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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह50 / 94

आठवाँ अध्याय · कथा 50

भूत सेवी साणिंया को रोटू गाँव से उठाना

स्याणियो पेदड़ो कुम्भ पेदड़े को बेटो। गाँव रोटू रह। जीह नै भूत लागो। उपंग की बात कहण लागो। एक बिश्नोई की तरवार चोरी थी। मैंहदसर क रजपूत छान्य क कातर लाधौ। देसा परदेसा की बात कह। वीसनोइयां ने कह थे सीनान करो जको आधो सीनान थ। पहलू पाणी पीयो तो भीतरलौ सीनान हुव। पछै उपरलौ सीनान सुध्य बले। वीसन कौ नाव मतल्यौ नहचै चैहमै चैहमै म चउ जाप करो। वीरम भादू डकराय जांभजी क हजूरी आयौ। साथै ल्यायो। जाम्भोजी श्री वायक कहै -

शब्द-90 ओ३म् चोइस चेड़ा कालिंग केड़ा अधिक कलांवत आयसै।

वै फेर आसन मुकर होय बैसैंला, नुगरा थान रचायसै।

जाणत भूला महापापी, बहू दुनियां भोलायसैं।

दिल का कूड़ा कुड़ियारा, उपंग बात चलायसै।

गुरु गहणा जो लैवे नाहीं, दश बंध घर बोसायसै।

आप थापी महापापी, दग्धी परलै जायसैं

सतगुरु के बैड़ें न चढ़ैं, गुरु स्वामी ने भायसैं।

मंत्र बेलु ऋ ध सिध करसें, दे दे कार चलायसैं।

काठ का घोड़ा निरजीवता, सरजीव करसै, तानैं दाल चरायसैं।

अधर आसन मांड बैसेंला, मूवा मड़ा हसांय सैं।

जां जां पवन आसण, पाणी आसण, चंद आसण,

सूर आसण, गुरु आसन संभराथले,

कहै सतगुरु भूल मत जाइयो,पड़ोला अभै दोजखे।

गाँव रोटू नागौर में बिश्नोई बसते हैं। स्याणियों पेदड़ो जो कुम्भा का बेटा था। वही रोटू में रहता था। वन में साँढ (ऊँटनी) चराता था। एक दिन अशौच शरीर से वन में घूम रहा था। उसको कोई भूत-प्रेत चिपक गया था। उपंग की बात यानि अजब गजब की बात-मानव द्वारा अदृष्ट बात कहने लगा।

जैसे-एक बिश्नोई की तरवार खो गयी। स्याणिये ने तुरंत बतला दी कि मैहदसर में एक राजपूत की छान (झोंपड़े) में छिपा कर रखी गयी है। किसी की गाय, किसी की भैंस आदि खो जातद्ध, तो सांणियां तुरंत बतला देता। इस प्रकार से स्यांणिये ने पूरे पन्द्रह परचे दिये। देश प्रदेश की सभी देखी अनदेखी बात बता देता था।

बिशनोइयों ने पूछा-कि भाई तुम कौन हो? स्याणिये ने बतलाया कि मैं तो जांभोजी का छोटा भाई हूँ। जाम्भोजी ने सम्भराथल पर अवतार लिया है। मैं यहाँ पर हूँ। जो परचा आपको चाहिए वह आप मेरे यही पर ले लेवें, इस प्रकार से रोटू गाँव के पास ही एक थली पर बैठा हुआ भूत प्रेत चरित्र करने लगा। लोग उन्हें स्याणा ज्ञानी कहने लगे, क्योंकि लोगों की दृष्टि में तो वह ज्ञान की ही बात करता था। विशेष रूप से जाम्भोजी के चेले बिश्नोइयों से कहने लगा-

आप लोग जो स्नान करते हो, वह तो आधा स्नान है। प्रथम तो जल पीओ। उससे भीतर का स्नान होगा। जब भीतर का स्नान हो जाये, तो फिर बाहर शरीर का स्नान करो। तभी पूर्ण स्नान होगा। सांणियां कहने लगा- आप लोग विष्णु का जप करते हों, यह भी ठीक नहीं है। यदि जप करना है तो चहमैं-चहमैं इस मंत्र का जप करो। इससे तुम्हारा दुःख कटेगा। इस प्रकार का पाखण्ड देखकर वीरम भादू जाम्भोजी के पास सम्भराथल पर पहुँचा।

हे देव! आप ही जैसा हमारी थली पर भी प्रकट हुआ है। जिस प्रकार से आप अलौकिक लीला करते हैं उसी प्रकार से वह भी करता है। यदि कोई चोर चोरी करके चला जाता है तो सांणियां उसे तुरंत बतला देता है। वह तो आप का छोटा भाई भी अपने को बतला रहा है। आपके ऐसे कितने भाई हैं? केवल परचे ही नहीं देता, वह तो आपकी तरह ही धर्म भी बतलाता है। एक नया पंथ भी बतलाता है। वह आदेश देता है कि पहले जल पीओ, पीछे स्नान करो और चहमैं-चहमैं भजन करो।

जम्भेश्वरजी ने कहा-यह तो चेड़ा है। अधोगति में पड़ा हुआ भूत-प्रेत योनि को प्राप्त जीव है। यदि वह तुम्हारे यहाँ रहेगा, तो विष्णु पूजा धर्म नियमों में विघ्न पैदा करेगा। उसे वहाँ से भगाना ही होगा। जाम्भोजी ने रोटू गाँव के लिये प्रस्थान किया और गाँव के निकट साथरी में खेजड़ी वृक्ष के नीचे आसन लगाया। गाँव के लोग देव दर्शनार्थ आते और पूछते-

कहो देवजी, आप कितने भाई हैं? एक तो हमारी थली पर अवतरित हुआ है, आप की तरह ही लीला कर रहा है। किन्तु हमें पता नहीं है कि आपका पंथ सत्य है या आपके छोटे भाई का? वैसे तो आप बड़े सिद्ध है। आपका भाई सैणा छोटा सिद्ध है। वह तो सदा ही हमारी थली पर विराजमान है। ग्रामीण भक्तों के सरल सहज वचन सुन कर देवजी ने कहा-अच्छी बात है। यदि छोटा भाई सिद्ध है तो किन्तु आप लोग जाओ और छोटे भाई को यहीं पर बुला लाओ।

जाम्भोजी की आज्ञा को शिरोधार्य कर के चार जने सांणियां को बुलाने के लिये चले। कुछ लोग खेल देखने के लिए उनके साथ ही साथ चल पड़े। थली पर जाकर देखा, सांणियां वहाँ पर बैठा ध्यान लगा रहा था। उन लोगों ने जाकर बतलाया और कहा-चलो ज्ञानीजी, आपके बड़े भाई आये हैं तुम्हें वहीं पर बुलाया है। ऐसी बात सुन कर सांणियां क्रोधित हो कर कहने लगा-मुझे बुलाने वाला अनाड़ी कौन है?

बिश्नोइयों ने कहा-रे सांणियां! ऐसा क्यों बोलता है? जम्भगुरु जी तो त्रिलोकी के नाथ हैं। तू उन्हें अनाड़ी कहता है? सांणियां ने कहा- जिसको गर्ज होती है वह अपने आप चला आता है। मुझे तो गर्ज नहीं है। यदि जाम्भोजी को गर्ज है, तो वे यहीं पर चले आवें। मैं तो अपने आसन पर बैठा हूँ।

जो आसन पर बैठा होता है, वही बड़ा होता है। दूसरे बाहर से आने वाले छोटे होते हैं। यदि उनको मिलने की इच्छा है, तो यहाँ पर चले आवें अन्यथा वहाँ से चले जायें, मैं नहीं जा सकता। क्योंकि यह मर्यादा के विरुद्ध है।

सांणियां द्वारा इस प्रकार का जवाब सुन कर रोटू गाँव के लोग वापिस आ गये और कहने लगे-हे महाराज! वह तो आ नहीं रहा है और अपने को ही बड़ा सिद्ध आसन धारी बता रहा है। आप स्वयं ही वहाँ पर चलो। जाम्भोजी ने कहा-आप लोग दुबारा जाओ और उसका हाथ पकड़ कर थली से नीचे घसीट लेना, जब तक वहाँ थली पर बैठा हुआ है, तभी तक ये बातें कर रहा है। वहाँ से घसीट लेंगे, तो तुम्हारे साथ चल पड़ेगा। तुम्हारा सामना नहीं करेगा।

वे लोग वापिस गये और जाकर कहा-अरे सांणियां तुम्हें जाम्भोजी ने बुलाया है। तुम्हीं से कुछ बातें करनी हैं, तब सांणियां झुंझला कर विरम के मुख पर थाप चलाई उसी समय ही विरम ने सांणिये का हाथ पकड़ कर थली से नीचे घसीटा और जाम्भोजी के पास लेकर आ गये। वह चुप-चाप बिना विरोध किये ही चला आया।

जाम्भोजी ने कहा-दूसरा पंथ क्यों चलाता है? अपने को देवता क्यों कहता है? बिना स्नान किये जल क्यों पिलाता है? चहमैं चहमैं भजन क्यों बतलाता है? चहमैं चहमैं भजन तो भूत प्रेत करते हैं।

सांणियां कहने लगा-मैं तो अपना जो सिद्धांत है वही बतलाता हूँ। मुझे झूठा ओलाणा क्यों देते हो? जो मैं हूँ, वही मैं कर रहा हूँ। इसमें आप मुझे दोषी नहीं कह सकते। जमाती लोगों ने पूछा-हे देव! हमें आश्चर्य हो रहा है कि यह खोयी हुई वस्तु कैसे बता देता है? यदि यह अभी आपके सामने से लोप हो जाये तो क्या होगा। तब जाम्भेश्वरजी ने शब्द सुनाते हुए कहायह

असली ताकतवर चेड़ा (भूत प्रेत) है। ये चेड़े चौबीस प्रकार के होते हैं। कलंकी वाले कीड़े जोंक की तरह दूसरों के चिपट जाते है। ये भूत प्रेत अधोगति प्राप्त साधारण जीव ही तो होते हैं, किन्तु इनका वायु प्रधान शरीर होने से दूर-दूर तक वायु के साथ सम्मिलित हो कर जान लेते है तथा किसी अन्य मानवादि शरीर में प्रवेश कर जाते है। फिर उनका खून जोंक की तरह चूसते हैं।

कुछ कला बाज लोग भी होते हैं, जो अपनी कला द्वारा लोगों को मोहित करके अपनी पाखण्ड क्रिया में सफल हो जाते हैं। कुछ लोग आसन लगा कर समाधि ध्यान का ढोंग कर के भी लोगों को ठगने में सफल हो जाते हैं। कुछ नुगरा गुरु विहीन मन मुखी लोग पेट भराई के लिये कहीं कोई मूर्ति की स्थापना कर लेते हैं और उसे ही देव कहते हैं, लोगों को भेंट-चढावा चढाने के लिए प्रेरित करते हैं।

जानते हुए भी कि यह मूर्ति कोई देवता नहीं है। फिर दूसरों को भुलावे में डालेंगे। ऐसे लोग तो महा पापी हैं। अनजान में पाप हो जाता है, तो पापी है। किन्तु जानते हुए पाप करता है, भूल करता है। वह महा पापी है। उपर से दिखावे के लिए तो सत्य का आचरण करते हुए मालूम पड़ते हैं, किन्तु उनका दिल झूठ कपट वासना से भरा हुआ है। ऐसे लोग उपंग बात ऊ टपटांग बातें चलायेंगे। गुरु के कथनानुसार तो जीवन यापन करेंगे नहीं किन्तु मनमुखी चलेंगे। अपनी कमाई का दसवाँ भाग दान देना चाहिये। वह न कर के घर में ही अर्थ लगा लोंगे। स्वयं ही मूर्ति की स्थापना करते हैं और स्वयं उसको नमस्कार करते हैं। ऐसे महा पापी दग्ध नरकों में गिरेंगे।

सतगुरु के द्वारा बताये हुए मार्ग पर तो चलेंगे नहीं, गुरु स्वामी की बात अच्छी नहीं लगेगी। ऐसे अज्ञानी जन मंत्र द्वारा, मिट्टी द्वारा, रिद्धि-सिद्धि दिखलायेंगे। कभी मंत्र द्वारा जल की कार दिला कर लोगों को भ्रमित करेंगे स्वकीय सिद्धि का प्रदर्शन करेंगे। लकड़ी का घोड़ा बना कर उस निर्जीव को सजीव करके उसे हो सकता है कि दाल चरा दें। कभी कोई धरती के ऊपर अधर आकाश में आसन लगा कर बैठ जायेंगे। मुर्दे को हंसा सकेंगे, फिर भी हे लोगो! सावधान रहना। जब तक सूर्य का आसन, चन्द्र का आसन, पवन का आसन, जल का आसन, मर्यादा स्थिर है। ये सभी अपनी अपनी मर्यादा पर टिके हुए हैं तब तक जाम्भोजी कहते हैं कि मेरा आसन सम्भराथल पर स्थिर है। सतगुरु कहते हैं कि हे लोगो! भूल नहीं जाना। अन्यथा तो दोरे (नरक) में गिरोगे। ऐ चौबीस प्रकार के चेड़ा आपको भुलावे में डाल सकते हैं। सावधान रहें।

रणधीर कह असा आयस्यै तो आंह ने किसो दोस। कीस आकीद रहेस्यै। जांभोजी कह अता, थोक जाण्यस्यै नहीं। धरती मां वसत सूझयस्य नहीं, पांणी ता घृत होयसी नहीं। परमन की लहस्यै नहीं,उरध र बाणी जाण्यस्यै नहीं, सुरग पहैली कहस्यै नहीं, केवल न्यांन की बात कहिस्यै नहीं, अति बात सतगुरु जांण, मेरा नहीं डीगस्यै, सतयुग में छाया दाग थो, मेर की छाया पड़े अति सतयुग क भूत नै सूझ। दवापुर में अगन्य दाग थो, वासदे की झल दीस अति दवापुर के भूत ने सुझ, कल्यजुग मां भौमी दाग थ मरद को बौल्यौ, गाय को रांभ्यो सुणित अतो कल्यजुग के वितर ने सुझ, अब वीतर नीसर गयों। ननेउ के कोहर क खेजड़ को डालौ भान्यौ, राव हमीर नै चिलत दिखाल्यौ।

जाम्भोजी के हजूरी शिष्य रणधीर ने पूछा- हे देव! आपने जो शब्द कहा- मूवां मड़ा हसायसैं, “काठ का घोड़ा निरजीव सरजीव करस्यै” इत्यादि ऐसे कलाकार आयेंगे, विचित्र करतब करेंगे तो विचारे इस साणियैं का क्या दोष है? यही उनसे पीछे क्यों रहे?

जाम्भोजी ने समझाते हुए कहा-ये भूत प्रेत कलाकार अपनी औकात के अनुसार ही जान पायेंगे। जो ईश्वरीय कर्म है, वह ये नहीं कर पायेंगे। इन्हें धरती में गड़ी हुई वस्तु दिखाई नहीं देगी। ये जल का घृत नहीं बना सकते। दूसरे के मन की बात नहीं बता सकेंगे और न ही जान सकेंगे। स्वर्ग पहेली मार्ग नहीं कह सकेंगे, ये उपर्युक्त बातें सतगुरु ही जानते हैं, ये भूत प्रेत नहीं, यही इनकी पहचान है। ब्रह्म वाणी नहीं जानते।

सतगुरु ने कहा-जो मेरा है, भक्त ज्ञानी है, भगवान् का प्रेमी है, वह तो अपनी मर्यादा को छोड़ेगा नहीं। दूसरे लोग ही इनके चक्कर में फंस जायेंगे। सतयुग में छाया अर्थात् वन में ही मृत शरीर को छोड़ने की प्रक्रिया थी। तब तो भूत प्रेतों को मेरु पर्वत की छाया जहाँ तक पड़ती थी उतना ही भूत को दिखता था। त्रेता युग में जल का दाग था यानि मृत शरीर को जल में बहाने का विधान था, तब तो एक समुद्र से दूसरे समुद्र के बीच में जितना फैसला है उतना भूत को दिखता था। द्वापर में अग्नि का दाग था यानि मृत शरीर को अग्नि में जलाया जाता था। तब तो अग्नि की ज्योति प्रकाश जहाँ तक दिखाई देता है उतना भूत को सूझता था। अब कलयुग में धरती को दाग है। धरती में मुर्दे को गाड़ा जाता है। इस समय मनुष्य की आवाज या गाय के रंभाने की आवाज जहाँ तक सुनाई देती है, वहीं तक भूतों को दिखता है अर्थात् जहाँ तक धरती है वहीं तक दिखता है।

जाम्भोजी ने पूछा रे सांणियां मुलतान के दरवाजे पर क्या है? साणियां ने कहा-हे देवजी! दो घोड़े दौड़ रहे हैं। जिनका शरीर अति बलिष्ठ है। दुबारा जब लंका की बात पूछी तब कहने लगा-कि लंका के दरवाजे पर एक मालण बैठी हुई है। उसकी छबड़ी में चार नींबू हैं। देवजी ने दो नींबू उठा लिये और फिर पूछा-अब कितने हैं? सांणियां कहने लगा-अब दो ही दिख रहे हैं। देवजी ने फिर उन दोनों नींबुओं को मंगवा लिये तथा फिर पूछा अब कितने हैं? अब तो छबड़ी खाली है। किन्तु वे नींबू कहाँ गये, सांणियां कहने लगा-ये तो मुझे पता नहीं है। देवजी ने अपने पास से दिखलाये और कहा-ये नींबू वो ही हैं या और? सांणियां बोला हैं तो वही।

जाम्भोजी ने कहा- हे सांणियां! तूं लंका मुलतान की बात तो बता देता है। किन्तु तुम्हारे पास अति निकट की बात नहीं बता सकता। उसी समय ही उस सांणिये पेंदड़े के अंदर से वह प्रेत निकल गया। फिर उससे पूछा कि अब तुम्हें कितना दिखता है? सांणिये ने हाथ जोड़े- महाराज! अब तो जितना इन लोगों को दिखता है, उतना ही मुझे दिखता है। जो अंदर बैठा हुआ देखता था, वही बोलता था। वह निकल के चला गया।

जाम्भोजी ने बतलाया-अब वह भूत प्रेत ननेउ गाँव के कुंवे पर पहुँच गया। एक खेजड़ी के डाले पर बैठा है और उसने पूरी ताकत लगा कर खेजड़े की डाली तोड़ डाली है। अब वहाँ से भी चला गया है और फलोदी के राव हमीर को चरित्र दिखलायेगा।

वील्होजी ने पूछा-हे गुरु देव! वह बिना शरीर की आत्मा हवा रूप में अति शीघ्र गमन कर जाता है, यह तो सत्य है। किन्तु उस प्रेत ने फलोदी के राव हमीर को आगे क्या चरित्र दिखलाया? इन भूत-प्रेतों की कथा द्वारा भी जाम्भोजी महाराज का दिव्य जीवन चरित्र सुनने को मिलता है। नाथोजी कहने लगे-

जांभोजी ने हंकारो कियो, रणधीर कहे देवजी! क्यौं रजपूत रजपूताणी ऊठ चडया, राव हमीर के दरबार गया फलोदी, रजपूताणी रावल गंज मां सौंपी, आकाश ने कूकड़ी बाही, तागी तागी उंचो चढयौं, हाथ ग बटका होय पड़या, रजपूताणी सती हुई, रजपूत पूठो आयौं, रजपूताणी रावल गंज मांही यों बुलाय लीवी, राव हमीर के मनमां इचरज हुवौं, म्हां सांम्हौ ओठी चाडयो थे। औठी आयसी हंकारो कियो जदि ननेऊ के खेड़े को डालो भानी लुक गयौं, ननेऊ को ओठी आयसी, अंतरे दोय ओठियां आय हकीकत कही, लोग जमाती के परचौं आयो, जाम्भोजी श्री वायक कहे-

शब्द-91 ओ३म् छंदे मंदे बालक बुद्धै, कूड़े कपटे ऋद्ध न सिद्धे।

मेरे गुरु जो दीन्ही शिक्षा, सर्व आलिंगण फेरी दीक्षा।

जाण अजाण बहीया जब जब, सर्व अलिंगण मेटे तब तब।

ममता हस्ती बंध्या काल, काल पर काले पसरत डाल।

ध्यान न डोले मन न टलै, अहनिश ब्रह्म ज्ञान उच्चरे।

काया पत नगरी मन पत राजा, पंच आतमा परिवारूं।

है कोई आछै मही मंडल शूरा, मन राय सूं झूझ रचायले।

अथगा थगाय ले अबसा बसायले, अनबे माघ पाल ले।

सत सत भाषत गुरुरायों, जरामरण भो भागू।

नाथोजी ने वील्हो जी के प्रति इस प्रकार से बतलाते हुए कहा- हे वील्हा! जब मैं श्री देवजी के श्री मुख की ज्योति चारों तरफ देखता था, उस समय मैं अकेला ही नहीं था। पास में अनेक संत भक्त लोग बैठे हुए थे सद्गुरु देव ने हंकारा किया-लंबी श्वास ली किन्तु कुछ भी बोले नहीं। उस समय वहाँ उपस्थित संत शिरोमणि रणधीर जी ने श्री देवजी से पूछा-

आज आप किस पर प्रसन्न हुए हैं, आपकी अलौकिक क्रियाएँ देख कर कुछ न कुछ आश्चर्य जनक घटना का आभास होता है। श्री देवजी ने कहा- मैं देख रहा हूँ कि सांणियां के अंदर बैठा हुआ प्रेत सांणियां पेदड़े को तो छोड़ गया, किन्तु वह ननेऊ गाँव के कुएँ पर पहुँच गया है। वहाँ जाकर उसने खेजड़ी के डाल को तोड़ा है। वहाँ से दो आदमी ऊँट पर सवार होकर यहाँ सम्भराथल पर ही आ रहे हैं तथा अति शीघ्र ही पहुँचने वाले हैं। उनकी यह समस्या है कि खेजड़ी की डाल स्वतः ही कैसे टूट गयी?

ननेऊ से वह प्रेत फलोदी के एक राजपूत में प्रवेश करके पहुँच गया है। यह राजपूत भी सांणिये की भांति ही भूत-प्रेत सेवी है। अनेकों कला बाजी दिखाता है। वह राजपूत तथा उसकी धर्मपत्नी दोनों फ लौदी के राव हमीर के दरबार में पहुँच चुके हैं। रणधीरजी ने पूछा-हे देव! आप हमें इस बात को विस्तार से बतलाये कि वहाँ फलोदी के राज दरबार में पहुँच कर उसने क्या किया? यदि कथन करने योग्य वार्ता है, तो अवश्य ही कहिये?

जाम्भोजी ने आगे की कथा विस्तार से कहते हुए कहा-कोट फलोदी में राव हमीर के दरबार में एक राजपूत अपनी स्त्री के साथ ऊँट पर सवार होकर पहुँचे। जब राव हमीर का दरबार लगा हुआ था तभी उस राजपूत ने प्रवेश करके सभी को नमन किया और कहने लगा-यदि आप लोग देखना चाहो तो मैं आपको दिव्य खेल दिखाने आया हूँ। आप लोग देखें कि मैं सूर्य की किरणों द्वारा सूर्य भगवान् तक पहुँच जाऊँगा। आप लोग तथा रावल हमीर आदि सभी सत्यवादी है। मेरी अमानत को संभाल कर के रखो तथा एक तो मेरी धर्मपत्नी है और मेरा ऊँट भी है, मैं वापिस आकर ले लूँगा। राव हमीर ने स्वीकृति प्रदान कर दी। अवश्य ही खेल दिखायें हम सभी देखेंगे।

राव हमीर ने उसकी स्त्री को राजमहल में रानियों के पास भेज दी, और उसका ऊँट सेवकों को सौंप दिया। उस क्षत्रिय ने अपनी जेब से कच्चे धागे की कूकड़ी निकाली और सभी के देखते ही देखते आकाश में फेंक दी और वह उस कूकड़ी के सहारे-सहारे सभी के देखते ही देखते आकाश में चला गया। कुछ दूर तक तो लोगों ने जाते हुए देखा, किन्तु वह तो इतना ऊँचा चला गया लोगों की आँखों से ओझल हो गया।

क्षत्रिय सूर्य लोक में गया है। वापिस आ जायेगा। सभा वहीं पर बैठी प्रतीक्षा कर रही थी कि आकाश से उसके शरीर के कटे हुए अंग गिरने लगे। सर्व प्रथम एक हाथ जो आभूषणों से युक्त था धरती पर आकर गिर पड़ा। देखते ही देखते दूसरा हाथ एवं दोनों पाँव तथा धड़ भी आकर सभी के सामने गिर पड़े। सभी ने देखा कि यह शरीर उस क्षत्रिय का है, जो सूर्य लोक में गया था। कहीं युद्ध हुआ होगा और वह तो मारा जा चुका है।

उस क्षत्रिय की धर्मपत्नी से कहा कि तुम्हारा पति तो वीर गति को प्राप्त हो गया है। ऐसी बात सुनकर उस सती ने शरीर के अंग एकत्रित कर के पति के वियोग में विलाप करने लगी। राव हमीर ने समझाया, किन्तु वह तो अपने पति के साथ ही सती होने के लिए तैयार हो गयी तथा बिना कुछ विलंब किये अपने पति के साथ ही सती भी हो गयी। सभी लोग जिंदा एवं मुरर्दे को साथ ही जला कर के वापिस लौट आये। तीसरे दिन का तैइया भी कर डाला। बात समाप्त हो गयी।

दस दिन के पश्चात् एक दिन राव हमीर राजदरबार में बैठे थे कि उस क्षत्रिय ने आकर मुजरा- प्रणाम किया और कहने लगा-मैं वापिस आ गया हूँ। मेरी स्त्री और ऊँट दे दो। मुझे कहीं अन्यत्र जाना है। हमीर तथा अन्य सभी लोग आश्चर्यचकित हो गये। कहने लगे-हमने तो तुम्हारे कटे हुए शरीर को अग्नि में समर्पित कर दिया है। तुम्हारे शरीर के साथ ही तुम्हारी स्त्री भी जल चुकी है। दस दिन व्यतीत हो गये हैं। जले हुए भी क्या वापिस लौटाए जा सकते है? क्षत्रिय कहने लगा-

मेरी अमानत आप देना नहीं चाहते हैं। पराई स्त्री को जबरदस्ती से छीन रहे हैं। मैंने तो सोचा था कि राजा प्रजा की रक्षा करता है, किन्तु यह राजा तो चोर है। राजा कब का भला होता है? सदा ही चोर लुटेरे होते हैं। या तो तुम मेरी स्त्री को वापिस दे दो, जो तुमने महलों में छिपा कर रखी है। अन्यथा मैं स्वयं बुला लेता हूँ तुम्हारी बेइज्जती होगी।

हमीर ने कहा-मैं कहाँ से दे दूँ, महलों में नहीं है। उसकी तो एक मुट्ठी भर राख हो गयी है। अच्छी बात है। यदि तुम नहीं देना चाहते, तो मैं ही बुला लेता हूँ। ऐसा कहते हुए आवाज लगायी। वह स्त्री अपने पति की आवाज सुन कर महलों से दौड़ती हुई चली आयी। राव हमीर ने यह आश्चर्य देखा और अन्य सहयोगियों ने भी देखा। राव हमीर के कुछ भी समझ में नहीं आया। यह क्या हुआ? कैसे हुआ? किंकर्तव्यविमूढ हमीर ने दो आदमियों को सम्भराथल पर भेजा और आदेश दिया कि जाम्भोजी से पूछा कर आओ और हमें बतलाओं कि यह राज क्या था?

हे वील्हा! हम लोग देवजी के समीप थे, उसी समय हमीर के भेजे हुए दो ऊँट सवार तथा ननेऊ से भेजे हुए भी दोनों साथ ही सम्भराथल पहुँचे। वहाँ पर उपस्थित सभी के सामने ही देवजी ने यह शब्द सुनाया-

रणधीरजी ने पूछा- हे महाराज! यह क्या आश्चर्य था? क्या हकीकत थी? जाम्भोजी ने बतलाया कि यह तो भूत-चेड़ों की ही करामात थी। न तो कोई आकाश मार्ग में गया और न ही कोई मरा, न ही जला। यह तो केवल देखने मात्र की बात थी। चेड़ों की ही करामात थी।

हे रणधीर! भूत-प्रेतों की सेवा करना मंद कार्य है। भूत प्रेतों का सेवक मरने पर भूत-प्रेत ही बनता है। जिस की जो पूजा करेगा, वह वही होगा। बाहर कुछ अन्य, भीतर कुछ और दिखावामात्र करना छंद है। जो अभी बालक बुद्धि के लोग हैं, वे ही इन दिखावे के कार्य में भाग लेते हैं और भ्रमित होते हैं। यहाँ केवल झूठ कपट है। न तो कोई सिद्धि है और न ही कोई रिद्धि है। हमारे जैसे गुरु वों ने शिक्षा देकर दीक्षित किया है। सभी जगह धर्म मर्यादा का प्रचार किया है। उसी तरफ इन जंजालों को छोड़ कर ध्यान दो। जब भी जान कर या अनजान में कार्य किया है, धर्म कर्म किया है, तभी-तभी उन्हें सचेत किया है। उनके पापों को, अज्ञानता को मिटाया है।

मैं और मेरा यह माया है। ममता रूपी हस्ति काल के अधीन है। ज्यों-ज्यों समय आगे बढता जाता है, त्यों-त्यों अधिकता से बंधन का प्रसार होता है। किन्तु होना तो यही चाहिये था कि किसी भी प्रकार से ध्यान न डोले, मन चंचल न होवे, रात दिवस ब्रह्म में ही लीन रह कर ब्रह्मज्ञान का उच्चारण करे।

काया रूपी यह नगरी है। मन ही इस काया का राजा है। अन्य पाँच ज्ञानेन्द्रिय पाँच कर्मेन्द्रिय आदि इन्हीं सम्पूर्ण परिवार का आत्मा ही स्वामी। इस मही मंडल में ऐसा कोई शूर वीर होगा जो इस चंचल मन से युद्ध करले, यह कभी थकने वाला नहीं है। इसे थकाय ले। यह कभी वशीभूत होने वाला नहीं है इसे वशीभूत एकाग्र करले। यह सदा ही मनमुखी चलने वाला है, इसे सच्चे पथ का पथिक बना ले। जाम्भेश्वरजी कहते है कि मैं यह सत्य कहता हूँ कि गुरु के वचनों को स्वीकार कर ले। तो सदा सदा के लिये जन्म-मरण का भय निवृत्त हो जायेगा।