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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह60 / 94

नवां अध्याय · कथा 60

साहू को स्नान का महत्व बतलाना

बिजनौर को चौधरी नांव साहू,गंगा पार सु आयौ,छःताकड़ी सोनो चाड़यौ। जाम्भोजी! कीया भजन हुव नहीं,सोनो साटै मुकति द्यौ। जाम्भोजी कह-छः ताकड़ी तेरो,छःताकड़ी म्हे देस्या,आंखे में काचौ रतन थ,आ रतन काया की सहनाणी थ,तेरी काया रतन थ। दूजौ मोल साटली आव,साहु कह,जम्बू दीप कीमता साह दीन ताउ मोल साट मील नहीं,तो रतन काया क्यौंकरि मिल्यसी,जाम्भोजी श्री वायक कहै -

शब्द-104 ओ३म् कंचन दानो कछु न मानूं, कापड़ दानूं कछु न मानूं।

चोपड़ दानूं कछु न मानूं, पाट पटंबर दानूं कछु न मानूं।

पंच लाख तुरंगम दानु, कछु न मानू, हस्ती दानू कछु न मानूं।

तिरिया दानू कछु न मानूं, मानूं एक सुचील सिनानूं।

गंगा पार पूर्व से बिजनौर निवासी एक चौधरी जाम्भोजी के पास सम्भराथल पर अपनी जमात सहित आया। उसका नाम साहू था। तथा कर्म भी साहू का था। स्वर्ण व्यापार करता था। उसने छःताकड़ी यानि छः धड़ी (तीस सेर) सोना जाम्भोजी के भेंट किया और हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगा-हे देवजी! मेरे से भजन भाव साधना तो होती नही है और न ही स्नान संध्यादिक क्रियाएँ ही हो पाती हैं। मैं स्वर्ण का कार्य करने वाला हूँ। इस कार्य में शील धर्म भी मेरे से पालन होता नहीं है।

यह सोना आप लीजिये और मुझे मुक्ति की प्राप्ति करवा दीजिये। मेरे सभी अवगुण माफ कीजिये और यह सोना लीजिये।

जाम्भोजी ने कहा -हे साहू ! यह तीस सेर तो तेरा और इतना ही मैं तुझे दूँगा। इसके बदले में तू एक यह रतन काया तुम्हारे जैसी और भी खरीद के ले आ,क्योंकि इस रतन काया में भगवान् ने आँखें दी हैं। आँखों के अन्दर भी देखने वाला छोटा सा रतन यह भी तू इस सोने के बराबर मोल देकर खरीद कर ले आ सकता है क्या? साहू कहने लगा -हे देवजी! यह सोना तो बहुत ही थोड़ा है। सम्पूर्ण जम्बूदीप को बेच कर भी उस धन से रतन काया तो खरीदी नहीं जा सकती। आप बताइये की यह रतन काया कैसे मिलेगी?

जाम्भोजी ने शब्द सुनाया-रतन काया की प्राप्ति का उपाय बतलाया-शब्द में बतलाते हुए कहा-हे साहू! तुम्हारा ये कंचन दान, इसका मेरे यहाँ कोई महत्व नहीं है। तथा कपड़े का दान भी यदि तू करे तो कुछ भी महत्व नहीं देता। घी तेल आदि का दान भी यदि तू समझे कि महत्व का होगा, वह भी कुछ भी नहीं है।

सवारी हेतु हे साहू! तू हाथी का दान करे तो भी मै इस दान को कुछ भी नहीं मानता। पाट पटम्बर बहुमूल्य वस्त्रों का दान भी मेरे सामने नगण्य है। यहाँ तक कि पाँच लाख उच्च कोटि के घोड़ों का दान करले तो भी उसको महत्वपूर्ण नहीं समझता। कन्या दान सर्वश्रेष्ठ दान है। वह दोनों कुलों को तारने वाली है। उसकह्य विवाह तथा दहेज आदि में दे देना उसको भी मैं कुछ भी नहीं मानता।

हे साहू! मैं तो सुचील, सचैल (वù सहित) अंग के पाँचों वùों की धुलाई सहित कि या गया स्नान सुचील सिनानूँ कहलाता है। स्नान को ही मानता हूँ। जिसकी तुम क्षमायाचना कर रहे हो वही तो तुम्हें युक्ति मुक्ति दिलाने वाली क्रिया धर्म है। इस प्रकार से बिजनौर के साहू के द्वारा दान दिया हुआ सोना भी श्रीदेवजी ने अस्वीकार कर दिया तथा शील धर्म एवं स्नान संध्यादिक क्रियाओं को महत्वपूर्ण बतलाया।