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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह37 / 94

तीसरा अध्याय · कथा 37

लक्ष्मणनाथ एवं लोहापांगल को योग का उपदेश

वील्होजी उवाचः- हे गुरुदेव! आपने अब तक श्री जम्भदेवजी द्वारा दिए हुए अनेकानेक उपदेश श्रवण करवाये। आपके श्रीमुख से उच्चरित वाणी को मैं सुनते हुए भी तृप्त नहीं हो रहा हूँ। कुछ तो आपकी वाणी में ही जादू होगा तथा श्रीदेवजी का जीवन कर्म दोनों ही विचित्र ही है। उस विचित्रता को मैं आगे भी सुनना चाहता हूँ।

योग क्या है? असली योगी भी कोई होगा जिसकी श्री देवजी से भेंट हुई होगी? उनकी आपस की वार्तालाप आपने श्रवण की होगी। कृपा करके मुझे सुनाने का कष्ट करें। इस प्रकार से वील्हो द्वारा पूछने पर श्री नाथोजी थोड़ी देर मौन रहने के बाद कहने लगे-

शिष्य! सिद्धों की परस्पर की वार्ता तो मैं समय आने पर बाद में बताऊँगा। पहले कुछ लोग जो योग के नाम से पाखण्ड करने वाले तथाकथित सिद्धों की बात मैं तुम्हें बतलाता हूँ, सुनो!

शब्द सुण जोगी ष्सिनोई हुवो, ष्सिनोई हुवा पछे टीले गयो, टीले जोगी बालो लखमण नाथ रहे, जिंहि के भण्डारो थो। भण्डारे जोगी भेला हुवा। ष्सिनोई ने कहे भुगति करे, ष्सिनोई भुगति करै नहीं। जोगी रीसाणा, जोगी कहे! कौण तेरा पीर, कौण तेरा राह, तैं नाथ के घर दूजि राखी। ष्सिनोई कहे मेरे जाम्भोजी पीर। सत पंथ को राह। जोगी कहै तेरे पीर की अर हमारी बात। जोगी किते इक दिन जांभेजी दिस चाल्या। जोगी नजीक आय लागा। जोगिये एक जोगी जांभेजी कने मेल्ह्यो। जोगी कहे जाम्भोजी इहां बालां लछमण आवे हैं। तम साम्हां चलकर आदेश करके पाय लागो। जांभेजी कहे बाल लछमण मां के आसति इधका है। जोगी कहे, परभात तो बाल सरूप दीसे, मध्यान जवान अवस्था धारे साम कूं गरढ़ा नजर आवै। इस तरे की अनेक आसति है। ष्सिनोई कहे घणा बेस तो वेस्वा करे। जांभोजी श्रीवायक कह-

शब्द-48 ओ३म् लक्ष्मण लक्ष्मण नां कर आयसां, म्हारे साधां पड़े बिराऊं।

लक्ष्मण सो जिन लंका लीवी, रावण मारय्यो ऐसो कियो संग्रामूं।

लक्ष्मण तीन भुवन का राजा, तेरे एक न गाऊं।

लक्ष्मण के तो लख चौरासीं जींया जूणी, तेरे एक न जीऊं।

लक्ष्मण तो गुणवंतो जोगी, तेरे बाद बिराऊं।

लक्ष्मण का तो लक्षण नाहीं, शीस किसी बिध नाऊं।

शब्द 39 वां सुनकर एक योगी बिश्नोई पँथ में सम्मिलित हो गया। वह योगी कानों में मुद्रा पहनने वाला दर्शनी साधु था। जब बिश्नोई पन्थ में सम्मिलित हो गया तथा तब उसकी मुद्रा निकलवा दी थी। और घर भटके नाथ घर अटके यह कहावत यहाँ चरितार्थ होती है। जब वह नाथ-बिश्नोई बनने के पश्चात् एक समय एक टीले पर गया था। वहाँ पर लक्ष्मणनाथ का डेरा था। वहाँ टीले पर उस समय भण्डारा विशेष था। लक्ष्मणनाथ द्वारा आमंत्रित नाथ विशेष वहाँ पर एकत्रित हुए थे। उन नाथों ने वहाँ उपस्थित एकमात्र बिश्नोई से भोजन करने को कहा। बिश्नोई ने भोजन करना मना कर दिया। नाथ लोग क्रोधित हुए और कहने लगे-

कहो! तुम्हारा कौन गुरु और धर्म है? हम देखते हैं कि तुम्हारे कान फटे हुए हैं। तेने नाथ का घर भेख क्यों छोड़ा? अब तू नाथों से द्वेषभाव रखता है। बिश्नोई ने कहा-मेरे गुरु जाम्भोजी भगवान् हैं। सतपंथ ही मेरा मार्ग एवं पंथ धर्म है। योगी कहने लगे-तेरे गुरु से हम बात करेंगे। हम तुम्हारे गुरु को दोषी मानते हैं। उन्हें दण्डित करेंगे। ऐसा कहते हुए वे योगी लोग वहाँ से चल पड़े। बहुत दिनों के पश्चात् जाम्भोजी के निकट आ पहुँचे। आकर हिम्मटसर गाँव में डेरा लगाया।

लक्ष्मणनाथ ने अपने एक शिष्य को दूत बनाकर जाम्भोजी के पास भेजा। योगी सम्भराथल पर पहुँचा और अपने गुरु लक्ष्मणनाथ का संवाद सुनाते हुए इस प्रकार कहा-हे जम्भेश्वर! आपके पास यहाँ पर बाल लक्ष्मण पधार रहे हैं। इसलिए कि आप पर नाराज हैं। आप उनके सामने चलकर प्रणाम करो। अपनी भूल की क्षमा याचना करो। उनके चरणों में शीश झुकाओ, तो शायद वो आपको माफ भी कर दे।

श्रीदेव ने कहा-तुम्हारे बाल लक्ष्मण में क्या सिद्धि है? जो मैं उनके सामने जाकर क्षमा याचना करूँ तथा मैंने भूल भी कौनसी की है? वह दूत बोला-महाराज! हमारा लक्ष्मण तो राम का भाई लक्ष्मणकुमार ही है। प्रातःकाल तो वह बाल्यावस्था को प्राप्त हो जाता है। बाल सूर्य के समान ही बाल स्वरूपवान होता है। जब सूर्य मध्याह्न आता है तो जवान हो जाते हैं। और ज्यों ही सूर्य ढ़लता है, साँझ वेला होती है तो हमारे लक्ष्मण वृद्ध हो जाते हैं। यही शक्ति लक्ष्मण में है।

वहाँ पर उपस्थित बिश्नोई बन्धुओं ने कहा-ये अनेकानेक वेश-भूषा दिखावा तो वैश्या करती है। यह तो कोई योगी का लक्षण नहीं है। योगी तो तीनों अवस्थाओं में एकरस ही रहता है। उसी समय श्रीदेवजी ने शब्द सुनाया-

हे आयस! बार-बार लक्ष्मण लक्ष्मण ऐसा मत कहो, अनाधिकारी साधारण व्यक्ति को तुम राम का भाई लक्ष्मण कह रहे हो। यह तो अन्याय है। ऐसा कहकर तुमने साधु-संतों, सज्जनों को भ्रमित किया है। लक्ष्मण ने तो रावण को मारा था। लंका की प्राप्ति की थी। ऐसा भयंकर संग्राम किया था। लक्ष्मण तो तीनों लोकों का राजा है। तुम्हारे लक्ष्मण के पास तो एक गाँव भी नहीं है। लक्ष्मण के तो चौरासी लाख योनियां है, तुम्हारे लक्ष्मण के तो एक ही जीव नहीं है, लक्ष्मण तो गुणवान योगी है, तुम्हारे लक्ष्मण के तो अब तक वादविवाद, भ्रम आदि विद्यमान हैं। लक्ष्मण का तो एक भी लक्षण नहीं है तो मैं कैसे उनके सामने शीश झुकाऊँ। यदि वास्तव में राम का भाई लक्ष्मण होता तो मैं अवश्य ही स्वागत हेतु जाता, शीश झुकाता।

जोगी कहै जाम्भोजी जोग मार्ग कठिन है। हमने अजरी बजरी साझी है। जाम्भोजी श्री वायक कहे-

शब्द-49 ओ३म् अबधू अजरा जारले, अमरा राखले, राखले विन्द की धारणा।

पताल का पाणी आकाश कूंचढायले, भेटले गुरु का दरशणा।।

आगन्तुक वह दूत कहने लगा- हे जाम्भाजी! सच्च है कि योगमार्ग अति कठिन है किन्तु हमने तो यौगिक क्रियाएँ अजरोली बजरोली आदि सभी विधिवत की हैं। आप हमें केवल नाममात्र का योगी न समझें।

सद्गुरु देवजी ने शब्द सुनाते हुए बतलाया- हे अवधू! केवल योग के बाह्य साधन आसन प्राणायाम मुद्राएँ आदि करने से ही योगी नहीं हो जाता है जो योगी परब्रह्म को प्राप्त हो चुका है, वह तुम्हारी तरह वादविवाद भ्रम में नहीं पड़ेगा।

काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्यादि ये तुम्हें सदा ही जलाने वाले हैं। इन्हें प्रथम आप जला डालो, तभी तुम योगी बनने की योग्यता धारण कर सकोगे। अपने आप को अमर कर लें। बिन्दु ब्रह्मचर्य की रक्षा करे। तथा ऊर्जा शक्ति जो वीर्य-जल के रूप में नीचे की ओर स्वभाव से प्रवाहित हो रही है। इसको दशवें द्वार-ब्रह्माण्ड में चढ़ा लें। ऊर्ध्वरह्यता ब्रह्मचारी बनें। तभी तुम सम्मुरु परमात्मा का दर्शन स्पर्श अनुभव कर सकोगे, सच्चे अर्थों में योगी बन सकोगे। पुनः वह योगी कहने लगा-हे जम्भदेव!

जोगी कहै, बाला लखमण है सो तिरिया का मुख देखे नाही। छोती नाहीं लागे। जाम्भोजी श्रीवायक कहै-

शब्द-50 ओ३म् तइया सांसू तइया मासूं, तइया देह दमोई

उतम मध्यम क्यूं जाणीजै,बिरस देखो लोई।

जांके बाद बिराम बिरांसो सांसो, सरसा भोला चाले, ताकै भीतर छोत लकोई

जांके बाद बिराम बिरांसो सांसो सरसा भोलो भागो,ताकै मूले छोत न होई।

दिल दिल आप खुदायबंद जाग्यो, सब दिल जाग्यो सोई।

जो जिंदो हजकाबै जाग्यो, थल सिर जाग्यो सोई।

नाम विष्णु के मुसकल घातै, ते काफर सैतानी।

हिंदू होयकर तीरथ धोकै, पिंड भरावै, तेपण रह्या इंवाणी।

जोगी होय के मूंड मुंडावे कान चिरावै, गोरख हटड़ी धोके।

तेपण रह्या इंवाणी। तुरकी होय हजकाबो धोकै, भूला मुसलमांणद्ध।

के के पुरुष अवर जागैला, थल जाग्यो निज वाणी।

जिहिं के नादे वेदे शीले शब्दे, लक्षणे अंत न पारूं।

अंजन मांही निरंजन आछै, सो गुरु लक्ष्मण कंवारूं।

योगी कहने लगा-हे देवजी! हमारे लक्ष्मणनाथ तो स्त्री का तो मुख भी नहीं देखते। सभी प्रकार की छोत नहीं लगती। योगी के लिए नारी ही साधना में बाधक है। स्त्री से तो बचे हुए हैं। आप लक्ष्मण को योगी ब्रह्मचारी कैसे नहीं मानते? श्रीदेवजी ने योगी के प्रति इस प्रकार से शब्द सुनाते हुए कहा-

हे लक्ष्मण के दूत! स्त्री पुरुष में शरीर की बनावट की दृष्टि से तो कोई फर्क नहीं है। वही श्वांस, मांस, वही देह, प्राणादिक पाँचों तत्त्वों का पुतला तो एक ही जैसा है, फिर स्त्री को मध्यम, पुरुष को उत्तम क्यों देखता है? यदि यही ज्ञान है, तो अज्ञान किसे कहेंगे? विचार करके देखो तो उत्तम मध्यम का भाव निवृत्त हो जायेगा।

यदि अब तक वाद-विवाद, भ्रम, छोटा-बड़ा और मैं और पराया का भाव योगी के अन्दर विद्यमान है तो फिर योगी कैसे हो सकता है? वासुदेव सर्वमिति स महात्मा सु दुर्लभः। योगी का तो छोत छूआछूत भाव निवृत्त हो जाना चाहिये था। तुम कहते हो कि वह तो स्त्री का मुख नहीं देखता तो क्या वह योगी हो गया? मानसिक संताप तो ज्यों का त्यों विद्यमान है। वह परमात्मा तो सर्वत्र विद्यमान है। प्रत्येक हृदय में विद्यमान होकर सृष्टि का संचालन करता है। वह तो जाग्रत पुरुष है। जो हज काबे में जाग्रत हुआ, पुरुष वही सम्भराथल पर भी जागृत हुआ है। परमात्मा के नाम में विघ्न करने वाले तो काफिर (शैतान) लोग हैं।

हिन्दू होकर के अर्थात् अपने को श्रेष्ठ आर्य समझते हुए भी घर बैठे हुए तीर्थों की धोक लगाते हैं, उपासना करते हैँ। तीर्थ तो स्नान करने से ही पवित्र करता है, न मात्र नाम लेने से। यह हिन्दुओं की भूल है। इसी भूल के कारण हिन्दू निष्फल रह गये।

योगी होकर केवल मूण्ड मुण्डवा लेते हैं। कान चिरवा लेते हैं। मुद्रा धारण कर लेते हैं। गोरख के धूणां पर जाकर धोक लगाते हैं। शीश झुकाते हैं। यही योग समझ रखा है। यह भूल ही निष्फलता का कारण है।

मुसलमान होकर केवल काबे के सामने मस्तिष्क झुका लेते हैं तथा हज कर आते हैं। इसको ही अपना धर्म समझ लिया है। इतना मात्र ही धर्म कर्म नहीं है। इससे आगे भी कुछ और करणीय है। ऐसा नहीं समझते। इसलिए मुसलमान भी निष्फल (व्यर्थ) का जीवन जी रहे हैं।

कोई कोई विरल पुरुष ही संसार में जाग्रत हुए हैं और भी कई जागृत होने वाले हैं। किन्तु सम्भराथल पर इस समय जाग्रत पुरुष के रूप में विद्यमान हूँ। इस समय विशेष रूप से वेदवाणी के रूप में उपस्थित हूँ। जो कार्य अन्य प्रकारों से, अन्य अवतारों में किया वो ही कार्य मैं नाद, वेद, शील, शब्द द्वारा कर रहा हूँ। वही निरंजन, निराकार, साकार रूप में विद्यमान होकर प्रगट हुआ हूँ।

हे योगी! अलख निरंजन ही मैं गुरु रूप में यहाँ सम्भराथल पर विद्यमान हूँ।

जोगीये सबद मान्यो नहीं। देवजी नाल्हीयै विडाड़ै ने मेल्ह्यौ। नाल्हीयो जोगीयां कनै गयो। कुलाछ मार कूद्यो। ताल एक आसन मांड बैठो। लखमण है सो मोरे पासि आय आसण मांडो। जोगी हार आदेश आदेश कर उठि चाल्या। काहिक दूर गया कहै। जांभेजी निरहारी पुरुष कहावै। आ बात झूठी है। कै कही जाय जीमि आवता है। कै कोई आण जिमावता है। चलो या बात की ठीक करेंगे पूठा आया। जांभोजी के दोला बैठा। देवजी की कला दिन दिन चड़ती दीसै। जोगी भूख भागा। कै तो बसतियां ने उठि चाल्याँ कै ठाहरया, जोगी कहे, जाम्भोजी! अतीतों को भूख लगी है, तीनि दिन हुए कुछि दया भी आवैती है। दैवजी कहै जदि ही क्यों न कह्यौ। चेला कनि यों भुगति मंगाई। जोगियों का पतर पुरायां। योगी कहै आगै अनंत सिद्ध हुवा। तिन्हों भुगति जीमि। भुगति बिना कोई न रह्या तम भी हम पासि बैठिके भुगति जीमौ। काहे को वासते भूखे रहो। जाम्भोजी श्रीवायक कहे-

शब्द-51 ओ३म् सप्त पताले भुय अंतर अंतर राखिलो, म्हे अटला अटलूं।

अलाह अलेख अडाल अजूनी शिंभू, पवन अधारी पिंडजलूं।

काया भीतर माया आछै, माया भीतर दया आछै।

दया भीतर छाया जिहिकै, छाया भीतर बिंब फ लू।

पूरक पूर पूर ले पोण, भूख नहीं अन जीमत कोण।

नाथोजी ने आगे कथा इस प्रकार से बतलाते हुए कहा-देवजी ने लगातार तीन शब्द सुनाये तो भी लक्ष्मणनाथ के दूत ने माना नहीं, तब श्रीदेवजी ने अपने शिष्य निहालदास को अपने पास बुलाया और कहा- तुम लक्ष्मणनाथ के पास जाओ और अपनी सिद्धि दिखाकर के मेरे पास ही मण्डली सहित ले आओ। निहालदास ने कहा-हे गुरुजी! मेरे पास तो सिद्धि ही नहीं है। मैं कैसे ला सकता हूँ। जाम्भोजी ने कहा-तुम अवश्य ही जाओ और वहाँ जाकर सिद्धि से ऊँचा आसन लगाकर बैठ जाना और योगियों को हरा करके ले आना। निहालदास अनमना सा होकर चला। मार्ग में विचार किया कि अब तक तो कभी मैंने अधर में आसन लगाया नहीं है। कहीं वहीं पर मेरी बेइज्जती न हो जाये? मार्ग में ही पता करके देखता हूँ। योगियों के पास पहुँचने से पूर्व ही मार्ग में छलांग लगायी, किन्तु धरती पर गिर पड़ा। विचार किया कि मेरे में शक्ति नहीं है। वापिस श्रीदेवजी के पास लौट आया।

देवजी ने कहा-क्या बात हुई निहालदास! वापिस क्यों लौट आया? निहालदास बोला-गुरुदेव! मेरे में तो सिद्धि नहीं है। मैंने मार्ग में पता लगाया था। मैं तो धरती पर गिर पड़ा था। मैं जाऊँगा नहीं। श्रीदेवजी ने पीठ थपथपाई और कहा-पुनः जाओ। अबकी बार मार्ग में पता नहीं लगाना। यह सिद्धि तुम्हें इस कार्य हेतु दी गई।

दुबारा निहालदास योगियों की मण्डली में पहुँचा और श्री देवजी की आज्ञानुसार लक्ष्मण के सामने जाकर आदेश आदेश किया किन्तु लक्ष्मणनाथ ने जवाब नहीं दिया। किन्तु उनकी धूनी पावड़ी आदेश आदेश जवाब देने लगी। लक्ष्मणनाथ ने देखा कि निहालदास तो धरती से इक्कीस गज ऊँचा आसन लगा कर बैठा है। यह सिद्धि तो हमारे से कहीं अधिक है। इस प्रकार से अपनी न्यूनता समझ करके वहाँ से लक्ष्मणनाथ मण्डली सहित रवाना हुए और सम्भराथल पर जाम्भोजी के पास पहुँच गये। लक्ष्मणनाथ ने अपने चेलों से कहा कि हमने सुना है कि जाम्भोजी निराहारी हैं, किन्तु यह बात असंभव है। बिना भोजन किये कैसे रह सकते हैं? या तो कहीं भोजन करके आते हैं या उन्हें कोई रात्रि में भोजन करवाके चला जाता है? अपने लोग इसका पूरा पता लगायेंगे और उनके इस झूठ को उजागर करेंगे। हम सभी लोग उनको घेरकर बैठ जाते हैं। न तो किसी को बाहर से आने देंगे और न ही किसी को बाहर जाने देंगे। देखना है कितने दिन भूखे रहते हैं।

इस प्रकार से योगी लोग तीन दिन तक घेर कर बैठ गये। न तो स्वयं ही भोजन कर सके और न ही जाम्भेजी के पास किसी को आते जाते देखा और न ही कहीं जाम्भोजी उठ कर ही गये। भूख सहन करने की भी तो कोई सीमा होती है। तीसरे दिन लक्ष्मणनाथ के शिष्य अपने गुरु को छोड़कर भूख-प्यास से व्याकुल होकर इधर गाँवों में चले गये तो कुछ अभी भी लक्ष्मण के साथ बैठे रहे।

योगियों ने आपस में ही कानाफूंसी की कि आज तीन दिन-रात हो गये हैं। जाम्भोजी की कला तो दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती ही जा रही है। हम तो मुरझा गये हैं। श्रावण में वर्षा विहीन जो खेती की दशा होती है, वही दशा हमारी है। न तो इस मालिक को सूखती हुई खेती को देखकर दया आती है और न ही जाम्भोजी को भी दया आ रही है। न जाने ये दोनों ही कैसे दयाविहीन है? हम तो जाम्भोजी के अतिथि थे परंतु भूख से व्याकुल हैं।

जाम्भोजी ने उन निरपराधजनों की वार्ता सुनी और उन्हें दुःखी देखा तो बोले-हे योगीजनो! आपको भूख प्यास सता रही है। यह बात आपने पहले ही क्यों नहीं बतलाई? मैं तुम्हारे लियह्य भोजन की व्यवस्था करवाता। जाम्भोजी ने अपने शिष्यों को आदेश दिया कि इन अतिथियों के लिए श्रावण-भादव कड़ाह चढ़ा दो। जल्दी ही इनके लिए भोजन बना दो। इन्हें भोजन द्वारा जल्दी ही तृप्त कर दो क्योंकि ये तीन दिन से भूखे हैं।

श्रावण-भादव में बनाया हुआ भोजन अखूट होता था। वे योगी लोग इस बात को क्या जाने? लक्ष्मण ने अपने शिष्यों को आदेश दिया कि वैसे ही हम तीन दिनों से भूखे हैं तथा सभी लोग आज अपनी ताकत से अधिक ही भोजन करना है तथा कुछ अपने देवी-देवता यानि भूत-प्रेतों को भी बुला लेना। हम सभी मिल करके ये छोटे-छोटे कड़ाह खाली कर देंगे। जाम्भोजी क्या इस जंगल में हमें भरपेट भोजन करा सकेंगे? बीच में ही भोजन समाप्त कर देना है। जाम्भोजी की बेइज्जती करनी है। जाम्भोजी के शिष्यों द्वारा भोजन पत्तलों में परोसा गया। सभी पंक्ति लगाकर के बैठ गये। तब लक्ष्मणनाथ ने जाम्भोजी से कहा-आओ महाराज! आप भी हमारे साथ बैठकर भोजन पाओ। इस संसार में बड़े सिद्ध एवं अवतार हुए हैं। उन्हीं सभी ने ही भोजन ग्रहण किया है। यदि आप भोजन ग्रहण नहीं करोगे, तो हम भी भोजन ग्रहण नहीं करेंगे। जाम्भोजी ने कहा-आप लोग फिर हारोगे। मुझे भोजन की आवश्यकता होती, तो मैं अवश्य ही भोजन करता। इस प्रकार से कहते हुए श्रीदेवजी ने शब्द सुनाया-जिसका भावार्थ इस प्रकार से है-

हे योगी लोगो! इस शरीर में ही सप्त पताल है। जिसे सप्तचक्र भी कहते हैं। इन सातों चक्रो में सर्वप्रथम चक्र कुण्डलिनी से प्राणवायु का उम्मम होता है और सातवें चक्र सहस्रार में जाकर प्राणवायु स्थिर हो जाती है। इन सात चक्रों को प्राणवायु जाग्रत करती है। ऊर्जा शक्ति का ऊर्ध्व गमन होता है। ऐसी अवस्था में भूखप्यास निवृत्त हो जाती है। सात चक्र कमशः इस प्रकार से हैं-सहस्रार (ब्रह्मरन्ध्र) आज्ञा, विशुद्ध, अनाहत, मणिपूरक, स्वाधिष्ठान, मूलाधार (कुण्डलिनी)।

गुरुदेव कहते हैं-हे योगी! मैं तो प्राणवायु को सातों चक्रों के अन्दर ही रखता हूँ। इस वजह से मैं अटल हूँ। सभी प्रकार से संसार की व्याधियाँ मुझे आवृत्त नहीं करती, क्योंकि मैं अल्लाह, अडाल, अयोनी एवं स्वयंभू रूप से हूँ।

यह मेरा जलीय तत्त्व से बना हुआ शरद्धर तो वायु के आधार पर टिका हुआ है। मैं तो केवल श्वांस प्रश्ंवास से ही जीता हूँ। यह दिखने वाली पंचभौतिक काया अवश्य ही है, किन्तु इस काया में ही माया भी है। जो सभी का पालन पोषण करती है। जो माया अन्य शरीरों को बाहर से पोषण देती है। इसी माया में हृदय भी है। जो भावना का भोग करता है। इसी हृदय में ही तो परमात्मा का बिम्ब रूप जीव विद्यमान होकर सम्पूर्ण शरीर को जीवनशक्ति प्रदान करता है। किन्तु हृदय में विद्यमान ईश्वर दिखता नहीं है। क्योंकि माया की छाया से ढ़का हुआ है।

गुरुदेव ने कहा-हे लक्ष्मण! मैं तो अपने सत्चित् आनन्द रूप में ही विद्यमान रहता हूँ। मुझे सांसारिक अन्न आदि की कुछ भी आवश्यकता नहीं है। मैं तो प्राणवायु को प्राणयाम द्वारा अन्दर ही पूर्ण कर लेता हूँ। इसलिए मुझे भूख-प्यास नहीं लगती तो भोजन कौन करेगा? भूख प्यास लगना तो प्राणों का ही धर्म है। वह प्राण तो गुरुदेव कहते हैं कि-मेरे ही वश में है। अन्य लोगों के शरीरों को तो प्राण चलाती हैं, किन्तु मैं अपने प्राणों को चलाता हूँ।

इसलिए हे योगी! मुझे भूख नहीं है। आप लोग भूखे हो, इसलिए भोजन करलो। इस प्रकार के समझाने पर योगी लोगों ने भोजन किया। अपने साथियों को भी भोजन करवाया। किन्तु भोजन तो अखूट ही रहा। भोजन करने के पश्चात् लक्ष्मण कहने लगा-हे जम्भेश्वरजी! यदि आपके कोई शत्रु है तो आप हमें अवश्य ही बतला दें, हम उनका नाश कर देंगे।

जोगी कहै तम निरहारी तो हम भी निरहारी। रे जोगी यों झूठ पड़स्यो। भूखो होयसी सौ आपै ही निहौरा करसी। थे जीमों जीमियें। भुगति जीमी। देवजी ने कहै तुमारै कोई बेरी दुसमण होय तो हमकूं फूरमावों हम पालै जाम्भोजी श्रीवायक कहै-

शब्द-52 ओ३म् मोह मण्डप थाप थापले, राख राखले अधरा धरूं।

आदेश वेसूं ते नरेसूं, ते नरा अपरं पारूं।

रण मध्ये से नर रहियो, ते नरा अडरा डरूं।

ज्ञान खड़गू जथा हाथे, कोण होयसी हमारा रिपूं।

श्रीदेव ने शब्द द्वारा बतलाया कि हमारे पास तो ज्ञानरूपी खड्ग विद्यमान है। इसलिए मेरा तो कोई शत्रु नहीं है। तुम्हारे तो अवश्य ही आशा, तृष्णा, काम-क्रोध, लोभ, मोहादिक शत्रु हैं। स्वयं अपनी ही चिन्ता कीजिये। दूसरे की चिन्ता में अपना जीवन व्यर्थ में ही ना गमाइये। शत्रु कब पैदा होता है? जब आप किसी से प्रेमभाव नहीं रखते। अपने ही अहंकार को द्वेष द्वारा पुष्ट करते हैं। अपने पुष्ट अहंकार के सामने दूसरे का कोई अस्तित्व ही नजर नहीं आता।

इसलिए हे योगी! मोह रूपी मण्डप बनाकर उसमें रहने की कोशिश करें, तो सभी अपना ही दिखाई देगा। अपने से कभी शत्रुता नहीं होती। स्वयं की रक्षा कर ले। इन षट्उर्मियों से, जो तुम्हें सदा ही सताती रहती हैं। यह तेरा चंचल मन अस्थिर है। इसे स्थिर कर ले। जो व्यक्ति स्वयं का ही मालिक नहीं बना है, वह दूसरे का क्या मालिक बनेगा? पहले स्वयं अनुशासित होवे तो दूसरे को उपदेश दे सकते हैं।

नरेश तो वही होगा, जिसने स्वयं को वश में कर लिया है। मन के कहने पर नहीं चलता है। स्वयं आत्मा के कथनानुसार जीवनयापन करता है। ऐसे ही नर वरणीय, पूजनीय हैं, जिनकी गति अपार है। ऐसे व्यक्ति ही संसार सागर के युद्ध मैदान में रहते हुए भी पूर्णतया निर्लेप हैं। निर्भय होकर संसार में विचरण करते हुए भी समाधि में स्थित हैं। हे योगी! जिसके हाथ में ज्ञानरूपी खड्ग है, इसका शत्रु कौन हो सकता है?

इन उपर्युक्त शब्दों को सुन करके ज्ञान पिपासु श्री वील्होजी बोले-हे गुरुदेव! आपने लक्ष्मणनाथ की कथा के बारे में बताते हुए दो सिद्धांत जाम्भोजी के उजागर किये। पहला तो यह है कि जाम्भोजी जब तक मरुधरा में रहे, तब तक भोजन नहीं किया? यदि ऐसा है तो भोजन क्यों नहीं किया? तथा बिना भोजन के जीवित भी कैसे रहे? दूसरी बात आपने यह बतलायी की जाम्भोजी के कोई शत्रु था ही नहीं, वे तो अजात शत्रु थे।

ज्ञान प्राप्त व्यक्ति का शत्रुभाव समाप्त हो जाता है। किन्तु कुछ लोग जो स्वयं ज्ञानी होते हुए भी उनके शत्रुभाव का निवारण नहीं हुआ है। जिस प्रकार से राम ने रावण के प्रति किया। क्या जाम्भोजी से कोई वैरभाव नहीं रखता था? यदि ऐसा है तो वह कौनसा ज्ञान है, जिससे सभी प्राणी वैरभाव भूल जाते हैं। कृपा करके बतलाने की अनुकम्पा करे।

इस प्रकार से वील्होजी द्वारा पूछने पर नाथोजी कहने लगे-हे शिष्य! वैसे तो भगवान् की गति निराली है। उनकी लीला वही जाने। जाम्भोजी ने कहा-सुरनर तणो संदेशो आयो। नरनिरहारी। यह संदेशा देव तथा मानव, दोनों शरीरों का मिला-जुला रूप है। देवता शरीर से उपदेश नहीं दे सकते। इसलिए नर का रूप बनाना आवश्यक था और केवल नर रूप ही होते तो बिना अन्न भोजन के जीवित रहना असंभव था इसलिए नर एवं देवरूप में जाम्भोजी थे।

नर रूप तो केवल उपदेश हेतु था ताकि यहाँ के लोग उनकी भाषा समझ सके। देवता रूप में भोजन ग्रहण करते थे। देवता का भोजन तो घृत, हवन-सामग्री ही है। स्वयं देवता ज्योतिस्वरूप होते हैं। घी आदि से ज्योति प्रज्ज्वलित होती है। यज्ञ में अर्पित किया हुआ पदार्थ देवता का भोजन होता है। इसलिए जाम्भोजी यज्ञ में प्रदान की हुई आहुति रूप भोजन करते थे।

इसलिए जम्भेश्वर जी ने यज्ञ करना बतलाया है। आप लोग यदि साक्षात् भगवान् को भोजन भेंट करना चाहतह्य हैं, तो यज्ञ करो। यज्ञ में दी हुई आहुति परमात्मा विष्णु, जो देवाधिदेव है, वही ग्रहण करते हैं। यही इनका (श्री देवजी का) भोजन है क्योंकि जाम्भाजी स्वयं विष्णु रूप हैं। इसलिए हमारा किया हुआ यज्ञ उसमें दी हुई आहुति स्वयं जाम्भोजी जीमते थे और अभी भी जीम रहे हैं।

यज्ञ में उठने वाली सुगन्धि को ग्रहण करते हैं। इसलिए तो उनका शरीर सुगन्धमय था। यज्ञ ही विष्णु जाम्भोजी का भोजन है। इसलिए अधिक से अधिक यज्ञ करें। यही विष्णु का आदेश है।

जाम्भोजी किसी से शत्रुभाव नहीं रखते थे। तो जाम्भोजी से कोई शत्रुभाव क्यों रखेगा? जहाँ संत महापुरुष साक्षात् भगवान् विष्णु विराजमान होते हैं, वहाँ तो उनके निकट रहने वाले सभी जीव जन्तु भी वैरभाव भूल जाते हैं। सिंह और बकरी दोनों एक ही घाट पर पानी पीते हैं।

हे वील्हा! तुम यहाँ समाधी मंदिर के प्रवेशद्वार पर देख रहे हो कि सिंह और गाय एक ही बर्तन में साथ ही जल पी रहे हैं। यही जाम्भोजी का जीवन दर्शन था। जो यहाँ पर उकेरा गया है। ऐसी ज्ञान की दशा किसी भी व्यक्ति की हो जाये कि वह मनसा वाचा कर्मणा द्वारा जीव हिंसा का भाव निकाल दें, तो उसके पास रहने वाले जीव भी वैरभाव भूल जाते हैं।

जाम्भोजी का तो कहना ही क्या, वे तो साक्षात् विष्णु ही थे। भृगु ने विष्णु के लात मारी, तो भी उसको क्षमा कर दिया। कुछ भद्ध वैरभाव नहीं रखा। ऐसे विष्णु जाम्भोजी लक्ष्मणनाथ से कहते हैं कि मैंने ज्ञानरूपी खड्ग धारण कर ली है, अब मुझे शत्रु का कोई भय नहीं है।

देवजी कहै तो तेरी पाल। जोगी कहै हमारे वैरी कोण है। देवजी कहे थारे बेरी भूख, तिसना, निद्रा,काम,क्रोध,लोभ,मोह,रोग,मांद, ऐ थारे वैरी है। इतनी सुणी जोगी उठी गया। गोदावरी जाय भेला हुवा। भेख आगै फिरीयाद कीवी। लोहापांगल बीड़ो लीयो। जोगी भेला हुवा। चाल्या चाल्या हिमटसर आया। देवजी जोगियाँ के दरसण आयो। भेष ने आदेश कियो। जोगी बोल्या नहीं। वासंद्र आदेश कीयौ। श्री सर्व दरसणे आदेश कीयौ जाम्भोजी श्रीवायक कहे-

लक्ष्मण जाम्भोजी की करामात देखकर उठकर चल पड़ा। कुछ दिनों के बाद गोदावरी नदी के किनारे पर पड़ने वाले मेले में पहुँचा और जाम्भोजी के बारे में अन्य योगी लोगों को बतलाया। एकत्रित साधुओं के सामने फरियाद की कि मेरे से तो जाम्भोजी काबू में नहीं आये हैं। आपके समूह में ऐसा कोई सिद्ध पुरुष होगा, जो जाम्भोजी को परास्त कर सके।

लक्ष्मणनाथ ने बीड़ा फेरा। चुनौती सुनाई। उन्हीं मण्डली में वहाँ पर लोहा पांगल की मण्डली भी वहीं थी। मण्डली के महंत लोहा पांगल ने चुनौती स्वीकार की। लोहा पांगल अपनी मण्डली सहित गोदावरी से चला और बागड़ देश सम्भराथल के पास ही हिमटसर गाँव में आकर डेरा लगाया।

हिमटसर गाँव में लोहा पांगल अपने पाँच सौ शिष्यों के साथ एक सौ चालीस धूणी धुखाकर के महंत बनकर के बैठ गया। हिमटसर वासियों ने प्रथम इतने साधुओं को एकत्रित देखा था और आश्चर्यचकित होकर अनेक कल्पनाएँ करने लगे थे।

वहां हिमटसर की ही सोढ़ों की माँ लाछमदे ने यह समाचार सम्भराथल पर जाम्भोजी को बताया कि आप तो यहाँ पर बैठे हैं, किन्तु आपके मेहमान शत्रु बनकर आये हैँ। हमारे तो गाँव को घेर लिया है। आप ही जाकर के उनको शांत कर सकते हैं अन्यथा तो वे कुपित बाबा लोग हमारे यहाँ उपद्रव करेंगे। हमारा गाँव ही जला देंगे। ये सभी भूतप्रेत सेवी हैं।

जाम्भोजी ने अपने शिष्य केल्हण को भेजा और कहा कि तुम जाकर भक्तों से कहो कि इनकी जमात को भोजन करवावें। यहाँ पर आये हुए अतिथि भूखे न रहें। केल्हण ने जाकर आदेश कहा, किन्तु कोई कुछ बोला नहीं, केल्हण ने सोचा या तो ये लोग अहंकारी हैं या मेरे से नाराज हैं या फिर सुनता ही न होगा।

चलूँ! पास में इस योगी का कान पकड़कर कानों में आवाज डालूँ, क्या पता कुछ जवाब भी दे? केल्हण ने कान पकड़ा ही था कि तुरंत लोहा पांगल बो4ा और कहने लगा हम तो योगीपुरुष समाधि में थे। तुम लोग नारी के दास हो।

केल्हण ने नारी विद्या का समुचित उत्तर देते हुए कहा-हे योगी! यह संसार तथा तुम और हम सभी नारी की ही संतान हैं। बिना नारी तो उत्पत्ति ही असंभव है। तुम लोगों ने ऊपर तो योगी का वेश बना रखा है किन्तु अन्दर तो तुम्हारे भी नारी बैठी हुई है। प्रथम अन्दर की नारी को बाहर निकालो।

केल्हण ने भोजन का निमंत्रण दिया। लोहा पांगल ने भोजन करना स्वीकार किया। जांभोजी द्वारा प्रदत्त श्रावण भादव नामक दो कड़ाहों में बना भोजन पूरी मण्डली को जिमाया, परंतु कुछ भी कम नहीं पड़ा। लोहापांगल समझ गया कि मेरी पूरी मण्डली को कई गाँव एकत्रित होकर के भी भोजन देने में आनाकानी करते हैं।

जाम्भोजी ने सहजभाव से ही अति स्वादिष्ट भोजन करवा दिया। किन्तु यह केल्हण तो जाम्भाजी का एक साधारण शिष्य ही हमें बुलाने हेतु आया है। जाम्भोजी स्वयं नहीं आये। इसलिए उनके पास जाना ठीक नहीं होगा।

जाम्भोजी लोहा पांगल को जगाना चाहते थे। उस पर अपार कृपा थी। इसलिए लोहा पांगल का भाव जानकर स्वयं श्रीदेवजी श्चले। जाम्भोजी अकेले ही मण्डली में पहुँचे थे कि कहीं लोहापांगल अधिक लोगों को देखकर डर न जाये। जाम्भोजी ने देखा कि लोहापांगल भोजन करके आँखे बंद करके मौन होकर बैठा है। समाधि का बहाना कर रहा है। जाम्भोजी ने जाकर आदेश कहा किन्तु न तो लोहापांगल ही कुछ बोला और न ही उसकी जमात ने ही जवाब दिया। किन्तु वहाँ पर धुइयों एवं अग्नि से आदेश आदेश आने लगा। लोहापांगल ने सुना तो आँखें खेली और रोषभरी दृष्टि से देखने लगा औद्भ कहने लगा-मेरे आदेश के विरुद्ध कौन मेरा शिष्य आदेश आदेश बोलता है? शिष्यों ने कहा-महाराज! ये धुइयां एवं अग्नि बोल रही हैं। लोहापांगल सहित सम्पूर्ण मण्डली ने आदेश आदेश कहते हुए जाम्भोजी की आधीनता स्वीकार करली।

जाम्भोजी की आज्ञा से सूर्य तपने लगा। प्रचंड गर्मी से लोहापांगल का लोह दहकने लगा। वह गर्मी सहन नहीं कर सका और छाया में जा बैठा। शरीर को ठण्डा करने का उपाय करने लगा। शरीर पर जड़ी बूटी द्वारा ईलाज किया। धूल में लोटपोट होने लगा। किन्तु जलन शाँत नहीं हुई। लोहा पांगल ने अपने कष्ट निवारण हेतु प्रार्थना की।

जाम्भोजी ने कहा-कल प्रातःकाल ही सम्भराथल पर आ जाना। मैं तुम्हारे तप की निवृत्ति का उपाय बताऊँगा। ऐसा कहते हुए श्रीदेवजी सम्भराथल पर चले गये। दूसरे दिन सुबह ही अपनी मण्डली सहित श्रीदेवजी के पास सम्भराथल पहुँचा।

लोहा पांगल कहे-कहाँ-कहाज हो। जाम्भोजी श्रद्ध वायक कहे

शब्द-40 ओ३म् सप्त पताले तिहूँ त्रिलोके, चवदा भवने गगन गहीरे।

बाहर भीतर सर्व निरन्तर, जहाँ चीन्हों तहां सोई।

सतगुरु मिलियों सतपंथ बतायो, भ्रान्त चुकाई,

अवर न बुझबा कोई।

लोहा पांगल ने पूछा कि आप कहाँ-कहाँ रहते हो? जाम्भोजी ने बतलाया कि मैँ सातों पातालों में, अतल, वितल, सुतल, तलातल, रसातल, पाताल, महातल तथा ऊपर के भी भूः भुवः स्वः महः जनः तपः सत्यम् इन सातों में भी, तीनों लोक, मृत्यु, स्वर्ग, ब्रह्मलोक में भी इस प्रकार से 14 लोकों में मेरा निवास है। गगन समुद्र, बाहर, भीतर सर्व स्थानों में निरन्तर मेरा निवास है। अथवा जहाँ पर भी मेरा स्मरण करोगे, मैं वहीं पर विद्यमान हूँ।

हे लोहा पांगल! तुझे सतगुरु मिल चुका है। सतपंथ बताया है। तेरी भ्रान्ति मिटाई है। अब तुझे किसी से भी पूछने की आवश्यकता नहीं है।

शबदि सुणी आयस बोल्या नहीं। जाम्भोजी श्रीवायक कहे-

शब्द-41 ओ३म् सुण राजेन्द्र, सुण जोगेन्द्र, सुण शेषिन्द्र, सुण सोक्तिन्द्र।

सुण काफि न्द्र, सुण चाचिन्द्र, सिद्धक साध कहाँणी।

झूठी काया उपजत बिणद्यत,जां जां नुगरे थिती न जांणी।

उपर्युक्त शब्द में विष्णो जाम्भोजी की सर्व व्यापकता सुनकर योगी मौन हो गया। कुछ बोला नहीं तब जाम्भोजी ने पुनः शब्द सुनाते हुए कहा- हे राजेन्द्र सुनो! हे योगीन्द्र सुनो! हे शेष सुनो! हे सूफी सुनो! हे काफिन्द्र सुनो! हे चाचिन्द्र आप भी सुनो! हे सिद्धो! हे साधको! सुनो! आप लोग मौन क्यों हो गये। मेरी बात सुनना भी बन्द क्यों किया? सुनो अवश्य ही।

यह शरीर एवं शरीर के कीमती अंग कान आदि सुनने के लिए ही तो मिले हैं। अन्यथा तो यह झूठी काया उत्पन्न एवं विनाशशील है। यह चली जायेगी, तो पुनः प्राप्त नहीं हो सकेगी। इसलिए इस शरीर के रहते हुए ही अमूल्य वचन श्रवण कर लो।

हे नुगरो! समय का विश्वास न करो। यह व्यतीत हो जायेगा। आयस कहै जोग मारग दीस है। जाम्भोजी श्री वायक कहे-

शब्द-42 ओ३म् आयसां काहे काजै खेह भकरूड़ो, सेवो भूत मसांणी।

घड़े ऊंधै बरसत बहु मेहा, तिहिमा कृष्ण चरित बिन पड्यो न पड़सी पाणी।

योगी जंगम नाथ दिगम्बर, संन्यासी ब्राह्मण ब्रह्मचारी।

मनहट पढ़िया पंडित, काजी मुल्ला खेलै आप दवारी।।

निश्चै कायो वायो होयसी, जै गुरु बिन खेल पसारी।

आयस कहने लगे हे देव! योग मार्ग अति कठिन है। हम लोग इस मार्ग के पथिक हैं। जाम्भोजी ने शब्द सुनाते हुए बतलाया कि हे आयसो! योग का अर्थ है कि जीवात्मा एवं परमात्मा का मिलन करना। आप लोग परमात्मा की प्राप्ति हेतु शरीर पर भस्मी क्यों लगाते हो? इस राख से तो तुम्हारा शरीर ही दूषित हुआ है। यह योग का साधन नहीं है।

हे योगी लोगो! आप लोग योग साधना भूत-प्रेतों की सेवा, शमशान भूमि में जाकर क्यों करते हो? यह तो योग के विरुद्ध कार्य है। आप लोगों ने घड़े को उल्टा कर लिया है। योग के विरुद्ध चल पड़े हो। ऊँधे घड़े में जल नहीं भरेगा। चाहे कितनी वर्षा क्यों न हो। जब तक आप पर कृष्ण चरित का प्रभाव नहीं होगा, तब तक सभी साधन व्यर्थ हैं।

कृष्ण की अपार कृपा से ही तुम्हारा उल्टा मानसिक भाव सीधा हो सकेगा। इस समय यहाँ पर कृष्ण चरित विद्यमान है। इस समय योगी, जंगम, नाथ, दिगम्बर, संन्यासी, ब्राह्मण, ब्रह्मचारी, मनहठी, पढ़े पण्डित, काजी मुल्ला आदि ये सभी लोग अपना अपना मनमुखी खेल खेल रहे हैं। यह तो निश्चित है कि इनकी काया क्षीण होगी। यदि बिना गुरु के मनमुखी खेल खेलते रहेंगे तो।

आयस कहै हमने जोग मारग सब लीया है। जाम्भौजी श्री वायक कहे-

शब्द-43 ओ३म् ज्यूं राज गए राजिंदर झूरै, खोज गए नै खोजी।

लाछ मुई गिरहायत झूरै, अरथ बिहूँणा लोगी।

मोर झड़ें कृसाण भी झूरै, बिंद गए नै जोगी।

जोगी जंगम जपिया तपिया , जति तपि तकपी:्न

जिहि तुल भूला पाहण तोले, तिहि तुल तोलन हीरूं।

जोगी सोतो जुग जुग जोगी, अब भी जोगी सोई।

थे कान चिरावो चिरघट पहरो, आयसां यह पाखंड तो जोग न कोई।

जटा बधारो जीव सिंघारो, आयसां इहि पाखण्ड तो जोग न होई।

आयस कहने लगे-हमने योग मार्ग लिया है। हम लोग योग साधना करते हैं। जाम्भोजी ने शब्द कहा जिस प्रकार से राज चला जाता है तो राजा रोता है, क्योंकि राज था तभी तक राजा था। खोजी व्यक्ति का खोज चला जाता है, तो वह रोता है। चरणचिह्नों की खोज करना ही उसका ध्येय था। गृहस्थ में जब घरवाली ही मर जाये तो, गृहस्थ पुरुष रोता है। क्योंकि जब तक घरवाली थी तभी तक गृहस्थ था। यही उसके जीवन का सार था।

संसार में धन के लोभी धनहीन हो जाने पर रोते हैं। क्योंकि धन ही उसका सभी कुछ था। खेती करने वाले किसान तो तब रोता है, जब उसकी खेती में आये हुए फूल झड़ जाते हैं। क्योंकि बिना फूल की खेती में फल नहीं आयेंगे, यही उसकी तो आजीविका थी। योगी के लिए तो ब्रह्मचर्य ही उसका बल है, जीवन प्राण है, वही जब स्खलित हो जाये तो उसे भी रोना ही पड़ता है। क्योंकि ब्रह्मचर्य बिना योग साधना की कल्पना करना ही व्यर्थ है।

इसी प्रकार से आप लोग भी मुझे रोते हुए दिखाई दे रहे हो। फिर कैसी आपकी योग साधना सफल हुई है? इस समय योगी,जंगम,जती,तपी,यती,तकपीर ये सभी भूले हुए इस उतम जीवन तराजू से पत्थर तोल रहे हैं। उन्हें अपनी साधना मार्ग का ज्ञान ही नहीं है, पूर्णतया भटक चुके हैं।

गुरुदेव कहते हैं कि मैं तो उसी तराजू से हीरे तोलता हूँ। उत्तम व्यापार कर रहा हूँ। यदि वास्तव में कोई योगी होगा तो युगों युगों तक योगी ही रहेगा। तथा अब भी वह योगी है। कई जन्मों की साधना का फल योगी है। किन्तु आप लोग योगमार्ग जानते ही नहीं। केवल बाह्य दिखावा ही करते हैं। आप लोगों ने कान चिरवा लिये, मुद्रा डाल ली, लंगोटी पहन ली। हे आयस! यह पाखण्ड तो योग नहीं हो सकता तथा जटाएँ बढ़ाना एवं जीवों की हत्या करनी तो यह पाखण्ड ही है। योग नहीं है। इसलिए असली योगी बनो।

आयस कहे जोग मार3 हमने सबही किया-जाम्भोजी श्रीवायक कहे-

शब्द-44 ओ३म् खरतर झोली खरतर कंथा, कांध सहे दुख भारूं।

जोग तणी थे खबर न पाई, कांय तज्या घर बारूं।

ले सुई धागा सीवण लागा, करड़ कसीदि मेखलीयो।

जड़ जटाधारी लंघै न पारी, बाद बिवाद बेकरणो।

थे बीर जपो बेताल धियाशो, कांय न खोजो ततकणो।

आयसां डंडत डंडू मुडंत मुंडू, मुंडत माया मोह किसो।

भरमी बादी बादे भूला, कांय न पाली जीव दयो।।

आयस लोहापांगल कहने लगा- महाराज! जो भी यौगिक क्रियाएँ हैं। वे सभी मैंने की हैं। आप हमें योगी क्यों नहीं मानते हैं? श्री जम्भेश्वरजी ने शब्द सुनाया-

हे लोहापांगल! आप लोगों ने कन्धे पर झोली एवं कंथा (गुदड़ी) उठा रखी है। इससे कोई योगी नहीं हो जाता है। ये तो कंधे पर भाररूप ही है। आप लोगों ने योग क्या है, इसका पता भी नहीं लगाया है। तो फिर घरबार क्यों छोड़ा है? यह भार तो गृहस्थी में ही काफी था। सुई धागा लेकर आप लोगों ने मेखलिये-झोले पर अनेकों प्रकार का कसीदा-चित्रकारी बनायी है, यही योग है क्या?

केवल मूर्खतावश जटाएँ बढ़ा लेने से पार नहीं उतर सकोगे। आप लोग व्यर्थ के विवाद में पड़कर अकर्त्तव्य कर्म कर रहे हो। आप लोग बीरों का, भूत प्रह्यतों का जप करते हो। बेतालों का ध्यान करते हो। ये तो वैसे ही अधोगति में गिरे हुए जीव हैं। ये आप लोगों को डुबा देंगे। तत्त्व की खोज क्यों नहीं करते? व्यर्थ के बकवाद में ही जीवन व्यतीत कर रहे हैं। हे आयसों! हाथ में डंडा लेने से या मूंड मुंडाने से कुछ भी नहीं होगा। यदि सिर मुंडा ही लिया तो मोह किसका? सिर मुंडाना तो सभी कुछ मोह माया समाप्त हो जाना है। किन्तु आप लोग तो मोहमाया में पड़े हुए हैं। आप लोग भ्रमवश व्यर्थ के वाद-विवाद में भूले हुए हैं। जीवों पर दया क्यों नहीं करते? योगी तो सर्वभूत हिते रता होना चाहिए।

लोहापांगल कहे- मेरे गुरु यों कहया था। तुझ कू आदि गोरख उमित का साहिब मिलेगा। जदि तेरा लोह झड., सो क्या जाणे तम होक नहीं। जाम्भोजी श्रीवायक कहे-

शब्द-45 ओ३म् दोय मन दो दिल सिंशी न कंथा, दोय मन दोय दिल पुली न पंथा।

दोय मन दोय दिल कही न कंथा, दोय मन दोय दिल सुणी न कथा।

दोय मन दोय दिल पंथ दुहेला, दोय मन दोय दिल गुरु न चेला।

दोय मन दोय दिल बंधी न बेला, दोय मन दोय दिल रब्ब दुहेला।

दोय मन दोय दिल सुई न धागा, दोय मन दोय दिल भिड़े न भागा।

दोय मन दोय दिल भेव न भेऊ,दोय मन दोय दिल टेव न टेऊं।

दोय मन दोय दिल केल न केला, दोय मन दोय दिल सुरग न मेला।

रावल जोगी तां तां फिरियो, अण चीन्हैं के चाह्यों।

कांहे काजै दिशाबर खेलो, मन हठ सीख न कायों।

थे जोग न जोग्या भोग न भोग्या, गुरु न चीन्हों रायों।

कण विण कूकस कांये पीसो, निंश्चय सरी न कायों।

बिण पायचिये पग दुख पावै, अबधू लोहै दुःखी सकायो।

पारब्रह्म की सुध न जांणी, तो नागे जोग न पायो।

लोहापांगल कहने लगा-मेरे गुरु ने ऐसा कहा था कि तुझे आदि गोरख विष्णु साक्षात् सम्भराथल पर मिलेंगे। वे साहिब तुझ पर अपार कृपा करेंगे, तो तुम्हारा यह पापस्वरूप लोहकच्छ झड़ेगा। किन्तु मैं यह कैसे जानूँ कि वही साहिब आप हैं। मुझे विश्वास नहीं हो रहा है। मेरा दिल असमंजस में है कि आपको स्वीकार करूँ या नहीं? आप वास्तव में वही हो या नहीं?

इतनी वार्ता श्रवण करके श्री देवजी ने शब्द सुनाया-दो मन दो दिल अर्थात् एकाग्रवृत्ति का अभाव होना। एक निश्चय नहीं कर पाना, सर्वत्र अविश्वास अश्रद्धा का होना। इस प्रकार से चलते हुए तो तुम्हारा कार्य बनेगा नहीं। यह लोहा झड़ना तो बहुत बड़ी बात है। द्विविधा वृत्ति से तो तुम कंथा गूदड़ी भी नहीं सी सकते, और न ही पंथ पर चल सकते। द्विविधा वृत्ति से तो न कथा कह सकते हैं और न ही सुन सकते। एकाग्रता के अभाव में तो मार्ग भी भूल जाओगे और एकता बिना तो न ही गुरु हो सकता और न ही चेला ही हो सकता। दो मन दोय दिल से तो बेला-इस समय में नहीं बंध सकता और वृत्ति निरोध किये बिना तो राम को ही भूल जायेगा। दो मन से तो सुई में धागा भी नहीं पिरोया जायेगा तथा एकता बिना तो युद्ध भी नहीं कर सकते और न ही भाग ही सकते। किसी भी भेद को भी नहीं जाना जा सकता। और न ही दोय मन दोय दिल प्रतिज्ञा की जा सकती है और न ही प्रेमभाव ही किया जा सकता। अविश्वास से तो खेल भी नहीं खेला जा सकता और न ही स्वर्ग की प्राप्ति ही की जा सकती है। हे लोहापांगल! रावल जोगी जहाँ-जहाँ भी भटकेंंगे, किन्तु बिना स्मरण किये कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकोगे। किस हेतु अनेक देश देशान्तरों में भटक ते हो, जब तक स्वकीय मनहठ का परित्याग नहीं करोगे तो कुछ भी प्राप्त नहीं हो सकेगा। आप लोगों ने तो न तो पूर्णरूपेण योग ही किया और न ही भोग ही भोगा और न ही परमात्मा का स्मरण ही किया। ज्ञान द्वारा परमात्मा की पहचान भी नहीं की। आप लोग तो कणविहीन थोथे भूसे (चांचड़) को पीस रहे हो, उसमें कण कहाँ है? आपकी भूख कैसे मिटेगी? बिना पगरखी पहने जंगल में भटकने से आप लोगों के पैर ही तो दुःख पा रहे हैं।

हे अवधु! तुमने लोहे का कच्छ पहन रखा है। यह सिवाय दुःख के तुम्हे क्या देगा? पारब्रह्म परमात्मा की तो सुधि मिली नहीं, तो केवल नंगे हो जाने से योगी नहीं बन सकते।

तम आदि नाथ जोगी तो तमारे मुदरा कहाँ-जाम्भाजी श्रीवायक कहे-

शब्द-46 ओ३म् जिहिं जोगी के मनही मुद्रा, तनही कंथा पिंडे अगन थंभायो।

जिहि जोगी की सेवा कीजै, तूठो भवजल पार लंघावे।

नाथ कहावे मर मर जावै, सेक्यूं नाथ कहावे।

नान्ही मोटी जीवा जूंणी, निरजत सिरजत फिं र फिं र पूठा आवै।

हम ही रावल हम ही जोगी, हम राजा के रायो।

जो ज्यूं आवै सो त्यूं थरपा, सांचा सूं सत भायों।

पाप न छिपां पुण्य न हारा,करां न करतब लावां बारूं।

जीव तड़े को रिजक न मेटूं, मूवां परहथ सारूं।।

दोरै भिस्त बिचालै ऊभा, मिलिया काम सवारूं।

लोहापांगल ने कहा-हे जम्भेश्वर! यदि आप आदिनाथ योगी हैँ, तो कानों में मुद्रा क्यों नहीं है? जाम्भोजी ने श्रीवायक कहा-हे लोहापांगल! जिस योगी के मन ही मुद्रा है, शरीर ही गुदड़ी है, जिसने शरीर में ही अग्नि को स्थिर किया है। बाह्य दिखावा धूणा धुकाना, मुद्रा पहनना एवं गुदड़ी ओढ़ना आदि को महत्व नहीं दिया है। केवल आन्तरिक मुद्रा कंथा एवं अग्नि जागृत किया है वही योगी वास्तव में योगी है।

ऐसे महान् योगी की सेवा कीजिये। वह योगी संतुष्ट हो जायेगा, तो संसार सागर से पार उतार देगा। जो जोगी अपने को नाथ कहता है, फिर भी बार-बार जन्म लेता है और मरता है, फिर वह योगी कैसा? अपने को नाथ क्यों कहता है? योगी होकर भी छोटी-मोटी जीवां योनियों में भटकता है, बार-बार जन्म लेकर पुनः मरता है, वह नाथ योगी कैसा?

हे लोहापांगल! मैं ही रावल हूँ। मैं ही योगी हूँ। मैं ही राजाओं का भी सम्राट हूँ। जो जिस भाव से मेरे पास आता है, उसी भाव से मैं उनकी देखभाल करता हूँ। जो सत्यनिष्ठ हैं, वह तो मुझे बहुत ही अच्छे लगते हैं। न तो मैं किसी के पाप को छिपाता हूँ और न हीं पुण्य का हरण करता हूँ। न ही मैं किसी को कर्म करनेके लिए मजबूर ही करता हूँ और न ही किसी को जन्म मरण के चक्कर में डालता हूँ।

सभी जीव अपने अपने कर्म करने में परम स्वतंत्र हैं। जब तक जियेगा तब तक तो अपने कर्मों को भोगेगा और मृत्यु हो जाने पर दूसरे के हाथ में चला जायेगा। अपने वश में कुछ भी नहीं होगा।

हे आयस! इस समय आप लोग दोरे नरक एवं भिस्त-स्वर्ग के बीच में खड़े हुए हैं। मिल जाओगे तो कार्य बन जायेगा। अन्यथा दोनों तरफ ही जा सकते हो।

लोहा पांगल कहे- जोग साझया है बजर काछ बणाई है- जाम्भोजी श्रीवायक कहै-

शब्द-47 ओ३म् काया कंथा मन जो गूंटो, सीगी सास उसासूं।

मन मृग राखले कर कृषांणी, यूं म्हे भया उदासूं।

हम हीं जोगी हमहीं जती, हमहीं सती हमही राखबा चीतूं।

पंच पटण नव थानक साधले, आद नाथ के भक्तूं।

लोहापांगल ने कहा-हमने योग साधना की है। काछ बज्र की बनाई है। लोह कच्छ पहने से काछ वज्र की भांति हो चुकी है। इसलिए हम सच्चे योगी हैं। श्रीदेवजी ने शब्द कहायह

तुम्हारा शरीर ही कंथा है, मन ही गूंटो गले में पहनने वाला मनका है। अन्य की आवश्यकता ही नहीं है। इस शरीर रूपी गुदड़ी को संभालकर रखें और मन की चंचलता को शांत करें यही गूंटा है। तुम्हारा श्वास प्रच्छवास ही बजाने वाले सीगी है। सीगी बजाने की आवश्यकता ही नहीं होगी क्योंकि श्वास आते जाते स्वतः ही बज रहे हैं। मनरूपी मृग को स्थिर करके खेती रूपी साधना करे। इससे उदासीनता आयेगी तो संसार की मोहमाया से छूटैगद्ध।

हे आयस! मैं ही योगी हूँ। मैं ही सती हूँ। मैं ही यती हूँ। मैं ही चित्त को स्थिर करने वाला सिद्ध योगी हूँ। हे आदिनाथ के भक्त! पंच प्राणों का प्राणायाम द्वारा स्व वशीभूत कर, ये प्राण ही पटश्रेष्ठ है। नौ दरवाजे ही नौ थानक है। इन दरवाजों को भी बंद करके साधना कर, तभी तुम भक्त कहलाने की योग्यता धारण कर सकोगे।

लोहापांगल परच पगे लागो। के के जोगी और पणि परच्या। जटा उतराई विसनोई हुवा। जोगी कहे जाम्भोजी म्हे थारा चेला हुआ। सरणि आया सुध करणी फुरमावो। जाम्भोजी श्रीवायक कहे-

शब्द - 53 ओ३म् गुरु हीरा विणजे लेहम लेहूँ, गुरु ने दोष न देणा।

पवणा पाणी जमी मेहूँ, भार अठारे परबत रेहूँ।

सूरज जोति परे परे रे, एति गुरु के शरणे।

केती पबली अरु जल बिम्बा,नवसे नदी निवासी नाला सायर एती जरणां।

क्रोड़ निनाणवे राजा भोगी, गुरु के आखर कारण जोगी।

माया राणी राज तजीलो, गुरु भेटीलो जोग सझीलो पिंडा देख न झुरणा।

कर कृषाणी बेफायत संठो, जो जो जीव पि.डै नीसरणा।

आदै पहलू घड़ी अढाई, स्वर्गे पहुंता हिरणी हिरणा।

सुरां पुना तेतीसां मेलो, जे जीवन्ता मरणों।

के के जीव कुजीव, कुधात कलोतर बांणी।

बादीलो हंकारीलो, वैभार घणा ले मरणो।

मिनखां रे तैं सूतैं सोयो, खूलै खोयो, जड़ पाहन संसार बिगोयो।

निरफ ल खोड़ भिरांति भूला, आस किसी जा मरणो।

बेसाही अंध पड़यो गल फंध, लियो गल बंध गुरु बरजंतै।

हेलै श्याम सुन्दर के टाह्यटै, पारस दुस्तर तरणो।

निश्चे छेह पड़ेलो पालो, गोवलवास जु करणों।

गोवलवास कमाय ले जिवड़ा, सो सुरगापुर लहणा।।

लोहा पांगल ने अपनी अनेक शंकाओं का समाधान शब्दों द्वारा किया और अन्त में गुरुदेव की सिद्धि से परिचित हुआ और अहंकार का परित्याग करके चरणों में गिर पड़ा। तन-मन-धन से समर्पित हुआ। गर्व गल जाने के साथ ही लोहापांगल का लोहकच्छ भी पिघल गया और शरीर से छूट गया।

अहंकार ही तो लौह कच्छ था। वही तो गिर गया। तब लोहे की क्या औकात? जो सजीव शरीर से चिपका रह सके। वह लोहापांगल तो लोहा ही था, जिसे श्रीदेवजी ने लोहा से रूपा (चांदी) बना दिया। उसका लोहा नाम बदलकर रूपा नाम रखा। पैरों से पांगला-लंगड़ा था। इसलिए लोहे का कच्छ पहन रखा था, ताकि पैरों से ठीक प्रकार से चल सके।

सतगुरु की अपार कृपा हुई। वह चलने योग्य हो गया। तो अब उसे लोहे के कच्छ की आवश्यकता ही नहीं रही थी। हम आपकी शरण में हैं। जाम्भोजी ने शब्द सुनाया-हे शिष्यो! गुरु तो सदा ही हीरों का व्यापार करता है। जिसे लेना है, वह अवश्य ही प्राप्त करे। बहती गंगा में जिसे स्नान करना है, वह करे। अन्यथा गुरु को दोष नहीं देना।

पवन,पाणी,धरती,आकाश,वर्षा,अठारह पर्बत, सूर्य की ज्योति जहाँ तक पहुँचती है, वहाँ से भी परे ये सभी गुरु की शरण में हैं। कुछ छोटे-बड़े तालाब, जल, समुद्र, नदियाँ, नये-नये प्रकार के पानी के जलसा्रेत ये सभी समुद्र में ही समाहित हो जाते हैँ। उसी प्रकार से ही सम्पूर्ण ज्ञान या जीव, सभी गुरु में समाहित हो जाते हैँ। वह हिरण्यगर्भ नाम से गुरु ही विख्यात है।

निन्यानवे करोड़ राजा हुए हैँ। ये सभी विशेष राजा थे। इन्होंने राजसुख प्राप्त किया था। उन्होंने माया राणी राज आदि सभी कुछ त्याग करके गुरु से भेंट की थी और तपस्या द्वारा शरीर को सुखा डाला था। उन्होंने साधना में रत रहके, अपने प्रियजनों की भी परवाह नहीं की थी। वे लोग मोह-माया से पार उतर गये थे।

साधना रूपी कृषि कार्य करे। लाभ तो तभी होगा, जब तक फल आये। तब तक करता रहे। इस जीवन में लाभ नहीं दिखता, तो भी आगामी जन्म में फल अवश्य ही मिलेगा। अढ़ाई घड़ी में हिरणी-हिरणा तथा उनके बच्चे छः प्राणी तथा एक अहेड़ी-शिकारी भी स्वर्ग में पहुँच गये थे। जो अब तक भी आकाश में तारों के रूप में दिखाई देते हैं। क्योंकि उन्होंने धर्म पर अपने प्राण न्यौछावर कर दिये थे। इनके विपरीत कई कई जीव कुजीव हैं। कुद्यात, अपशब्द बोलने वाले, झगड़ालू, विवादी, अहंकारी, ऐसे लोग इस संसार से बहुत बड़ा भार लेकर जायेंगे। संसार सागर में डूब जायेंगे।

हे मानव, तू मनुष्य है। सोये हुए ही जीवन व्यतीत कर दिया। यह तुमने खुले रूप से जीवन को खो दिया। जड़-पत्थर आदि पर ही अपने को समर्पित कर दिया। जिस वन में फल नहीं हैं, उसमें ढूँढ़ने से भी क्या मिलेगा? भ्रान्ति में भटक ता रहा निष्फल वन में। शरीर छोड़कर किस आशा-विश्वास से आगे जायेगा।

हे अन्ध! तेरे गले में मोह-ममता रूपी फांसी पड़ी हुई है। इससे छूट भी नहीं सकता क्योंकि वह फांसी तुम्हें सोने की दिखती है। गुरु ने तुझे बार बार रोका था फिर भी फंसता ही चला गया। श्यामसुन्दर भगवान् तुझे हेला दे रहे हैँ कभी तुमने सुना भी नहीं। जिस प्रकार से थोड़े दिनों के लिए घरबार छोड़कर गोवलवास को जाते हैं। उसी प्रकार से यह संसार भी तो गोवलवास की तरह ही है। यहाँ पर भी सदा रहने का जुगाड़ न बना। एक दिन जबरदस्ती छुड़ाया जायेगा। इससे तो अच्छा है कि समय रहते, पहले ही छोड़ दें।

लोह पांगल कहे देवजी। आवागवण चुके जक्यो बात बतावां। श्रीदेवजी श्रीवायक कहे-

शब्द-54 ओ३म् अरण बिंबाणे रे रिव भांणै, देव दिंवाणे, विष्णु पुराणे।

बिंबा बाणे सूर उगाणो, विष्णु बिवाणे, कृष्ण पुराणे।

कांय झंख्यो तैं आल पिराणी, सुर नर तणी सबेरूं।

इंडो फूटो बेला बरती, ताछै हुई बेर अबेरूं।

मेरे परै सो जोयण बिंबा लोयण, पुरुष भलो निज बांणी।

बांकी म्हारी एका जोती, मनसा सास बिंवाणी।

को अचारी अचारे लेणा, संजमे शीले सहज पतीना।

तिहिं अचारी नै चीन्हत कोण, जाकी सहजै चूके आवागवण।

लोहापांगल कहने लगा- हे देवजी! जिस प्रकार से जन्म-मरण दुःख मिटे। ऐसा उपाय बतलाओ? श्रीदेवजी ने शब्द कहा- हे रूपा! मैं सतगुरु के रूप में तुम्हारे सामने बैठा हुआ हूँ। मैं तुम्हें आचारविचार, संयम, शील सिखाने हेतु गुरु के रूप में आया हूँ। वैसे तो मैं निराकार रूप में ही रहता हूँ। वह पुरुष परमात्मा के नाम से कहा जाता है। वही पुरुष परमात्मा इस समय वाणी के रूप में अवतरित हुआ हूँ। उस परमात्मा और मेरी एक ही ज्योति है। मनसा एवं श्वास प्रच्छवास एक ही चल रही है।

उस आचारी परमात्मा को कोई आचरवान ही प्राप्त कर सकता है। जिसने आचारवान पुरुष परमात्मा को प्राप्त कर लिया, वही जन्म-मरण के चक्कर से छूट जाता है। हे रूपा! उस परमात्मा की सत्ता से ही सम्पूर्ण सृष्टि में प्रकृति की हलन-चलन हो रही है।

उस परमात्मा की इच्छा से ही प्रातःकाल की अरुणवेला आती है, जिसमें सूर्य किरणों द्वारा पाँव पसारता है अर्थात् उदय होता है। यह सूर्य भी देवताओं का दीवान है। यह विष्णु रूप अति प्राचीन है। सूर्य देवता उदय होता है तो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। यह सूर्य ही विष्णु का विमान है। इसी पर सवार होकर भगवान् विष्णु सम्पूर्ण सृष्टि का अवलोकन करते हैं।

यह सूर्य कृष्ण पुराण है। कृष्ण की कथा भी यहीं से उदय होती है। हे रूपा! यदि आप अपना भला चाहते हैं, तो सूर्योदय की घटना के प्रत्यक्ष रूप से विद्यमान रहते हुए आल-बाल झूठ क्यों बोलता है? देवता की तरफ से होने वाला सवेरा एवं संध्या वेला को व्यर्थ में न जानें दें। भगवान् विष्णु का जप करें।

दिन-रात करते हुए समय व्यतीत होता जा रहा है। समय कीमती है। इसके महत्व को समझते हुए श्वासों ही श्वास भगवान् विष्णु का भजन एवं सेवा कार्य करें। तभी तेरा पाप झड़ेगा और मुक्ति को प्राप्त हो सकेगा।

लोहा पांगल कहे देवजी! जामण मरण रहित हवै जका करणी बतायों। देवजी कहे-साधां की सेवा करि, मारग माँ जमातियाँ ने पाणी पाय, लोहा पांगल को नाम रूपो दीन्हो। एक सम चर मां पाणी पावणै न गयो। लोगे रूपै मां फोड़ा घात्या। रूपो देवजी आगे आय दलगीर हुवो। कलपण लागो। नैणे नीर प्रवाह आयो। रूपो पछताणो तिह समये, जाम्भोजी श्रीवायक कहे-

शब्द-55 ओ३म् रणघटिये के खोज फिरन्ता, सुण सेवन्ता खोज हस्ती को पायो।

लूंकड़िये को खोज फिरन्ता, सुण सेवन्ता खोज सुरह को पायो।

मोथड़िये के गूढ़ खणंता सुण सेवन्ता, लाधो थान सुथानो।

रांघड़िये को घाट घड़न्ता सुण सेवन्ता, कंचन सोनो डायों।

हस्ती चड़ंता गेवर गुड़न्ता, सुणहीं सुणहां भूंकत कायों।

लोहा पांगल कहने लगा-हे देवजी! जन्म मरण से कैसे छूटे? यह कर्त्तव्य कर्म बतलाओ। देवजी ने कहा-हे रूपा! साधु, सज्जन पुरुषों की सेवा करे। मार्ग में आने-जाने वाले जमाती लोगों को जल पिला। जल सेवा से बढ़कर और कोई सेवा नहीं है। रूपाराम को श्री देवजी ने धरणोक गाँव में जल सेवा करने हेतु भेजा। जाम्भोलाव एवं सम्भराथल के बीच यह गाँव पड़ता है।

एक समय रूपा जल पिला रहा था। कुछ गाँव के लोग घास काटते हुए रूपे के पास एकत्रित हो गये। रूपे ने सभी को कंधे पर कावड़ रखकर जल लाकर पिलाया। बड़ी सेवा रूपी तपस्या कर रहा था। सेवाकार्य में निःस्वार्थ भाव से लगा हुआ था। एकत्रित गाँव के लोग रूपे से मखौल-हंसी करने लगे।

रूपे से कहने लगे-तुम तो पहले मंहत थे। भूत-प्रेत जगाया करते थे। बड़ा ठाठ था। सभी लोग तुम्हारे डर के मारे काँपते थे। अब तो तुम जाम्भोजी के पास आकर घाटे में हो गये। अब यह तुम्हारी महंताई सिद्धाई कहाँ गयी। दिनभर कंधे पर कावड़ द्वारा पानी ढ़ोकर पिला रहे हो। अभी भी तुम्हें पिछली करामात शायद याद होगी। हमारा कहना मानो तो अब भी छोड़ दो। ये जाम्भोजी के चेले पने को और पुनः महंत ही बन जाओ। यही ठीक रहेगा।

रूपे ने उन लोगों को समझाया कि आप लोग मुझ से हंसी ना करो, अन्यथा पछतावोगे। लोगों ने कहा-अब तुम हमारा क्या कर लोगे? अब तो जाम्भोजी के चक्कर में ही फंस गये। निकल ही नहीं सकते। वो तुम्हारी तांत्रिक विद्या तो जाम्भोजी ने हरण कर ली है। रूपे के पूर्व संस्कार अब तक निवृत्त नहीं हुए थे। उन लोगों की वार्ता सुनकर रूपे से पुनः लोहा हो गया और क्रोध रूपी अग्नि फिर से प्रज्वलित हो गयी और रूपे ने उन लोगों के कपड़े जला दिये।

दो-चार दिन बाद ही अमावस का पर्व आया। रूपाराम व अन्य गाँव के लोग भी सम्भराथल पर पहुँचे। रूपा देवजी के सामने जाकर रोने लगा। आँखों में आँसू बहाने लगा-देवजी ने कहा-रूपा क्या बात है? रोते क्यों हो? क्या बताऊँ गुरुदेव! जिस गाँव में आपने मुझे भेजा है। उन लोगों ने मुझे बहुत ही दुःखित किया है। मैं इन लोगों के बीच नहीं रह सकता।

उसी समय गाँववासियों ने भी आकर देवजी के सामने शिकायत की कि महाराज! यह कैसा सेवक आपने भेजा है? इसने हमारे कपड़े जला दिये। श्रीदेवजी ने प्रथम तो रूपे को शब्द द्वारा समझाते हुए कहा-

हे रूपा! इससे पूर्व तू खरगोश की खोज में भटका करता था। उसी की ही सेवा करता था। मैंने तुम्हें खरगोश की जगह हाथी दे दिया है। पूर्व की स्थिति और अब में काफी अन्तर आया है। इसे तूं समझता क्यों नहीं? लोमड़ी की खोज में घूमता था उसी की ही सेवा करता था। मैंने तुम्हें सुरभि गऊ दे दी है, फिर भी तू अपने को दीन-हीन क्यों समझता है?

हे रूपा! पहले तू मोथ खोदा करता था, तेरा जीवन हीन था। अब मैं तुम्हें आम का मधुर फल देता हूँ। व्यर्थ के वाद-विवाद व कुतर्क में ही जीवन व्यतीत करता था। अब मैंने तुझे सेवा का कार्य सौंप दिया है। रांग घड़ता था मैंने तुझे सोना दे दिया। पहले तो पाखण्ड में ही सिद्धि समझता था, अब मैंने तुझे परम तत्त्व की प्राप्ति का साधन दे दिया है। अब तुझे अपने को हीन नहीं समझना चाहिये।

ये गाँव के लोग तुझे कुछ भी कहे तू इनकी परवाह न कर। मैंने तुझे सवारी के लिए हाथी दे दिया है अब तू हाथी पर सवार है। हाथी पर सवार को यदि कुत्ते भौंकते हैं, तो भौंकने दे। तेरा क्या बिगड़ेगा? रूपे ने देवजी भंडारो करि दीन्हौ, खीदासर के गाँव। भंडारे की सौंपना दीन्ही। जीवां ता जुगती आगै मुगति।

रूपराम को देवजी ने भण्डारे का कार्य सौंपा। सींवर गौत्र रखा। खींदासर गाँव में बसाया। जियेंगे तब तक युक्ति और अंत में मुक्ति का वरदान दिया। सिंवर गोत्र के बिश्नोई रूपे की परम्परा से हैं।