तीसरा अध्याय · कथा 22
उनतीस नियम
तीस दिन सुतक , पांच ऋ तुवन्ती न्यारो ।
सेरा करो स्नान , शील संतोष सुचि प्यारो ।
द्विकाल संध्या करो , सांझ आरती गुण गावो ।
होम हित चित प्रीत सूं होय , बास बैंकुण्ंठा पावो ।
पाणी बाणी इंर्धणी , दूध इतना लीजै छाण ।
क्षमा दया हिरदे धरो , गुरु बतायो जांण ।
चोरी निन्दा झूठ बरजियो , वाद न करणो कोय ।
अमावस्या को वृत राखणो, भजन विष्णु बतायो जोय ।
जीव दया पालणी , रूंख लीलो नहीं घावै ।
अजर जरे जीवत मरै, वै वास स्वर्ग ही पावै ।
करै रसोई हाथ सूं, आन सूं पलो न लावै ।
अमर रखावै ठाट, बैल बधिया न करावै ।
अमल तम्बाखूं भांग, मद्य माँस सूँ दूर ही भागे ।
लील न लावै अंग, देखते दूर ही त्यागै ।
दोहा उणतीस धर्म की आखड़ी, हिरदे धरियो जोय।
जाम्भेजी कृपा करी, नाम बिश्नोई होय।
ये उनतीस नियम प्रत्येक आये हुए जिज्ञासु को दिये। और कहा कि आप लोग इन बीस और नौ नियमों का पालन करने वाले हो गये हो। इसलिये आपको आज से बिश्नोई नाम से कहा जायेगा, तथा आज से आप लोग कल्पित देवताओं की पूजा त्याग कर के केवल एक विष्णु की ही उपासना-अराधना करोगे।
विष्णु के उपासक वैष्णव होते हैं। इसलिये आप लोग वैष्णव हैं। वैष्णव होने से आपको बिश्नोई ही कहा जायेगा। आप लोग नित्य प्रति सुबह जल्दी उठकर स्नान करोगे। इसलिये अन्य लोग आपको स्नानी भी कहेंगे तथा आप लोग साधु के शिष्य हैं, इसलिये आपको मोडा भी कहेंगे। क्योकि जिन्होने मोह को ढाह लिया है, पटक दिया है, मोह से मुक्त हो गये है, इसलिये मोडा भी कहे तो भी कोई अतिशयोक्ति नहीं है। साधु को मोडा नाम से ही कहा जाता है। मोडा के शिष्य भी मोडा ही होंगे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
कोई भी नाम होता है वह सार्थक होता है। यह नाम संज्ञा आपके लिये प्रयुक्त होगी। आप लोग इन नामों की सार्थकता बनाये रखें। कहीं ऐसा न हो कि चकाचौंध में आप लोग आप अपने नाम कर्म की महत्ता को भूल ही न जाये। आप लोगों के लिये जैसा नाम दिया गया है वैसा गुण भी अमृत पाहल पान से भरा गया है।
आज से आप लोग साधु जैसा जीवन यापन करते हुए अपना जीवन यापन करते हुए जीवन को सार्थक करेंगे। आप लोग गृहस्थी होते हुए भी ऋषि जैसा आपका उच्च कोटि का जीवन होगा। इन नियमों का पालन करते हुए इह लोक एवं पर लोक दोनों ही आपका उज्ज्वल होगा। जीया ने जुगति और मुवा ने मुक्ति दोनों आपके हाथ में होंगे।
जिस प्रकार से सम्पूर्ण वेदों का सार ओम है, उसी प्रकार से सम्पूर्ण वेद शास्त्रों का सार रूप ये उनतीस नियम हैं। ये नियम हमें आचार संहिता सिखलातें हैं। “आचारो ही प्रथमो धर्मों” आचार विचार ही प्रथम सर्वोत्तम धर्म है। जैसे सर्वप्रथम धर्म तीस दिन सूतक है। बच्चा जन्म लेता है तो माँ और बच्चे दोनों को ही तीस दिनों तक ग्रहकार्य से अलग रखें। उन्हें शुद्ध होने के लिये तीस दिन का समय चाहिये। समय व्यतीत होने से ही अपवित्र से पवित्र हुआ जा सकता है। तीस दिन पूर्ण होने पर घर को साफ करके हवन-पाहल देकर के पवित्र किया जा सकता है। तीस दिन पूर्ण हो जाने पर घर को साफ करके हवन-पाहल देकर माँ और बच्चे दोनों को ही पवित्र किया जाता है। यह प्रथम संस्कार है। इस संस्कार से बिश्नोई बनाया जाता है। पैदा होते ही बिश्नोई नहीं होता। जन्मना शुद्रो जायते संस्कारात् द्विज उच्यते। जन्म से तो शुद्र ही पैदा होता है किंतु संस्कार से दूसरा जन्म होता है।
एक माह तक माँ विश्राम करेगी, अच्छा पौष्टिक भोजन करेगी, तो माँ और बच्चा दोनों ही स्वस्थ होगें, बच्चे को माँ अपना दूध पिला सकेगी, बच्चा पुष्ट होगा, उसकी नींव मजबूत होगी, वह बड़ा होकर स्वस्थ बुद्धि शक्ति सम्पन्न होगा। उसे किसी प्रकार की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, हानि नहीं उठानी पड़ेगी। माँ अपना दूध पिलायेगी। उसे प्यार देगी। अपना संस्कार देगी बादमें वह आगे चलकर योग्य व्यक्ति, माता-पिता का भक्त, व देश भक्त बनेगा ।
दूसरा नियम इस नियम से जुड़ा हुआ है कि महिलाओं को प्राकृतिक रूप से मासिक धर्म होता है, उससे रजकाव होकर शुद्ध होती है तथा पुनः गर्भ धारण करने के योग्य होती है। यह हर एक माह बाद पाँच दिनों तक चलता है। ऐसी अवस्था में वह अपवित्र होती है। इस समय वह रसोई बनाने, खिलाने आदि कार्यों के योग्य नहीं होती है। ऐसी अवस्था में घर के कार्य पूजा-पाठ, हवन, मंदिर आदि से दूर रहना चाहिये।
रजस्वला अवस्था में स्त्री एकान्त में निवास करे। किसी पर पुरुष का चिन्तन न करे। किसी अन्य कुपात्र का दर्शन न करे। अन्यथा आगे आने वाली सन्तान विकृत पैदा हो जायेगी। अन्यथा वही कुपात्र ही जन्म ले लेगा, या अंग हीन, कुवर्ण, कुचील तथा अरूपवान संतान पैदा हो सकती है। ये दिन ही संतान उत्पति के मूल हैं।
आप लोग जैसा चाहे वैसी संतान की प्राप्ति कर सकतें हैं। इस दूसरे नियम पर विशेष रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है। इस नियम का पालन न करने से ही वर्णशंकर सन्तान पैदा हो जाती है। यही संतान आगे चलकर अपने कुल परिवार की मर्यादा भंग करने में कारण बनती है। सम्पूर्ण कुल परिवार को ही नरक में ले जाने का मार्ग प्रशस्त करती है। माता-पिता भाई बन्धु की कोई भी बात उसे स्वीकार नहीं होती है।
इसलिये महिलाओं के लिये ये नियम विशेष पालनीय हैं। वे ही समाज की नैया को पार ले जा सकती हैं। पुरुषों के सहयोग की भी महती आवश्यकता है। एक चक्र से गाड़ी नहीं चलती है। इसके लिये दोनों ही चक्र स्वस्थ होने चाहिये।
तीसरा नियम यह है कि प्रातः कालः की शुभ वेला में शौचादि क्रिया से निवृत्त होकर स्नान करें। इस एक नियम के प्रभाव से ही अन्य सभी नियम खिंचे चले आयेंगे। यदि प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व आप स्नान करते हैं, तो संध्या, सूर्य देवता की वन्दना हवन, तथा अन्य सभी सात्विक कार्य स्वतः ही सम्पन्न हो जायेंगे। अन्यथा एक नियम टूटने से दूसरे सभी परमार्थ के कार्य संपन्न नहीं हो पायेंगे।
रात्रि में सोया हुआ व्यक्ति मृत तुल्य हो जाता है। सुबह उठकर पुनः जीवन शक्ति संचार हेतु प्रथम जल स्पर्श ही जीवन दायक है। शरीर में होने वाली अनेक प्रकार की बीमारियों से स्नान द्वारा त्राण पाया जा सकता है। अधिक क्या कहें, स्नान करने का नियम धारण करने पर ही सत्यता का अनुभव होता है। बिना कुछ किये तो केवल कहने-सुनने से उसका कुछ भी तत्त्व नहीं मिलेगा। ये तीन नियम शरीर मन सम्बन्धी व्यावहारिक दिशा निर्देश देने वाले हैं। प्रथम आचार बताने वाले है।
चौथा नियम शील है। शील वृत्त है। शील नियम है। संसार को मर्यादित करने वाला एक नियम शील ही है। जिससे यह संसार ठीक से चलता है। ये हमारे देवता, सूर्य, चन्द्र, तारे, ग्रह, नक्षत्र, वायु पृथ्वी, अग्नि सभी शील से ही बंधे हुए हैं। गृहस्थ परिवार भी शील की ही मर्यादा में ही बंधा हुआ है। किसके साथ कैसा व्यवहार हो । माँ, बहन, बेटा, बेटी, भाई बन्धु, मित्र आदि सभी एक शील के बन्धन में बंधे हुए हैं। जिस दिन जहाँ पर भी शील धर्म टूटा है, वहीं पर समाज में उपद्रव हुआ है। जीवन नरक बन गया है। भगवान् ने हमें संसार में भेजा है, शील देकर भेजा है।
कार्यशाला में कोई औषधि का निर्माण होता है तो शील लगती है। वह शील हमें यह बतलाती है कि जैसी बनी है, ठीक वैसी ही आपके पास आ गई है। उसी प्रकार से जैसे हम शीलवान होकर संसार में आये हैं, उसी प्रकार से शीलवन्त बने हुए वापिस लौट चले। जिन कर्मो को लेकर आये थे उसी धर्म से युक्त रह कर संसार से प्रयाण कर जायें। यहाँ पर भ्रष्ट होकर, कुछ खोकर वापिस न लौटें। यह शील धर्म बतलाया।
शील-चरित्र, यही शील धारण करना होगा। तभी सच्चे अर्थो में मानव बन सकेंगे। इसलिये हम इस महत्वपूर्ण शील धर्म से मुँह न मोड़े। जीने की विधि को समझें। आत्मसात् करें ।
पाँचवाँ नियम संतोष है। शील व्रत से ही संतोष आता है। यह एक दूसरे के पूरक एवं सहयोगी हैं। कहा है- “संतोषादनुत्तमं सुख लाभः” अर्थात् संतोष से ही अपूर्व सुख आनन्द का अनुभव होता है। यदि सुख चाहते हैं। तो वह संतोष में ही मिलेगा। अन्यत्र सुख की प्राप्ति असम्भव है। संतोष का विलोम लोभ होता है। लोभ ही सभी दुःखों का मूल कारण है। जीवन में चाहे किसी पक्ष को देखो, जहाँ पर भी संतोष है, वहीं पर स्वर्ग-सुख है। जहाँ लोभ है, वहीं पर नरक है। ये सभी अनुभव करने की बातें हैं। आप लोग रोज अपने जीवन में इन्ही बातों का अनुभव करते हैं। किन्तु फिर भी सचेत नहीं हो पाते। अज्ञानता के वशीभूत हो जाते हैं।
“किं कर्तव्य विमूढ” हो कर जीवन को एक शाप समझते हैं। किन्तु यह मनुष्य जीवन एक वरदान है। इस ईश्वरीय देन मानव जीवन को समझें और सफल बनायें। श्री देवजी द्वारा दिये हुए नियमों की और विशेष ध्यान दें।
छठा नियमः-शुचि प्यारो है । पवित्रता से हमें प्यार होवे, न कि गन्दगी से। प्रथम स्नान से शरीर की शुद्धि, यह तो हमारी बाह्य शुद्धि ,कपड़ों की शुद्धि, घर की शुद्धि आदि। यह शुद्धियाँ तो जल मिट्टी आदि से सम्भव है किन्तु इनके अतिरिक्त भी हमारे मन, बुद्धि, अहंकार इन्द्रियाँ आदि की भी शुद्धि परम आवश्यक है । इनकी शुद्धि भगवान् के जप, कर्म,यज्ञ आदि द्वारा ही सम्भव है।
जो लोग स्वभाव से ही अपवित्र रहतें हैं। जिनके वस्त्र, घर आदि पवित्र नहीं हैं। जिनका जल, भोजन, वायु आदि भी पवित्र (शुद्ध) नहीं हैं। उनके पास में भी नहीं बैठना चाहिये। उनसे मित्रता आदि भी व्यवहार नहीं बढाना चाहिये। क्योंकि सर्वत्र संगति का गुण दोष प्रभावित करते हैं। जिनके यहाँ पर पवित्रता, शुचिता, सौम्यता, सम्मुण, आदि उत्तम गुण विद्यमान हैं, उनसे प्रेम करना चाहिये। क्योकि उनसे सभी कुछ सीखा जाता है। भगवान् विष्णु ही “पवित्राणां पवित्रम्” यो मंगलानाम् च मंगलम्” दैवतानां दैवतम् यो भूतानाम्मव्यय पिता उसी की ही संगति करनी चाहिये।
सातवाँ नियम दोनों समय संध्या करनी चाहिये। संध्या का अर्थ है दिन रात्रि की संधि वेला अर्थात् सूर्योदय-सूर्य अस्त समय, संध्या वेला है। अन्य सांसारिक कार्य हेतु नहीं है। यदि ईश्वर का स्मरण न करके अन्य सांसारिक कार्य इस वेला में करता है, जिस समय जो कार्य करना हो, उसी समय वही कार्य करें।
परमात्मा ने सभी कार्यों के लिये अलग-अलग समय निश्चित किया है। उसका उलंघन न करें। क्योंकि सभी समय किसी न किसी कार्य हेतु बंटा हुआ है। जैसे स्नान, संध्या, हवन, भोजन, अन्य कार्य, शाम को पुनः संध्या स्वध्याय, आरती शयन आदि। नियत समय पर कार्य करने से ही उस कार्य का सुविधापूर्वक समय पर फल मिलता है। समय आने पर ही फल पकता है। बीच में तोड़ दिया जायेगा तो वह रसमय नहीं हो सकेगा। अपना गुण धर्म प्रकट नहीं कर सकेगा। संध्या वेला प्रातः काल में शौच स्नानादि से निवृत्त होकर भगवान् विष्णु का जप करना चाहिये। ततपश्चात् सूर्योदय हो जाने पर हवन करना चाहिये। इस प्रकार से शाम को भी सूर्यास्त होने के साथ ही संध्या वेला में ईश्वरीय कार्य करना चाहिये ।
आपने देखा होगा कि संध्या वेला में स्म्पूर्ण सृष्टि की हल चल थोड़ी देर के लिये रुक जाती है। सम्पूर्ण पेड़ -पौधे, पशु-पक्षी, वायु-तेज, आदि ये सभी एक क्षण के लिये अपने जन्म दाता, पालन पोबाण कर्ता का स्मरण करते हैं। अन्य सभी क्रियाएँ शांत कर देतें हैं। उसी प्रकार मानव को भी करना चाहिये। यही संध्या का महत्व है ।
आठवाँ नियम-साँझ आरती गुण गावो। साँय जब रात्रि हो जाये। शयन की तैयारी हो जाये तब थोड़ी देर के लिये उस दयालु, कृपालु ईश्वर को धन्यवाद अवश्य ही प्रदान करो दिन भर के किये हुए कार्यो को स्मरण करो। कोई भूल-चूक हो गई तो क्षमा याचना माँगो। आर्त भाव से परमात्मा की प्रार्थना करना ही आरती है। कुछ इधर की कुछ उधर की निंदा करके समय को बर्बाद न करो। समय मिलने पर ईश्वर के ही गुणगान करो।
रात्रि समय में नित्य प्रति सक्रसंग (जागरण) करो। जागरण में ईश्वर की महिमा का बखान, साखी शब्दों द्वारा करो। इससे मन को खुराक मिलेगी। आपका मन स्वस्थ होगा। बुद्धि ज्ञानी होगी। आपका जीवन सुखमय होगा। युक्ति-मुक्ति दोनों आपके हाथ में होंगी ।
नौवाँ नियम-होम हित चित प्रीति सूँ होय, वास वैकुण्ठा पावो। नित्य प्रति हवन करें। किस विधिविधान से करें? इसका समाधान भी दिया है-हित चित तथा प्रीत से करें। हवन कर्ता-सर्व हिताय करे, चित लगाकर एकाग्र मन से करे, तथा प्रेम भाव से करे। यही विधि और विधान है। इससे बढकर और कोई विधि-विधान नहीं है।
यज्ञ का फल क्या होगा? वास वैकुण्ठा पावो , वैकुण्ठ अर्थात् भगवान् के परम धाम को। जहाँ जाने के बाद पुनः वापिस संसार के जन्म-मरण के चक्कर में नहीं आता। “ यद् गत्वा न निवर्तन्ते तद् धाम परं मम ” शास्त्रों में चार प्रकार के पदार्थों का विवरण आता है। धर्म, अर्थ, काम , और मोक्ष यज्ञ से इन चार प्रकार के पदार्थों की प्राप्ति होती है। सर्वप्रथम धर्म होगा, धर्म से धन की प्राप्ति होगी और धन से इच्छित वस्तु की प्राप्ति की जा सकती है। जब इच्छित वस्तु की प्राप्ति हो जाये तो अन्तिम चतुर्थ पदार्थ मोक्ष ही परम पदार्थ है, ये पदार्थ हवन करने से प्राप्त होते हैं।
सर्व प्रथम यज्ञ कर्ता अग्नि को प्रज्वलित करने के लिये गोत्राचार का उच्चारण करे। उसके पश्चात् देवताओं को स्वाहा कह कर के आहुति प्रदान करे। हम देवताओं को आहुति द्वारा घृतादिक पदार्थ प्रदान करें। देवता हमें वर्षा द्वारा इन हवनद्धय पदार्थों की प्राप्ति करवायें। हमारा तथा देवताओं का परस्पर भाव सम्बन्ध जुड़ेगा। एक दूसरे के प्रति सहयोगी बनेंगे। इसके लिये एक मात्र यज्ञ ही साधन है। यदि हम देवताओं के आहुति दिये बिना स्वयं ही पकाते व खाते हैं तो हम पाप को ही खाते हैं। यज्ञ से अवशिष्ट को अर्थात् यज्ञ कर्म करने के पश्चात् जो भी हमारे पास बच जाता है उसका भोजन करते हैं तो वह अमृत तुल्य है।
अन्न से सभी भूत प्राणी जीते हैं। वृद्धि को प्राप्त होते हैं तथा अन्न वर्षा जल से होता है, तथा वर्षा यज्ञ करने से होती है। इसलिये यज्ञ कर्म अवश्य ही करें। सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्याजी ने मानव के साथ ही यज्ञ की भी रचना की थी, और बतलाया था कि हे मानवो! आप लोग अपनी अभि वद्धि हेतु यज्ञ अवश्य ही करो। यह यज्ञ कामधेनु की तरह इच्छित फल देने वाला है। यही बात श्री देवजी ने उनतीस नियमों तथा शब्दों में कही है।
ज्योति में ही परमात्मा का दर्शन होता है। जब चाहें तब परमात्मा का दर्शन करें। शब्द पढे। परमात्मा से सीधी वार्तालाप भी करे। कहा है-यज्ञो वै विष्णुः” अर्थात् यज्ञ ही विष्णु है” स्वर्ग कामो यजेत्” अर्थात् स्वर्ग सुख की इच्छा वाला यज्ञ करे।
दसवाँ नियम-पाणी बाणी ईधणी, दूध इतना लीजे छाण। अर्थात् जल, दुध तथा ईधन व लकड़ी आदि जलाने वाली लकड़ी छाण कर लेना चाहिये। जल को वस्त्र द्वारा छान कर के पीना चाहिये। तथा दूध को भी वस्त्र द्वारा छान कर के लेना चाहिये। लकड़ी को जलाने से पूर्व झाड़कर अर्थात् अच्छी प्रकार से देख कर प्रयोग में लेना चाहिये। हो सकता है कि उसमें कीट पतंग आदि जीव हो सकतें हैं। आपके द्वारा अग्नि में ईधन के साथ ही डाल दिये जायेंगे तो जल कर भस्म हो जायेंगे। और जब जीव जल कर मर जायेंगे तो आप को पाप लगेगा ही। थोड़ी सी सावधानी से बहुत बड़े पाप से बचा जा सकता है।
जल में तो जीव होतें हैं, यदि बिना छाने जल पान करोगे तो जीवों को उदरस्थ कर लेंगें, जिससे जीवों की हत्या तो होगी ही। साथ में आपके स्वास्थ्य के लिये भी हानिकारक रहेंगे। जीव हत्या भी तो आपके द्वारा होगी। जीवों की हत्या न करें। जल के जीव जल में ही वापिस छोड़ दें। अपने तो केवल जल ही पीना है न कि जीवों को।
गाय-भैंस के स्तनों से दूध दुहते हैं, दूध दुहते समय हो सकता है कि उनका कोई रोम दूध में गिर सकता है। आप बिना छाने दूध के साथ रोम भी पी सकते हैं। वह आपके पेट में जायेगा। वहाँ पेट में वह क्या फायदा देगा? धार्मिक दृष्टि तथा शरीर के स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक ही होगा। इसलिये कहा गया है कि जल व दूध छानकर पीना चाहिये। ईधन को साफ करके ही प्रयोग में लाना चाहिये ।
ग्यारवाँ नियम-वाणी को भी छानकर के बोलना चाहिये। जल-दूध तो वस्त्र के द्वारा छाने जा सकते हैं किन्तु वाणी को किससे छानें? वाणी को छानने के लिये आपको बुद्धि से विचार करके बोलना चाहिये। बुद्धि रूपी वस्त्र ही छानने का साधन होगा। केवल सत्य बोलना ही प्रयाप्त नहीं है सत्य के साथ-साथ प्रिय भी बोलना आवश्यक है। “सत्यम ब52यात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्” सत्य तो अवश्य ही बोलें, किन्तु सत्य के साथ मीठा-प्रिय भी बोलें। जो सभी को प्रिय लगे ऐसा वचन बोले। “ सुवचन बोल सदा सुहलाली।” अच्छे, प्रिय, मीठे वचन बोलेंगे तो सदा खुशहाली बनी रहेगी।
प्रिय बोलने वाले के लिये कहीं विदेश नहीं होता। कः प्रदेश प्रियवादिनाम्। ” वाणी में बहुत भारी शक्ति निहित होती है। वह चाहे तो सभी को अपना मित्र बना ले। चाहे तो सभी को अपना “ात्रु भी बनाले। अनेक प्रदूषणो में शब्द भी एक प्रकार का प्रदूषण फैलाता है। उत्तेजना फैलाता है। वह शब्द शान्ति का प्रसार भी करता है। शब्द संगीत मय भी हो जाता है, तो परमात्मा से साक्षात्कार करवा देता है। वही शब्द जब गाली युक्त, कठोर होता है तो परमात्मा से दूर हटा देता है। इसलिये सद्गुरु देव ने उनतीस नियमों में से एक नियम मधुर प्रिय शब्द बोलने की आज्ञा दी है।
बारहवाँ नियम-क्षमा दया हिरदे धरो, गुरु बतायो जाण। क्षमा और दया ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। विरोधी नहीं है। प्रथम दया भाव होगी तो क्षमा का भाव पैदा होगा। दया भाव तो तभी होगा जब सर्व जन सुखाय व सर्व जन हिताय की भावना होगी। जब मन में परोपकार की भावना पैदा होगी तो तभी दया होगी। या ऐसे कहें कि दया भाव पैदा होगा, तो परोपकार उत्पन्न होगा । यह सभी कुछ तभी होगा जब हम परमात्मा के अति निकट होंगे। संसार से हमारी विरक्ति होगी। संसार में पदार्थ हमारे इतने मूल्यवान नहीं हैं, जितने आत्मा परमात्मा के प्राप्ति की लालसा । कहा भी है-
अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचन द्वयम् । परोपकाराय पुण्याय पापाय पर पीडनम् । ।
अर्थात् अपने से कम शक्ति वाला हो, उसने आपका नुकसान कर दिया है। आपका अपराध किया है। उसको आप दण्ड दे सकते हैं। किन्तु आपने अपने क्रोध को वशीभूत करके उसको क्षमा कर दिया है। यही क्षमा भाव है। आप के पास अपने से बलिष्ठ को दण्ड देने का सामर्थ्य नहीं है, तो आप दण्ड नहीं दे सकते। किन्तु दण्ड देने की भावना तो है, तो आप उसे क्षमा नहीं कर सकते। अन्य किसी दूसरे के दुःख से द्रवित होकर उसकी हर सम्भव सहायता करने का बीड़ा उठाया है, तो आप परम दयालु है। पराई पीड़ा को अपनी ही पीड़ा मानकर उसको दूर करने के लिये प्रयत्नशील होना ही दया भाव है ।
इसी दया भाव से ही भगवान् विष्णु विभिन्न अवतार लेते हैं और दुःखी जनों की रक्षा करते हैं । दया भाव होगा, जब जीवों की रक्षा होगी। दया-क्षमा भाव परम पवित्र भाव है । इसे विकसित करें। जीवन का आनन्द प्राप्त करें। जीवन में हमेशा अच्छे कर्मों को ही अपनायें, तभी यह जीवन सफल होगा।
तेहरवाँ नियम-चोरी निन्दा झूठ बरजियो, अर्थात् चोरी नहीं करनी चाहिये। यह एक नियम है, दूसरे का धनादिक नहीं चुराना चाहिये। कोई व्यक्ति अपने तथा अपने परिवार हेतु धन कमाता है। अन्य कोई दूसरा उसके धन को चुरा लेता है। हड़प कर अपने लिये उपभोग करता है। कमाता कोई और है खाता कोई अन्य ही है। जिसका धन हरण हो जाता है उसके दुःख का पार नहीं होता। असहनीय दुःख देने वाला कभी भी सुखी नहीं हो सकता। किसी को किसी भी प्रकार से दुःख देना पाप है। इसलिये यह पाप कर्म न करें।
चोर की न तो समाज में प्रतिष्ठा है, इसलिये यह लोक तो बिगड़ ही गया। तथा न ही परलोक में सुख शांति है। इसलिये दोनों लोकों से ही हाथ धो बैठता है। पराये धन की आशा छोड़कर अपनी कमाई पर ही विश्वास करें, उसमें ही सुख है ।
चोरी भी कई तरह की होती है। वह चाहे धन, जमीन, स्त्री, पशु हो अन्य वचनादिक की भी चोरी होती है। सभी प्रकार की चोरी सदा ही वर्जनीय है। समाज में चोरी जारी करके व्यवस्था में अव्यवस्था फैलाना है। मर्यादा को भंग करना ही पाप है। ऐसा पाप न करें।
चौदहवाँ नियम-निंदा नहीं करनी चाहिये। कोई भी व्यक्ति दूसरों की निन्दा करने में रस क्यों लेता है? कुछ कारण तो अवश्य ही होने चाहिये। क्योंकि स्वयं में जब अवगुण बहुतायत से हो, तो व्यक्ति अपने अवगुण छिपाने के लिये दूसरों के अवगुणों का ही मात्र बखान करता है। इससे उसके स्वयं के अवगुण तो समाप्त नहीं हो जाते, किन्तु थोड़ी देर के लिये उसे शान्ति तो अवश्य ही अनुभव होती है। इसमें ही वह रस लेता है।
दूसरों की निन्दा करने में ही वह लगा रहता है। दूसरों की निन्दा करते समय स्वयं के अवगुण तो समाप्त नहीं होते हैं किन्तु दूसरों के अवगुण तो अवश्य ही आ जातें हैं । अपने स्वयं के पहले से विद्यमान तथा अन्य के अवगुण मिलकर अभिवृद्धि को प्राप्त हो जाते हैं। कौन कैसा है? इससे कुछ भी मतलब नहीं है । हम कैसे हैं? यह हम देखें तो निन्दा भाव लुप्त हो जायेगा ।
मनुष्य की दृष्टि बाह्य है , अन्तर को नहीं देखती । यदि स्वयं को देखने लग जाये तो अवगुणों का भण्डार अन्दर मिलेगा । सभी शास्त्र वेदों में तथा सन्तों ने पराई निन्दा करने वालों को अधम बताया है इससे स्वयं की प्रगति में बाधा उत्पन्न हो जाती है। सदा के लिये एक स्वभाव ही बन जाता है । निज उन्नति का मार्ग ही भूल जाता है। इसलिये सदा उन्नति शील व्यक्ति को दूसरे की निन्दा करने के चक्कर में पड़कर अपने ही पेर पर कुल्हाड़ी नहीं मारनी चाहिये । इस दोष से सदा ही सावधान रहना चाहिये ।
पन्द्रहवाँ नियम-झूठ नहीं बोलना चाहिये । सत्य बोलने के समान तो कोई तप नहीं हैं । झुठ बोलने के बराबर कोई भयंकर पाप ही नहीं है । जिसके हृदय में सच्चाई है, उसके हृदय में हरि आप ही विराजमान होते हैं। यही तो तपस्या का फल है। अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिये लोग झूठ बोलकर अपना कार्य सिद्ध कर लेते हैं। उससे दूसरों को चाहे कितना ही नुकसान हो, उसकी वो लोग परवाह नहीं करते हैं ।
झूठे व्यक्ति की बात पर कोई विश्वास नहीं करता और बिना विश्वास के लोक व्यवहार नहीं चलता । झूठ बोलकर तो कोई दूसरों को धोखा दिया जा सकता है, लेकिन सत्य पर तो सम्पूर्ण पृथ्वी टिकी हुई है। सत्य सभी धर्मों का मूल है। सत्य से पवन चलता है। अग्नि तपती है। सूर्योदय होता है। सत्य से ही पृथ्वी स्थिर है , सत्य से ही सृष्टि का सम्पूर्ण व्यवहार चलता है , “ सत्यमेव जयते नानृतम ” सदा सत्य से ही विजय होती है । सत्यं वद , सत्य बोले व धर्म का आचरण करे।
सत्य क्या है? असत्य क्या है? इसकी मीमांसा कठिन है। कहीं सत्य भी असत्य हो जाता तथा कहीं असत्य भी सत्य हो जाता है। सत्य एवं असत्य का परिणाम देखकर ही निर्णय किया जा सकता है। केवल शब्द बोलने मात्र से सत्य असत्य का निर्णय नहीं किया जा सकता।
उदाहरणार्थ-जैसे कि आपके शब्द बोलने से यदि बहुत बड़ा अनर्थ हो, तो वह आपका सत्य शब्द सत्य नहीं कहलायेगा। क्योंकि उसका फल पापयुक्त है। और यदि आपके असत्य बोलने से यदि किसी के प्राण बच जाते हो, तो वह असत्य भी सत्य हो जाता है। इसलिए सत्य-असत्य का निर्णय उसके फल को देखकर ही किया जाता है। श्री देवजी ने उनतीस नियमों में सत्य बोलने का नियम दिया है। यह नियम सभी के लिए पालनीय है।
सोलहवाँ नियमः- व्यर्थ का विवाद नहीं करना चाहिए। किसी तत्त्व को जानने के लिए आपस में बैठकर वार्तालाप करना तो वाद कहलाता है। यदि सार्थक विवाद हो। जिसमें उत्तेजना नहीं आये तो वह ठीक ही होगा। किन्तु जहाँ पर केवल खण्डन करने की प्रवृत्ति हो जाये। प्रत्येक बात को काटा जाये, वह चाहे ठीक हो चाहे अठीक हो, ऐसी प्रवृत्ति विवाद को जन्म देती है। विवाद हमें कहीं नहीं पहुँचाता। केवल स्व अहंकार की पुष्टि करता है।
श्री देवजी ने कहा- वाद विवादे दाणू खीणा, वाद विवाद करके राक्षस मारे गये। वाद विवाद फिटाकर प्राणी, छाडो मनहट मन का भाणो। हे प्राणी! व्यर्थ का विवाद करना छोड़ दे। तुम्हें जो अच्छा लगता है। इसलिए तुम उस बात को दूसरों से मनवाने के लिए प्रयत्नशील हो जाते हो। यह कोई आवश्यक नहीं है कि जो बात तुम्हें अच्छी लगे, वह सभी को अच्छी लगे। व्यर्थ का विवाद करके स्वयं के अहंकार को पुष्ट न करें। कहा भी है विद्या
विवादाय धनं मदाय, शक्ति परेषां परपीडनाय।
खलस्य साधोर्विपरीतमेतत्, ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय।
दुष्ट प्रकृति वाले के पास यदि विद्या आ जाये तो वह उससे विवाद करेगा और सज्जन आदमी के पास विद्या आ जाये तो उससे ज्ञान देगा। इसी प्रकार से धन एवं ताकत का भी सदुपयोग करता है। व्यर्थ के विवाद से बचें, समय का सदुपयोग करें, व्यर्थ का विवाद अनेक प्रकार के झगड़े झंझट पैदा करता है, परमात्मा से दूर ले जाता है। अहंकार की अभिवृद्धि करता है। जीवन की सुख सौश्वयता को पलीता लगाता है। सत्य से दूर करके मानव को पशुवत बना देता है। इसलिए व्यर्थ के विवाद में न पड़ें। जहाँ पर विवाद बढ़ता हो, वहाँ पर शांत रहें। वचनों का आदान-प्रदान विवाद को अनंत गुणा बढ़ावा देता है।
सत्रहवाँ नियम- अमावस्या को व्रत राखणों-अमावस्या को व्रत करना चाहिये। अर्थात निराहार रह कर उपासना करनी चाहिये। व्रत-उपवास,उप-समीपे,आवास-निवास रहना चाहिये अर्थात किसके समीप में? समीप में रहने योग्य तो एक ही हैं, जो अपना है। अपनी आत्मा है अन्य से तो दूर ही रहे। वह परमात्मा सत्य है। सत्य की ही हम संगति करें।
व्रत केवल अमावस्या का ही करना चाहिये। अमावस्या एवं पूर्णमासी दो महान् पर्व हैं। पूर्णमासी को चन्द्र पूर्ण होता है। उस दिन तो व्रत नहीं करना चाहिये। क्योंकि पूर्ण चन्द्र हमें पूर्णता देता है। हमारा चन्द्रमा से गहरा सम्बन्ध है। चन्द्र हमें ज्योति,प्रकाश,ओजस्विता प्रदान करता है। जितने भी पुष्प, फल, अन्न, धन आदि सभी चन्द्रमा से अमृत लेकर अमृत मय बनते हैं,फूलते-फलते हैं। वही फल धानादिक से हम ग्रहण करते हैं, उससे ही हम जीते हैं। चन्द्रमा हमारी जीवन दायिनी शक्ति है। उसे पूर्णमासी को पूर्णता से ग्रहण करें।
अमावस्या के दिन एवं रात्रि में वह जीवनदायनी शक्ति बिना चन्द्रमा के हमें प्राप्त नहीं होती। उस समय यदि हम अन्न खाते हैं तो बिल्कुल निस्तेज, मरे हुए अन्न को खाते हैं। उससे हम रुग्ण हो सकते हैं। जीवन शक्ति उसमें कदापि नहीं होती। इस खाने से तो अच्छा है कि व्रत ही रखें। कम से कम जीवन की विपरीतता से तो बचेंगे।
अमावस्या के दिन व्रत करे। व्रत का अर्थ होता है कि संकल्प करे। अर्थात् आज मैं अमावस्या को भोजन नहीं करूँगा। यह आपका किया हुआ संकल्प आपकी आत्मा को बल देगा। शरीर एवं वासनाएँ भले ही दुर्बल हो जायें, किन्तु आत्मा की ताकत महत्वपूर्ण है। उसे ही अमावस्या का व्रत करके बढावे। आज तो यह छोटा सा संकल्प किया था, वह पूर्ण हुआ। कल हम इससे भी महान् संकल्प लेकर कार्य पूर्ण करने में सफल हो सकेंगे।
शरीर एवं मन की शुद्धि के लिए अमावस्या का व्रत रखना चाहिये। एक महीने में अमावस्या आती है। महीने में एक दिन व्रत का निश्चित किया है। वह अमावस्या पर्व ही श्रेष्ठ है। क्योंकि हम लोग भूख लगे या न लगे, समय पर भोजन करने में नहीं चूकते। वह अपच भोजन शरीर में विकार पैदा करता है। जिस वजह से अनेकानेक बीमारियाँ जकड़ लेती हैं। इसलिए भी अमावस्या का व्रत बतलाया है।
अमावस्या के दिन अन्य सांसारिक कार्य न करके कवेल आत्म उन्नति हेतु एवं परमात्मा के निमित्त ही कार्य करना चाहिये। यदि अमावस्यादि पर्वों में भी पालंग सेज निहाल बिछायो तो होने वाली संतान कुपात्र, दुष्ट या विकलाँग पैदा हो जायेगी। उस दिन तो केवल हवन, जप, तप एवं शुद्ध क्रियाएँ ही करनी चाहिये।
अमावस्या की रात्रि भूत-प्रेतों की होती है। उस रात्रि में राक्षस, प्रेतादिक बलवान हो जाते हैं। उसी दिन यदि हमने उन दुष्टात्माओं को पुष्ट करने वाले कार्य किये, तो वे हमें आकृष्ट कर लेंगे। हमारे अपने साथी बन जाये हमें हर प्रकार से कष्ट देंगे। उस दिन यदि हमने परमात्मा का स्मरण, यज्ञ, सत्संग, आदि देवताओं के कार्य किये, तो हमारे ऊपर उन राक्षसों का जोर नहीं चलेगा। हम देवताओं की तरफ बढ़ेंगे। परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त करेंगे।
अठाहरवाँ नियमः- भजन विष्णु बतायो जोय। श्री जाम्भेश्वरजी कहते हैं कि विष्णु भगवान् का भजन करना चाहिये। शब्दों में अनेक बार विष्णु भजन की ही महिमा बतलाई है। भजन अर्थात्-भज, सेवा, सेवा करे, वह भी भगवान् विष्णु की ही करे। गीता में भी कहा है- आदित्यानामहं विष्णु देवताओं में विष्णु देवता भगवान् कृष्ण कहते हैं कि मैं हूँ।
श्री देवजी ने अन्यत्र भी कहा है- ओम् विष्णु सोहं विष्णु, तत्त्व स्वरूपी तारक विष्णु। ओम् नाम से परमात्मा कहा जाता है, वह विष्णु ही है। वह आत्मा रूप परमात्मा भी विष्णु ही है। तत्त्व रूप विष्णु ही है। सभी को तारने वाले, साकार रूप भी विष्णु ही कहे जाते हैं। विष्णु की ही सेवा करे। किन्तु विष्णु की सेवा किस प्रकार से करे, वे तो सम्पूर्ण सृष्टि के पालनपोषण कर्त्ता हैं। उन्हें तो किसी प्रकार की सेवा की आवश्यकता नहीं है। किन्तु विष्णु की संतान जितने जीवधारी हैं, उनकी सेवा करे। यही विष्णु की सच्ची सेवा है। जीवन परमार्थ हेतु होना, यही विष्णु की सेवा है। यज्ञ द्वारा उपासना करना, सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय ही विष्णु की सेवा भजन है।
जितने भी अवतार होते हैं, वे सभी विष्णु के होते हैं। सभी अवतारों का भजन स्मरण एक साथ नहीं हो सकेगा। किन्तु एक विष्णु की द्वपासना करने से सभी की उपासना भजन हो जायेगा। तीन देव प्रसिद्ध हैं, ब्रह्मा-विष्णु-महेश। किन्तु एक विष्णु ही व्यापक रूप से सर्वत्र अवस्थित हैं। वही विष्णु जब सृष्टि का कर्त्ता होता है तो ब्रह्मा रूप से अभिहित होता है और सहांरकर्त्ता होता है, तो शिव रूप से प्रसिद्ध होता है और पालन पोषण कर्त्ता होता है, तो विष्णु रूप से रहता है।
इस समय हमें न तो उत्पत्ति की आवश्यकता है। वह तो पहले से ही बहुत हो चुकी है। और न ही संहार की ही आवश्यकता है, क्योंकि समय आने पर यह कार्य तो स्वतः ही हो जायेगा। हमें तो केवल पालन- पोषण की आवश्यकता है, जिससे सुखमय जीवन व्यतीत हो सके। इसके लिए विष्णु की ही शरण में जाना चाहिये। विष्णु की अर्द्धाग्नि लक्ष्मी हैं। लक्ष्मी का अर्थ धन-दौलत है। वह देने वाला विष्णु ही है क्योंकि लक्ष्मी उनके पास में ही है। उन्हें छोड़कर अलग नहीं जाती। लक्ष्मी की प्राप्ति हेतु विष्णु का भजन करे, यही समझदारी की बात है।
उनीसवाँ नियमः- जीव दया पालणी। जीवों पर दयाभाव द्भखें। उनका पालन पोषण करें। न कि उन्हें बेवजह मारें या सतायें। कहा है-भवन-भवन म्हे एका जोति। सर्वत्र उस एक परमात्मा की ही ज्योति है।
ये जितने भी जीव हैं, ये ईश्वर के ही अंश हैं। पिता अहं पुत्रस्य भगवान् कहते हैं कि मैं ही जगत का पिता हूँ। सम्पूर्ण संसार ही मेरा पुत्र है। बीजमहं सर्वभूतानाम्। सभी भूत प्राणियों का भगवान् ही बीज है। बीज का ही वृक्ष रूप से सारा संसार विस्तार है।
उस भगवान् के रूप को नष्ट करने का मनुष्य को कोई अधिकार नहीं है। किसी भी जीव को मारना या उसे सताना, महा घोर अन्याय है। एक जीव दूसरे जीव को मारेगा या सतायह्यगा तो उन जीवों के कर्म उन्हें ही तो भोगने पड़ेंगे। जीवो जीवस्य भोजनम् जीव ही जीव का भोजन है। एके जीव दूसरे जीव को खा जाता है। ये सभी जीवों के आपस के बदले हैं। आपस का वैरभाव सदा से चलता रहता है।
यह मानव जीवन मिला है। इसमें रहकर सूझबूझ से वैरभाव निवृत्त किया जा सकता है। ज्ञानाग्नि सर्व कर्माणि, भस्मसात् कुरुते अर्जुन। ज्ञानरूपी अग्नि सभी कर्मों को जला देती है। ज्ञान की प्राप्ति मानव शरीर से ही हो सकती है। अन्य योनियों में असम्भव है। इसलिए मानव को चाहिये कि सभी जीवों की रक्षा करें, उन्हें न ही सतायें और न ही मारें।
बीसवाँ नियमः रूँख लीलो नहीं घावे। हरा वृक्ष नहीं काटना चाहिये। हरे वृक्ष में जीव होता है, इसलिए तो वह फूलता फलता है। वृद्धि एवं अवृद्धि को प्राप्त होता है। अन्य जीवों की भाँति हरे वृक्ष में भी चेतनता है। काटने पर सूख जाता है। जल की प्राप्ति होने पर प्रफुल्लित भी हो जाता है।
हरा वृक्ष महान् परोपकारी है। वह परमार्थ हेतु छाया, फल-फूल, लकड़ी, देता है, इसके साथ ही साथ सभी जीव धारियों को श्वाँस भी प्रदान करता है। दूसरे जीव-जन्तुओं द्वारा छोड़ा गया श्वांस वृक्ष स्वयं पी जाता है और अपना छोड़ा हुआ श्वांस मानवादि को देता है, उससे सभी जीते हैं। यह परस्पर सहयोग की भावना से प्रकृति में संतुलन बनाये रखता है। एक के बिना दूसरे की कल्पना भी नहीं की जा सकती ।
हरे वृक्ष वर्षा को खींचकर के ले आते हैं। जहाँ पर भी हरे वृक्ष होंगे, वहीं पर ही वर्षा प्रचुर मात्रा में होगी। जहाँ पर भी वृक्षों का अभाव होग, वहाँ पर स्वाभाविक रूप से वर्षा का अभाव होगा। अकाल पड़ेगा। इसलिए वृक्ष लगाना चाहिये।
हे वील्हा! इस मरुभूमि में अन्य वृक्ष तो होना कठिन है। यहाँ तो खेजड़ी वृक्ष ही आसानी से हो सकतद्ध है। देखो! वन में चारों तरफ खेजड़ी ही खेजड़ी दद्धख रही हैं। दूसरे वृक्ष तो हो सकता है। फसलों को नुकसान पहुँचाये। किन्तु यह खेजड़ी तो सर्वगुण सम्पन्न होने से फसल को अनन्त गुणा बढ़ा देती है। इस देश में तो यही वृक्षों का राजा है। ये तो तुलसी सदृश पूजनीया है। कम वर्षा में भी यह पनपने वालद्ध तुलसी इस देश के लिए तो सर्वथा उपयुक्त है।
इसका आश्चर्य तो देखो, वर्षा को खींचकर के ले आती है। किन्तु वर्षा के ऊपर का जल जो फसल के काम आता है, उसको नहीं पीती। उस जल को नीचे धरती में जाने से रोकती है और नमी बनाये रखती है तथा अपने से छोटे को जल पिलाती है। स्वयं तो अपनी प्यास पाताल के जल से बुझाती है। इसकी जड़ें पाताल को चली गयी है। वहाँ से जल को खींचकर के ले आती है। स्वयं भी जल पीती है और अपने आश्रितों को भी पिलाती है। फसल आदि अपने से छोटों पौधों को वृद्धि में सहयोग प्रदान करती है।
इस खेजड़ी के पत्ते, फल, सांगरी आदि भी बहुत ही उपयोगी हैं। गाय, ऊँट आदि पशु बड़े ही चाव से खाते हैं। यह बड़ा ही पौष्टिक आहार है तथा इसका फल सांगरी मनुष्यों के लिए बहुत ही उपयोगी है। इसकी बहुत ही स्वादिष्ट एवं सर्वरोग नाशक सब्जी बनती है। ताजी या सुखाकर भी कार्य में लाई जा सकती है। इसलिए श्रीदेवजी ने हरे वृक्षों की रक्षा करने का नियम दिया। न तो स्वयं ही काटें और न ही दूसरों को काटने दें। सिर साँटे रूँख रहे तो भी सस्तो जाण।
इक्कीसवाँ नियमः- अजर जरे। अजर जरे जीवत मरे तो वास स्वर्ग ही पावै। जरणा रखे। काम, क्रोध, लोभ,मोह,ईर्ष्या आदि जो सदैव जलाने वाले हैं। इन्हें जला डालें। कभी हमें वासना, कभी हमें क्रोध, कभी मोह, लोभ, ईर्ष्यादि हमारी दुर्गति करते रहते हैं। इनसे सावधान रहें। इनके हम दृष्टा साक्षी बन जायें। जब भी इनका आक्रमण हमारे ऊपर होवें, तभी हम जग जायें। सचेत हो जायें, तो हम अपने को बचाकर रख सकते हैं। इनके आक्रमण से हम बेहोश हो जाते हैं। ये अपना प्रभाव डाल देते हैं।
हम शरीरधारी आत्मा अपने परमात्मा से विलग ही बने रहते हैं। अपने मूलस्वरूप की झलक हमें नहीं मिल पाती। जो हमारा बीज है, बुनियाद है, उससे हम लोग दूर हट गये हैं। इस समय भटक चुके हैं। ईश्वर एवं जीव से मिलन नहीं हो पा रहा है। इसमें मुख्य बाधा केवल अहंकार ही है। हमारे बीच की खाई बन चुका है। अति निकट होने पर भी अति दूर करने में अहंकार ही कारण है। जिस समय अहंकार की निवृत्ति हो जायेगी। उसी दिन जीवत मरो की बात सार्थक हो जायेगी। हम अपने स्वरूप में स्थित हो जायेंगे। उसी दिन आनन्द की बधाईयाँ बँटेगी। अपने प्रियतम से मिलन हो सकेगा। जम्भेश्वर जी ने कहा भी है-
जीवत मरो रे जीवत मरो, जां जीवन की विधि जाणी।
जे कोई आवे हो हो करता, आपज हुइये पाणी।
यही बात यति गोरख भी कहते हैं-
मरौ वै जोगी मरौ, मरौ मरण है मीठा।
तिस मरणी मरौ, जिस मरणी गोरख मरि दीठा।
जीवत मरो। अहंकार को छोड़ो तो जीवन की विधि जान सकोगे। यदि कोई तुम्हे मारने के लिए आग बबूला क्रोध में भरकर आता है, तो आप जल के समान शीतल हो जाइये। जल से आग स्वयं ही बुझ जायेगी। इस प्रकार से मर कर देखो। यही मरना कितना मीठा है? कितना आनन्द से भरा हुआ है? यह कहा नहीं जा सकता। स्वयं यदि अपने आप नहीं मर सकते, क्योंकि स्वयं का मरने का अनुभव नहीं है तो गोरख यति, जाम्भा यति से मरना सीखो। उन्होंने स्वयं मरकर के देखा है। तभी तो वहे कह रहे हैं कि आप भी हमारे तरह आनन्द से पूर्ण होइये। यही आनन्द ही जीवन का स्वर्ग है। यह आनन्द ही जीवन जीने की कला है। यही जीने की विधि है।
गुरु के समीप रहकर यही उत्तम विधि सीखी जाती है। अन्यथा तो इस संसार में दुःख भटकन के सिवाय और कुछ भी नहीं है। यही भटकन ही नरक है, परमात्मा की प्राप्ति ही स्वर्ग है। स्वर्ग एवं नरक के बीच में अहंकार विद्यमान है, अहंकार से निवृत्ति तो परमात्मा की अपार कृपा से ही हो सकती है।
बाईसवाँ नियमः- करे रसाई हाथ सों, आन सू पला न लावे। रसोई अर्थात् भोजन अपने हाथ से ही बनावे। दूसरों से पला अर्थात् सम्पर्क न करें। यहाँ पर हाथ से अर्थात् अपने ही जैसे संस्कारित जनों द्वारा बनाया हुआ भोजन करे, जिसका संस्कार नहीं हुआ है, जो नियम पालन नहीं करता है, वह असंरु कारित है। उसके द्वारा बनाया हुआ भोजन न करे।
जो लोग बिश्नोई पन्थ में सम्मिलित हो गये हैं। जिन्होंने पाहल ग्रहण कर ली है। उनतीस नियम अपना लिये हैं। उसके ही हाथ का भोजन करो। जो लोग आपके जैसे अर्थात् संस्कारयुक्त नहीं हैं वह आन हैं अर्थात् आपसे भिन्न दूसरी जाति के हैं। उनका बनाया हुआ भोजन अपवित्र है। वह न करे, क्योंकि हो सकता है उन्होनें भोजन में अभक्ष्य कुछ बनाया हो। जो आपको भ्रष्ट कर सकता है। अभी अभी नये ही बिश्नोई पंथ के पथिक बने हैं। यदि इस समय इन्हें खाने-पीने की छूट दे दी जायेगी, तो अभक्ष्य पदार्थ खा सकते हैं। खाने-पीने से हमारी बुद्धि और मन बनता है। मन और बुद्धि ही इस जीवन को चलाते हैं। मार्ग तय करते हैं। ये अपवित्र हो जायेंगे तो हम इस मार्ग से भटक जायेंगे। जैसे के तैसे बने रहेंगे। जब मार्ग पर ही नहीं चलेंगे तो पहुँचेगे कैसे। मार्ग का अनुसरण ही नहीं करेंगे, तो मार्ग बताना ही व्यर्थ हो जायेगा।
भोजन में शुद्धता एवं पवित्रता होनी चाहिये। अन्यथा शरीर की भूख तो हो सकता है भोजन मिटा दे, किन्तु बुद्धि-शक्ति से यह शरीर वंचित रह जायेगा। अनेकों व्याधियाँ आकर घेर लेगी। शरीर रुग्ण हो जायेगा। मन एवं बुद्धि भी विचिलत हो जायेगी। ऐसे दुःख भरे शरीर में यह आत्मा रहना नहीं चाहेगी। यहाँ से प्रस्थान कर जायेगी। हम एक सौ वर्ष जीने की कल्पना नहीं कर सकते। असमय में ही मृत्यु का ग्रास बन जाएगा।
आचारो ही प्रथमो धर्मः। आचार-विचार युक्त जीवन ही पहला धर्म है। आचार हीनं न पुनन्ति वेदाः आचार-विचार से हीन मानव को वेद भी पवित्र नहीं कर सकते। आचार-विचार, खाना पीना, उठना-बैठना, चलना-क्तिरना, बोलना आदि सभी कुछ आचार ही है इनमें पवित्रता होनी चाहिये। यह सभी कुछ स्वयं ही करणीय है। स्वयं ही देख, सोच समझकर जल भोजन ग्रहण करें।
विशेष रूप से तो यह नियम तभी निभ सकता है, जब सभी कार्य स्वयं ही हाथ से ही करें। इसलिए श्री देवजी ने हाथ से ही भोजन बनाने का नियम बताया। स्वयं ही कार्य करके,बना करके भोजन करता है, तो उसको महान संतुष्टि होती है। अपने ही अनुकूल भोजन बनता है। दूसरों के द्वारा बनाया हुआ भोजन अपने अनुकूल नहीं होता है। आत्मा की संतुष्टि प्रदान करने वाला नहीं होता है। भोजन बनाने वाले की भावना भी बहुत कुछ कार्य करती है। यदि वह क्रोध, काम, लोभ, मोह अवस्था में भोजन बनायेगा, तो खाने वालों को भी वही दोष जकड़ लेगा।
भोजन बनाने वाले की भावना भी भोजन में निहित होती है। इसलिए सभी से अच्छा तो यही है कि भोजन या तो स्वयं ही बनावें अथवा अपने ही सदृश लोगों द्वारा बनाया हुआ करें।
तेईसवाँ नियमः- अमर रखावे ठाट। अमर रखावे ठाट-अधिकतर किसान वर्ग के लोग बिश्नोई पन्थ में सम्मिलित हुए थे, किसानों मेंभी ज्यादातर जाट वर्ग ही बिश्नोई बने थे। वे लोग भेड़-बकरी पालते थे। यही उनकी आजीविका थी। द्वस समय में तो ये लोग अधिक संख्या में बिश्नोई हो गये थे। उनका धंधा भेड़-बकरी पालन ही था। इस धंधे में जीव हत्या होती थी, बकरे आदि कसाइयों को बेचे जाते थे। कसाई लोग बकरों को काट डालते थे।
भेड़-बकरियों के साथ अधिक नर रखे नहीं जा सकते थे। इस समस्या के समाधान हेतु श्री जम्भेश्वरजी ने कहा-आप लोग सभी बकरों का एक ठाट बना दो, कसाइयों के हाथ मत दो। मतलब यह था कि किसी प्रकार से जीव हत्या न तो करो और न ही करने दो। धीरे-धीरे आप लोग बकरियाँ पालनी छोड़ दो। जो अन्य लोग पालन करे, तो वही जाने। आप लोग अब अहिंसक बन गये हैं। भेड़ बकरियों के स्थान पर अब आगे गऊ पालन करो। धीरे धीरे आपका इनसे पीछा छूट जायेगा। इसलिए जाम्भोजी महाराज ने बिश्नोइयों को भेड़ बकरी पालन के लिए मना किया है। जिस कार्य को करने से जीव हत्या हो, ऐसा कार्य कदापि नहीं करना चाहिये।
मुख्य रूप से इस नियम का प्रयोजन जीवरक्षा ही है तथा अभक्ष्य भोजन का त्याग करना भी है। यदि किसी को भेड़पालन करना है तो यह नियम भी अवश्य ही पालनीय है। यदि स्वतः ही भेड़ बकरी पालन नहीं करता है, तो उसके लिए यह नियम लागू नहीं होगा। क्योंकि वह इस नियम का पालन करता ही है। इस नियम का मुख्य उद्देश्य तो बिश्नोई को भेड़-बकरी पालन से निवृत्त करना है। इसलिए इस समय यह नियम सार्थक है।
चौबीसवाँ नियमः- बैल बधिया न करावे। बैलों को नपुसंक न बनावें। बिश्नोई स्वयं यह कार्य न करे तथा न ही करवावें। यह तो सर्वमान्य है कि बिना नपुसंक करवाये बैल हल आदि नहीं चलते हैं तो हलगाड़ी आदि चलाने के लिए ही ऐसा किया जाता है। किन्तु इस क्रूर कार्य को करने और करवाने में बिश्नोई सहयोग न दे, अन्य कोई करे तो करने ना दें।
यदि कृषि कार्य हेतु बैल चाहिये, तो उसके लिए खरीदा जा सकता है। अपनी गाय का बछड़ा बेचा जा सकता है। इससे स्वयं इस क्रूर कार्य से बचा जा सकता है। यह नियम भी जीव दया पालणी से सम्बन्धित है। दया ही धर्म का मूल है। जब मूल बीज भी धर्म के अन्दर नहीं होगा, तो क्या फूलेगा? क्या फलेगा? दया हीन कर्म करने से दया का लोप हो जाता है फिर कभी दया का अंकुर फूट नहीं पाता।
जाम्भोजी महाराज ने कहा है कि दया धर्म थापले निज बाला ब्रह्मचारी। मैं दया धर्म की स्थापना करने वाला बाल ब्रह्मचारी हूँ।
पच्चीसवाँ नियमः- अमल,तमाखू,भांग,मद्य,माँस सूं दूर ही भागे। अमल- अफीम नहीं खाना चाहिये। अफीम भयंकर नशा है। यह शरीर मन, बुद्धि को अपने वश में कर लेता है। ऐसी अवस्था में इससे छुटकारा पाना कठिन है। इसलिए पहले से ही नियम बना लेना चाहिये, मैं खाऊँगा ही नहीं। यह नियम प्रतिज्ञा की र6ा करता है।
अफीम शरीर की ताकत को समाप्त कर देती है, बीमारियों से लड़ने की शरीर में ताकत नहीं रहती है। धन-परिवार शरीर से यह बर्बाद कर देती है। ज्यों ज्यों नशा बढ़ता जायेगा त्यों-त्यों मानव उसके वशीभूत होता जायेगा।
अफीम आदि का नशा करने वाला जीते जी मुर्दे के समान हो जायेगा। अन्य नशीली वस्तुओं मेंयह अफीम शिरोमणि नशा हैं और नशा ही मौत की निशानी है। यदि किसी को अपने जीवन को जल्दी बर्बाद करना हो तो इसे अपना लें। देखने में तो अच्छा लगता है, किन्तु घुण की तरह जीवन को खा जाता है।
छब्बीसवाँ नियम-तम्बाकू- जीवन में सुख शाँति चाहनें वाले के लिए चाहिये कि वह तम्बाकू का सेवन किसी भी प्रकार से न करे। इस तम्बाकू ने मनुष्य समाज पर अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया है। वह चाहे अग्नि के संयोग से धुएं के रूप में अन्दर आकर, बाहर जाकर अपना राज्य स्थापित करती है, वह चाहे सूंघकर चाहे खाकर कैसे भी हो यह चारों तरफ से मनुष्य को घेरकर मुर्दा बना देती है। इसलिए तम्बाकू का सेवन वर्जनीय है।
तम्बाकू का सेवन करने वाला यज्ञ में आहुति देने का अधिकारी नहीं है। तम्बाकू खाने, पीने, सूँघने वाले के हाथ से दी हुई आहुति देवता भी ग्रहण नहीं करते। उनके द्वारा किए हुए सभी धार्मिक कार्य जैसे हवन- पूजा,पाठ,दान,दक्षिणा आदि व्यर्थ हो जाते हैं। उनका कोई फल नहीं होता है, जैसे ऊसर भूमि में बोया हुआ बीज। इन सभी बातों पर विचार करने से ऐसा ही परिणाम आता है कि तम्बाकू का सेवन नहीं करना चाहिये।
सत्ताईसवां नियमः- भांग भक्षण नहीं करना चाहिये। भाँग एक प्रकार का विष है जो धीरे-धीरे मन बुद्धि को पागल कर देता है। थोड़ी देर के लिए भाँग का नशा जीवन की वास्तविकता से दूर हटा देता है किन्तु जीवन की बीमारी, दुःखों का स्थाई ईलाज नहीं है। किसी भी व्यसन में पड़ा हुआ मानव अपने आप को खोता है। जीवन के कष्टों से थोड़ी देर के लिए दूर भागना चाहता है किन्तु यह कोई स्थाई ईलाज नहीं है। वे दुःख तो कर्मों के अनुसार पीछे ही लगे रहते हैं। दुःख मिटाने के चक्र में दुःख को आमंत्रणेदेकर बुला लेता है।
नशा अनजाने में ही संगति से सीखा जाता है। फिर वह नशा काँटे की तरह चुभता रहता है। अपने में जकड़ लेता है। साँप छछून्दर की गति हो जाती है। नशा आजीवन अपना दास बना लेता है। मानव की मानवता आजादी छिन जाती है। अपने अन्दर पाप को बैठने की जगह प्रदान करता है। गोरख यति भी यही कहते हैं-
भाँग भखत ध्यान ज्ञान खोवत, यम दरबार ते प्राण रोवत।
भाँग खाने से ज्ञान ध्यान खो जाते हैं। आगे यम के दरबार में अवश्य ही पहुँचेगा। तब हिसाब किताब होगा तो तुम्हारा यह जीव रोयेगा। इसको कौन बचायेगा। जाम्भा यति ने भी कहा है-
आगे सुरपति लेखो मांगे, कह जीवड़ा के करण कमायो।
थरहर काँपे जीवड़ो डोले, उत माई पीव कोई न बोले।
अट्ठाईसवाँ नियमः- माँस-मद्य का सेवन नहीं करना चाहिये। जिसने शराब का सेवन कर लिया उसे सभी पाप कर लिये, कुछ भी बाकी नहीं छोड़ा। इसलिए यहाँ पर मद्य और माँस दोनों एक साथ ही रखें है। बुद्धि ही तो भक्ष्य एवं अभक्ष्य का निर्णय करती है। दारू से बुद्धि ही विचलित हो गयी तो फिर कौन निर्णय करेगा? क्या खाना चाहिये और क्या नहीं खाना चाहिये? मनुष्य अपने अन्दर कितनी बातें छिपाकर रख लेता है, जो कहने और करने योग्य नहीं होती हैं। समाज में जीने के लिए कुछ मर्यादा होती है। उन मर्यादाओं का त्याग करने से व्यवस्था बिगड़ती है। उपद्रव मच जाता है। शराबी व्यक्ति इन दोनों ही बातों का उल्लंघन करता है। न तो वह किसी प्रकार की मर्यादा को समझता है और न ही कुछ छिपाने योग्य को छिपा पाता है। इसलिए शराब सदा ही वर्जनीय है। माँस सेवन नहीं करना चाहिये यह तो जीव दया पालनी नियम से भली-भाँति ज्ञात हो चुका है।
श्री जम्भेश्वरजी ने ये नियम एक-एक करके अलग-अलग गिनाये हैं। केवल इतना ही कह देते हैं कि सभी प्रकार की नशों वाली वस्तुएँ त्याज्य हैं। यह संभव था, किन्तु एक-एक गिनाने से, बार-बार दोहराने से नियम पालन करने में दृढ़ता आती है। इशारे द्वारा अलग-अलग बतलाने से इनका महत्व बढ़ जाता है।
उनतीसवाँ नियमः- लील न लावे अंग, देखते दूर ही त्यागे। नीले रंग का वस्त्र धारण न करें। हमारा शरीर प्रकृति से बना हुआ है, प्राकृतिक ही हम सेवन करें वही हमारे लिए ठीक तथा अनुकूल भी है।
मानव प्रकृति में विकृति पैदा करके नील का निर्माण करता है। उससे शरीर को लड़ना पड़ता है। उस लड़ाई में हमारी शक्ति व्यर्थ में व्यय होती है। हमारी प्रकृति के प्रतिकूल विष होता है। विष हमारे शरीर को मार देता है। वह विष नील रंग का होता है।
शिवजी ने विषपान किया था, जिससे कंठ नीला हो गया। हम लोग नीले वस्त्र धारण करेंगे, तो हमारी गति भी अच्छी नहीं होगी। शिवजी ने तो विष को पचा लिया था किन्तु हम पचा नहीं पायेंगे। पूर्णरूपेण यदि नहीं मरेंगे तो भी मरे हुए जैसे तो अवश्य ही हो जायेंगे। जीवन में कुछ भी सार नहीं होगा। जीवन के सुख से रहित हो जायेगा।
बाल्मीकि रामायण में कथा आती है कि त्रिशंकु को वशिष्ठ के पुत्रों ने शाप दिया-कि तुम चाण्डाल हो जाओ। राजा चाण्डाल हो गया-
अथ रात्र्यां व्यतीतायां, राजा चण्डालतां गतः।
नील वस्त्रो नील पुरुषो, ध्वस्त मूर्धजः।
चित्य माल्यांग रागश्च, आयसा भरणो अभवत्।
त्रिशंकु राजा चाण्डाल हो गया। उसके वस्त्र नीले रंग के हो गये। सिर नीचे झुक गया। आभूषण लोहे के हो गये। रंग काला एवं कद ठिगना हो गया। यह नील रंग चाण्डालता को प्राप्त करवाता है। अनेक शास्त्रों ने नील वर्जित किया है। नीला वस्त्र पहन करके यज्ञ में आहुति देने पर देवता ग्रहण नहीं करते। दान-पुण्य किया हुआ सफल नहीं होता। इत्यादि अनेक प्रकार से नीला वस्त्र वर्जित है। नीला वस्त्र सूर्य की गर्मी को आकर्षित करता है। शरीर में जलन पैदा कर देता है। अनेकों प्रकार की बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए इस देश में रहने वालों को नीला वस्त्र धारण नहीं करना चाहिये।
नीला वस्त्र राक्षसी पहनावा है। जैसा हमारा बाह्य परिवेश होगा, वैसी ही हमारी आन्तरिक वृत्तियाँ कार्य करेगी। नीला वस्त्र पहनने से राक्षसी वृत्ति जाग्रत होगी, तो पाप कर्म करने में सुविधा होगी। इसलिए इस प्रकार के लोग नीला वस्त्र ही पहनना पसंद करते हैं। देवी वृत्ति वाले नीला वस्त्र पहनना पसंद नहीं करते हैं, क्योंकि देवभाव उनमें रहता है। वे लोग वैसा वस्त्र सफेद, पीला, भगवां आदि पसन्द करते हैं। उन्हीं से उनकी वृत्ति विकास को प्राप्त होती है। इसलिए शुभ कार्य करने वालों के लिए नीला वस्त्र नहीं पहनना चाहिए।
भक्त समाज का अपना एक अलग पहनावा है। रहन-सहन, व्यवहार आदि विचित्र ही होता है। अलग से पहचान हेतु श्री गुरुदेव ने बिश्नोई भक्त समाज से कहा कि आप लोग नीले रंग के वस्त्र न पहनें क्योंकि आपकी वृत्ति दैवी है। कहीं राक्षसी वृत्ति पुनः नहीं बन जाये। प्रकृति के साथ जीओ, तुम्हारा जीवन सुखमय होगा।
जीआ ने युक्ति और मुवा ने मुक्ति देने वाले ये उनतीस नियम श्रीदेव जाम्भोजी ने अपने मुख से बतलाये हैं। इन्हीं नियमों की वजह से यह बिश्नोई पंथ चला। ये नियम सदा एक रस रहने वाले स्थायी है। युगों-युगों से चलते आये हैं और आगे भी चलते रहेंगे। इस प्रकार से नियम बतलाकर बिश्नोई पंथ की स्थापना की।
वील्होजी उवाचः- हे गुरुदेव! आपके श्रीमुख द्वारा बिश्नोई पंथ स्थापना की वार्ता सुनी। उनतीस नियमों को भी ध्यानपूर्वक श्रवण करके हृदय में धारण किया। यह पंथ है, जो भी इस पंथ-मार्ग में चलेगा, वही पहुँच जायेगा। किन्तु अब आगे अन्य भी कुछ श्रवण करने योग्य है, जो आप मुझे अवगत करवायें, आपकी महत्ती कृपा होगी।
नाथोजी उवाचः- हे शिष्य! श्री सिद्धेश्वरजी ने उनतीस नियमों के अतिरिक्त भी बहुत से शब्द सुनाये हैं। उन शब्दों को मैं तुम्हें धीरे-धीरे बतलाऊँगा। जब बालक जन्म लेता है और तीस दिन के पश्चात् सूतक निका4ते समय जाम्भोजी महाराज द्वारा नियुक्त किये गये थापन (पुरोहित)द्वारा घर में हवन किया जाता है। हवन के पश्चात् कलश पूजा एवं पाहल किया जाता है। पाहल उस बच्चे एवं माँ के लिए सूतक निकालने के लिए किया जाता है। पाहल मंत्र कलश पूजा मंत्र तो मैंने तुम्हें पहले ही बतला दी है। पाहल द्वारा बालक को बिश्नोई बनाया जाता है। जन्म से बिश्नोई नहीं होता है। संस्कार द्वारा बनाया जाता है। कहा भी है-
जन्मना शुद्रो अजायत, संस्कारात् द्विज उच्यते। जन्म से तो सभी शूद्र होते हैं। संस्कार से द्विज यानि दूसरा जन्म होता है। दूसरे जन्म हेतु श्रीदेवजी ने मंत्र का उच्चारण किया है उस मंत्र द्वारा पाहल जल अभिमंत्रित करके बालक को तीन बार पिलाया जाता है। तीन बार ही मंत्र का उच्चारण किया जाता है। वह मंत्र इस प्रकार से हैं-
बालक मंत्र ओ३म् शब्द गुरु देव निरंजन, ता इच्छा से भये अंजन।
पांच तत में जोत प्रसनु, हरि दिल मिल्या हुकम विष्णु।
हरि के हाथ पिता के पिष्ट, विष्णु माया उपजी सिष्ट।
सप्त धात को उपज्यो पिण्ड, नौ दस मास बालो रह्यो अघोर कुण्ड।
अरध मुख ता उरध चरण हुतास, हरि कृपा से भया खलास।
जल से न्हाया त्याग्या मल, विष्णु नाम सदा निरमल।
विष्णु मंत्र कान जल छुवा, गुरु फुरमाण बिश्नोई हुवा।
बालक को इस मंत्र द्वारा क्या दिया जा रहा है, यह विचारणीय है। जल के साथ यह मंत्र पिलाया जाता है। जिसका भाव इस प्रकार से है-हे बालक! ओम् शब्द ही गुरुदेव निरंजन परमात्मा है। ओम् शब्द ही सृष्टि के पालन-पोषण उत्त्पति एवं संहारकर्त्ता विष्णु है। उसकी इच्छा से ही हे बालक! तुम्हारी उत्त्पति हुई है। तुम्हें यह मानव शरीर प्राप्त हुआ है।
वह विष्णु ज्योतिस्वरूप से पाँच तत्त्वों में विद्यमान है। उन्हीं पाँच तत्त्वों से तुम्हारा शरीर निर्मित हुआ है। हरि कृपा एवं आज्ञा से ही जन्म होता है। वही तुम्हारा पिता है। उसे भूल मत जाना। यही तुम्हारा मूल एवं बीज है। जब तुम गर्भवास में थे, तभी तुम्हारा ऊपर हरि का हाथ था। वहाँ पर भी तुम्हारी भोजनादि से रक्षा की थी। तुम्हारे शरीर तो तुम्हारे लौकिक माता पिता से मिला है। किन्तु अन्य सभी कारण वही तुम्हारा परमात्मा विष्णु है।
केवल तुम्हीं 1केले सृष्टि में जन्मे हो, ऐसा भी नहीं है। यह सम्पूर्ण सृष्टि ही विष्णु की माया से उत्पन्न हुई है। यह तुम्हारा शरीर तो सप्त धातुओं से उत्पन्न हुआ है। सप्त धातु जैसे-त्वचा, रक्त, माँस, मेदा, मज्जा, अस्थि और वीर्य। इन्हीं सभी को मिलाकर एक शरीर बना है। ये भी पाँच तत्त्वों के ही रूप हैं।
नौ-दस महीनों तक बालक गर्भवास में रहा था। गर्भवास का दुःख अघोर नर्क की भांति अति दुःखदायी है। हे बालक! ऐसा उपाय करना ताकि पुनः इस अघोर कुण्ड में आना न पड़े। गर्भवास में था, तब तो नीचे मुख, चरण ऊपर थे। उल्टा लटका हुआ था। हरि की कृपा से ही बाहर आया है। जन्म लिया है।
इस समय तुम्हें तीस दिन हो चुके हैं। तुमने स्नान कर लिया है। मल को त्याग चुके हो। यह तुम्हें विष्णु का नाम कानों से सुनाया जा रहा है। जल-पाहल एवं मंत्र तुम्हें पवित्र कर देगा। सदा-सदा के लिए तुम्हें जन्म-मरण से छुटकारा दिला देगा। इस विष्णु मंत्र द्वारा कानों को जल से छुवा दिया है। गुरुदेव निरंजण द्वारा कहा हुआ यह मंत्र तुम्हें बिश्नोई बना देगा, अर्थात् जन्म मरण के चक्कर से छुड़वा देगा। अब तुम्हें फिर से जन्म इस प्रकार से नहीं लेना पड़ेगा।
नवजात शिशु को यह मंत्र सुनाया जाता है। जल पाहल दिया जाता है। अभी तो वह बिल्कुल शुद्ध पवित्र ब्रह्मस्वरूप ही है। जो भी संस्कार अन्दर डाला जायेगा, वह स्वतः ही ग्रहण होगा। बालक ज्यों-ज्यों बढ़ता जायेगा, त्यों-त्यों अनेकों प्रकार की व्याधियों से भरता जायेगा। इसलिए यह प्रथम संस्कार इसी प्रकार से करणीय है।
नाथोजी उवाचः-हे शिष्य! इस बालक मंत्र के पश्चात् जब बालक समझदार हो जाता है। लगभग दस- बारह वर्षों का, तब उसे सुगरा मंत्र सुनाया जाता है। इसे सुगरा संस्कार कहते हैं। अनादि काल से ही गुरु धारण करने की परम्परा चली आयी है। राम-कृष्ण अवतारी पुरुषों ने भी गुरु धारण किया था। स्वयं जाम्भोजी ने संभवतः गोरख यति को गुरु माना हो, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। क्योंकि वे स्वयं ही गोरख का नाम बड़े ही आदर से लेते हैं-जुग छतीसूं एके आसन बैठा बरत्या। छत्तीस युग एक आसन पर बैठे व्यतीत हो गये।
गुरु बिना ज्ञान नहीं होता, ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं होती। प्रथम शब्द में ही श्री देवजी ने गुरु की महिमा बतलाई है। गुरु से श्रद्धावान ही ज्ञान की प्राप्ति कर सकता है। इसलिए सुगरा संस्कार करवाया जाता है। बालक को गुरु मंत्र दिया जाता है। साथ ही साथ हवन पाहल भी किया जाता है। गुरु भी कैसा हो, यह भी बतलाया है-
जो स्वयं मोह माया के कीचड़ में फंसा हुआ है, वह भला क्या शिष्य को पार उतारेगा? गुरु स्वयं ज्ञानी, ध्यानी, यति हो, तब उसका दिया हुआ मंत्र सफल होता है। कहा भी है- जिंहि जोगी की सेवा कीजे, तूठो भवजल पार लंघावे। इसलिए श्री देवजी ने विरक्त यति साधु को ही गुरु मंत्र देने का अधिकार दिया है। दिया जाने वाला गुरुमंत्र इस प्रकार से है-
गुरु दीक्षा मंत्र (सुगरा मंत्र)
ओ३म् शब्द गुरु सुरत चेला, पाँच तत्त्व में रहे अकेला।
सहजे जोगी शून्य में बास, पाँच तत्त्व में लियो प्रकास।
ना मेरे माई ना मेरे बाप, अलख निरंजन आपही आप।
गंगा यमुना बहे सरैवती, कोई कोई न्हावे बिरला जती।
तारक मंत्र पार गिराम्म, गुरु बतायो निश्चय नाम।
जे कोई सुमिरै उतरे पार, बहुरि न आवे मैली धार।
यह गुरु मंत्र जब साधु-गुरु सुनाता है तो बालक समझ की तरफ तेजी से बढ़ता है। उसके मन में अनेक जिज्ञासाएँ खड़ी होती है। जो भी उसे दिया जायेगा, वह उसका अमर धन होगा। ऐसी अवस्था में उसे यह सुगरा मंत्र ही देना चाहिये। इस मंत्र के अन्दर बहुत कुछ समाया हुआ है। यह केवल मंत्र ही नहीं है, उच्च कोटि की साधना भी है। जो सहज में ही की जा सकती है। इस मंत्र के बारे में थोड़ा विचार कर लेना चाहिये।
ओम् शब्द ही गुरु है। सुरति ही चेला है। यही गुरु और चेले का शाश्वत सम्बन्ध है। ओम् ईश्वर का नाम है। वह ईश्वर ही गुरु हैं और सुरति अर्थात् जीवात्मा ही चेला है। यह जीवात्मा चेला तभी है, जब ओम् शब्द से सम्बन्ध स्थापित कर ले। उसे एक क्षण भी भूले नहीं। अन्यथा गुरु कहीं, चेला कही। कोई अर्थ नहीं है। न ही वह चेला बन सका है। इससे आगे मंत्र में कहा है कि-
तुम इन पाँच तत्त्वों से भिन्न अकेले हो। क्योंकि तुम्हारा सम्बन्ध तो ओम् गुरु से है। पाँच तत्त्वों का सम्बन्ध तो केवल शरीर से ही है। यदि इस प्रकार का सम्बन्ध गुरु से जोड़ लिया जाय तो तुम सहज ही में योगी हो। किसी प्रकार के प्रयत्न की आवश्यकता नहीं है। संसार में रहते हुए भी तुम्हारी वृत्ति सुरति शून्य में ही रहेगी। वह शून्य ही ओम् की ध्वनि है। वही गुरु है, उन्हीं में तुम सदा रमण करोगे।
पाँच तत्त्वों में तुम्हारा ही प्रकाश विद्यमान है। तुम स्वयं ब्रह्मस्वरूप हो। ब्रह्म का ही अचेतन पाँच तत्त्वों में चेतनता रूपी प्रकाश है। न तो इस आत्मा के माता हैं और न ही पिता हैं। केवल शरीर के तो अवश्य ही माता-पिता हैं। आक्रमा अलख निरंजन स्वयं अपने आप में ही स्थित है। न कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है। अलख निरंजन निर्लेप, अगोचर ब्रह्म रूप है। ऐसा ही इसे समझें।
इसी मानव शरीर में ही गंगा, यमुना, सरस्वती तीनों पवित्र नदियाँ बहती हैं। किन्तु उनमें स्नान कोई बिरला यति ही करता है। मनुष्याणां सहस्रेषु हजारों मनुष्यों में कोई एक। ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् समाधि अवस्था में जो आनन्द की प्राप्ति होती है, वह त्रिवेणी में स्नान है। तुम्हारा तिलक लगाने का स्थान त्रिकुटि कहा जाता है। इसी त्रिकुटि में ही तीनों का संगम होता है। त्रिकुटि में ध्यान करने से ज्योति आनन्द एवं ज्ञान इन तीनों की प्राप्ति होती है। वही योगी का लक्ष्य है। हे बालक! तुम्हें भी वही आनन्द ज्ञान एवं तेज की प्राप्ति करनी है। हे शिष्य! यह मंत्र तारक है। संसार सागर से पार उतारने वाला है। गुरु ने निश्चय करके बतलाया है। इसका श्रद्धा एवं विश्वास से स्मरण एवं साधना कर ले। जे कोई भी स्मरण करेगा, वह संसार सागर से पार उतर जायेगा। उस परम पद को प्राप्त कर लेगा। जहाँ से वापिस लौटकर नहीं आयेगा। इस प्रकार से यह सुगरा मंत्र गुरुदेव ने सुनाया है।
तीसरा मंत्र-संन्यास मंत्र है। जब कोई संन्यस्त होना चाहता है, तब यह मंत्र सुनाया जाता है। गुरु महाराज ने कहा है-
कोड़ निनाणवे राजा भोगी, गुरु के आखर कारण जोगी
माया राणी राज तजीलो, गुरु भेटीलो जोग सझीलो।
एक या दो नहीं, जब से सृष्टि रची गयी है, तभी से ही निनाणवे करोड़ राजा योगी हो गये। संन्यास धारण करके माया राणी राज को त्याग दिया। वन में तपस्या करके शरीर को सुखा दिया। शरीर की कुछ भी परवाह न करते हुए अपने कार्य में संलग्न रहे।
चार अवस्था में मानव जीवन को बांटा है। प्रथम अवस्था ब्रह्मचारी, जो पच्चीस वर्ष तक की है। उसके पश्चात् पचास वर्ष तक गृहस्थ आश्रम है। तीसरा वानप्रस्थ आश्रम पचहतर वर्ष तक का है और चौथी अवस्था सन्यास सौ वर्ष तक की है। इसलिए सन्यास लेकर के परोपकार कार्य एवं साधना में संलग्न होना चाहिये। स्वयं यतीश्वर ने संन्यास धारण किया था तथा अपने शिष्यों को संन्यास में दीक्षित किया था। उन दीक्षित शिष्यों में हे वील्हा! मैं भी एक हूँ। जो तुम्हें दीक्षित करके इस पंथ को आगे बढ़ाया है। तुम्हें भी इस परम्परा को आगे बढ़ाना है तथा इस गुरु मंत्र को देकर सन्यास में दीक्षित कर लेना है।
साधु (गुरु) दीक्षा मंत्र
ओ३म् शब्द सोहं आप, अन्तर जपै अजप्या जाप।
सत्य शब्द ले लंघे घाट, बहुरि न 1ावे योनी वाट।
परसे विष्णु अमृत रस पीवै, जरा न व्यापे, युग युग जीवै।
विष्णु मंत्र है प्राणाधार, जो कोई जपै सो उतरे पार।
ओ३म् विष्णु सोहं विष्णु, तत स्वरूपी तारक विष्णु।
गुरु जब किसी नये व्यक्ति को साधु दीक्षा देता है, भगवाँ वस्त्र धारण करवाता है, तो यह उपर्युक्त मंत्र सुनाता है। ऐसी ही परम्परा श्री गुरु देवजी ने बतलायी है। हवन पाहल के साथ ही साथ यह मंत्र सुनाकर उसे साधना में रत होने के लिए तैयार करता है। मंत्र एवं साधना दोनों ही इस मंत्र में विद्यमान हैं। इसलिए यह विचारणीय है कि क्या साधना हमारे साधु विरक्त समाज को दी है।
ओम् शब्द ही आत्मा है। जो यह ब्रह्म है, वह मैं ही हूँ। ऐसा ही स्मरण जप करें। उसी का ही साक्षात्कार करें। जिसका साक्षात्कार किया जावेगा, वह मैं ही हूँ। इसलिए अपने स्वरूप में स्थित होना ही अन्तिम लक्ष्य एवं साधना है। बाह्य दिखावा न करें। केवल अजप्या जाप, श्वांसों ही श्वांस स्वतः ही स्मरण चलता रहे। किसी भी क्षण उसे भूलें नहीं। यही परम साधना, ध्यान एवं पूजा है। यही साधना यति, साधु, संन्यासी के लिए बतलायी है।
सत्य शब्द ओम् ही है। इसे ही लेकर संसार सागर से पार उतर सकते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य उपाय नहीं है। सत्य शब्द लेकर संसार सागर से पार उतर जाने का अर्थ है कि बार बार माँ के गर्भ में नहीं आना पड़ेगा। सदा-सदा के लिए मुक्त हो जायेगा। विष्णु का दर्शन स्पर्श इस मन्त्र द्वारा करे। इसी मार्ग को पकड़कर विष्णु का साक्षात्कार करें। जो आपकी आत्मा रूप से विद्यमान है।
जब आपको विष्णु का दर्शन स्पर्श हो जायेगा, तो उस अद्भुत अमृत रस की प्राप्ति होगी जो अब तक आपने नहीं चखा है। उस महान् आनन्द की प्राप्ति होगी। संसार में कहीं भी किसी भी विषय में वह आनन्द दृष्टिगोचर नहीं होता। इस प्रकार से अमृत की प्राप्ति हो जाने से आपको बुढ़ापा नहीं अयेगा और न ही आप मृत्यु को प्राप्त हो सकोगे। कहा भी है-
कलियुग दोय बड़ा राजिन्दर, गोपीचन्द भरथरियो जीवनै।
ऐसे लोग अमृत का पान करके अमर हो गये। यह विष्णु मंत्र ही प्राणों का आधार है। हमारे प्राण चलते हैं। हमारा जीवन सुचारू रूप से उन्हीं विष्णु की कृपा से ही चलता है। जो भी जप करेगा वह संसार सागर से पार उतर जायेगा। ओम् ही विष्णु है, विष्णु ही ओम् है। इनमें कुछ भी भेद नहीं है। मैं भी विष्णु हूँ। आप भी विष्णु हैं। यह आत्मा जिसे मैं नाम से कहा जाता है, वह विष्णु ही है। इस संसार में जो भी तत्त्व है वह विष्णु ही है। अन्य सभी कुछ तो मिथ्या ही है।
इस संसार में शरीर धारी जीव को संसार सागर से पार उतारने वाले भी विष्णु ही हैं। इसलिए जप विष्णु का करें। शरण विष्णु की ग्रहण करें। क्योंकि विष्णु सभी की आत्मा हैं। ओम् की ध्वनि उच्चारण करें, वह भी विष्णु ही है। इस प्रकार की शब्द साधना साधु को दी जाती है।