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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह53 / 94

आठवाँ अध्याय · कथा 53

गोपीचन्द और भर्तृहरि को शब्दोपदेश

एक समै जोगी गोपीचन्द भर्तृहरि देवजी कै हजूर आया। आघु नै हाथ कीयौ। जाम्भोजी श्री वायक कहै

शब्द-96 ओ३म् सुण गुणवंता सुण बुधवंता, मेरी उत्पति आदि लुहारूं।

भाठी अन्दर लोह तपीलो, तंतक सोना घड़े कसारूं।

मेरी मनसा अहरण नाद हथोड़ो, शशीयर सूर तपीलो।

पवन अधारी खालूं। जे थे गुरु का शब्द मानीलो, लंघिबा भव जल पारूं।

आसण छोड़ि सुखासण बैठो, जुग जुग जीवे जम्भ लुहारूं।

सद्गुरु देव सम्भराथल विराजमान थे। पास में संत भक्तों की जमात बैठी हुई थी। उसी समय ही दो योगी आये। उन्होंने आते ही कुछ सांकेतिक भाषा में कहा। उन्होंने नाक के हाथ लगाया। इशारा किया। श्री देवजी ने जिना की तरफ इशारा करते हुए न जाने क्या कहा? जाम्भोजी ने इस अवसर पर एक शब्द भी सुनाया। वही शब्द हे वील्हा! मैं तुम्हें सुनाता हूँ। जिसका भाव कुछ इस प्रकार से है-

जाम्भोजी के पास में सभी तरह के लोग आया करते थे। उन्हें उसी तरह का शब्द- आदेश देते थे। किसी को तो फटकार भी सुनाते थे। किन्तु इन दोनों योगियों की तो भारी प्रशंसा की है। कहा है-“सुण गुणवंता सुण बुधवंता” हे गुणवानो! हे बुद्धिमानो! आप सुनो। मेरी उत्पत्ति तो आदि-अनादि है। मैं कोई आज कल का योगी नहीं हूँ। लुहार की भांति मैं तो आगे नयी उत्पत्ति करता हूँ। जिस प्रकार से लुहार भट्ठी के अंदर रखकर लोहे को तपाता है और उस लोहे को अग्नि के संयोग से तपा कर, कूट कर तत्त्व रूपी लोहा बना देता है। उस तत्त्व रूपी लोहे से अनेकानेक औजार बर्तन आदि बना देता है। उसी प्रकार से मैं भी पांच तत्त्व रूपी लोहे को लेकर उससे तत्त्व रूपी मानव शरीर का निर्माण करता हूँ। वैसे तो सभी शरीर इन पांच तत्त्वों से ही निर्मित हैं।

किन्तु पाँच तत्त्वों का सार रूप यह मानव तन ही विशेष है, जिसमें यह जीवात्मा विराजमान होती है। जिस प्रकार से लुहार के पास अहरण, हथौड़ा, अग्नि, इंर्धन और हवा देने वाली खाल की धोंकनी होती है, जिससे हवा देकर अग्नि को प्रज्जवलित करता है। उससे लोहा तपता है। उसी प्रकार से मेरे पास भी मनसां इच्छा ही अहरण है। जो मूल आधार है जिसके ऊपर ही सभी कुछ निर्भर है। नाद ही हथौड़ा है, जो चोट करता है।

मेरे पास भी नाद ध्वनि ही हथौड़े का कार्य करती है। जो सोये हुए चित्त को जाग्रत करती है। सूर्य र्ही अग्नि सदृश इन पाँच तत्त्वों को पिघलाने वाला है। और चन्द्रमा ही इन्हें पुनः ठण्डा करता है। तभी कार्य सफल हो पाता है। प्राण वायु ही धौंकनी है जो अंदर बैठी हुई वैश्वानर अग्नि को प्रज्वलित करती रहती है। इसी प्रकार से मैं उत्पत्ति करता हूँ। यदि आप लोग गुरु का वचन स्वीकार कर लो तो संसार सागर से निश्चित ही पार हो जाओगे।

हे गोपीचंद भर्तृहरि! मैंने तो सांसारिक आसन छोड़ दिया है और आध्यात्मिक सुखासन पर बैठा हूँ इसीलिए युगों-युगों तक जीने वाला जाम्भा लुहार हूँ। इस प्रकार से उन आगंतुक योगियों को संदेशा दिया और वे दोनों वहाँ से प्रस्थान कर गये।

हे वील्हा! हमने श्री देवजी से पूछा-कि हम तो आपके इशारे को नहीं समझ पाये और न ही यह जान पाये कि वे दोनों योगी कौन थे? यह कृपा कर के बतलावें।

श्री देवजी ने कहा-ये दोनों तो गोपीचंद और भर्तृहरि थे। क्या वे ही गोपीचंद भर्तृहरि थे? ऐसा कहते हुए हम लोग वहाँ से उठ खड़े हुए। उनको देखने के लिये पीछे भाग पड़े। किन्तु देवजी ने हमें रोकते हुए कहा-रुको! वे अब तुम्हें नहीं मिल सकेंगे, क्योंकि वो बहुत ही दूर चले गये हैं।

हे देव! आपने पहले नहीं बतलाया। हम उनका दर्शन वार्तालाप करते । आपकी तथा उनकी क्या वार्तालाप हुई, यह तो बताने का कष्ट करें।

देवजी ने बतलाया-उन्होंने नाक की तरफ इशारा किया। इसका मतलब था कि हम तो इस लम्बे जीवन से नाक-नाक आ गये अर्थात् थक गये है। मैंने जवाब देते हुए कहा था कि पहले आपने अपनी जिना से ही लम्बी आयु माँगी थी। इसीलिए जिना की तरफ मेरा इशारा था। अब लंबे जीवन को जीना ही होगा, काया की आयु बढा लेना भी तो सुख शांति प्रदान नहीं कर सकती।