आठवाँ अध्याय · कथा 54
ऊदोजी नैण का जाम्भोजी के शरण में आना
मांगलोद गंगा पार का जमाती आय उतरया, ऊदो नैण देवी को भोपा कहै- जमातियां इह महमाई नै पूजी र पाछा जावौ देव करै थौ देवी करसी। बिश्नोई कहै देवी सुरग देसी। देवी ऊदै के घट आय बोली सुरगां मां क्यौइ नहीं सुरग मटा मटि थै पणि मेरे सारै सुरग कोई नहीं। ऊदो जमातियां के साथ देवजी के हजूरी आयो। विसनोई हुवौ। ऊदो कहै देवजी कहो तो महमाई का गीत गाऊ। जाम्भोजी श्री वायक कहै-
शब्द-97 ओ३म् विष्णु विष्णु तूं भणरे प्राणी, जो मन मानै रे भाई।
दिन का भूला रात न चेता, कांय पड़ा सूता आस किसी मन थाई।
तेरी कुड़ काची लगवाड़ घणो छै, कुशल किसी मन भाई।
हिरदै नाम विष्णु को जंपो, हाथे करो टवाई।
हर पर हरि की आंण न मानी, भूला भूल जपी महमाई।
पाहन प्रीत फिटाकर प्राणी, गुरु बिन मुक्त न जाई।
पंच क्रोड़ी ले प्रहलाद उतरियो, जिन खरतर करी कमाई।
सात क्रोड़ी ले राजा हरिचंद उतरियों, तारादे रोहिताश हरिचन्द
हाटो हाट बिकाई। नव क्रोड़ी राव युद्धिष्ठिर ले उतरियो, धन धन कुन्ती माई।
बारा क्रोड़ समाहन आयो, प्रहलादा सूं वाचा कवल जु थाई।
किसकी नारी बस्त पियारी, किसका बहिन रु भाई।
भूली दुनिया मर मर जावै, ना चीन्हों सुर राई।
पाहण नाऊं लोहा सक्ता,नुगरा चीन्हत कांई।
नाथोजी महाराज अपने शिष्य वील्हो के प्रति आगे की कथा सुनाते हुए कहने लगे-एक समय गंगा पार से बिश्नोइयों की जमात सम्भराथल पर आ रही थी। इससे पूर्व भी कई बार आ चुकी थी। उनका पैदल आना कई लोगों को सचेत करना था। पूर्व की जमात ने तो हासम कासम को सचेत किया था और दिल्ली के बादशाह सिकंदर लोदी को सचेत किया था। दूसरी बार भीयों पंडित को अपने साथ लेकर आये थे और उन्हें बिश्नोई बनाया था।
इस बार बिश्नोइयों की जमात गंगा पार से चल कर गंगा यमुना को पार कर के नागौर से पूर्व दिशा में गोठ मांगलोद में आकर तालाब के किनारे आसन लगाया था। तालाब के निकट ही गाँव के बाहर महमाई का मंदिर था। तालाब में स्वच्छ जल प्राप्त था। बिश्नोई लोग देवी के मंदिर में तो नहीं गये किन्तु तालाब के किनारे ही बैठे थे।
उस समय स्नान, संध्या, हवन कर रहे थे। ज्योति का दर्शन एवं शब्दों की ध्वनि, घृत सामग्री की सुगन्धी, चारों तरफ फैल रही थी। मंदिर के पुजारी ऊदोजी नैण थे। ऊदोजी मंदिर में आरती नित्य प्रति करते थे, किन्तु दीपक तेल का ही करते थे। वह भी छोटी चिराग तेल की। उसमें वह दिव्य सुगंध कहाँ थी? ऊदो आरती गाता था किन्तु महमाई की ही गाता था। आज पहली बार शब्दों की ध्वनि सुन रहा था? घृत आदि दिव्य पदार्थों की सुगंध ले रहा था।
ऊदा जल लाने के बहाने से तालाब पर गया था। ऊदै ने देखा कि यहाँ तो दिव्य देव सदृश शुभ्र वेश में भक्त विराजमान हैं। ये ही लोग हवन कर रहे हैं। हो सकता है कि हमारी देवी दर्शनार्थ आये होंगे। ये तो धनवान भी हैं। यदि आ जायेंगे, चढावा करेंगे तो बहुत धन प्राप्त होगा। मैं अभी शीघ्र चलता हूँ। इनके आने की प्रतीक्षा एवं पूर्व तैयारी करता हूँ। अपनी देवी को भोग लगाता हूँ। खुश करता हूँ, तो इन्हें अवश्य ही वरदान देगी। मेरी कंगाली अवश्य ही आज मिट जायेगी।
ऊदा वापिस मंदिर में पहुँचा और देवी को प्रसन्न किया। स्वयं भोपा बना, अंग में तेल लगाया, लाल तिलक किया, सिर की लंबी लंबी जटायें खोल दी। हाथ में जंजीर एवं लोहे का सरिया लेकर उछल कूद करने लगा। देवी ने भोपे के शरीर में प्रवेश किया। वह तो देवी नहीं थी, कोई प्रेत ही था। किन्तु लोग उसे देवी देवता कहते थे। पूजा होती थी।
ऊदा ऐसी विकराल अवस्था में अपने ही शरीर पर चोट मारता हुआ बिश्नोइयों की जमात के पास पहुँच गया। बिश्नोइयों ने देखा और कहा- हे भाई! क्यों जुल्म करता है? इस अपने ही शरीर को क्यों पीटता है? यह तो अन्याय है। ऐसा मत करो जो तुम्हें लेना है तो हम तो वैसे ही दान दे देंगे, इस पाखण्ड को करने की हमारे सामने आवश्यकता नहीं है।
ऊदो कहने लगा-आप हमारी देवी के मंदिर में चलो। वहाँ जो आपको चाहिये वही सभी कुछ मिलेगा। एक बार मस्तक झुका दो। तुम्हारी सभी इच्छाएँ पूर्ण हो जाऐगी। बहुत देर से मैं आपकी प्रतीक्षा कर रहा था। आप लोग आये क्यों नहीं? आप लोग कहाँ से आये है? और कहाँ को जा रहे हैं? किस कार्य के लिये जा रहे हैं?
जमात के लोगों ने कहा-हम लोग गंगा पार पूर्व देश से चल कर आये हैं। सम्भराथल पर विष्णु जाम्भोजी के पास जा रहे हैं। वहाँ पर हमें जीया ने युक्ति मूवां ने मुक्ति मिलेगी अर्थात् युक्ति मुक्ति लेने जा रहे हैं। ऊदो कहने लगा- यदि युक्ति और मुक्ति यहीं पर देवीजी प्रदान कर दें तो आप लोग आगे नहीं जाओगे? जमात ने कहा- यदि ऐसी बात है तो आप अपनी देवी से पूछ लें, क्या वह स्वर्ग, युक्ति मुक्ति दे सकती है? यदि दे सकती है तो हम लोग देवी के मंदिर पर स्वर्ण कलश चढा देंगे।
ऊदे ने देवी को अंदर प्रवेश करवाया और कहने लगा- स्वर्ग मुक्ति आदि तो मेरे पास कुछ भी नहीं है। स्वर्ग मटामट है अर्थात् केवल कहने सुनने की बात है। मुक्ति नाम की भी कुछ वस्तु नहीं है। जो नहीं है वह मैं कैसे दे सकती हूँ। यह संसार ही सभी कुछ है। आगे कुछ भी नहीं है और न ही मैं कुछ जानती हूँ। यदि तुम्हें कुछ संसार की वस्तु चाहिये, तो मैं कुछ उल्टा सीधा कर सकती हूँ जैसे-किसी को लंगड़ा, बहरा, रुग्ण आदि करने में मेरा कुछ सहयोग हो सकता है।
बिश्नोई कहने लगे, हम जिनके पास जाते हैं, वे तो पूर्ण परमेश्वर हैं, हमें युक्ति मुक्ति प्रदान करेंगे- हे उद्धव! यदि तुम्हें भी चाहिये तो हमारे साथ चल। ऐसा कहते हुए ऊदे से देवी की पूजा छुड़वाकर साथ में ही सम्भराथल लेकर चले आये।
ऊदा भक्त मार्ग में चलते हुए विचार करने लगा न जाने क्या होगा? क्या मुझे वो सद्गुरु देव अपनायेंगे? मैं तो कुछ भी नहीं जानता। जिस देवी की पूजा करता था, उसका भय भी मुझे बना हुआ है। ये सभी लोग तो पूर्व परिचित हैं। सभी धनवान हैं। सभी ने अपनी अपनी भेंटें ली हैं। मेरे पास तो कुछ भी नहीं है बिना भेंट मैं उनके पास सभी से अलग ही दिखने वाला पहुँचूँगा, तो क्या वो मुझे अपनायेंगे? मेरे पास भले ही कुछ भी नहीं है, किन्तु मेरा प्रेम भाव तो है, क्या मेरे प्रेम को ठुकराएँगे?
वे तो पूर्ण ब्रह्म अन्तर्यामी हैं। हृदय की भावना को जानते हैं। फिर भी अवश्य ही कुछ तो भेंट ले लेनी चाहिये। खाली हाथ जाऊँगा तो खाली हाथ लौट आऊँगा। ऐसा विचार करते हुए सम्भराथल मार्ग में नागौर से एक टके की खली ले ली। ज्यादा तो कुछ जेब में था भी नहीं। वापिस मंदिर में जाने का अवसर ही नहीं मिला था।
सम्भराथल सभी के साथ ऊदोजी भी पहुँचे। वहाँ पर श्री देवजी की मुख शोभा देखी, ज्योति सदृश मुख मंडल चारों तरफ ही दिखाई दे रहा था। सभी ने अपनी अपनी अमूल्य भेंटें रखी, उदो सकुचाने लगे। मैं कैसे रखूँ? इनके पास तो बड़ी कीमती वस्तुएँ है। मेरे पास तो पशुओं को चराने वाली खली ही तो है। यह भेंट करने से तो ना करना ही ठीक है। ऐसा विचार करते हुए ऊदा सभी के पीछे ही बैठ गया।
जम्भेश्वर जी ने ऊदे का नाम लेकर पुकारा-हे ऊ दा! पीछे क्यों बैठा है? आगे आ जा। जो कुछ भी भेंट लाया है, वह तो प्रेम रस से भरी है, मुझे दे दे। ऊदा संकोच वश डरता-डरता सामने आया। कपड़े में बंधी अमूल्य भेंट ऊदे ने सामने रखी। श्री देवजी ने कहा-उद्धव! तू तो बहुत ही अच्छी भेंट लाया। सभी को दिखाते हुए श्री देवजी ने कहा देखो ऊ धव नारियल की गिरी लाया है। यह तो अमूल्य है। हवन करने के काम आयेगी। उद्धव द्वारा प्रेम से भेंट की हुई खली भी नारियल बन गई।
ऊदो हाथ जोड़े हुए पास में खड़ा हुआ था। जाम्भोजी ने कहा-हे ऊदा! तू तो कवि है। कुछ गा कर के सुनाओ। ऊदो कहने लगा-हे महाराज! यदि आप माताजी के भजनों के लिए कहो तो मैं सुना दूँ। अन्य कुछ जानता ही नहीं हूँ। पास में बैठे हुए लोग उपहास करने लगे कि देखो ऊदो कुछ भी नहीं जानता, यह तो निपट मूर्ख ही है। न जाने यहाँ क्यों आ गया? श्री देवजी ने कहा-माता का तो तू जानता है, किन्तु कुछ पिताजी वाले भी तो सुना दे। ऊदा कुछ भी नहीं बोला, श्री देवजी ने ऊदे के सिर पर हाथ रखा, ऊदे के मन में हुलास- (आनंद) हुआ और आनंद में विभोर हो कर गाने लगा-
ओ गुरु आयो जाम्भराज देव, निज हक साच पिछाणियों।
जो साधां ने देवेलो पार, मुखि बोले अमृत बाणियों।
इमरत बाणी गुरु मुख बोलै, सुर3 सुध लीला पति।
देवां को गुरु विसन जाम्भौ, जतियां गुरु पुरो जति।
पार गिराय जीव वासो, जे हक साच पिछाणियो।
मानुष रूपी विष्णु आयो, मुखि बोले इमरत बाणियो।
इस प्रकार से श्री देवजी की स्तुति में ऊदे ने इस साखी का गायन किया। पास में बैठे हुए सज्जनों को आश्चर्य चकित कर दिया। कवि हृदय तो ऊदा था ही। देवजी ने सिर पर हाथ रखा तो कविता सरिता की भांति बह पड़ी। ऊधो ने श्री देवजी की स्तुति करते हुए कहा-मैं आपकी शरण में तो आ गया हूँ, किन्तु मेरा भय अब तक नहीं मिटा है। जिस प्रेत की मैं माता मान करके पूजा करता था उसने मुझे बहुत कष्ट दिया। आज मुझे पता चला है कि वह तो मेरे साथ धोखा ही था। मैंने अपनी जिंदगी वैसे ही बर्बाद कर डाली है। हे देव! मेरा भय दूर कीजिये। श्री देवजी ने ऊदे का भय मिटाने हेतु यह विष्णु विष्णु भण शब्द सुनाया। जिसका भाव इस प्रकार से है-
हे ऊधा! तथा अन्य सभी लोगो! यदि आपको भय लगता है, तो विष्णु विष्णु इस नाम का जप करो। रे भाई! यदि तुम्हें श्रद्धा विश्वास है, तुम्हारा मन नाम जप करने को राजी है, तो अवश्य ही तुम्हारे भय को मिटा देगा। दिन का भूला-भटका रात्रि को घर लौट आये तो वह भूला हुआ नहीं माना जाता। यदि रात्रि में भी घर नहीं आये तो चिंता होती है। इसी प्रकार से बाल एवं जवानी अवस्था में यदि ईश्वर को भूल गया तो कोई बात नहीं। अब बुढापे में भी सचेत हो जाये, तो वह संभल सकता है। बुढापे ने यहाँ से जाने की सूचना दे दी है। अब भी यदि सोया रहा, सचेत नहीं हो सका तो किस आशा पर जी रहा है। तुम्हें कौन सहारा देगी, तेरी मृत्यु बिगड़ जायेगी, तो दुर्गति होगी।
इस संसार में तो सच्चा झूठा संबंध गहरा है। किन्तु कच्चे धागे की तरह इस लगाव को भी तोड़ा जा सकता है। इतनी गहरी मोह माया में फंसा होने से कुशलता कैसे हो सकती है? हृदय में विष्णु का जप करते हुए हाथों से शुभ कार्य करो। हे ऊदा! हरि की मर्यादा तो छोड़ दी। भूला हुआ तुमने महमाई की पूजा सेवा की है महमाई तो केवल पत्थर की मूर्ति ही तो है। इस प्रकार से पत्थरों की प्रीति छोड़ो।
गुरु की शरण हुए बिना तो मुक्ति को प्राप्त नहीं हो सकते। गुरु की शरण ग्रहण करके और हरि की मर्यादा में रह कर के पाँच करोड़ का उद्धार प्रह्लाद ने सतयुग में किया था। स्वयं प्रह्लाद ने शुद्ध कमाई की थी तथा अपने अनुयायियों को भी प्रेरित किया था। त्रेता युग में हरिश्चन्द्र एवं उनकी धर्म पत्नी तारादे एवं कुंवर रोहिताश्व ने सात करोड़ का उद्धार किया था। स्वयं धर्म की रक्षार्थ हाट में जाकर बिक गये थे। किन्तु धर्म को नहीं छोड़ा था।
नौ करोड़ का उद्धार द्वापर युग में धर्मराज युधिष्ठिर ने किया था। उस माता कुन्ती को भी धन्य है, जिन्होंने ऐसे पुत्र पैदा किये। उन्हें ऐसे दिव्य संस्कार प्रदान किये। श्री जाम्भोजी कहते हैं कि बारह करोड़ों का उद्धार करने हेतु मैं स्वयं आया हूँ। क्योंकि मैंने ही नृसिंह रूप में अवतार लिया था। उस समय प्रह्लाद को वचन दिया था कि तुम्हारे तेतीस करोड़ों का उद्धार होगा। अब तक पाँच, सात व नौ करोडों का तो उद्धार हो चुका है। बारह करोड़ अवशेष हैं। उनका उद्धार करने हेतु मैं आया हूँ।
कौन किसका है? कोई किसी का नहीं है। जिन्हें कहते हैं कि यह मेरी नारी है, मैं इसका नर हूँ, यह मेरी प्यारी वस्तु है। मेरी बहन, मेरा भाई, यह मेरा कुछ भी नहीं है। किन्तु दुनिया इसी भूल में भटक रही है। अनेकानेक जन्म-मरण को प्राप्त हो रही है। मोह माया ग्रसित प्राणी उस विष्णु परमात्मा को अपना नहीं बनाते जो कि वास्तव में अपना ही है। जो अपना नहीं है, उसे तो अपना मान रखा है।
हे ऊदा! तू जिस पत्थर की मूर्ति की सेवा पूजा करता है, उससे तो लोहा ही मजबूत है। लोहे की पूजा क्यों नहीं करता? सदा ही शक्तिशाली की ही पूजा करनी चाहिए। जिसका जैसा संग करोगे, तो उसकी संगति का फल भी अवश्य ही मिलेगा।
नाथोजी उवाच-हे वील्हा! इस प्रकार से यह शब्द ऊदेजी के प्रति श्री देवजी ने सुनाया और उससे कहा-कि तुम भक्त अधिकारी होने से पाहल लेकर बिश्नोई पंथ में सम्मिलित हो जाओ। डरो मत, अब तुम बिश्नोई पंथ के पथिक हो गये, इसीलिए अब तुम्हें किसी प्रकार के भूत-प्रेत महमाई आदि से भय नहीं होगा।
यदि तुम्हें विश्वास नहीं हो रहा है, तो तू वापस अपने महमाई के मंदिर में जाओ और जाते समय यह पाहल का लोटा ले जाओ। जब तुम्हें भूत-प्रेत भय उत्पन्न करायेंगे, तो तुम जल की कार दिला कर के बीच में खड़े हो जाना, फिर तुम स्वयं आश्चर्य देखना।
ऊदो भक्त जाम्भोजी की आज्ञा शिरोधार्य करके सम्भराथल से रवाना हुआ, ज्योंही अपने गाँव की सीमा में प्रवेश किया त्योंही वह महमाई, जो एक प्रेत के रूप में थी ऊदो के सामने बवंडर बन कर के आयी और डराने लगी। ऊदो जाम्भोजी के वचनानुसार जल की कार देकर बीच में खड़ा होकर, विष्णु विष्णु जप करने लगा। वह बवंडर (भैंतूलिया) दूर-दूर ही भयंकर ध्वनि करता हुआ वेग से दूसरी तरफ चला गया।
जाम्भोजी एवं जाम्भोजी की पाहल का चमत्कार एवं प्रताप ऊदे ने देखा तथा आश्चर्य चकित हुआ। वह महमाई हताश अवस्था में ऊदे को भयभीत करने के लिए कभी बैठूरा बनती, तथा कभी अग्नि के रूप में दिखाई देती, कभी सिंह बन कर गर्जना करती, किन्तु ऊदे ने तो श्री देव परमात्मा विष्णु की शरण ले रखी थी। भय निवृत्त हो चुका था। आखिर महमाई ही घबराकर ऊदे से कहने लगी-
हे ऊदा! तुमने तो सद्गुरु को प्राप्त कर लिया है, किन्तु मैं तो एक अवगति प्राप्त जीव हूँ। मेरा इस प्रेत योनि में प्राप्त जीव का उद्धार कब होगा? तुम्ही कोई उपाय करो। मेरे दुःख का कोई पार नहीं है। मेरा वायु प्रधान यह अधम शरीर है। एक क्षण भी स्थिर नहीं हो पाता। मैं स्वयं इस शरीर से भोजन प्राप्त करने में असमर्थ हूँ। तुम्हारे जैसे पुजारियों के शरीर में प्रवेश करके ही मैं भोजन प्राप्त करता हूँ। अपनी स्वतंत्र सत्ता नहीं है। मैं स्वयं पराधीन हूँ। कभी-कभी मेरे को मारा पीटा भी जाता है। वह भी मैं किसी शरीर में रह कर ही सहन करता हूँ। यह सभी कुछ मेरे कर्मो का ही फल है।
अब तू ऊदा वहीं जा और मेरा भी किस प्रकार से उद्धार होगा, यह विनती जाम्भोजी से करना। मेरी पूजा तो कोई दूसरा ही करेगा। मैं अपनी पूजा तो स्वयं किसी दूसरे से करवाऊँगा। अब तुम हमारे लायक नहीं हो क्योंकि तुमने पाहल ग्रहण करके देवताओं के नियम धारण कर लिया है। तुम्हारे पर हमारा वश नहीं चलता।
इस प्रकार से ऊदो अपने घर गया, लोगों ने बड़ा ही आश्चर्य किया कि महमाई का पुजारी- भोपाजी लौट आये हैं। न जाने एकाएक कहाँ छिप गये? अब हमारी विपदा दूर करेंगे। ऊदो ने कहा- अब आप लोग ऐसी आशा न करें। मैं अब भूत-प्रेतों की पूजा नहीं करता। मुझे तो सतगुरु मिल गये हैं।
यदि आप लोग भी युक्ति-मुक्ति चाहते हैं, तो मेरे साथ चलो। अपने बुटुम्ब को लेकर ऊदो सम्भराथल आया और अपने परिवार को बिश्नोई पंथ में सम्मिलित किया। जाम्भोजी ने ऊदे को ऋद्धि सिद्धि प्रदान की और नैण गोत्र का बिश्नोई बनाया।
जब संत महापुरुषों की संगति हो जाती है, तो दुराचारी भी साधु बन जाता है। जिस प्रकार से पारसमणि की संगति करने से लोहा पलट कर सोना बन जाता है, और दही भी पलट कर घृत बन जाता है।
ऊदो मूलतः कवि हृदय मानव थे। जाम्भोजी की स्तुति में ऊदे ने आरती, साखी, छन्द, कवित आदि की रचना की थी। ऊदो जी द्वारा रचित काव्य अति उच्च कोटि का है। उन्होंने जैसा प्रत्यक्ष देखा था वही यथार्थ कहा था। यथार्थ वक्ता एवं हजूरी कवियों में ऊदोजी का नाम अग्रगण्य है।