नवां अध्याय · कथा 63
नौरंगी को भात भरना
नाथोजी उवाचः- हे वील्ह! एक समय सम्भराथल पर श्रीदेवजी विराजमान थे। उनको रोमांचित हुआ देखकर हम लोगों ने पूछा -हे देवजी! आज किस जीव के भाग खुले हैं? सदा ही आनन्द में रहने वाले श्रीदेवजी ने बतलाया-रोटू गाँव में एक भक्तिमती उमा नाम की बेटी रहती है। वह भादू गोत्र की है और झोदकणा गोत्र में उसका विवाह हुआ है। उसकी दो कन्याएँ हैं। वे बड़ी हुई। विवाह लायक हुई तो उन्होंने उनका विवाह करने की तैयारी कर ली है। इस समय वह उमा अपने पीहर गयी है। वहाँ पर अपने पिता, चाचा, ताउ, भाइयों को विवाह में आने का निमंत्रण देने गयी है। उमा बत्तीसी लेकर विधि विधान से निमंत्रण देने पहुँची है। किन्तु उनके कटुम्बी भादू जनों ने निमंत्रण-बत्तीसी लेने से इनकार कर दिया है।
उन्होंने कहा कि-तू तो हमें क्या समझती है? जाम्भोजी की भक्त बनी है। वो ही तुम्हारा भात भरेंगे। वहाँ जाम्भोजी के पास निमंत्रण देने क्यों नहीं गयी? यहाँ पर ही क्यों आ गयी? हमारे पास पहले तो कभी नहीं आयी थी। अब गरज पड़ी तो कैसे आ गयी? जिसकी तू चेली बनी है, वही तुम्हारा भात भी भरेंगे। इस प्रकार से व्यंग्य वचन कहे। अपने प्रिय भ्राता, माता-पिता, बन्धुओं से ऐसे अप्रिय वचन सुनकर वह बेचारी वापिस आ गयी। अब तो उसे मेरे सिवाय अन्य कोई भाई बन्धु आदि दिखाई नहीं दे रहे हैं। जो विवाह में सम्मिलित हो सके और भात भर सके।
इतना ही नहीं उमा जल लेने कुएँ पर गयी थी। वहाँ पर भी अन्य महिला,ज उमा से कहने लगी-हे उमा! क्या अपने भाइयों को निमंत्रण दे आयी? वे तो अवश्य ही बहुत सारा भात भरेंगे। तुम्हारा विवाह का खर्चा सभी पूरा हो जायेगा। उसमें तो बच भी जायेगा। तीसरी सखी ने कहा-हे उमा! जल्दी जल लेकर घर पहुँचो, भात लेकर तुम्हारे भाई आ गये होंगे। उनका स्वागत कौन करेगा? चौथी सखी बोली-इसके चाचा, बाबा, भाई आदि तो अवश्य ही होंगे, या नहीं? इसका कोई सगा भाई होगा तो अवश्य ही भात भरेगा।
उमा कहने लगी- हे सखियो! यदि मेरे कोई भात भरने वाला हो तो आप लोग इस प्रकार की व्यंग्य वाणी- मौसा नहीं मारती। ये टेढ़ी बातें नहीं करती। तुम्हें मालूम है कि मेरे भाइयों-कुटुम्बियों ने भात भरना स्वीकार नहीं किया है। आप लोग इस प्रकार से जले पर नमक न छिड़को। मेरे माता-पिता, भाई-बन्धु, गुरु- स्वामी सभी कुछ जाम्भोजी ही हैं। मैंने तो उनकी ही शरण ग्रहण कर ली है। अब तो मेरी लज्जा उनके ही हाथ में है। इस प्रकार से विलाप करती हुई उमा जल का घड़ा लेकर लौट आयी। अपने कार्य में संलग्न हो गयी। वे अन्तर्यामी मेरी लाज रखेंगे।
श्री जाम्भोजी ने साथरियों से कहा-हे भक्तो! अतिशीघ्र ही रोटू चलना है। तैयारी करो। उमा की बेटियों का विवाह तो परसों ही है। कल ही हमें रोटू पहुँचना होगा।
रणधीरजी ने पूछा- हे देव! आपके पास उमा का निमंत्रण पत्र आया है क्या? श्री देवजी ने कहा- उमा के हृदय की करुणा की पुकार मैं सुन रहा हूँ। यह निमंत्रण सर्वोत्तम है। बाह्य चिट्ठी तो लोक व्यवहार की भाषा है। मैं प्रेम की भाषा जानता हूँ। तुम लोग स्थूल भाषा का अर्थ समझते हो। हे रणधीर! यह समय शंका समाधान का नहीं है। प्रातःकाल ही अपने साथरियों को लेकर चलो। सायंकाल में रोटू पहुँचना है। वहाँ पर राजा लोग भी उपस्थित होंगे। मैंने उनको निमंत्रण भेज दिया है। जिस बेटी ने मुझे ही सर्वस्व मान लिया है, शरणागत प्राप्त हो गयी है, तो उसकी लज्जा अपने ही हाथो में है। उमा को ऐसा दिव्य भात भरना है, जो अब तक किसी ने भी नहीं भरा है।
हे वील्ह! नौरंगी की बेटियों का विवाह अक्षयतृतीया-आखातीज को था। दूज की शाम को रोटू गाँव की सीमा में अनेकों तम्बू तन गये और राजा लोग अपने अपने सैनिक उमराओं के साथ रोटू गाँव में पहुँच चुके थे। गाँव के लोगों ने अपने ही खेतों में तम्बू तने हुए देखे तो आश्चर्यचकित हुए और कहने लगे-
यह क्या हो रहा है? क्या कोई राजा की सेना दूसरे राज्य पर श्चढ़ाई करने जा रही है। इतने में ही एक व्यक्ति आया। कहने लगा-साथरी पर गुरु जाम्भोजी आ चुके हैं। उमा ने सुना कि स्वयं त्रिलोकीनाथ मेरी प्रार्थना सुनकर आये हैं। मैं धन्य हो गयी। मेरा जीवन सफल हो गया। अब मुझे किसी बात की चिंता नहीं है। अक्षय तृतीया के अवसर पर श्री जाम्भोजी उमा का भात भरने के लिए अनेक भक्तों के साथ रोटू गाँव के बीच में पहुँचे। रथ से नीचे उतरने लगे, तभी उनके एक पैर की एडी पत्थर पर टिकी थी। वहीं पत्थर पर चरण चिह्न अंकित हो गया था।
चौकी बिछाकर भात भरने के लिए श्रीदेवजी उच्च आसन पर विराजमान हुए। अन्य लोग भी यथास्थान विराजमान हुए उमादेवी थाल में तिलक आदि का सामान सजाकर उपस्थित हुई। सर्वप्रथम श्रीदेवजी की आरती उतारी। श्रीदेवजी ने उमा को उपहार में नौरंगी चीर ओढ़ाया। तभी से ही उमा का नाम नौरंगी पड़ गया। यह विचित्र नौ रंगों से रंगा हुआ ओढ़ना था। न तो किसी ने अब तक देखा था और न किसी मानव द्वारा निर्मित था।
देवजी के साथ अन्य लोग भी उमा के लिए भाई बन्धु बनकर आये थे। उनको भी तिलक देकर विजयी होने की कामना उमा बहन ने की। सभी ने अपनी अपनी योग्यतानुसार भेंट प्रदान की। उमा का थाल भर गया था एवं सभी भण्डार भी भर गये थे।
श्रीदेवजी भात भरने को आये हैं। आज तो जो कुछ भी किसी को चाहिये, वही मिलेगा। सम्पूर्ण गाँव के लोगों को यथा योग्यतानुसार रुपये हीरे, वस्त्रादिक से भण्डार भर दिये। श्रीदेवजी ने कहा-यहाँ हमारे दरबार में आया हुआ कोई खाली नहीं जायेगा। जो कुछ, जितना जिसको चाहिये, उतना दिया जायेगा। श्रीदेवजी के हाथों से प्रसाद लेकर रोटू गाँव के छोटे-बड़े, वृद्ध, स्त्री-पुरुष सभी आनन्दित हुए
साथ में आए हुए जोधपुर नरेश राव मालदेव ने कहा- हे देव! आप सम्पूर्ण सम्पत्ति इस गाँव के लोगों को लुटा रहे हैं। हम भी तो आपके साथ हैं। इन गाँव वासियों ने सेवा चाकरी अच्छी की है। यह सभी आपकी ही कृपा का फल है। हमारे पास तम्बू ज्यादा नहीं हैं। हमारे सैनिक, हाथी, घोड़े आदि धूप में हैं। उनके लिए यहाँ छाया कुछ भी नहीं है। यहाँ इस गाँव की सीमा में एक भी वृक्ष नहीं है। छाया के अभाव में सभी बेहाल हैं। कुछ उपाय बतलाइये।
श्रीदेवजी ने जिस प्रकार से वस्त्र आकाश मार्ग से उतारे थे, उसी प्रकार से सभी के देखते देखते खेजड़ी के तीन हजार सात सौ पेड़ गोलोक से मंगवायह्य। जहाँ-जहाँ पर वृक्षों का अभाव था, वहीं-वहीं पर रोप दी। सामान्य खेजड़ी को तो बड़ी होने में समय लगता है, किन्तु वे बढ़ी हुई तैयार, गहरी छाया वाली, गो लोक की तुलसी ही थीं। लोगों ने देखा कि एक ही रात्रि में रोटू की सीमा में बाग लग गया। हर्ष की लहर फैल गयी।
रोटू गाँव के कुछ लोग श्री जाम्भोजी के पास आये और कहने लगे- हे महाराज! आपने खेजड़ियों का तो बाग लगा दिया किन्तु हमारे लिए एक भारी समस्या पैदा कर दी है। प्रथम तो इन खेजड़ियों के नीचे बाजरा, मोठ तिल आदि अनाज ही नहीं जम पावेगा, क्योंकि बड़े पेड़ के नीचे छोटा पेड़ ही नहीं पनप सकेगा और यदि अनाज भी हो गया तो चिड़ियाँ इन पेड़ों पर बैठैंगी। हमारा अनाज तो ये खा ही जायेंगी। हमारा परिश्रम तो व्यर्थ ही चला जायेगा। हमें भूखा मरना पड़ेगा। यह तो अपने हमारी समझ में अच्छा नहीं किया।
जाम्भोजी ने समझाते हुए कहा-आप लोग चिंता न करो। इन खेजड़ियों के नीचे अन्य जगह से कहीं अधिक ही पैदा होगा। ये खेजड़ियाँ तुम्हारे अन्न के लिए खाद पैदा करेंगी। इनके पत्ते झड़ेंगे। पशु-पक्षी इनके नीचे ऊपर विश्राम करेंगे, उनकी बींट की खाद बनेगी। ये वृक्ष भूमि में नमी बनाये रखेंगे। स्वयं तो ऊपर का जल ग्रहण नहीं करेंगे, तुम्हारी फ सलें जो ग्रहण करती हैं, नीचे पाताल का जल इनकी जड़ें खींचेंगी और भूमि को जलयुक्त बनाये रखेंगी। ये वृक्ष तुम्हारे लिये वर्षा लायेंगे। यह हरा-भरा बाग बादलों को खींच कर ले आयेगा। वर्षा करवा देगा। जिससे तुम्हारे अकाल कभी नहीं पड़ेगा। सदा खुशहाली हरियाली बने रहेगी। इसलिए इन परोपकारी स्वर्ग से आये हुए वृक्षों को काटना नहीं।
आप लोग यह कहते हैं कि चिड़ियाँ खेत चुग जायेंगी। यह भी आपका कहना ठीक नहीं है। श्रीदेवजी ने कहा-मैं चिड़ियों को कह देता हूँ। ये तुम्हारे खेत का अनाज नहीं खायेगी। रात्रि विश्राम तुम्हारे इन पेड़ों पर करेंगी, किन्तु दाना चुगने अन्यत्र तुम्हारी सीमा से बाहर जायेंगी। जब तक तुम लोग अपने नियमों का पालन करते रहोगे, तब तक ये चिड़ियाँ भी अपने नियम पर अडिग रहेंगी।
नाथोजी उवाचः-हे वील्ह! इस प्रकार से चिड़ियों को श्रीदेवजी ने आदेश दिया। उन अज्ञानी चिड़ियों ने उनके आदेश को माना है। वे तो श्रीदेवजी की मर्यादा का उल्लंघन नहीं कर रही हैं, किन्तु मानव को देखो। वह शास्त्र मर्यादा का उल्लंघन करने जा रहा है। मैं तुझे कहाँ तक कहूँ? जाम्भोजी के शिष्य बिश्नोई भी नियमों में ढ़ील दे रहे हैं।
हे वील्ह! हम तुम पढ़ लिखकर विद्वान् हो गये हैं। जाम्भोजी की कृपा तुम्हारे पर असीम है। मैं तुम्हारे अन्दर वह अपार शक्ति को देख रहा हूँ। जिसके द्वारा तुम इस पंथ के रक्षक के रूप में उभर सकते हो।
मैंने तुझे अबाध गति से जाम्भोजी की लीला सुनाई है। अग आगे कुछ विशेष लीला मैं तुम्हें सुनाऊँ गा। रोटू गाँव के लोगों एवं नौरंगी को प्रसन्न करके श्री देवजी वापिस अपने शिष्यों के साथ सम्भराथल लौट आये। राजा प्रजा लोग वापिस पुण्य कार्य करके चले गये। नौरंगी ने भगवान् का स्मरण अनन्य भाव से किया था जिसका फल श्रीदेवजी ने योगक्षेम के रूप में दिया था। अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति योग कहा जाता है और प्राप्त की रक्षा करना क्षेम कहा जाता है।