ग्यारहवाँ अध्याय · कथा 77
जाम्भोजी का भ्रमण
पश्चिम देशों का भ्रमण करके श्री देवजी सम्भराथल पर विराजमान हुए। कुछ समय व्यतीत होने के पश्चात् एक दिन एकत्रित जन समूह ने प्रार्थना करते हुए कहा-हे देवजी! आपके शिष्य हमारे गुरु भाई कहाँ- कहाँ निवास करते हैं? आप तो अन्तर्दृष्टि से सभी कुछ जानते हैं किन्तु हम अल्पज्ञ जीव इन आंखो से दर्शन करना चाहते हैं। आप एक बार जीवों पर कृपा करने हेतु प्रस्थान कीजिए, जिससे हमारा भी आपके साथ कल्याण हो सके।
श्री जाम्भेश्वरजी ने भक्तों की इच्छा पूर्ण करने हेतु पूर्व देश गंगा पार जाने का निश्चय किया। सभी भक्त संतों को भी साथ ले चलने का विचार किया। सभी साथ चलने वालों को अपनी-अपनी सवारी साथ लेकर चलने की आज्ञा प्रदान की। समय पर अपने साथ चार हजार सेवकों को साथ में लेकर सम्भराथल से प्रस्थान किया।
नाथोजी कहते हैं कि हे वील्ह! सर्वप्रथम साँवतसर गाँव में जमात सहित निवास किया था। जहाँ पर श्री देवजी ने साथरियों के साथ निवास किया, वहाँ पर साथरी बनी है। इस प्रकार से साँवतसर में साथरी की स्थापना करके वहाँ के निवासियों को कृतार्थ किया। जाम्भोजी अकेले नहीं थे। साथ में हजारों की संख्या में संत भक्त थे। सांवतसर के धारणियां बिश्नोइयों ने श्री देवजी के साथ आये हुए सुभ्यागतों का आदर सत्कार किया और भोजनादि बड़े प्रेम से जिमाया तथा पुण्य के भागी बने। सभी ने अपनी-अपनी श्रद्धानुसार घृत, अन्न, मिष्ठान्न, नारियल आदि श्री चरणों में भेंट चढाया। श्री देवजी हमारे गाँव में पधारे हैं, हमारा अहोभाग्य है। इसी खुशी में रात्रि में जागरण हुआ। साखी शब्द आदि गाये। प्रातः काल स्वयं श्री देवजी ने हवन किया और लोगों को नियम मर्यादा से अवगत करवाया। हवन प्रसाद का सुख प्राप्त कर के ग्रामीण लोग कृतार्थ हुए सभी साथरियों गुरु भाइयों को भोजन करवा कर के अश्रूपूर्ण नेत्रों से विदाई दी। श्री देवजी के साथ आये हुए संत भक्तों ने गाँव के लोगों की अपने गुरु भाइयों की भूरि-भूरि प्रशंसा की और आगे का मार्ग लिया।
दूसरी मंजिल में रोटू गाँव में श्री देवजी अपने साथरियों सहित पहुँचे। वहाँ पर भी पूर्व परिचित ग्राम वासियों ने आगत स्वागत किया। साथरी पर ही श्री देवजी के साथ ही आसन लगाया। पूर्व में नौरंगी का भात श्री देवजी ने भरा था। रोटू में श्री देवजी ने कुछ समय पहले ही तो खेजड़ियों का बाग लगाया था। गाँव के लोगों को निहाल कर दिया था।
श्री जम्भदेवजी आज रोटू में आ गए हैं। अबकी बार न जाने किसको निहाल करेंगे। ऐसी वार्ता श्रवण कर के आस पास के गाँवों के लोग अपना दुःख दर्द मिटाने के लिए एकत्रित होने लगे थे। हे वील्ह! केवल रोटू गाँव की ही बात नहीं थी। वहाँ तो रामसर, गुगरियाली, अबाद, दुगोली, भ्रनाऊ, खारी आदि सभी गाँवों के लोग अपनी अपनी भेंट लेकर मिलने के लिए आए थे। रोटू पर तो देवजी का स्नेह सदा ही रहा था। इसीलिए वहाँ पर पाँच दिनों तक ठहरे थे। जो जिसने सत् वरदान माँगा उसकी इच्छा पूर्ण की थी। विशेष रूप से रोटू गाँव के लोगों को आदेश देते हुए कहा- तुम्हारे यहाँ तो त्रेता युग की तुलसी ये खेजड़िया है। आप लोग इनकी रक्षा करना। ये तुम्हारी रक्षा करेगी। यह बाग हरा- भरा रहेगा तो तुम्हारे यहाँ वर्षा की कमी नहीं होगी ये खेजड़ियाँ कहीं से भी वर्षा को खींच कर ले आयेगी और तुम्हारे यहांपर तो वर्षा अवश्य ही करवायेगी। ये तुम्हे शीत, गर्मी से भी बचाएँगी। तुम्हें जीवन का प्राण आधार यहीं से ही मिलेगा।
इन वृक्षों के नीचे-ऊपर निवास करने वाले पशु-पक्षी भी तुम्हारे जीवन के आधार हैं। यदि तुम इन हरे वृक्ष, पशु, पक्षी, जीव-जन्तुओं की रक्षा करोगे, तो तुम्हारी रक्षा स्वतः ही हो जायेगी। एक के विना दूसरे का जीवन असंभव है। इस प्रकार से रोटू गाँव तथा आस पास के लोगों को उपदेश देकर श्री देवजी ने वहाँ से अपने साथरियों सहित प्रस्थान किया।
आगे गंगा पार का देश अपने साथरी भक्तों को दिखाने के लिए रवाना हुए। शाम को भ्रनाऊ में निवास किया। दूसरे दिन दूणपुर आये। वहाँ दूणपुर में वीदो राठौड़ जाम्भोजी से परिचित हो चुका था। लोगों ने कहा- वीदे राठौड़ का विवाद मिटाने वाले श्री देव आज अपनी नगरी में आ गये हैं। हमारा सौभाग्य होगा कि हम भी दर्शन- स्पर्श करके उनको अपना अहंकार समर्पित कर दें। यह मैं का व्यर्थ का भार उतार दें। मोतिये का पता लगा के आज हमारे प्राणेश्वर अपनी नगरी में आ गये हैं, तो खुशी का ठिकाना ही न रहा। सभी को संतुष्ट करके जमात आगे चल पड़ी।
तीसरा पड़ाव श्री देवजी ने चुरू के निकट सातड़ा गाँव तथा मोलासर के गाँव की सीमा पर घने वन में किया था। उसी पवित्र भूमि को धाम बना कर आगे के लिए प्रस्थान किया था। जहाँ जहाँ पर भी श्री चरणों में भूमिस्पर्श होती थी, वहीं पर ही धाम बन जाता था। क्यों न हो, मरुभूमि का यह सौभाग्य ही था। इस कठोर कंटक प्रदेश में प्रथम बार स्वयं विष्णु ही अवतार लेकर भ्रमण कर रहे थे । इससे पूर्व त्रेता युग में राम रूप में विष्णु ने अयोध्या से चल कर लंका तक की भूमि को तीर्थस्थली बनाया था। द्वापर युग में भी श्री कृष्ण के रूप में विचरण करते हुए विशेष रूप से वृज भूमि को अति पवित्र तीर्थ रूप बना दिया था। सामान्य रूप से वृन्दावन से द्वारिका तक की भूमि श्री कृष्ण के चरणों से पवित्र हुई थी। इस समय कलयुग में श्री देवजी ने बागड़ देश को अयोध्या, वृंदावन, काशी सदृश तीर्थ स्थल बना दिया।
इस समय भी उनके चरणों से सुवासित हुई भूमि पवित्र हो रही है। यहाँ की भूमि का दर्शन करने से ही पापियों के पाप कट जाते हैं। जिस प्रकार गंगा में स्नान करने से पापियों के पाप कट जाते हैं। उसी प्रकार संत महापुरुषों के चरण भी गंगा की धारा सदृश पवित्र करने वाले हैं। वहाँ सातड़ा मौलीसर के निवासियों ने उस भूमि को जाम्भोजी की वणी से नाम से विख्यात की है। उस भूमि को ही देवालय मानकर पूजा करते हैं। और अपने जीवन को कृतार्थ करते हैं। हे वील्ह! कभी तुम भी जाकर अवश्य ही दर्शन करो। तथा गुप्त रहस्य को लोगों के सामने उजागर करो।
नाथोजी आगे की वार्ता कहने लगे- हे वील्ह! श्री देवजी के चरण तो एक क्षण भी कहीं टिक जाते तो वह पृथ्वी धन्य हो जाती है। हमने तो वहाँ एक रात्रि विश्राम किया था। वहाँ से जाम्भोजी की आज्ञा पाकर अपने-अपने रथ जोते और उत्तर दिशा की तरफ आगे बढे थे। उस दिन का मार्ग काफी लंबा था। अतिशीघ्र से चलकर हम लोग झूपा गाँव में पहुँचे थे। यह गाँव मरुभूमि का अंतिम गाँव है।
नित्य क्रिया, होम, जप-तप से निवृत्त हो गए थे। हमने देखा कि आज तो श्री देवजी एक टक दृष्टि से उत्तर की तरफ देख रहे है। कुछ अवश्य ही विशेष बात होगी। हमने श्री देवजी की दृष्टि अपनी ओर खींचते हुए पूछा-
हे सद्गुरु देव! आज हमने आपको एक टक दृष्टि से उत्तर की तरफ निहारते हुए देखा है। इधर तो कोई कहीं गाँव भी नहीं है। वन का ही साम्राज्य है। क्या होगा, इधर देखने के लिए? यदि कुछ होगा तो हमें भी बतलाने का कष्ट करें। श्री देवजी ने कहा- मैं इस भूमि को देख रहा हूँ। बहुत दूर तक निर्जन है। किन्तु यह भूमि बसने योग्य है। आप लोग अपने परिवार सहित यहीं आकर बस जाओ। यदि इस समय यहाँ बागड़ देश में धर्म का राज्य स्थापित हो चुका है। लोग धर्म, कर्म, यज्ञ करने लगे हैं। इस लिये यहाँ पर समय पर वर्षा हो रही है। किन्तु कालांतर में सदा ही ऐसा होना कठिन होगा। मैं देखता हूँ, जन संख्या की अभिवृद्धि होगी तो अत्याचार बढेंगे। यज्ञ कर्म समाप्त प्रायः हो जायेंगे तो अत्याचार बढेंगे, यज्ञ कर्म समाप्त प्रायः हो जायेंगे तो अकाल पड़ने लगेंगे। ऐसी अवस्था में आपकी कुल परंपरा के बिश्नोई लोग यहाँ इस भूमि पर बसेंगे। इस समय में यहाँ से लेकर बंगाल तक बिश्नोइयों का निवास इस भूमि पर देख रहा हूँ।
झूंपे से प्रस्थान कर के बीच- बीच में निवास करते हुए श्री जम्भदेवजी जमात सहित दिल्ली आये। जाम्भोजी के शिष्य हासम-कासम ने दिल्ली में यमुना के किनारे अपना आश्रम बनाया। उसी आश्रम में जमुना के किनारे जमात ने श्री देवजी के सहित आसन लगाया। यमुना में स्नान किया। सांयकाल में जागरण किया और प्रातः काल हवन सभी साथरियों ने मिल कर किया। पहले भी कई बार बिश्नोइयों की जमात ने यहाँ हवन किया था। शब्दों की ध्वनि सुन कर हासम कासम जाम्भोजी के शिष्य बने थे।
हासम कासम सदा ही प्रतीक्षा में थे कि न जाने कब वो स्वयं ईश्वर हरि आयेंगे, जिन्होंने हमें इस पथ का पथिक बनाया था। किन्तु आज तो सामने प्रत्यक्ष देखा था। हृदय की उमंग प्रेमाश्रुओं द्वारा बाहर निकल पड़ी। कहने लगे-हम क्या सत्य ही देख रहे हैं? या स्वप्न ले रहे हैं। अब हमने जीवन को सफल कर लिया। उनकी कृपा सिन्धु की एक दृष्टि ऊपर पड़ जाये तो महान पापी जन भी तर जाते हैं। ऐसे कहते हुए श्री देवजी के चरणों में दण्डवत प्रणाम किया।
देवजी ने उनके सिर पर अपना हस्तकमल रखा और कहा-हे भक्तो! खड़े हो जाओ। तुम्हारे प्रेम की बाढ में तो सभी पाप धुल गए हैं। अब पापों का लवलेश ही नहीं रहा। नाथोजी कहते हैं-हे वील्हा! इस प्रकार से हमने हासम कासम का प्रेम देखा था, वह तो प्रेम की पराकाष्ठा थी। ऐसा प्रेम यदि सभी का ही परमात्मा हरि के प्रति हो जाये तो जन्मो जन्मों के पाप धुल जाते है।
हासम कासम ने तो हमें भी जाम्भोजी के सदृश मान कर दण्डवत प्रणाम किया था- हमने कहा था कि आप ऐसा न करें। श्री देवजी के सामने हमें शर्मिंदा न करें। हासम कासम ने कहा- आप भी तो देवजी के साथ ही रहते हैं। उनकी संगति से सुगंधित हुए हैं। जिस प्रकार से चंदन के पेड़ के पास रहने वाला दूसरा वृक्ष भी सुगंधित हो जाता है। हम आप लोगों में वही प्रभाव देख रहा हैं। श्री देवजी ने हासम कासम की कुशल मंगल पूछी। उन्होंने कहा-हे देवजी! आपकी कृपा जिन पर हो जाती है, उनका मंगल सदैव बना रहता है। हमारी बहुत इच्छा थी कि मृत्यु से पूर्व आपके दर्शन-स्पर्श-वार्तालाप हो जाये तो कृतार्थ हो जायें।
इस समय हम अति वृद्ध हो चुके हैं। आपके पास आ नहीं सकते थे। किन्तु आप स्वयं ही दर्शन देने हेतु इन गरीबों की झोंपड़ी पर आ गए। यह हम समझ गये हैं कि आप प्रेम के भूखे हैं। केई बड़े राज महलों को छोड़ कर स्वतः ही चले आये हैं। श्री देवजी ने साह सिकंदर की बात ,तब हासम-कासम कहने लगे-
हे देव! आपका शिष्य सिकंदर तो अपना नियम जब तक जीवित रहा तब तक निभाता रहा। किन्तु अब उनकी दोनों बेगमें भी इस संसार में नहीं रही। अपने पति सिकंदर के साथ ही भिस्त चली गयी हैं। इस समय उनके घर में भक्ति भाव नहीं है। वह तो सिकंदर के साथ ही चला गया है। सिकंदर का बेटा इब्राहिम इस समय यहाँ का बादशाह बना हुआ है, किन्तु वो साह सिकंदर वाली बात बेटे में नहीं है। यह तो हरि से विमुख है।
जब हासम-कासम की वार्ता चल रही थी, उसी समय एक काजी ने भी सुना कि हासम कासम के घर एक बड़ी भारी जमात आयी है। तो वह काजी भी चला आया और श्री देवजी से पूछने लगा- आप कहाँ रहते हो? आपका स्थान कौन सा है? कहाँ से आये हो? और कहाँ को जाना है? काजी की बात सुनकर श्रीदेवजी मुस्कराते हुए कहने लगे- हे काजी! हम तो शून्य में रहते हैं और शून्य से ही आये हैं तथा शून्य में ही जायेंगे। मेरा वही शून्य परम स्थान है। उसी शून्य से ही मैं आया हूँ और घट-घट में जायेंगे। प्रत्येक श्वांस प्रश्ंवास के साथ ही मैं रहता हूँ। सभी के अन्दर एवं सभी के बाहर भी मैं रहता हूँ। जहाँ कुछ भी चेतन रूप से विद्यमान है, वहीं मैं ही रहता हूँ। वह चेतनता भी मैं ही हूँ। मैं और सर्व जगत एक ही है। आप लोग मुझे ज्ञान नेत्रों से देखो तो मैं असली रूप में दिखाई दूँगा। ऐसी वार्ता श्रीमुख से श्रवण कर वह काजी शीघ्र ही राजदरबार में गया।
काजी के चले जाने के पश्चात् हासम कासम ने प्रार्थना की। हे गुरुदेव! आप आज अपनी मण्डली सहित मेरे मेहमान बने हैं मेरा अति सौभाग्य है। मेरे यहाँ आप मण्डली सहित भोजन करो। तभी मेरी तृप्ति होगी। उसी समय ही श्रीदेवजी ने उनका निमंत्रण स्वीकार किया।
भण्डारी को भेजा और कहा-जाओ भोजन तैयार करो। न्यात-जमात भोजन करेगी। भण्डारियों ने जाकर नये मकान को जल छिड़क कर शुद्ध किया। उसमें हवन करके प्रथम देवता को आहुति प्रदान की। वातावरण को सुगंधित किया। और उसमें बैठ कर पाँच पकवान बनाये। सभी न्यात जमात को प्रेम से भोजन करने हेतु बुलाया। पंक्ति लगा कर भोजन हेतु बिठाया। ईश्वरीय प्रार्थना ध्वनि बोलकर जल का आचमन करके भोजन किया।
भोजन होने के पश्चात् दोनों भाई श्री देवजी के पास हाथ जोड़ कर बैठे हुए क्षमा याचना करने लगे। इतने में ही एक संदेश वाहक आया और श्री देवजी से कहने लगा- सिकंदर बादशाह का बेटा आप से द्वेष रखता है तथा उसने अनेक कुकर्म किये हैं। अपने पिता के यश को मिट्टी में मिला दिया है। इस समय हे पीर जी! वह आपको अपने महलों में बुलाने के लिए मुझे भेजा है।
हे वील्हा! श्री जाम्भेश्वरजी तो घट-घट की जानने वाले हैं। तो वे अकेले ही इब्राहिम से मिलने के लिए चल पड़े। श्री देवजी ने महल में प्रवेश किया और नौ दरवाजे पार करते गए। ज्योंही पीछे ताले पड़ते गये। नौ दरवाजे बंद कर ताले लगा कर द्वार पाल ने बाहर आकर देखा तो श्री देवजी उसे बाहर खड़े दिखाई दिए।
इब्राहिम ने कहा- यदि अंदर बंद नहीं कर सकते, तो इस फकीर की हत्या कर दो। ऐसा दंगा मचाओ और उसमें मार डालो। ऐसी राजदरबार की बात सुन कर श्री देवजी को काजी खाने, हत्या गृह में ले आये। वहाँ पर क्या देखते हैं कि एक-दो नहीं ये तो हजारों की संख्या में खड़े हैं। काजी कहने लगा- इतने लोगों की एक साथ हत्या कैसे कर सकते हैं?
हे बादशाह! आपने तो इन फ कीरों से सम्पूर्ण महल ही भर दिया है। हम लोग तो इनको देख कर डर रहे हैं। न जाने ये लोग क्या कर देंगे? उनकी वार्ता सुनकर इब्राहिम स्वयं देखने आया। पीछे से एक सेवक ने आकर बादशाह को खबर सुनाई कि तुम्हारे महल के जनाने वास में वह फकीर खड़ा मैंने देखा है। स्वयं बादशाह ने हाथ में तलवार ली और रंग चौक में श्री देवजी के दर्शन किये। क्रोध में भरकर बादशाह कहने लगातू
पड़दे में कैसे घूमता है? यहाँ पर पुरुष प्रवेश वर्जित है, ऐसे कहते हुए खड्ग की मारने लगा, किन्तु श्री देव के शरीर में चोट नहीं लगी। बादशाह होश गुम होकर धरती पर गिर पड़ा। जाम्भोजी वैसे ही खड़े देखते रहे। हिम्मत करके दुबारा खड़ा हुआ और दुबारा वार करने लगा किन्तु वह भी खाली ही गयी। अब तो खड़ग फेंक कर माफी मांगने लगा। किन्तु आकाश में हाथ फैलाया हुए बादशाह खाली खड़ा रहा। बादशाह डर गया था। अब पछताने लगा। हाथ जोड़ कर क्षमा याचना करने लगा। श्री देवजी ने कहासिकंदर तुम्हारा पिता तो मेरा शिष्य था। तूं उनका बेटा होकर कुपात्र कैसे हो गया? अब तुम्हारा राज्य ज्यादा दिन नहीं चलेगा। यह तुम्हारा लोदी वंश का राज्य चला जायेगा। और यहाँ पर मुगलवंश का राज्य शीघ्र ही आयेगा। तुमने अपने पिता की चलाई हुई मान मर्यादा, हक की कमाई का नियम तोड़ दिया है। अनीति का राज्य अधिक टिकाऊ नहीं होता। ऐसा कहते हुए श्रीदेवजी वहाँ से अदृश्य हो गये और मुकाम साथरियों के पास चले आये।
उसी समय ही प्रातःकालीन वेला में आगे यमुना पार जाने के लिए जमात तैयार खड़ी थी। श्रीदेवजी जमात सहित आगे बढ़े। यमुना को पार किया। शाम के समय में इब्राहिम ने वहाँ पर आकर देखा तो जमात तो आगे जा चुकी थी। वह समय तो व्यतीत हो चुका था। वापिस लौटकर आने वाला नहीं था। बीच में पाँच मंजिलों पर विश्राम करके श्री जम्भेश्वरजी अपनी संत मण्डली सहित सरधना पहुँचे। वहाँ पर दो दिन तक विश्राम निवास किया। उस समय सभी आसपास के गाँवों के लोग मिलने हेतु आये।
सरधना से श्रीदेवजी फ लावदा पहुँचे। वहाँ पर रथ को रोका। तब वहाँ के बिश्नोई लोग बड़े ही प्रेमभाव से फूल, मिष्ठान्न, घृत आदि लेकर आये। सभी ने अपनी श्रद्धानुसार भेंटे चढ़ाई। तन-मन-धन से हरि की सेवा की। जहाँ-जहाँ पर भी जाते चरण कमल टिकतह्य थे, वहीं पर बिश्नोई लोग निवास करने लगे थे क्योंकि वह भूमि पवित्र रहने योग्य हो गयी थी। यही सद्गुरु का सामर्थ्य है। जहाँ पर भी धर्म विस्तार होने की सम्भावना थी, वहीं पर श्रीदेवजी पहुँचे। जो भी उनके मार्ग में गाँव-नगर आये, वहीं बिश्नोई पंथ में सम्मिलित होते गये।
वहाँ से आगे चल पड़े। बिश्नोई की जमात श्रीदेवजी के साथ नगीना पहुँचे। नगीने में श्री गुरुदेव ने जहाँ पर आसन लगाया , वहीं पर साथरी की स्थापना हुई। सद्गुरु के शिष्य कुलचन्द, धनों, बीछ2, चेलोजी आदि बड़े उत्साह से अपनी अपनी श्रद्धा समर्पित करने हेतु श्री देवजी के पास बड़े ही प्रेम से पहुँचे। जो कुछ लाये थे, वह भाव रूप में श्रीदेवजी के चरणों में रखकर स्तुति करने लगे।
कुलचंदजी कहने लगे-हे गुरुदेव! मैं तो आपका ही हूँ। आप मेरे ही हैं। अन्य तो सभी कुछ झूठा ही है। आप की जयजयकार हो। आप दयालु कृपालु हो तथा आपका कोई आदि अन्त नहीं है। आपने कृपा करे हमें दर्शन दिया है। मुझे निहाल कर दिया है। हे जगतकर्ता! आप हमारे दुःखों का निवारण कीजिये। इसी हेतु तो आपने अवतार ही लिया है। हे जगत के स्वामी! आप तो अन्तर्यामी हैं। हम क्या कहें? यदि आप प्रसन्न हो जावें, तो हमारे जन्ममरण के फंदे कट जायें।
हे प्रभु! हमारा धन्य भाग जो आपने हमारे यहाँ पर चरण रखे हैं। आपने यह कृपा की है, जो मेरे घर पर दर्शन देने के लिए आ गये हैं। हे अव्यक्त अनामय स्वामी! आपका नाम लेने से 84 लाख योनियों में भटकना मिट जाता है। आप तो सत्यलोक के स्वामी हो। हे निष्कामी! आपने हमारे पर बड़ी कृपा की है। अपने जन को अपनी शरण में रखो तथा कुछ सेवा का अवसर प्रदान करो। हे देव! यह मन बड़ा ही चंचल है। इसे स्थिर कीजिये। यह कार्य तो आपकी कृपा से ही हो सकेगा। इस मन ने तो शिव ब्रह्मादिक सभी को नचाया है।
कुलचंदने इस प्रकार से स्तुति की। श्री जाम्भेश हरि ने प्रसन्नता से कुलचंद के सिर पर अपना हस्त कमल धरा और कहा-क्या माँगते हो? कुलचंद हे देव! जब आपका हस्त कमल मेरे सिर पर आ गया तो मुझे अन्य सांसारिक वस्तु से कुछ भी प्रयोजन नहीं है। आपकी भक्ति सदैव बनी रहे । कुलचंद जी की स्तुति पूर्ण हो जाने पर धन्ना बिछू ने भी अपनी अपनी स्तुति पृथक् पृथक् रूप से की। उसी गाँव में रहने वाले सुरगुण भँवरा भी स्तुति करने लगे।
ये तो सभी लोग पूर्व समय में कई बार सम्भराथल की यात्रा कर चुके थे। इस समय तो घर में आयी हुई गंगा को कैसे हाथ से जाने देते। इस भक्त मण्डली में चेलोजी भोले-भाले शिरोमणि भक्त थे। वे पास जाकर स्तुति करने में संकोच करते रहे। कहाँ तो मैं अपवित्र कहाँ विष्णु परमात्मा! मैं भला क्या स्तुति करूं? कैसे कहू और क्या कहूँ? कुछ समझ में नहीं आता। श्रीदेवजी ने चेलेजी का नाम लेकर अपने पास बुलाया और अपने मनोभाव प्रकट करने को कहा। चेलोजी कहने लगे- हे देव! मैं तो आपके चरणों का दास हूँ। दास कैसे अपने स्वामी की कीर्ति का बखान कर सकता है? मैं तो आपकी महिमा जानता हूँ, बखान करना तो मेरे वश की बात नहीं है। अपनी वाणी में आपकी विराट महिमा को कैसे बाँध सकता हूँ? रात-दिन आपके ही गुणों का बखान करता हूँ। मेरे भाई-बन्धु, माता-पिता तो सभी कुछ आप ही हो। आपके बिना तो मेरा जीवन व्यर्थ है। आप सदा ही मेरे हृदय में निवास करो। अपना कमल सदृश हाथ मेरे सिर पर रखो। अपने दास को साथ ही लीजिये। मेरी कुमति का हरण करो और शुद्ध ज्ञान प्रदान कीजिये।
आप तो सत्यलोक के स्वामी हैं। इस मृत्युलोक से सदा ही उदास रहते हैं। यहाँ मृत्युलोक में तो प्रह्लाद भक्त के वचनों का पालन करने हेतु आये हैं। इकीस करोड़ को तो आपने पूर्व तीन युगों में पार पहुँचा दिया। अब अवशिष्ट बारह करोड़ उद्धार करने हेतु यहाँ पर आये हैं। उन बारह करोड़ जीवों में हम भी हैं। इसलिए हमारा तो उद्धार अवश्य ही होगा। हे देव! आप संतों के प्रतिपालक हैं। आपने इससे पूर्व भी /ा्रूव, प्रह्लाद, नारद, कयाधु आदि की गति की हैं। अब आप मेरी भी गति कीजिये।
हे भगवन्! मैं आपकी शरण ग्रहण कर चुका हूँ। आपके सिवा मेरा इस भवसागर में कोई नहीं है। पतितों को पार उतारने में आपकी कोई बराबरी नहीं है। यदि दोष होगा तो किसी साधक में ही होगा आप तो निर्दोष समदृष्टि भगवान् हैं। अब आप ही जानें, हम क्या जानें? आपके दर्शनमात्र से ही करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। सूखी लकड़ी के साथ हरी लकड़ी भी जल जाती है। काठ के संग लोहा भी पार लग जाता है। मैं तो आपका सेवक आपके शिष्यों के साथ यूँ ही पार उतर जाऊँगा। मुझे तो चिंता कदापि नहीं करनी चाहिये। ऐसा कहते हुए भक्त चेलोजी श्री देवजी के चरणों में गिर पड़ा।
श्रीदेवजी ने चेलेजी के सिर पर अपने दोनों हाथ रखे। उसे उठाकर गले लगाया। चेलोजी से बहुत ही प्यार किया। उसके दोनों हाथ चूमे। जिस प्रकार से माँ अपने लाडले भोले-भाले बच्चे को प्यार करती है। यही दशा श्रीदेवजी की थी। सत्य है, ईश्वर तो इसी प्रकार से जीवों से प्यार करते हैं। किन्तु ये बेटे लोग ही अपना अहंकार नहीं त्यागते, कुपात्र हो चुके हैं।
उसी समय वहाँ पर उपस्थित किसी बन्धु ने श्रीदेवजी को अपना हाथ दिखाया और कहा-महाराज! ये देखो मेरे हाथ कितने सुन्दर सौम्य हैं। श्रीदेवजी ने कहा- इन कोमल हाथों में तो कीलें ठोकी जायेंगी। हाथ पैर तो वही सफल हैं, जिससे परोपकार का कार्य सम्पन्न होवे। तूनें इन हाथों से कुछ भी नहीं किया, तो यम के द्वार पर खड़ा होना पड़ेगा।
अनेक प्रकार से श्रीदेवजी की स्तुति की तथा अपनी इच्छानुसार वरदान भी माँगा। देवजी नगीने की साथरी पर विराजमान थे। एक इमली के पेड़ के नीचे सभी को पाहल पिला रहे थे। आसपास के गाँवों के लोग आते रहे और पीते रहे। वह अमृत पाहल तो अमर ही था। वह कभी समाप्त होने वाला नहीं था। जीवनयुक्ति सिखाने वाला जल था। जिसने भी पिया, वह अमर हुआ। अपनी पंचभौतिक काया को त्याग करके भी जीवात्मा के रूप से अमर रहने का ज्ञान प्राप्त कर लिया था।
उस समय श्रीदेवजी की शोभा निराली ही थी। सभी के मध्य में विराजमान होते थे, तो उनकी मुख ज्योति चारों तरफ बराबर दिखती थी। शायद किसी ने उनकी पीठ देखी हो? मैं तो कहता हूँ- हे वील्ह! मैंने कभी श्रीदेवजी की पीठ नहीं देखी। जब भी देखा तो सम्मुख ही देखा। मैं तुम से सत्य कहता हूँ, पीठ दिखाना तो कायरता की बात है। उनके नयन, कमल दल सदृश शोभायमान थे। करोड़ों कामदेवों के सदृश उनके शरीर की कांति शोभायमान हो रही थी।
भगवां वस्त्र शरीर पर अग्नि सदृश सभी पापों की निवृत्ति की सूचना दे रहा था। सिर पर टोपी शोभायमान हो रही थी। जब वो मधुर वाणी से बोलते थे, तो उपस्थित जन समूह मंत्र मुग्ध हो जाता था। उनकी एक-एक बात को पी जाते थे। एक-एक शब्द बड़ा ही अमूल्य था। हे वील्ह! मैंने अब तक ये जो एक सौ बीस शब्द कण्ठस्थ रखे हैं। वे ही शब्द मैंने तुम्हें सुना दिया हैं। इन्हें अपने अंदर से जाने मत देना। दूसरों को सुनाते रहना। इससे तुम्हारी विद्या अनंत फ लवती होगी।
इस प्रकार से नगीने में श्री देवजी ने चार महीने निवास किया था। नाथोजी कहते हैं कि हमने तो यही सभी कुछ अपनी आँखों से देखा है। वहाँ के लोगों का प्रेम धारण किया है। मैं वहाँ की बात स्मरण करता हूँ, तो अभी भी रोमांचित हो जाता हूँ। उस विशाल इमली के पेड़ की मुझे बार बार याद आती हैं। उसके नीचे बैठे हुए श्री देवजी मुझे इस समय भी स्पष्ट दिख रहे हैं।
आप भी देखिए, अवश्य ही दिखेंगे। वे कहीं चले नहीं गये हैं। अब भी हृदय में बिठाएँ और अन्तर्दृष्टि से देखिए। अवश्य ही दर्शन होंगे। वे लोग भी धन्य हैं जिन्होंने साक्षात्कार एवं शब्द श्रवण किया है। उनका वह निष्कंटक प्रेम भी धन्य है। ऐसा प्रेम सभी का बन जाये, तो कार्य बन सकता है। विना प्रेम तो सूखी सरिता में नाव चलाने के समान सभी कुछ परिश्रम व्यर्थ ही है।
नगीने से प्रभु जी अपनी भक्त मंडली सहित रवाना हुए। चेलोजी कुलचंद जी आदि भी श्री भगवान् के साथ ही बिजनौर महमद पुर, गाँवों में अधिकारी भक्तों को ज्ञान, ध्यान, धन, संपत्ति, विद्या, युक्ति देकर गंगा के किनारे दारानगर गंज में तीन दिनों तक निवास किया। वहाँ गंगा के किनारे श्री देवजी के चरणचिन्ह स्थापित हुए। वहाँ पर भी श्री देवजी की साथरी की स्थापना हुई।
साथ में भक्त साथरियों ने गंगा स्नान कर के पुण्य अर्जित किया। सभी को पवित्र करने वाली गंगा भी आज विष्णु के चरणों को स्पर्श करके धन्य हुई। उन्हीं के चरणों से गंगा निकली थी। ब्रह्मा जी के कमण्डलु में आई थी और अंत में कुछ समय तक शिव की जटाओं में रमण करती हुई गंगा ने पृथ्वी पर साठ हजार सागर के पुत्रों का उद्धार किया।
बहुत दिनों की प्रतीक्षा के बाद आज गंगा को पुनः श्री चरण स्पर्श करने का अवसर मिला था। दारानगर को इसीलिए ही तो विशेष तीर्थ बनाया। नगीने निवासी श्री देवजी के शिष्य धनों बिछू नगीने से नित्य प्रति गंगा स्नान करने के लिए यहाँ आया करते थे। क्योंकि वो देवजी के साथ थे। इस महत्व को जानते थे।
श्री देवजी ने कहा- हे धनाजी! आप नित्य प्रति स्नान करने के लिये यहाँ पर आते हैं? यह तुम्हारा नियम तो अच्छा है। किन्तु काफी दूर पड़ता है। आने-जाने में कष्ट होता है। इसीलिए आपके घर के पास जो कुआँ है उसी पर ही स्नान कर लिया करो। वह भी गंगा जल ही है। धनो बीछू कहने लगे- यह हम कैसे मान लें कि वहाँ हमारे कुएँ का जल भी गंगा जल ही है?
देवजी ने कहा- आज तुम ऐसा करो। यहाँ गंगा में अपनी धोती छोड़ जाओ और कल सुबह अपने कुएँ पर स्नान करने के लिए पानी की सिंचाई करना, तो तुम देखना कि यह तुम्हारी धोती वहीं पर तुम्हारे कुएँ में ही मिलेगी। पानी के साथ तुम्हारा वस्त्र तुम्हारे पास ही पहुँच जायेगा। जैसी आपकी आज्ञा, वैसा ही करेंगे।
धना- बीछू ने अपनी धोती गंगा में छोड़ दी और दूसरे दिन अपने कुएँ में प्राप्त कर लीया। धनो बीछू के घर के पास वह कूआँ, जहाँ पर वे दोनों नित्य प्रति स्नान करते, वह जगह भी भुलाने योग्य नहीं है।
नाथोजी कहते हैं-हे वील्ह! तुम कभी अवश्य ही जाना और मैंने तुझे जो जो भी पवित्र स्थल बतलाये हैं उन्हीं के दर्शन करके कृतार्थ होना है। दारानगर विदुर कुटि से श्री देवजी ने आगे जाने की इच्छा प्रकट की तो नगीने आदि के पट शिष्य रोने लगे। जिस प्रकार से रामजी वनवास को चले तो अयोध्या के लोग रोने लगे थे। उन्हें श्री देवजी ने दिलासा दी और कहा- मैं आपसे दूर नहीं हूँ।
“नेड़ा था पण दूर न रहीबा” जब भी आप लोग हृदय में अन्तवृत्ति से देखोगे, तो मैं तुम्हारी आत्मा रूप में विद्यमान रहूँगा। ऐसा कहते हुए श्री देवजी जमात सहित लोदीपुर धाम की स्थापना हेतु जाकर विराजमान हुए।
लोदीपुर के भक्त जनों ने आगत स्वागत किया। पग मंडा कर साथरी में स्थापित किये। न्यात जमात के लिए तम्बू लगवाये। नाना प्रकार के व्यंजनों द्वारा न्यात-जमात को भोजन देकर तृप्त किया। चारों वर्णो के लोग श्री देवजी के दर्शन करने के लिए आ रहे थे। श्री देवजी श्री मुख से ज्ञान श्रवण करते थे। सुजीवों की खोज कर रहे थे। परिक्रमा कर के दर्शन कर रहे थे। कोटि जन्मों के पापों को हरण कर रहे थे। चारों तरफ ज्योति स्वरूप परमात्मा का दर्शन कर के कृतार्थ हो रहे थे। लोगों ने आश्यर्च चकित नेत्रों से यह दृश्य प्रथम बार ही देखा था।
लोदीपुर के धारू और घाटम दोनों परम भक्त शांत दत्तचित्त थे। इस बात को सभी जानते थे। दोनों हाथ जोड़े हुए श्री देवजी के आगे खड़े प्रेमाश्रुओं की धारा प्रवाहित कर रहे थे। भगवान् की अथाह कृपा से घाटम जी स्तुति करने लगे-
जय हो लोहट के लाला की। जो हमारे जैसे दास पर कृपालु हुए हैं। धन्य हैं माता हांसा को जिन्होंने अपनी गोद में खिलाया है। धन्य है बुआ तांतू और पीपासर के ग्वाल बाल, छोटे-बड़े सभी, जिन्होंने अपना समय देवजी के साथ व्यतीत किया। वह बागड़ देश भी धन्य है, जिस भूमि पर विष्णु के चरण चिह्न स्थापित हुए हैं। केवल बागड़ देश ही धन्य नहीं है, हमारा देश भी धन्य हो गया है। धारू स्तुति करते हुए आगे हाथ जोड़े खड़ा था।
हे देव! आपने सत्य लोक को किस कारण से छोड़ा? अब आप स्वयं विष्णु ही यहाँ पर आ गये हैं। तो मेरे सिर पर अपना वरद हस्त रखो। जिस प्रकार से प्रह्लाद के सिर पर हाथ आपने नृसिंह रूप धारण करके रखा था। आज हमारा जन्मों जन्मों का भाग्य उदय हुआ है कि स्वयं सृजन हार ही हमारी धरती पर पधारे हैं। घाटम और धारू की स्तुति से श्री देवजी अति प्रसन्न हुए और इन भक्तों को अन्य कुछ भी नहीं चाहिये, केवल भक्ति ही प्रगाढ नित्य प्रति बनी रहे। यही वरदान दिया और जीवन युक्ति और मुक्ति प्रदान की। अनेक भांति के लोग लोदीपुर में दर्शनार्थी आते और अपनी इच्छा की पूर्ति करके जाते थे। श्री देवजी के साथ में आये हुए भक्त मंडली की सेवा गुरु भाइयों ने करने में कोई कमी नहीं छोड़ी। इस प्रकार से एक माह तक श्री देवजी लोदी पुर ग्राम में रहे। वहाँ पर जितने भी प्रह्लाद पंथी जीव थे, वे सभी आकर कृतार्थ हुए थे।
नाथोजी कहते हैं- हे वील्हा! एक माह पश्चात् जब वहाँ से रवाना होने की तैयारी कर रहे थे, तभी एक सुरजी नाम की बुढिया आयी। हमने उसके प्रेम को देखा था। वह तो साक्षात् शरीर धारी भक्ति ही थी। जो मानव के रूप में आयी थी। वह हाथ जोड़ कर श्री देवजी से कहने लगी-हे देवजी! आप तो वापिस जा रहे हैं? जब आप नहीं आये थे, तब तो आपकी प्रतीक्षा में समय व्यतीत ठीक हो रहा था। किन्तु अब चले जाओगे तो इस बूढे शरीर में प्राण कैसे रहेंगे? ये मेरे प्राण तो आपके साथ ही जाना चाहते हैं, अब ये प्राण किस के सहारे से टिकेंगे?
हमने आपका बागड़ देश सम्भराथल देखा है। वहाँ के वृक्ष देखे हैं, जिनके नीचे आप बैठते हैं। ऐसा कोई वृक्ष हमारे यहाँ भी लगाइये। जिससे हम दर्शन कर के कृतार्थ हो सकें। आपके ही द्वारा लगाया हुआ रोटू गाँव में खेजड़ियों के बाग का दर्शन हमने किया है। वहाँ का दर्शन यहाँ भी होता रहे, ऐसी कुछ कृपा करो।
हे वील्हा! इस प्रकार से देवी सुरजी की प्रार्थना सुन कर श्री देव ने बागड़ देश का वृक्ष खेजड़ी वहाँ पवित्र स्थल साथरी पर लगवायी थी। जाम्भोजी महाराज की महिमा अपार है। न जाने वह खेजड़ी का वृक्ष शून्य में से कहाँ से आया? हम तथा उन ग्राम वासियों ने तो वहाँ पर वह वृक्ष लगा हुआ देखा था। कहीं से भी लाते हुए नहीं देखा था। वह वृक्ष बड़ा ही अलौकिक, प्रकृति से परे था।
कृष्ण चरित्र से तो अनहोनी भी हो जाती है। यह कृष्ण चरित्र ही था। हम तो कुछ भी निर्णय नहीं कर सके थे, क्योंकि उस देश में आस पास कहीं भी ऐसा खेजड़ी का ऐसा वृक्ष दुर्लभ है। सुरजी ने हाथ जोड़े और कहा- हे मेरे प्राणाधार! यह वृक्ष ही आपने यहाँ क्यों लगाया? इसमें यदि कुछ रहस्य है तो अवश्य ही बतलाने की कृपा करो।
श्री देवजी ने बतलाया कि वेद शास्त्रों में इस वृक्ष को शमी के नाम से कहा जाता है। त्रेता युग में इसको तुलसी कहते थे। इस समय कलयुग में इसे बागड़ देश में खेजड़ी कहते हैं कई लोग जांडी भी कहते हैं। इसकी कुछ विशेषता है। यह वृक्ष अपने आप में परोपकारी है। अपनी छत्र छाया में दूसरे वृक्षों को पनपने से रोकता नहीं है। अन्न आदि पदार्थ के लिए भूमि को उपजाऊ बनाता है। यह अपने नीचे पनपने वाले घास अन्न का जल स्वयं नहीं पीता। यह तो नीचे का गहरा पानी खींचकर पीता है। जिससे धरती में नमी बनी रहती है। पाताल का पानी आकाश में चढाने की इसकी क्षमता है। यह स्वयं खुशहाल रहकर दूसरों को भी खुशहाल देखना चाहता है।
ऐसा गुण अन्य वृक्षों में मिलना दुर्लभ है। स्वयं सर्दी-गर्मी, बरसात सहन करके अन्य जीवों की रक्षा करता है । इसी वृक्ष से सदा ही तुम्हें प्रेरणा लेनी चाहिये। यही प्रेरणा ही जीवन को सुखमय बनाने का परम आधार है। इस प्रकार से लोदी पुर में खेजड़ी वृक्ष का आरोपण कर के खेजड़ी वृक्ष का माहात्म्य बतलाते हुए श्री जम्भेश्वरजी ने पुनः जोर देकर कहा इसके
लगने वाली फली (सांगरी) शाक-पात के लिए उत्तम भोजन है। यह तो सर्व रोगों को हरने वाली अमृत बूंटी है। इसके पत्ते उंट गाय, आदि खाते हैं। इससे उनको पौष्टिक आहार मिलता है। किन्तु इस देव स्वरूप वृक्ष को कभी नहीं काटें। स्वतः ही इससे जो कुछ मिल जाये, वही अमृत तुल्य है।
नाथोजी कहने लगे-हे वील्ह! इस प्रकार से श्री देवजी ने खेजड़ी का दरखत लगाया। तुम भी कभी भ्रमण करने को अवश्य ही जाना। वहाँ लोदीपुर धाम में अवस्थित श्री देवजी की स्मृति रूप उस वृक्ष का दर्शन स्पर्श करके कृतार्थ होना। लोदीपुर गाँव से अपने शिष्यों सहित रवाना हुए और कई दिनों के पश्चात् लखनऊ पहुँचे।
लखनऊ में नवाबगंज में तंबू ताने और कुछ लोगों पर कृपा करने हेतु आये थे। लखनऊ का स्वांति शाह बादशाह श्री जाम्भेश्वरजी से मिलने के लिए अनेक प्रकारों की भेंट लेकर आया था। एक रात्रि में लखनऊ में ही निवास किया। स्वांति साह का उद्धार किया। स्वांतिसाह ने लखनऊ में नवाब गंज में हिन्दू और मुसलमान का मिश्रित मंदिर-मस्जिद का निर्माण करवाया। एक तरफ मंदिर दूसरी तरफ मस्जिद। हिन्दू मुसलमान दोनों धर्मो का समान आदर स्वांति साह ने किया था। मंदिर में पुजारी थापन था और मस्जिद में मुल्ला रहा करते थे।
लखनऊ में केवल स्वांति साह से ही विशेष कार्य था। वह कार्य अति शीघ्र पूर्ण कर के श्री देवजी सृष्टि के चक्कर से घूमते हुए पूर्व में ही औरैया, कानपुर, आदि देशों में घूमने की इच्छा से आगे बढे। कुछ दिन चलने के पश्चात् श्री देवजी ने औरेया के शिव मंदिर में आसन लगाया। चार हजार संत भक्त साथ में थे। बड़ी भारी जमात आयी है, ऐसा सुन करके स्थानीय लोग अपनी-अपनी भेंटे लेकर श्री देवजी के दर्शनार्थ आये।
पूरबियों ने देखा कि यहाँ तो सभी साधु भक्त हवन कर रहे हैं। वेद मंत्र तुल्य ही उच्च स्वर से शब्दों का उच्चारण कर रहे हैं। स्वाहा कहते हुए घृत-नारियल सामग्री की आहुति दे रहे हैं। अग्नि देव अति प्रसन्नता से उनकी दी हुई आहुति स्वीकार कर रहे हैं। ऐसे ऋषि तुल्य बिश्नोइयों का दर्शन करके कृत कृत्य हुए। आगंतुक जमात ने देखा कि उन हवन कर्ताओं के बीच में श्री देवजी ताराओं के बीच जिस प्रकार से पूर्ण चन्द्र दिखता है, उसी प्रकार दिखाई दिये। जो जहाँ आगे पीछे खड़े थे, वहीं से श्री मुख दिखता था। ऐसा मालूम पड़ता था कि स्वयं यज्ञ रूप परमात्मा ही प्रगट हुए हैं।
जिस यज्ञ नारायण की स्तुति यज्ञ द्वारा करते आये हैं, वह तो आज साक्षात ही प्रकट है। इस प्रकार से औरेया में श्री देवजी आठ दिनों तक रहे। नित्य प्रति ही होम, जप, पाठ आदि होते हुए दर्शकों ने देखा। कुछ लोगों ने तो प्रथम बार ही यह कौतुक देखा था। अन्यथा तो सदा ही ब्राह्मणों द्वारा यज्ञ होना देखते आ रहे थे। ये ब्राह्मण लोग तो बहुत ही प्रपंची थे। यज्ञ कर्म को अनेक विधि विधानों में फं सा कर लोगों की अरुचि पैदा करवा दी थी। यहाँ पर उन्होंने बहुत ही सरल स्वाभाविक रूप से इतना सात्त्विक यज्ञ प्रथम बार ही देखा था। बाह्य दिखावा तो आडंबर है। यह यज्ञ आडंबर रहित प्रेम भाव से किया जा रहा था। यहाँ यज्ञ पूर्ण होने पर दक्षिणा के लिए तू तू मैं मैं नहीं थी। यज्ञ कर्म करने में जो आनंद की अनुभूति थी, वही सच्ची दक्षिणा थी। वह उन्हें प्राप्त हो रही थी।
श्री देवजी अपनी जमात के सहित औरेया के शिव मंदिर में रहने से उस मंदिर का नाम ही हरि मंदिर हो गया। क्योंकि स्वयं हरि- विष्णु ने ही आकर निवास किया था। इससे पूर्व तो केवल शिव मूर्ति को ही भगवान् मान कर चल रहे थे। अब तो हरि के चरण चिन्हों से वह भूमि तीर्थ बन गयी थी। औरेया में प्रह्लाद पंथी जीवों को सचेत कर के श्री हरि आगे मुसाणपुर गाँव में पहुँचे।
मुसाणपुर गाँव के निवासी श्री हरि के परम शिष्य थे। उन्हें नित्य प्रति हवन करने का नियम पूर्व में बतलाया था। उसी नियम का पालन करते आ रहे थे। हवन करना चाहिये। केवल एक इस नियम का पालन हो जाये, तो दूसरे नियम तो स्वतः ही पालन हो जायेंगे। अलग-अलग बताने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। श्री देवजी के मुसाणपुर आने पर विराट यज्ञ का आयोजन किया गया। नित्य प्रति सवामन घृत की आहुतियाँ दी जा रही थी। अन्य सामग्री भी सुगंधित औषधियों द्वारा निर्मित की गयी। वहाँ का वातावरण सम्पूर्ण सुगंधमय हो गया था। ऐसा लगता था मानो यह स्वर्गलोक ही है। जहाँ केवल सुगंध ही है। सस्वर शब्दों का उच्चारण सुनकर ऐसा प्रतीत होता था मानो देवलोक में गन्धर्व गान कर रहे हैं।
हे वील्हा! मैं वहाँ की महिमा का क्या क्या वर्णन करूँ? यह वाणी उस अलौकिक दृश्य का वर्णन नहीं कर सकती। किन्तु मेरा अनुभव वाणी द्वारा बाहर निकलना चाहता है। इसीलिए मैं बिना कहे रह नहीं सकता। दूर दराज गाँवों के लोग आते, यज्ञ स्वरूप विष्णु जाम्भोजी का दर्शन करते और कृत कृत्य होकर वापिस चले जाते। यह कार्यक्रम कई दिनों तक चलता रहा।
शहर कन्नोज में एक खड्ग सिंह राजा रहता था। वह कहीं वन में गया था। किसी ऋषि के आश्रम की मर्यादा का उल्लंघन किया था। इस कारण से राजा को कोढ हो गया था। वह बीमारी दिनों दिन बढती ही जा रही थी। राजा स्वयं तो सचेत नहीं हो सका, किन्तु किसी ज्ञानी आदमी ने बतलाया कि यह कोढ किसी दवाई से ठीक होने वाली नहीं है। जिस अपराध से यह रोग लगा है, उसी अपराध की शांति से यह रोग मिटेगा।
राजा के बात समझ में आ गयी और सदा ही प्रतीक्षा में रहता था कि कब कोई ऐसा देव पुरुष आये और मैं उनसे क्षमा याचना करूँ जिससे मेरे रोग की निवृत्ति हो सके। हे वील्ह! जिस समय श्री देवजी मुसाणपुर में विराजमान थे, वह समय खड्गसिंह ने मिलने के लिए उचित समझा। जाम्भोजी के पास पूर्ण श्रद्धा विश्वास से राजा अपने राज्य अहंकार को गिराकर शुद्ध पवित्र होकर श्री देवजी से मिलने के लिए आया था।
श्री देवजी साथरियों के साथ विराजमान थे। हमने देखा कि वह राजा बहुमूल्य अनेकों भेंट लेकर आया था। श्री चरणों में अपने प्रिय धन के साथ ही अहंकार को भी चढा दिया था। श्री देवजी के चरणों में गिर कर गिड़गिड़ाने लगा था। देवजी ने कृपा कर के उसके सिर पर हाथ रखा। तभी खड्ग सिंह ने अपने शरीर को देखा तो कोढ झड़ चुकी थी।
हे वील्ह! इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। श्री विष्णु के सामने तो किसी भी प्रकार के पाप और पाप से उत्पन्न रोग कष्ट कैसे टिक सकते हैं।
सूर्योदय होने पर अंधकार कहाँ टिकता है? सेर की गर्जना सुन कर वन्य जीव कहाँ टिक पाते है? श्री विष्णु ने तो अपने दिव्य चरित्र से बड़े बडे भयंकर राक्षसों को भी पछाड़ दिया। वह विचारी कोढ कितनी सी है? जो विष्णु के सामने टिक सके।
शुद्ध पवित्र शरीर हो जाने से राजा ने जामात तथा श्री देवजी को बहुत बहुत धन्यवाद दिया और प्रार्थना करने लगा- हे देव! आप सम्पूर्ण जमात सहित मेरे घर पर अवश्य ही चलो। मैं आपकी सेवा कर के जन्म सफल करूँगा। भक्त के प्रेम भाव को किसने ठुकराया है? भगवान् तो प्रेम को देखकर दौड़े आते है। प्रेम ही संसार में सार है। बिना प्रेम तो नटवर नागर रिझते ही नहीं हैं। इस प्रकार से प्रेम भाव से अभिभूत होकर श्री देवजी के साथ हम सभी लोग कन्नौज गये थे।
मन इच्छित भोजन कर के तृप्त हुए थे। वहाँ के प्रेम भाव को कैसे भुलाया जा सकता है? अभी भी कभी-कभी याद हो आती है। राजा ने बहुत ही बहुमूल्य भेंट श्री चरणों में रखी थी। जाम्भोजी ने कहा- हे राजन! ये बहुमूल्य वस्तुएँ मुझे नहीं चाहिये। इन्हें तू वापिस लेले और किसी परोपकार के कार्य में लगा दे।
राजा ने पूछा- हे देव! इस समय मैं क्या परोपकार का कार्य करूँ? जो आपकी आज्ञा हो वही कार्य मैं करूँ। श्री जाम्भेश्वरजी ने कहा- यहाँ पर जहाँ मेरा आसन है, वहीं पर दिव्य मंदिर का निर्माण करवावो। यहाँ पर इस मंदिर में सभी प्रकार के लोग आयेंगे और अपनी इच्छा पूर्ति करेंगे। यह मंदिर सर्व साधारण के लिये श्रद्धा का केन्द्र होगा।
नाथोजी कहते हैं- हे वील्ह! राजा खड़गसिंह ने वहाँ पर दिव्य मंदिर का निर्माण करवाया। वैसे तो मंदिर की आवश्यकता नहीं है। हृदय रूपी मंदिर में परमात्मा साक्षात विराजमान होकर इस शरीर का संचालन करते हैं। फिर भी अल्पज्ञ जीवों के लिए बाह्य विग्रह की भी आवश्यकता होती है। छोटे बच्चों को कसे कबूतर बताया जाता है। किन्तु जब बड़ा हो जाता है जो क को तो पकड़ लेता है और कबूतर को छोड़ देता है। उसी प्रकार से प्रारम्भिक अवस्था में तो मंदिर चित्र आदि का सहारा लेना ही पड़ता है, बाद में जब ज्ञान हो जाये तब स्वतः ही छूट जाता है।
मुसाणपुर एवं कन्नौज से चलकर श्री देवजी कालपी यमुना जी के घाट पर शोभायमान हुए। जहाँ पर हरि ने तम्बू लगाया, वहाँ पर भी हरि मंदिर का निर्माण वहाँ के लोगों ने करवाया। जाम्भोजी के चेले रतनदास ने वहाँ पर मंदिर बनवाने में तन-मन-धन समर्पित किया था। वहीं विष्णु मंदिर की ही राम-कृष्ण आदि नामों से पूजा अपनी रुचि के अनुसार ही पुजारी लोग करते हैं। तीन दिनों तक जाम्भोजी ने कालपी में निवास किया।
वहाँ से आगे चलकर श्री देवजी कानपुर आये। वहाँ पर भी अधिकारी जीवों को सचेत किया। पूरबिये बिश्नोई वहाँ पर व्यापार करने वाले दर्शनार्थ अपनी अपनी भेंट लेकर आये। दर्शन करके अपने पापों का विनाश किया। अपने जीवन को सफल किया।
नाथो जी कहते हैं- हे वील्ह! जब हम लोग देवजी के साथ पूर्व देश में भ्रमण कर रहे थे, तभी वहाँ के लोग एकत्रित होकर अपनी एक समस्या का समाधान करवाना चाहते थे। देवजी से आज्ञा लेकर उनमें से एक प्रतिष्ठत व्यक्ति ने कहा- हे देवेश! हमारे यहाँ पर मुसलमान बहुत ज्यादा हैं। वे यदि हमारे धर्म पालन करने में विघ्न पैदा करें, तो हमें क्या करना चाहिये? आप ही हमें कुछ शक्ति प्रदान कीजिए ताकि हम उनको जवाब दे सकें। हमारा धर्म निर्विघ्न चलता रहे। तब श्री देवजी ने एक दिव्य चमत्कार दिखाया। उसके बारे में मैं तुझे बतला रहा हूँ।
एक सम वीसनोई गंगापार पूरब का अरज कीवी। जांभाजी! तुरकाणी को जोर है। कोई हम कुं तुरक संताव तो क्या जवाब देंगे। जाम्भाजी कोरौ कागद लपेटय दीनी। उघाड़ दैखे तो मांही अरबी दसकत है। पारसी नवीसां नूं बचाया। पजनामौ नीसरयौ-
एक समय गंगा पार पूर्व के बिश्नोइयों अर्ज करी, हे जाम्भाजी! हमारे यहाँ पर मुसलमानों का बाहुल्य है। यदि हमें कोई तुरक सतावे तो हम उनका क्या जवाब देवें? जाम्भोजी महाराज ने एक सफेद बिना लिखा हुआ कोरा कागज हाथ में लिया, उसे लपेट दिया। थोड़ी देर में उसे उघाड़ कर देखा तो अंदर अरबी भाषा में लिख हुआ था, तथा नीचे श्री जाम्भोजी के हस्ताक्षर थे।
वहीं पर किसी अरबी फारसी जानने वाले को बुलाकर पढाया गया, तो वह पंचनामा था। वही अरबी फारसी में लिखा हुआ पंचनामा नीचे लिखा जा रहा है। अरबी जानने वाले लोगों के लिये। इस प्रकार का पंचनामा उस अरबी जानने वाले ने पढकर सुनायाविसमलाह
हिर रमांने रहीमः फ रमान बंदगी। हजरतिः सेखभल सायखेः अवलीया हजरतः सेखजीहान मां वियावानीः कुद सुलाहः श्रहुला अजीज वजान मुरीदां नैः वो मात कदानः पीरा मूरी ही फ रमुद अंद केह जरती बंदगीः सेख मजकूरः गोसत ने में खुरद अदः वगल व आवः न खुरद अंदः प्रहेज दसतः सबुबराजः खवाबनबुद्धः एक पायइसतादः में मांदः रोजे वजवान मुबारकः फ रमुद अद किमादर दुनियाः फेसतात कसे आमैदमः फि सरान हि दवाराः दर असलामेः चुन्पांच कंज गाराः दान में अंदज दुहम चुना वजु वांनी फ सीः नौ मुसलमै साखतः वदरदीनः महंमदरसुल अलाः स लला अलेव सलांमः आवरदमः सीजद वजु ज खुदाया ताला दिगररा क्रंदनः दुरसीतनेसः व अजखुरखद अंदः सरावः वभंगः वपोसतः व अफीमः ववद अंमैल जहाँ वह रात परहेजः कु नांनीदः एम वायदकेः हरि मोमिनः गवाजवस्यः ताब रइ सांराः नजरि सफ कत बुबीनंदः दरखेयाल हीलः इसांन अफ त दवौ आकु नंद वौइज कुमंदः अमा हजारः सुकर सत केफ र जदांन हिदवानःपबुरजरगांन खुदगुजासतः कलमै महैमद रसुलः अरज में कुनंदः दराइदः अजीचवेह तरः हम दरीफ र मुद अदः केमुरी दान वफ रजदानः मनजी करह क सुभान हु तालाः सबुबरोजः गाफेल नै वासदः चुना चदर कलाम मजीद वौ फुरकानै हमीदः खंद खबर हा दइसा या अइय हुलजीनः अवमू जिक्र लाजिक्रनः कसीर नकसीराः त्रजमाइनसः एक सांने कइमान आवर दइ दपसियादे कुनंद खुदायतालाशः वसयार इयांन सबु वराजः काम कालु लाहताला जिक रूलाहः कया मनव कउदनः अलाजनु वहेमः वयत फुकरन यानीयाद कुनंद खुदापराः दरिहाल इसदादवतीस सतः व पहलु सत व पहलु जदः वहर चुक वासदः व अजाजी कर खुदायताला राः गाफैल ने वासदः ववाजे सलातीन्यः मोज्य मसेखरा सुकरानमाल वइ मलाक ये समै आंव रदः हजरति सेख कबुल न करद अदः वरखु वासत इसौः वरइवद की मुरीदरन फ रजदानः मराकसनरूः जानंदः सलाती न्यवर इमांनीः मंजै मैं जुमलः हबुबात दीवानी चुला जल कुत वफ र जोट वगर जालकः माफ फ रमुद ओदः के मुरीदानः वफ रजदान मनः नैवा यद के समावद दसत सेखः हलाक सवदः जराकर सुलः अला सललाहः अलेहु सलमैंः फ रमुद अंदः कातुलेलन पसफि नारि हरके खुदराहला कमें कुनंद जाय वौदर दोजख सः अगर समांराराजः वो मु जाहमत विरसानदः पस एस वरकुनदः तां जायजा अज खुदाय करीम वर रहीमः विसावदः अगरतोफि क खबर नै वासदः पस एहा करम सरः यह मैदर सुलराः इला सरे सांनदः अगर वो जोई निसाफ नै वासदः अंगा कसतः वरतन वस कुनंदः वदि गरफ र मुदनः पंज बखत गुसलःबुकुनंदःनिमाज बुग जारदःव रोजे माह मुवार करःमजान वेदारदःवज कुतमाल विदहेदःनीयत हजकाब विर सांनदःतावा जे मुरीदानःइलत मास करद अदःकीह जरती पीर दसत गीरजीःमापंजवखतःगुसलकरदनःचुगने तो वांनःमैवाज फ र मुदनःकेदर वक्षत वामदादःगुसल बुकनंदःवदिगर वखत हाये वजू साखतःनिमाज बुकनंदःचुन्याचरू सुलःसलला अलउ सलमैःफरमुद असत असला तइमा दुदीन फमनःअकमहा फगदःअकामुदीन मत्र कहा कुफ नलःहदमुदीनःइयान नीमाज रावर पाय दारद पस चुनान सती के दीनःखुदरावरपास दासत वासद वाके सेक नीमाज रात्रःकदे हददीन खुदराख रा बकर बकरद वासद्यःवगां सत खुदरन परहेज कुनंदःव दुरी वासदःकी दिलरास्याह कुनंदःवसु दसु वाइगरा खुरदन परहेज कुनंदःव दुरीवासदःकी वहर के सदःसवाइ वगीदःइके दान दकी वौ अजमानेसःऔमा अजवौ नसतमैं कालुलाह तालाःयाकल नरवौ फ हुव असुदल अजाःदिगर फ रमुद अज खुरदन गोसत ही साबःवीसी मारसःचुकम सायखानःमहमदी व खवानंद की गोसत व खुरदःजानवर वखुसी खुरदे आंमदमज बुइसुदहीम चुनीफ रमानःहक सुभानुहुतालाःजंद सुध व चराहगां मरफ तःपस एमुरीदान मनःए चुनी करामातःदरमीयान सुं मा कु जासं की जानवर वखु सीखुरदं आमंद मजबुसवाद वकीत वान दकी वो राज्य दाःकुनदप सवेह तरस की परहेज कुनंदःगल वगल खुरदन माफ सव जांम च्यारय सदीवा पांच सदीम फ साह कसु भानहुं तालाःमहमंद मुसतफाःसललाह अलहु सलमःअफंव फ रमंद सव कलमै तइय बगोयदःअलाहि लाहि इललाहि महमंद रसूली लाहि तादर आयंद भर भिसत विलाही साबःवलिलाय जाब एति य जनामु”””
एक सम जाम्भोजी आपका हजुरीया नु कह रे थे मांड की पहेली जांणौ थौ।
जाम्भोजी कहया जाण्यस्यां -जाम्भोजी पहेली कह -
मांडा सगते धरम कराइयां,जां धरमां उपरी भाव।
दोनो पंथ बताइयां,मनै मानै जीह जाय।
साथरियाँ कहे देवजी इह कौ विचार कहो -जाम्भेजी विचार कह्यौ,श्रब जमाती सुण्यौ। नाथजी वील्ह जी न कह्यौ वील्ह जी कथा ग्यान चरी कही -
पूर्वदेश कन्नौज कालपी कानपुर आदि में भ्रमण करते समय श्री देवजी ने वहाँ के लोगों को धर्म पर दृढ रहने के लिये कहा था। उपरोक्त शब्द प्रदान किया था तथा बतलाया था कि यदि कोई आपके साथ जोर जबरदस्ती करे, तो उपरोक्त पंचनामा शब्द दिखा देना।
कभी भी धर्म को जोर जबरदस्ती से नहीं चलाया जा सकता। धर्म तो अपनी इच्छा के अनुसार ही ग्रहण किया जा सकता है। धर्म तो स्वभाव है। अपना स्वभाव तो अपना ही रहता है। दूसरे का जोर जबरदस्ती थोपा नहीं जा सकता। थोड़ी देर के लिये भले ही किसी को मजबूर किया जा सकता है, किन्तु समय आने पर पुनः यथावत हो जाता है।
नाथोजी कहते हैं-हे वील्ह! उस समय की बात है जब श्री देवजी के साथ हम कानपुर में थे। एक समय श्री जाम्भेजी ने स्वयं ही अपने साथ रहने वाले साथरियों से पूछा-आप माड यानी जोर ने पहेली का विचार बतलाया-यदि जबरदस्ती-शक्ति के बल पर धर्म चलाते हैं तो वह धर्म नहीं है। हिन्दु या मुसलमान जिनका जिस धर्म पर भाव है, वही धर्म ग्रहण करेगा।
दोनों हिन्दू एवं मुसलमान धर्म बता दिया है। जिसको जिस धर्म पर चलना है, वह उसी धर्म पर चले। इस प्रकार का विचार श्री देवजी ने बतलाया। सभी साथरियों ने सुना । हे वील्ह मैंने भी सुना था। और वही विचार मैं तुम्हें बतलाता हूँ। तुम भी इस विचार से आगे बढना।
इस प्रकार से श्री देवजी कानपुर से जबलपुर और गाडरवाड़ा होते हुए मालवे आये। वहाँ पर महाराज एवं दावद दोनों भाइयों को सचेत किया। ये लोग भी पूर्व देश के रहने वाले थे। श्री देवजी को देखकर उन्हें चेता हुआ। अन्यथा ये लोग बिश्नोई पंथ से दूर हटते जा रहे थे। साक्षात् विष्णु ही आये हैं, ऐसा देख कर वहाँ प्रहलाद पंथ के छः सौ जीव भी श्री चरणों में आये और पुनः अपने पंथ को प्राप्त कर के अपनी सद्गति प्राप्त की। सोध्या जीव सुजीव “सुजीवों की खोज की थी। यह बात सत्य है।
वहाँ से चलकर जमात मेवाड़ आयी। चित्तौड़ देश के शासक सांगा राणा और उनकी माता झालीराणी श्री देवजी के अनुयायी थे। सांगा की मांग पर ही श्री देवजी ने पूर्व देश के व्यापारियों को चित्तौड़ की राज्य सीमा में पुर, दरीबा, संभेलिया आदि गाँवो में बसाया था। वहाँ क्षत्रिय वंश के बिश्नोई निवास करते हैं। पुर में घाटमजी थापन रहते हैं। वहीं पर श्री देवजी विराजमान हुए।
पुर निवासियों ने सुना कि देश देशान्तरो से भ्रमण करते हुए आज हमारे देव हमारे ही ग्राम में पधार चुके हैं। गाँव के लोग एकत्रित होकर ढोल नगाड़े मृदंग आदि अनेकों वाद्य बजाते हुए नृत्य गान करते हुए श्री देवजी का स्वागत किया। श्री जाम्भोजी ने उन्हें ज्ञान, ध्यान नियमों का उपदेश दिया। उनके द्वारा दी हुई प्रेम भेंट स्वीकार की। संत शिरोमणि श्री देवजी पुर गाँव में विराजमान थे।
सदा ही साथ में रहने वाले हरि के परम भक्त रणधीरजी एक दातुन तोड़ लाये। वैसे तो जाम्भोजी ने नियमो में कहा था कि हरा वृक्ष नहीं काटना अर्थात् दातुन भी हरे वृक्ष का नहीं तोड़ना। किन्तु रणधीर जी ने दातनु तोड़ी। इसलिये अपराधी भाव से मुँह नीचे किये हुए खड़े थे। जाम्भोजी ने देखा कि आज रणधीर उदास खड़े है। हाथ में बैर की दातुन ले आया है।
जाम्भोजी ने कहा-हे रणधीर! यह दातुन तुमने झाड़ी की ही तोड़ी है, किन्तु डाली तोड़ तो डाली ही है। अब तुमने अपराध कर ही डाला, किन्तु अब भी समय है इसे तू जमीन में गड्ढा खोदकर गाड़ दे। यह पुनःअपने आप जैसी बैरी थी, वैसे ही बन जायेगी। इसके मीठे-मीठे फल लगेगें। बच्चे बड़े लोग जीमेंगे तो तुम्हारा प्रायश्चित हो जायेगा। यदि जान या अनजान में वृक्ष को हानि पहुँची है यानि काटा गया है तो उस पाप का शमन करने के लिये पुनःदूसरा वृक्ष लगाया जावें।
हे वील्ह! इस प्रकार से श्री देवजी के कहने पर उनकी ही प्रेरणा से वह डाली गार में गाड़ दी गयी। वही डाली हराभरा फ लदार वृक्ष बन गया। अब भी वहीं खड़ा हुआ श्री सिद्धेश्वरजी की स्मृति ताजा करता था। अभी ही कुछ समय पूर्व मुझे समाचार मिला है कि घाटम जी का एक छोटा सा पौत्र उसी बैर के नीचे खेल रहा था। उस बैर का एक काँटा चुभ गया। छोटा बच्चा रोने लगा-उस बच्चे की माँ ने उलाहना देते हुए कहायह
जाम्भोजी ने क्या किया? बैरी का पेड़ लगाया है। यदि बड़-पीपल लगाते तो दर्शन ही करते। आज इस प्रकार से काँटा तो नहीं चुभते। इस प्रकार से दुःखी मन से घर परिवार के लोग सो गये। प्रातःकाल उठकर देखा तो वहाँ पर बैर के बीच में बड़ उग आया था। यह दिव्य चरित्र गाँव के सभी लोगो ने देखा था। अब तक तो वह बैर में उगा हुआ बड़ का पेड़ ज्यों का त्यों खड़ा हुआ है। श्री देवजी का परिचय दे रहा है।
इस प्रकार से पाँच दिनों तक श्री देवजी पुर में ही रहे। जहाँ पर चरण चिह्न चिह्नित हुए वहाँ पर साथरी बन गयी। पुर से रवाना होकर श्री देवजी दरीबा होते हुए संभेलिया पहुँचे। संभेला गाँव के पास ही सांगा राणा ने तालाब खुदवाया था। तथा तीर्थ स्नान के लिये पेड़ियाँ बन्धवायी थीं।
सभी जाति पाति के लोग वहाँ पर एकत्रित हुए थे। वहाँ पर समेलन किया था। इसलिये उस जगह का नाम संभेलिया पड़ा। परम पवित्र तालाब के किनारे श्री देवजी ने आसन लगाया था। वहीं पर ही हवन यज्ञ करके ज्योति की स्थापना की थी। श्री देवजी ने तालाब का महात्म्य बतलाते हुए कहा था कि यह स्थल गंगा यमुना जाम्भोलाव सदृश ही परम पवित्र है। इस तीर्थस्थल में स्नान करने से पापों की निवृत्ति होती है। जहाँ पर श्रीदेवजी ने आसन लगाया था, हवन किया था, वहाँ पर एक स्थिर थम्भा (खंभा) रोपा था। उस पर एक पटड़ा चढ़ाया था, जिसे यज्ञ स्तूप कहा जाता था।
सांगाराणा ने पूछा था कि- हे हरि! यह क्या कौतुक कर रहे हैं? श्रीदेवजी ने सांगा को सचेत करते हुए कहा था मैंने यहाँ पर तुम्हारे राज्य की स्थिरता हेतु यह यज्ञ स्तूप रोपा है। जब तक यह स्थिर रहेगा तब तक तुम्हारा राज्य भी स्थिर रहेगा। ध्यान रहे कि इसे कोई हिला न पाये। यदि हिल गया तो तुम्हारा राज्य भी हिल जायेगा।
सांगा राणा ने बात सत्य कर मानी और वहाँ पर चौकीदारी करने हेतु अपने सिपाहियों को बिठा दिया था तथा उसी उपलक्ष्य में साल में दो मेले भरते हैं। हे वील्ह! इस समय तो वहाँ पर जाम्भोजी का चेला साणिया भूत-प्रेत सेवी वहाँ पर पहुँच चुका है। उसी चौकी पर ज्योति मंदिर का निर्माण कार्य प्रारम्भ करने के लिए प्रयत्नशील है तथा तालाब की संवराई खुदवायी का कार्य भी उसने अपने हाथ में लिया है।
हे वील्ह! मुझे वि≥वास है कि यह व्यक्ति वहाँ पर विशाल मंदिर का निर्माण करवायोगा क्योंकि उसको वही पर इमली के पेड़ के नीचे अथाह धन की प्राप्ति हुई है। इसमें भी मैं श्रीदेवजी की ही प्रेरणा मानता हूँ। मुझे पूर्ण विश्वास है। क्योंकि इस मंदिर की नीव तो श्री देवजी ने अपने ही हाथों से रख दी थी। जाम्भोजी का प्रारम्भ किया हुआ कार्य तो अवश्य ही दिव्य तथा परिपूर्ण होगा।
सद्गुरु जाम्भोजी ने मेवाड़ में परोपकार का दिव्य कार्य पूर्ण करके वहाँ से आगे चले और मेड़ता की तरफ प्रस्थान किया। पीछे नौबत बजती रही। अश्रूपूर्ण नेत्रों से प्रेम विभोर होकर श्रीदेवजी को निहारते रहे। जब तक आँखों से ओझल नहीं हो गये, तब तक उन लोगों को एकटक दृष्टि लगाये हुए देखा गया।
हे वील्ह! प्रेम ही जीवन का रस है। बिना प्रेम का जीव तो शुष्क मरुभूमि की तरह केवल नाममात्र का है। सभी प्राणियों के प्रति प्रेमभाव हो, तो उन्ही में ईश्वर का दर्शन सुलभ करवाता है। प्रथम प्राणियों के प्रति प्रेमभाव होवे, तो उसी प्रेम का विस्तार ही ईश्वरीय प्रेम है। वहाँ के लोगों का प्रेमभाव तो हमने अद्भुत अनिर्वचनीय ही देखा था। संतों की मण्डली श्रीदेवजी के पीछे गंगा की धारा सदृश चली और मेड़ता आ पहुँची।
मेड़ता के राव दूदा को श्री जाम्भोजी ने केर की लकड़ी दी थी और कहा था कि यह खांडा ले जाओ। जब तक पास में रहेगा, तब तक तुम्हारा राज्य स्थिर रहेगा। इस बात को दूदा का बेटा जानता था। अपने पिता के लिए राज्य दिलाने वाले को भी जानता था। उस समय दूदा का बेटा राजसिंहासन पर विराजमान था। वह अपने परिवार के लोगों के साथ श्रीदेवजी का स्वागत करने हेतु अनेकों प्रेम की भेंट लेकर आया था।
राजा ने प्रार्थना करते हुए कहा-हे देव! आप अपने शिष्यों के सहित हमारे राजमहल में अवश्य ही पधारें। हम आपका उपकार कभी भी नहीं भूल सकते। आपका ही दिया हुआ यह राज्य है। हम सभी आपके ही अधीन हैं। हमारे रनिवास में आप चलें। आपकी बेटी मीरा आपके दर्शनों के लिए लालायित रहती है। दिन रात न जाने क्या कुछ मन ही मन गुनगुनाती है। यह कैसी बालिका है? हम तो उसकी गति को नहीं समझ सकते।
हे वील्ह! मीरा का दादा राव दूदा जाम्भोजी का परमभक्त था। जैसा दादा था, वैसा ही संस्कार मीरा में जन्मजात थे। दादा तो परलोकवासी हो गये, किन्तु अपनी पौत्री में भक्ति का बीजारोपण कर गये थे अथवा पूर्व जन्म की कोई भक्त देवी ही राव दूदा की पौत्री बनकर आयी थी। इस जन्म में मीरा को सद्गुरु की परमावश्यकता थी। बिना गुरु के तो अन्धेरे में लट्ठ मारने वाली बात ही थी। दूसरा जन्म होने से पूर्व जन्म के संस्कार सोये हुए थे। इस समय कोई ऐसा आवे, तो उन संस्कारों को जाग्रत कर दे। मीरा इस समय समझदार बालिका थी। उसे तो केवल एक ज्योति मिल जाये, तो अंधकार तो भागने के लिए तैयार ही था।
जाम्भोजी ने अपने शब्दों में कहा था- “जो ज्यूं आवे सो त्यूं थरपा, साचा सों सत भायों।” जो जिस भावना योग्यता से आता है, श्री जाम्भेश्वरजी कहते हैं कि मैं उसको उसी योग्यता के अनुसार ही ध्यान कर्मादिक देता हूँ और जो सत्य में प्रतिष्ठित लोग है वे तो मुझे बहुत ही प्यारे हैं। मीरा भी अभी बालिका ही थी। उसे किसी भी तरह से समझाया जा सकता था। वह मार्ग जो उसके अनुकूल भी हो और आसान भी हो। श्रीदेवजी ने मेड़ता के राव दूदा के महल में मीरा बालिका को एक बाल कृष्ण कन्हैया की सुन्दर मूर्ति प्रदान की और सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते हुए कहा-
हे बेटी ! यह तुम देख रही हो। यह कौन है? यदि तुम नहीं जानती हो, तो बतला देता हूँ। यह कृष्ण कन्हैया है। यही जगत का स्वामी है। यही घट-घट व्यापक अन्तर्यामी है। यही तेरा सर्वस्व स्वामी है। इसके अतिरिक्त इस जीव का कोई साथी नहीं है। इसकी ही पूजा-अर्चना किया कर। मीरा ने सहर्ष वह मूर्ति लेकर अपनी छाती से लगायी और सदा-सदा के लिए प्रेमसम्बन्ध जोड़ लिया। अभी बालिका के शुद्ध हृदय में वह परमात्मा का विग्रह बैठ गया था।
मीरा ने कहा- “मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई” जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई। एक समय मीरा की माँ कहीं विवाहोत्सव में जाने की तैयारी कर रही थी। मीरा ने स्वाभाविक रूप से पूछ लिया कि माँ! आज कहाँ जा रही हो? मीरा की माँ ने कहा- बेटी! आज अपने ही सम्बन्धियों की बेटी का विवाह है, वहाँ पर दूल्हा आयेगा। वही मुझे जाना है। मीरा ने पूछा- मेरा पति दूल्हा कौन है? कब आयेगा? माँ ने कहा- तेरा पति तो युगों-युगों का स्वामी कृष्ण कन्हैया जो है। उसे तो तुम अपने पास ही छिपाये रखती है वही तुम्हारा दूल्हा है।
मीरा ने जाम्भोजी की बात सुनी थी। वही बात अपनी माँ के मुख से भी सुनी थी और पक्की गाँठ बाँध ली थी तथा मीरा ने घोषणा कर दी कि मेरा पति तो कृष्ण कन्हैया ही है। मेरे सद्गुरु जाम्भोजी तथा माँ ने भी मुझे यही बतलाया है। तभी से मीरा “मैं तो अपने सवांलिया की आप ही हो गयी दासी रे”
नाथोजी कहते हैं-हे वील्ह! भले ही मीरा का विवाह चित्तौड़गढ़ के राणा परिवार में राजकुमार रतनसिंह से हुआ था। सांसारिक सुख में मीरा अपने सांवरिये को भूल नहीं सकी थी। राज परिवार की बहू बन कर गयी थी। राज नियमों एवं अपने कर्तव्यों का पालन भी किया, किन्तु उसकी दृष्टि सदा ही भगवान् में लगी रही।
कुछ समय पश्चात् ही मीरा के पति का देहान्त हो गया था। जिनकी गोद में खेलकर मीरा बड़ी हुई थी, उन राव दूदा का देहान्त तो पहले ही देख चुकी थी। इस समय अपने पति एवं अपनी जन्मदात्री माता का भी देहान्त भी मीरा ने देखा था और झेला भी था। संसार की असारता को प्रत्यक्ष देखा था। मीरा को वैराग्य हो गया और अपने मायके मेड़ता में ही अधिकतर रहने लगी। साधु संत, भक्तों की संगति करना, भजन गाना, प्रेम में नृत्य करना, मीरा के लिए तो सहज ही था। किन्तु राजपरिवार इससे सहमत नहीं थे। वे मीरा से नाराज रहा करते थे।
मीरा को अनेकों कष्ट भी दिये। किन्तु मीरा कष्टों को भी सुख मानकर सहन कर गयी। विष का प्याला भी अमृत करके पी गयी। विषैला सर्प भी गले का हार मानकर पहन लिया। परमात्मा जिनकी सहायता करते हैं, उनके लिए सभी विघ्न बाधाएँ निर्मूल हो जाती हैं। मीरा को उपदेश देकर जाम्भोजी ने राजा से कहा-
हे राजन्! तुम अपने पिता की चलाई हुई मर्यादा को भूल नहीं जाना। मेरा दिया हुआ खांडा और भगवां वस्त्र जब तक तुम्हारे राज्य में रहेगा, तब तक तुम्हारा राज्य स्थिर रहेगा।
हे वील्हा! दो दिनों तक जाम्भोजी महाराज मेड़ते में ही रहे और वहाँ से आगे के लिए प्रस्थान किया और मनाणै गाँव पहुँचे। मनाणै में मेंहदोजी राहड़ रहते थे। उन्होंने देवजी को तन-मन-धन समर्पित किया और जमात के लोगों को प्रेम से भोजन भी दिया। श्रीदेवजी के चरणचिह्न मंडवाकर अपने घर में रखे। वहीं पर छोटा भाई टोहोजी भी उनतीस नियमों का पालन करते हुए रहते थे। उन्होंने वृक्षों की रक्षा करने का बीड़ा उठाया था।
वहाँ से आगे पोलास गाँव में श्रीदेवजी ने आगमन किया। सम्पूर्ण न्यात जमात श्रीदेवजी से मिलने के लिये आयी। वहाँ के गाँवों के लोग भी जैसे हुड़िया, मनाणा, मोखमपुरा, भूतावा, दाबड़िया, पालड़ी, रामपुर , दमोही, आसोजाई, कुचामण, नैणास, पुनास, राजोद, बिचपड़ी, जालोड़ी, राणा, इत्यादि सभी गाँवों के लोगों ने एकत्रित होकर धर्म मर्यादा में रहकर जीवनयापन करने की प्रतिज्ञा की।
मेड़ता के गाँवों से आगे चले और प्रभुजी रामड़ावास जा पहुँचे। श्री की सुन्दर सौम्य मूर्ति का दर्शन करके भक्त लोग आनन्दित हुए रामड़ास में जगदीश्वर ने स्वयं आकर डेरा लगाया था। इसलिए उस को बडेर कहते हैं। बड़े लोगों द्वारा डेरा (आसन) लगाने के कारण बडेर कहते हैं। रामड़ावास में बहुत दिनों तक श्रीदेवजी रहे थै। वहाँ पर चौसठ गाँवों के लोग एकत्रित हुए थे। इसलिए रामड़ावास का महत्त्व बढ़ गया था। ये सभी गाँव जोधपुर राज्य के अधीन हैं। वहाँ पर राजा जोधा, सांतल, मालदेव तो पूर्व में ही श्री जाम्भोजी से परिचय प्राप्त कर चुके थे।
जम्भेश्वरजी जब रामड़ावास में पधारे थे, उसी दिन कार्तिक पूर्णिमा थी। उसी दिन प्रथम वार रामड़ावास में चौसठ गाँवों का मेला भरा था। उसी दिन की स्मृति में अब भी कार्तिक पूर्णमासी को मेला भरता है। रामड़ास तथा अन्य गाँवों को कृतार्थ करके एक दिन सवेरे ही श्रीदेवजी रामड़ास को धाम बनाकर चल पड़े।
उनके पीछे-पीछे जमात के लोग चले आ रहे थे। न जाने अब आगे कहाँ जायेंगे, कौनसे जीवों का उद्धार करेंगे? ऐसे जीव भी कौन से रह गये हैं, जिनका कल्याण होना है? जमात के लोग पीछे-पीछे चले आ रहे थे। किन्तु जिज्ञासा शांत नहीं हो रही थी। एक रात्रि मेवासी की पहाड़ी पर व्यतीत की। इसलिए उस पहाड़ी को मेवासो कहते हैं।
वहाँ से भी प्रातःकाल प्रस्थान किया और दूसरे दिन लोहावट के जंगल में पहुँचे। लोहावट का वही जंगल जहाँ पर इससे पूर्व भी जोधपुर नरेश मालदेव से भेंट हुई थी। लोहावट की साथरी में तीन दिनों तक निवास किया और आगे बढ़ चले। एक रात्रि मूंजासर तथा दूसरी रात्रि पड़ियाल पहुँचे और वहाँ निवास किया। तीसरी रात्रि को शाम के समय जाम्भोलाव पर पहुँचे।
वहाँ सरोवर पर जालवृक्ष के नीचे श्रीदेवजी विराजमान हुए वहीं पर सभी आसपास के गाँवों के लोग आये थे। उसी दिन से ही मेले की स्थापना हुई थी। जिनके मन में जो भी संशय था, उसी का समाधान श्रीदेवजी से चाहते थै। जाम्भोजी ने आये हुए भक्तों के भावों को देखकर अनेकों प्रकार से ज्ञान देकर समझाया था।
जैसलमेर के राव जैतसी ने यह सुना कि श्रीदेवजी हमारे देश में लोगों को कृतार्थ कर रहे हैं। तुरन्त अपने सभी कार्यक्रम छोड़कर के जाम्भोलाव पर आकर श्रीदेवजी के सामने हाथ जोड़कर उपस्थित हुआ। राव जैतसी ने हाथ जोड़े- हे देव! अब तो मैं भी बुढ़ापे को प्राप्त हो गया हूँ। इस जीर्ण शीर्ण शरीर का कुछ भी पता नहीं है। यह न जाने कब छूट जाये? आपका अन्तिम दर्शन मेरा कल्याण करेगा। अब मुझे क्या आज्ञा है? भक्तों की सेवा करूं। यदि मुझे आज्ञा प्रदान करो, तो मेरा सौभाग्य ही होगा।
श्री जम्भेश्वरजी ने रावल को सचेत करते हुए कहा- हे राजन्! यह शरीर तो पंचभूतों से बना हुआ है। इसमें तुम्हारा कुछ भी नहीं हैं। यह तो पराया है। परायी वस्तु चाहे तो रहे या जाये इसमें किसी का भी जोर नहीं है। तुम्हारी यह जीवात्मा, जो इस शरीर में बैठी हुई है, भोग भोग रही है और कुछ नया कर्म भी कर रही है। इन कर्मों को लेकर इस जीर्ण शरीर से प्रस्थान कर जायेगी और नया शरीर धारण कर लेगी।
तुम यह शरीर नहीं हो, तुम तो जीवात्मा परमात्मा स्वरूप हो। अमृतस्या पुत्रा तुम तो अमृत अविनाशी परमात्मा के पुत्र हो। उस सर्वसमर्थ बाप के बेटे होकर चिन्तित नहीं होना चाहिये। अपने राजकुमार को अपना राज्यभार सौंप दो और अब अन्तकाल में केवल परमात्मा विष्णु का स्मरण करते हुए पीछे के थोड़े से जीवन को व्यतीत कर दो। यदि तुम्हें कुछ परोपकार कार्य करने की इच्छा है, तो यहाँ पर सरोवर पर मिट्टी खुदवाई हेतु कुछ धन खर्च करो। तुम्हारा पुण्य बढ़ेगा। यही परोपकार का पुण्य कार्य होगा।
जेतसी ने पूछा- हे देव! आपकी कृपा से जैसा अपने आज्ञा प्रदान की है, वह मैं अवश्य ही पूर्ण करूँगा। किन्तु मेरी एक प्रार्थना है कि आप यहाँ पर बहुत समय तक विराजमान रहे हैं। अब भी, इससे पूर्व भी किन्तु आप इस वृक्ष के नीचे ही बैठे रहे हैं। आपके लिए हम लोगों ने कोई आसन, मंदिर, मेड़ी आदि का निर्माण नहीं किया। आपकी स्मृति सदा बनी रहे, इसके लिए मैं यहाँ पर एक कमलासन का निर्माण करना चाहता हूँ। यद्यपि आप तो कमल सदृश ही निर्लेप है। फिर भी हमारे जैसे साधारण लोगों के लिए आपकी स्मृति सदा तरोताजा बनी रहे, इसके लिए मैं आप से प्रार्थना कर रहा हूँ।
ऐसा कहते हुए जैतसी ने श्रीचरणों को पकड़ लिया और कहा- आप हमारी भावना को समझेंगे और ठेस नहीं पंहुचायेंगे। हे वील्हा! रावल जैतसी की श्रद्धा भक्ति भाव से भगवान् तो द्रवित हो गये और कहा- जो तुम्हारी इच्छा है।
ऐसा कहते हुए रावल जेतसी को कमलासन बनाने की आज्ञा प्रदान की। रावल जेतसी ने तुरंत जैसलेमर से पत्थर मंगवाकर श्री देवजी के बैठने की स्मृति में कमलासन का निर्माण करवाया। श्रीदेवजी ने जाम्भोलाव की महिमा का वर्णन श्रीमुख से करते हुए कहा-
हे भक्तो! यह पवित्र सरोवर परमपावन तीर्थ बन गया है। मुझे भी यह स्थान बहुत ही प्रिय लगता है। यहाँ पर आकर कोई सज्जन तालाब से मिट्टी निकालेगा, स्नान, संध्या, हवन आदि करेगा तो उसके सकल पाप मिट जायेंगे। बहुत समय तक जाम्भा सरोवर पर रहने के पश्चात् एक दिन वहाँ से श्रीदेवजी अपने साथरियों के साथ प्रस्थान कर गये। वहाँ पहला पड़ाव रणीसर में किया। वहाँ पर भी साथरी की स्थापना करके दूसरा पड़ाव जैसला में किया। वहाँ से आगे चला-नाथूसर के पास झींझाला पर सैंसे कसवें के गाँव में पुनः आये।
वहाँ से किसनासर के पास जाँगलू की साथरी पर श्रीदेवजी आये। वहाँ से आगे चलकर कूदसूं के पास खारा गाँव में आसन लगाया। श्रीदेवजी के पास जमाती लोगों ने जल की मांग की तब गाँव के लोगों ने कहा यहाँ तो जल खारा है। यह बात जमाती लोगों ने श्रीदेवजी से कहा कि आप तो कहते यहाँ का जल मीठा है, किन्तु यहाँ के लोग तो खारा बता रहे हैं। श्री देवजी ने कहा- यदि गाँव के लोग खारा बता रहे हैं तो खारा ही होगा, ये लोग झूठ क्यों बोलेंगे?
ऐसा कहते हुए श्री देवजी आगे बढ़ गये। गाँव के लोगों ने कूएँ का पानी दूसरे दिन पीया तो खारा ही हो गया। दूसरे दिन अलाय की साथरी में श्रीहरि ने आसन लगाया। जहाँ पर भी श्री चरण टिके वहीं पर साथरी की स्थापना हो गयी। वहाँ पर श्रीदेवजी तीन दिनों तक रहे और वहाँ से चलकर अपनी मातृभूमि पीपासर चले आये।
यहीं पीपासर में ही तो श्री देव के माता-पिता को बाल्य लीलाओं द्वारा प्रसन्न किया था। यहीं पीपासर में ही तो श्रीदेवजी ने माता हांसा, पिता लोहटजी को प्रसन्न किया था। वहीं इस पवित्र ब्रजभूमि में वही कन्हैया ही स्वयं नन्द-जसोदा लोहट हांसा को पुत्र रूप में आकर कृतार्थ किया था। अब तो वो पूज्य माता पिता स्वर्गवासी हो गये थे। अपनी पैतृक सम्पत्ति भी वितरण कर चुके थे। पीपासर के लोगों ने अपने को अपना ही सम्बन्धी आया जानकर धन्य माना।
पीपासर से विदा होकर अतिशीघ्र ही जाम्भोजी सम्भराथल पर ही आ विराजे। बहुत दिनों के पश्चात् श्रीदेवजी सम्भराथल पर आये हैं। ऐसा सुनकर आसपास के गाँवों के लोग छोटे बड़े सभी आने लगे। बहुत दिनों तक इस प्रकार से मिलन, आगत स्वागत होता रहा। लोग अपनी समस्या लेकर आते, कोई कहता- हे महाराज!
आप तो बहुत वर्षों के बाद यहाँ पर लौटकर आये हैं। आपके बिना तो हमारा जीवन व्यर्थ ही हो गया। कोई अपनी घरेलू समस्या लेकर उपस्थित होता। कोई कहता मेरी गाय, भैंस, बकरी आदि खो गयी। आप बताने का कष्ट करें। कोई शिकारी आकर पूछता- हे महाराज! मेरा बाण निशाने पर लगता क्यों नहीं? कोई राजा आकर अपनी आयु के बारे में पूछता? कोई पुत्रहीन नारी आकर पुत्रप्राप्ति की कामना करती। कोई धनहीन नारी आकर धन प्राप्ति का उपाय पूछती।
श्री जाम्भोजी “जो ज्यूं आवे सो त्यूं थरप्या” का सिद्धांत अपनाते। सभी को यथा योग्यता अनुसार कुछ न कुछ तो प्रदान अवश्य ही करते। सांईं के दरबार में आया हुआ कोई खाली हाथ लौटकर नहीं जाता था। ऐसी महिमा से मण्डित श्रीदेशजी सम्भराथल पर विराजमान रहते।