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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह84 / 94

बारहवाँ अध्याय का उतरार्द्ध · कथा 84

संत एवं भक्तों द्वारा समाज को देन

अधिकतर हजूरी संत एवं समाज सुधारक साहित्यकारों के बारे में तो पूर्व ही चर्चा कर आये हैं। जाम्भोजी के बैकुण्ठ धाम पश्चात् वील्होजी, सुरजन जी एवं केशोजी के बारे में विस्तार से वर्णन किया जा चुका है। अब आगे कुछ विशिष्ट संत एवं भक्तों के बारे में संक्षेप में चर्चा करेंगे।

माखन जी- माखन जी का जन्म संवत सौलह सौ पचास में अनुमानित है। ये नगीना के रहने वाले संत थे। इन्होंने एक सौहलों की रचना की थी जो प्रसिद्ध है। राग खंभावची में गाया जाता है। इसके द्वारा जाम्भोजी की महिमा का वर्णन किया है। रचना बहुत ही महत्वपूर्ण है जो इस प्रकार से हैजिभिया

जपले जंभ सवेरा, आज संभरथल आनंद अपारा।। टेर।।

सुर तेतीसों रहत सन्मुख, आगे ऊधोजन करत उचारा।

देव घणा सब हिल मिल गावे, इन्द्र बधावा मंगलचारा।। 1।।

जैसे दणीयर उदय होत है, तिमर तुटत होत उजारा।

मुनि जन वेद पढत है ब्रह्मा, धनि धनि लोहट भाग तुम्हारा।। 2।।

षोड़स अड़षट नरपति आये, बड़े बड़े भूपति भूप भुजारा।

हर्ष भये शब्दों की धुन सुन, परसत कर कर प्रीत पियारा।। 3।।

अवगत नाथ अयोध्या के पति, तुम ही ब्रजपति नंद कंवारा।

आज संभरथल आये हो स्वामी, नवखंड पृथ्वी खेल पसारा।। 4।।

झिगमिग जोति विराजे शंभू, कंचन नगर अनूप कीवारा।

तीन लोक जाकि महिमा गावे, पावत “माखण” मोख द्वारा।। 5।।

हीरानंद- जन्म संवत सत्रह सौ पचास है। इनके द्वारा रचित हिडोलणों नाम से एक रचना प्राप्त है। जिसमें जाम्भोजी के हजूरी शिष्यों केनाम दिये गये है। यह इतिहास ज्ञात करने हेतु बहुत ही प्रामाणिक महत्वपूर्ण रचना है। जागरणों में गायी जाती है। उन हजूरी संत भक्तों का स्मरण किया जाता है। आइयें हम भी उन्हें स्मरण कर के पुण्य के भागी बने- सरस हिंडोलणो संभरथल, झूले हो साध।।। टेर।। शील, संयम दोय थंभ रोपै, नांव बेड़े आधार। चार डांडी सरल सुंदरी, वेद के झणकार।। सत्य धीरज वणे मरवो, जड़त प्रेम सवार। सूरत पटड़ी बैठ कर, थे झूलो जंभद्वार।। 1।। लोहट हांसा नाम पूरे, जिण लियो उरलाय। नौरंगी के भात ल्याये, संग साहिल्या आय।। सिरियां झीमा रूपां, मरियां, मांगी पूर्व प्रीत बिचार। दोय कंवर आगे धरे लाछां, आये झूलण वार।। 2।। भुवा तांतू चली झूलण, नायकी लीवी बुलाय। अजब देश वीरदे तहां, झाली पोंहती आय।। लोचां गौरा अवर मांगू, पालै वचन विचार। उदो अतली हेत सेती, झूले जंभद्वार।। 3।। राव दूदा टोहा ठकरा, केल्हण बरसिंग लेख। लोहा पांगल भीयां परच्या, सोहन नगरी देख।। रावण गोविंद लक्ष्मण पांडू, मोतिये के भाय। रणधीर अली सैंसा साल्हा, सहजे देत झुलाय।। 4।। खीयां नाथा पूरब झीमां, राणा प्रीति विचार। कोजा बूढा लूणा सायर, आये पूल्ह पुंवार।। धन्नो बिच्छु सुरगण भवंरा, चेला कुलचंद पियार। प्रहलाद की प्रतग्यां कारण, विष्णु को अवतार।। 5।। महाराज दाउद घाटम, पूरो थापन हर खेता । धारू चोखा वैरा प्रीत हिरदे, धरी मंगला रेड़ा।।

हासम कासम संताँ,सेती, सदा सहाय। दास सैंसो उदोदास आयो,पांच को समझाय।। 6।। रावल जैतसी सांगा राणा, लूणो मालदे राव।। महम्मंद खान मुल्ला सधारी, आय परसे पाव।। शाह सिकंदर राव शांतल, सेख सदू जाण। कान्हा तेजा अल्लू चारण, बलि बलि करत बखाण।।7।। हुकम उदो दीन बोल्यो, वील्ह कियो उपदेश। सुजा सुरजन आलम केशव, ज्ञान का उपदेश। चंदन रायचंद जसो पंचायण, शब्द का आचार। हीरानंद की अरज एती, संगत पार उतार।। 8।।

स्वंय कवि हिंडोलने में झूलता है और अन्यों को भी झूलाता हुआ पूर्व सतपुरुषों का स्मरण कर के कृत कृत्य हो जाता है।

ऐसा कहा जाता है कि एक समय हीरानन्दजी पूर्व देश गंगा पार चले गये थे। वहाँ बिश्नोइयों के गाँव नजदीक नहीं थे। हीरानन्द जी नित्य नियम से दोनों समय में हवन करते थे। पैदल यात्रा चलते हुए जहाँ पर भी विश्राम करते, वहीं शुद्ध गो घृत से हवन करते थे। आस पास कहीं भी बिश्नोईयों के गाँव नहीं होने से शुद्ध घृत की प्राप्ति नहीं हो सकी। उनके पास जो घृत था वह समाप्त हो गया था। ऐसी परिस्थिति में हवन करने का नियम निभाना था। वहाँ ऐसी जगह में घी प्राप्त होना असंभव था। नियम टूट गया तो टूट ही जायेगा। हीरानन्द जी ने ऐसी दशा में हरि को ही याद किया। प्रार्थना की कि घी रखने का पात्र खोल कर शून्य में फैलाया, वहीं पर ही घी से पात्र भर गया। इसको कहते हैं कि सिद्धि। जो शुभ कामनाएँ की जावें, वह पूर्ण हो जाये। हीरानन्द जी भी ऐसे ही सिद्धि पुरुष जाम्भोजी के चेले थे।

हरजी-वणियाल-हरजी जांगलू के थापन गृहस्थ थे। इनका जन्म काल वि. संवत-सत्रह सौं पैतालीस में होना अनुमानित है। ये दामो जी के शिष्य थे। इनके द्वारा निम्नलिखित साखियाँ प्राप्त हैं। हरजी द्वारा रचित साखियांँ विशेष रूप से प्रचलित हुई हैं, जो जागरणो में गायी जाती हैं, जो जाम्भोजी के जन्म की हैं-

लोहट तणी जे लाज, पतिराखो पूरा धणी। तथा सही विसवा वीस,देव तणी परमोध, ये विशेष रूप से जाम्भोजी के बारे में कथन की गयी हैं। तथा पौराणिक कथाएँ साखियों के रूप में महीपत मछ अवतार, राजा बलि के द्वार, तथा कुछ साखियाँ मन पर भी हैं। इन साखियों द्वारा हरजी अजर-अमर हो गये।

परमानन्दजी बणियाल -हरजी के समकालीन ही उनके ही भाई बन्धुओं में परमानन्द जी हुए ये बचपन में ही वैराग्य धारण करके विरक्त साधु हो गये थे। परमानन्दजी की समाज सेवा अतुलनीय है। इन्होंने अपने जीवन में “पोथो ग्रन्थ ग्यान” नाम से संग्रह किया था। उन्होंने स्वंय ही घोषणा की है -

बड़ पोथो गिण वील्ह को,दूजो सुरजन दास।

तीजै मुकनु मुझ गुरु,सुरताण पिता मुझ आख।

दसुंधी दासो खीराज जी,रासो जी सुरताण।

ऐ पांचू परत्या बाँच के,पोथो लिख्यो प्रवाण।

कै बाता सुणी साधा कनां,कै पोथिया मां परवाणि।

परमाणंद सुरताण रै,लिखिया सबद सुजाणि।

दीठा वाच्या मैं लिख्या,सासतर मा था सोय।

ग्याता कोई बांच के,दोस न देइयो मोय।

मैं तो मांड्या मोह कर,पुस्तक देखी विचारि।

सबदां रा अरथ अनंत है,जांणै सिरजण हारि।

कचा सब संसार है,सच्चा सबद ततसार।

परमांणद सूं परम गुरु,राखो हेत विचार।

परमानन्दजी से पूर्व में जितने भी कवि लेखक हुए उनकी रचनाओं का संग्रह परमानन्द जी ने “पोथो ग्रंथ ग्यान” में किया। उन्होंने अपने ही हाथ से पाजश्च प्रतियाँ लिखी। प्रथम तो विशाल ग्रन्थ है, दूसरह्य उसी का ही संक्षेप रूप में है।

परमानन्दजी के इस उपर्युक्त दोहे से ही स्पष्ट होता है कि उनको सब से बड़ी पोथी वील्होजी के हाथ की प्राप्त थी। दूसरी सुरजन जी के हाथ की थी। तीसरी पुस्तक परमानन्द जी के ही गुरु मुकनाराम जी की थी। और चौथी पोथी अपने पिता सुरताण जी की थी। पांचवी दसुंधीदास की थी। इन पांचों पोथियों से संग्रह करके एक रूप में “पोथो ग्रन्थ ग्यान” बनाया था। और कुछ बातें अलिखित भी थी। उनका भी संतों से सुन कर पोथे के रूप में संग्रह किया।

यह जाम्भा-पुराण आप के हाथ में है। इसका भी मुख्य आधार परमानन्द जी का पोथा ही है। दूसरा आधार साहबरामजी द्वारा रचित एवं संग्रहित जम्भसार है। कुछ बातें अभी भी लिखित रूप में नहीं थी, किन्तु कर्ण परंपरा से सुनते आ रहे हैं, उनको भी लिखित रूप दिया गया है।

परमानन्दजी ने अपने समय में लेखन कार्य करके बिश्नोई समाज एवं मरुभूमि के साहित्य का बहुत बड़ा कार्य किया है। यदि परमानन्द जी संग्रह नहीं करते तो उन महापुरुषों की रचनाएँ अब तक कभी नष्ट हो गयी होतीं। उन्हें बचाने का कार्य परमानन्द ने ही किया था। परमानन्दजी एक अच्छे संग्राहक के साथ ही साथ स्वयं कवि भी थे। उन्होंने स्वयं भी अनेक साखियाँ, दोहा, छंदों की रचना की है।

शब्दवाणी के गद्य एवं पद्य में प्रसंग परमानन्दजी ने लिखे हैं। उनके द्वारा रचित-हरजस, साखियाँ, विसन स्तोत्र, फुटकर छन्द कवित, गद्य में साका, संवत्सरी, दोहा आदि प्रसिद्ध हैं।

ऊदोजी अडिग-अडिग गोत्र के बिश्नोई ऊदोजी थे। इनका जन्म रुड़कली जोधपुर के पास ही वि.संवत अठारह सौ अठारह में हुआ था। ये बचपन से ही धार्मिक प्रवृति के थे। जीवन के प्रारम्भिक काल युवावस्था में गृहस्थ थे। इनके कोई संतान नहीं थी। उस समय संपन्न किसान एवं प्रतिष्ठित विद्वान् के रूप में इनको मान्यता प्राप्त थी। ऊदोजी अधेड़ अवस्था में जब आ गये और शास्त्रो के अनुसार पचास वर्ष को पार कर गये तो वानप्रस्थ अवस्था में प्रवेश कर गये थे।

उसी समय सर्दियों की रात्रि में अपने कुएँ से सिंचाई कर रहे थे। उसी समय उनको वैराग्य होने में निमित कारण था। उन्होंने कहा -

आव जाव उठ बैठ, ठंडी बाजै बूक रे।

भजियो नहीं भगवान्, ऊदा चाकरी में चूक रे।

कुएँ से जल सिंचाई करते समय ऐसा ही होता है। आना-जाना, उठना-बैठना और ठण्डी हवाओं को झेलना। यह क्या था? ऊदो जी कहने लगे-मेरे लिये ऐसा क्यों हो रहा है? मैंने भगवान् का भजन नहीं किया। स्वयं से कहा -हे ऊदा! कहीं न कहीं चाकरी (सेवा) में चूक हुई है। उसी का ही फल मैं भोग रहा हूँ। वह भी किस लिये? दुनिया तो अपनी संतान के लिये करती है, किन्तु मैं किस लिये?

वहीं से सभी कुएँ की सिंचाई का सामान छोड़ कर ऊदोजी मालवै की तरफ चले गये। वहीं पर भेख लेकर साधु बन गये। हरि के भजन में लग गये। चार पाँच वर्षो पश्चात् ऊदोजी भ्रमण करते हुए होली के दिनों में वापिस रुड़कली आये। वहाँ उन्होंने होली के दिनों में महिलाओं द्वारा फागण के अश्लील गीत गाते हुए और नाचते हुए देखा।

ऊदोजी ने कहा-बहनो! आपको ये अश्लील गीत शोभा नहीं देते। उन स्त्रियों ने कहा-महाराज! यदि हम फाल्गुन के गीत न गायें, तो क्या गायें? आप ही बतलाइये? तब ऊदोजी ने बैठ कर उन्हीं गीतों के लय में “लूर” गाकर सुनाई और कहा -यह भगवान् की भक्ति का गीत गाइये। जाम्भोजी ने कहा भी है-जाणी गीत विवाहे गाइये” भगवान् कृष्ण की भक्ति का गीत गाइये। जो गोपियों ने कृष्ण विरह में गाया था। उस दिन से उन महिलाओं ने ऊदोजी रचित यह “लूर” गायी। और अब तक गा रही हैं।

“लूर” गिरधर गोकल आय,गोपी संदेशो मोकल्यो।

मोह दरशन को चाव,प्रेम पियारा कानजी। टेर।

थारै माथै मुकुट सुढाल,केसर तिलक जु हद बण्यौ।

मोहन नैण विसाल,सुन्दर बदन सुहावणौ। 1।

घूंघर बारै केश,कानां कुण्डल झलक रहै

ओही मनोहर वेस,म्हारै मन में रम रहयौ। 2।

गल बैंजती माल,पीतांबर कट काछनी।

हाथ लकुटिया लाल,सांम सलूणों सांवरो। 3।

गावै छतीसूं राग,गिरधर मुरली मोहनी।

मोहे मोहे सुरनर नाग,गोपी मोहे गुवालिया। 4।

वै दिन कान्ह चितार,महीड़ो मोपे मांगता।

अब तुम गये विसार,मथुरा में महाराज बने। 5।

चेरी कंस की दास,भली बसाई भामनी।

वा संग कियो निवास,सैंस सहेली छाड़ कै। 6।

थानै झूरै जसोदा माय,राधा पलक न बिसरै।

ललिता जीव ललचाय,दरसण कारण दूबली। 7।

थानै झूरै बिरज की नार,घर घर झूरै गुवालिया।

गऊ तिण तज्यौ मुरार,बछड़ा खीर न पीवही। 8।

ऊदो कहै कर जोड़,कांय बिसारी कानड़वा।

म्हारी अर्ज सूणो रणछोड़,दरस दया कर दीजिये। 9।

साहबरामजी ने ऊदोजी के बारे में इस प्रकार से लिखा है -

उद्धव जी अणभै अधिकारी,नाना शास्त्र किये संवारी।

जंभगुरु के दर्शन भये,प्रहलाद चरित विष्णु चरित कहै।

कवत छन्द नाना विध वांणी,उद्धव जी बहु भांत बखाणी।

बहुत काल जग में रहे,फेंरू सुध संप्रधा गये।

साहबरामजी राहड़-हजूरी भक्त रतना राहड़ की परंपरा में तारोजी के पुत्र थे। इनका जन्म वि,संवत अठारह सौ इकोतर में हुड़िया गाँव में हुआ था। छोटी अवस्था में ही ये गोविन्दराम जी के शिष्य बन गये थे। ये उच्च कोटि के कवि थे। इन्होंने अपने से पूर्व कवियों कि कविताओं की व्याख्या अपनी भाषा में की है।

इनकी कीर्ति का आधार उनका विशाल ग्रन्थ जम्भसार है। जम्भसार में अपने ढंग- अपनी शैली में अपने आदरणीय गुरुओं की रचना को दोहा, चौपाई, छन्दों के रूप में लिखा है। जो कथाएँ पूर्व आदरणीय संतों ने लिखी हैं, वह तो सम्पूर्ण साहित्य साहबरामजी ने ज्यों का त्यों ग्रहण कर लिया है। जो कथाएँ उन पूर्व ग्रन्थों में उपलब्ध नहीं हैं, वे सभी कथाएँ जम्भसार में उपलब्ध होगी। जो जम्भसार में नहीं है, वह अन्यत्र कहीं नहीं मिलेगा। जैसे जो महाभारत में नहीं मिलेगा, वह कही नहीं मिलेगा। यह उक्ति जम्भसार में चरितार्थ होती है।

स्वंय अपने अनुभव की रचना सार शब्द गुंजार है। जो बहुत ही महत्वपूर्ण है। इससे साहबरामजी का व्यक्तित्व एवं ज्ञानी पना झलकता है। इन्होंने हवन समाप्ति पर बोले जाने वाले धूप मन्त्रों की रचना की है जो अति सुन्दर एवं महत्वपूर्ण है। साहबरामजी ने सन् अठारह सौ सतावन की गदर का वर्णन अपनी आँखों देखा किया है। साहबरामजी ने दो प्रसिद्ध साखियाँ परम भक्त प्रहलाद,तथा नरसिंह नर मुलतान की रचना की थी। तथा एक प्रसिद्ध आरती-कूं कूं केरा चरण पधारो। भी इनकी ही रचना है। इस आरती से पता चलता है कि साहबरामजी कितने ज्ञानी, अन्तर्मुखी कवि थे। भगवान् विष्णु जाम्भोजी को हृदय रूपी हवेली में बिठाकर आरती की है। साहबराम जी ने हरजस एवं भजन भी बहुत सुंदरता से गाये। उनके द्वारा रचित भजन एवं हरजसों की संख्या बीस है। इनका देहान्त गाँव दुतरावाली में संवत-उन्नीस सौ अड़तालीस में हुआ था। वहीं पर ही उनका समाधि मन्दिर बना हुआ है। उनके परिवार के लोगों ने ही बनाया है। इस ग्रन्थ “जाम्भा-पुराण का आधार भी यही जम्भसार ग्रन्थ है। साहबरामजी प्राचीन कवियों में अन्तिम कवि थे। उनके बाद ऐसा कोई विशेष कवि इस समाज को नहीं मिल सका है जो प्राचीन परंपरा को आगे बढा सके।