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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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आठवाँ अध्याय · कथा 51

एक वैदिक ब्राह्मण को शब्दोपदेश

एक वेदियों कह- जाम्भाजी वेद विना सिध नहीं, जाम्भोजी श्री वायक कहै-

एक समय सम्भराथल पर श्री देवजी विराजमान थे। उनके पास एक वैदिक पंडित आया, उसने कहा- हे महाराज! आप चाहे कुछ भी करो किन्तु वेद पढे बिना सिद्धि की प्राप्ति नहीं होती। वेदों के ज्ञाता ही सफल होते है। श्री देवजी ने उनके प्रति यह शब्द सुनाया-

शब्द-92 ओ३म् काया कोट पवन कुटवाली, कुकर्म कुलफ बणायो।

माया जाल भरम का संकल, बहु जग रहीया छायों।

पढ़ वेद कुराण कुमाया जालों, दंत कथा जुग छायों।

सिध साधक को एक मतो, जिन जीवत मुक्त दृढ़ायो।

जुगां जुगां को जोगी आयो, सतगुरु सिद्ध बतायो।

सहज स्नानी केवल ज्ञानी, ब्रह्मज्ञानी, सुकृत अहल्यो न जाई।

क्यूं क्यूं भणंता क्यूं क्यूं सुणंता, समझ बिना कुछ सिद्धि न पाई।

यह काया ही कोट (किला, महल) है। इसमें चलने वाला प्राण वायु ही इसके दरवाजे पर खड़ा होने वाला पहरेदार है। कुकर्म रूपी किवाड़ बनाये हुये हैं। भ्रम, माया जाल रूपी जंजीर लगा रखी है। सम्पूर्ण जगत में यही किवाड़ जड़ रखा है। किसी एक दो की बात नहीं है। जब तक यह किवाड़ खुलेगा नहीं, तब तक भ्रम-माया जाल से कैसे बाहर निकलेगा? तुम्हारे वेद इस कुकर्म किवाड़ को नहीं तोड़ सकते।

आप वेद पढें कुराण पढें, किन्तु माया जाल में अधिक ही फं सते चले गये। अनेकों प्रकार के विधि विधान। यह करो, यह न करो। एक दूसरे के विरोधी वाक्यों के जाल में फंस जाने का खतरा अधिक है। वेद शास्त्र तो लिखित हैं, किन्तु कुछ दन्त कथाएँ जो एक दूसरों को कहते सुनते आ रहे हैं, सम्पूर्ण जगत की यही रीति है। कुछ कथाएंँ तो सत्य हैं, तो कुछ झूठी मनगढन्त कथाएँ भी प्रचलित है। कौन सी बात विश्वास योग्य है और कौन सी नहीं, यह निर्णय करना सद्गुरु के बिना सम्भव नहीं है।

एक तो गन्तव्य स्थान पर पहुँच चुका है, प्राप्त कर चुका है, वह तो सिद्ध है और दूसरा अभी साधना कर रहा है। पहुँचने के लिए प्रयत्न शील है, वह साधक है। दोनों का लक्ष्य एक ही है। उन दोनों ने ही मुक्ति प्राप्ति का लक्ष्य दृढ कर रखा है।

हे वैदिक! चाहे तुम्हारे वेद पढ कर परमात्मा तक पहुँचे या अन्य साधन द्वारा पहुँचना, तो आखिर एक ही जगह पर है। किस साधन को मन्द कहें या किसे तेज कहें, यह तो अधिकारी भेद से निर्णय होगा,जो जिस मार्ग पर चलने योग्य होगा, उसे लिये वही मार्ग श्रेष्ठ है। इसलिये आप केवल वेद की ही बात कह कर के अन्य साधनों को नकार नहीं सकते।

श्री देवजी कहते हैं कि मैं तो युगों युगों का योगी हूँ। मुझे न तो किसी गुरु की आवश्यकता है और न ही वेद पढने की, वेदों में जो कहा है, वह मैं जानता हूँ, यह मैं अभी-अभी नहीं सीखा हूँ, मैं तो युगों युगों का योगी हूँ, ये बातें तो मैंने पिछले युगो में ही जान ली थी। मुझे तो तुम्हारे जैसे पढे-लिखे लोगों ने ही सद्गुरु एवं सिद्ध की उपाधि प्रदान की है।

मैं तो सहज में ही ज्ञान सरोवर में स्नान करने वाला स्नानी हूँ। मैं तो कैवल्य ज्ञानी हूँ। ब्रह्मज्ञानी हूँ। मनुष्य का किया हुआ सुकर्म साधन-भजन ज्ञान प्राप्ति हेतु प्रयत्न व्यर्थ में नहीं जाता है।

हे वैदिक! तू वेद मन्त्रों का उच्चारण क्यों करता है? और क्यों ही वेद मन्त्रो को सुनता है? बिना समझ के तो कोई कार्य सिद्ध ही नहीं होता है। समझ ही बड़ी बात है। वह समझ ही बड़ी है। वह समझ पढे लिखे को हो जाये, यह कोई आवश्यक नहीं है। और अनपढ को न आवे यह भी कोई जरूरी नहीं है। ज्ञान की प्राप्ति किसी को भी हो सकती है। मुख्य उद्देश्य समझ ही है। किन्तु तुम्हें समझ ही नहीं आयी, वेदों के अनुसार जीवन यापन नहीं किया। वेद मन्त्र तो केवल तुम्हारे दूसरो के सुनाने के लिये ही हैं। स्वंय ने इनका सदुपयोग नहीं किया है। इस प्रकार से वैदिक पुरोहित के प्रति शब्द सुनाया।