रचना 14
श्री संत वील्होजी कृत बत्तीस आखड़ी
सेरा उठै सुजीव छाण जल लीजियै। दातण कर करै सिनान जीवाणि जल कीजियै। वैस इकांयत ध्यान नाम हरि पीजियै। रवि उगै तेही वार चरण सिर दीजियै।। गऊ घृत लेवे छाण होम नित ही करो। पंखै से अग्न जगाय फूंक देता डरो।। सूतक पातक टाल छाण जल पीजियै। कर आत्म को ध्यान आरती कीजियै।। मुख बोलो जै साच झूठ नहीं भाखियै। नेम झूठ सूं जाय जीभ बस राखियै।। निज प्रसुवा गाय चूंगती देखियै। मुखां बताइये नाहीं और दिस पेखियै।। अमावस व्रत राख खाट नहीं सोइयै। चोरी जारी त्याग कुदृष्ट नहीं जोइयै।। नेम धर्म गुरू कहै कदे नहीं छोड़ियै। लाधी वस्तु पराई बोल देवोड़ियै।। जीव दया नित राख पाप नहीं कीजियै। जांडी हिरण संहार देख सिर दीजियै।। बधिया करै तो बैल जु देख छोड़ाइयै। बरजत मारै जीव तहां मर जाइयै।। ऋतुवन्ती ह्वै नार पलो नहीं छुइयै। पांचू कपड़ा धोय न्हाय सुधि होइयै।। सूतक पातक अन्त घरहुं लिपवाइयै। गऊ घृत सुध छाण जु होम कराइयै।। जल छाणै दोय वारहि सांझ सवेरे ही। जीवाणी जल जोड़ कुवै जाय गेरहीं।। राख दया घट माही वृक्ष घावै नहीं। घर आवै नर कोय भूखा जावै नहीं।। अमावस दिन धर्म इता नित पालियै। गायर बच्छो बैल बेचन सूं टालियै।। पंथ न चालै भूल खाट न सोइयै। ऊखल खड़वै नाहीं चाकी नहीं झोइयै।। वस्त्र धोवै नाहिं सीस नहीं धोइयै। जूवां लीखां नाव लिया पुन खोइयै।। ओलै अमावस दूध दधी नहीं मथ्थियै। साखी हरीजस गाय ज्ञान गुण कथ्थियै।। दांती कसी गंडासी बांण नहीं वाइयै। धोबी चकरी ढेढ घरे नहीं जाइयै।। चमारां घर जाय भूल करि बैठ है। नरक पड़ै निरधार रकत मैं पैठ है।। आन जात को पाणी भूल नहीं पीजियै। बिन मांज्या बरतन कबहुं नहीं लीजियै।। चौके बिना रसोई कबहुं मत करो। गऊ बैठक शत ग्रह करत तुम जन डरो।। ब्राह्मण दश प्रकार तीन सुध जानियै। अमल तमाखू भांग लील नहीं ठानियै।। इह औगण नहीं होय विप्र सुध है सही। और छत्तीसूं पूंण एक सम गुरू कही।। वे अस्नाने कोय जो पलो लगावहीं। न्हायै ते सुध होय गुरू फरमावहीं।। अपने घर में बैठ निंद्या नहीं कीजिये। देख्या सुण्यां अदेख जु अजर जरीजिये।। त्रिधां देवा साधां सूं संग कीजिये। गुरू ईश्वर की आण नहीं भानीजिये।। हल अरू गाठो गाडि बैल नहीं वाहिये। जीव मरे जेहि काम कदे न कराइये।। अमावस को दूध जू भूलन भलोंय है। कदेन उतरै पार रक्तसम होय है।। होके पाणी आग कदे नहीं दीजिये। अमल तमाखू नाम भूल नहीं लीजिये।। जूवां लीखां काढ छाह मैं डारिये। इन मार्या सुख होय पुत्र क्युं नी मारिये।। घर को बकरो भेड़ थाट संग कीजिये। बेच्यो कूट्यो बेल उलट नहीं लीजिये।। तीसां ऊपर दोय आखड़ी गुरू कही। जो विश्नोई होय धर्म पालैं सही।। गहै धर्म बत्तीस तीर्थ सब न्हाइया। अड़सठ तीरथ पुण्य घरां चल आविया।। गह गुनतीस बतीस विष्णु जन जानिये। इकसट सातूं छोत अड़सठ एहि मानिये।। देखा देखी तीर्थ और नहिं कीजिये। मन सुरती कूं जीत परमपद लीजिये।। पाले गुरु का कवल जम्भ गुरु ध्यावे है। घाटो भूख कुरूप कदे नहीं आवे है।। यहि विधि धर्म सुनाय कह्यो गुरू जगत नै। अज्ञानी कूं डांस प्रिये ज्ञानी भक्त नै।। या विधि धर्म सुनायके, किये कवल किरतार। अनधन लक्ष्मी रूप गुन, मूवां मोक्ष द्वार।।