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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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दूसरा अध्याय · कथा 5

दूसरा अध्याय (भूमिका)

वील्हा उवाचः हे गुरुदेव! मेरा अहो भाग्य है जो संसार सागर में भटका हुआ आपके श्री चरणों में आ गया। आपने मुझे उस पवित्र पंथ का पथिक बनाया। मैंने यह जाना है कि यह पंथ नया नहीं है, इस पंथ के पथिक तो तेतीस करोड़ रहे हैं। अधिक क्या कहूँ? इस पंथ को सतयुग में प्रह्लाद ने प्रारम्भ किया था। त्रेता में इस पंथ को हरिश्चन्द्र ने पवित्र किया तथा द्वापर में तो श्रीकृष्ण के परमप्रिय भक्त युधिष्ठिर ने सत्यधर्म से इस पंथ को आगे बढ़ाया।

इस समय मेरा सौभाग्य है कि मैं इस पंथ का पंथिक बना। कलयुग में श्री गुरु जाम्भोजी महाराज ने यह पंथ प्रकट किया। अन्य संत महापुरुषों को पता ही नहीं था। क्योंकि बहुत समय व्यतीत हो जाने पर किसी पंथ (मार्ग) में घास, पत्थर, काँटे आदि आ जाते हैं। यह पंथ अन्य वस्तुओं से ढ़क जाता है। कैसे पता चले कि यहाँ से यह मार्ग बैकुण्ठधाम को जाता है। कलयुग में तो सर्वप्रथम जाम्भोजी ने ही इस पंथ को उजागर किया है। यह बात निश्चित ही है।

आप कृपा करके यह बतलाएँ कि यह पंथ जाम्भोजी ने किस प्रकार से प्रगट किया? सत,त्रेता,द्वापर युग में तो स्वयं भगवान् ने दुष्टों का विनाश किया। किन्तु अबकी बार तो जाम्भोजी ने किसी को मारा नहीं। किन्तु बिना मारे कैसे तारा?

जाम्भोजी के जन्म,कर्म तथा दिव्य चमत्कारों के बारे में विस्तार से जानना चाहता हूँ? उनकी दिव्य लीलाएँ जो उन्होंने मूढ़ लोगों को सचेत करने के लिए की है, उनके बारे में मैं आपके श्रीमुख से सुनना चाहता हूँ। हे गुरुदेव! मैंने आपसे जो कुछ भी पूछा है या नहीं भी पूछा है, किन्तु आप उचित्त समझते हैं, तो बतलाने की कृपा कीजिये। आपने अति निकटता से श्रीदेव को देखा है तथा कानों से शब्द श्रवण किया है। उनके बारे में विस्तार से बतलाइये। आपके सिवाय और कोई भी इस समय नहीं दिखता, जो प्रमाणिकता से बता सके।

यदि ऐसा कोई ग्रन्थ लिखित रूप से विद्यमान हो तो मुझे पढ़ाने की कृपा करें? अन्यथा आप तो स्वयं शास्त्र रूप ही हो। आपके मुखारविन्द से जो कुछ भी निकलता है, वह मेरे लिए ब्रह्मवाक्य ही है। मैं आप से जो भी श्रवण करूँगा उसे अतिशीघ्र ही लिपिबद्ध कर दूँगा। इस समय तो शब्द विद्या आपके कण्ठस्थ है किन्तु भविष्य में ऐसा होना असम्भव है। जम्भेश्वरजी की दिव्य वाणी तथा उनके जीवन चरित्र को मैं आपकी कृपा से छन्दोबद्ध करने की चेष्टा करूँगा। इस पवित्र पंथ को आगे बढ़ाऊँगा, जिससे जन-जन का कल्याण हो।

जाम्भोजी के अवतार होने में क्या कारण होगा? क्योंकि बिना कारण के तो कार्य नहीं होता। स्वयं भगवान् विष्णु नाना प्रकार से शरीर धारण करके, कोई कर्म विशेष करके अपनी लीला समेट लेते हैं। इस बार भी विष्णु अवतार के कुछ कार्य विशेष हैं, तो बतलाने की कृपा करें। शास्त्रों में नव अवतार ही प्रसिद्ध हैं। दसवाँ अवतार तो कल्कि होगा, परंतु जाम्भोजी तो विष्णु के अवतार थे, इस अवतार का प्रयोजन क्या था?

नाथाजी उवाचः हे जिज्ञासु! तुमने बहुत सी बातें पूछी हैं। ये सभी बातें आत्मा-परमात्मा से सम्बन्ध रखती हैं। मैं तुम्हें क्रमशः सभी बातें विस्तार से बतलाऊँगा। अधिकारी शिष्य मिलजाने पर गुरु कुछ भी छिपाकर नहीं रखते।