बारहवाँ अध्याय का उतरार्द्ध · कथा 85
बलिदान -कथाएँ करमा और गौरा का बलिदान
करमा और गौरा दो बहिनों ने खेजड़ी वृक्ष की रक्षा के लिये अपना बलिदान सहर्ष दिया था। इस घटना के प्रत्यक्ष द्रष्टा वील्होजी ने साखी में इस घटना का भाव पूर्ण यथार्थ वर्णन किया है। वह साखी इस प्रकार है-
““साखी छन्दा की”” करमणी चलणों इण संसार, संभल कर कर चालिये । जीवड़ा नै जोखो होय, सोई ओ डर पालिये । पालिये सो डर चेत अवसर, राख मन अमरापुरी । करो सारी गुरु फुरमाई, चेतकर करणी खरी । मान आण पिछाण सतगुरु, पाप से मन पालिये । चेतणां संसार करमणी, संभल कर कर चालिये ।१। करमणी जपै विसन को नाम, जगत गुरु मन में रहै । भक्ति तणां न मेले आण, हीणों वैण न कहै । वैण हीणों न कहै करमा, रही सिर कंध मांडियो । सांभरण संग्राम हुवो, मरण को बीड़ो लियो । मैल मायाजाल चाली, राख तागो पंथ को । सुरग सामै पांव परठे, जपै नांव विसन को ।२। करमणी चलती सिंवरियो, श्याम शरीर सत घणों । करमणी गौरा लिवी बुलाय, ओ अवसर छै आपणों । आपणों अवसर राम गौरा, लिखी कलम सो नहि मिटे । जाय चौहटे शीश मांड्यो, लिखी स्याही ना मिटे । बाहि तेग समांहि आसु, है है कारो बरतियो । धन्य तेरो ध्यान कर्मा, सीझती साको कियो ।३। गुरु फरमाई खांडा धार, अवसर आपो सारियो । आपण जीवड़ो कबूल कर, पर जीव यूं उबारियो । उबारियो जीव अरू जीवा काजै, असुरां खोटो हियो । रूखां उपर मरण धार्यो, कीजै ज्यूं करणी कियो । करणी पाल उजाल सतपंथ, प्रेम तत्व उपाइयो । जीव काजै प्राण दीन्हे, कीयो गुरु फुरमाइयो ।४। करमां खड़ी छै खेजड़ियां काज, रैवासड़ी के चौहठे । सम्मत सौला सौ संसार, समय मंझ अरू इकसठे । इकसठे मंझ और जेठ मासे, किसन पख अरू थावर दिनें । बीज के दिन कियो पयाणों, सरियो सूधों मनें । निरवाही नाम न सीख, मोटी पांव दे बेड़े चड़ी । गुरु परसादे वील्ह बोलै, करमां अरू गौरा खड़ी ।५। जोधपुर के अन्तर्गत रैवासड़ी-रामासड़ी गाँव की रहने वाली करमा और गौरा दोनों ही गुरु देव के वचनों का पालन करते हुए धर्म पर दृढ रहने वाली थी। एक दिन अकैमात् गौरा करमा के घर पहुँची। और कहने लगी- हे करमणी। अपने को संसार में ही रह कर जीवन यापन करना है। किन्तु जीवन जीना कठिन है। हमें अत्यन्त संभल कर के ही चलना है। अन्यथा एक पैर भी चूक गया, तो हम गिर जायेंगी। और न जाने कहाँ जाकर गिरेंगी,फिर संभलना कठिन होगा। वैसे यह शरीर जो नाशवान ही है। इसका तो डर नहीं है। एक यह शरीर टूट जायेगा, तो दूसरा मिल जायेगा। वह चाहे किसी पशु-पक्षी योनि का हो, परन्तु खतरा तो इस शरीरस्थ जीवात्मा का है। उसकी कहीं दुर्गति नहीं हो जाये। कर्मानुसार कहीं नीच योनि में चला गया, तो फिर दुःख का कोई आर पार ही नहीं है। हे करमा ! इसलिये तो मेरा तो कहना बस इतना ही है कि इस संसार में जीवन जीते हुए,कार्य करते हुए, इस मन को तो अजर अविनाशी परमात्मा के अमर धाम की तरफ ही लगा दें। अमरापुर में जाने के लिये वही कार्य सुचारू रूप से करो,जो जाम्भोजी ने फरमाया है। अपनी मान मर्यादा,गुरु का मार्ग तथा सदगुरु को पहचान कर के सचेत हो जा। इस समय सचेत होने का अवसर आ चुका है। सम्पूर्ण जीवन की कमाई का फल उपस्थित हो चुका है। हे करमा! यह हमारी परीक्षा की घड़ी उपस्थित हुई है। यदि हम इस परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो गयी तो फिर हमारा धार्मिक अनुष्ठान केवल ढकोसला मात्र ही था। इसलिये सचेत होकर बहुत ही सावधानी से पैर आगे बढाना है।
हे करमा! विष्णु को नाम द्वारा स्मरण करो। वही विष्णु ही सर्व देवाधिदेव है तथा जगद्गुरु जाम्भोजी भी वही है। उन्हीं को मन में रखते हुए हमें आगे बढना है। कहीं ऐसा न हो कि इस शुभ अवसर पर कोई सांसारिक मोह माया की तरफ चंचल मन न चला जाये। दूसरी सावधानी यह भी रखनी होगी कि वह भक्ति,ज्ञान,कुल,धन,बल आदि का अहंकार किंचित मात्र भी न आ जाये। यदि ऐसा न हुआ तो हमारा कर्तव्य पूर्णता से निभ जायेगा। दूसरी बात का ध्यान यह भी रखना होगा कि कठिन से कठिन विपत्ति,अनर्थ में भी किसी को कठोर वचन गाली-गलौच न कहे। यदि तुम्हारे ऊपर कोई अन्याय करता भी है, तो उसे शांत करने के लिये उसके सामने अपना सिर मांड दीजिये। वह मर जायेगा और यदि ईंट का जवाब पत्थर से देंगे तो कलह कभी शांत नहीं होगी और धर्म अनुष्ठान में बाधा उपस्थित होगी।
इन्हीं सभी समस्याओं के समाधान के लिये हे करमा! कभी भी ओछी बाणी न बोलें। सदा ही हित कर प्रिय बोलें। करमा ने गौरा की बात को बहुत ही ध्यानपूर्वक सुनी और कहने लगी-हे गौरा। आज तू इस प्रकार की बातें क्यों कह रही है? आखिर इस समय कौन सी विपत्ति आ पड़ी है? जो इस प्रकार की बातें तू कहने को उतावली हो रही हो।
हे करमा! तुम तो बहुत ही भोली एवं अनजान हो। तुम्हें यही मालूम नहीं है कि कल के दिन अपने ही इस प्रिय गाँव की सीमा में दुष्ट हत्यारों का प्रवेश हो चुका है। वे लोग राजमद,धनमद,एवं बलमद से अन्धे हो रहे हैं। उन्होंने अपने गाँव के खेतों में अपने ही हाथ से पाल-पोष बड़े किये हुए पुत्रवत प्रिय वृक्षों को काट रहे हैं। तुम्हें यह पता हो जाना चाहिये कि इस गाँव के ठाकुर ने ही इन लोगों को कुल्हाड़ी देकर भेजा है
हमारे बिश्नोई भाई-बन्धुओं ने इस का डट कर विरोध किया है। अब तक तो एक टहनी भी काटने नहीं दी है। उन लोगों के साथ संग्राम हुआ है। उस परस्पर के युद्ध में अब तक तो धर्म की ही विजय हुई है। जितने भी हमारे लोग हैं, वे सभी मरने के लिये तैयार हैं। यह निश्चित हो चुका है कि कोई भी पीछे नहीं हटेगा। चाहे सभी को प्राणों की बाजी लगानी क्यों न पड़ जाये। हमारे धर्मवीर भाई-बन्धु-पुत्र आदि सभी जब इस संसार को तिनके की तरह तोड़ कर जाने के लिये तैयार खड़े हुए हैं, तो हमें भी पीछे नहीं रहना चाहिये।
स्त्री तो सदा ही धर्म के कार्य में पुरुष से दो कदम आगे ही रही है। सदा ही अन्याय का डटकर विरोध किया है। राम के साथ सीता ने कदम से कदम मिलाया था। द्रौपदी ने भी तो पाण्डवों को विजय श्री दिलवायी थी और दुष्टों का विनाश करवा कर के धर्म की रक्षा की थी। वे भी तो सभी नारियाँ ही थी। उसी प्रकार से हम भी तो उन्हीं की संतान हैं तो भला पीछे क्यों रहें। यदि हम उन दुष्टों के सामने जाकर सत्याग्रह नहीं करेंगी तो हमारा तो वंश ही नष्ट हो जायेगा। साथ ही साथ धर्म भी चला जायेगा और सब से बड़ी हानि तो यह होगी कि हमारे सभी दरखत कट जायेंगे। इनमें एक भी नहीं बचेगा।
ये हमारे दरखत ही नहीं रहे, तो हमारा जीवन ही दूभर हो जायेगा। इन के बिना तो हम जी भी नहीं सकते और न ही जीना चाहेंगे। इसलिये हे करमा! मैं तो संसार की मोह-माया छोड़ कर ही घर से चली थी। अब मुझे मरने में किंचित भी भय नहीं है। पंथ की डोरी न टूटे,आगे से आगे जुड़ती रहे। इसलिये इस समय हमें कुछ करना ही होगा। मैंने तो इस संसार से नाता तोड़ लिया है और स्वर्ग की तरफ एक पाँव आगे बढा दिया है। पीछे का सम्बन्ध टूटते ही आगे का स्वतः ही जुड़ जायेगा। मेरे हृदय में तो विष्णु नाम का स्मरण ही है। उसी को मैंने धारण किया है। वही मेरे सच्चे प्रेरक हैं जो भी मुझसे करवायेंगे, वह अच्छा ही होगा। इसलिये हे करमा! तू भी इस मार्ग पर चलने के लिये तैयार होजा।
हे करमा! मैं जब इस कार्य के लिए घर से चली थी तो उस समय परम पिता परमात्मा का स्मरण करते हुए चली थी। यह मैं तुम से सच कह रही हूँ कि यहाँ पहुँचते पहुँचते मेरे शरीर में सत बहुत ही आ चुका है। वही परमात्मा ही शक्ति दाता है। इसमें मेरा अपना कुछ भी नहीं है। अब तो मुझे इस धर्म के मार्ग से पीछे कोई भी मोह जाल नहीं हटा सकता। इस प्रकार से कहते हुए गौरा ने करमां को ज्ञान तत्त्व समझाया और धर्म का अकुंर उत्पन्न करके अपने साथ चलने के लिये तैयार कर ली।
करमा भी गौरा के साथ ही घर से निकल कर सहर्ष चल पड़ी। करमा भी गौरा की तरह इस शुभ अवसर को हाथ से नहीं जाने देना चाहती थी। होनहार को कोई मिटा नहीं सकता। जो कुछ भी अपने भाग्य या कर्मो में लिखा हुआ है,वह लेख तो अमिट है। उसे तो सुख या दुःख द्वारा भोग कर ही मिटाया जा सकता है। भूख की निवृति तो भोजन द्वारा ही की जा सकती है। दबाने से दबेगी नही। कर्मो का फल दुःख सुख भी तो दबाने से नहीं दबता,किसी न किसी रूप में प्रगट हो ही जाता है।
दोनों ओर से रणबांकुरे युद्ध के लिए तैयार खड़े थे। यदि करमां और गौरा उनके बीच में न आती तो न जाने कितना अनर्थ हो जाता। कितनी माता-बहिनें विधवा हो जाती और न जाने कितने बच्चों के सिर से पिता का, भाई का साया उठ जाता। करमा गौरा दोनों ही हरि का स्मरण करते हुए दोनों पक्षों के बीच में जाकर खड़ी हो गयी। उधर से ग्राम पति ठाकुर के अनुचर जो वृक्ष काटने की तैयारी में थे।
कहने लगे- ये औरतें यहाँ क्यों आ गयी? इनको यहाँ से भगा दो। यहाँ पर कुछ ऐसा हो सकता है, जो इन से देखा नहीं जा सकता। जो इन से देखा नहीं जायेगा, ये कायर हैं। इधर वृक्ष रक्षार्थ खड़े हुए बिश्नोई कहने लगे- हे माता बहनो! तुम यहाँ से चली जाओ। तुम्हारा कुछ भी यहाँ पर कार्य नहीं है। हम पुरुष लोग यहाँ पर उपस्थित है। अपने प्राणों की बाजी लगा कर के भी वृक्षों की रक्षा करेंगे। एक भी दरखत नहीं कटने देंगे।
वे दोनों देवियाँ कहने लगीं-आप पुरुष लोग पीछे हट जाओ। यह शुभ अवसर तो हमारे लिये ही आया है। जब तक हम आगे नहीं बढेंगी, तब तक धर्म की रक्षा नहीं हो सकती। ऐसा कहते हुए दोनों आगे बढी और उन हत्यारों के सामने जाकर निर्भय भाव से खड़ी होकर कहने लगीं-आप लोग इस प्रकार की दुर्भावना छोड़ दीजिये और वापिस अपने घर लौट जाइये। जब तक हमारे शरीर में प्राण रहेगा तब तक तुम लोग वृक्ष तो क्या, एक पता भी नहीं काट सकते। हमें मार कर भले ही यह सम्पूर्ण वन काट लेना।
ठाकुर के अनुचर लोग कहने लगे-यदि हम काटेंगे तो तुम क्या कर सकती हो? हम अपना सिर दे सकती हैं, हमें रूँख कटते हुए देखने में अपने सिर से भी ज्यादा पीड़ा होती है। इसलिए सहर्ष अपना तन वृक्षों की रक्षार्थ दे देंगी। वे भ्रमित अन्यायी लोग कहने लगे- यदि ऐसा है तो हम भी देखते हैं। तुम किस प्रकार से अपना सिर सौंप देती हो? ऐसा कहते हुए उन्होंने एक साथ दो खेजड़ी के पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाना प्रारम्भ किया।
करमा और गौरा ने भी अन्त समय जान कर ओ३म् की ध्वनि करते हुए मन को परमात्मा के साथ जोड़कर अपने शरीर को ले जाकर स्वयं ही उन वृक्षों के चिपका दिया। कुल्हाड़ी की चोट वृक्ष के नहीं लगने दी। अपने ही शरीर पर झेल ली। कुल्हाड़ी की धार से शरीर का एक एक अंग कटकर गिरने लगा, किन्तु अपने शरीर से रूंख प्यारे हैं। इसीलिए उनको नहीं कटने दिया। खून की धारा बह चली। वहाँ की धरती लाल हो गयी। सूर्य देवता साक्षी थे। तथा वहाँ पर उपस्थित जन समूह भी साक्षी था। दोनों वीरांगनाओं ने देखते ही देखते शरीर के टुकड़े करवा लिये। फिर भी अपने लक्ष्य से नहीं हटी। ऐसा देख कर दोनों ओर से हा हा कार होने लगा, किन्तु अब क्या हो सकता था? बाण तरकस से निकल चुका था। उन दोनों की आत्मायें तो वहाँ से प्रयाण कर चुकी थी। पीछे शरीर ही अवशेष मात्र टुकड़ों के रूप में पड़े हुए थे।
इस प्रकार शांति पूर्वक स्वेच्छा से मरण सुन कर, देख कर उन दुष्ट जनों का पत्थर सदृश हृदय भी पिघल गया और वहाँ पर सभी द्रवित होकर आँसू बहाने लगे और बिश्नोइयों से आकर क्षमा प्रार्थना करने लगे। कहने लगे- हम अपराधी हैं। आप लोग जो चाहो सो करो। हमारा सिर आपके आगे झुका हुआ है। इसे काट लीजिये। तभी हमें शांति मिल सकेगी। अन्यथा हम पश्चाताप की आग में जीवन भर जलते रहेंगे, तो भी हमारा पाप नहीं उतरेगा।
बिश्नोई कहने लगे महाशय जी! आप अपना सिर अपने पास ही रखिए। हमें इन सिरों की आवश्यकता नहीं है। जिन सिरों में ज्ञान नहीं है। ऐसे मस्तकों से हम लेकर भी क्या करेंगे? और न ही तुम्हारा मस्तक काट लेने से हमारी माता-बहिनों का पुनः जीवित होने का कारण बनेगा। किन्तु इसके बदले में हम यह चाहेंगे कि हमारे गुरु जाम्भोजी की बताई हुई मर्यादा का धर्म का पालन हो। आप लोग कभी भी इसमें अड़चन न करें। फिर कभी इस प्रकार से वन काटने का, जीव हत्या करने का, दुःसाहस न करें। जिन्होंने हंसते हुए वृक्ष रक्षा हेतु अपने प्राण दे दिये उनका दिया हुआ बलिदान व्यर्थ न जाये।
हम आप से यही चाहेंगे कि आप राजा की तरफ से लिखित प्रमाण-पत्र प्रदान करें कि हम फिर कभी ऐसा कार्य नहीं करेंगे, जिससे जीव हत्या एवं वृक्षों का काटना हो। गाँव पति ठाकुर ने बिश्नोइयों की बाते स्वीकार की और जीव हत्या एवं वृक्ष न काटने का पक्का पट्टा लिख कर दिया।
वील्होजी साखी में लिखते हैं कि करमा और गौरा ने जैसा गुरु जाम्भोजी ने फरमाया था वैसा ही किया। आये हुए अवसर का लाभ उठाया। दूसरे जीवों की भलाई के लिए अपने प्राण समर्पण कर दिये। इससे बढकर और परोपकार क्या हो सकता है? वृक्षों की रक्षा के लिए जिन्होनें अपना जीवन बलिदान दिया है, हमें भी द्वनके बताये हुए मार्ग का अनुसरण करना चाहिये।
करमा और गौरा ने बिश्नोई पंथ का नाम उज्ज्वल किया। प्रेम तत्त्व का पसारा किया। करमा और गौरा खेजड़ियों के लिए बलिदान हो गई। वह भी रेवासड़ी के चौराहे पर सम्पूर्ण जमात के सामने। यह घटना वि.सं. सौलह सौ इकसठ के ज्येष्ठ के कृष्ण पक्ष द्वितीया तिथि और वार शनिवार के दिन घटित हुई थी।
करमा और गौरा तो धर्म रक्षार्थ बलिदान देकर अमर हो गयीं और सदा सदा के लिए रूंखों की रक्षार्थ प्रमाण प्रस्तुत कर गयीं। निश्चित ही ऐसे लोगों की दुर्गति नहीं हुआ करती। गुरु की कृपा से वील्होजी कहते है कि मैंने यह साखी सुनाई है और करमा और गौरा का बलिदान ही मेरी इस प्रेरणा का कोत है।