तीसरा अध्याय · कथा 20
कलश पूजा मन्त्र
ओम् अकल रूप मनसा उपराजी, तामां पांच तत्त्व होय राजी । आकाश वायु तेज जल धरणी, तामां सकल सृष्टि की करणी । ता समर्थ का सुणो विचार, सप्त दीप नव खण्ड प्रमाण । पांच तत्त्व मिल इण्ड उपायो, विगौयों इण्ड धरणी ठहरायों । इण्डे म्म/ये जल उपजायो, जल मां विष्णु :प उपनौ। तां विष्णु को नाभ कमल विगसानो, तांमा ब्रमा बीज ठहरानो। ता ब्रह्या की उत्पति होई, भाने घड़े, संवारे सोई । कुलाल कर्म करत है सोई, पृथिवी ले पाके तक होई । आदि कुम्भ जहाँ उत्पन्नों, सदा कुम्भ प्रवर्तते । कुम्भ की पूजा जे नर करते, तेज काया भोखण्डते । अलील रूप निरंजनो ,जाके न थे माता न थे पिता । न थे कुटुम्ब सहोदरम, जे करे ताकि सेवा, ताका पाप दोष क्ष्यों जायन्ते । आदि कुम्भ कमल की घड़ी, अनादि पुरुष ले आगे धरी । बैठा ब्रह्मा बैठा इन्द्र, बैठा सकल रवि अरु चन्द । बैठा ईश्वर दो कर जोड़ , बैठा सुर तैतीसा करोड़ । बैठी गंगा यमुना सरस्वती, थरपना थापी बाल निरंजन गोरख जति । सत्रह लाख अठाइस हजार, सतयुग प्रमाण । सतयुग के पहरे में सुवर्ण को घाट, सुवर्ण को पाट, सुवर्ण को कलश । सुवर्ण को टको, पांच करोड़्या के मुखी गुरु प्रह्लाद जी ने कलश थाप्यो । वै कलश जो धर्म हुआ सो इस कलश हुइयो । बारह लाख छियानवे हजार त्रेतायुग प्रमाण । त्रेता युग के पहरे में रूपे को घाट, रूपे को पाट, रूपे को कलश , सुवर्ण को टको, सात करोड़या के मुखी राजा हरिश्चन्द्र तारादे रोहितास , कलश थाप्यो वै कलश जो धर्म हुआ सो इस कलश हुइयो । आठ लाख चौसठ हजार द्वापर युग प्रमाण । द्वापर के पहरे में तांबे को घाट, तांबे को पाट, तांबे को कलश, रूपे को टको, नव करोड़्या के मुखी राजा युधिष्ठर कुन्ती माता द्रौपदी, पाँच पांडव मिल कलश थाप्यो, वै कलश जो धर्म हुआ, सो इस कलश हुइयो । चार लाख बतीस हजार कलयुग प्रमाण । कलयुग के पहरे में माटी को घाट, माटी को पाट, माटी को कलश , तांबा को टको, अनन्त करोड़्या के मुखी गुरु जम्भेश्वरजी ने कलश थाप्यो। वै कलश जो धर्म हुआ, सो इस कलश हुइयो।
ओम् विष्णु तत्सत ब्रह्मणे नमः।।
कलश क्या है? सम्पूर्ण सृष्टि ही गोल-गोल कलश रूप ही है। कलश में जल भरा है। इस सृष्टि में भी जल भरा है। यह कलश पृथ्वी से बना है। पृथ्वी ही हमें सभी कुछ देती है। धरती माता है। आकाश पिता है। जल जीवन है। अग्नि ओज व तेज है। वायु हमारा श्वास है इस कलश को आदि विष्णु गोरख ने ही निर्मित करके सृष्टि के आदि में ही स्थापित किया था।
उस समय वहाँ पर तैतीस करोड़ देवी-देवता, गंगा, यमुना व सरस्वती आदि देवता विराजमान थे। उन्हें यह शिक्षा दी थी कि संसार में रहो, तो जल की तरह निर्मल रहो। अन्यथा तुम्हारा जीवन नरक समान हो जायेगा। उन्हीं आदि विष्णु से प्रेरणा लेकर सतयुग में सर्वप्रथम प्रह्लाद जी ने कलश की स्थापना की थी। जिससे पाँच करोड़ जीवों का उद्धार हुआ था। त्रेता युग में राजा हरिश्चन्द्र ने कलश की स्थापना की थी, जिससे सात करोड़ जीवों का उद्धार हुआ था। तथा द्वापर युग में धर्मराज युधिबिठर ने इसी कलश की स्थापना की थी, जिससे नौ करोड़ जीवों का उद्धार हुआ था। तथा द्वापर युग में धर्मराज युधिष्ठिर ने इसी कलश की स्थापना की थी, जिससे नौ करोड़ जीवों का उद्धार हुआ था।
यहाँ पर श्री जम्भेश्वरजी कहतें हैं कि मैं उन्हीं परम्पराओं को निभाते हुए यहाँ सम्भराथल पर भगवीं टोपी पहन कर आया हूँ। उसी कलश की स्थापना करता हूँ। जिससे बारह करोड़ में घुमते हुए मंत्र पढ़ा था जीवों का उद्धार होगा। इस मंत्र द्वारा जल देवता में इन सभी ऋषियों का आह्वान किया है, जो धर्म के पालक थे। उनका धर्म ही यहाँ पर कलश में निवेश करवाया है। वै कलश धर्म हुआ वो इस कलश हुइयो।
ऐसा कहते हुए उसी मर्यादा को बार-बार दोहराया है। श्री सिद्धेश्वरजी ने इसमें ग्यान-ध्यान की भावना भरी है। जल में गुण होता है कि स्पर्श कर्ता की भावना गुणों को ग्रहण कर लेता है। स्पर्श कर्ता जैसा होगा, वैसा ही जल हो जायेगा। यहाँ पर स्वयं विष्णू भगवान् ने ही कलश की स्थापना करके जल को अमृत बनाया है। इसमें सहयोगी थे स्वर्ग दृष्टा पूल्होजी।
कलश पूजा के पश्चात् पाहल किया था, पाहल करते समय केवल अकेले ही श्री देवजी ने माला जल में घुमाते हुए निम्नलिखित मंत्र पढा -