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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह74 / 156

साखी छन्दां की, राग धनाश्री-74

बाबो सांभल जैसे बागड़ देश, पोहमी पितांबर आवियो

कवि: वील्होजी

कवि परिचय — वील्होजी

वील्होजी का जन्म विक्रम संवत् 1589 में हुआ था। निर्वाण संवत् 1673 निश्चित रूप से ज्ञात है। वील्होजी के सम्बन्ध में सुरजन जी, केशोजी,परमानन्द जी, गोविन्दराम जी, तथा साहबराम जी आदि सभी ने लिखा है। संवत् 1601 में मुकाम मन्दिर में शब्दवाणी का सस्वर पाठ श्रवण करके वील्होजी छोटी आयु में आकर्षित हुए थे और नाथोजी के शिष्य बन गये थे। नाथोजी ने जाम्भोजी द्वारा दी हुई वस्तुऐं वील्होजी को सप्रेम भेंट दी थी। और पंथ का स्वामी यही होंगे यह पहचान कर ली थी। नाथोजी तथा उदोजी तापस से ज्ञान श्रवण किया और शब्दवाणी तथा साखियां नियम धर्म कण्ठस्थ करके पूर्णतया तैयार हो गये तब संवत् 1611 में विधिवत् साधु दीक्षा प्रदान की थी। साधु परंपरा वंशावली से ऐसा ही ज्ञात हुआ है। साधु दीक्षा लेकर समाज में भ्रमण प्रारम्भ किया। अनेक स्थानों में सत्संग करते थे। लोगों को समझाते थे, साखी शब्द गायन में बड़े ही निपुण थे। स्वयं भी साखियों की रचना करते थे। वील्होजी ने अनेक आख्यान कथाओं की भी रचना की है। तथा अनेकानेक हरजसों की रचना करके गा करके सुनाते थे और अपने शिष्यों को भी प्रेरित किया करते थे। साहित्य लेखन का कार्य वील्होजी ने ही प्रारम्भ किया था। अपने शिष्य सुरजन जी एवं केशोजी को नये साहित्य की रचना करने की प्रेरणा देते थे। वील्होजी मण्डली सहित धर्म प्रचारार्थ भ्रमण किया करते थे परन्तु लोग उनकी बातों पर ध्यान कम ही देते थे। तब वील्होजी जोधपुर के राजा सूरसिंह के राज दरबार में पहुंचे और राजा के कहने पर जेष्ठ के महीने में मरूभूमि में बाजरी का सिट्टा, काकड़ी एवं मतीरा अपनी सिद्धि के बल पर दिया था। जिससे प्रभावित होकर राजा ने वील्होजी की प्रार्थना पर सिपाही, खूंटा, कोरड़ा यानि दण्ड देने का अधिकार दिया था। वील्होजी गांव-गांव में पहुंचे और लोगों को साम, दाम, दण्ड भेद से समझाया और पंथ की टूटी हुई मर्यादा को पुनः जोड़ा। वील्होजी ने ही मुकाम का आसोजी मेला तथा चेत्र अमावस्या का जाम्भा मेला प्रारम्भ करवाया था। जब समाज में प्रथम बार आकर समिलित हुए थे तब उनके चक्षु खुल गये थे ये चर्म चक्षु तथा ज्ञान चक्षु भी यह उनके जीवन का प्रथम चमत्कार था। तभी वील्होजी ने अपने उद्धार की प्रार्थना इस साखी द्वारा बड़े ही कारूणिक रूप से की है यह प्रथम उनकी साखी नीचे दी जा रही है-

बाबो सांभल जैसे बागड़ देश, पोहमी पितांबर आवियो । कांय पुरबलै सै करमन रेख, राक रतन धन पावियो । राक पान रतन जड़ियो, ऐसी सुणी जे सोय । आप देव त्रिभुवण नायक, मिलियो प्रगट होय । आलिंकारे ओलख्यो, गुरु गुदड़ियो सूं भेस । संग साधो श्याम आयो, सांभलि जैसे बागड़ देश । पोहमी पितांबर आवियो ।१।

सर्व श्रेष्ठ धाम अमरापुरी जैसा इस बागड़ देश को मानकर स्वयं पीत वस्त्र धारी यहां बाबे के वेश में आये है यहां के रहने वाले सज्जनों का ऐसा कोई सौभाग्य ही था जिस कारण से विष्णु यहां पर आये है। जिस प्रकार से गरीब को अकस्मात अपार धन की प्राप्ति हो जाये उसी प्रकार से यहां के लोग धनी हो गये है, हाथ में रत्न आ गया है ऐसा हमें सुनाई दे रहा है। आप स्वयं देव तीनों लोकों के स्वामी है। यहां प्रत्यक्ष रूप से आकर मिले है। कुछ ऐसे दिव्य चिन्ह देकर सहज ही में पहचान हो गयी अन्यथा बाह्य वेशभूषा देखकर तो पहचानना कठिन ही था क्योंकि गरीबी का वेश बना रखा था, कहा भी है- "म्हे आप गरीबी तन गूदड़ियो" हे साधो ! आपके साथ में स्वयं श्याम पधारे थे। इस देश को अमर लोक मान करके आये थे, वे स्वयं विष्णु ही थे ।१।

साधो चालो ज्यूं जोवण जाय, नैणे नारायण देखस्यां । उत मिलसी मुनियर पात, मांहि मधुसूदन पेखस्यां । पेखां कोड़ा तरण तारण, सुपह दाखण हार । मोमणां मन हरण हुवो, भेटस्यां दीदार । हीयो हरषे मन बिगसे, सांभलियो हरि नांव । कीवी माया मोह ज्यूं छूटै, चालो ज्यूं जोवण जाय । नैणे नारायण देखस्यां ।२।

हे साधों ! चलो अब देखने चलते है। वहां पर इन्हीं आंखों से दर्शन करेंगे। वहां पर अनेक पवित्र मुनियों का दर्शन भी होगा तथा इस धरती पर मधुसूदन भगवान विष्णु को देखेंगे। दर्शन मात्र से ही हम उनकी कृपा के पात्र हो जायेंगे तो हमें भी उन बारह करोड़ में पार उतार देंगे। मोमण भक्तों का मिलन भी वहीं होगा, प्रेम का प्रवाह उमड़ पड़ेगा। हृदय हर्षित होगा, मन विकसित होगा, हरि नाम की संभाल होगी तथा ग्रहण किया जायेगा। वहां पर पहुंचने से ही मोह माया का भ्रम टूट जायेगा। इसलिये चलो वहां पर इन्हीं आंखों से नारायण को देखेंगे ।२।

भक्तां पूगो पहली सहनाण, देव जाणीजै त्रिभुवण धणी । यही अचंभी बात, जाट जीकारो यूं भणी । जाट जीकारो यूं भणी नै, नर बोलता हुंकार । सु सबद संतोष लेणां, पुरूष अथवा नार । पालटि कुबध कुबाण मेर ही, हुवा संत सुजाण । भाव सूं गुरु मिलियो भक्तां, पूगा पहली सहनाण । देव जाणी जै त्रिभुवण धणी ।३।

भक्तों को तो पहले अवतारों के कार्यकलाप से पता चल गया कि ये तो त्रिभुवन के स्वामी विष्णु देव ! यह अचंभे की बात है कि जाटों ने भी हांजी-हांजी कहकर बोलना प्रारम्भ कर दिया है। यह विष्णु चरित्र के अलावा और क्या हो सकता है इससे पूर्व तो जाट लोग हुंकार के सहित बोला करते थे। उन्हें तो बोलने की भी सुधी नहीं थी। इस समय तो पुरूष अथवा नारी सुशब्द सुनने तथा कहने लगे है। शील संतोष आदि नियम भी धारण करने लगे है। धोखा धड़ी करनी छोड़ दी है। कुमार्ग की आदत छोड़कर सभी संत बन चुके है, सभी सुजान हो चुके है। भाव से भक्तों को गुरु मिले है। यह कोई पूर्व जन्म के संस्कार से ही पहचान हुई है स्वयं जाम्भोजी को त्रिभुवन का स्वामी स्वीकार किया है ।३।

देवा ही अति देव, शारंग धर संभराथले । जिन सतगुरु की सेव, कीजे मन सूधे मिले । मन सूधे सेव कीजै, हुवै मंगलाचार । पांच सात नव कोटि बारा, आयो तारण हार । आरती कीजै नाम लीजै, जीव काजै सेव । संभरथल परगट बाबो, देवा ही अति देव । शारंग धर संभराथले ।४।

यहां सम्भराथल पर देवाधिदेव विष्णु सारंगधर आये है। उन सतगुरु की सेवा करो। तथा मन लगाकर पूजा पाठ द्वारा मेल करें। इस प्रकार मन लगाकर सेवा करने से मंगलाचार होगा। क्योंकि पांच, सात, नव करोड़ तो पार पहुंच चुके है। इस बार बारह करोड़ का उद्धार करने के लिये आये है। सदा ही आरत भाव से परमात्मा को पुकारें। नाम स्मरण करें। इस जीव की भलाई के लिये भक्ति करें। सम्भराथल पर प्रगट स्वामी देवाधिदेव है जो यहां पर आये है ।४।

मोमणां के मन मोटी आस, साचा ने सतगुरु तारसी । देशी अमरापुर वास, आवागवण निवारसी । आवागवण निवारसी नै, जे मन सुधे ध्यावियो । जीवत मूवा खाक हुआ, सो अमरा पुर पावियो । सुध गुरु की आण बहिसी, तांण थंद हारसी । वील्ह जपै आस कीजै, आवागवण निवारसी । साचा नै सतगुरु तारसी ।५।

भक्तों को तो बहुत बड़ी आशा है। जो सच्चे लोग है उन्हें तो सतगुरु संसार सागर से पार उतार देंगे। उन्हें अमरापुरी में निवास देंगे। तथा सदा के लिये जन्म मरण के चक्कर से छुड़ा देंगे। यदि आवागवण मिटाना है तो मन के सहित ध्यान करें। अन्यथा दोय मन दोय दिल कार्य नहीं बनेगा। जो जीते हुए भी मरे हुए के समान हो चुके है अर्थात् उन्होनें दुर्गुणों को निकाल दिया है वही अमरापुरी को जाते है। गुरु की बतायी हुई शुद्ध मर्यादा पर चलता है वही अजरा जारले की भावना से पार पहुंच जाता है। वील्होजी हरि का जप करते हुए कहते है कि हे प्रभु ! अब तो आपकी ही आशा है। आप ही हमें जन्म मरण के चक्कर से छुड़ा दीजिये ।५।