दूसरा अध्याय · कथा 12
उधरण को शब्द सुनाना
वील्होजी उवाचः- हे गुरुदेव! आपके श्रीमुख से मैंने राव दूदा की विचित्र कथा सुनी। केवल मात्र शरणागति से ही दूदे को राज्य की प्राप्ति हो गयी। अब मैं आगे अनेकानेक राजकुमारों की कथा सुनना चाहता हूँ। ऐसी दिव्य कथा जिससे हमारे इष्ट देवता भगवान् विष्णु का दिव्य चरित्र उजागर हो सके। जाम्भोजी ने किन किन राजाओं को अपना शिष्य स्वीकार किया? क्योंकि राजा ही प्रजा का सर्वश्रेष्ठ अग्रगण्य होता है। यदि राजा धर्म-नियमों का आचारण करेगा तो प्रजा भी उसी का ही आचरण करेगी। यथा राजा तथा प्रजा।
नाथोजी उवाचः- हे शिष्य! मैं तुम्हें जाम्भोजी का दिव्य चरित्र सुनाता हूँ। ध्यानपूर्वक श्रवण करो। एक समय गुरु जम्भेश्वरजी ग्वाल-बालों सहित सम्भराथल पर गऊवें चरा रहे थे। बहुत से ग्वाल-बाल उनके साथ में थे। उसी समय कुछ बालक आकर कहने लगे- हे मित्र! आपने हमारी सहायता तो अनेक बार की है। हम सभी आप पर अति प्रसन्न हैं। किन्तु इस समय कुछ डाकू लोग ऊँट-ऊँटनियों को यहाँ सम्भराथल के पास से ही हाँक कर ले जा रहे हैं। हमें ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यह धन इनका अपना नहीं है। ये लोग पराया धन चोरी करके ले जा रहे हैं। ये बेचारे मूक पशु भी इसी समय अपनी आवाज लगा रहे हैं। लगता है वे आपको ही बुला रहे हैं। अपने बंधन से छूटने की प्रार्थना आपसे कर रहे हैं।
आज आप अपना देवपना दिखलाओ और इन ऊँट-ऊँटनियों को छुड़ा दो। यदि आज आप नहीं छुड़ाओगे, तो पीछे निश्चित ही बाहरू (इनके मालिक) शस्त्र लेकर आयेंगे। इनका आपस में घोर संग्राम होगा। यह पवित्र शांत धरती खून से रंग जायेगी। आपके यहाँ पर उपस्थित रहते हुए हम लोग ऐसी भयानक घटना नहीं देखना चाहते। ये पशु भी बेचारे अपना परिचित स्थान छूट जाने से अति दुःखी हो रहे हैं। मानव की धन प्राप्ति की इच्छा कहाँ तक उचित है? स्वयं तो आपस में लड़ते ही हैं, साथ में इन निरीह जीवों पर भी कहर ढ़हाते हैं। यह लोभ-लालसा तो कभी पूरी नहीं होने वाली है। स्वयं लड़कर मर जायेंगे, किन्तु इस अपूरणीय वासना को कभी मार नहीं सकेंगे। अपने अहं की तृप्ति हेतु इन पशुओं को दुःख देना कहाँ तक उचित है?
जाम्भोजी बोले- हे ग्वालो! आप लोग सभी एकत्रित हो जाइये। अपनी-अपनी लकुटिया लेकर उनका पीछा कीजिये। वे डाकू लोग तुम्हारे डर से डरकर भाग जायेंगे। एकता में शक्ति होती है। उस शक्ति की तुम लोग पहचान करो। वह तुम्हारे भीतर मौजूद है।
बालक बोले- हे देव! हमें आपकी बात पर सहसा विश्वास नहीं हो रहा है। क्योंकि हम तो अब तक बालक ही हैं। संख्या में भी कम ही हैं। हमारे पास कोई शस्त्र भी तो नहीं है तथा न ही हमने अब तक शस्त्र चलाना ही सीखा है। हमारे विपरीत इन दस्युओं की संख्या भी अधिक है। सभी शस्त्रधारी हैं। ये लोग शक्ति संपन्न शस्त्र चलाने में कुशल है। हम इनका सामना कैसे कर सकते हैं? यदि आपकी कुछ कृपा हो जाये। कृष्ण चरित्र की झलक हममें आ जाये तो हम कुछ कर सकते हैं। अन्यथा तो यह असंभव ही है।
जम्भेश्वरजी ने कहा-हे ग्वालो! आप लोग मेरी बात पर विश्वास कीजिये। और जैसा मैं कहता हूँ वैसा कीजिये। बालकों ने अपने मित्र की बात पर विश्वास किया। सभी एकत्रित होकर अपनी अपनी लट्ठियाँ लेकर सांढों को छुड़ाने के लिए चल पड़े। सभी ने अपनी अपनी लट्ठियाँ उपर उठा रखी थी और सम्मिलित स्वर में जय-जयकार करते हु,, ठहर जाओ, ठहर जाओ। अभी हम आये। आप लोग हमारे जीवित रहते हुए हमारी सीमा का उल्लंघन नहीं करोगे। आज तो तुमने किसी अन्य का पशुधन चुराया है, कल हमारा भी चुराओगे। आज हम तुम लोगों को जिन्दा नहीं छोड़ेंगे। हमें आप लोग केवल बालक ही मत समझना, हम निरीह अकेले नहीं है। हमारे साथ हमारे मित्र जय अम्बेश्वर भी हैं।
डाकुओं ने देखा कि बहुत बड़ी सेना हमारे पीछे आ रही है। अब हमें जिन्दा नहीं छोड़ेगी। इस समय तो इस पशुधन को छोड़कर भागने में ही भलाई है। ऐसा एक-दूसरे से कहते हुए, बड़ी सेना के भय से भीत होकर डाकू लोग भाग गये। पशुधन निर्भय होकर विचरण करने लगा।
एक समै देवजी थलिया राज करे। रावरा वरग धावड़िये लिया। देवजी सूं सला आय निर्सया। देव कनै पाल रमै छा जका कह्यो- रावजी की सांढ़ी छुड़ावों तो तूं सति देव। देवजी कहे- थे गेडी कावां सगला अंसवार हुवौ। असवार हुवा। देवजी कही सगला ललकार कीवी। धावड़ियां की नजरी कटक आयो। सांढे छोड़े, नाहठा। रैबारी सांढया लार छां तका बाहर घाती। बाहरूवे टोला चरता दीठा। गुवालियां ने कहरे मरदां सांढयां के छुड़ाई? म्हारे साथे औ देवजी छै, ऐणी छुडई। और उमराव चढयां के उतरयां। उधरण कान्हावत कर जोड़, अरज कीवी- देवजी! थांहरे पेट पूठी दीसै नही, छाया दीसै नही, आप कुण बालक छो? श्री जाम्भाजी उवाचथोड़ी
देर में अपनी सांढें छुडने हेतु कान्हाजी का पुत्र उधरण- ऊधोजी अपनी सेना लेकर आ गये। उन्होंने देखा कि उनके सांढ़ ऊँट तो यहाँ पर ही चर रहे हैं। चलो! वहाँ पर कुछ ग्वाल-बाल खेल रहे हैं। उन्ही से पूछ लेते हैं कि हमारे पशुधन को किसने छुड़ाया या स्वयं छोड़कर भाग गये। आज हमें खून खराबे से बचा लिया है। ऐसा कहते हुए उधरण अपनी सेना सहित सम्भराथल पहुँचा। वहाँ बालकों के साथ जम्भेश्वर के दर्शन किये।
बालकों से पूछा- हमारे धन को किसने छुडवाया या स्वयं ही छोड़कर भाग गये हैं? बालकों ने कहावैसे तो हम सभी लोगों ने मिलकर ही यह कार्य किया है, किन्तु हम तो केवल निमित्त मात्र ही हैं, हमारे सूत्रधार कार्य करवाने वाले हमारे देवजी ही हैं। अधिक क्या कहें,उनकी अलौकिक शक्ति से तो हमारे असंभव कार्य भी संभव हो रहे हैं। उधव अपने सैनिकों सहित जाम्भोजी के निकट आया और उन्होंने देखाचारों तरफ मुख ही दिखाई देता है। पीठ नहीं दिखती है, न ही शरीर की छाया ही दिखती है। फिर भी बैठे हुए एक बालक दिखते हैं।
ऐसा आश्चर्यजनक दिव्य काया का स्वरूप देखकर उन्होंने पूछा- आपके तो शरीर में शारीरिक लक्षण, पीठ, छाया आदि क्यों नहीं दिखते? गुरु जम्भेश्वरजी ने शब्द उच्चारण किया-
शब्द नं.- 2 ओ३म् मोरे छाया न माया लोही न मांसू, रफू न धातूं, मोरे माय न बापूं।
आपण आपूं रोही न रापूं, कोपूं न कलापूं, दुख न सरापूं।
लोई अलोई त्यूंह तृलोई,ऐसा न कोई जंपा भी सोई।
जिंहि जंपे आवागवण न होई।
मोरी आद न जाणत, महीयल धूंवा बखाणत, उरध ढ़ाकलें तृसूलूं।
आद अनाद तो हम रचिलो, हमें सिरजिलों से कौण?
म्हें जोगी के भोगी कै अल्प अहारी, ज्ञानी के ध्यानी, के निज कर्मधारी।
सोखी के पोखी, कै जल बिम्बा धारी,दया धर्म थापले निज बाला ब्रह्मचारी।।
श्री गुरुदेव ने अपने शब्द में कहा है- हे उधरण! तुम सत्य ही कहते हो। जैसा तुम कहते हो, वैसा ही मेरा स्वरूप है। क्योंकि मेरा शरीर ज्योतिप्रधान है। देवताओं का शरीर तेज प्रधान होता है। तेज के कैसी छाया, कैसी माया, कैसा रक्तधात इत्यादि। मानव शरीर पृथ्वी प्रधान होता है। उसमें ही ये सभी कुछ होता है। इसलिए तो देवता का दर्शन ज्योति में ही होता है। देवता के मुख्य शिरोमणि भगवान् विष्णु है, वही मैं स्वयं विष्णु ही हूँ।
हे उधरण! मेरे माता-पिता भी नहीं है। मैं तो स्वयं ही हूँ। मेरे से भिन्न तो कुछ भी नहीं है। मैं ही सम्पूर्ण जगत का आधार हूँ। मेरा कोई आधार नहीं है। मैं किसी पर भी कोप नहीं करता और न ही किसी को शाप ही देता हूँ, क्योंकि मुझे दुःख ही नहीं होता, तो मैं क्यों किसी को शाप दूँगा?
व्यक्ति अपने ही कर्मों का फल दुःख-सुख भोगता है, किन्तु दोष दूसरों को देता है। हे उधरण! हम जप भी उसी परमात्मा विष्णु का करते हैं, जिसके जप से मानव जन्म-मृत्यु के दुःख से छूट जाता है। मेरा आदि- अन्त कुछ भी नहीं है। वह इन आँखों से प्रत्यक्ष तो दिखाई नहीं देता, फिर भी अनुमान द्वारा जाना जा सकता है। जिस प्रकार से पर्वत पर धुएं को देखकर अग्नि का अनुमान लगा लिया जाता है।
दैहिक, दैविक तथा भौतिक तीन तरह के ताप संसार में प्रसिद्ध हैं। उन तापों के उपर ढ़क्कन लगा दें, उन्हें लुप्त कर दें, तभी शान्ति हो सकेगी। आदि अनादि तो हमने ही बनाया है। हमें बनाने वाला कौन? अर्थाह्म्9 हमें बनाने वाला हम से ऊपर है भी नहीं।
हम क्या हैं? कौन हैं? यह तो कहना तथा समझना कठिन ही है। क्या हम योगी हैं या भोगी हैं अथवा थोड़ा भोजन करने वाले या अधिक खाने वाले, हम ज्ञानी हैं या ध्यानी, या कर्म करने वाले, या किसी का शोषण करने वाले या पालण-पोषण करने वाले, हम जीव रूप में हैं या ईश्वर रूप में, यह भी कहना कठिन है। हे उधरण! तुम ऐसा समझो कि हम दया धर्म की स्थापना करने वाले स्वयं बाल ब्रह्मचारी हैं।
उधरण कान्हावत ने पुनः पूछा कि हे देव! आपकी आयु तो थोड़ी ही दिखती है, आप कितने वर्षों के हैं? मुझे लगता है कि आपकी आयु मुझे जो दिख रही है, इससे कहीं ज्यादा है? क्योंकि आप बातें बहुत ही ज्ञान की कर रहे हैं। अन्यथा इस छोटी सी आयु में यह ज्ञान कैसे संभव हुआ। गुरु जाम्भोजी ने शब्द सुनाया-
शब्द- 4 ओ३म् जद पवन न होता, पाणी न होता, न होता धर गैणारूं।
चंद न होता सूर न होता, न होता गिंगदर तारूं।
गऊं न गोरू माया जाल न होता, न होता हेत पियारूं।
माय न बाप न बहण न भाई, साख न सैण न होता न होता पख परवारूं।
लख चौरासी जीया जूणी न होती, न होती बणी अठारा भारूं।
सप्त पताल फुंणीद न होता, न होता सागर खारूं।
अजिया सजिया जीया जूणी न होती, न होती कुड़ी भरतारूं।
अर्थ न गर्थ न गर्व न होता, न होता तेजी तुरंग तुखारूं।
हाट पटण बाजार न होता, न होता राज दवारूं।
चाव न चहण न कोह का बाण न होता, तद होता एक निरंजन शिंभु।
कै होता धन्धूकारूं, बात कदे की पूछै लोई, जुग छतीस विचारूं।
तांह परै रे अवर छतीसूं, पहला अन्त न पारूं।
म्हें तपदण होता अब पण आछे, बल बल होयसा कह कद कद का करूं विचारूं।
गुरु जम्भेश्वरजी ने शब्द द्वारा बतलाया- हे उधरण! आपने मेरी आयु के बारे में जानना चाहा। किन्तु मैं अपनी उमर कितनी बतलाऊँ? किसकी समता करूँ? जब मैं था तब ये सूर्य, चन्द्र, तारे, धरती, आसमान, गायें, हाट-बाजार, नगर-गाँव,भाई-बन्धु, 84 लाख योनियाँ, माता-पिता, सप्त पाताल, शेषनाग, सागर, अर्थ-गर्थ, अहंकार, तुरंग, राज-पाट, चहल-पहल इत्यादि इस समय जो तुम देख रहे हो, वह उस समय कुछ भी नहीं था।
सभी कुछ दृश्य-अदृश्य न होते हुए भी एक निरंजन स्वयंभू उस समय भी था। या फिर केवल धंधुकार ही था। हे उधरण! तुमने मेरी आयु कब की पूछी है? मैं छत्तीस युगों की बात बतला दूँ। उससे भी परे और भी छतीस युगों की बात बतला दूँ। अनन्त समय व्यतीत हो गया है, किन्तु मैं ज्यों का त्यों हूँ।
हम तो उस समय भी थे, अब भी हैं, फिर आगे भी रहेंगे! हे उधरण! कब की बात बतलाऊं? पुनः उधरण ने पूछा हे देव! मैं देखता हूँ कि आपके हाथ में माला है, आप जप कर रहे हैं, यदि जप करते हैं तो यह बतलाइये कि किस देवता का? जाम्भोजी ने शब्दोच्चारण किया-
शब्द- 5 ओ३म् अइयालो अपरम्पर बाणी, म्हें जपा न जाया जीऊं।
नव अवतार नमो नारायण, तेपण रूप हमारा थीयूं।
जती तपी तकपीर ऋषेश्वर, कांय जपीजे तेपण जाया जीऊं।
खेचर भूचर खेत्रपाला परगट गुप्ता, कांय जपीजे तेपण जाया जीऊं।
वासग शेष गुणिंदा फुणिंदा, कांय जपीजै तेपण जाया जीऊं।
चौषट जोगनी बावन बीरूं, कांय जपीजै तेपण जाया जीऊं।
जपां तो एक निरालंभ शिंभु, जिंही के माई न पीऊं।
न तन रक्तूं, न तन धातूं, न तन ताव न सीऊं।
सर्व सिरजत मरत बिवरजत, तास न मूलज लेणा कीयौ।
अइयालो अपरंपर बाणी, म्हें जपा न जाया जीऊं।
हे उधरण! मैं जप करता हूँ। किन्तु तुम्हारी तरह से नही। आप लोग तो जन्मे हुए जीवों का जप करते हो। मेरी परंपरा तुम्हारे से सर्वथा ही भिन्न है। नौ अवतार मच्छ, कच्छ, वाराह,नृसिंह, वामन,परशुराम, राम- लक्ष्मण,कृष्ण,बुद्ध आदि। मेरे ही रुप हैं। मैं भी उन्हीं का रूप हूँ।
हे उधरण! मैं तो इनका ही जप करता हूँ, क्योंकि मैं स्वयं ही विष्णु स्वरूप हूँ। ये अवतार भी विष्णु ही हैं। इसीलिए मैं तो स्वयं का ही जप करता हूँ। जप का अर्थ है, स्वयं को पहचानना। जब तक स्वयं को नहीं पहचानोगे, तो कुछ भी हासिल नहीं होगा। बाहर देखने से स्वयं का भला कुछ भी नहीं होगा।
हे उधरण! आप संसार के लोग तो जन्मे हुए जीवों का जप करते हैं। जैसे कोई जह्मी,तपी,तकपीर,ऋषि इत्यादि स्वयं जन्मे हुए, असमर्थ, शक्तिहीन, दूसरों को क्या शक्ति देंगे? कुछ अन्य भी देव कहे जाते हैं। जैसे-खेचर-खेत्रपाल, कुछ प्रकट कुछ गुप्त, वासुकी, शेष, गुणिंदा फुणिंदा फण वाले। चौसट प्रकार की योगनियाँ, बावन प्रकार के भेरूं, इत्यादि ये सभी जन्मे हुए जीव हैं, जो मरकर भूत-पे्रत योनियों में चले गये हैं। ये स्वयं दुःखी हैं। अपने कर्मों का फल भोग रहे हैं। इनको क्यों जपते हो?
हे उधरण! यदि तू मेरे बारे में पूछता है तो मैं तुम्हें बतलाता हूँ। हम तो एक निरालंभ, निराकार, स्वयंभू का ही जप करते हैं, जिसके न तो माता-पिता हैं। जो स्वयं ही है। अजन्मा है। न ही उसके मानव पंचभौतिक शरीर ही है, उसको न तो सर्दी-गर्मी ही लगती है और न भूख प्यास ही लगती। जो सभी का सृजनहार है, मृत्यु-बुढ़ापे से रहित है। उस मूल को खोजो। वही सभी का मूल है। हे लोगो! हमारी परम्परा तो तुम्हारे से सर्वथा भिन्न है।
पुनः उधरण ने पूछा- हे गुरुदेव! हमने सुना है कि राम,कृष्ण,शिव,विष्णु आदि भिन्न भिन्न देवता ईश्वर हैं? इनके बारे में आप हमें समझाइये? उक्त प्रश्न सुनकर गुरुदेव ने शब्दोच्चारण किया-
शब्द- 6 ओ३म् भवन भवन म्हे एका ज्योति, चुन चुन लीया रतना मोती।
म्हे खोजी थापण होजी नाही,ं खोज लहां धुर खोजूं।
अल्लाह अलेख अडाल अजोनी स्वयंभू, जिही का किसा विनाणी।
म्हे सरै न बैठा सीख न पूछी, निरत सुरत सब जाणी।
उतपति हिन्दू जरणा जोगी, किरिया ब्राह्मण।
दिल दरवेशा, उनमन मुल्ला, अकल मिसलमानी।
हे उधरण! सम्पूर्ण सृष्टि में परमात्मा की एक ही ज्योति है। सूर्य,चन्द्र,तारे,अग्नि आदि जितने भी प्रकाशित होते हैं, वे सभी एक ही ज्योति के विभिन्न रूप हैं। सूर्य एक है, प्रतिबिम्ब अनेक होते हैं। हमने तो परमात्मा की विभूति को चुना लिया है। अग्नि सर्वत्र व्यापक होते हुए भी लकड़ी में विशेष रूप से प्रकट होती है। उस प्रकार से हमने उस ज्योति को प्रकट रूप से अवतारों में देखा है। उसी में ही हम रमण करते हैं। हम तो यहाँ पर खोज करने के लिए आये हैं। वैसे ही व्यर्थ में हमारा आना नहीं हुआ है। हम तो उन प्रह्लाद पंथ के बिछुड़े हुए जीवों की खोज करेंगे। वे लोग यहीं इस देश में जन्म लेकर आये हैं। हम उनकी जात पहचानते हैं। हमें उनकी खोज करने में कुछ भी अड़चन नहीं है। उनके शरीर तो वे नहीं रहे किन्तु उनकी जीवात्मा वही ज्यों की त्यों अलाह अलेख मूल रूप में विद्यमान है। वे किसी भी योनि में जन्म लें किन्तु उनकी जाति-स्वभाव ज्यों की त्यों है। हम भी तो रुवयंं अलाह अलेख अडाल अयोनी स्वयंभू हैं। हमारा तथा हमारी ही जाति वाले जीवों का विनाश कैसा? भले ही वह चाहे कितने जन्म धारण करलें, किन्तु मैं उनको पहचानता हूँ।
मैंने किसी भी पाठशाला में बैठकर शिक्षा ग्रहण नहीं की, किन्तु मैं जानता सभी कुछ हूँ। मेरे जानने का कारण भी आप लोग सुनलो-बाह्य रमण करने वाली वृत्ति को मैंने हटा करके आत्मस्थ करके सभी कुछ जान लिया है। मैं ही अकेला क्यों? आप भी जान सकते हैं। यदि मेरे कहने अनुसार चलो तो।
उत्पति से तो सभी हिन्दू-आर्यश्रेष्ठ हैं। किन्तु बाह्य जगत की हवा संस्कार से दूषित हो जाता है। फिर अपने को भिन्न-भिन्न कहता है। जिसमें जरणा, शीलता है, वही योगी है तथा जिसमें शुद्ध क्रिया आचार विचार है, वही पवित्र ब्राह्मण है। जिसमें दिल हस्, वही दरवेश है। शुद्ध पवित्र हृदय वाला, जो दूसरों के दुःख से पिघलने वाला ही दरवेश है। उनमुन अर्थात् जिसने अपने मन को संसार से हटाकर परमात्मा में लगा दिया है, वही मुल्ला है। और अकल वाला ही मुसलमान है। मुहमद ने अकलहीनों को अकल प्रदान की थी।