बारहवाँ अध्याय का उतरार्द्ध · कथा 81
वील्होजी का धर्म प्रचार-प्रसार
बिश्नोई पंथ एवं पंथ के प्रवर्तक गुरु जाम्भोजी के बारे में वील्होजी ने अपने गुरु नाथोजी से आद्यान्त पर्यन्त सुना और अपने गुरु नाथोजी के बैकुण्ठवासी होने के पश्चात् अपने गुरु की आज्ञा शिरोधार्य करके, वील्होजी भ्रमणार्थ निकल पड़े।
वील्होजी ने देखा कि इस समय दो तरह की समस्याएँ उपस्थित हो गयी हैं। प्रथम तो बिश्नोई लोग ही पंथ से विचलित हो रहे हैं। दूसरी समस्या यह थी कि जहाँ कहीं गाँव में बिश्नोई बने थे, किन्तु अल्प संख्या में ही। एक भाई तो बिश्नोई बन गया था, किन्तु दूसरे बहुत से भाई, सगा-सम्बन्धियों ने बिश्नोई पंथ स्वीकार नहीं किया था। उन बहुतों के बीच में एक का गुजारा चलना कठिन था। उन्हें धर्म पालन में कठिनाइयाँ हो रही थी। दूसरे लोग जानबूझकर कठिनाइयाँ पैदा कर रहे थे।
कहाँ-कहाँ कौन-कौन, बिश्नोई बने हैं, यह कुछ भी पता नहीं था। उस समय तक संगठन नहीं बना था। केवल बिश्नोई ही बने थे। जब बने थे तो जाम्भोजी का हाथ सिर पर था। किन्तु अब उनका मालिक कोई नहीं था। वील्होजी के सामने ये सामाजिक समस्यायें थीं। जो कुछ जाम्भोजी ने शब्दों द्वारा कहा था, वह तो नाथोजी के कण्ठस्थ था, तथा दो चार आदमी ऐसे और भी हो सकते थे किन्तु उनसे वील्होजी की भेंट नहीं हुई थी।
गुरु नाथोजी से वील्होजी ने शब्द तो श्रवण अवश्य ही किये थे। जाम्भोजी द्वारा की हुई अलौकिक लीला भी श्रवण परम्परा से सुनते-सुनाते आ रहे थे। अब तक लिखित कुछ भी नहीं था। केवल कर्ण परम्परा से सुनने-सुनाने से तो साहित्य के लुप्त होने का खतरा था। या हेराफेरी भी हो सकती थी। इसलिए लिखा जाना आवश्यक था। वील्होजी से पूर्व जाम्भोजी के संत-भक्तों ने साहित्य की रचना की थी। जिनमें उदोजी नैण, , तेजोजी, समसदीन, डैलहजी, आंछरे, कील्हजी चारण इत्यादि थे। इनके द्वारा साखी, छंद, कथा, आदि लिखे गये थे, किन्तु अपर्याप्त थे। साहित्य ही समाज का दर्पण होता है। किंतु इस साहित्यरूपी दर्पण से यह समाज वंचित था।
जाम्भोजी द्वारा स्थापित किए हु, पंथ की अभिवृद्धि भी होनी चाहिये। क्योंकि यह पंथ मार्ग युक्ति- मुक्ति दिलाने वाला था। जो पंथ के पंथिक बन चुके थे, वे तो कायम रहे और भी नवीन पंथ में सम्मिलित होना चाहते थे तो उनको भी सम्मिलित किया जाये। अधिकारी को ज्ञान देना पुण्य का कार्य है। वह किसी भी जाति-देश का हो सकता है। धर्म का प्रचार-प्रसार एवं साहित्य अभिवृद्धि हेतु जो होनहार युवक हैं, उन्हें प्रोत्साहन देकर आगे बढ़ाना हैं। इसके लिए शिष्य परम्परा भी आगे बढ़े और इस पंथ के पहरेदार तैयार हो सके। इसके लिए भी प्रयत्न करना आवश्यक था।
जहाँ-जहाँ पर भी जाम्भोजी की साथरियां हैं, जहाँ बिश्नोई बहुतायत में रहते हैं। वहाँ पर धर्म प्रचार का केन्द्र बनाया जावे। साधु समाज वहाँ पर निवास करे और अपनी साधना में रत रहकर धर्म प्रचार प्रसार करें उन्हीं साथरियों में पंचायत स्थापित की जाये। जो कुमार्ग पर चलने वाले लोगों को दण्डित करें। साम-दाम- दण्ड-भेद से धर्म को कायम रखा जावे। इसके लिए वील्होजी प्रयत्नशील हुए इन सभी कार्यों की पूर्ति हेतु आध्यात्मिक शक्ति के साथ ही साथ लौकिक राज शक्ति की भी आवश्यकता होती है। जाम्भोजी की अपार कृपा से सिद्धि को तो प्राप्त हो गये, किन्तु जाम्भोजी की तरह ही अपार शक्तिमान भगवान् तो नहीं बन सके थे। बिना राज सहायता के वील्होजी अपने ही बलबूते पर आगे कदम बढ़ाने में असमर्थता महसूस करने लगे। धर्म की अभिवृद्धि भी राजकीय सहायता के बिना होना संभव नहीं थी। इसलिए वील्होजी ने विचार किया कि जोधपुर राजा से जाकर एक बार म्मिलूँगा। जोधपुर के राजा जाम्भोजी के परम भक्त थे। जोधपुर के राजा सूरसिंह के पास वील्होजी संत मण्डली सहित पहुँचे। जोधपुर के राजदरबार की लौहपौल पर जाकर आसन लगाया। वील्होजी ने सभी संतों के सहित शब्द ध्वनि का गुंजार करते हुए लौहा-पौल पर हवन किया। उसी समय मधुर ध्वनि राजा के कानों में पड़ी। पूर्व संस्कार जाग्रत हुए
उस समय सूरसिंह ने कहा-यह लौहपौल की तरफ कौन गा रहा है? मेरे कानों में मधुर ध्वनि गुंजायमान हो रही है। तब एक चारण ने जवाब देते हुए कहा- हे राजन! जाम्भोजी के चेले आये हैं। वे शायद परचा शक्ति प्रदर्शित करने के लिए आये हैं। यदि आप चलो, तो दर्शन कर आते हैं। उनकी करामात देख आते हैं। साधुओं के पास जाने में सुख ही मिलेगा। वह चारण तो यह बात व्यंग्य भाव से कह गया था क्योंकि चारण के मन में द्वेष भाव था।
राजा ने चारण की बात स्वीकार करके संतों के लिए भेंट सजा कर तैयार की। स्वर्ण थाल में फूल, मिठाई, घृत आदि लेकर राजा सुसज्जित होकर अपने मंत्रियों के साथ चला। राजा सूरसिंह संतों के पास नम्रता से आया था। वील्होजी संत मंडली सहित विराजमान थे। राजा ने परिक्रमा कर के थाल वील्होजी के आगे रखा। वील्होजी ने राजा का स्वागत किया। कुशल क्षेम समाचार पूछे। परस्पर कुशल क्षेम पूछने के पश्चात् राजा ने कहा-
हम तो आपकी कृपा से ठीक ही हैं। जब आप जैसे संत महापुरुषों के चरण हमारे राज्य में पड. जायें तो अकुशलता कैसे ठहरेगी? हमारे तो परदादा, दादा, पिताजी आदि सभी सदा ही संतों के सेवक रहे हैं। आप की कृपा से ही हमारा कल्याण होता आया है। संसार की संपत्ति, राज आपकी कृपा से ही मिलता है। आप ही हमारे सर्वस्व हो। ऐसी प्रार्थना कर के राजा जब चुप हो गया तब उस चारण ने आगे बात चलाते हुए कहा क्या
सचमुच में ही आप जाम्भोजी के चेले हो? या आप कोई अंधे जाट हो? जाम्भोजी में तो बड़ी करामात थी। आप में भी तो कुछ होनी चाहिये। यहाँ राज दरबार में संत लोग आते हैं, तो कोई न कोई अद्भुत चमत्कार दिखाते हैं। यदि नहीं दिखाते तो बाँसों की मार खा कर चले जाते हैं। क्या आप लोग भी उन्हीं की तरह बाँसों की मार खाकर जाओगे या कुछ करामात दिखाओगे? चारण द्वारा कही गयी इस प्रकार की बात वील्होजी ने सुनी और श्री विष्णु जाम्भोजी का स्मरण किया। वील्होजी का शरीर रोमांचित हो गया- रोंगटे खड़े हो गये। इतना उत्साह एवं रोमांचित हुआ, स्वतः ही मुख से वाणी का प्रसार होने लगा।
वील्होजी ने कहा- मैं कौन हूँ, यह बताता हूँ। ऐसा कहते हुए सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर जाम्भोजी तक की वंशावली बताना प्रारम्भ किया। इसी रूप में अपना परिचय दिया। वील्होजी ने अपना पूर्ण परिचय देकर फिर कहा- हे राजन! अब भी तुम्हें विश्वास नहीं हुआ है और भी जानना पहचानना चाहता है, तो पूछ लें। इस समय तो मेरे साथ जाम्भोजी की शक्ति विद्यमान है। राजा ने वील्होजी की बात सुनी और सत्य ही मानी तथा कहने लगा-
आज वैशाख महीने की अक्षय तृतीया का पवित्र दिन है। इस समय गर्मी का मौसम है। यहाँ बागड़ देश में वर्षा ऋतु में होने वाले मतीरा, काकड़िया और बाजरी का सिट्टा अपनी सिद्धि से बना कर जीमाओ। तो हम जानंह्यगे कि आपने जो बात कही थी, वह सत्य थी। अन्यथा केवल वंश परंपरा का बखान करने से सिद्ध तो नहीं हो जाता। आप जाम्भोजी की करामात लेकर आये हैं, वह सत्य तभी मान्य होगा।
राजा की ऐसी भावना जान कर के वील्होजी ने जाम्भोजी का स्मरण करते हुए चादर ओढ कर शरीर को ढक लिया। और चादर के अंदर हाथ ले जाकर सर्व प्रथम दो सौ बाजरी के सिट्टे निकाल कर दिये।
राजा ने देखा कि सिट्टे तो बाजरी के ज्यों के त्यों हैं। खाने योग्य हैं। तब राजा ने कहा- अब आप दो काकड़ी दीजिये। बाजरी जीमने के पश्चात् काकड़ी जीमेंगे। तब मन प्रसन्न होगा। राजा के कहने की देरी थी कि दो बड़ी-बड़ी काकड़ी भी निकाल कर दे दी। उन बड़ी-बड़ी बिना मौसम की, बिना ही खेत की, उन अलौकिक बाजरी व काकड़ी को जीमकर के राजा अति प्रसन्न हुआ।
सूर सिंह कहने लगा- मैंने आज से ही आपको गुरु धारण कर लिया है। किन्तु अब तक आपने मारवाड़ का मेवा मतीरा (तरबूज) तो नहीं दिया। बिना मतीरे तो कुछ बात नहीं बनी। वील्होजी ने उसी समय ही बुकुल परदे से आठ-आठ सेर के तीन मतीरे निकाल कर दिये। ये मतीरे पुराने नहीं थे। वे तो मानो अभी अभी बेल से तोड़ कर लाये थे। उनके गूँढ नाल हरी थी। एक मतीरा फोड़ कर देखा तो लाल गुलाब की भाँति खिला हुआ था। वहाँ उपस्थित सभी लोगों ने सिट्टियाँ, काकड़ी और मतीरा जीम कर के देखा बड़ा ही आनंद आया।
राजा वील्होजी की स्तुति करते हुए कहने लगे- आप तो जाम्भोजी के सदृश ही सिद्धिवान हो। हम लोगों ने आपकी परीक्षा करने की कोशिश की है, आपका पार कैसे पाया जा सकता है? हम लोग तो अल्प अज्ञानी, मूढ लोग हैं। हम क्या जानें संत महापुरुषों की महिमा? वील्होजी की चरण वंदना स्वयं राजा करने लगे- सत्य ही है। ऐसे संत महापुरुषों की चरण वंदना करने से केवल्य ज्ञान की प्राप्ति होती है।
वील्होजी ने राजा सूरसिंह को धर्म, राजनीति, एवं मर्यादा का उपदेश देते हुए कहने लगे- हे राजन! सुगुरु एवं कुगुरु में बड़ा ही अन्तर है। इसलिये तुम्हें सावधान रहना चाहिये। कहींं कुगुरु, पाखण्डी कोई तुम्हारी श्रद्धा का अनुचित लाभ न उठाले। सुगुरु होगा, वह सुमार्ग बतायेगा। सुगुरु दया, शीलवान, सदा संतोषी,परोपकारी, संसार सागर से पार उतारने वाला होगा। इन सद्गुणों के द्वारा तुम्हें सतगुरु की पहचान कर लेनी चाहिये।
इसके विपरीत कुगुरु होगा वह झूठ,कपट,कुमार्गी,कुकर्मी,भ्रमित करने वाला,भांग ,पोस्त,मांसाहारी होगा। दया हीन,जीव हत्यारा,अकल विहीन आदि दुर्गुणों से युक्त होगा। वील्होजी ने कहा -हे राजन! इन कुगुरुओं से दूर ही रहना श्रेष्ठ है। यह परीक्षा कर के ही संगति करना। सुगुरु मिल जायेगा तो सुख की प्राप्ति होगी। कुगुरु मिलेगा तो दुख आयेगा। सुगुरु भ्रम मिटायेगा,तो कुगुरु भ्रमित करेगा। सुगुरु स्वर्ग दिखायेगा तो कुगुरु नरक ले जायेगा। सुगुरु पार उतार देगा तो कुगुरु डुबो देगा। वील्होजी ने कहा -हे राजन !सुगुरु और कुगुरु में अन्तर बहुत है। इस प्रकार से वील्होजी ने अनेक छन्दों द्वारा राजा सूर सिंह को ज्ञान दिया। वील्होजी ने राजा को ज्ञान एवं परचा दोनों ही दिया।
तब राजा कहने लगा -हे गुरुदेव! आपने मुझ पर कृपा करी। स्वतः ही हमारे यहाँ पर पधारे। मैं आपकी क्या सेवा करूँ? मुझे आप अपना दास मान कर आज्ञा प्रदान कीजिये। वील्होजी कहने लगे-मैं क्या मांगूं। मुझे अपने लिये कुछ भी नहीं चाहिये। मैं तो “आत्मा से ही आत्मा में सतुंष्ट हूँ” किन्तु जाम्भोजी द्वारा चलाया हुआ सत्पंथ कायम रहे, लोग सन्मार्ग पर चले,जीवन में युक्ति सीखे और मृत्यु पर मुक्ति को प्राप्त करें। यही श्री जाम्भोजी का सत्पंथ है।
इस समय कुछ लोग इस पंथ से विमुख हो रहे हैं। और बिश्नोइयों को अन्य विधर्मी लोग नाजायज तंग कर रहे हैं। उन्हें धर्म छोड़ने के लिये मजबूर कर रहे हैं। कम से कम आपके राज्य में धर्म पालन की तो स्वंतत्रता होनी चाहिये। कोई किसी को धर्म पालन करने से रोके नहीं। मैं तो यही चाहता हूँ। इसके लिये आप राज सहायता प्रदान करें।
मुझे अधिकार दीजिये कि मैं जिसे मार-पीट करूँ आपके पास आकर पुकार करे तो आप उसे सद्बुद्धि प्रदान करें। हमारे संतों की सुरक्षा हेतु कुछ सिपाही भी दीजिये। इनको लेकर मैं गाँव गाँव में भ्रमण करूँगा और बिगड़े हुए लोगों को सही मार्ग पर लाऊँगा। यही मेरे गुरु का आदेश है। यही आपकी भी मान्यता होनी चाहिये। राजा ने कहा -ऐसा ही होगा।
वील्होजी ये साधन लेकर वहाँ से चल पड़े। वहीं जोधपुर के गाँवों में भ्रमण करते हुए फि टकासणी, रसीदै, गुड़ै आदि गाँवो के बीच तम्बू खूँटा रोप दिया। जो कोई भी चाहे बिश्नोई पंथ के अन्दर से विरोधी था चाहे बाहर से कोई विरोधी था,उन्हें खूँटे से बाँधा और कोरड़े (कपड़े का बना हुआ दण्ड) से पिटाई की। एसा कुछ ही गाँवों में किया था कि आगे से आगे स्वतःही बात फैल पड़ी कि वील्होजी आ रहे हैं। सावधान हो जाओ। अपनी इच्छा से स्वयं ही धर्म का पालन करो। अन्यथा जबरदस्ती मार कूट के धर्म पर कायम करेंगे।
जब वील्होजी उन गाँवों में भ्रमण कर रहे थे तब किसी आदमी ने आकर वील्होजी से कहा -महाराज! आप तो हम लोगों पर ही जोर चलाते हैं, आप से थोड़ी दूर पर ही रुड़कली गाँव में जाम्भोजी विराजमान हैं, वह तो जाम्भोजी की तरह चहुंदिश मुख वाला है, स्वयं अपने को जाम्भोजी कहता है। वील्होजी ने कहा-यहाँ से कितना दूर होगा? दूर नहीं है। यहाँ से तो केवल पाँच कोश पर ही है।
वील्होजी वहाँ से रवाना हुए और कहने लगे-यह तो बहुत ही शुभ समाचार है। यदि जाम्भोजी स्वयं ही हैं, तो अवश्य ही दर्शन लाभ होगा। अन्यथा पाखण्डी का अन्त होगा। वील्होजी ने रुड़कली के तालाब पर उस व्यक्ति के पास ही जाकर डेरा डाल दिया। शाम को तो वील्होजी ने गाँव के लोगों के साथ जागरण किया और प्रातःकाल हवन करके फिर उसके पास गये। वह व्यक्ति सांणिया था। भूत-प्रेत सेवी था। लोग उसे स्याणा कहते थे। इसी नाम से वह प्रसिद्ध था। वैसे वह स्याणा तो नहीं था, किन्तु दुनिया भी तो स्याणी कहाँ है?
सांणिया ने देखा कि वील्होजी आ रहे हैं। स्याणियां भी उन्हें देखकर ध्यान मुद्रा में तन कर बैठ गया। वील्होजी ने सांणिये को प्रणाम किया। वह तो बहुत ही डर गया था। साणियां कहने लगा -आओ संतो बैठो। संत तो मेरे ही स्वरूप हैं। वील्होजी ने कहा-
आप अपना धर्म बताओ? यहाँ क्या कर रहे हो? किस प्रकार से अपना पंथ चला रहे हो?
वह साणियां कहने लगा -हे भाई! मेरी बात सुनो। मेरा धर्म मैं बतलाता हूँ। स्नान से पूर्व सवा सेर जल पीना,पश्चात् भोजन करें। भोजन से पूर्व स्नान करें तो करे, न करे तो भी चलता है। चहमैं चहमैं भजन भी बतलाता हूँ। मैं तो इसी प्रकार का धर्म बतलाता हूँ। यदि आपको अच्छा लगता है तो आप धारण करलो।
वील्होजी ने विचार किया कि यह तो सभी भूत -प्रेत के लक्षण है। यह कोई देवता नहीं है न ही यह जाम्भोजी हो सकते। यह तो जाम्भोजी से विपरीत चलता है। यदि जाम्भोजी का स्वरूप है तो मैं परिक्रमा कर के देखुंगा,जाम्भोजी का मुख तो चारो तरफ बराबर दिखता था। ऐसा विचार करके वील्होजी परिक्रमा करने लगे तो वह साणिया भी चारो तरफ घूमने लगा। अपना मुख वील्होजी के तरफ ही रख रहा था। पहले तो वील्होजी ने समझाया कि इस प्रकार से घूमना नहीं चाहिये। परन्तु वह नहीं माना तो वील्होजी ने पीठ पर अपना घुटना लगाया। गला पकड़ा। तब वह कहने लगा छोड़ दो छोड़ दो अब मैं यहाँ से चला जाऊँगा।
वह कहने लगा-मैंने सोचा था कि अब जाम्भोजी नहीं रहे मैं अपनी करतूत कर लूंगा
। किन्तु अब मुझे पता चला है कि जाम्भोजी तो वील्होजी के रूप में विद्यमान है। फिर मैं तो कभी ऐसी हरकते नहीं करूँगा। अब मैं यहाँ से चला जाऊंगा। जाम्भोजी की साथरी संभेलिया में जाकर कुछ परोपकार का कार्य करूँगा। जहाँ पर चितौड़ नरेश ने तालाब खुदवाया है वहाँ पर मुझे एक इमली के पेड़ के नीचे अपार धन गड़ा हुआ दिखता है।
उस धन का सदुपयोग करूँगा वहाँ पर ज्योति मन्दिर का निर्माण करवाऊंगा और तालाब के पैड़ी बन्धवाऊंगा। जाम्भोजी के पन्थ का प्रचार प्रसार करूँगा। इस प्रकार से वील्होजी के सामने वह भूत साधक साणियां प्रतिज्ञा करता हुआ रूड़कली से प्रस्थान कर गया। साणियां ने संभेलिया जाकर इमली के पेड़ के नीचे गढा हुआ धन निकाल लिया,एक पूर्ववीया महिला से बावन बीघा जमीन खरीदी और विशाल मन्दिर का निर्माण करवाया।
चौमुखा वह मन्दिर जाम्भोजी के जीवन की ““चहूँ दिश परसै””चारो तरफ मुख दिखाई देने की बात को प्रगट करता है विशाल जाम्भोलाव तालाब को खुदवाया, उसके पेड़ी बंधवायी। संभेलिया में धर्म प्रचार प्रसार का स्थान कायम किया। वही पर सांणिये ने घुड़साल बनवायी,चारो तरफ चार विशाल गोपुर द्वार बनवाये,अपने रहने के लिये भी विशाल भवनों का निर्माण करवाये। वही पर ही साणियां की समाधि लगी हुई है। उस पर भी समाधि मन्दिर का निर्माण हुआ है।
इतना समय व्यतीत हो जाने पर भी वह ज्योति मन्दिर जैसा का तैसा अपनी भव्यता का परिचय दे रहा है। वर्षा के समय बांध का पानी भर जाता है किन्तु मन्दिर ज्यों का त्यो खड़ा हुआ काल को बाधित कर रहा है। उस मन्दिर को देखकर ऐसा लगता है कि उसकी नींव बहुत ही गहरी है। जितना वह ऊंचा है उतना ही वह नीचे धरती में गहरा होगा।
ऐसा दिव्य मन्दिर अन्यत्र दुर्लभ है। काल तो सभी को खा जाता है किन्तु वह मन्दिर तो काल का भी काल होता नजर आ रहा है। उसी मन्दिर के आस पास तीन गाँव बिश्नोइयो के है -पुर,दरीबा,और संभेलिया। ये गाँव व मन्दिर भीलवाड़ा शहर के अति निकट है।
सांणिया को रूड़कली से उठाने के पश्चात वील्होजी ने अन्य गाँवो में भी व्यापक भ्रमण किया था। जहाँ पर भी देखा कि किसी प्रकार से धर्म की हानि हो रही है वहीं पर अपना प्रयोग किया तथा इस कार्य में सफल हुए। बिश्नोई पन्थ में कुछ शिथिलता आ गयी थी वील्होजी ने पुनःउसमें जान डाल दी थी। वील्होजी जैसे संत ही पन्थ के थम्भ है। अन्य संत तो डाल के समान है। जाम्भोजी तो पन्थ के मूल है
जहाँ जहाँ पर जाम्भोजी ने भ्रमण किया था। पंथ की स्थापना की थी। वहीं वहीं पर वील्होजी भी पहुँचे थे। गंगा पार,पूर्वदेश,मालवा,मेवाड़,जोधपुर,बीकानेर आदि सभी जगहों पर घूम-घूम कर धर्म का प्रचार प्रसार किया। मेवाड़ में पुष्कर तीर्थराज में स्नान कर के पुनः जोधपुर के चौरासी गाँवो में आये। वहाँ से मेड़ता पोलास, हींगोली आदि गाँवो में भी वील्होजी के चरण चिह्नों से धरती धन्य हुई। बीकानेर राज्य में भ्रमण करते हुए रासीसर गाँव में खेजड़ी के नीचे आसन लगाया था,वह खेजड़ी वील्होजी की स्मृति ताजा कर रही है। वील्होजी ने सुगुरु कुगुरु का भेद बताया- सुगुरु ध्याया सुख होय,कुगुरु ध्याया दुख पावै। सुगुरु भेद कर्म छेद, कुगुरु संग पाप कमावै। सुगुरु संग स्वर्ग सुख, कुगुरु संग साथ विगौवै। सुगुरु उतारै पार, कुगुरु डूबै अरु डुबोवै। सुगुरु सेव लाभै स्वर्ग, कुगुरु दुख नरका तणौ। विल्ह कहै जो पारखो, सुगुरु कुगुरु अन्तर घणौ। अन्य किसी गाँव में वील्होजी पहुँचे थे तो उस गाँव की हालत भी ठीक नहीं देखी। तो कहने लगे - परहरिये सो गाँव,नाव विष्णु को न भणीजै। नही साध सूँ गुष्ट,ज्ञान श्रवणे न सुणीजै। घणो वाद अहंकार,घणी पर निंद्या कीजै। नहीं साच सूँ प्रीत,मुखअलियो बोलीजै। मेट्यौ सतगुरु को कह्यौ,बुध शैतानी पाकड़ी। वील्हा विलंब न कीजियै,जिण नगरी एका घड़ी। तब लोगों ने पूछा -महाराज! तब हम कैसे गाँव में निवास करें। तब वील्होजी ने कहा जिंहि नगरी धर्म दृढाय,सत्य सिंवरण नर सूरा। सझै सुचील सीनान,जुगत्य जणां पण पूरा। मेल्ही मन की भ्रान्त,भ्रम भोलावै भानै। जपै नाम श्री विष्णु को,आन की सेवा न मानै। ओलख्यो जम्भ साचो गुरु,धन जीतब ताह को जीयौ। वील्हा कई दिन जीव जै,तिह नगरी वासो लियो। वील्होजी ने लोगों को धर्म की महत्ता बताते हुए कहा - धर्म किया सुख होय,लाछ लछमी धन पावै। धर्म उत्तम कुल अवतरै,जलम दालद नहीं आवै। धर्म जीव जुग्य बलह,रूप ओपमा इधिकारी। धर्म ता मान महन्त,ज्ञान तेसुं प्रीति पियारी। संसार जुगत आगै मुक्त,लाभ घणौ छै देहूँ पर। वील्ह कहै आलस मत कर,जो गुरु कह्यौ सो धर्म कर। पाप का निषेध करते हुए इस प्रकार से कहा - पाप न कर मत्य हीण,हलत हारस। जल मंत्र पाप,मध्यम कुल अवतरस्य। मान घटी सी न खरी पर,पाप भूख दुःख भोग्यवस्य। सिर भार फि रसी,पर सार पुलंतो। पाप तणै पोसाय कर,सिर र्मायो भोजन लस्य। वील्ह कहै हारस्य जन्म,पाप न कर बोह दुख सहस्य। गाँवों में भ्रमण करते हुए वील्होजी ने अनुभव किया कि सभी बिश्नोई एक दुसरे से परिचित नहीं हैं। अपने सुख-दुःख की बात किससे कहें? ऐसा कोई उपाय करना चाहिये, जिससे सभी लोग एक जगह एकत्रित हो सकें। जहाँ पर ज्ञान की चर्चा हो और सामाजिक व्यवस्था दृढ हो सके। यह बिश्नोई पन्थ सुदृढता से आगे बढ सके।
इसके लिये वील्होजी ने वि. संवत सौलह सौ अड़तालीस में चैत्र अमावस्या का मेला जाम्भोलाव में स्थापित किया। आसोज की अमावस्या का मेला मुकाम में वील्होजी ने प्रारम्भ करवाया। फाल्गुन की अमावस्या का मेला तो आदि अनादि काल से ही चला आ रहा था। जहाँ जहाँ पर साथरियाँ बनी थी वहाँ वहाँ पर वहाँ के स्थानीय लोगों को प्रत्येक अमावस्या को एकत्रित कर के हवन करने का कार्यक्रम वील्होजी ने ही प्रारम्भ किया था।
यज्ञ करने का अर्थ भी यही है कि यज्ञ-देव, पूजा,संगति करण,और दान। यज्ञ कर के देवपूजा करे। परमात्मा से संगति स्थापित करे,और दान करे। स्वाहा कह कर के आहुति देना दान है और समाज को एकत्रित करना संगति करण है। तथा इस शुभ कार्य द्वारा परमात्मा की प्राप्ति करना भी यज्ञ से संभव है। स्वाहा द्वारा आहुति दी जाती। इस दान में यही भावना होती है कि “इदं न मम”यह मेरा नहीं है। आपका ही है हे प्रभु! आपको ही समर्पित है।
इस त्याग भाव से यज्ञ जीवन जीना सिखाता है। यदि सभी लोग त्याग भाव से यज्ञ कर के पश्चात उपभोग करें तो किसी प्रकार का उपद्रव होने की संभावना नहीं रहती। वील्होजी ने मेले पर उपस्थित जन समूह को नियमों पर अटल रहने का आदेश दिया। सामाजिक व्यवस्था ठीक ढंग से चलती रहे, इसके लिये जगह जगह साथरियों को केन्द्र बिन्दु बना कर पंचायतों की स्थापना की।
यदि कोई अनजान में धर्म को तोड़ता है तो उसे प्रायश्चित करवा कर के पाहल देकर पुनःशुद्ध किया जावे। यदि कोई जान कर धर्म विमुख होकर शैतानी करता है, तो उसे दण्ड देकर वापिस पंथ में सम्मिलित किया जावे। और यदि दण्ड देना भी स्वीकार न करे तो, उसे समाज से बहिष्कृत किया जावे। इस प्रकार के नियम वील्होजी ने बना कर लागू करवाये। बिना समाज के अकेला व्यक्ति जी नहीं सकता। उसे कहीं न कहीं तो सहारा लेना ही पड़ेगा। धर्म की रक्षा करने हेतु सामाजिक बहिष्कार भी एक उपाय है
प्रारम्भ में तो धर्म जबरदस्ती ही चलाना होता है। किन्तु धीरे-धीरे धर्म पर चलने में अभ्यस्त हो जाता है, तो धर्म आनन्द दायक हो जाता है। प्रारम्भिक सुख का परिणाम अन्त में दुःखमय हो जाता है। वह सुख राजसी होता है और जो प्रारम्भिक सुख दुःख मय मालूम पड़ता है, उसका परिणाम आनन्दमय होता है। वह सुख सात्त्विक होता है। और न तो प्रारम्भ में सुखमय है और न अन्त में वह सुख तामसी होता है। इसलिये धर्म के मार्ग पर चलने में प्रारम्भ में कठिनाइयाँ तो आती ही हैं। वील्होजी इन बातों से लोगों को अवगत करवाते और धर्म मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।
वील्होजी ने अपने जीव काल में विशाल साहित्य की रचना की है। हालांकि वील्होजी से पूर्व भी कवि लोगों ने साखियाँ, छन्द, हरिजस, कथाओं के द्वारा जाम्भोजी के जीवन चरित्र को दर्शाया है। वील्होजी ने अपने से पूर्व संत महापुरुषों की विधि को तो ज्यों की त्यों अपनायी है। वील्होजी ने साखी, छन्द, हरजस आदि की रचना की तथा विशेष रूप से कथा साहित्य की रचना वील्होजी ने ही प्रारम्भ की थी।
वील्होजी ने-कथा धड़ाबंध,कथा औतारपात,कथा गूगलिये की,कथा पूल्होजी की,कथा दूणपुर की,कथा जैसलमेर की,कथा झोरड़े की इत्यादि रचना की थी। इन्हीं कथाओं के आधार पर जाम्भोजी की पावन लीला एवं इतिहास टिका हुआ है। ये सभी कथाएँ परमानन्दजी के पोथे में हस्तलिखित उपलब्ध हैं।
वील्होजी स्वंय तो सर्वश्रेष्ठ कवि,धर्मप्रचारक,एवं सिद्धसंत महापुरुष थे ही। वे इस समाज की उन्नति एवं अभिवृद्धि के लिए सतत प्रयत्नशील रहे। इसके साथ ही उन्होंने अपने दो शिष्य भी समाज को दिये केशोजी गोदारा एवं सुरजनजी पूनिया। अपने गुरु के सदृश ये दोनों ही साहित्यकार एवं धर्म प्रचारक सिद्ध महापुरुष हुए इन्होंने अपने गुरु के कदमों पर चल कर इस समाज की बहुत ही सेवा की है।
इस समय वर्तमान में चलने वाली संत परंपरा भी वील्होजी से प्रारंभ हुई है। इस समय भी संतों की दो परंपराएँ चलती हैं। एक तो वील्होजी की परंपरा दूसरी वील्होजी के गुरु भाई खिदरोजी की परंपरा। वील्होजी के दोनों शिष्यों की चर्चा आगे की जायेगी। प्रसिद्ध साखी “करमणी चलणो इणि संसारि” की रचना वील्होजी ने की थी। इस साखी का विषय है करमा और गौरा दो महिलाएँ जिन्होंने रामासड़ी गाँव में वृक्षों की रक्षा हेतु बलिदान दे दिया था। उस घटना के वील्होजी प्रत्यक्ष द्रष्टा थे। इसका वर्णन आगे किया जायेगा।
वील्होजी ने मुकाम मन्दिर से नवीन जीवन प्रारंभ किया था। सर्व प्रथम मुकाम के गुरु मन्दिर में आकर वील्होजी ने अपने जीवन के उद्धार की प्रार्थना इस प्रकार से की थी।
गुरु तार बाबा, तू पालक सरब दुःख भंजन, हम अपराधी तेरा।। 1।।
गुरु तार बाबा, जीवड़ो लोभी अरु लब्धी ,इण खूनी खून किया बहुतेरा।। 2।।
गुरु तार बाबा, मरमर गयो जन्म फिर आयो, इण मन न छाड़ी मेरा।। 3।।
गुरु तार बाबा, आवागवण सह्या दुःख संकट,फिरियो अनंत ही फेरा।। 4।।
गुरु तार बाबा, स्वदेज अंडज जेरज उद्भिज, भुगती खैंण अनेरा।। 5।।
गुरु तार बाबा, लख चौरासी चौचक भीतर, भरम्यो वहोली वेरा।। 6।।
गुरु तार बाबा, बहु दुःख सहया शरण बिन गुरु की, कर कर कर्म कुफेरा 7।
गुरु तार बाबा, बैर किया बैरी उठि लागा, मैं शरणै ताक्यो तेरा।। 8।।
गुरु तार बाबा, मन परच्यो पूरो गुरु पायो, न भजूं आन अनेरा।। 9।।
गुरु तार बाबा, अरज करूं जंभेश्वर आगे, मोहि संमल्हो अब की वेरा।। 10।।
गुरु तार बाबा, वील्ह कह वीनती गुरु आगे, द्यो पार गिराय बसेरा।। 11।।
जगत के बाबा जी से वील्होजी ने प्रार्थना की थी। स्वयं ही परमात्मा के समर्पण हो गये थे। अहंकार को बाहर निकाल दिया एवं परमात्मा को हृदय मन्दिर में बैठने को जगह प्रदान कर दी थी। लगभग चौरासी वर्षो तक संसार में जीवन यापन कर के अपने जीवन को सफल बनाया। वील्होजी ने अपना कार्य पूर्ण क रने के लिए अपने शिष्य सुरजन जी को उत्तराधिकारी बनाया और अपनी अन्तिम इच्छा स्वभाव प्रकट करते हुए राग धनाश्री में उमाहो गाया था।
अंतिम उमंग,हृदय की परम पवित्र, प्रेम-भावना उमाहो में साकार मूर्तिमान होकर अजर अमर हो गयी। वील्होजी की सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में उमाहो मान्य है। उमाहो में किसी कवि का कवित्व नहीं है। यह तो उनके जीवन का सार है। अन्त समय में उमाहो के रूप में प्रवाहित हुआ है। हमारा जीवन भी उमाहो की तरह बन जाये, तो हम भी कृत कृत्य हो जायें। जिस प्रकार अपना नया जीवन”गुरु तारि बाबा से प्रारम्भ किया था, वही मुकाम से ही अन्तिम विदाई लेते हुए उमाहो का उच्चारण किया था। प्रेम रस से हृदय आनन्दित होकर उमाहो के रूप में शब्द रस प्रगट हुआ। आओ हम भी रसास्वादन करें।
बाबो जंबू द्वीपे परगटियो, चोचक हुयो उजास।
आप दीठो केवल कथे, जिंहि गुरु की हम आस।। बलि जाऊं जांभेजी रे नाम नै, साधां मोमणां रो प्राण आधार। थे जांरे हिरदे वसो, तेरा जन पहुंता पार।। टेर।। संभरथल रली आवणा, जित देव तणो दीवाण। परगटियो पगड़ो हुयो, निस अंधियारी भांण।। 1।। एकलवाई थल खड़्यो, करत सभी मुख जाप। शिम्भू को सिंवरण करै, जोई जपे सोई आप।। 2।। भूख नहीं तिसना नहीं, गुरु मेल्ही नींद निवार। काम किरोध व्यापै नहीं, जिहिं गुरु की बलिहार।। 3।। भगवीं टोपी पहरंतो, गहि कथा दस नाम। झीणी बांणी बोलंतो, गुरु बरज्यो वाद विराम।। 4।। सिकंदर परमोधियो, परच्यो महमंद खान। राव राणा निंव चालिया, सांभल केवल ज्ञान।। 5।। मधम तां उत्तम किया, खरी घड़ी टकसाल। कहर क्रोध चुकाय के, गुरु तोड़यो माया जाल।। 6।। सीप वसै मंझ सायरा, ओपत सायर साथ। रैणायर राचे नहीं, चाहै बूंद स्वात।। 7।। जल सारे विण माछला, जल बिन मच्छ मर जाय। देव थे तो सारो हम बिना, तुम बिन हम मर जाय।। 8।। बोह जल बैड़ी डूबंता, बूझे नहीं गिंवार। केवल जंभ बाहरो, म्हांनै कौण उतारे पार।। 9।। हंसा रो मान सरोवरां, कोयल अंबा राय। मधु कर कमल रै करै, तेरा साध विसनु के नांव।। 10।। जल बिन तिसनां ना मिटै, अन्न बिन तिरपत न थाय। केवल जंभ बाहरो, कोण कहे समझाय।। 11।। पपहियो पीव पीव करे, बोली सहै पियास। भूयं पड़ियो भावै नहीं, बूंद अधर की आस।। 12।। ठग पोहमी पाहण घणां, मेल्ही दूनी भुलाय। पाखंड कर पर मन हड़ै, तहां मेरो मन न पतियाय।। 13।। गुरु काच कथीर न राचही, गुरु विणज्या मोती हीर। मेरो मन लागो श्याम सूं ,गुदड़ियो गुणा को गहीर।। 14।। निर्धनियां धन वाल्हो, किरपण वाल्हो दाम। विखियां ने वाहली कामणी, तेरा साधु विसन के नाम।।15।। धन्य परेवा बापड़ा, थारो वासो थान मुकाम। चूण चुगे गुटका करे, सदा चितारे श्याम।। 16।। अंबाराय बधावणां, आनंद ठामो ठांय। श्याम उमाहो मांडियो, पोह कियो पार गिराय।। 17।। बोल्यो गुरु उमाहड़ो, करमन मोटी आस। आवागवण चुकाय के, म्हाने द्यो अमरापुर वास।। 18।। अवसर मिलिया मोमणां, भल मेलो कब होय। दुःखी बिहावे तुम बिना, हर बिन धीर न होय।। 19।। काही के मन को धणी, कांही के गुरु पीर। वील्ह भणो विसनोइयां, आपां नाम विसन के सीर।। 20।। उमाहो -राग धनाश्री अन्तिम बार भाव निवेदन करके वील्होजी ने अपनी ज्ञान प्राप्ति स्थल, मुकाम समाधि स्थल को प्रणाम किया और मुकाम से प्रस्थान कर के रामड़ावास पहुँचे। पूर्व में जाम्भोजी ने रामड़ावास की धरती पर चरण रखे थे। वहीं पर वील्होजी ने अपना पंचभौतिक शरीर त्यागने के लिये उपयुक्त समझा था। वील्होजी ने अपने दो परम शिष्य केशोजी एवं सुरजन जी को पास में बुला कर उन्हें अन्तिम उपदेश देकर कृतार्थ किया। सुरजन जी को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। जहाँ सतगुरु देव बैकुण्ठ धाम में विराजमान थे वहीं उन्हीं के पास ही जीवात्मा प्रेमाधिकता के कारण पहुँच गयी। जिस समय वील्होजी ने शरीर त्यागा था,उस समय का वर्णन गोविन्दरामजी ने इस प्रकार किया है - मनोहर छन्द - वील्हजु महाराज तब धामहि,सिधारे जब।
संमत सोलासे अरू,तेहतरो बखाणिये।
सूरज उतर दिस,काल सोई जानों रूत।
रितु ही बसंत,मधुमास जु प्रमाणिये।
विष्णु वरत सुदि,सोउ एकादशी तिथि।
मानो वार में सु आदिवार,दितवार मानिये।
उतरा नखत मानो,धु्रव कर जोग जानो।
तुल सुं लगन काल,अमृत जु जानियै। कालान्तर में वील्होजी की समाधि अमर करने हेतु साहबरामजी ने मन्दिर का निर्माण करवाया। स्वयं साहबराम जी ने कहा -
साध जो साहबराम,सुन्दर बनायो धाम।
आठूजाम विष्णु नाम,मन्दिर में गाइये।
मन्दिर की सुन्दरता,नित ही छिव रूप।
इंडो ही अनूप रूप,समाद को ध्याइये।
समंत उन्नीस सो जूं,इज्ञारे की साल मन्दिर।
कंवार सुदि पुन्यु वार,सुक्र हुं सुनाइयै।
साहब राम जु की भेंट, यही,मानो मेरे प्रभु।
टेलही सै नित चित,चरणां मैं लाइयै।