मुख्य सामग्री पर जाएँ
गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह177 / 157
जुमलै की साखी

जमै की दूसरी साखी

जीव के काजै जुमलै जाइये, कीजै गुरु फुरमाइये।

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

दोहा

देवजी तेरे नावनै, साधु बलिहारी जाव।

हूं बलिहारी जां मोमिणां, जपै तेरो नांव॥

सतगुरु बिणजारो हुवो, गुणा छली रतनांह।

सत सुकरत किरिया धरम, लइयो पारख वांह॥

जीव के काजै जुमलै जाइये, कीजै गुरु फुरमाइये।

सुणिये ज्ञान कटै तन कषमल, ज्ञान सरोवर न्हाइये।

श्रीपति सिंवरो सदा सुख दाता, जाय लीजै शरणाइये।

ऊधो भक्त हुओ अपरंपर, जो जपतो महमाइये।

रावण सांसे ओल्हे आण्या, गोविन्द सा गुरु भाइये।

लोहापांगल सुण कर सीधा, सतगुरु हुवा सहाइये।

सिकन्दर यों कीवी करणी, दुनियां फिरी दुहाइये।

महमंदखां नागोरी परच्यो, चाल्यो गुरु फरमाइये।

सेखसदू परचे पर आण्यां, मरती गऊ छुड़ाइये।

सिध साधु पगम्बर सीधा, गिणियो ज्ञान न जाइये।

रहो एकांयत अन्तर खोजो, भरम चुकाओ भाइये।

सुमति आवै साधां संग बैठै, कुमति न आवै काइये।

गहकर ज्ञान सुणो संग साधो, केशो साख सुणाइये।