा बीकानेर राज्य की सम्पत्ति बना।

वील्होजी उवाचः- हे गुरुदेव! आपने अभी कहा था कि बेरीसाल नगाड़ा जो ग्वाल-बालों को सदा निर्भय बनाता था, वह तो जाम्भोजी ने जोधा को प्रदान कर दिया था। तब ग्वाल-बालों ने फिर कैसे निर्भय रहने का संबल प्राप्त किया? यदि अन्य कोई उपाय था तो अवश्य ही बतलाइये। जिससे हमे भगवान् के नये-नये चरित्र सुनने को मिल सकें।

नाथोजी उवाचः- हे शिष्य! मैं तुझे सुनाता हूँ। विस्तारपूर्वक श्रवण करो। एक समय जब ग्वाल-बाल गऊवें आदि पशुधन चराते हुए वन में भ्रमण कर रहे थे,उसी समय ही वन में एक सिंह दिखाई दिया। उसे देखकर बालक भयभीत होकर दौड़कर जम्भेश्वरजी के पास ही चले आये और कहने लगे- आप की कृपा से हम अब तक तो सुरक्षित थे, किन्तु आज एक भयंकर सिंह हमारे वन में प्रवेश कर गया है। अभी अभी हमने देखा है। जिसे देखकर हम डर गये हैं। ऐसा न हो कि हमारे प्रिय पशुधन को ही न खा जाये या किसी बालक को ही अपना ग्रास न बना डाले?

जब तक हमारे पास वह बैरीसाल नगाड़ा था, तब तक तो हम लोग बजाते थे, तो वह सिंह भाग जाता था। हमारे ग्वाल बालक एकत्रित होकर भगा देते थे। उसकी तो आवाज में ही ऐसा जादू था। किन्तु हे जय अम्बेश्वर! आपने तो वह दिव्य नगाड़ा जोधा को दे दिया। हमारी कुछ भी परवाह नहीं की। आप भी तो हम से ज्यादा राजा को ही महत्व देते हैं।

जाम्भोजी बोले-हे बालको! आप भयभीत न हों। जब भी वह सिंह वन में प्रवेश करे तब आप एकत्रित होकर जोर से सम्मिलित स्वर में उस सिंह को सुना करके कहना-जाम्भोजी की आण है, यदि फिर कभी हमारे इस वन में आया तो। फिर कभी वह आपके वन में नहीं आयेगा। न ही वह किसी पशु आदि की हत्या ही करेगा।

ग्वाल-बालों ने मिलकर ऐसा ही किया। तो फिर कभी उस सिंह को वन में नहीं देखा। गुरुदेव की बाँधी हुई आण (मर्यादा) हिँसक प्रकृति के सिँह ने कभी नहीं तोड़ी। हम तो मानव हैं। कैसे उनके वचन (मर्यादा) को भूल सकते हैं?

हे वील्हा! मुझे तो उनकी एक-एक बात याद है। मैं तुझे जो भी बतला रहा हूँ, वह अपने आँखों देखी, कानों सुनी हुई बातें बतला रहा हूँ। मुझे स्वयं कहने में आनन्द की प्राप्ति हो रही है। तुम्हे भी अवश्य ही होती होगी।