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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह83 / 94

बारहवाँ अध्याय का उतरार्द्ध · कथा 83

सिद्ध संत श्री केशोजी

केशोजी गोदारा सिद्ध संत एवं महान् कवि थे। उनका जन्म संवत सौलह सौ तीस में माडिया गाँव में ही गोदारा परिवार में हुआ था। ये बाल्यकाल में ही वैराग्यवान हो कर वील्होजी के शिष्य बन गये थे। वील्होजी द्वारा ही केशोजी ने ज्ञान ध्यान अर्जित किया। केशोजी ने अपने गुरु वील्होजी के ही सिद्धान्त को आगे बढाया। साहित्य रचना में केशोजी पौराणिक कवि के रूप में प्रसिद्ध थे। उनका साहित्य बहुत ही विस्तृत है। वील्होजी जो कार्य नहीं कर सके, उसी कार्य को केशोजी ने पूर्ण किया। केशोजी द्वारा रचित साहित्य इस समय निम्नलिखित रूप में उपलब्ध है-

उन्नीस साखियाँ, तेरह हरजस, इक्यासी कवित, सत्ताईस सवैये, पिच्यासी चन्द्रायण, एक सौ सोलह दोहा, तेरह सोरठे, अवतार की स्तुति में, तथा कथा बाललीला, कथा ऊदे अतली की, कथा सैसे जोखाणी की, कथा मेड़ते की, कथा इसकंदर की, कथा जती तलाव की, कथा विगतावली, कथा लोहापांगल की, प्रहलाद चरित्र, कथा भीव दुसासणी, कथा सुरगारोहणी, कथा बहसोवनी, कथा म्रघ लेखा, इत्यादि प्रसिद्ध।

साहबरामजी ने जम्भसार में लिखा है- “केशव तो केशव सम जानो” केशोजी तो केशव भगवान् जाम्भोजी सदृश ही थे। जाम्भोजी विष्णु के परम प्रेमी भक्त थे। ऐसे प्रिय भक्त को यदि जाम्भोजी विष्णु मिल जाये तो अचम्भे की बात नहीं है। अवश्य ही मिले होंगे।

केशोजी साखी शब्दों के गायक कलाकार उच्च कोटि के थे। उन्होंने जहाँ पर भी बैठ कर मधुर ध्वनि में गाया, वहीं मधुर ध्वनि श्रवण करके उनके ही सुनने वाले हो गये। उनको कभी छोड़ नहीं सके। उन्होंने अपनी कला से सभी को मोहित कर के धर्म पंथ पर चलने के लिए मजबूर कर लिया। कितने ही पापी जनों को पाप पंक से निकाल कर के शुद्ध पवित्र बनाया। उनतीस नियमों पर चला कर सतपंथ के पथिक बनाया। एक समय केशोजी रामड़ावास पधारे थे। उनसे मिलने के लिए जोधपुर नरेश जसवंत सिंह आये थे। मारवाड़ की भूमि में बार बार अकाल की विभीषिका असहनीय है। जसवंतसिंह ने प्रार्थना करते हुए कहा था-

हे सद्गुरु देव! आप हमारे देश में पधारे हैं। आपको मैं जाम्भोजी एवं वील्होजी ही मानता हूँ। आपके गुरु भाई सुरजन के सदृश आप भी हमारे देश में वर्षा करवाइये? भयंकर दुर्भिक्ष को भगाइये। आप की कृपा से ही तो हम लोग सुखी हो सकते हैं।

केशोजी ने वर्षा हेतु विराट यज्ञ का आयोजन किया। स्वयं ने ही वेद मंत्र रूपी ध्वनि का प्रसारण किया। यज्ञ में आहूति प्रदान की। “यज्ञात् भवति प्रजन्यो, यज्ञ कर्म समुद्भव” यज्ञ करने से वर्षा होती है, इसीलिए यज्ञ कर्म करो। ऐसी आज्ञा भगवान् कृष्ण ने दी है। उन्हीं की आज्ञा शिरोधार्य कर के केशोजी ने हित, चित और प्रेम से यज्ञ किया। उसका फल वर्षा के रूप में लोगों ने प्रत्यक्ष देखा।

केशोजी ने यज्ञ कार्य पूर्ण किया ही था, तभी जसवंत जी ने यज्ञ की महिमा एवं केशोजी के श्रद्धा विश्वास को वर्षा के रूप में प्रत्यक्ष देखा था। घन उमड़ घुमड़ कर के चारों तरफ से आकर मूसलाधार बरसने लगे थे। सात दिनों तक लगातार वर्षा होती रही थी। जब नहीं रुकने का अवसर हुआ। तो पुनः राजा ने प्रार्थना की कि हे महाराज! अब आप इसे रोकिये। अन्यथा तो जल ही जल हो जायेगा। सभी धरती डूब जायेगी। अनर्थ हो जायेगा। केशवजी ने भगवान् की स्तुति करते हुए कहा-

हे देव! अब तो आप कृपा कीजिए, वर्षा को रोकिए। हमने तो आपका प्रत्यक्ष दर्शन वर्षा के रूप में ही कर लिया है। अब हम पूर्णतया तृप्त हो गये हैं। अब हम पूर्णतया तृप्त हो गये हैं। आपकी कृपा से हमारे सभी कार्य सफल हो जाते हैं। आपके बिना ऐसा दिव्य कार्य भला कौन करेगा? अब तो कृपा कर के वर्षा रोक दीजिये। आप भी तो देख रहे है कि धरती के जीव त्राहि त्राहि कर रहे हैं। आप तो भक्तों के रक्षक हैं।

इस प्रकार से प्रार्थना करने पर आठवें दिन वर्षा शांत हुई। केशोजी ने काल का मुँह इस प्रकार से तोड़ डाला। जसवंतसिंह जी अति प्रसन्न हुए और केशोजी के कहने पर पाँच सौ बीघा जमीन गोचारण हेतु प्रदान की।

केशोजी को अधिकार प्रदान किया कि धर्म रक्षार्थ विचरण करो। जनता को धर्म का रस पिलाओ। यदि लोग प्रेम रस से धर्म को नहीं अपनाते हैं तो भी उन्हें दंडित करके धर्म पर वापिस लगाओ। राजा ने कहा कि मैं इस कार्य में तुम्हारी सहायता करूँगा। आप साम, दाम, दण्ड तथा भेद से या अन्य किसी भी प्रकार से भूले-भटके लोगों को सन्मार्ग बताओ। इस कार्य में आपसे कोई अपराध या कोई व्यक्ति दंडित हो जायेगा, तो भी मैं आपका ही पक्ष लूंगा। क्योंकि आप निस्वार्थ भाव से दुनिया की भलाई हेतु कार्य करने जा रहे हैं। इस प्रकार कहते हुए नृप वापिस जोधाणे चला गया। केशोजी सभी जगहों पर भ्रमण करते हुए गंगा पार बिश्नोइयों के गाँवो में भी गये। मेवाड़, मालवा, बीकानेर, जैसलमेर, जोधपुर आदि स्थानों में भ्रमण करते हुए धर्म का प्रचार किया। बहुत से अज्ञान रूपी सर्प से ग्रसित लोगों को ज्ञान का दिव्य मार्ग बताया और उन्हें काल रूपी सर्प से मुक्त करवाया। केशोजी ने अपने गुरु वील्होजी द्वारा पंचायत संगठन कार्य को आगे बढाया और उन्हें सुदृढता प्रदान की। वि. सं. सत्रह सौ छतीस में अपनी जन्म भूमि में ही वैकुण्ठ वास को प्राप्त हुए। केशोजी की कीर्ति उनके कवित्व भाव से अमर हो गयी है। रचनाकार कवि तो चला गया, किन्तु उनकी रचना अजर अमर हो गयी है। उनके व्यक्तित्व को अभी भी उजागर करती हुई प्रेरित करती है। इस समय हमारे पास उपलब्ध है। यह जाम्भा पुराण भी इन्हीं संतों की रचनाओं के आधार पर लिखा गया है।