तीसरा अध्याय · कथा 33
वैरागी महंत की स्थूलता सम्बन्ध में शब्द
नाथोजी उवाचः-हे शिष्य! एक समय सम्भराथल पर श्री परमेश्वरजी विराजमान थे। जहाँ हरी-भरी कंकेहड़ी के वृक्षों की छाया में प्राकृत सौन्दर्य को अपलक नेत्रों से निहार रहे थे। पास में बैठे हुए साथरी जन जो सदा ही साथ में रहते थे। उन्होंने वैरागी-वैष्णव संतों की जमात को सम्भराथल के पास से ही होकर जाते हुए देखा। कुछ पूछने की इच्छा से श्रीदेवजी से प्रार्थना करने लगे-
हे देव! हम लोग देख रहे हैं। किन्तु आप उन्हें नहीं देख रहे। आप नीचे की ओर देखिये-वैष्णव साधुओं की जमात जा रही है। इस जमात का महंत अतिपुष्ट स्थूल शरीर धारी है। महंत देखने में कितना अच्छा लगता है। वास्तव में यह तो महंत बनने योग्य ही था। हे देव! हम आपको देखते हैं, तो आप हमारे सभी के महंत होते हुए भी पुष्ट क्यों नहीं हैं? इतने दुबले-पतले हो। यह हमें तो अच्छा नहीं लगता। श्री देवजी ने शब्द सुनाते हुए कहा-
अधिक भोजन करने में कुछ भी गुण नहीं है। इससे शरीर स्थूल हो जायेगा। आगे-पीछे मांस का भार झूलेगा। व्यर्थ ही शरीर का भार उठाना है। आप लोग शरीर को मत देखो। अंदर बैठी हुई आत्मा का साक्षात्कार करो। शरीर छोटा-बड़ा,दुबला-पतला होने से आत्मा कोई छोटी-बड़ी नहीं हो जाती। तुम आत्मस्वरूप हो। न कि शरीर रूप हो। अपनी औकात को पहचानो।
कोई ज्यादा आयु ले लेने से बड़ा नहीं हो जाता। ज्यादा बड़ा हो जाने से संसार के दुःखों से छूटकर पार नहीं चला जायेगा। कोई उत्तम कुल में जन्म लेने मात्र से उत्तम नहीं हो जाता है। उत्तम (महान) तो व्यक्ति कर्मों से बनता है।
यदि कोई गोरख यति का दर्शन करले तो गोरख यति नहीं बन सकता। गोरख ने जिस मार्ग का अनुसरण करके सिद्धि की प्राप्ति की है, वही मार्ग अपनाएँ। हे लोगो! इस समय कलयुग चल रहा है। अनेक प्रकार के कलाबाज आयेंगे। भ्रान्ति फैलायेंगे। सदा ही सचेत रहें। किसी के बहकावे में नहीं आवे। मैंने तुम्हें सतपंथ बताया है। तुम्हारी भ्रान्ति मिटा दी है। जो भी मैं कहता हूँ यह सभी वेदग्रन्थों के उम्मार है। इस प्रकार से शब्द सुनाया-
शब्द-26 ओ३म् घणतण जीम्या को गुण नाही, मल भरिया भण्डारूं।
आगे पीछे माटी झूलै, भूला बहैज भारूं।
घणा दिना का बड़ा न कहिबा, बड़ा न लंघिबा पारूं।
उत्तम कुली का उत्तम न होयबा,कारण किरिया सारूं।
गोरख दीठां सिद्ध न होयबा, पोह उतरबा पारूं
कलजुग बरते चेतो लोई, चेतो चेतण हारूं।
सतगुरु मिलियो सतपंथ बतायो, भ्रान्त चुकाई, बिद गाराते उदगा गारूं।