तीसरा अध्याय · कथा 34
जीव का देह में प्रवेश तथा स्वरूप विज्ञान
वील्होजी उवाचः-हे गुरुदेव! जीव देह में प्रवेश होता है, तब जीव-शरीर का सम्बन्ध कब होता है? क्या प्रथम शरीर की उत्पति होती है? पश्चात् जीव का प्रवेश होता है। या प्रथम जीव की उपस्थिति होती है, पश्चात् शरीर की उत्पति एवं विकास होता है? इस सम्बन्ध में अनेकानेक मत मतान्तर हैं। श्रीदेवजी इस सम्बन्ध में क्या कहते थे? यदि आपको ज्ञात हो तो बतलाने का कष्ट करें। इस समय में आपसे बढ़कर और कोई श्रोता या वक्ता इस समय प्रत्यक्षदर्शी नहीं है।
नाथोजी उवाचः-हे शिष्य! श्रीदेवजी ने अपने जीवनकाल में अनेक शब्द कहे। उन शब्दों द्वारा एवं प्रसंगों से अनेक विषयों का विस्तृत ज्ञान होता है। जैसा तुमने यह प्रश्न पूछा है, वैसा प्रश्न एक समय महमंद खां नागौरी एवं शेख मनोहर ने भी पूछा था। श्री देवजी ने इस सम्बन्ध में जो शब्द सुनाया था, वह मैं तुम्हें बतलाता हूँ तथा उन्होंने जो वार्ता की, वह भी तुम्हें बतलाता हूँ। ध्यानपूर्वक श्रवण करो-
महमंद खांन कह पीरजी जीव किस दवार पठ है देवजी कह तुम्हार वेद कतब मो क्या है वेद कतेब मा नासिका की वाट पठ है देवजी कह इंड मां जीव पठा से किस विध पठा है सेख मनुवर कह हम पारसी बौहत पढ़े है हम कूं कुरान की बात कहो। जाम्भाजी श्रीवायक कह-
महमंद खां जाम्भोजी का शिष्य बन गया था। एक समय किसी कार्यवश महमंद शेख मनोहर के पास गया था। महमंद ने कहा हमारे तो गुरु पीर श्री जाम्भोजी हैं। हम तो उनकी ही बात मानते हैं। महमंद खां ने श्रीदेवजी द्वारा सुनाया हुआ शब्द भी सुनाया और कहा-
हे शेख! कोप करने की आवश्यकता नहीं है। आप धैर्य धारण करके मेरे साथ चलो। वहीं पर जाने से ही तुम्हारा क्रोध शान्त होगा। मैं भी तुम्हारी तरह कोप करके गया था, किन्तु वहाँ जाने से अहंकार से निवृत्त होकर ठण्डा हो गया था।
शेख ने चर्चा करने के लिए सम्भराथल पर चलने की ठान ली। समय पर महमंद को साथ लेकर सम्भराथल पर श्रीदेवजी के पास आया। शेख मनोहर देवजी से पूछने लगा-हे पीरजी! आप यह बतलाइये कि शरीर में जीव उत्पन्न होता है, इसका क्या विचार है। क्या प्रथम शरीर या जीव?
देवजी ने कहा-हे शेख! तुम्हें किताबों पर विश्वास है। तुमने कुरान पढ़ी है। वेद शास्त्र भी पढ़े होंगे। उनमें क्या लिखा है? शेख कहने लगा-कुरान-पुराण में तो यही लिखा है कि नासिका के दरवाजे से जीव शरीर में प्रवेश करता है। श्रीजी ने कहा-तो यह बतलाओ कि अण्डे के तो नासिक होती ही नहीं है। उसमें जीव कहाँ से प्रवेश करेगा? शेख कहने लगा-यह तो हमें मालूम नहीं है। आप ही बतलावें। ईश्वर की आज्ञा से ही जीव आता है और चला भी जाता है। इसके बारे में आप ही प्रमाण हैं।
श्रीदेवजी ने बतलाया-आप लोगों ने वेद कुरान शास्त्र पोथा पढ़े हैं, किन्तु पढ़-लिख कर भी खाली ही रह गये। केवल कथन करने से ही ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो जाती हे। प्रथम श्रवण-मनन, फिर निदिध्यासन पश्चात् दर्शन अनुभव होता है। आप लोग तो केवल श्रवण तक ही सीमित हो गये हैं। जीव किस दिशा से आता है और किस दिशा को चला जाता है? इस बात को माता-पिता नहीं जानते। प्रथम जीव फिर शरीर की उत्पत्ति होती है। बिना जीव के शरीर की वृद्धि कैसे हो सकेगी। बिना जीव के शरीर तो मुर्दा है। जीव रूप चेतनता होने से ही शरीर जीवित रहता है, विकास को प्राप्त होता है, शरीर के मध्य ही जीव रहता है, जीव से ही शरीर की उत्पति एवं विकास होता है। जिस प्रकार से कांसी के बर्तन में ध्वनि रहती है, बजाने से प्रगट हो जाती है, अन्यथा अन्दर छिपी रहती है। उसी प्रकार से शरीर के कण-कण में जीव विद्यमान है। कहीं- कहीं विशेष रूप से आवश्यकता पड़ने पर प्रकट होता है।
कभी वह जीव आँखों द्वारा देखता है। कानों द्वारा सुनता है। बुद्धि द्वारा विचार करता है। मन द्वारा संकल्प-विकल्प करता है। नासिका द्वारा सूंघता है। त्वचा द्वारा स्पर्श करता है। इस प्रकार से वह चेतन जीव प्रत्यक्ष होता है। एक क्षण में ही जीव शरीर में रहकर अनेक क्रियाएँ करता है। दूसरे क्षण में मन के साथ मिलकर बहिर्गमन कर जाता है। संकल्प विकल्पवान हो जाता है। यह सभी कुछ ज्ञान,ध्यान,नाद,वेद से जाना जाता है।
जो सत्य मार्ग का अन्वेषण कर लेता है। तत्त्व की प्राप्ति तो वही करता है। वैसे तो संसार में बड़े-बड़े दानी हुए हैं- कर्ण,दधीचि जैसे किन्तु उन्होंने भी उतना ही प्राप्त किया जितना दिया था। तत्त्वज्ञान तो इन सभी से ही विलक्षण है। व्यर्थ की बातों में न उलझकर तत्त्व ज्ञान की प्राप्ति करनी चाहिये। श्रीदेवजी ने अपने मुख से शब्द सुनाया-
शब्द-27 ओ३म् पढ कागल वेदूं शास्त्र शब्दूं, पढ़ सुन रहिया कछु न लहिया।
नुगरा उमग्या काठ पखाणे, कागल पोथा ना कुछ थोथा।
ना कुछ गाया गीऊं।
किण दिश आवै किण दिश जावे, माई लखे न पीऊं।
इंडे मध्ये पिंड उपन्ना, पिंडा मध्ये बिंब उपन्ना।
किण दिश पैठा जीऊं, इंडा मध्ये जीव उपन्ना।
सुणरे काजी सुणरे मुल्लां, पीर ऋ षीश्वर रेमसबासी।
तीरथ वासी, किण घट पैठा जीऊं।
कंसा शब्दे कंस लुकाई, बाहर गई न रीऊं।
क्षिण आवै क्षिण बाहर जावै, रुतकर बरसत सीऊं।
सोवन लंक मंदोदर काजै, जोय जोय भेद विभीषण दीयों।
तेल लीयो खल चोपै जोगी, तिहिं को मोल थोड़ेरो कीयो।
ज्ञाने ध्याने नादे वेदे जे नर लेणा, तत भी ताही लीयो।
करण दधीचि सिंवर बलराजा, हुई का फल लीयों।
तारा दे रोहितास हरिचन्द, काया दशबन्ध दीयों।
विष्णु अजंप्या जनम अकारथ, आके डोडा खीपे फ लीयो।
काफर बिवरजत रुहीयूं।
सेतूं भातूं बहुरंग लेणा, सब रंग लेणा रुहीयूं।
नाना रे बहुरंग न राचै, काली ऊंन कुजीऊं।
पाहे लाख मजीठी राता, मोल न जिहिं का रुहीयूं।
कब ही वो ग्रह ऊथरि आवै, शैतानी साथे लीयों।
ठोठ गुरु वृष ली पति नारी, जद बंकै जद बीरूं।
अमृत का फल एक मन रहिबा, मेवा मिष्ट सुभायों।
अशुद्ध पुरुष वृष ली पति नारी, बिन परचै पार गिराय न जाई।
देखत अन्धा सुणता बहरा, तासों कछु न बसाई।
शेख मनउवर पुछ पीरजी इस रोह का वरण कुण है जाम्भोजी श्री वायक कह-
शेख मनोहर एवं महमंद खां ने शब्द सुना और आनन्द को प्राप्त हुए तथा वहाँ से प्रणाम करके चल ते हुए आपस में वार्ता करने लगे कि जाम्भोजी तो स्वयं विष्णु के ही रूप हैं। उनकी बात सत्य है। हम लोग पूर्णतया संतुष्ट होकर आ गये।
किन्तु एक बात तो भूल ही गये। जम्भेश्वरजी से हमने जीव का रूप-रंग नहीं पूछा। यह जीव किस रंग का है, इसका रूप क्या है, अब तो बहुत दूर आ गये हैं। वापिस जाना तो लज्जा की बात है। यदि जाम्भोजी स्वयं अन्तर्यामी हैं, तो हमें वापिस बुला लेंगे। उनके पास आया हुआ तो कोई खाली हाथ लौटता ही नहीं है। हमारी तो यही मानसिक पीड़ा है। हमें दुःख देती रहेगी। अवश्य ही हमारा दुःख दूर करेंगे। अन्तर्यामी श्रीदेवजी ने अपने एक सेवक को भेजकर उन्हें वापिस बुलाया और उनकी शंका का समाधान करते हुए शब्द सुनाया-
शब्द-28 ओ३म् मच्छी मच्छ फि रै जल भीतर, तिहिं का माघ न जोयबा।
परम तन्त है ऐसा, आछै उरबार न ताछै पारूं।
ओवड़ छेवड़ कोई न थीयों, तिहिं का अन्त लहीबा कैसा।
ऐसा लो भल ऐसा लो, भल कहो न कहा गहीरूं।
परम तन्त कै रूप न रेखा, लीक न लेहूँ खोज न खेहूँ।
वर्ण बिबरजत, भावैं खोजो बांवन बीरूं।
मीन का पंथ मीन ही जाणे, नीर सुरंगम रहीयूं।
सिध का पंथ कोई साधु जाणत, बीजा बरतन बहियों।
जिस प्रकार से मछली मगरमच्छ जल में रहते हैं। उनका मार्ग वही जानते हैं। उसी प्रकार से ही अनुभव तो तभी होगा, जब साधना पथ में उतरोगे और साक्षात्कार भी तभी होगा जब आत्मा परमात्मा के बारे में जान सकोगे।
यह केवल शब्द का विषय नहीं है। शब्द के द्वारा जनाया नहीं जा सकता। वह परमतत्त्व तो ऐसा ही है। यह कैसे कहें? न तो उसकी कोई सीमा ही है, न ही कोई रूप वर्ण खोज छाया माया आदि कुछ भी नहीं है। उसे कैसे इन्द्रियों द्वारा अवगत किया जावे।
जिसने भी अनुभव किया है वही जान सका है। वह दूसरे को शब्द द्वारा नहीं दे सकता। सिद्ध का पंथ कोई साधु ही जानता है। अन्य लोग तो केवल देखा-देखी आचरण करते हैं। जल में तैरना सीखना है तो जल में डुबकी लगानी पड़ती है। उसके लिए गहरे जल में उतरना ही पड़ेगा। दूर बैठकर कोई तैरना नहीं सीखता। उसी प्रकार से परमतत्त्व की प्राप्ति हेतु तो, उसी में ही लीन होना होगा। इस प्रकार से शेख मनोहर गुरुदेव की शक्ति से परिचित हुआ। हृदय में सच्चाई का प्रादुर्भाव हुआ। श्रीदेवजी के चरणों में प्रणाम करके वहाँ से प्रस्थान किया।
नाथोजी उवाचः- एक समय की अद्भुत घटना मैं तुम्हें सुनाता हूँ। क्योंकि-तुमने तो मेरे से नहीं पूछा, किन्तु मैं तुम्हें बिना पूछे ही सुनाता हूँ। क्योंकि स्वयं श्री सिद्धेश्वरजी ने भी तो बिना कुछ जमात के पूछे ही स्वतः शब्द का उच्चारण किया था। इस शब्द को इलोल सागर के नाम से कहा जाता है। कभी-कभी बिना पूछे स्वतः ही किसी विशेष घटना की स्मृति हो जाये, तो उसे कहे बिना नहीं रहा जाता। अन्दर उमड़े हुए भावों को शब्दों द्वारा प्रकट कर दिया जाता है। अपार आनन्द की अनुभूति को अन्दर रोक करके नहीं रखा जाता। वैसे तो श्री जाम्भेश्वरजी बिना प्रयोजन नहीं बोलते थे। किन्तु इस शब्द के बारे में तो अपवाद ही कहा जायेगा। आनन्द की लहरें उमड़ पड़ीं और स्वतः ही इस प्रकार से बाहर निकल पड़ीं। इस शब्द द्वाराइलोल
सागर शब्द-29 ओ३म् गुरु के शब्द असंख्य प्रबोधी, खार समंद परीलो।
खार समंद पर परेरै, चौखंड खारूं, पहला अन्त न पारूं।
अनन्त कोड़ गुरु की दावण बिलम्बी,करणी साच तरीलो।
सांझे जमों सवेरे थापण, गुरु की नाथ डरीलो। शब्द इलोल सागर भगवीं टोपी थलशिर आयो, हेत मिलाण करीलो।
अम्बाराय बधाई बाजै, हृदय हरि सिंवरीलो। कृष्ण मया चौखण्ड कृषाणी, जम्बू दीप चरीलो।
जम्बू दीप ऐसो चर आयो, इसकन्दर चेतायो। मान्यो शील हकीकत जाग्यो, हक की रोजी धायों। ऊंनथ नाथ कुपह का पोहमा आण्या, पोह का धुर पहुँचायों। मोरै धरती ध्यान वनस्पति वासो, ओजू मंडल छायों।
गीदूं मेर पगांणै परबत, मनसा सोड़ तुलायो। ऐ जुग चार छतीसां और छतीसां, आश्रा बहे अंधारी। म्हें तो खड़ा विहायों। तेतीसां की बरग बहां म्हे, बारां काजे आयों। बारा थाप घणा न ठाहर, मतांतो डीले डीले कोड़ रचायों। म्हे ऊँचे मण्डल का रायों। समंद बिरोल्यो बासग नेतो, मेर मथांणी थायों। संसा अर्जुन र्मायो कारज सारयो, जद म्हे रहस दमामा वायों।
फेरी सीत लई जद लंका, तद म्हे ऊंथे थायों। दश सिर का दश मस्तक छेद्या, बाण भला निरतायों। म्हे खोजी थापण होजी नाही, लह लह खेलत डायो।
कंसा सुर सूं जूवै रमियां, सहजे नन्द हरायो। कूंत कुंवारी कर्ण समानो, तिहिं का पोह पोह पड़दा छायो। पाहे लाख मजीठी पाखो, बनफ ल राता पींझू पाणी के रंग धायो। तेपण चाखन चाख्या भाख न भाख्या, जोय 2 लियो, फल 2 केर रसायो। थे जोग न जोग्या भोग न भोग्या, न चीन्हों सुर रायों। कण बिन कुकस कांय पीसो, निश्चै सरी न कायों।
म्हें अबधू निरपख जोगी, सहज नगर का रायो। जो ज्यूं आवै सो त्यूं थरपा, साचा सूं सत भायो। मोरै मन ही मुद्रा तन ही कंथा, जोग मारग सहडायों। सात शायर म्हे कुरले कीयों, ना मैं पीया ना रह्या तिसायों। डाकण शाकण निंद्रा खुध्या, ये म्हारे तांबै कूप छिपायों। म्हारे मनही मुद्रा तनही कंथा, जोग मार्ग सहलीयों। डाकण शाकण निंद्रा खुध्या, ऐ मेरे मूल ना थीयों। इस शब्द को सुनकर के रणधीर आदि शिष्यों ने पूछा-हे देव! आप समुद्र पार कब गये थे? हमने तो आपको यहाँ सम्भराथल पर ही देखा है।
श्री जम्भेश्वरजी ने कहा-हे शिष्यो! मैं इस शरीर से तो आपके सामने यहाँ पर बैठा हूँ, किन्तु केवल मेरा यही शरीर ही नहीं है। मेरा असली शरद्धर तो शब्द है। मैं शब्द द्वारा अनेक देश-देशान्तरों में गया हूँ। मेरे शब्दों द्वारा असंख्य लोग प्रबोधित हुए हैं और अपने कर्त्तव्य कर्म का पालन किया है। मैं खारसमुद्र के पार भी गया हूँ तथा उससे भी आगे, जहाँ पर विचित्र लोग निवास करते हैं। वहाँ पर भी मैं शब्द शरीर द्वारा पहुँचा हूँ।
उनको भी यही ज्ञान, जो मैं तुमको सुना रहा हूँ, सुनाया था। सद्पन्थ का पथिक बनाया है। आप लोग इसमें किसी प्रकार का सन्देह न करें, क्योंकि शब्द व्यापक है। मैं भले ही यहाँ पर बैठा हूँ, किन्तु मेरा शब्द व्यापक होकर अन्य रूप से प्रह्लाद पंथी जीवों को उनकी ही भाषा में समझाता है। इसी शब्द द्वारा ही अनन्त करोड़ लोग धर्म के मार्ग पर आये हैं। गुरु वचनों को स्वीकार करके धार्मिक जीवन व्यतीत करने लगे हैं। इस समय में मैं तुम्हारे सामने भगवीं टोपी धारण करके सम्भराथल पर आया हूँ। मुझे आप किसी सीमा में न बाँधें। क्योंकि मैं तो अनेक रूपों में विचरण करता हूँ। जैसा जहाँ चाहता हूँ, वैसा रूप धारण कर लेता हूँ। अभी कुछ दिन पूर्व ही मैंने सिकन्दर को चेताया था। तब मेरा रूप भिन्न ही था। बड़े बड़े दुष्ट प्रकृति के मोहग्रस्त लोगों को मैंने सन्मार्ग पर चलाया है।
मुझे अनेकानेक रूप बनाने में कुछ भी परेशानी नहीं है क्योंकि प्रकृति को अपने वश में करके अपनी माया द्वारा मैं विस्तार को प्राप्त हो जाता हूँ। यह धरती, पवन, जल,तेज, आकाश, पाँच तत्त्व तो मेरे ही अधीन हैं। मैं इनका प्रयोग विशेष कार्य हेतु कर लेता हूँ।
मैं सभी कुछ करता हुआ भी अकर्ता बना रहता हूँ। मैं सभी कर्म करते हुए भी कर्मफल में लिपायमान नहीं होता। इसलिए कर्मों का भोग सुख-दुःख मुझे छू नहीं सकते। मैं सदा ही सुख दुःख से ऊपर उठकर आनन्द की अनुभूति में रहता हूँ। मेरे देखते हुए छत्तीस युग व्यतीत हो गये हैं। दुनियाँ सभी सो जाती है, मैं तो कभी सोता नहीं हूँ। क्योंकि मुझे भूख, प्यास, निद्रा आदि सताते नहीं हैं।
मैं यहाँ 33 करोड़ प्रह्लाद के जीवों का उद्धार करने के लिए आया हूँ। इस समय तो केवल 12 करोड़ ही यहाँ मरुदेश में तथा खारसमुद्र से पार जहाँ कहीं भी होंगे, उनका उद्धार करूँगा। जब यह कार्य पूर्ण हो जायेगा तो फिर यहाँ एक क्षण भी नहीं ठहरूँगा। उन्हीं जीवों की खोज मुझे करनी है।
मैंने ही तो समुद्र मंथन करवाया था। मेरु पर्वत की मथाणी और वासुकी नाग की रस्सी बनायी थी। मैंने ही तो सहस्राबाहू को मारा था। उस समय मैं परशुराम के रूप में था। मैंने ही तो रावण को मारा था। उस समय मैं राम के रूप में था। मैंने ही तो कंस को मारा था, उस समय मैं कृष्ण के रूप में था। मैंने ही नन्दजी को पिता बनाया था। उन्हें स्नेह दिया और तोड़ने वाला भी मैं ही था।
मैं तो अवधू निरपेक्ष योगी हूँ। सहज में ही योग समाधि में विचरण करने वाला हूँ। इस समय मेरे पास जो जिस भावना से आता है, मैं उसे उसी भाषा में समझाता हूँ। जो सच्चे लोग हैं, वे मुझे बहुत ही प्रिय हैं। ये बाह्य परिस्थितियाँ मुझे नहीं सताती। भूख-प्यास आदि डाकणी शाकणी आदि तो मेरे मूल में नहीं हैं। इस प्रकार से शब्द श्रवण करने के पश्चात् आश्चर्यचकित रणधीरजी ने पूछा-
हे गुरुदेव! आपने तो सम्पूर्ण सृष्टि को तथा सृष्टि के जीवों, उनकी जातियों को, रीति-रिवाजों को देखा है। कृपा करके उन लोगों का दर्शन करवाइये। वे भी हमारे ही गुरुभाई एवं नियमों का पालन करने वाले हैं। इस प्रकार से रणधीर के कहने पर श्रीदेवजी बोले-
हे रणधीर! तुम्हें मैं वे लोग एवं देश दिखाऊँगा, जहाँ पर मैंने शब्द रूप शरीर से उन्हें उपदेशित किया है। जम्भेश्वरजी ने रणधीर को अपने साथ लिया और वहाँ से कुछ दूरी पर ले गये। रणधीर के ज्योतिरूपी जीव को स्वयं श्रीदेवजी ने अपनी विशाल ज्योत में लिया और कहा- रणधीर! अब तू दिव्य नेत्रों से देख। तुम्हारा अल्पज्ञ जीव इस लोक के प्राणियों को नहीं देख सकता। मैं तुम्हें ईश्वरीय दिव्य सर्वज्ञ नेत्र देता हूँ। ऐसा कहते हुए रणधीरजी को अनेक लोग एवं विचित्र वेशभूषा दिखलायी।
हे वील्हा! श्री रणधीरजी ने वापिस आकर हमारे सामने जाह्य वर्णन किया है, वह मैं तुम्हें बतलाता हूँ। रणधीरजी ने कहा-हे लोगो! आप मेरी बात सुनकर आश्चर्य चकित अवश्य ही होंगे, किन्तु अश्रद्धा अविश्वास न करें। मैंने दिव्य आँखों से देखा है। एक ही सूर्य सम्पूर्ण सृष्टि को प्रकाशित करता है। उसी प्रकार से एक ही ब्रह्म विष्णु जगत का पालन पोषणकर्त्ता एवं सृजनकर्त्ता भी है। इसलिए असंभव कुछ भी नहीं है। वह विष्णु ही गुरु रूप में यहाँ सम्भराथल पर विद्यमान है।
श्रीदेवजी ने मुझे प्रथम दक्षिण दिशा में रहने वाले लोग जो सात समुद्रों के पार कहीं थे, उनको दिखलाया। वहाँ मैंने बहुत से गुरुभाई देखे। वहाँ पर मैंने यही धर्म और यही मार्ग देखा है। वे लोग श्रीदेवजी को देखकर उत्साह मनाने लगे थे। उनकी प्रसन्नता का कोई पार नहीं था। वहाँ से आगे जब हम बढ़े, तब वहाँ पर बड़े-बड़े कानों के लोग मुझे दिखाई दिये। छजले-सूप सदृश बड़े, बड़े कानों के लोग थे। वे बहुत ही सुन्दर थे।
वहाँ से आगे तब मैंने देखा वहाँ के बिश्नोई एकटक दृष्टि से श्रीदेवजी को देख रहे थे। मानो, उनकी तो श्रीदेवजी को देखकर समाधि ही लग गयी थी। ऐसे एकाग्रचित्त वाले बिश्नोई मैंने वहाँ देखे थे। वहाँ से आगे चले, तब समुद्र आ गया। मैं भगवान् की अपार कृपा से समुद्र में नहीं डूबा। वैसे ही पार हो गया जैसे कि धरती पर चलता हूँ।
वहाँ के लोगों के मैंने देखा कि तीखे नाक-मुँह के सुन्दर लोग थे। वे देखने में तपस्वी मालूम पड़ते थे। वे बड़े ही सौम्य मूर्ति थे। ऐसे लोग तो मैं यहाँ देख नहीं रहा हूँ। जिस प्रकार हम लोग यहाँ सम्भराथल पर बैठकर हवन करते हैं। इसी प्रकार से वहाँ पर भी लोग सभी मिल बैठकर हवन करते हैं। श्री गुरुदेव को देखकर अति प्रसन्न हुए। सभी ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया, अपने को धन्यभागी माना।
दक्षिण दिशा को देखकर हम लोग पश्चिम दिशा की तरफ गये। वहाँ पर बिश्नोई भाई आपस में मिलते हैं, तो एक दूसरे को नमन प्रणाम करते हैं। वहाँ पर मैंने देखा कि एक कहता है कि सुन मुन दूसरा जवाब देता हुआ कहता है घट घट रह उनमुन। वहाँ पश्चिम में मैंने देखा है कि कौए तो सफेद रंग के थे। किन्तु बुगले काले रंग के थे। वहाँ तो मैंने यहाँ से उल्टा ही देखा है। उस देश में हमारे गुरु भाई बहुत ही रहते हैं। वहाँ पर मैंने देखा कि रूंँख वृक्ष आपस में वार्तालाप कर रहे हैं। उनकी आपस की बात को तो मैं समझ नहीं सका किन्तु वे अपनी भाषा में कुछ बोलते अवश्य ही थे।
वहाँ से आगे बढ़े, तब हमने एक समुन्द्र को पार किया। वहाँ पर तो आचर्य मैंने देखा था। वे लोग जंगल में ही रहते थे। उनके पास ओढ़ने-पहनने हेतु कोई वस्त्र नहीं थे। वे लोग मृगछाला ही पहनते थे। वही ओढ़ते थे। रात्रि में सोते समय उन लोगों ने फूलों की शैय्या बिछा रखी थी। भगवान् विष्णु शेष शैय्या पर सोते हैं। तो ये लोग भी फूलों की शैय्या पर शयन करते हैं। किन्तु उनका धर्म नियम व्यवहार तो अपने जैसा ही था। वे लोग काफी सभ्य मालूम पड़ते थे।
वहाँ से आगे बढ़ने पर एक देश मे, वहाँ पर सभी भक्तजन अल्पाहार करते हैं। वहाँ से आगे पहुँचे तो मैंने देखा कि सूर्य की किरणों से रसाह्यई पकती है। उनके पास कुछ ऐसी ही युक्ति थी, जिससे अपना भोजन सूर्य से पकाते थे। वहाँ से आगे बढ़े, तब मैंने देखा कि पश्चिम में अभिवादन प्रणाली दक्षिण से कुछ भिन्न ही थी। वहाँ के लोग आपस में मिलते हैं तो एक कहता है तत्व केते दूसरा जवाब देता है अचल एक ही सलाघे। इस प्रकार से उनकी प्रणाम करने की शैली श्रवण करके हम लोग उत्तर की तरफ चले आये।
उत्तर दिशा में बिश्नोई बहुत विराजमान रहते हैं। हमारे जैसा ही उनका व्यवहार, विवाह, उत्सव आदि रीति-रिवाज मैंने देखा। बिना वृषभ के ही यहाँ गऊवें ब्याह जाती है, एक बार गऊ दूध देना प्रारम्भ कर देती है तो लगातार देती रहती है। गो वंश की अभिवृद्धि लगातार चलती रहती है। वे गऊवें जलपान ज्यादा करती हैं। सूखा घास कम खाती हैं। जल से भरा हुआ हरा घास चरती हैं। दूध अधिक मात्रा में देती हैं। वहाँ के बिश्नोई दूध दही घी आदि खाते हैं। जिससे बहुत ही ताकतवर है। शरीर भी उनका हृष्ट-पुष्ट है। मन भी शुद्ध पवित्र है। जैसा खावे अन्न वैसो होवे मन। जैसो पीवे पाणी, वैसी बोले बाणी। ऐसा ही नियम है।
वहाँ अन्य कोई राजा नहीं है। घर-घर में ही राजा है। स्वयं ही अपने आप पर संयम रखते हैं। दूसरे शासक की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। दूसरों को कर नहीं देते। वहाँ पर गायें जल में स्नान करती हैं, बाहर घास चरती हैं। प्रातःकाल स्नान करके बाहर निकलती हैं, तो वे लोग गायें दुहने के लिए अपने मटके लेकर पहुँच जाते हैं और दूध भरके ले आते हैं। अपनी इच्छानुसार खीर बनाते हैं और खाते हैं।
वहाँ उत्तर दिशा में बड़े-बड़े कोठे चावलों से भरे रहते हैं। मानो वह देश तो चावलों की खान ही है। जितना चाहे उतना उस देश में उपजता है। वे चावल खाने-पकाने में बड़े ही सुविधाजनक है। थोड़ा सा भिगोया कि गल जाते हैं। तब गर्म-गर्म खा लेते हैं। यदि ठंडा हो जाये तो सूखकर पत्थर जेसे हो जाते हैं।
वहाँ से लौटकर वापिस आते समय मुझे श्रीदेवजी ने दूसरा लोक दिखाया, जिसमें मैंने कद में बहुत ही लम्बे आदमी देखे। वह देश ही लम्बे आदमियों का लम्बक लम्बा था। वे लोग भी विष्णु का भजन कर रहे थे। इन्हीं उनतीस नियमों का पालन करते थे।
वहाँ से आगे श्रीदेवजी बढ़े तब मैंने जमल देश में गुरुभाई देखे। उस देश में चारों तरफ पर्वत दिखाई दे रहे थे। वहाँ पर चंदन, कु मकु म केसर की खेती होती है। वहाँ के चन्दन की सुगन्ध बहुत दूर तक जाती है। उस सुगन्ध के प्रभाव से अन्य वृक्ष भी सुगन्धित चन्दन की तरह हो जाते हैं।
वहाँ का धर्म भी भिन्न नहीं था। सभी बाल-वृद्ध, युवा प्रातः सांय संध्या हवन करते हैं। बिना स्नान संध्या हवन किये वे लोग भोजन भी नहीं करते हैं। इसी धर्म से ये लोग बैकुण्ठ को पहुँच जाते हैं। वहाँ के लोग आपस में मिलते हैं तो अभिवादन करते हुए कहते हैं डबाक डरू जवाब मिलता है डबक डरू अघ हरूं।
वहाँ से आगे प्रभुजी मेरे को पूरब ले गये वहाँ पर मैंने एक आश्चर्य देखा- वहाँ से आगे समुद्र से पार ले जाकर श्रीदेव ने मुझे अपनी सृष्टि का खेल दिखलाया। वहाँ पर बारहों महीना वृक्षों पर फल फूल रहते हैं। उन मधुर फलों का उपयोग सभी बिश्नोई करते हैं। उन वृक्षों में भी कोई कोई वृक्ष ऐसा भी मैंने देखा कि वह वृक्ष उगते ही तुरंत फल देना आरम्भ कर देता है। ऐसे वृक्षों में अमृत की धारा प्रवाहित होती है। जो उसे प्राप्त करले वह अजर अमर हो जाता है। ऐसे फल वहाँ बिश्नोई प्राप्त करते हैं।
उससे आगे समुद्र को लांघकर के पार पहुँच गये। वहाँ पर भी मैंने देखा कि लोगों में आपसी प्रेमभाव समता है। दोनों आँखों में कोई भेदभाव नहीं देखता है। सभी अपनी संतान को एक ही भाव से देखते हैं उसी प्रकार से सभी लोगों में एकता, दृढ़ता, प्रेमभाव मैंने वहाँ देखा। त्रिकुट में ज्योति का दर्शन करते हैं और आनन्द-मंगल होकर शून्य में विचरण करते हैं। ऐसे बिश्नोई वहाँ रहते हैं। हे लोगो! अधिक क्या कहूँ? वहाँ के लोग बहुत ही अच्छे एवं प्रिय थे। सभी लोग गुरुदेव के बताए हुए नियमों का पालन करते हुए विष्णु महामंत्र का जाप कर रहे थे। उन लोगो में आपस में वाद-विवाद, विरोध, काम-क्रोध, लोभ, ईर्ष्या आदि विकार नहीं थे। वे लोग ज्ञानवान, वैराग्यवान, भक्तिमान थे।
पूर्व में नमन करने का तरीका भी भिन्न था। एक कहता जन जदा दूसरा कहता यह नमन उस कायम दायम पैदा करदा उस हाजिर हजूर उत्पति स्थिति संघार करता को इस प्रकार से नमन करते हैं।
जम्भगुरुजी ने उन्हें उपदेश दिया था, वही वे लोग पालन करते थे। इन चारों दिशाओं में मैंने जो देखा व सुना वह मैंने आप लोगों को बतलाया। अन्य देश भी मैंने अनेक देखा किन्तु मुझे जो स्मरण हुआ था वही मैंने आप लोगों को बतलाया है। जहाँ पर भी हम गये है, वहीं पर जमाती के लोगों से भेंटवार्ता हुई थी।
इस प्रकार से रणधीरजी ने जमात को अद्भुत ज्ञान सुनाया। जैसा रणधीरजी ने देखा वैसा वर्णन किया। हे वील्हा! मैंने भी ये बातें उनसे सुनकर तुम्हें सुनायी हैं। परम पिता परमात्मा अपनी इच्छा से अनेक रूप :पाय विष्णवे प्रभ विष्णवे।
श्रीदेवजी ने रणधीर को पुरोहित की उपाधि से विभूषित किया और इस पन्थ को आगे बढ़ाने का कार्यभार सौंपा। रणधीर श्रीदेवजी की आज्ञा शिरोधार्य करके अपने कर्त्तव्य कर्म में संलग्न हुए।
बात- एक समइये देवजी जमाती देखी खुशी हुवा, खवां चमकण लागा, देवजी भाय आया, साथरिया यौं कहण लागा, देवजी कह-सुरगां की पोल को कीवाड़, पचास मण को थ, जदि ष्सिनोई कहै देवजी उघड़ क्यां करि थ, देवजी कह एक शबदि उघड़, जमात कह देवजी किसो सबद, कीसी करणी, झाभोजी कह- असतरी पुरुष दोन्यो एक मत कीया, सुध लीलंग मत। आठ प्रकार करे धरम, नुव चाल, अजर जर, ताह का हाथ आघुकीय, सबद बोल्य स वा कीवाड़ उघड़। सबद कूंची को।
नाथोजी उवाचः- एक समय श्रीदेवजी प्रसन्न होकर के जमात को देखने लगे-जब कभी भी प्रसन्न होते तो शरीर में रोमांचित हो जाते थे। ऐसा ही जमात के लोगों ने तथा मैंने देखा था। उस समय जो वार्तालाप हुआ, वही मैं तुम्हें बतलाता हूँ।
सुनो! श्रीदेवजी स्वयं ही साथरियों से कहने लगे-मैं तुम्हें स्वर्ग के बारे में बतलाता हूँ। वहाँ पर जाने का अधिकार तो सभी का ही है। किन्तु स्वर्ग के प्रवेश का द्वार (किवाड़) पचास लाख मन का है। तुम लोग कैसे खोल पाओगे, दरवाजा खुले बिना अन्दर प्रवेश असम्भव है।
साथरियों ने पूछा-हे देवजी! आप ही कृपा करके बतलाओ कि इतना भारी किवाड़ खुलेगा कैसे? हम लोग तो इतने ताकतवर नहीं हैं। जो उस किवाड़ को खोल सकेंँ
देवजी ने बतलाया-किवाड़ खोलने का उपाय मैं तुम्हें बतलाऊँगा। आप ध्यानपूर्वक सुनो-देवजी ने कहा-प्रथम उपाय तो शब्द ही है।
जमात ने पुनः पूछा-कौनसा शब्द? कैसे शब्द से उघड़ेगा? कौन से कर्त्तव्य कर्म करने से उघड़ेगा? जाम्भोजी ने यह कूंचीवाला शब्द सुनाया तथा कुछ कर्तव्य कर्म भी बतलाया। जिससे किवाड़ उघड़ेगा। स्त्रीस्वर्ग खोलने की कूंची पुरुष दोनों का मत एक हो, तभी स्वर्ग किवाड़ उघड़ेगा। क्योंकि गृहस्थ की गाड़ी दो पहियों पर चलती है। एक के बिना दूसरा व्यर्थ हो जायेगा। गृहस्थ का व्यवहार शुद्ध पवित्र होगा तो इहलोक घर ही स्वर्ग बन जायेगा। यह घर यदि बिगड़ गया तो परलोक भी बिगड़ जायेगा। इसलिए आपसी प्रेमभाव होगा वही घर स्वर्ग है।
शुद्धता, पवित्रता, आचार-विचार, उच्चकोटि का होना, एक ईश्वर की भक्ति, विश्वास ये सभी स्वर्गद्वार खुलने के उपाय हैं। यदि ऐसा नहीं होगा, तो भटक जायेंगे। आठ प्रकार के धर्म का पालन करे। आठ प्रकार का धर्म- योग के अष्टांग ही है जैसे- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इन आठ प्रकार के नियमों को उनतीस नियमों के अन्तर्गत समाहित हो जाना है। इनका पालन करना ही आठ प्रकार के धर्म पालन करना है।
नम्रता का व्यवहार रखें। जरणा एवं सहनशीलता अपनाएँ तो उसके हाथ से स्वर्ग का दरवाजा खुल सकेगा अथवा अन्त समय में कूंचीवाला शब्द का उच्चारण करने से भी स्वर्ग के किवाड़ उघड़ जाते हैं। इस प्रकार से जमात के लोगों को सचेत करते हुए यह कूंचीवाला शब्द सुनाया-
कुंचीवाला शब्द-30 ओ३म् आयो हंकारो जीवड़ो बुलायो, कह जीवड़ा के करण कमायो।
थरहर कंपै जीवड़ो डोलै, उत माई पीव कोई न बोले।
सुकरत साथ सगाई चालै, स्वामी पवणा पाणी नवण करंतो।
चंदे सूरे शीस निवन्तो, विष्णु सूरां पोह पूछ लहन्तो।
इहिं खोटे जनमन्तर स्वामी, अहनिश तेरो नाम जपंतो।
निगम कमाई मांगी मांग, सुरपति साथ सूरासूं रंग।
सुरपति साथ सुरां सूं मेलो, निज पोह खोज ध्याईये।
भोम भली कृषाण भी भला, बूठो है जहाँ बाहिये।
करषण करो सनेही खेती, तिसिया साख निपाईये।
लुणचुण लीयो मुरातब कियो, कण काजै खड़ गाहिये।
कणतुस झेड़ो होय नवेड़ो,गुरुमुख पवण उड़ाईये।
पवण डोलै तुस उडैला, कण ले अर्थ लगाईये।।
यूं क्यूं भलो जे आप न फरिये, अवरां अफ र फ राइये।
यूं क्यूं भलो जे आप न डरिये, अवरां अडर डराइये।
यूं क्यूं भलो जे आप न जरिये, अवरां अजर जराइये।
यूं क्यूं भलो जे आप न मरिये, अवरा मारण धाइये।
पहले किरिया आप कमाइये, तो औरा न फ रमाइये।
जो कुछ कीजै मरणै पहलै, मत भल कहि मर जाइये।
शौच स्नान करो क्यूं नाही, जिवड़ा काजै न्हाइये।
शौच स्नान कियो जिन नाहीं, होय भंतूला बहाइये।
शील बिबरजित जीव दुहेलो, यमपुरी ये सताइये।
रतन काया मुख सूवर बरगो, अबखल झंखे पाइये।
सवामण सोनो करणह्य पाखो, किण पर वाह चलाइये।
एक गऊ ग्वाला ऋषि मांगी, करण पखो किण सुरह सुबच्छ दुहाइये।
करण पखो किन कंचन दीन्हों, राजा कवन कहाइये।
रिण ऋ ध्ये स्वामी करण पाखो, कुण हीरा डसन पुलाइये।
किंहिं निश धर्म हुवै धुर पुरो, सुर की सभा समाइये।
जे नविये नवणी, खविये खवणी, जरिये जरणी, करिये करणी।
तो सीख हुयां घर जाइये।
अहनिश धर्म हुवै धुर पूरो, सुर की सभा समाइये।
किंहि गुण बिदरो पार पहूँतो,करणै फेर बसाइये।
मन मुख दान जु दीन्हों करणै, आवागवण जु आइये।
गुरु मुख दान जु दीन्हों बिदरै, सुर की सभा समाइये।
निज पोह पाखो पार असीपुर, जाणी गीत बिवाहे गाइये।
भरमी भूला बाद विवाद, आचार विचार न जाणत स्वाद।
कीरत के रंग राता मुरखा मन हठ मरै, ते पार गिराये कित उतरे।
इस प्रकार से कूंचीवाला शब्द श्रीदेवजी ने जमात के प्रति सुनाया और सचेत करते हुए कहा- आयो हंकारो अर्थात मृत्यु आ गयी। जीव को बुलावा आ गया। अहंकार ही मृत्यु है। जहाँ कहीं भी किसी भी अवस्था में अहंकार पुष्ट हुआ, तो जानो कि स्वयं शुद्ध आत्मा जो सद्चित आनन्दरूप है, उसकी मृत्यु हो गयी। वह अहंकार की काली बादली से ढ़क जाती है।
अहंकार जीव और ईश्वर, आत्मा एवं परमात्मा को मिलने नहीं देता। यही सबसे बड़ी मृत्यु है, जो स्वयं के आनन्द स्वरूप से मिलन नहीं हो पाता। संसार के दुःख एवं दुःखों के कारणों से जूझता है। कहीं कोई ज्ञान की किरण दिखाई नहीं देती। ऐसी दशा में स्वर्ग सुख की कल्पना करना ही व्यर्थ होगी जब अहंकार रूपी मृत्यु का साम्राज्य होगा।
जीव इहलोक में जीता तो है किन्तु कंपायमान होकर जीता है। आगे भी कर्मों का हिसाब-किताब, लेखा-जोखा सामने उपस्थिति होगा तो थर-थर काँपेगा। वहाँ पर कोई भी सहायक नहीं होगा। न वहाँ मातापिता-भाई-बन्धु ही साथ देंगे। ये तो यहीं पर छूट जायेंगे। दुःख तो व्यक्ति अकेला ही भोगेगा। अन्य कोई साथ नहीं है। सुकर्म किया हुआ साथ जावेगा।
पूर्व जन्म के सुकर्म के कारण ही यह देह मिली है। इहलोक में भी सुकर्म ही सुख देता है। पापकर्म दुःख का हेतु बन जाता है। अहंकार से निवृत्त हाह्यक र, अपने से भी बड़ा कोई ओर है उन साक्षात् देवता, स्वामी, सूर्य, चन्द्र, पवन, अग्नि आदि को प्रणाम करना चाहिये था, किन्तु अपने सामने अन्य को तुच्छ ही समझा। दिन-रात विष्णु का जप करता, तो स्वर्गद्वार खुला ही था।
यह जीवन कृषक जीवन है। इसे सचेत होकर जीये तो फल मधुर प्राप्त होगा अन्यथा आलसी किसान की भांति बीज ही खो बैठेंगे। आते समय तो बीज लेकर आया था, किन्तु जाते समय वह भी खोकर जायेगा। इसमें क्या भलाई है? जो स्वयं तो फल प्राप्ति पर्यन्त कर्म करता नहीं है। दूसरों को कहता है। स्वयं तो ईश्वर से डरता नहीं है। अन्य दूसरों को डराता है। नर्क का भय दिखाता है।
स्वयं तो काम, क्राह्यध, लोभ, मोह आदि को समाप्त करता नहीं है। दूसरों को कहता है। यह तो उसका कहना व्यर्थ ही है। स्वयं तो मरता नहीं है, किन्तु दूसरों को मारने के लिए तैयार हो जाता है। सर्वप्रथम कर्म स्वयं करे तो फिर दूसरों से कहे यही कहना लाभदायक होगा। शौच स्नान आदि शुद्धता पवित्रता ही धर्म का मूल है। यहीं से चूक कर दी तो वह भूत-प्रेतादि अशुद्ध दुःखदायी योनियों में जन्म लेगा। शील को त्याग दिया है, तो वह यमपुरी में सताया जायेगा। उन्हें स्वर्ग दुर्लभ है। कर्ण ने स्वर्ण का दान दिया किन्तु मनमुखी होकर दिया, तो उस दान का फल भी जन्म-मरण के बन्धन से छुटकारा नहीं दिला सका। दान से भी आत्मा महान् है। इसलिए आत्मधर्म का पालन करना था। गुरुमुखी होकर विदुर ने दान दिया, वे देवताओं की सभा में शोभायमान हुए। इसलिए कोई भी कार्य गुरुमुखी होकर ही करे, वही फलदायी है। यदि आपको देवता की सभा में विराजमान होकर शोभायमान होना है, तो इस संसार में जीवन की विधि समझे। स्वर्ग सुख के मूल आधार है कि आप नमन भाव से जीयें। क्षमा करते हुए जीयें। जरणा रखते हुए जीयें। कर्त्तव्य कर्म करते हुए जीयें। यही अन्तिम सीख है। इसी शिक्षा को स्वीकार करते हुए वापिस अपने घर को जाओ। इस संसार के घरबार असली नहीं हैं। असली घर तो आगे है, जहाँ से आप आये हैं। वहीं पर जाने की पुनः कोशिश चल रही है। वहाँ जाने के बाद वापिस जन्म-मरण के चक्कर में न आना पड़े।
अपना पन्थ अपना धर्म खोजिये। वही आपको वापिस पहुँचाने में समर्थ है। अन्य पंथ अन्य धर्म आपको नहीं पहुंँचा पायेगा। इसलिए स्वधर्म ही श्रेयष्कर है। परधर्म भय पैदा करने वाला है।
यदि स्वयं सुख चाहते हैं, तो स्वकीय कीर्ति से परहेज करें। मैं ही बड़ा हूँ। मेरा ही नाम हो। यही अहंकार की पुष्टि करता है। अहंकार की पुष्टि ही मृत्यु है। इसलिए मृत्यु से त्राण पाने के लिए नम्रता, शीलता, समर्पण भाव, एक विष्णु की शरणागति, शुद्धता, पवित्रता आदि गुणों को समाविष्ट करें। अवगुणों का परित्याग करें। तभी पचास लाख मन का किवाड़ हाथ लगते ही खुल जायेगा।
जमात्य कह देवजी, दीन्हा धर्म, लीया पाप। देवजी कह उतम नै दीन्हो असो सु खेत मां मेह बूठो, मन मान्यो नीपनु, म धरम न दीनु असो मेह बूठो कलर मां बीज गुमायो मद मासी भंगी, पोसती, न दीनु उलटो कर्म लागो- जाम्भोजी श्री वायक कह-
शब्द-31 ओ३म् भल मूल सींचो रे प्राणी, ज्यूं का भल बुद्धि पावै।
जामण मरण भव काल जु चूकै, तो आवगवण न आवै।
भल मूल सींचो रे प्राणी, ज्यूं तरवर मेलत डालूं।
हरि परि हरि की आण न मानी, झंख्या झूल्या आलूं।
मूल की सिंचाई देवा सेवां टेव न जांणी, न बंच्या जम कालूं।
भूलै प्राणी विष्णु न जंप्यो, मूल न खोज्यो, फिर 2 जोया डालूं।
बिन रैणायर हीरे नीरे नग न सीपे, तके न खोला नालूं।
चलन चलंतै, वास बसतैं, जीव जींवतै सास फुरंतैं।
काया निवंती, कांयरे प्राणी विष्णु न घाती भालूं।
घड़ी घटंतर पहर पटंतर रात दिनंतर, मास पखंतर, क्षिण ओल्हरबा कालूं।
मीठा झूठा मोह बिटम्बण, मकर समाया जालूं।
कबही को बांइदो बाजत लोई, घड़िया मस्तक तालूं।
जीवां जूंणी पड़े परासा, ज्यूं झींवर मच्छी मच्छा जालूं।
पहले जीवड़ो चेत्यो नाहीं, अब ऊंडी पड़ी पहारूं।
जीवर पिंड बिछोड़ो होयसी, ता दिन थाक रहे सिरमारूं।
नाथोजी उवाचः- कथाक्रम को आगे बढ़ाते हुए नाथोजी ने अपने प्रिय शिष्य वील्होजी से कहा-हे शिष्य! एक समय जमात के लोग एकत्रित हुए थे। उन्होंने पूछा-हे देवजी! देने से धर्म होता है और दूसरे से लेने में पाप होता है, ऐसा हमने सुना है। क्या सत्य है?
देवजी ने कहा- केवल लेन-देन से ही पाप-पुण्य नहीं होता है। किन्तु उत्तम अधिकारी को देने से ही पुण्य होता है। जिस प्रकार से अच्छे उपजाऊ खेत में वर्षा होने पर बीज बोने से निपजता है। बीज फलीभूत होता है। फूलता-फलता है। अनन्त गुणा वृद्धि को प्राप्त होता है।
पापी जन कुपात्र जैसे मद्यपान करने वाला, भांग पीने वाला, तम्बाकू खाने-पीने वाला, अफीम खाने वाला, ये सभी कुपात्र हैं। इन्हें देने का कुछ भी शुभ फल नहीं है। उल्टा पाप का भागी बनता हैं। जिस प्रकार से वर्षा होने पर भी ऊसर भूमि में बोया हुआ बीज व्यर्थ में ही चला जाता है। इसी प्रकार से दानी का दान भी व्यर्थ में ही चला जाता है।
श्री देवजी ने इसी सम्बन्ध में शब्द सुनाया जिस का भाव इस प्रकार से है- हे प्राणी! भले मूल की सिंचाई करो, जिससे भली बुद्धि की प्राप्ति होगी। अर्थात् जो कुछ भी देना है वह चाहे विद्या, धन, अन्न,जमीन इत्यादि सभी कुछ सुपात्र को दी हुई फलीभूत होती है। जिस प्रकार से अच्छे मधुर फलदायी वृक्ष में सिंचाई करने पर वह मधुरता से फलीभूत होता है। मधुर फल प्रदान करता है। उसी प्रकार देना भी सुपात्र को ही चाहिये।
जन्म-मरण, संसार के बन्धन से छूटने हेतु त्याग आवश्यक है। तेन त्यकक्तेन भुंजिथः त्याग से उपभोग करो। तउवा त्याग जो ब्रह्मा त्यागा अवर भी त्यागत त्यागूं। निर्लेप भाव से सेवा करेंगे, तो जन्म मरण से छूट जायेंगे। ज्ञान की प्राप्ति होगी। ज्ञान से बढ़कर अन्य संसार में कुछ भी पवित्र नहीं है।
अच्छे मूल में जल डालने से डाल पत्ते फल-फूल सभी जल प्राप्त कर लेते हैं। उसी प्रकार से एक विष्णु की सेवा-पूजा भजन करने से सभी देवता स्वतः ही संतुष्ट हो जाते हैं, क्योंकि सभी का मूल विष्णु है। हरि विष्णु की मर्यादा छोड़कर सांसारिक आल-बाल कुछ भी बोलता तथा करता रहा, तो यमदूतों से बच नहीं सकेगा।
हे भूले प्राणी! विष्णु सभी का मूल है। उसी का जप कर। वह विष्णु ही सम्पूर्ण सृष्टि का मूल है। अन्य देवता तो डाल पत्ते सदृश विष्णु के आधार पर टिके हुए हैं। बिना समुद्र के हीरा नहीं मिलता। सीपी बिना नग की प्राप्ति अन्य नदी नालों में सम्भव नहीं है।
इसलिए हे प्राणी! चलते हुए, बैठै हुए, रहते हुए, जीवन जीते हुए, श्वास लेते हुए, काया से कार्य करते हुए, यह सभी कुछ कार्य व्यवहार करते हुए तुमने विष्णु से सम्बन्ध नहीं जोड़ा। ये सभी क्रियाएँ तो विष्णु की शक्ति से ही हो रही हैं।
काल कब आ जाये, कुछ पता नहीं है। किसी भी घड़ी में, किसी भी प्रहर में, किसी भी दिन-रात में, किसी भी महीने में, किसी भी पक्ष में, यह मृत्यु आ सकती है। कुछ भी समय निश्चित नहीं है कि वह काल कब आयेगा?
कोई दिन ऐसा आयेगा, ऐसी वायु चलेगी कि तुम्हें यहाँ से जाना होगा। तुम्हें बंधन में डालकर ले जायेंगे जैसे झींवर मछली को जाल में फंसा कर ले जाता है। तुम्हें अनेकानेक छोटी-मोटी जीव योनि में डाल दिया जायेगा। पहले तो यह जीव सचेत हुआ नहीं। अब तो मनुष्य शरीर से बहुत ही दूर चला गया है। जब तुम्हारे इस जीव एवं शरीर का बिछोहा होगा, तब सिर पीट-पीटकर रोयेगा। कुछ भी उपाय नहीं होगा।