साखी छन्दां की-104
झड़कर बूठो भाव करै, भगतां के तांई । भाग परापति भेंट हुई, थल बैठो सांई
कवि: सुरजनदास जी पूनियां
कवि परिचय — सुरजनदास जी पूनियां
सुरजनदास जी पुनिया का जन्म वि॰ सं॰ 1640 है तथा परलोक गमन संवत् 1748 में हुआ था। ये भींयासर गांव के पुनियां गोत्र से थे। बाल्यावस्था में ही वील्होजी के शिष्य बन गये थे। वील्होजी के शिष्य केशोजी एवं सुरजनजी ये दोनों प्रतिष्ठ कवि थे। ये दोनों ही अपने गुरु के समान महान कवि और समाज सुधारक थे। सुरजनजी को वील्होजी ने रामड़ास का महंत बनाया था। वहां पर गांव से बाहर एक तालाब पर झूंपड़ी बनाकर रहते थे। काव्य कविता की साधना और योग साधना में लीन रहते थे। पौराणिक कथाओं के महान पण्डित तथा कवि थे। जाम्भोलाव महात्म्य सुरजन जी ने ही उजागर किया था। अपने जीवन काल में सुरजन जी ने अनेक रचनाऐं की थी जिनमें आख्यान कथाऐं, हरजस, कवित, फुटकर छन्द, राम रासौ तथा साखियां प्रसिद्ध है। अन्य जाम्भाणी कवियों की अपेक्षा सुरजनजी की भाषा अधिक कलिष्ट है तथा काव्य कला से युक्त भी है यहां पर सुरजनजी द्वारा रचित नौ साखियों का भावार्थ किया जा रहा है। जम्भसार में सुरजनजी की कथा विस्तार से साहबराम जी ने लिखी है।
झड़कर बूठो भाव करै, भगतां के तांई । भाग परापति भेंट हुई, थल बैठो सांई । सधर गुरु संसार आयो, जोत जागी निज थले । शैतान भूत प्रेत पर हरि, ज्ञान सांवल संभले । सबद बूंद स्वाति बूठो, जंभ बूठो झड़ करे ।१।
भक्तों के प्रति प्रेम भाव की वर्षा हो रही है। सम्भराथल पर बैठे हुए सांई से साक्षात् भेंट हो रही है। हमारा यह सौभाग्य ही कहा जायेगा। धर्म तथा धैर्य को लेकर सतगुरु संसार में आये है। निज थल पर ज्योति प्रज्वलित हो रही है। शैतान भूत प्रेतों को हटाकर कैवल्य ज्ञान ही सुनकर धारण कर रहे है। स्वाति नक्षत्र की बूंद की तरह शब्दों की वर्षा कर रहे है। जिन से तीन गुण प्रगट हो रहे है, कदली, शीप, भुजंग में स्वाति नक्षत्र की बूंद गिरने से केले में कपूर बन जाती है। शीप में मोती बन जाता है और सर्प में मणी बन जाता है। जल एक ही है परन्तु गुण तीन होते है। उसी प्रकार से शब्द भी अधिकारी अनुसार ही परिवर्तन कर देता है। आज तो अमृत की धारा बह रही है। स्वयं जाम्भोजी प्रसन्न होकर वर्षा कर रहे है ।१।
जुग चोथे फेर करे, जुग जीव जगाया । नव खंड गुरु की खबर हुई, सम्भराथल आया । सम्भराथल प्रकाश कियो, विसन नाम चितारियो । द्वीप जम्बू भरत खण्डे, प्रगट खेल पसारियो । स्नान दान ध्यान केवल, भाग पायो भाइयों । जुग चौथे मेर कीवी, धर जीव जगाइयो ।२।
चौथे युग में लौटकर फिर विष्णु ही आये है तथा सोये हुए जीवों को जगाया है। नव खंडों में गुरु की खबर पहुंच चुकी है। सभी को मालूम हो चुका है कि सम्भराथल पर विष्णु का आगमन हो चुका है। सम्भराथल पर विराजमान होकर विष्णु का जप बताया है। भरत खंड जम्बू द्वीप में प्रत्यक्ष रूप से खेल का पसारा किया है। लोगों को स्नान ध्यान दान आदि उतम क्रियाऐं बतला रहे है। इस प्रकार से चौथे युग में जीवों को जागृत किया है ।२।
नव खंड सिंह की खबर हुई, शुद्ध खेती कीजै । अवसर गुरु से भेंट हुई, जुग लाहो लीजै । लाहो लीजै दया कीजै, और लोभ न लागिये । दान दे स्तुति कीजै, नांव निहचल लीजिये । निरहारी आप आयो, चारू धर्म चलाइयो । नव खंड खेत किसान जिह का, साच खेत कमाइयो ।३।
जिनके सिद्धान्तों की नव खंड में खबर पहुंच चुकी है। सभी को यही आदेश दिया है कि खेती व्यापार भक्ति आदि शुद्धता से कीजिये। इस अवसर पर गुरु से भेंट हुई है। जिसे लाभ लेना है वह अवश्य ही लीजिये। दया का भाव रखिये किन्तु लोभ न कीजिये। यथा शक्ति दान देवें तथा परमात्मा का नाम लीजिये। स्वयं निराहारी निरंजन विष्णु आये है और सुन्दर पन्थ की स्थापना की है। नव खंड पृथ्वी ही जिनका खेत है और उसमें बसने वाले सभी उनके किसान है इसलिये हे किसानों ! सच्ची खेती करो ।३।
शरण जिह के पार लंघे, गुरु प्रगट आयो । क्षमा दया शील सही, जोग जुगत दृढ़ायो । जोग दृढ़ाया विसन आयो, भाग पायो भाइयो । पहलाद सूं हरि कवल कीयो, वाचा पालण आइयो । जोग जिन रो साच इल मां, ब्रह्म ज्ञान चितारियो । सुरजन जन की विणती, शरणै पार उतारियो ।४।
जिस गुरु की शरण ग्रहण करने से संसार सागर से पार उतर सकते है। ऐसे ही गुरु प्रगट हुए है। गुरु हमें क्षमा, दया, सत्य, शील योग की युक्तियां बतला रहे है। योग मार्ग में दृढ़ करते हुए हमें योगी बना देंगे। ऐसे दिव्य विष्णु आये है किन्तु जिनका भाग्य अच्छा होगा वही प्राप्त कर सकेगा। प्रहलादजी से कवल किया हुआ था, वह अपना वचन पूरा करने के लिये ही आये है। जिनका योग सिद्धान्त संसार में सत्य मार्ग है। जिस योग के द्वारा ही ब्रह्म की प्राप्ति तथा स्मरण संभव है। सुरजनजी विनती करते हुए कहते है कि हम आपकी शरण में है। हे देव ! हमें तो अवश्य ही संसार सागर से पार उतार दीजिये ।४।