आठवाँ अध्याय · कथा 52
कुंवर मालदेव के प्रति शब्द सुनाया
नाथोजी कहने लगे-हे शिष्य! शब्द की महिमा अनन्त है। शब्द ही ब्रह्म है। जो शब्द को ग्रहण कर लेता है,वह ब्रह्म को ही प्राप्त हो जाता है। इसी प्रकार से शब्द की महिमा श्रवण करने हेतु एक समय जोधपुर नरेश राव माल देव ने जम्भेश्वरजी के पास लोहावट के जंगल में आकर भेंट की थी। वो कथा मैं तुझे सुनाता हूँ-
मूले की मनिसा मन की मन माहे हुई,चालि जोधपुर राव गांगै के दरबार आयौ,दरबार माहै बात चाली,बीजौ कोई तमासो हुवै,तिको आगे कु माहवै,जिका नु दीसै,पाछलां लू वीसै नहीं,जांभोजी सगला नुं सनमुख दीसै,कंवर मालदेव कहै- आ पारख करस्यां,मालदे साथ भेलो करि चडयौ,लोहावट की साथरी सतगुरु नै आय परसयौ,मालदे कहै-जाम्भाजी थांहरी आदि उत्पति कहो,जाम्भाजी श्री वायक कहै-
शब्द-93 ओ३म् आद शब्द अनाहद बांणी, चवदै भवण रह्या छल पाणी।
जिहिं पाणी से इंड उपना, उपना ब्रह्मा इन्द्र मुरारी।
मूलाराम पुरोहित एक समय जोधपुर राव गांगा के दरबार में कुछ कार्यवश पहुँचा। मूलै के मन में कुछ मानसिक पीड़ा भी थी,तथा कुछ जाम्भोजी के बारे में कथन भी करना था। मूले ने दरबार में जाकर बात चलाई।
मूलै ने कहा-इस समय कोई आश्चर्य जनक घटना हो रही है, तो कोई बतलावे। मूला कहने लगा-मैंने सम्भराथल पर एक आश्चर्य देखा है। वैसे तो सामान्य रूप से तो हम किसी के यदि सामने बैठे हुए हों तभी मुख दीखता है, किन्तु जाम्भोजी के हम पीछे भी बैठते हैं तो भी उनका मुख दीखता है। उनका मुख चहुंदिस परसै चारो तरफ दिखाई देता है। ऐसा साधारण आदमी का नहीं।
यह आश्चर्य जनक घटना मूला कहने लगा कि मैं अभी देख कर आया हूँ। गांगे राव का राजकुमार कहने लगा- यदि ऐसी बात है तो अवश्य ही परीक्षा लेंगे। राजकुमार मालदेव अपने साथ में मूला पुरोहित एवं अन्य लोगों को साथ लेकर जोधपुर से रवाना हुए। लोहावट की साथरी पर सद्गुरु की तथा मालदेव की भेंट हुई। वहीं पर मालदेव ने श्री देव के चरण स्पर्श किये। मालदेव ने पूछा- हे देवजी! आप अपनी उत्पत्ति बतलाओ? श्री देव ने शब्द सुनाते हुए कहा-
ओ३म यह आदि शब्द है। जब सृष्टि की उत्पत्ति नहीं थी, तब भी ओ३म शब्द रूप में था। ओंकार की ध्वनि ही थी। जिसकी कोई हद नहीं है। अपार वाणी है। किसी सीमा में बाँधी नहीं जा सकती। ओ३म शब्द से ही सृष्टि की उत्पत्ति हुई है। सर्व प्रथम धंधुकार में आकाश, वायु, तेज, जल तथा धरती की उत्पत्ति होती है। जल का स्थूल रूप ही यह धरती है। जब जल ही भरा था। तब उस जल से अण्डाकार उत्पन्न हुआ। उसी अण्डे में सर्व प्रथम विष्णु रूप उत्पन्न हुए जो पालन पोषण कर्ता, साकार रूप से अवस्थित हुए। उसी विष्णु की नाभि से कमल की उत्पत्ति हुई। उसमें ब्रह्मा रूप सृष्टि के उत्पत्ति कर्ता उत्पन्न हुए। तीसरे रूप में वही ओम शब्द शिव रूप में संहार कर्ता उत्पन्न हुए। ओम तो निराकार शब्द रूप में एक ही है, किन्तु जब वह क्रियाशील हुआ तो विष्णु, ब्रह्मा शिव रूप में तीन हो गये। इन्ही तीनों से ही सृष्टि का विस्तार हुआ, देव, दानव, मानव आदि सृष्टि का कार्य बढता ही गया।
मालदै कहै- पहला उतपुत कुण कुण हुवा जाम्भोजी श्री वायक कहे-
शब्द-94 ओ३म् सहस्त्र नाम सांई भल शिंभु, म्हें उपना आदि मुरारी।
जद म्हें रह्यो निरा लंभ होकर, उतपति धंधुकारी।
ना मेरे मायन ना मेरे बापन, मैं अपनी काया आप सवारी।
जुग छतीसों शून्यहि बरत्या, सतजुग माही सिरजी सारी।
ब्रह्मा इन्द्र सकल जग थरप्या, दीन्ही करामात केती वारी।
चन्द सूर दोय साक्षी थरप्या, पवन पवनेश्वर पवन अधारी।
तद म्हे रूप कीयो मैनावतीयो, सत्यब्रत को ज्ञान उचारी।
तद म्हे रूप रच्यो काम ठीयो, तेतीसों की कोड़ हंकारी।
जब मैं रूप धर्यो बाराही, पृथिवी दाढ़ चढ़ाई सारी।
नरसिंघ रूप धर हिरण्यकश्यप मार्यो, प्रहलादो रहियो शरण हमारी।
बावन होय बलिराज चितायो, तीन पैंड कीवी धर सारी।
परशुराम होय क्षत्रियपन साध्यो, गर्भ न छूटी नारी।
श्रीराम शिर मुकुट बंधायो, सीता के अहंकारी।
कन्हड़ होयकर बंसी बजाई, गऊ चराई।
धरती छेदी काली नाथ्यो, असुर मार किया क्षय कारी।
बुद्ध रूप गयासुर मार्यो, काफर मार किया बेगारी।
पंथ चलायो राह दिखायो, नौवर विजय हुई हमारी।
शेष जंभराय आप अपरंपर, अवल दिन से कहिये।
जांभा गोरख गुरु अपारा,
काजी मुल्ला पढ़िया पंडित, निंदा करे गिवारा।
दोजख छोड़ भिस्त जे चाहो, तो कहिया करो हमारा।
इन्द्रपुरी बैकुण्ठे बासौ, तो पावो मोक्ष हि द्वारा।।
मालदेव ने पूछा- हे देव! सर्व प्रथम उत्पन्न कौन कौन हुए? अर्थात् विष्णु ने कौन-कौन से अवतार कब-कब लिए? तथा उन्होंने कौन-कौन से कार्य कब-कब किये? श्री देवजी ने विष्णु अवतारों का प्रयोजन इस शब्द द्वारा बतलाते हुए कहावैसे
तो विष्णु व्यापक सत्ता का नाम है, जो प्रत्येक जीवों के अन्दर समायी हुई है। स्वयं विष्णु ही जीव रूप से शरीरो में समाहित होकर पालन-पोषण करते हैं। फिर भी विष्णु के सहक नाम तथा कार्य हैं, जो गिने नहीं जा सकते। वह हजारों नाम वाला सांई विष्णु ही स्वयंभू है।
श्री गुरु देव जी कहते हैं कि मैं ही वही विष्णु हूँ, जो सर्वप्रथम मुरारी के रूप में प्रकट हुआ था। मुर नाम के दैत्य का संहार कर्ता ही मुरारी है । जब मैं निरारंभ में था अर्थात् सृष्टि रचने में क्रियाशील नहीं था, उस समय तो केवल धंधुकार ही था। धन्धुकार में ही उत्पति प्रारम्भ हुई। मैं स्वयं सृष्टि कर्ता हूँ। किन्तु मेरे मातापिता, बहन-भाई आदि कुछ भी नहीं है। मैंने तो अपनी काया विष्णु ब्रह्मा शिव में अपने आप ही बनाई है। मैं सम्पूर्ण सृष्टि को बना सकता हूँ, तो स्वयं को भी तो अनेक रूपों में बना सकता हूँ।
छत्तीस युग तो शून्य ही में व्यतीत हो गये। सृष्टि के प्रलय के बाद छत्तीस युग तो शून्य ही बना रहा। वहाँ कुछ भी नहीं था। सर्वप्रथम सतयुग का प्रारम्भ हुआ। तब मैंने सम्पूर्ण सृष्टि की सर्जना की। सृष्टि का रचयिता कोई होना चाहिये। इसीलिए ब्रह्मा रूप से मैं स्वयं ही बना। सृष्टि का पालण पोषण कर्ता भी चाहिये, इसीलिए मैं विष्णु के रूप में प्रगट हुआ और केवल रचयिता तथा पालन पोषण कर्ता से भी सृष्टि का संतुलन बिगड़ता है, इसीलिए संहार कर्ता भी चाहिये। इसके लिए शिव रूप से मैं ही संहार कर्ता हुआ। तीनों देवता को योग्यता के अनुसार सत्त्व गुण, रजोगुण, तमोगुण के अनुसार करामात भी प्रदान की थी।
सूर्य चन्द्रमा दो साक्षी भी बनाये। ये दोनों सम्पूर्ण संसार को अपनी प्रकाशमयी आँखों से देखते हैं। अर्थात् सम्पूर्ण सृष्टि को प्रकाशित करते हैं। यही जगत की दो आँखें है, ईश्वर की भी यही आँखें हैं। इन्हीं आँखों से ईश्वर भी देखता है। इसीलिए उनसे कुछ भी छिपा हुआ नहीं है। दिन में तो सूर्य रहता ही है, किन्तु कभी रात्रि को चन्द्रमा नहीं रहता है, तब तीसरी आँख अमावस्या रहती है। उसके द्वारा भी देखा जा सकता है।
तीसरी उत्पत्ति पवन देवता की है, जो सभी के श्वांस के रूप में सेवनीय है। श्वांस ही तो जीवन का आधार है। श्वांस रूप होकर वही विष्णु ही सभी को जीवन प्रदान करते हैं। इसीलिए शरीर को जीवित रखने के लिए सर्वप्रथम आवश्यकता पवन की ही होती है। यह पवन ही ईश्वर है। जीवन का आधार है।
गुरु महाराज कहते हैं कि मैंने अनेकों अवतार पूर्व में लिये हैं। जब मैंने मछली का अवतार धारण किया था उस समय सतयुग था। सृष्टि प्रलयावस्था को प्राप्त हो गयी थी। सृष्टि के बीजों की रक्षा करने के लिए मछली का रूप धारण करके, राज ऋषि सत्यव्रत को उपदेश दिया था।
दूसरा अवतार कछुए का धारण किया था। जब देव दानवों ने मिलकर समुद5 मंथन किया था, तब मथानी मेरु पर्वत की बनाई थी। वह समुद्र में डूबने लगी थी। तब कछुए का रूप धारण करके नीचे पीठ लगायी थी। देव-दानवों का कार्य पूर्ण किया था। देवताओं को अमृत पान करवाया था। देव-दानवों का गर्व भंजन किया था। क्योंकि उनको पता चल गया कि बिना विष्णु के हम अकेले सर्वथा निष्फ ल (असहाय) हैं। तीसरा अवतार वाराह का धारण किया था। जब हिरणाक्ष ने अपनी करामात से पृथ्वी को जल में डूबा दी थी। उस समय जल में डूबी हुई धरती का उद्धार करने हेतु वाराह रूप धारण करना ही युक्त था। ऐसा ही विचित्र रूप बना कर के धरती को बाहर निकाला और हिरणाक्ष को मारा था। वह भी तो मैं ही था।
चौथी बार नृसिंह रूप धारण करने वाला भी मैं ही था। उस समय हिरण्यकश्यिपु को मारने वाला नृसिंह रूप में विष्णु मैं ही था। हिरण्यकश्यिपु के बेटे प्रह्लाद ने शरण ग्रहण की थी। शरणागत की रक्षा करने वाला विष्णु अवतारी हूँ। पाँचवाँ अवतार बावन रूप धारण किया था। राजा बलि अनधिकार चेष्टा कर रहा था। इस लिये राजा बलि को सचेत किया था। स्वर्ग का अधिपति बनने हेतु यज्ञ पूर्ण करने जा रहा था। किन्तु समय से पूर्व कभी किसी को कुछ मिलता नहीं है। भगवान् ने बावन रूप धारण करके बलि को सचेत किया। इसीलिए तीन पग धरती की माँग की थी। याचक बन कर के विष्णु ने तीन पद भूमि में तीनों लोक मांग कर के बलि को इन्द्र पद प्राप्ति की चेष्टा से निवृत्त किया।
छठा अवतार परशुराम जी के रूप में धारण किया। दुष्ट क्षत्रियों का नाश किया। हालांकि जन्म तो ब्राह्मण कुल में हुआ था, किन्तु क्षत्रियों को दण्डित करने के लिए क्षत्रिय रूप धारण किया और एक भी क्षत्रिय नहीं छोड़ा। वह परशुराम भी वही विष्णु के रूप में मैं ही था। सातवाँ अवतार राम रूप में विष्णु अवतरित हुए। रावण आदि दुष्ट राक्षसों का संहार किया था। स्वयं राम राजा बने, राम राज्य की स्थापना की थी। एक राजा को कैसा होना चाहिये, यह मर्यादा कायम की थी। पती-पत्नी, भाई-बन्धु, माता-पिता, सेवक आदि के पवित्र सम्बन्धों को उज्ज्वल किया।
आठवाँ अवतार विष्णु कृष्ण के रूप में आये थे। कृष्ण रूप में अनेकानेक चरित्र किये थे। सर्व प्रथम ग्वाल बालों के साथ गऊवें चराई। वृन्दावन में बंसी बजाई। धरती के ऊपर बढे हुए पापियों का विनाश किया। सम्पूर्ण धरती को छान मारा कहीं कोई पापी रह न जाये। कालिये नाग को वश में किया नाथ डाली। यमुनाजी के कुण्ड से कालिये को बाहर निकाला। सभी के लिये जल शुद्ध पवित्र किया। पीने योग्य बनाया। अनेकानेक असुरों को मार कर के क्षय कारी बनाया। वही कन्हैया भी श्री देवजी कहते है मैं ही था।
नवाँ अवतार बुद्ध रूप में आये। गया जी पर निवास किया। वहाँ प्रचलित पाखण्ड को देखा और उसे खण्डन करने का बिड़ा उठाया। हिन्दु धर्म में प्रचलित पाखण्ड का संहार किया। बौद्ध पंथ चलाया। शुद्ध मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया अंगुलिमाल नाम के दैत्य को संत बनाया। जम्भेश्वरजी कहते हैं कि इस प्रकार से नौ बार विजय हमारी हुई है। इन नौ अवतार से जो कार्य हो सका। वह तो समयानुसार पूर्ण किया। किन्तु अब भी बहुत सारे कार्य करने शेष हैं। वह कार्य जम्भराय रूप में आकर पूर्ण करूँगा।
वैसे तो मैं अपार शक्ति सम्पन्न हूँ। मुझे यहाँ आने की आवश्यकता नहीं है। फिर भी थोड़ी सी शक्ति लेकर आता हूँ और अपना कर्तव्य कर्म करके चला जाता हूँ। यही मेरा विभिन्न अवतारों का प्रयोजन है। मैं तो प्रथम दिन से ही अपरंपार शक्ति सम्पन्न हूँ। इस समय यहाँ भारत भूमि में जांभा एवं गोरख दोनों ही अपार गुरु रूप में विद्यमान है। किन्तु पढे हुए पंडित, काजी, मुल्ला आदि अपनी अहंता के कारण समझ नहीं पा रहे है, ये मूर्ख लोग निंदा करते हैं। दोजख (नरक) को छोड़कर यदि स्वर्ग को चाहते हैं तो हमारा कहना स्वीकार करो। यदि इस प्रकार से गुरु पथ पर चलोगे तो आपको स्वर्ग-मोक्ष, जीवन युक्ति मुक्ति की प्राप्ति अवश्य ही होगी।
मालदेव कहै- अलख संभू कहो सो कुण उपायो, पहला क्यौह बीजो ही हुवो। जाम्भोजी श्री वायक कहे-
शब्द-105 ओ३म् आप अलेख उपन्ना शिंभू, निरह निरंजन धंधूकांरू।
आपै आप हुआ अपरम्पर, हे राजेन्द्र लेह विचारूं।
नै तद चन्दा नै तद सुरुं, पवण न पाणी धरती आकाश न थीयों।
ना तद मास न वर्ष न घड़ी न पहरूं, धूप न छाया ताव न सीयों।
न त्रिलोक न तारा मंडल, मेघ न माला वर्षा थीयों।
न तद जोग नक्षत्र तिथि न बारसीयों, ना तद चवदश पूनो मावसीयों।
नै तद समद न सागर न गिरि न पर्वह्म्, ना धौलगिरी मेर थीयों।
ना तद हाट न वाट न कोट न कसबा, बिणज न बाखर लाभ थीयों।
यह छत धार बड़े सुलतानो, रावण राणा ये दिवाणा।
हिन्दू मुसलमानूं, दोय पंथ नहीं जूवा जूवा।
ना तद काम न करषण जोग न दर्शण, तीर्थ वासी ये मसवासी।
ना तद होता जपिया तपिया, न खच्चर हींवर बाज थीयों।
ना तद शूर न वीर न खड़ग न क्षत्री, रण संग्राम न जूझ न थीयों।
ना तद सिंह न स्यावज मिरग पंखेरूं, हंस न मोरा लेल सूवो।
रंग न रसना कापड़ चोपड़, गोहूँ चावल भोग नथीयों।
माय न बाप न बहण न भाई, ना तद होता पूत धीयों।
सास न शब्दूं जीव न पिंडू, ना तद होता पुरुष त्रियों।
पाप न पुण्य न सती कुसती, ना तद होती मया न दया।
आपै आप ऊपनां शिंभू, निरह निरंजन धन्धू कारूं।
आपो आप हुआ अपरंपर, हे राजेन्द्र लेह विचारूं।
मालदेव ने पूछा-हे देव! अलख स्वयंभू ने तो सम्पूर्ण सृष्टि की रचना की थी, किन्तु अलख शिंभू को रचने वाला कोई और ही होगा? क्योंकि बिना उत्पत्ति कर्त्ता के तो कुछ उपजता ही नहीं है, यह नियम है। अलख निरंजन को उत्पन्न करने वाला कोई अन्य ही होगा?
श्री जाम्भोजी ने शब्द सुनाते हुए कहा- हे मालदेव! आप स्वयं ही शिम्भू अलख निरंजन उत्पन्न हुए हैं। उन्हें उत्पन्न करने वाला अन्य कोई नहीं है। यदि उन्हें भी उत्पन्न करने वाला कोई और स्वीकार करें तो फिर आगे परंपरा चल पड़ेगी। उसका कोई और होगा तो, उसका भी कोई और ही होगा। इस परंपरा का कोई अंत नहीं है। यह सिद्धान्त अनवस्था दोष से ग्रसित है। इसीलिए एक ही ब्रह्म अंतिम है। उसी से ही सृष्टि की रचना होती है। उसे बनाने वाला कोई अन्य नहीं है। क्योंकि वह ब्रह्म अजन्मा है। माया से रहित है। वह अन्य सभी का तो आधार है, किन्तु उसका आधार कोई नहीं है। हे राजेन्द्र ! ब्रह्म तो स्वयं आपो ही आप है। स्वयं ही सृष्टि के रूप में परिवर्तन होते हैं। उस समय, जब सृष्टि की रचना नहीं हुई थी तब भी एक निरंजन शिम्भू था। या उस समय धंधुकार ही था। इस समय सृष्टि के सौन्दर्य को आप देख रहे हैं। यह उस समय कुछ भी नहीं था। जैसे- चन्द्रमा, सूर्य, पवन, पाणी, धरती, आकाश, ये पाँचों तत्त्व, उस समय नहीं थे। तथा महीना, वर्ष, घड़ी, प्रहर, धूप-छाया, सर्दी-गर्मी, तीनों लोक, तारा मंडल, मेघमाला आदि नहीं थे।
योग-नक्षत्र, तिथि, द्वादशी,चतुर्दशी, पूर्णिमा, अमावस्या, समुद्र, पर्वत, धौलागिर, मेरु आदि भी नहीं थे। हाट-मार्ग, कोट, कस्बा, व्यापार, हानि-लाभ आदि नहीं थे। इस समय के सम्राट, छत्रपति, मंडलेश्वर, रावण, राणा, दीवान, हिन्दू मुसलमान ये दोनों पंथ अलग अलग नहीं थे। कार्य कृषाण, योग दर्शन तीर्थ तथा तीर्थवासी, मसवासी, श्मशान भूमि में निवास करने वाले,मठ वासी, मठ में निवास करने वाले भी नहीं थे। जप करने वाले जपिया, तपस्या करने वाले तपिया, ये भी नही थह्य।
उस समय एक निरंजन शिंभू ही था। तब खच्चर-घोडे बाज आदि भी नहीं थे। उस समय शूरवीर, खड,क्षत्रिय भी नही थे और न ही रण संग्राम या युद्ध होता था। उस समय रंग-रसना, कापड़, चोपड़, घी तेल, गेंहूँ चावल, आदि भोज्य पदार्थ नहीं थे। माता-पिता, बहन-भाई, पुत्र-पुत्री आदि भी नहीं थे। उस समय श्वास प्रश्वास, जीव शरीर, स्त्री-पुरुष, पाप-पुण्य, सती-कुसती, माया-दया भी नहीं थी।
हे राजेन्द्र ! उस समय एक निरंजन माया रहित स्वयंभू था। वही निरंजन स्वयंभू ही स्वयं सृष्टि के रूप में उत्पन्न हुआ। यह विचारणीय विषय है। इसीलिए स्वयं ही विचार करके देख ले।
मालदेव कह देवजी सीख द्यौं, जाम्भेजी कह-जको राज विद्या ध्रम पाल्यसी, बिसनोई को तागो पाल्यसी, मरजाद मां रहिसी, तैं राज द्योक, राज्य रीध खडग सिध होयसी, मेट जिहक राज रीघ्य खडग सिध जायसी, सतगुरु कही सांच करि मानी। मालदेव जोधपुर आयों।
मालदेव ने शब्द सुने और कहने लगा- हे देव! मुझे शिक्षा प्रदान कीजिये और अपना शिष्य बनाइये। जाम्भोजी ने कहा- हे राजन! जो राज-धर्म का पालन करेगा, वही सच्चे अर्थो में राजा होगा। राजस्व के रूप में जनता से धन लेता है, किन्तु वह धन तुझे युक्ति-युक्त ही लेना होगा। विशेष रूप से बिश्नोइयो से पाँचवाँ भाग लेना, क्योंकि बिश्नोई पूर्ण रूपेण धार्मिक हैं। अपना धन ईमानदारी से कमाते हैं और दसवाँ भाग दान पुण्य में खर्च करते हैं। इसीलिए इन्हें यह विशेष छूट मिलनी चाहिये।
हे राजन! यदि आप मर्यादा में रह कर राज करोगे, तो तुम्हारे राज में रिद्धि सिद्धि की अभि वृद्धि होगी। तुम्हारा खड्ग सिद्ध होगा। अवश्य ही तुम विजय को प्राप्त होगे। जो राजा मर्यादा का परित्याग करेंगे उन्हें ये अलौकिक सिद्धि आदि की प्राप्ति नहीं होगी। मालदेव ने सद्गुरु की कही हुई बात सत्य कर मानी।
मालदेव के साथ मूला पुरोहित भी था। जाम्भोजी तथा मालदेव की वार्ता को सुना, किन्तु पुरोहिताई की वजह से वाद-विवाद में ही अपनी विद्वता को मानता था। मैं पडित हूँ, मैं विद्वान हूँ, यह अहंकार ही विवाद का कारण होता है। मूला पुरोहित कहने लगा-आप मुझे कोई अलौकिक परचा दीजिये, अन्य सीधे साधे लोगो को क्यों ठग रहे हो? क्रोध से युक्त हुआ ब्राह्मण कहने लगा-
मुझे प्रथम परचा तो यह दीजिये। मेरी मुट्ठी में क्या है? दूसरा परचा यह दीजिये कि मेरे घर में कितने जीव हैं? कितने पुरुष, नारी एवं बच्चे हैं? भिन्न भिन्न करके बतलावें? तीसरा परचा यह दीजिये कि मैं तुम्हारे शरीर पर तलवार मारूँगा। यदि आपके चोट नहीं लगे, तो मैं जनेऊ रखकर आपका शिष्य हो जाऊँगा। श्री देवजी ने कहा-हे ब्राह्मण ! तुम्हारे हाथ में नारियल की गिरी है, किन्तु तू खली लेकर आया था। वह अब पलट करके नारियल की कच्ची गिरी बन गयी है।
तुम्हारे कुटुम्ब में तीन सौ घर हैं। तुम्हारे शरीर से उत्पन्न बालक तीस हैं। उनमें सोलह पुत्र एवं पौत्र हैं, चौदह नारी दिखाई देती हैं। तुम्हारे पास में यह तलवार है, यह तो लकड़ी की है। यह कटारा तुम मेरे शरीर पर मारो, तभी तुम्हारा भ्रम मिटेगा।
ऐसा कहते ही मूला हाथ में कटारा (तलवार) लेकर उठ खड़ा हुआ जिसके मारने से कोई बच नहीं सकता था। मूले ने पूरे जोर से देव के शरीर पर प्रहार किया। ज्योही कटारा मारा, शरीर को पार करके दूसरी तरफ निकल गया। मूलै ने देखा कि हाड माँस शरीर में दिखाई नहीं दे रहा है।
इसलिये जिस प्रकार से हवा में तलवार निकल जाती है, उसी प्रकार से आर पार हो गयी, किन्तु श्री देवजी के शरीर में खरोंच तक नहीं आयी। मूले ने देखा कि यह तो पूर्ण ब्रह्म परमात्मा स्वंय ही हैं। मूले के हाथ से तरवार नीचे गिर पड़ी। जाम्भोजी ने कहा-तुम्हारे किये हुए पाप छूटेंगे नहीं, जब तक तुम अहंकार को नहीं गिराओगे। व्यर्थ के विवाद को नहीं छोड़ोगे।
मूला कहने लगा-व्यास कहे देवजी आज ही ज समझि नै कासौ करणौ छै,जाम्भोजी श्री वायक कहै -
मूला व्यास कहने लगा-देवजी! आज ही समझ करके क्या करना है समझने के लिये तो आगे दिन बहुत है। अभी क्या जल्दी है? जाम्भोजी ने शब्द सुनाया-
शब्द-95 ओ३म् वाद विवाद फिटाकर प्रांणी, छोड़ो मन हठ मन का भाणो।
कांही कैं मन भयो अंधेरो, कांही सूर उगाणो।
नुगरा के मन भयो अंधेरो, सुगरा सूर उगाणो।
चरणभि रहीया लोयण झुरीया, पिंजर पड्यो पुरांणो।
बेटा बेटी बहन रु भाई, सबसै भयो अभाणो।
तेल लियो खल चोपै जोगी, रीता रहीयो घांणो।
हंस उड़ाणो पंथ बिलंब्यो, कीयो दूर पयाणो।
आगै सुरपति लेखो मांगै, कहि जिवड़ा के करण कमाणो।
जीवड़ा नै पाछो सूझण लागो, सुकरत ने पछताणो।
हे पुरोहित! व्यर्थ का विवाद करना छोड़ दे। तुझे जो अच्छा लगता है, उसी में ही तुम्हारा मन लगता है। उसी में तुम्हारा मन हठ करता है। यह आवश्यक नहीं है कि वह ठीक ही हो। वाद-विवाद करके तो बड़े- बड़े राक्षस मारे जा चुके हैं।
इस संसार में सभी तरह के लोग हैं। किसी-किसी को तो ज्ञान हुआ है जिससे ज्ञान चक्षु खुल गये हैं तथा कई लोग सूर्योदय हो जाने पर भी आँखें नहीं खोलेगे तो उन्हें प्रकाश की प्राप्ति कैसे हो सकेगी? जो अभी नुगरे हैं, जिन्होंने गुरु की शरण ग्रहण नहीं की,उनके तो अज्ञानान्धकार ही छाया हुआ हैं, तथा जिन्होंने गुरु धारण किया है,सुगरा हो चुका, उसके ज्ञान चक्षु खुल गये हैं। हे मूला! व्यर्थ के विवाद में समय व्यतीत न करो। तुम्हारी आयु बहुत ही छोटी एवं कीमती है, इसे समझो। यदि इस प्रकार तुम कहते रहोगे कि अब क्या जल्दी है, तो यह काल किसी को भी माफ नहीं करता है। तुम्हारे शरीर पर बुढापा आ जायेगा। यह काल तुम्हारे शरीर को खा जायेगा। शिथिल कर देगा। आँखें देखना बन्द कर देंगी। हाथ-पाँव कार्य करना छोड़ देंगे। यह शरीर रूपी पिंजर तुम्हारा पुराना पड़ जायेगा।
उस समय जिन्हें तुम अपना कहते हो, वे लोग तुम्हारे से घृणा करने लग जायेंगे। तुम्हारे अपने प्रिय बेटा- बेटी, बहन और भाई सभी तुम्हारे से विलग हो जायेंगे। किसी को भी तुम अच्छे नहीं लगोगे, क्योंकि जब तिलों से तेल निकल जाता है, तो पीछे खली ही शेष रह जाती है। जो पशुओं के खाने के काम आती है। उसी प्रकार से तुम्हारे शरीर पर बुढापा आ जायेगा। शरीर से शक्ति रूपी तेल निकल जायेगा तो यह खली सदृश रस विहीन हो जायेगा।
एक दिन वह भी उपस्थित हो जायेगा। इस शरीर से हंस रूपी जीव उड़ जायेगा। जिस सरोवर में जल नहीं रहता है, वहाँ से हंस भी उड़ कर के चला जाता है। इसी प्रकार से रस जवानी विहीन यह जीर्ण शीर्ण शरीर हो जायेगा, तो इसमें हंस रूपी जीव कैसे रह सकेगा?
आगे-जाने का मार्ग उसे मिल नहीं सकेगा। क्योंकि सम्पूर्ण जीवन में कभी भी उस मार्ग पर चला नहीं। जब तक मार्ग पर चलने का अभ्यास नहीं करेगा तो अन्तिम समय प्रयाणकाल में कैसे मार्ग मिलेगा? बिना मार्ग तो कोई अपने गन्तव्य स्थान (मुक्ति) को प्राप्त नहीं हुआ है। मार्ग में भटक जाने पर इस मानव जीवन से कहीं बहुत दूर चला जायेगा। चौरासी लाख योनियों में भटक जायेगा। आगे सुरपति (धर्मराज) जीवन का लेखा-जोखा माँगेंगे।
हे जीव! तुमने मानव जीवन में रह कर क्या धर्म-कर्म किये है? ऐसा पूछने पर जीव को पछतावा होगा। पीछे के जीवन को देखेगा। किन्तु वहाँ तो ऐसा कुछ भी कार्य नहीं किया, जो आगे धर्मराज के यहाँ गवाही दे सके। जीव ने सुकर्म नहीं किया। इसलिये जीव को पछताना होगा।
हे मूला! बाद में तुम्हें पछताना न पड़े, इसलिये मरने के पूर्व ही सचेत होकर शुभ कार्य करने में संलग्न हो जाओ। इस प्रकार से जोधपुर नरेश मालदेव एवं मूला पुरोहित दोनों ही अपनी संतुष्टि कर के वापिस जोधुपर को रवाना हो गये।