तीसरा अध्याय · कथा 26
जाटों के प्रति शब्दोपदेश
वील्होजी उवाचः- हे गुरुदेव! मु.डे मुण्डे मति र्भिन्ना। जितने संसार में लोग हैं। उतनी ही बुद्धि भिन्नभिन्न हैं। न जाने कौन कौन लोग श्रीदेवजी के पास आते होंगे और नाना प्रकार के प्रश्न पूछते होंगे? कुछ सवाल तो संसार के पदार्थों तक ही सीमित होते हैं तथा कुछ सवाल आत्मा-परमात्मा के बारे में होते हैँ। उस समय चारों तरफ जाट समाज का ही बाहुल्य था। ये लोग अज्ञानी थे। ये भी बड़ी ही विचित्र प्रकृति के लोग हैं। उन्होनें क्या-क्या बातें पूछी? मैं आपसे विशेष रूप से जानना चाहता हूँ।
नाथोजी उवाचः- हे शिष्य! जब श्रीदेव यतीश्वर सम्भराथल पर विराजमान थे, तो उनके पास सभी जाति के लोगों के अलावा जाट लोग अधिक मात्रा में आते थे। वे लोग ज्ञान-ध्यान की बातें तो नहीं जानते थे, किन्तु व्यर्थ का सवाल अवश्य ही खड़ा करते थे।
श्री योगेश्वरजी उन्हें योग-ज्ञान-ध्यान की बातें अपनी भाषा में समझाते थे। जो भी पूछा गया उसका उतर ज्ञानवर्द्धक ही देते थे। कभी भी रोष उत्पन्न नहीं करते थे। बड़े ही स्वाभाविकता से हंसते हुए सटीक जवाब दिया करते थे।
ऐसे ही एक समय में एक जाटों की जमात बिश्नोइयों से विवाद करने लगी। वे लोग कहने लगे- जाम्भोजी भी स्त्री रखते हैं। वे क्या हम से कम हैं। जैसे हम लोग वैसे ही जाम्भोजी। बिश्नोई कहने लगे हमने तो कभी नहीं देखी और न ही कभी सुनी। वे तो निराहारी निराकार हैं। स्वयं ब्रह्मस्वरूप हैं। उनकी दृष्टि में तो स्त्री-पुरुष का भेद भी नहीं है।
जाटों की जमात ने बिश्नोइयों की बात मानी नहीं। विवाद करते हुए जम्भेश्वरजी के पास सम्भराथल ही पहुँच गये। देवजी से बिश्नोइयों ने पूछा- हे देव! ये जाट लोग क्या कहते हैं? क्या आप स्त्री रखते हैं?
श्रीदेवजी ने कहा- सुनो! मैं जो स्त्री रखता हूँ वह बड़ी ही विचित्र है। वह आपके पास भी है। किन्तु तुम्हारे पास जो स्त्री है, वह तुम्हारी सत्चरित्रा मधुरा नहीं है, इसे सोम्या बनाओ।
जाट कहने लगे-हे देवजी! हम लोग समझ नहीं पाये। आप क्या कहना चाहते हैं? क्या हमारे से आपके पास की स्त्री अच्छी है? श्रीदेवजी ने कहा- सुनो! मैं कैसी स्त्री रखता हूँ। मेरे पास मेरी सहजे सुन्दर लोतर वाणी। सहज में ही सुन्दर मधुर वाणी ही मेरी स्त्री है। आपके पास जो वाणी है वह मधुर नहीं है। इसलिए आप लोग दुःखी हैं। संसार में आपकी महत्ता नहीं है। आप निंदा के पात्र बनते हैं। इसलिए इसे मधुर बनाइये। ऐसी वाणी रूपी स्त्री मन को ज्ञानी बना देती है। हे लोगों! स्त्री-पुरुष में भेद ही कहाँ है? ज्ञान के लिए तो भेद नहीं है। वही श्वांस, त्वचा, वही जीवात्मा, सभी एक ही है। तो फिर उत्तम मध्यम क्यों देखते हैं। मैं स्वयं क्या हूँ? स्त्री या पुरुष? यह तो कहना कठिन है। न तो मैं आत्मा रूप से पुरुष हूँ और न ही मैं नारी। स्त्री-पुरुष होना तो शरीर तक ही सीमित है। मैं तो आत्मा-परमात्मा हूँ। तुम लोग शरीर के धर्मों में कैद होकर ऐसी बात करते हो। ऐसा कहते हुए शब्द सुनाया-
एक सम बिश्नोइयां ने जाट पूछ जाम्भजी के लुगाई छः बिश्नोई कह काई नहीं, निराहीरी निरंजण छः जाट कह- हूँ जाम्भेजी ने पूछस्यों, जाट बिश्नोई झगड़ता झगड़ता जाम्भाजी के जुरे आया जाम्भोजी श्री वायक कह-
शब्द-17 ओ३म् मोरै सहजे सुन्दर लोतर वाणी, ऐसो भयो मन ज्ञानी।
तइया सासूँ,तइया मांसूँ,रक्तूं रुहीयूं,खीरू नीरूं,ज्यूं कर देखूं।
ज्ञान अंदेसूँ,भूला प्राणी कहे सो करणो।
अइ अमाणो, तत समाणो, अइया लो म्हे पुरुष न लेणा नारी।
सोदत सागर सो सुभ्यागत,भवन भवन भिखियारी।
भीखी लो भिखियारी लो, जे आदि परमतन्त लाधो।।
जांके बाद बिराम विरासों सांसो, ताने कौन कहसी साल्हिया साधो।
जाट कह मुन जांभजी जीपाया था, बिश्नोई कह म्हे जाम्भाजी, सहजे सुन्दरी कदे दीठी नहीं, थहे जाणां नहीं।
बिश्नोई लोग कहने लगे-जाम्भोजी ने जो शब्द में सहज सुन्दर कहा है। वह स्त्री तो हमने न देखी न कभी सुनी है। तुम लोग बिना सोचे समझह्य अपनी जीत कैसे कहते हो। स्त्री जाम्भोजी ने सहज सुन्दर वाणी के लिए कहा है। इस प्रकार के विवाद को समाप्त करने के लिए पुनः श्रीदेवजी ने शब्द सुनाया-
शब्द-18 ओ३म् जां कुछ 2 जां कछू न जांणी, ना कुछ 2 तां कुछ जांणी।
ना कुछ 2 अकथ कहाणी, ना कुछ 2 अमृत वांणी।
ज्ञानी सो तो ज्ञानी रोवत, पढ़िया रोवत गाहे।
केल करन्ता मोरी मोरा रोवत, जोय 2 पगां दिखाही।
उरध खेणी मन उनमन रोवत, मुरखा रोवत धाहीं।
मरणत माघ संघारत खेती, के के अवतारी रोवत राही।
जड़िया बूंटी जै जग जीवै, तो बेदा क्यूं मर जाही।
खोज पिरांणी ऐसा बिनाणी, नुगरा खोजत नाहीं।
जां कुछ होता ना कुछ होयसी, बल कुछ होयसी ताही।
ये लोग जानने का अहंकार करते हैं। उनका अहंकार करना व्यर्थ ही है। जो कुछ जानने का दम्भ भरता है, वह कुछ भी नहीं जानता। कितना क्या जानेगा? ज्ञान भण्डार अपार है। पार नहीं पाया जा सकता। तथा जो यह कहता है कि मैं कुछ भी नहीं जानता वह जानने के लिए प्रयत्नशील होगा, तो अवश्य ही कुछ जानेगा।
अपने को ज्ञानी, पढ़े-लिखे हुए योगी, भक्त, वैद्य, कृषक, गृहस्थ आदि कहते हैं। फिर भी उनका रोना तो मिटा ही नहीं है। तो फिर जीवन की कला विधि से परिचित नहीं हुए हैं। ऐसी दशा में अपने को सर्वज्ञ कहना तो अज्ञानता के सिवाय और कुछ भी नहीं है। नुगरा भाव छोड़कर सुगरा बनो, तभी कुछ जान सकोगे।
हे प्राणी! ऐसी दिव्य खोज करो, जिससे संसार सागर से पार उतर जाये। नुगरे लोग नहीं खोज सकते। जो कुछ होता था, अब वह नहीं हैं और अब जो नहीं है वह भी आगे हो जायेग। होना या न होना यह तो ईश्वर के ही अधीन है।
जाम्भाजी थे किता जगा रैमूं थौ कित थे थोउं नहीं।
पुनः पूछा- हे देवजी! आप कहाँ-कहाँ रहते हो और कहाँ नहीं रहते? आपसे मिलन कहाँ होगा? कहाँ नहीं होगा? यह हमें बतलाओ। ताकि हम आपको ढूँढ़ सकें? जम्भेश्वरजी ने शब्द सुनाया-
शब्द-19 ओ३म् रुप अरुप रमू पिण्डे ब्रह्मण्डे, घट घट अघट रहायो।
अनन्त जुगां मैं अमर भणीजूं, ना मेरे पिता न मायों।
ना मेरे माया न छाया, रूप न रेखा, बाहर भीतर अगम अलेखा।
लेखा एक निरंजन लेसी, जहाँ चीन्हों तहां पायो।
अड़सठ तीर्थ हिरदा भीतर, कोई कोई गुरु मुख बिरला न्हायों।
श्री योगेश्वरजी ने कहा-मैं रूपवान् अरूपवान, मैं रमण करता हूँ। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में तथा इस शरीर में भी। घट घट अघट में भी बाहर-भीतर सर्वत्र-निरंतर जहाँ भी स्मरण करोगे, वहीं मैं हाजिर हूँ।
अनन्त युगों में भी अमर कहा जाता हूँ। मेरे माता-पिता कोई नहीं है। मैं तो अजन्मा हूँ। न ही मेरे में यह माया एवं माया की छाया यह जगत ही है। मैं निराकार रूप से हूँ। शरीर का रूप भले ही कुछ भी हो, किन्तु मैं परमात्मा रूप से रह रहा हूँ। मेरे रूप-रेखा कुछ भी नहीं है। अड़सठ प्रकार के तीर्थ हृदय में विद्यमान हैं किन्तु उनमें स्नान कोई कोई गुरुमुखी बिरला ही करता है।
जाम्भाजी! अगत्य सुगति को विचार करो-
हे जम्भेश्वरजी! आप हमें संसार सागर से पार उतारने हेतु बात करो। हमारी दुर्गति किस प्रकार से हुई है तथा गति परमात्मा की प्राप्ति किस प्रकार से होगी? ऐसा साधन बतलाइये जिससे दुर्गति को पार कर सके। श्री जम्भेश्वरजी ने शब्द सुनाया-
शब्द-20 ओ३म् जां जां दया न मया, तां तां बिकरम कयां।
जां जां आव न बैसूं, तां तां सुरग न जैसूं।
जां जां जीव न जोती, तां ता मोख न मुक्ति।
जां जां दया न धर्मूं, तां तां बिकरम कर्मूं।
जां जां पाले न शीलूं, तां तां कर्म कुचीलूं।
जां जां खोज्या न मूलूं, तां तां प्रत्यक्ष थूलूं।
जां जां भेद्या न भेदूं, तो सुरगे किसी उमेदूं।
जां जां घमण्डे स घमण्डू, ताके ताव न छायों, सूते सास नसायों।
जिसके हृदय में दया नहीं है, वहाँ प्रेम भी नहीं होगा। जहाँ प्रेम नहीं होगा, वहाँ पापकर्म होगा। जहाँ पर आए हुए अतिथि को आओ जी बैठो पीओ पानी नहीं होगा, वहाँ स्वर्ग नहीं है। वहाँ कलह से घर भर जायेगा। जहाँ पर भी प्रत्येक शरीर धारी में परमात्मा की ज्योति के दर्शन नहीं होगा, वहाँ मुक्ति नहीं हो सकती। जिस व्यक्ति के अन्दर दयाभाव नहीं है, वहाँ धर्म नहीं होगा। जहाँ धर्म नहीं होगा, वहाँ पापकर्म होगा। जहाँ पाप भावना होगी, वहाँ शीलव्रत का पालन नहीं होगा। जहाँ शील नहीं होगी, वहाँ कुकर्म होगा। जहाँ कुकर्म होगा, वहाँ मूल की खोज कैसे होगी? जहाँ मूल विष्णु की उपासना नहीं होगी। वहाँ स्थूल में ही भटकना होगा। जहाँ स्थूल सांसारिक पदार्थों में ही रमण होगा।
वहाँ भेद-विवेक नहीं होगा। जहाँ विवेक नहीं होगा, वहाँ पर स्वर्ग की आशा करनी व्यर्थ है। जहाँ स्वर्ग सुख नहीं है, वहाँ संसार के पदार्थों से अहंकार ही होगा। अहंकार ईश्वर से दूर हटा देता है। न तो स्वयं के अहंकार से प्रकृति बदल सकता है। धूप-छाया ये सभी प्रकृति के ही रूप हैं। ऐसा न स्वीकार करके स्वयं को प्रकृति के ऊपर आरोपित करेगा तो सोये हुए के ही श्वांस निकल जायेंगे। इस प्रकार से जाट लोग धर्म ज्ञान और देवजी से परिचित हुए। उनकी महिमा को समझा और अपने परिवार सहित बिश्नोई पन्थ में सम्मिलित हुए। जगदीश को जान करके चालीस घरों के लोग बिश्नोई बने। जो पूनिया, सारण आदि गोत्र के थे।