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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह80 / 94

बारहवाँ अध्याय · कथा 80

जांगलू की कंकेहड़ी धाम

नाथोजी कहते हैं- हे वील्हा! तुम्हारे यहाँ इस पंथ में सम्मिलित होने से पूर्व, अभी ही कुछ दिनों की बात है कि गाँव जांगलू की बरसिंगवाला तालाब के पास ही कंकेहड़ी वृक्ष के जंगल में एक व्यक्ति भेड़ बकरियाँ चरा रहा था। वह व्यक्ति तालाब की सीमा के बाहर पश्चिम धोरे में एक कंकेहड़ी के नीचे बैठा हुआ अपनी भेड़ बकरियों को चरा रहा था। उस समय ज्येष्ठ का महीना, कृष्ण पक्ष की एकादशी थी। उस ग्वाले ने अकस्मात् एक योगी पुरुष को देखा। जो साक्षात् विष्णु स्वरूप जाम्भोजी सदृश ही था। कानों में आवाज सुनाई दी। वह महापुरुष कह रहे थे-

हे ग्वाला! तुम ऐसा करो कि जल्दी से जांगलू जाओ और गाँव के लोगों से कहना कि कल द्वादशी तिथि है। वर्षा होने वाली है। तालाब में गोबर खाद बिखरा पड़ा है। सफाई का अभाव है। वर्षा के जल को गोबर खाद अपवित्र कर देगा। शीघ्र ही गाँव के लोग चले आयें और तालाब की सफाई कर दें।

वह ग्वाला कहने लगा- हे महाराज! आप की बात तो सत्य है। किन्तु मैं यहाँ से भेड़ बकरियों को छोड़कर चला जाऊँ गा तो भेड़िये-नाहर आदि हमारे धन को खा जायेंगह्य। इनकी रखवाली कौन करेगा? महात्माजी ने कहा- इनकी रखवाली मैं करूँगा। तूँ जल्दी जा और वापिस लौटकर आजा। उस ग्वाले ने कहा- आप क्या भेड़-बकरी चराना जानते हैं? कैसे रखवाली करोगे? जांगलू गाँव यहाँ से तीन कोस दूर है। मैं जल्दी कैसे आ सकूँगा? अरे ग्वाले! तुम बहुत ही भोले हो। मैं तो सभी जीव योनियों की रक्षा करता हूँ। तुम्हारे ये कितने से जानवर हैं। अब तुम देरी ना करो, अतिशीघ्र जाओ और उनसे कह करके लौट आओ।

वह ग्वाला उन सिद्ध पुरुष की बातों में आ गया और अपना पशु धन उनके हवाले करके भागता हुआ गाँव आया और गाँव के मुखिया वरसिंग के बेटे स्याणे से कहते हुए और वहाँ की सारी बातें बताते हुए उन्हें सचेत कर के दौड़ा-दौड़ा वापिस आ गया। जहाँ पर जिस कंकेहड़ी के नीचे छोड़कर गया था, वहाँ आकर देखा तो कोई नहीं था। उस ग्वाले ने पैरों के निशान देखे किन्तु वे भी नहीं थे। ग्वाला आश्चर्यचकित हो गया कि यह क्या हुआ? क्या मैं स्वप्न तो नहीं देख रहा हूँ? मुझे क्या हो गया है? चलूँ मेरे पशुधन को देखूँ, कहाँ गया होगा,अब तक जीवित है या नहीं? धोरे पर चढ़कर देखा कि वहीं पर ही पशुधन विचरण कर रहा है।

एक साधारण ग्वाले के समझ में कुछ नहीं आया। ग्वाला ही क्या, बड़े-बड़े योगी, यति, लोग निरंतर जिनका ध्यान, जप,पूजा,पाठ आदि करते हैं, तो भी उनके समझ में कुछ नहीं आता। बुद्धि द्वारा अगम्य को बुद्धि द्वारा कैसे जाना जा सकता है।

जांगलू गाँव के लोगों ने स्याणे को अगुवा करके द्वादशी के दिन सूर्योदय के साथ ही तालाब सफाई का कार्य प्रारम्भ किया। जब प्रातःकाल में गये थे, तो एक भी बादल नहीं था। किन्तु हवन, यज्ञ, प्रसाद पूर्ण होते ही न जाने कहाँ से बादल उमड़कर आये और लोगों के देखते ही देखते तालाब स्वच्छ जल से भर गया।

उन सभी लोगों ने परमात्मा विष्णु जाम्भोजी को ही निमित्त कारण माना। वह कोई अन्य साधारण योगी नहीं था, वे तो विष्णु ही थे। इस प्रकार से समय-समय पर अज्ञानान्धकार में सोये हुए जनों को जाग्रत करते आये हैं। उस दिन से लेकर आज पर्यन्त उसी गाँव के लोग, ठीक उसी समय पर उसी तालाब पर हाजिर होकर हवन-तालाब की सफाई आदि कार्य करते हैं। इन्द्र देवता को यज्ञ द्वारा प्रसन्न करके वर्षा करवाते हैं।

हे वील्ह! यह परचा भी अद्भुत ही था। जाम्भोजी के अन्तर्धान होने के पश्चात् लोगों को प्राप्त हुआ था। मैं समझता हूँ कि आगे भी प्राप्त होता रहेगा। इस पवित्र जगह पर आने से ही पाप-पंक धुल जायेगा। शारीरिक, मानसिक, रोगों का निदान हो सकेगा।

“श्रद्धावान लभते ज्ञानम9” श्रद्धावान पुरुष को ही ज्ञान की प्राप्ति होती है। तर्क की कैंची से तो कुछ भी काटा जा सकता है। मैं तुझे यह कहना चाहता हूँ कि तुम कहीं दुर्भाग्यवश तर्क रूपी कैंची मत ले लेना। अन्यथा तो आत्मा-परमात्मा के आध्यात्मिक सुख से वंचित हो जाओगे। भगवान् की लीला का आनन्द श्रद्धावान हृदय से ही लिया जा सकता है। कहीं ऐसा न हो कि तुम कुतर्क के जाल में पड़कर अपने को शुष्क बना लो।

इस प्रकार से गुरु शिष्य के संवाद के द्वारा जाम्भा पुराण पूर्णता की ओर अग्रसर हुआ है। अब आगे जाम्भोजी के शिष्यों द्वारा किया हुआ कार्य का अवलोकन किया जायेगा। सर्वप्रथम वील्होजी के कार्य एवं धर्म रक्षार्थ आंदोलन को देखेंगे। तत्पश्चात् वील्होजी की शिष्य परम्परा एवं साहित्य संरचना तथा अन्य कार्यों के बारे में विचार किया जायेगा। इस पंथ ने कहाँ पर क्या-क्या बलिदान दिया है, ऐसे धर्मवीर सज्जनों का स्मरण किया जायेगा।

यह जाम्भा पुराणा का पूर्वार्द्ध पूर्ण हुआ। अब आगे उतरार्द्ध प्रारम्भ किया जा रहा है।