दसवां अध्याय · कथा 74
ऊदै अतली की साधु सेवा
हे वील्ह! अब आगे मैं तुझे ऊदो अतली के पवित्र साधु सेवा के भाव की कथा सुनाता हूँ। सुनो! मेड़ताटी के पंडवाला गाँव में ऊदो एवं अतली दोनों दम्पती रहते थे। ये दोनों दम्पति कर्तव्य कर्म का निर्वाह करते हुए पुण्य का संचय कर रहे थे और पाप को नजदीक भी नहीं आने देते थे। नित्य क्रिया स्नान संध्या हवन आदि नियम पूर्ण रूपेण निभाते थे। अतिथि सेवा हेतु घर में घी, दूध, दही, अन्न की कोई कमी नहीं आती थी। कोई सुभ्यागत आ जाता, तो उसे प्रेम से भोजन आदर-सम्मान देते थे। विष्णु की भक्ति एवं भक्त का विचार जानते थे। क्योंकि विष्णु ही सम्पूर्ण सृष्टि के पालन पोषण कर्ता हैं। हम विष्णु इतना तो नहीं कर सकते, किन्तु आगन्तुक अतिथि की सेवा तो कर ही सकते हैं। विष्णु की भक्ति को क्रियात्मक करना ऊदो अतली जानते थे। चार धर्म धारण करते थे। धैर्य, संयम, सत्य एवं सद्गुरु विष्णु से एकता। विष्णु की महिमा जानते थे। क्योंकि सभी के पालन पोषण कर्ता हैं। उसी रूप में विष्णु का स्मरण, साधु सेवा में लीन थे। उन्हें तो केवल भक्ति से ही प्रयोजन था। जिस दिन कोई संत सुभ्यागत घर में नहीं आता था, उस दिन दुःखी हो जाते थे। आज कुछ भजन पुण्य बना नहीं। हमारा दिन व्यर्थ में ही चला गया। ऊदो अतली जब कोई मेहमान न आते, तो चिंतित हो जाते कि आज हमारा नियम भंग हो गया। विचाद्भ करने लगे- हम लोग यहाँ पंडवाले गाँव में रह रहे हैं, किन्तु यहाँ तो एकांत है। इधर किसी का आना जाना नहीं होता। इसीलिए हम लोग इस गाँव को छोड़कर वहाँ पर जाकर बसेंगे, जहाँ पर जमात के लोग ज्यादा रहते हैं। कोई न कोई संत वहाँ पर अवश्य ही आयेगा। हमें सेवा का सुअवसर प्राप्त होगा। ऐसा विचार कर के पंडवालो गाँव छोड़ दिया। बड़ी खुशी एवं आशा के साथ पंडवालो गाँव छोड़ कर हिंगुणियें गाँव में जा कर बस गये।
वहाँ आकर बसने का कोई दूसरा कारण नहीं था। केवल संत सेवा करना ही था। वहाँ हिंगुणियें में पहले ही बिश्नोई बसते थे। वे भी अतिथि सेवा करने में चौकस थे। सदा ही गाँव के लोग सावधान रहते थे। कभी चार पाँच अतिथि आते तो बाँट कर ले जाते। चार बासों में बसने वाले बिश्नोई तथा पाँचवाँ वास में ऊदो अतली आकर बसे थे। ऊदो अतली को तो पाँचो में एक ही मिलता। चारों को तो चारों मुहल्ले वाले ले जाते। कभी दस सुभ्यागत आ जाते तो दो ही मिलते। इस प्रकार से कुछ महीनों तक चलता रहा।
एक दिन अतली कहने लगी-हे पति देव! इस गाँव में आकर बसने में भी कोई लाभ नहीं मिला। हमें तो संत भक्तों की सेवा करनी है। यही हमारा उद्देश्य है। हमें यहाँ भी नहीं रहना चाहिए। जहाँ पर हमारा धर्म पूर्णतया निभ सके, वहीं जाकर रहना उत्तम है। हिंगुणिये से भी ऊदो अतली चल पड़े और सम्भराथल के पास ही कूदसूं गाँव में आकर बस गए। सम्भराथल से जाम्भोलाव आने-जाने वाले भक्तों के मार्ग में पड़ता है। सेवा का अच्छा अवसर प्राप्त होगा। बहुत ही लोगों का आना-जाना होगा। हमारे यहाँ रुकेंगे। हमें सेवा का अवसर प्राप्त होगा। यही विचार करके कूदसूं में बस गये। यहाँ बसने में बड़ी खुशी हुई कि यह खर्च करने की जगह उत्तम है। यहाँ से आने-जाने वाले सभी सुभ्यागत जाम्भोजी के शिष्य हैं।
आस पास में ऊदो अतली ने जो देखा और जो सुना, उससे कुछ श्रद्धा भाव में कमी आने लगी। कुछ लोग साधु भक्तों की आलोचना करते थे। उनके गुणों में भी दोष निकालते थे। गुण-दोष तो सभी में ही होते हैं। किन्तु अपना अवगुण ही दूसरों में सहज ही दीखता है। संगति का फल अवश्य ही लगता है। साधु- सन्तों की आलोचना दोष सुनते-सुनते ऊदो अतली के दिल में भी कठोरता आ गयी। वह पहले वाला भाव श्रद्धा नहीं रही। पहले तो सदा ही प्रतीक्षा करते थे कि आज कोई भगवान् का भक्त आयेगा। हम उनकी सेवा करेंगे तो वह भगवान् की ही सेवा होगी, किन्तु इस समय इस गाँव में आने के बाद तो केवल दिखावा ही रह गया था।
भोजन तो करवाते थे, स्वागत भी करते थे, किन्तु केवल देखा देखी। बिना भाव के ही सेवा कर रहे थे। जब प्रेम भाव घट गया, तो धीरे धीरे अतिथि- मेहमान भी घटते गये। ऐसा होने पर भी उन्हें किसी प्रकार की तड़पन नहीं हुई कि क्या बात है? आजकल सुभ्यागत आते क्यों नहीं? धीरे-धीरे प्रेम भाव घट गया तो अतिथि भी आने बंद हो गये। जब अतिथि नहीं सेवा नहीं तो अन्न भी नहीं। एक दिन वह दशा भी आ गयी, घर में दाना भी नहीं बचा। खेती तो करते थे, किन्तु खेती सामने न आकर पीठ दिखा जाती। जितना बीज बोते थे, उतना ही पूरा नहीं हो पाता था। ऐसी विपत्ति की दशा में दम्पति ने फिर से विचार किया कि क्या किया जावे? इस गाँव में जब से आकर निवास किया है, तभी से अन्न, धन सभी कुछ समाप्त हो गया है। यहाँ रह कर अब करना भी क्या है? ऐसा विचार कर के कुदसूं से भी चल पड़े। ऊदो अतली ने कूदसूं से आकर खीचियासर गाँव में निवास किया। जिस दिन से खींचियासर में निवास किया था, उस दिन से तो और अधिक भूख आ गयी। अन्न की बुवाई करते, किन्तु कुछ भी उपज नहीं हो रही थी। एक तो अन्न धन का अभाव, दूसरा शरीर में वृद्धावस्था झलकने लगी थी। पहले तो जब धन, युवा अवस्था से सम्पन्न थे, तब तो सभी प्रेम से मिलते थे, किन्तु अब तो सभी छोड़ कर चले गए। कोई बात ही नहीं करता था। सत्य है कि जिसको अपना कहते हैं, वे भी अन्न धन हीन व्यक्ति से परहेज करते हैं। उनसे बात करना भी पसंद नहीं करते। सभी धन के ही साथी हैं। अन्न की कमी से दोनों दुःखी हो गए। कोई भूला-भटका साधु भक्त आ भी जाये वो भी बिना अन्न धन के सेवा भी कहाँ से करें? ऐसा क्यों हुआ? बात कुछ भी समझ में नहीं आ रही थी।
ऊदो अतली प्रार्थना करने लगे-हे कर्ता! अब हम क्या करें? हमारे साथ ऐसा क्यों हुआ? अब तो आप ही हमारे रक्षक हो। प्रार्थना की भाव दशा में ऊदो अतली सम्भराथल पर श्रीदेवजी के निकट पहुँचे और हाथ जोड़ कर कहने लगे-हे देव! हमने कौन सी भूल की है? जिससे हमें दण्डित किया जा रहा है? हम पंडवाले बसते थे, तब तक तो सभी कुछ ठीक था। वहाँ से हम लोग सेवा भावना से हिंगुणिये आए थे वहाँ पर भी अन्न-धन की कमी नहीं आयी। किन्तु जब से कुदसूं एवं खींचियासर आकर बसे हैं, तभी से घाटा दिनोंदिन बढता ही गया।
ऊदोजी कहने लगह्य- मैंने तो कभी भी देने में संकोच नहीं किया। यदि अतली ने नारी स्वभाव की वजह से कुछ कमी की है, तो आप ही जानो। अतली कहने लगी- हे देव! हमने तो जब तक घर में अन्न धन था, तब तक देने में आलस नहीं किया। जब घर में कुछ नहीं होगा, तब मैं कहाँ से दूँगी। बाकी तो आप स्वयं अन्तर्यामी हैं, आप ही हमारी भूल को जानते हैं।
अतली कहने लगी- हे देव! इस समय तो अन्न का अभाव है। यह टोटा आप मिटा दो तो हम कुछ करने में समर्थ हो सकते हैं। भूखों को ज्ञान, ध्यान की बात कुछ भी समझ में नहीं आती। केवल भोजन ही याद आता है। सुभ्यागत सेवा तो बहुत ही दूर की बात है।
श्री देवजी ने कहा-आप लोग पारवे गाँव जाकर बसो। वहाँ पर खेती करो। अन्न की कमी नहीं रहेगी। प्रेम से खेती करोगे, तो बहुत ही निपजेगा। जाम्भोजी की बात स्वीकार करके ऊदो पारवे गाँव जाकर बस गए। मन में अन्न की आशा अधिक ही थी।
अतली कहने लगी-अब तो सद्गुरु जाम्भोजी की कृपा हो गयी है जाओ खेती करो अन्न बहुत होगा, पहले की तरह अन्न का टोटा नहीं रहेगा। ऊदो अतली ने पारवे आकर खेती करी। खेती लहलहा उठी, मोठ, बाजरी, तिल आदि अत्यधिक हुए अन्न का टोटा मिट गया। घर में गायें दूध देने वाली बढ गयी। अन्न धन घी दूध दही आदि के भण्डार भर गये। अन्न से सभी कोठे भर गये थे। सभी कुछ प्राप्त हो गया था। जैसा चाहते थे वैसा ही हुआ।
ऊदो अतली मन में सोच विचार करते। सद्गुरु की कृपा से अन्न धन से घर भर गया। रखने को भी जगह नहीं है। किन्तु इस धन से करें भी क्या? कोई सुभ्यागत तो घर में आता ही नहीं है। किसको जिमायें? कहाँ खर्च करें? रात दिन सुभ्यागत आने की प्रतिक्षा बनी रहती थी, किन्तु कभी कोई आया ही नहीं। अपने से रहमान स्वयं ही रूठ गए हैं।
अतली कहने लगी- अपन दोनों ही सद्गुरु के पास सम्भराथल पर चलते हैं। उन्हीं से क्षमा माँगते हैं। वही कृपा करेंगे, तो ही हमारा धन सुपात्र के लिए खर्च होगा। ऐसा विचार करके सम्भराथल पर दम्पति पहुँचे। दोनों प्रीतम जी के पास आये। चरणों में अरदास करते हुए कहने लगे-हे देव! आपने दया की थी, तब हमें धन की प्राप्ति हुई है। किन्तु कोई सुभ्यागत तो आया ही नहीं। हम धन से क्या करें? श्री देवजी ने कहा-हे उधव! मेरी बात सुनो। संसार में निर्धन को धन ही अच्छा लगता है। जब तुम निर्धन थे तो धन ही तुमने माँगा था। वह तुम्हें मिल ही गया। सुभ्यागत तुमने कहाँ माँगे थे। बिना माँगे कुछ कैसे मिलेगा? जब से तुम्हारा सेवा भाव घटा था, तभी से तुम्हारा धन घटता गया। अब तुमने धन माँगा था तो धन मिल गया और यदि तुम्हें सेवा का भाव अब जग गया है, तो सेवा का अवसर दिया जायेगा। श्री देवजी के कहने पर अतली धन खर्चने के लिए तैयार थी। श्री देवजती ने कहा-गंगा पार से बिश्नोइयों की जमात यहाँ आयी हुई है। ये सभी सुपात्र हैं। इन्हें तुम निमंत्रण देकर ले जाओ। इनकी सेवा में अपने धन का सदुपयोग करो। ऊदो अतली ने बिश्नोइयों की जमात को निमंत्रण दिया और श्री देवजी से भी उनके साथ ही चलने का आग्रह किया। किन्तु आगे केवल जमात ही पारवे पहुँच गयद्ध थी।
ऊदो अतली ने मूँग, मोठ, बाजरी, घी, दूध, दही आदि का भोजन तैयार किया। बड़े ही प्रेम से जमाती के लोगों को सुपात्र मान कर भोजन दिया। जाम्भोजी के द्वारा भेजे गए भक्तों को जाम्भोजी का ही स्वरूप मान कर ऊदो अतली सेवा में तल्लीन हो गये। जमात भोजन करती, अखंड घृत धारा चलती। जब तक ना नहीं करते, तब तक घृत की धारा बंद नहीं होती। धन खर्च करने में अतली को खुशी होती। सुपात्र साधु जन भोजन करते। ऊदो स्वयं अपने हाथ से पंखा करते। अतली घी स्वयं अपने हाथ से देती थी।
“अतली के होती आखड़ी, नैकारे विना न रह खड़ी” धन खर्च करते समय अतली का हृदय धड़कता नहीं था। क्योंकि अतली ने यह निश्चय कर लिया था कि मेरा कुछ भी नहीं है। जो कुछ है वह परमात्मा का है। उन्हीं का, उनके समर्पण है।
सम्भराथल पर विराजमान श्री देवजी ने देखा कि अतली सेवा में तल्लीन है। वह कहती है कि “अतली के होती आखड़ी, नैकारे विना न रह खड़ी” मैं अभी जाकर देखता हूँ कि अतली धन खर्च करने में कितनी दृढ है। जो यह कहती है कि वैसा करती है या नहीं? अतली का प्रेम-भाव श्री देवजी को खींच रहा था। सम्भराथल पर बैठे नहीं रह सके। और पारवा के लिए श्री देवजी प्रस्थान कर गये।।
जाम्भोजी ने अपना रूप वेश बदल दिया। भिखारी जैसा वेश बना लिया। अपनी काया को पलट कर कुरूप भी हो गये। जैसा वेश वैसा स्वरूप। क्योंकि अतली की परीक्षा करके उसकी महिमा को बढाना था। स्वयं सृष्टि के कर्ता आज ऊदो-अतली के घर पर पधारे थे। कपड़े लाल वर्ण के, वे भी फ टे हुए रूप कुरूप दिख रहा था। शरीर जीर्ण अवस्था को प्राप्त था। चलते हुए लड़खड़ा रहे थे। शरीर दुबला-पतला हिंयाँ दिख रही थीं। हाथ में भिक्षा पात्र लिए हुए जमाती के लोगों ने तथा अतली ने भी देखा नहीं था कि कोई भिक्षुक आ रहा है।
जमात भोजन कर रही थी। कई लोग भोजन करवा रहे थे। अतली घी दे रही थी। ऊदोजी पंखे से हवा कर रहे थे। सभी अपने अपने कार्य में लगे हुए थे। श्री देवजी विचित्र भिक्षुक रूप में आकर जिस बर्तन में भोजन बनाया था, उसी बर्तन का ढक्कन उघाड़ दिया और स्वयं ही मिष्ठान्न लेने लगे। उसी समय ही भोजन करने वाली जमात ने देखा और भीट्यो भीट्यो कहने लगे। यह अछूत लाल कपड़े वाला कहाँ से आ गया। हमारे भोजन को छू दिया। हम भोजन नहीं करेंगे। इस प्रकार से सभी कहने लगे। कुछ लोग अतली को धिक्कारने लगे कि तुमने हम को बुलाया ही क्यों था? यदि इस प्रकार से भोजन करवाना था तो।
अतली कहने लगी-हे मामा! आपने ऐसा क्यों किया? सम्पूर्ण जमात का कार्य बिगाड़ दिया। ये लोग अब आपका छुआ हुआ भोजन नहीं करेंगे। यदि आप को भोजन करना था तो मैं आपको प्रेम से भोजन परोसती। ऐसी अतली एवं जमात की रूखी बातें सुन कर वापिस मुड़ गये। अतली कहने लगी-सभी न्यात जमात नाराज हो गयी तो हो जावे, किन्तु इस पुरुष को तो मैं अपने ही हाथ से भोजन प्रसाद दूँगी, प्रेम से भोजन खिलाउँगी। हे महाराज! आप नाराज न होइए। अपना पात्र दीजिए। मैं आपको भोजन देती हूँ। मैंने बहुत प्रतीक्षा की, किन्तु कोई आया ही नहीं। आज मैरा सौभाग्य है कि अब आप आये हैं। इस समय आप भूखे न जायें। यदि आप जैसे आये वैसे ही खाली चले गए, तो मेरा दिल टूट जायेगा।
श्री देवजी ने पतरी रख दी कि भोजन दे दो, यही संकेत था। अतली ने लप्सी से पतरी भर दी। और देवजी लेकर चल पड़े कि इतना ही मिलेगा। शायद अतली घी नहीं देगी। अतली ने आवाज लगाई मामा रुक भी तो जाओ। सभी भक्त लोग तो लप्सी घी के साथ जीम रहे हैं। आप बिना घी के कैसे जीमेंगे, यह कैसे हो सकता है? श्री देवजी ने पतरी वापिस रख दी, अच्छा घी भी दोगी? तो दे देवो। “अतली के होती आखड़ी, नैकारे विना न रह खड़ी” अतली घी की धारा पतरी में छोड़ने लगी। पत्र भी बढ़ता ही गया। घी का बर्तन भी खाली होने लगा। जाम्भोजी ना नहीं कहते कि अब बहुत हो गया बन्द करो। बिना ना किये अतली घी की धारा बन्द नहीं करती।
इस प्रकार से दोनों तरफ से परीक्षा होने लगी। इस परीक्षा में आखिर जीत तो अतली की ही हुई। पत्र भर गया, घी नीचे गिरने लगा था, किन्तु अतली ने धारा बंद नहीं की। तब श्री देवजी ने स्वयं ही ना कह कर घृत धारा ष्न्द करवायी। अतली ने पहचान लिया कि आज स्वयं त्रिलोकी नाथ हरि ही आ गये हैं। उनके बिना ऐसा होना असंभव है।
श्री देवजी ने कहा- अतली तुमने सेवा धर्म को अपनाया है और इसमें तू सफल हुई है। अब क्या माँगती है। जो कुछ माँगोगी वही मिलेगा। अतली ने कहा- हे दयानिधि देव! मैं आपसे क्या माँगूं, आपकी भक्ति, संत सेवा, जन्मों जन्मों तक चलती रहे। और यदि आप जन्म मरण मिटाना चाहते हैं, तो आप अपने स्वरूप में ही विलीन कर लीजिए। नर कुछ अन्य ही चिंतन करता है, किन्तु भाग्य देवता कुछ और ही कर देते हैं। हमारे करने से नहीं होगा, वह आपके ही आधीन है।
अतली सतगुरु सूं कहै, रोमावली को भार।
सो वो कहो कद उतरै, तुम ही कहो किरतार।।
अतली ने सद्गुरु से पूछा-हे देव! इस शरीर पर जितनी रोमावली हैं अर्थात् रोएँ हैं। उतने ही जन्मों के पाप भी साथ लगे हुए हैं। यदि ऐसा है तो यह बतलाओ कि वह पार कैसे उतरेगा। श्री देवजी ने शब्द सुनाया-
शब्द-119 ओ३म् विष्णु विष्णु तू भणरे प्राणी, पैंके लाख उपाजूं।
रतन काया बैकुंठे बासो, तेरा जरा मरण भय भाजूं।
हे अतली! तुम ठीक कहती हो किन्तु विष्णु विष्णु ऐसा जप करने से करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जायेंगे। जिस प्रकार से एक-एक पाप जुड़ते-जुड़ते पापों का ढेर हो जाता है, उसी प्रकार से एक-एक नाम जपते हुए नामों का ढेर हो जाएगा। तब उन पापों को जला कर भष्म कर डालेगा। जिस प्रकार से एक एक पैसा जुड़ते करोड़ों जुड़ जाते हैं। जिस प्रकार से लकड़ी घास के ढेर को अग्नि की चिनगारी भी जला डालती है, उसी प्रकार से ज्ञान रूपी अग्नि तुम्हारे पापों को जला कर भष्म कर देगी। तुम्हारा यह रत्न सदृश शरीर नाम जप के प्रभाव से बैकुण्ठ को वास करेगा। तुम्हारा बार-बार जन्म लेना और मरना सदा के लिए मिट जायेगा। केवल दो ही बड़े भय हैं, एक मृत्यु का दूसरा बुढापे का, ये दोनों ही मिट जायेंगे।