तीसरा अध्याय · कथा 18
पूल्हाजी को स्वर्ग दिखाना
विल्होजी उवाच-हे गुरु देव! गोरखयति को अपना गुरु भाव स्वीकार करने तथा उनसे भगवीं टोपी ग्रहण करने के पश्चात् जम्भेश्वरजी ने पंथ स्थापना हेतु क्या-क्या उपाय किये। किस प्रकार से उनके परिवार के सदस्यों ने अपना समर्थन दिया। क्योकि वे तो लोहट जी पंवार कुल में जन्म लेकर भगवां वस्त्र पहन कर साधु वेश में रहने लगे थे। यह सभद्ध कुछ उनके कुल परिवार के लोगो को तो असह्य ही होगा। अन्य भी भगवान् की विचित्र लीला आपके दृष्टि गोचर होती हो तो अवश्य ही बतलाने की कृपा करें। भगवान् की लीला तो जितनी श्रवण की जाये उतनी ही कम है।
नाथोजी उवाच-हे शिष्य वील्हा! जब जम्भेश्वरजी अपने पिता द्वारा अर्जित की हुई धन सम्पति को त्यागकर के सम्भराथल पर ही स्थाई रूप से निवास करने लग गये थे। वहीं पर ही योग ध्यान द्वारा समाधिस्थ रहने लग गये थे। उस समय उनके पास आने वाले अधिक नहीं थे एक दूसरे से चर्चा सुनते और परिचय करते तो केवल इतना ही कि आज-कल लोहट जी का पुत्र जाम्भोजी पीपासर छोड़कर सम्भराथल पर ही रहने लगे हैं। विवाह तो उन्होंने किया ही नहीं है । अब तो साधु बन गये हैं। न जाने वहाँ पर ही क्या करते रहते हैं, गाँव में तो कभी आते ही नहीं हैं। कोई ग्वाल बाल पाल चराने वाले यदा कदा उनके पास चले भी आते थे, उनसे प्रेम भाव भी रखते थे। किन्तु उनकी गति तो बड़ी विचित्र है समझ में आती नहीं है। एक दिन लोहटजी के छोटे भ्राता लाडनूं निवासी पूल्होजी पींपासर आये। उन्होंने बड़े भाई एवं भाभी के बारे में जानकारी ली तो मालुम हुआ कि वे तो स्वर्ग सिधार गये। अपने भाई के वियोग में दो आँसू बहाये । उनको सम्मति मिले ऐसी ईश्वर से प्रार्थना की। पूल्होजी ने पूछा-लोहट का यशस्वी बेटा मेरा भतीजा जम्भेश्वर कहाँ है? गाँव के लोगों ने बतलाया महाराज! जम्भेश्वर तो आज कल सम्भराथल पर रहने लग गयें हैं। पींपासर आना जाना छोड़ दिया है। पहले तो हमारे दीनानाथ लोहटजी एवं हाँसा देवी हमें छोड़ कर स्वर्ग सिधार गये। हमने धैर्य धारण किया था कि चलो कोई बात नहीं उनका पुत्र हमें सुख प्रदान करेगा किन्तु वो भी हमें निराधार छोड़कर जंगल में ही रहने लग गये हैं और भगवां वस्त्र धारण कर लिया है। अब वो हमारे अकेले ही देवता नहीं रहे, उन्होंने तो अपना जीवन सार्वजनिक कर लिया है। अब तो वे सभी के हैं, सभी उनके हैं। बीच में मोह माया का जाल था वह तोड़ दिया। इसलिये तो उनकी गायें, धन-दोलत, जमीन जायदाद आदि सभी कुछ सार्वजनिक हो गई है। अब तो उसमें हमारा सभी का हक बराबर है। यह देखो पूल्होजी! यह सारा धन जाम्भाणा हो गया है। इनके पशुओं के जाम्भाणा चिन्ह लगा दिया है। उनकी जमीन गोचर भूमि हो गई है। उनका घर धर्मशाला बन गया है और जो कुछ भी था वह सभी कुछ सभी के लिए है। पूल्होजी कहने लगे- हे पीपासर वासियों! यह कैसे हो सकता है? यह तो हमारे कुल के मर्यादा की बात है हमारे कुल में जन्मा व्यक्ति साधु होकर भिक्षा मांगे यह कैसे हो सकता है? इस प्रकार से तो हमारी कुल परम्परा ही समाप्त हो पूल्हाजी को रुवर्ग दिखाना जायेगी। मेरे बड़े भाई साहब के स्वर्गवासी हो जाने पर ही ऐसा हुआ है यदि वे आज जीवित होते तो ऐसी नौबत नहीं आती।
मैं आज ही जाता हूँँ और अपने कुल दीपक को समझा बूझा कर ले आता हूँँ और संसार के कार्य में प्रवृत कर देता हूँ। ऐसा कहते हुए पूल्होजी जम्भेश्वर के पास सम्भराथल पर पहुँचे। वहाँ जाकर “जय अम्बा शक्ति” कहते हुए वहाँ पर बैठ गये।
मैं आपका सम्बन्धी तुम्हारा चाचा तुम से कुछ बात पूछने आया हूँ। मेरी तरफ थोड़ा ध्यान दो, आपका भेद जानना चाहता हूँ आप कौन पुरुष है? यहाँ पर क्यों बैठे हैं? किसलिए आपका संसार में आना हुआ है? आखिर आपका यहाँ पर बैठने का प्रयोजन क्या है?
आपने इस अवस्था में भगवां वस्त्र धारण कर लिया है। यह अवस्था सन्यास की नहीं है? इस समय तो तुम्हें 3ृहस्थ धर्म का पालन करना चाहिए। यदि आप में कुछ सिद्धि या देवता के गुण है तो प्रगट रूप से दिखाइये। जिससे मैं तथा मेरे अन्य साथी आपको पहचान सके। यदि आप मुझे कोई विचित्र परचा-चमत्कार दिखाओगे तो में साक्षी बन जाऊँगा, लोगो को हकिकत बताऊँगा आपका कार्य सुलभ हो जाएगा। मैं वैसे तो आपसे बड़ा भी हूँ किन्तु कुछ अद्भुत प्रचा प्राप्त करने के लिये आपके पास आया हूँ इसलिए मैं आपके चरणों में प्रणाम करता हूँ ।
जम्भेश्वरजी ने कहा-हे चाचाजी! सावधान हो जाओ! विचार करो, सतगुरु के वचन सत्य होते हैं । मैंने सतयुग में भक्त प्रह्लाद को वचन दिया था कि मैं स्वयं तुम्हारे मित्र अनुयायियों को जो तेतीस करोड़ है उनका उद्धार करूँगा। पाँच करोड़ तो सतयुग में ही प्रहलाद के साथ पार उतार दिये, जन्म मरण के चक्कर से छुड़ा दिये। सात करोड़ , त्रेता युग में हरिश्चन्द्र के साथ तथा नौ करोड़ द्वापुर युग में राजा युधिष्ठिर के साथ स्वर्ग में पहुँचा दिये। अब कलयुग में बारह करोड़ के लिए आया हूँ , उन्हे भी स्वर्ग में पहुँचाउँगा। ये वचन मेरे दिये हुए है उन्हे पूरा करने के लिए मैं आया हुआ हूँ।
इस समय मैं धर्म रूपी विमान लेकर आया हूँ इस विमान पर मैं प्रह्लाद पंथी जीवों को बैठाकर ले जाऊँगा। इक्कीस करोड़ पूर्व से बचे हुए है बारह करोड़ का उनसे मिलन हो जाएगा तो आनन्द होगा। जभी हमारा कार्य पूर्ण होगा, तभी मैं यहाँ से प्रस्थान कर जाऊँगा, एक क्षण भी नहीं ठहरूंगा ।
वैसे तो मैं अलख निरंजन निराकार ब्रह्य हूँ किन्तु जब मैं भी एक से अनेक होने की इच्छा होती है तो “ एकाकी न रमते ” अकेले से खेल नहीं खेले जाते तो एक से अनेक हो जाते हैं। एक से अनेक होने के लिए मैं स्वयं माया पति अपनी माया को वश में करके ब्रह्या, विष्णु, महेश के रूप में हो जाता हूँ। क्योंकि सृष्टि के उत्पति कर्ता ब्रह्या, पालन कर्ता विष्णु , और संहार कर्ता महेश हो जाता हूँ। वही विष्णु पालन-पोषण कर्ता होने से जब भी प्रक्रति में विकृति-उलट-पलट अत्याचार-अन्याय होने लग जाते है तो मैं ही राम-कृष्ण आदि नौ अवतारों के रूप में आता हूँ इस समय भी मैं वही विष्णु इस उपरोक्त कार्य हेतु आया हूँ।
पूल्होजी उवाच-हे जम्भेश्वर! आपकी बात ठीक तो मैं जभी मानूँगा जब आप मुझे इस शरीर से स्वर्ग दिखा दे अन्यथा केवल कथन मात्र से मैं हमारे ये लोग भले ही प्रहलाद पंथी ही क्यों न हो , एक भी आपकी बात मानने को तैयार नहीं होंगे।
जाम्भोजी उवाच-मैं आपको स्वर्ग तो इस शरीर से अवश्य दिखाता किन्तु स्वर्ग का कुछ आकर्षण ही ऐसा है कि एक बार वहाँ पहुँच जाने पर फिर वहीं का हो जाता है, वापिस आने का नाम ही नहीं लेता है। यदि आप भी वहीं का ही होकर रह गये तो फिर यहाँ आकर कौन कहेगा कि स्वर्ग भी सत्य है, जम्भेश्वर के वचन भी सत्य है। हे चाचाजी! मेरी समस्या तो ज्यों की त्यों बनी रहेगी। वैसे नियम है कि अनधिकारी को स्वर्ग नहीं दिखाना चाहिये।
अब से पूर्व तो राजा हरिश्चन्द्र के पिता त्रिशंकु ने भी आपकी तरह ही स्वर्ग देखने की जिद की थी अपनी परंपरा के गुरु वशिष्ठ को छोड़ कर गुरु विश्वामित्र को अपना गुरु बना लिया था। जिस वजह से त्रिशंकु विश्वामित्र के प्रयत्न से न तो स्वर्ग में जा सका और न ही वापिस धरती पर आ सका बीच में ही लटक गया। वही दशा कहीं चाचाजी तुम्हारी न हो जाय। जो निज स्व धर्म को छोड़कर परधर्म की तरफ देखता है उनकी यही गति होती है। केवल एक धर्मराज युधिष्ठिर को छोड़कर अब तक कोई भी इस पंचभौतिक शरीर से स्वर्ग में नहीं गया है क्योंकि युधिष्ठिर तो पूर्ण धर्मात्मा थे धर्म के पालक थे। उसी तरह आप भी सत्य धर्म के प्रति प्रतिष्ठित हो जाओगे तो अवश्य ही स्वर्ग पहुँच जाओगे। अन्यथा अनाधिकार चेष्ठा करोगे तो बीच में ही लटक जाओगे।
पूल्होजी उवाच-जैसा आप कहते हो वैसा ही होगा। मैं द्यत्य शपथ खाकर कहता हूँ कि मैं आपके कथनानुसार ही चलूँगा। मैं वहाँ पर सदा के लिए रहने के लिए आपसे प्रार्थना नहीं कर रहा हूँ। केवल देखने की बात है। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि स्वर्ग देखकर वापिस लौट आऊँगा। यदि सच्चा शिष्य गुरु को मिल जाये तो गुरु शिष्य पर विश्वास कर लेता है ।
जम्भेश्वरजी ने कहा-अच्छा तो तुम अपना हाथ मुझे दो और अपनी आँखें बंद कर लो। मैं तुम्हें स्वर्ग में ले चलता हूँ।
दोहा मनस्या सास विवाण करि, सतगुरु पुल्ह बइठ ।
कीसन चीलत पुंहता सुरग, अजब अचम्भो दीठ । ।
सद्गुरु जाम्भोजी ने मनसा स्वकीय इच्छा से ही श्वासों का विमान बनाया और श्वास के विमान पर पूल्होजी को बिठाया। हमारा श्वांस और हमारा मन-संकल्प-विकल्प इनका गहरा सम्बन्ध है। यदि श्वास की गति का निरोध करते है तो चंचल मन स्वतः ही शांत हो जाता है, तो श्वांसो की गति स्वतः ही धीमी पड़ जाती है। एक दूसरे का गहरा सम्बन्ध है, खिंचाव है।
जब पूल्होजी से संकल्प करवाया कि मैं तुम्हे स्वर्ग दिखाता हूँ, तब उनकी श्वांस की गति रोकने के लिए कहा-जब श्वांस की गति रुक गई एक क्षण के लिए तब चंचल मन शांत होकर आत्मा में लीन हो गया, वहाँ आत्मस्थ मन आत्मा के ही सत्चित् आनन्द रूप का अनुभव करने लगा। यही समाधि की अवस्था है।
जम्भेश्वरजी ने उन्हें कुछ क्षणों के लिये समाधि में स्थित कर दिया था, क्योंकि जब मन समाधि में उतारा था, तो स्वर्ग देखने का संकल्प लेकर उतरा था इसलिए स्वर्ग को देख रहा था। स्वर्ग की जैसी कल्पना थी। वह वहाँ पर स्थिर मन से देख रही थी। स्वर्ग की कल्पना तो अपने अपने स्वभाव के अनुसार ही होती है। सभी का स्वर्ग सुख भिन्न-भिन्न ही होगा क्योंकि रुचि भिन्न-भिन्न ही होती है ।
इस प्रकार से पूल्होजी को स्वर्ग दिखलाया। कुछ ही क्षणों में सुख भोगने के पश्चात् श्री देवजी ने कहा- अब आप वापिस चलिये। अब तो बस इतना ही पर्याप्त होगा । पूल्होजी कहने लगे-अब तक तो मेरा मन भरा नहीं है, जब सुख से भूख मिट जाएगी तभी चलूँगा। कभी भूख मिटती है? चाचाजी! असम्भव है? चलिये, इतना ही देख लिया अब संतोष कीजिये। आपने चाचाजी वचन दिये थे वापिस शीघ्र आने का, विचार कीजिये और चलिये।
पूल्होजी कहने लगे-मैंने वचन तो दिये थे, किन्तु आप तो अपने हमारे हैं। मेरे वचनों को माफ कर दीजिये। मैं आपसे विनती करता हूँ। मेरा मन वापिस जाने को तैयार नहीं है। अच्छा तो ठीक है-ऐसा कहते हुए जम्भेश्वरजी ने कहा-मैं तुम्हे आगे और सुन्दर स्थानों पर ले चलता हूँ। यहाँ पर तो केवल कर्मो का भोग ही है। वह भी समय पर भोगने से मिट जाता है। मैं तुम्हे वह परम पद दिलाऊँगा, जो कभी भी नष्ट होने वाला नहीं है। सदा एक रस रहने वाला है। जाम्भोजी ने थोड़ी झलक नरक की भी दिखलाई तो पूल्होजी तुरन्त वापिस मृत्यु लोक में आने को राजी हो गये।
कहने लगे-इससे तो हमारा मृत्यु लोक ही अच्छा है, जहाँ पर समभाव है। न तो ऐसा स्वर्ग ही है और न ही ऐसा भयंकर नरक ही है। पूल्होजी वापिस मृत्यु लोक में आकर सभी से कहने लगे-हे भाइयो! जैसा जम्भेश्वर जी कहते हैं, वह सत्य है। मैं अपनी आँखों से स्वर्ग और नरक देखकर आया हूँ। पूल्होजी ने वापिस आकर अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति दान करने की घोषणा कर दी। अपनी दो कन्याओं का विवाह सुपात्र वर को ढूँढ कर के कर दिया। कन्यादान में अपनी बहुत सारी सम्पत्ति प्रदान कर दी। स्वयं अपने आप रणसीसर जाकर जंगल में ध्यान-भजन- समाधि में लीन रहने लगे। अपने जीवन को सुगन्धमय बनाया तथा अन्य लोगों के लिये भी प्रेरणा के कोत बने। अन्त समय तक वही रणसीसर में रह कर शरीर का त्याग किया। वही जंगल में उनके नाम से साथरी की स्थापना हुई है। प्रह्लाद पन्थी जीवों में एक पूल्होजी भी थे। जाम्भोजी महाराज का उदे्श्य भी यही था। “सोध्या जीव सुजीव”
यह सभी कुछ गुरु देव की कृपा से ही सम्पन्न हुआ था। जाम्भोजी ने जो कुछ भी अद्भुत परचा दिखाया था, वह सभी कुछ कृष्ण चरित्र से ही सम्भव होना बताया है। यह भी कृष्ण चरित्र का ही प्रमाण था। जो एक बार भी अपनी आँखों से देख लेता है, वह प्रत्यक्ष प्रमाण होता है। फिर कभी भूलता नहीं है। पूल्होजी ने वर्ग के सौन्दर्य को अपनी आँखों से देखा था। इसलिये वापिस आने पर भी कभी भी वह अद्भुत दृश्य पूल्होजी भूल नहीं सके थे। दिन-रात हरि का स्मरण करते हुए अपने जीवन को सफल बना लिया। पूल्होजी आये थे, अपने भतीजे को समझाने के लिये, किन्तु स्वयं ही समझ गये। अपने जीवन का मार्ग बदल दिया। अज्ञानान्धकार दूर हो गया। ज्ञान का प्रकाश हो गया। जीवन के अन्तिम लक्ष्य मुक्ति को प्राप्त हो गये।