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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह76 / 94

ग्यारहवाँ अध्याय · कथा 76

जाम्भोजी का भ्रमण काबुल में जीव हत्या बंद करवाना

एक सम जाम्भोजी मक मदीन लवेयान की पाल्य उपरे खड़ा रह्या। एक झींवर जाल ले आयो। जाम्भोजी झींवर ने कह्यो-जल में जाल मत रेड़। झींवर जल मां जाल रेड़यो। एक मछी आइ। जांभजी नफ र न कहे। दवा सुणाई। मछी अमर हुई, झींवर कनी यों मछी काजी लिवी। काजी करद चलाव। मछी कट नहीं। तीन्य दिन आतस मां उकलाई। मछी क आंच लागी नहीं। काजी झींवर पकड़ि मंगायो। क्यौं व कुटण यो मछी कहाँ ते लायौ। काजी हकीकत कही, काजी मछी ले पीर क पास्य आया। काजी कह तुम कुण मरद हो। जांभोजी कह यौह माही कहगी मछी कह- विसमलाह हरे रहमान रहीम...........

हे वील्ह! श्री जम्भेश्वर जी ने केवल सम्भराथल पर ही शब्दोपदेश दिया हो, ऐसी बात नहीं है। यत्र-तत्र भ्रमण करके भूले-भटके जीवों को सुपात्र जानकर उन्हें सचेत किया। एक समय श्री देवजी मक्का-मदीना गये थे। वहाँ पर लवेयान तालाब की पाल पर खड़े थे। उसी समय ही एक झींवर मच्छी पकड़ने वाला आया। और जल में जाल डालने लगा जाम्भोजी ने झींवर से कहा- तूं जल में जाल मत डाल किन्तु झींवर ने देवजी की बात सुन कर भी अनसुनी कर दी और जल में जाल डाल दिया।

जाल में एक मच्छी फंस गयी, जांभोजी ने उस मच्छी को अमर होने का वरदान प्रदान किया, जिससे वह अमर हो गयी। उस झींवर को क्या पता? वह तो रोज की भांति उस मच्छी को जल से निकाल कर ले गया। बाजार में जाकर उस मच्छी को काजी के हाथ बेच दी। काजी ने उसे काटने के लिए करद चलाया किन्तु वह तो बज्र देह वाली हो गयी थी। कटने में आयी नहीं। तब काजी ने उसे तीन दिन तक अग्नि में पकाई, किन्तु वह ज्यों के त्यों बनी रही। आंच लगी भी नहीं थी। काजी ने उस झींवर को पकड़ के बुलाया और पूछा-

रे कुटण! यह मच्छी तू कहाँ से लाया? काजी के सामने जो हकीकत थी, वह उस झींवर ने बतलाई। काजी उस मच्छली को लेकर श्री देवजी के पास में आया। काजी कहने लगा- तुम कौन मरद हो? जाम्भोजी ने कहा- मैं कौन हूँ? यह मैं नहीं कहूँगा। मेरा परिचय तो यह मच्छी ही दे रही है। अधिक क्या बतलाऊं? इस घटना से अब तक मेरा परिचय तुम्हें नहीं मिला तो अब अधिक कहने से भी कोई फायदा नहीं है। ऐसा कहते हुए शब्द बनाया।

यह शब्द अरबी-फारसी भाषा में है। उस काजी को सुनाया था। यह शब्द काजी ने किताब में लिख लिया था। जाम्भोजी का स्वागत किया, और सदा सदा के लिए मछली न मारने का प्रण किया।

नाथोजी कहते हैं हे वील्ह! यह पारसी का शब्द होने से हमारे लोगों के समझ में नहीं आया। इसीलिए कण्ठस्थ भी नहीं हो सका था। काजी की किताब में लिखा हुआ था, उसी रूप में तुम पढ सकते हो। शब्द इस प्रकार से हैविसमलाह

हरे रहमाने रहीम, रोजे ही वाय। सेख जहान मा वामक मदीनै वा जिवाय जिकर करद अद। नसबुद याय रबी। दसत पोसीद वव पे सेख। अवरदह। या पीर दसतगीर। अजमादर। उपदर पदास्य नेस। दह सूरा कदरव ओजू दमर धाम। नैमें वासद न मे करद अद। सेख पुरजीद की कुदरती। एमन माही सोगंद खुदाय तालाह हक बागोयौ। माही दरसे खान वागुकदः अबलि गुसल करद अदः वाजे अजली वाजः । इदवा सुखानंद मनवा जहाँ जरिः दवा दप गोस तासीर आतस कुदरती नमै करद अद। हर के सेख क एक। समुरी दइ दवा अति रोज बुखानंदः अगर हरे रोजः पुरसद मैने वासदः एक राज पीरान मुरीदानः खुद बुखानंद खवा अबरत वा मुरद वाउ आकोन अजावर कबेः सुद हाम दोजकी मन वासद परहेज बुद विसमलाह हिर रहमाने रहीम खरे खुलायक उआ अफ जल अलाह सरि। अवल्य नासरे सइदान महमंद अलाहु सलम। बाजे कुल सलामः अलाह सालहीज अलाह मोमदीनः उसलेह अलाह अबीयपां।

काजी किताब मां लिख्य लीवी। पीर की कदम पोसी कीवी। जीव तणां छोड्या।

उस समय का यह शब्द सुनाया हुआ नाथोजी ने वील्होजी को सुनाया। मृत मछली को जाम्भोजी के कहने से काजी ने वापिस जल में डाल दी। मछली जल में तैरने लगी। जिसकी सांई स्वयं रक्षा करे उसे मारने वाला कौन हो सकता है?

श्री देवजी ने मक्के-मदीने में प्रहलाद पंथी जीवों को सचेत कर के वहाँ से चलकर काबुल गए। वहाँ पर सुखनखाँ रहता था। उसको दर्शन दिया, एक पहाड़ी पर आसन लगाया। वहाँ पर पाँच काबली चले आये हैं और पास में बैठ कर पूछने लगे-कि आप हिन्दू हो या मुसलमान?

श्री देवजी ने कहा- न तो मैं हिन्दू हूँ और न ही मुसलमान। आप लोग क्या चाहते हैं? यह जीवात्मा न तो हिन्दू है, और नहीं मुसलमान। आप लोग क्या चाहते हैं? दोनों पंथों से ऊपर है। काबली कहने लगे- यदि आपको भोजन करने की इच्छा हो तो आपके लिये भोजन ले आये हैं। श्री देवजी ने कहा-मेरी चिंता न करो, आप लोग सुखनखाँ के पास जाओ और उनसे कहना कि हक की कमाई करो, हक का ही खाओ।

वे पांचो सुखनखां के पास गए और पीरजी की बात कह सुनाई- सुखनखाँ उन पाँचो के साथ भोजन लेकर श्री देवजी के पास आया और कपड़े से ढकी हुई थाल आगे रखते हुए इस प्रकार से कहने लगा- हे पीरजी! यह आपके लिए भोजन लाये हैं, इससे पेट भरो, ऐसा कहते हुए सुखनखाँ परिक्रमा करते हुए श्री देवजी के सामने बैठ गया।

श्री जाम्भोजी ने कहा-मुझे भोजन की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मुझे भूख-प्यास लगती नहीं है। भूख प्यास तो उसे ही सताती है, जिनका शरीर पाँच तत्त्वों से बना हुआ है। यह भोजन तुम वापिस अपने ही घर ले जाओ और एकान्त में बैठ कर खा लेना। सुखनखाँ कुछ कहने लगा-तभी उसकी थाली में तीतर का माँस था वही भोजन लेकर आया था। वे तीतर तो थाली में से जीवित होकर उड़ गये।

इस प्रकार से पीर में शक्ति देखी और सुखनखाँ चरणों में गिर पड़ा प्रार्थना करने लगा-हे पीर जी! मुझे क्षमा कर दो। मैं अब तक अज्ञान अंधकार में सोया हुआ था। अब मेरी आँखें खुल गयी। मेरे गुन्हे बकस दो। अपने जन को संसार सागर से पार उतार दो।

श्री देवजी ने उनतीस नियम बतलाते हुए कहा-फिर कभी जीव हत्या नहीं करना। नियमों का पालन करना। तूँ प्रह्लाद पँथी जीव है। यह मैं जानता हूँ, इसीलिए मैं मुम्हारे पास आया हूँ। तुम्हें जगाया है, फिर सो मत जाना ।

नाथोजी कहते है- हे वील्ह! इस प्रकार से एक सौ पचपन गाँव सुखनखाँ के नाम से थे। वे सभी जीव हत्या छोड़ कर बिश्नोई पंथ के पथिक बने। इस प्रकार से जहाँ-तहाँ भी बिछुडे हुए जीव थे, उनको वापिस सत्पंथ के पथिक बनाया।

श्री जाम्भोजी भ्रमण करते हुए काबुल से मुलतान चले आये वहाँ सूचका पहाड़ पर आसन लगा कर बैठे थे। तेरह खान और बारह काजी दर्शनार्थ आये। जो आये थे उनका पाप ताप मिट गया था। उन्होनें देखा था कि कोई फकीर पहाड़ पर बैठा ध्यान लगा रहा है। एक काजी कपड़े में हीं को लपेट कर के श्री देवजी के पास ले आया था। वह शक्ति- सिद्धि देखना चाहता था। काजी ने वह कपड़े में लपेटी हुई हीं दिखाते हुए कहा कि हे पीर जी! इस कपड़े में लपेटा हुआ क्या है आप सत्य बतलाइए?

जाम्बेश्वरजी ने हंस करके कहा-इसमें तो सोना है। काजी ने तुरंत कपड़ा हटाया और देखा कि उसमें तो सचमुच सोना ही हो गया। लपेटी तो हीं थी, किन्तु यह तो सोना बन गई। काजी आश्चर्य चकित होकर सोने की लकड़ी देख रहा था। श्री देवजी ने उन पच्चीस जनों की पहिचान की और उन्हें उपदेश देते हुए कहा-

हे प्रह्लाद पंथ के बिछुड़े हुए जीवों! आगे से कभी जीव हत्या नहीं करना। यह तुम्हारा कार्य नहीं है। यह सोना अपने घर ले जाओ। और हक की कमाई करो। उनतीस नियमों का पालन करते हुए सत्पंथ के अनुयायी बनकर वापिस अपने गुरु प्रह्लाद से जा मिलोगे।

हे वील्ह! इस प्रकार से यह बिश्नोई पंथ चला था और आगे अनेक प्रकार से विस्तार को प्राप्त हुआ था। उन सभी ने पृथक् पृथक् प्रणाम किया और सदा सदा के लिए अहिंसक होकर अपने जीवन को व्यतीत किया।

वहाँ पर मुलतान में श्री देवजी सूचका पहाड़ पर विराजमान थे। उस समय उनके पास में सरफ अली और हसन अली दोनों आये और कहने लगे- यदि आप स्वयं खुदाताला ईश्वर हैं, तो कुछ ईश्वरीय चरित्र दिखाना होगा। हम लोग तभी मानेंगे। अन्यथा हम पाखण्ड को नहीं मानते हैं। आप हमें चार बात का परचा दीजिए कि जमीन में गढा हुआ धन कहाँ है, यह बतलाइए? दूसरा परचा यह दीजिए कि मृतक पशु को पुनः जीवित कर दीजिए। तीसरा परचा यह दीजिए कि हम आपके शरीर पर चोट मारेंगे, तो भी आपके शरीर में घाव न हो पाये। चौथा परचा यह होना चाहिए कि आप खाना पीना न करें। यदि ये चार परचे पूर्ण हो जायें तो आप ईश्वरीय अवतार है अन्यथा आप कोई साधारण फकीर ही हैं।

जम्भेश्वरजी कहने लगे-आप लोग इस पहाड़ी के उत्तर की तरफ उस पीपल को देख रहे हो। उसके नीचे चार टोकणा जमीन में दबे हुए ये चारों बर्तन अनहरद ने रखे थे। सरफ अली पूर्व जन्म में अनहारद ही था। उन टोकणों पर नाम लिखा हुआ है। हे सरफ अली! पूर्व जन्म का तुम्हारा ही गाढा हुआ धन वह तेरा ही है उसे ले ले। तुम्हें इस धन की वजह से पूर्व जन्म की याद हो आयेगी। अनेकों जन्मों में भटका हुआ मनुष्य वापिस अपने स्थान में धर्म में कभी न कभी तो आही जायेगा।

हे हसन अली! तुम्हारी कोख में यह हींग का थैला है। इसे तुम धरती पर रखो और फिर ईश्वरीय करामात देखो। हसन अली ने श्री देवजी के कथनानुसार ज्योंहि थैला नीचे रखा, त्योंहि उस थैले में से एक मृग निकल कर वन में छलांग लगाता हुआ भाग गया। हे हसन! तुम्हारे हाथ में तलवार है। इसी से ही मेरे शरीर पर मार कर देखो। आज्ञा सुन कर हसन अली ने शरीर पर तलवार चलाई, किन्तु कहीं भी शरीर में स्पर्श नहीं कर सकी। हवा में खाली ही निकल गयी। जिसके शरीर में तीक्ष्ण तलवार का घाव नहीं लग सका, तो वह शरीर तो दिव्य ही होगा। इन पाँच महाभूतों से तो शरीर की उत्पत्ति नहीं होगी। तब खाना-पीना भी किस लिये होगा। पाँच तत्त्वों द्वारा निर्मित शरीर की रक्षा हेतु खाना-पीना आवश्यक है। इस प्रकार से चारों परचे पूर्ण हुए। अतिशीघ्र ही काजी और खान श्री देवजी के परिचित हुए। उसी समय श्री देवजी ने उनको शब्द सुनाते हुए उपदेश दिया-शब्द “ओ३म्! सुणरे काजी सुणरे मुला।” दोहा “सरफ हसन परचाविया, 3ख् छुड़ाई देव।”

सतगुरु शब्द सुनावियो, तिसी समय को भेव।

हज काबै का हज करां, काबुल सुखनखान।

सेफ न अली हसन अली, इह प्रचे मुलतान।

इनकू प्रचा देय के, आये संभ्रस्याम।

जो बाड़े के जीव थे, तिन्हीं तिन्हीं सूं काम।