दसवां अध्याय · कथा 75
भक्त रतने का गुरु शरण में आना
हे शिष्य! अब मैं तुम्हे एक कथा जो गंगा के समान पवित्र करने वाली है, वह सुनाता हूँ। गाँव जांगलू में रतना राहड़ गुरु का भक्त बिश्नोई रहता था। उसने धर्म की बाड़ लगा रखी थी। साधु संतों की सेवा करता था। संतों को भोजन करवा कर के स्वयं भोजन करता था। नित्य नियम से जीवन पालन करने वाला रतना राहड़ था। रतना भक्त का विवाह बांवरलै गाँव में हुआ था। विवाह के पश्चात् दहेज देने के लिए रतने को बुलाया था। अच्छे तेज चलने वाले ऊँट पर पीलाण (काठी) मांड कर तैयार हुआ था। पीतल का बना हुआ सुंदर पिलाण, रेशम के घासिया शोभायमान हो रहे थे। ऊँट के पैरों में घुँघरू बाँधे गये थे।
स्वयं रतना श्वसुराल जा रहा था, इसीलिए अंगरखा पहना, कानों में कुंडल पहने। कमर में पेटी बाँध करके, आवश्यक शस्त्र लेकर ब्रह्ममुहूर्त में ही घर से रवाना होते हुए, प्रथम श्री देव जाम्भोजी को स्मरण किया और पश्चात् माता-पिता को प्रणाम किया। ऊँट को बिठाकर झटिति सवार होकर बांवरलै गाँव के मार्ग को पकड़ लिया।
एक कोश ही गाँव से दूर गया था कि उसी मार्ग से पैदल चलते हुए एक संत स्वाभाविक रूप से मिल गए। रतना संतों का भक्त था। इसीलिए ऊँट को बिठा दिया नीचे उतरा। संत चरणों में प्रणाम करते हुए रतना कहने लगा-
हे प्रभु! आओ इस ऊँट पर चढो। मेरा बड़ा सौभाग्य है कि आपके दर्शन हुए हैं। आप पैदल चल रहे हैं, थक गए होंगे। इसीलिए अपना हवन करने का घृत आदि सामान ऊँट के अगले आसन पर टाँग दीजिए और आप आगे बैठ जाइए। पीछे मैं बैठ जाऊँगा। संत कहने लगा-मैं तो गुड़ै गाँव जा रहा हूँ और तू अपने श्वसुराल जा रहा है। मैं तो अपनी इच्छा से धीरे-धीरे चलते हुए आठ-दस दिनों में आऊँगा। मेरे पास हवन आदि करने का सामान है। मैं आ जाऊँगा, तुम चलो। तुम्हें तो आज ही पहुँचना होगा। आगे तुम्हारी प्रतीक्षा हो रही है। मेरी प्रतीक्षा करने वाला कोई नहीं है। रतना कहने लगा-हे गुरु देव! मैं आप को आज ही पहुँचा दूँगा, गुड़ा गाँव मेरे श्वसुराल के पास ही है मेरे साथ चलो। वहाँ पर आपका तथा मेरा स्वागत होगा। खीर, हलवा आदि मिष्ठान्न भोजन होगा। रास्ते में आपको ऐसा भोजन कौन जिमाएगा? तथा गुड़े गाँव में भी ऐसा भोजन कहाँ मिलेगा? संत क द्ध सेवा करके मैं तथा मेरा परिवार आनंदित ही होगा। जब तक आप मेरे साथ चलने को तैयार नहीं होंगे, तब तक मैं भी यहाँ से एक कदम आगे नहीं बढूँगा। अब आप देरी न करें।
उस साधु ने भी भक्त का भाव देखा और हिम्मत कर के रतने के साथ ऊँट के अगले आसन पर अपना झोला झंडा टाँग कर चढ गए। रतने ने बड़े ही प्रेम से साधु को ऊँट पर चढा लिया। वह स्वाभाविक प्रेम ही था। न तो अभिमान ही था और न ही मान बड़ाई। बड़े बेग से ऊँट चला और यथा समय बांवरलै गाँव की सीमा में पहुँच गया।
आगे रतने के श्वसुराल वाले प्रतीक्षा कर रहे थे। ऊँ चे चढकर उत्तर दिशा की तरफ देख रहे थे। दूर से आते हुए एक ऊँट और दो उस पर सवार दिखाई दिए। एक के सिर पर पगड़ी तथा दूसरे के सिर पर टोपी थी। गाँव में प्रवेश करते हुए लोगों ने देखा, तो आश्चर्य हुआ कि पाहुणे के साथ साधु आया है। यह तो विचित्र बात थी। ऐसा तो कहीं देखा नहीं था। प्रथम बार ही गाँव के लोग देख कर चर्चा कर रहे थे। रतने की सासू ने जब यह बात सुनी कि दामाद के साथ साधु आया है। ऐसा सुनकर बहुत ही दुःखी हुई। क्योंकि पाहुणे के साथ तो उनके भाई-बंधु आने चाहिए थे। यह साधु को साथ लेकर आया है, तो पार पड़ेगी नहीं। कभी न कभी यह अवश्य ही साधु हो जायेगा। संगति का फल पायेगा।
ऊँट से नीचे उतर कर, जब गाँव में प्रवेश किया था, उस साधु ने गाँव के लोगों की भावना देख ली थी। रतना अपने श्वसुराल के घर में प्रवेश करने लगा था, तब साधु रतने से अलग होकर दूसरे घर की तरफ जाने लगा। रतना कहने लगा- हे गुरु जी! आप मेरे साथ आये थे। अब मेरा साथ छोड़ कर कहाँ जा रहे हैं? यह तो अच्छी बात नहीं होगी कि साथ में आये, अब अलग जाये।
रतने के साले ने कहा-जीजाजी ठीक ही कह रहे हैं। आप अलग नहीं जा सकते, साथ ही चलें। साधु ने प्रेम भाव देखा तो रतने के साथ ही घर में पहुँच गए। साधु तथा रतने के लिए अलग-अलग आसन बिछा दिए। संध्या बेला में दोनों गुरु शिष्य ने संध्यादिक नियमों का निर्वाह किया। कुछ समय तक विष्णु का जप करते हुए अपने-अपने आसन पर विराजमान हुए बहुत दिनों की प्रतीक्षा के बाद आज जंवाई देवता जी आये हैं। आज जंवाई देवता के लिए विशेष भोजन बनाया गया था। खीर, हलवा, पूड़ी अनेकों प्रकार की सब्जियाँ आदि। भोजन का समय होने पर रतने के लिए भोजन का बुलावा आया तब रतनो कहने लगा चलो गुरु जी भोजन करने के लिये।
संत ने कहा-तुम्हीं जाकर भोजन कर आओ। मैं तो बाद में भोजन कर लूँगा। रतना कहने लगा, यह कैसे हो सकता है? आप हमारे साथ आये, भोजन अलग-अलग कैसे करेंगे। पहले आप भोजन करो पश्चात् मैं करूँगा। आप हमारे अतिथि हैं। मेरा तो यह घर है।
रतने का साला कहने लगा-विवाद बंद करो। साथ ही चलो। साधु रतने के साथ भोजन करने के लिए पहुँच गया। रतने की सासू ने देखा कि साधु तो भोजन हेतु साथ ही आ गया है। यह भी तो खीर हलवा जीमेगा। किन्तु नहीं, इसे तो सबक सिखाना चाहिए। ताकि हमारे दामाद का साथ छोड़ कर चला जाये।
सासू ने चालाकी की और भोजन घर में मंद-मंद जलता हुआ दीपक रख दिया। रतना तथा उसके दो साले साथ में भोजन करने बैठ गए। एक तरफ साधु अकेला भोजन करने बैठ गया। एक थाली में खीर आयी रतने के लिए तथा दूसरी थाली में साधु के लिए ठण्डी खट्टी बासी राबड़ी एवं ज्वार की ठण्डी रोटी। मंद प्रकाश में पता भी क्या चले? सफेद ही राबड़ी और सफेद ही खीर थी। दोनों भोजन करके बाहर आकर बैठ गए।
वार्तालाप करने लगे। भोजन की प्रशंसा करने लगे। स्वादिष्ट भोजन की चर्चा करने लगे। रतने ने कहा- गुरु जी आप तो आते ही नहीं थह्य। यदि न आते तो ऐसा अमृत भोजन आप कैसे प्राप्त करते? साधु ने कहा- भाई! ऐसा भोजन तो मुझे रोज ही प्राप्त होता है। रतना कहने लगा- गुरु जी झूठ मत बोलो। ऐसा अमृत भोजन आपको सदा ही कहाँ से प्राप्त होता है? यह तो कभी कोई खास मेहमान आता है, तभी प्राप्त होता है।
साधु ने एक टुकड़ा जो गौ ग्रास के लिए साथ में लाये थे, वह दिखाते हुए कहा-यह देखो रोटी का टुकड़ा। दो रोटी ज्वार की, वह भी सुबह की बची हुई बासी। और आधा सेर राबड़ी, वह भी बासी। मैंने प्राप्त की है। ऐसा भोजन तो हम रोज ही खाते हैं, इसमें क्या आश्चर्य है? रतने ने रोटी का टुकड़ा देखा और कहने लगा- साधु सत्य ही कहते हैं। झूठ नहीं।
रतने ने उसी समय ही ऊँट पर पिलाण माँड कर कहने लगा-मैं अब इस घर का एक ग्रास भी नहीं लूँगा। साधु तो उठकर आगे चला गया। रतना बहुत दुःखी मन से ऊँट खींचकर के रवाना हो गया। और अपनी स्त्री से कहने लगा- अब हमारा इस घर से सम्बन्ध टूट गया है। फिर मैं कभी भी लौट कर के नहीं आऊँगा। यदि तुम्हें मेरे साथ चलना है, तो अभी चल। और यदि अपने माता-पिता के पास रहना है, तो यहीं रहे। आगे ऊँट को खींचकर रतना चल पड़ा पीछे रतने की स्त्री भी चल पड़ी।
श्वसुर-साले-सास ने बहुत प्रकार से समझाया, रोकने की कोशिश करते रहे, किन्तु रतने ने किसी की एक भी नहीं सुनी। पीछे से कहने लगे-आज यह स्वामी-मोडा के साथ उनके द्वारा भ्रमित किया हुआ जा रहा है। पीछे बहुत ही पछतायेगा। हम लोग अनेक प्रकार का दहेज देते। यह लेकर जाता तो लोग सराहना करते। किन्तु इसके भाग्य में लिखा हुआ ही नहीं है। यह कैसे ले जायेगा? गाँव के लोग कहने लगे- यह तो बड़ा भारी क्रोधी है। कुछ लोग कहने लगे-यह साधु को साथ ले आया। इसने सारा कार्य बिगाड़ दिया। सम्पूर्ण गाँव के लोगों ने रतने को रोक कर निहोरा मिन्नतें की, किन्तु रतने ने एक बात भी नहीं मानी।
रतना कहने लगा- आप लोगों ने संत से दुविधा रखी है। संत को छोड़ कर यदि मैं आपकी सेवा करूँ, तो वैसा ही होगा, मानो कोई काम धेनु को छोड़कर खरी (गधी) की सेवा करना है। वह साधु तो आ ही नहीं रहा था। मैं उसको बुला कर लाया था। मैंने ही उनका अपमान करवाया है। मैं ही पाप का भागी बना हूँ। अब तो निश्चित ही नरक में पडूँगा। यदि मुझे जाम्भोजी बचाये, तभी बच सकता हूँ। रतने ने गाँव के लोगों की बात का आदर नहीं किया।
गाँव के लोग कहने लगे-आज यह दो हजार का दायजा छोड़कर जा रहा है। घर में आयी हुई लक्ष्मी को ठोकर मार रहा है। इसको अपनी बेटी देकर भी हमने बड़ी भूल की है। हमारी बेटी तो किसी अन्य को भी दी जा सकती थी, किन्तु ऐसे क्रोधी से हमारा संयोग हो गया। साधु का अनादर रतने को अच्छा नहीं लगा तथा इस प्रकार से रतना अपनी पत्नी सहित गाँव से बाहर निकल आया। रात्रि में ही रतना अपनी पत्नी सहित ऊँट पर चढकर अपने गाँव जांगलू की तरफ चल पड़े। फिर वापस मुड़कर देखा तक नहीं।
सवेरा होते-होते रतना लबैरे गाँव में पहुँचा। वहाँ पर स्नान संध्या करके आगे के लिए प्रस्थान किया था। रतना अपनी श्री सहित गाँव से बाहर निकला था कि एक अत्याचार देखा और रतने ने ऊँट रोक दिया। रतने ने देखा कि चार आदमियों ने एक जीवित हिरण को पकड़ कर के चारपाई पर बाँधा था। वे लोग रतने को सामने मिल गये। रतने ने पूछा-इस चारपाई पर क्या ले जा रहे है? उन्होंने कहा-यहाँ हमारे गाँव के ठाकुर अनड़सिंघ ने जीवित हिरण पकड़ कर के मंगवाया है। हम लोगों ने हरिण को फांसी में फांस कर जकड़ लिया है। हम लोग राजा के अनुचर भील हैं। हम तो ठाकुर साहब को भेंट देंगे।
रतने ने पूछा-ठाकुर साहब इसका क्या करेंगे? उन शिकारी लोगों ने यह नहीं पहचाना कि यह बिश्नोई है। हमारे कार्य में विघ्न करेगा। स्वभाविक रूप से भीलों ने बतलाया कि ठाकुर साहब इस मृग को देवी के चढावेंगे। इसकी हत्या की जायेगी। ऐसा कहते हुए उस मृग को उठा कर के वापिस चल पड़े।
रतना कहने लगा- यदि आप लोग मृग को छोड़ दो तो अच्छी बात होगी और यदि आप लोग नहीं छोड़ते हैं तो मैं तुम्हारे ठाकुर से छुड़ाऊँगा। ऐसा कहते हुए रतने ने अपनी घरवाली के सहित ठाकुर के महल में प्रवेश किया। गाँव के लोगों ने आश्चर्य से देखा कि आज कुछ अनहोनी होगी। महल में आये हुए अजनबी को देखकर ठाकुर ने त्यौरी चढा करके क्रोध भरे वचन बोलते हुए कहने लगा-
कहो स्नानी कैसे आये? क्या चाहते हो? तब रतना हाथ जोड़ कर कहने लगा- हे ठाकुर! तुम्हारे अनुचर वन से एक मृग ले आये हैं। उसे छुड़ाने आया हूँ। यह मृग आप मुझे दीजिए यह माँगने आया हूँ। ठाकुर कहने लगा- यहाँ कोई बिश्नोइयों के गाँव की कांकड़-सीमा नहीं है तुम इस मृग में क्या माँगते हो? तुम्हारा कोई हक नहीं है। तुम अपनी सीमा की वस्तु की माँग कर सकते हो। यह तुम्हारी माँग पूरी नहीं होगी।
उस समय ठाकुर के पास एक चारण था, वह कहने लगा- यदि तुम इस हरिण को लेना चाहते हो तो तुम्हारे शरीर पर स्वर्ण आभूषण, हाथों में कड़े, कानों में गोखरू और यह ऊँट आदि दे दो और इस मृग को ले जाओ। रतने ने यह बात सुनी और प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा- जाम्भोजी हमारे पर कृपा कर रहे हैं। ऐसा कहते हुए अपने शरीर के स्वर्ण आभूषण तथा ऊँट को ठाकुर को देकर हरिण को लेकर गाँव से बाहर आये और हरिण को तो वन में छोड़ दिया।
बिना ऊँट के पैदल ही दोनों जाते हुए आपस में बातें करते हुए जा रहे थे कि यह तो अच्छा ही हुआ। जो कुछ भगवान् करते हैं, वह ठीक ही करते हैं, यह ठाकुर भी भला आदमी है। इसने इतना थोड़ा सा धन लेकर ही इस जीवित मृग को छोड़ दिया। आज यदि यह नहीं छोड़ता तो प्राण भी देने पड़ते। हम जिंदा रहेंगे, तो धन तो वापिस आ ही जायेगा। हे देवी! तू चिंता नहीं करना। हमने आज धर्म की रक्षा की है। “धर्मो रक्षति रक्षितः“ हम धर्म की रक्षा करेंगे, तो धर्म हमारी रक्षा करेगा। दोनों दम्पति यही बातें करते हुए जा रहे थे। इसी बात को ठाकुर की माता ने सुना और ठाकुर के पास जाकर कहने लगी-
रे ठाकुर! तू बहुत ही पोचा (घटिया) आदमी है। मेरा बेटा होकर थोड़े से धन के लालच में आकर तुमने अपना धर्म बेच दिया। एक तो वे दोनों हैं, जिन्होनें धन देकर धर्म की रक्षा की है। एक तू है जो धन के लिए हाथ फैला दिया। तेरे जीवन को धिक्कार है। वे दोनों मनुष्य नहीं हैं, देवता हैं। उनकी तो तुझे पूजा करनी चाहिए थी। यदि मेरा कहना मानता है तो उनको वापिस बुला कर के उनका धन वापिस लौटा दो। उन्हें आदर सहित विदाई दो। अपनी माता की बात सुन कर ठाकुर ने अपना सेवक पीछे भेजा और रतने को वापस बुलाया। पाँचो कपड़े, अपनी तरफ से सिर से लेकर पाँव तक पहनाये, उनका ऊँट व धन वापिस लौटाया। रतने की पत्नी को भी अपनी बेटी मान कर उसे स्वर्णाभूषण प्रदान किए। और गा बजा कर के रतने को बिदाई दी। उसी दिन से ठाकुर ने जीव हत्या करनी और करवानी भी छोड़ दी। उनतीस नियमों का पालन करते हुए बिश्नोई सदृश आचरण करने लगा।
रतना वहाँ से चल कर अपने गाँव जांगलू पहुँचा। रतने ने आकर अपनी पत्नी सहित अपने मातापिता को प्रणाम किया। अपने बेटे-बहू को शुभ आशीष प्रदान करते हुए देखा कि कुछ विशेष कपड़े पहने हुए है। किंतु दो हजार का दायजा न ही है और नहीं कोई साथ में पहुँचाने भी आया है। ऐसा देखकर समझ गए कि यह अपने श्वसुराल से तोड़ कर आया है।
रतना कहने लगा- हे पिताजी! संसार से तो अवश्य ही सम्बन्ध टूटा है, किन्तु त्रिलोकी नाथ से सम्बन्ध जुड़ गया है। संसार से सम्बन्ध जोड़ने में दुःख है, किन्तु परमात्मा से जोड़ने में तो सुख ही सुख है। रतने के पिता ठकुरे ने कहा- यह ऊँट, आभूषण, गहना आदि तो मुझे दे दे और जिससे तुमने जोड़ी है, उसी के पास चले जाओ। तुम्हारे जैसे लोगों के लिए मेरे घर में जगह नहीं है। इस प्रकार से कहते हुए रतने को घर से बाहर निकाल दिया।
हे वील्ह! ऐसा कहा जाता है कि रतने को ऐसा खेत दे दिया था कि जिसकी बाजरी तोड़ ली थी। ऐसे घड़े दे दिए थे, जिनमें घी के स्थान में जल भरा हुआ था। यही धन देकर रतने को घर से बाहर निकाल दिया।
रतना जांगलू से अपनी श्री सहित सम्भराथल पर श्री देवजी के पास चला। जाम्भोजी अपने भक्तों सहित सम्भराथल पर विराजमान थे। अपने भक्तों से कहा-आप लोग यहाँ से रतने के सामने जाओ। यहाँ अति निकट ही रतना आ चुका है। मजीरा आदि लेकर जाओ। गाते बजाते हुए सम्मान करते हुए यहाँ पर ले आओ। रतने ने धर्म की रक्षा की है। उसके माता-पिता ने रतने को घर से निकाल दिया है। मैंने उसको अपना लिया है। इस प्रकार से धर्म की रक्षा करने वाला मुझे बहुत ही प्यारा है। रतना धोक धोरे पर आकर सर्व प्रथम सम्भराथल का दर्शन करता है।
जाम्भोजी द्वारा भेजी हुई भक्त मण्डली धोक धोरे पर सामने जाकर साखी, शब्द, ध्वनि का गान करते हुए बड़े ही हर्षोल्लास के सहित रतने को सम्भराथल पर प्रवेश करवाया। जाम्भोजी ने रतने को शुभाशीर्वाद प्रदान किया और कहा- रतना! तुमने धर्म की मर्यादा को बाँधा है। तेरे पिता ने कुछ नहीं दिया तो क्या हुआ, मैं तुझे सभी कुछ देता हूँ। “तुम्हारे पास जो पानी के घड़े हैं, वह तो घृत के हो जायेंगे। और तोड़ी हुई बाजरी पुनः सिट्टे निकाल देगी।
“ पाणी सूं घृत कुड़ी से कुरड़ा, सो घी ता बाजरियो जीवनै” तुम दुःख मत मानना कि धर्म की रक्षा करने वाले इस प्रकार से दुःख क्यों पाते हैं? तुम्हें दुःखी नहीं होना चाहिए। अब तुम पारवा जाकर बसो। और धर्म की रक्षा करते हुए कुल वंश की अभिवृद्धि करो। तुम्हारे कुल में सभी भक्त ही पैदा होंगे। अन्न, धन, रूप, गुण, लक्ष्मी की कोई कमी नहीं रहेगी।
उस समय रतने ने पूछा- हे देव! धर्म का मर्म क्या है? हमें क्या करना चाहिए? किस एक देवता का सहारा लेना चाहिए? इस जीवन का मूल क्या है? यह बतलाने की कृपा करें। श्री जाम्भोजी ने रतने को लक्ष्य कर के यह महत्वपूर्ण शब्द सुनाया-
शब्द-120 ओ३म् विष्णु विष्णु तू भणरे प्राणी, इस जीवन के हावै।
क्षण क्षण आव घटंती जावै, मरण दिनों दिन आवै।
पालटीयो गढ़ कांय न चेत्यो, घाती रोल भनावै।
गुरु मुख मुरखा चढ़े न पोहण, मनमुख भार उठावै।
ज्यूं ज्यूं लाज दूनी की लाजै, त्यूं त्यूं दाब्यो दाबै।
भलियो होय सो भली बुध आवै, बुरियो बुरी कमावे।
हे रतना! इस जीवन का मूल विष्णु परमात्मा ही है। विष्णु सर्व जीवों का पालन पोषण कर्त्ता सत्त्वगुण सम्पन्न परमात्मा ही है। वह विष्णु ही हमारी आत्मा है। इसीलिए तुम्हें विष्णु का ही जप करना चाहिए। यही धर्म है । यही तुम्हारा मूल है। संसार की अन्य वस्तुएँ तुम्हारे जीवन में कुछ भी सहयोगी नहीं हैं। न ही तुम्हारे साथ जाने वाली हैं। एक विष्णु का नाम प्रेम से लिया हुआ तुम्हारे साथ जायेगा।
यह शरीर तो आयु में बंधा हुआ है। आयु का समय तो क्षण-क्षण करते हुए व्यतीत हो रहा है। मृत्यु प्रह्म्क्षिण नजदीक आ रही है। इस नाशवान शरीर को लेकर अहंकार किस बात का किया जा रहा है? यह शरीर रूपी गढ देखते-देखते ही पलट गया है। पहले कभी बाल्यावस्था थी। फिर युवावस्था आयी थी। और अति शीघ्र ही बुढापा भी आ रहा है। फिर भी सचेत नहीं हुआ। कुछ आगे के लिए भी सामान जुटाना चाहिए था। यह शरीर दिनोदिन जीर्ण-शीर्ण हो रहा है। काल ने इस पर जबरदस्त प्रभाव जमा दिया है। यह एक एक क्षण कर के बदल रहा है।
गुरु मुखी होकर तो मूर्ख कार्य करता नहीं है, जो सरलता से किया जा सकता है। किन्तु मनमुखी होकर व्यर्थ का ही भार उठा रहा है। दुनिया की लज्जा-शर्म-मर्यादा में ही यदि रह कर अपना जीवन व्यतीत कर दिया, तो अपने दावे से चूक गया। दावा न्याय के लिए गुहार ऐसी करनी चाहिए कि निर्णय हो जाये और इस जीवन की बाजी में जीत जाये।
जो सज्जन प्रकृति का व्यक्ति होगा, वह तो सदा ही भला ही करेगा। और जो दुष्ट प्रकृति का व्यक्ति होगा, वह सदा दुष्टता ही करेगा। “प्रकृति यान्ति भूतानि निग्रह किं करिष्यति। सभी प्राणी अपनी प्रकृति में ही जीते हैं, निग्रह क्या करेगा? इसलिए प्रकृति को जानना ही ज्ञान है, ज्ञान से ही मुक्ति संभव है।
तुम्हें दूसरे की कमी को देख कर चिंतित नहीं होना चाहिए। पहले अपने को ही देखना चाहिए,फिर बाहर देखना। जो बुरा (पापी) होगा, वह तो चौरासी लाख योनियों में भटकेगा। और जो भला आदमी होगा, वह जन्म-मरण के दुःख से छूट जायेगा। इसीलिए भले- अच्छे बनने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।