बारहवाँ अध्याय · कथा 78
बारह थाप घणां न ठाहर
नाथोजी कहते हैं कि हे शिष्य! श्री देवजी ने एक शब्द में कहा था कि मैं अपना कार्य पूर्ण कर लूँगा अर्थात् बारह करोड़ का उद्धार हेतु आया हूँ। यही मेरा प्रमुख कार्य है। इसे पूर्ण करके मैं अधिक समय तक नहीं रुकूँगा। मुझे ऐसा आभास हुआ है कि वह समय आ चुका है।
एक समय सद्गुरु देव अति प्रसन्न हुए और अपने शिष्य संतों को पास बुलाया। चार हजार संत श्री देवजी के साथ रहा करते थे। ये सभी संत योग्य थे। उनमें से कुछ संतों को महंत बनाया। अन्य कुछ लोगों को उनके सहायक नियुक्त किया। काली पोशाक के संतों का महंत रेड़ोजी को बनाया और श्री देव ने स्वयं रेड़ोजी के सिर पर आशीर्वाद का वरद हस्त रखा। रणधीर जी को भगवी पोशाक का महंत बनाया और ऋ धि -सिद्धि का धनी बनाया। सभी संतों ने मिल कर रणधीर को महंत गद्दी पर बिठाया। लाल पोशाक के संतों का महंत निहालदास को बनाया। ये तीनों महंत सद्गुरु की आज्ञा में चलने वाले संत शिरोमणि थे।
सफेद पोशाक के महंत की सफेद पोशाक-जाम्भाणी टोपी,चोला,चादर,एवं माला श्री देवजी ने अपने पास ही रख ली। किसी अन्य को नहीं दी। श्री देवजी ने कहा-
यह सफेद पोशाक सन्दूक में रख दो। हे वील्ह! उसी समय वहाँ पर उपस्थित जमाती लोगो में से किसी ने पूछा-हे देव! यह सफेद पोशाक आप किस के लिये रख रहे हो?
इसका भेद (रहस्य) हमें बतलाने की कृपा करो? उसी समय ही कुछ मुस्कराकर श्री देवजी ने कहा -
कि एक स्वांति साह बादशाह लखनऊ का था। उसने मेरे से शब्द सुना था। वह अज्ञान अन्धकार में लिप्त था, किन्तु अन्त समय में जाग्रत हुआ था। उसका शरीर पूर्ण हो गया है। वह मृत्यु को प्राप्त कर के स्वर्ग गया। किन्तु वहाँ से अतिशीघ्र ही लौट आया है। और रेवाड़ी में परशराम के घर जन्म ले लिया है। इस समय वह चार वर्ष का बालक हो चुका है। आठ वर्ष के पश्चात् वह बालक यहाँ पर आयेगा। उसे यह सफेद पोशाक दे देना।
रणधीर ने पूछा हे देव! आप अपनी ज्योति समेटना चाहते हैं। हम उस बालक को कैसे पहचानेंगे? श्री देवजी ने कहा-आप लोग उन्हें शब्द सुनाना। एक बार सुनने से ही उसको शब्द याद हो जायेगा। यही उसकी पहचान होगी। उसे यह सफेद पोशाक देकर महंत बना देना। वही मेरा उत्तराधिकारी होगा। इस पंथ का प्रचार-प्रसार करेगा। उस बालक का नाम बिठल होगा। उसे पुरोहित बना देना। वह धर्म प्रचार करने में अति कुशल वक्ता,ज्ञाता एवं कवि होगा। वह बिठल मेरा ही स्वरूप है। उसे सभी भूप भी मानेंगे।
नाथोजी कहते हैं-हे वील्ह! यह बात संवत पन्द्रह सौ तिरानवै के प्रारम्भ काल में कही थी। श्री देवजी ने भविष्य में घटने वाली घटना का संकेत दिया था। इस समय तुम यहाँ पर मेरे पास बैठे हुए ज्ञान श्रवण कर रहे हो। यह कोई अकस्मात घटना घटित नहीं हुई है। वह बिठल तुम ही हो जो इस समय यहाँ पर पहुँच गये हो। यह ठीक समय है। तुम्हारे पर जाम्भोजी की अपार कृपा रही है। तुम्हारे पूर्व जन्म का तुम स्मरण करो तो तुम्हें ये बातें सत्य सिद्ध हो जायेंगी।
हे वील्ह! यह कृपा केवल तुम्हारे पर ही नहीं हुई है। मेरे ऊपर भी वही कृपा हुई है। उसी समय मुझे भी अपने पास बुलाया और कहने लगे “नाथिया तूं खड़ीजै ना”
हे नाथा! तू अपना शरीर संभाल कर के रखना। मेरा अन्तर्धान हो जाये, तो भी तू वियोग में शरीर को नहीं त्यागना। यह मेरी आज्ञा है। क्योंकि तुम्हारे कण्ठस्थ एक सौ बीस शब्द हैं। ये शब्द तू बिठल को सुनाना। अपने पास का यह अमूल्य धन अपने शिष्य को देकर के उऋण हो जाना। बिठल को अपना शिष्य बना कर इस रखी हुई पोशाक को सौंप देना।
हे वील्ह! अब तक मैं भी जिन्दा था। केवल इसलिये कि श्री देवजी की रखी हुई धरोहर एवं शब्द मैं तुझे दे दूँ। अब मैंने तुझे पोशाक भी दे दी और शब्द -धन भी दे दिया। अब मेरा कार्य भी पूर्णता की ओर बढ रहा है। जो कुछ भी तुम्हें अन्य बात पूछनी है तो पूछ लो। इस प्रकार से वील्हो ने अपने पूर्व जन्म का वृतान्त श्रवण किया और रोमांचित होकर आँखें बन्द कर ली। समाधिस्थ होकर पूर्व जन्म को देखने लगे। कुछ समय तक इस प्रकार से अवस्थित होकर के आत्मा के अथाह सागर से कुछ ज्ञान के कण प्राप्त कर के पुनःवील्ह ने पूछा-
हे गुरुदेव! यह बिश्नोई पंथ पृथक पंथ ही चला है। इसके पुरोहित, गुरु, याचक भी तो भिन्न ही होने चाहिये। किस को क्या अधिकार सौंपे हैं? कृपया बतलावें? क्योंकि किसी भी पंथ का संस्कार ही बिगड़ गया, तो जड़मूल से ही पंथ धूल धूसरित हो जायेगा। जिस पन्थ का कोई रखवाला ही नहीं होगा, तो वह पंथ बिखर जायेगा। यदि ऐसी कोई व्यवस्था की है, तो बतलाने का कष्ट करें।
नाथोजी उवाच-इस पंथ के तीन रखवाले नियुक्त किये गये हैं। तीनों को ही श्री गुरुदेव ने अलग-अलग अधिकार दिये हैं। अन्त समय में यही बात साथरियों ने भी पूछी थी। श्री देवजी ने इस प्रकार से बतलाया था। वही बात मैं तुम्हें बतलाता हूँ-
चार पोशाकों के चार महंतो की स्थापना जाम्भोजी ने की है। इनका कर्तव्य कर्म होगा कि “संजीवन मन्त्र” यानि “सुगरा मंत्र” देने का प्रथम अधिकार होगा। हवन पूजा पाठ आदि धार्मिक कार्य करने के लिये भ्रमण करेंगे तथा सोयी हुई प्रज्ञा को जागृत करेंगे। संत ही इस मेरे भगवें वेश के अधिकारी होंगे। मोह माया से छूटकर स्वंय का कल्याण एवं जगत कल्याण हेतु जिस किसी भी प्रकार से प्रयत्नशील रहेंगे। धार्मिक क्रियाओं द्वारा संस्कार, हवन, आदि करते हुए धर्म का प्रचार-प्रसार करना साधु-संतों का मुख्य कर्म होगा।
दूसरा महत्वपूर्ण कर्म पुरोहित का होता है। जो विवाह मृत्यु एवं जम्म पर संस्कार करवाता है। बिश्नोई पंथ के पुरोहित भी बिश्नोई को ही नियुक्त किया है। ये पुरोहित कलश की स्थापना कर के पाहल मन्त्र एवं हवन करके संस्कार करवायेंगे, इसलिये इन्हीं को स्थापक (थापन) कहा जायेगा। संस्कार करने का कार्य पुरोहित थापनों को सौंपा है।
तीसरा कार्य वंशावली लिखना एवं विवाहोत्सव में गाना -बजाना एवं दान ग्रहण करना गायणों को सौंपा है। जागरण, सत्संग करना, हरि का गुण गान करना तो सभी को ही अधिकार है। जो जानता है, वह यह कार्य करे। आप लोग अपने अपने दायित्व का निर्वाह करके बिश्नोई पंथ के पथिक बन कर अपने जीवन को सफल बनायें।
नाथोजी कहते हैं हे वील्ह! श्री जाम्भोजी ने इस प्रकार से सभी का कार्य निर्धारण किया है। वैसे तो कोई कर्म न्यून या महान नहीं है। अपने स्वाभाविक कर्म करते हुए लक्ष्य की प्राप्ति की जा सकती है। ये चारों वर्ण तो भगवान् ने ही बनाये हैं। किन्तु गुण कर्म के आधार पर ही जाति वर्ण व्यवस्था का निर्धारण होता है। जो लोग जिस योग्य थे, उनको वैसा ही कार्य सौंपा गया। जिनको जो कार्य सौंपा गया, उन्होंने हाथ जोड़ कर स्वीकार किया। क्योंकि वे लोग उस कार्य के योग्य ही थे। हे वील्ह! उस समय श्री देवजी ने रणधीर को अपने पास बुलाया और हंसते हुए कहने लगे-हे रणधीर! तुम तो महंत ऋद्धि -सिद्धि के मालिक हो। विश्वंभर की स्वर्णनगरी से सिलम लाया था। उसका क्या करेगा?
इस प्रकार का धन तो मृत्यु का कारण बन जाता है। मैं तो अतिशीघ्र ही शरीर का परित्याग करूँगा। पीछे तुम्हें इस सिलम से क्या करना है? रणधीर ने हाथ जोड़े और कहा -हे देवजी ! इसमें तो आप ही प्रमाण हैं। जैसी आपकी आज्ञा होगी, वैसा ही मैं करने को तैयार हूँ। आपकी कृपा होगी तो असंभव को भी संभव कर दूँगा।
जम्भेश्वरजी ने कहा-यह स्वर्ण सिलम अखूट है। इसको जितनी काटेगा इतनी ही वृद्धि को प्राप्त हो जायेगी। इसलिये इस अलौकिक वस्तु से कुछ अलौकिक परोपकार का कार्य ही करना। जाम्भोलाश तालाब खुदवाना, वहाँ पेड़ी बंधवाना। तथा यहाँ सम्भराथल के नीचे भी तालाब खुदवाने का कार्य परोपकार का होगा। तुम्हें इस सिलम से ऐसे मन्दिर का निर्माण करवाना चाहिये, जिसमें बैठ कर हवन, पूजा-पाठ, सत्संग हो सके। और यदि तुम लोग मेरे जीवन का स्मृति चिह्न बना सको, तो वह भी आने वाली पीढी के लिये प्रेरणादायक होगा। तुम्हें ऐसा ही कुछ कार्य करना चाहिये जो चिर स्थायी होवे,तथा साधना-भजन करने में सहायक सिद्ध हो सके।
हे रणधीर! यदि तुम इस सिलम से परोपकार का कार्य करते रहोगे, तो तुम्हें किसी प्रकार का भय नहीं रहेगा। यह वस्तु तुम्हारे पास ही रहेगी। तुम से कोई छीन कर के नहीं ले जा सकता। चोरी कर के नहीं ले जा सकता। यदि कोई ले भी जायेगा तो भी वापिस तुम्हारे पास चली 1ायेगी। यदि तुम्हें मारने के लिये विष भी दे देगा, तो भी तुम्हारे पर असर नहीं होगा। यह सिलम ऐसी सिद्धिवान है।
श्री देवजी ने रणधीर को एक मुद्रिका देते हुए कहा-यह अपने पास में रखना। जब तक यह तुम्हारे पास में रहेगी तब तक कोई भी तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगाड़ं सकता। यह मुद्रिका इस सिलम की रक्षा के लिये देता हूँ। जब तक यह मुद्रिका तुम्हारे पास में रहेगी, तब तक सिलम भी रहेगी। किन्तु एक बात का ध्यान रखना होगा। यदि वह मुद्रिका प्रसन्न होकर किसी को स्वंय ही तुमने दे दी, तो तुम्हें खतरा पैदा हो जायेगा। फिर तो यह मुद्रिका, एवं सिलम तथा तुम तीनों ही बिखर जाओगे। धन के लोभ में लोग कुछ भी कर सकते हैं। इसलिये तुम्हें जितना हो सके अतिशीघ्र ही आवश्यक कार्य कर लेना चाहिये।
तुम्हें भोजन करते हुए सावधान रहना चाहिये,भोजन में विष मिलाया जा सकता है और विष जीवन को समाप्त कर देता है। इसलिये अपने हाथ में यह अंगूठी पहने रखो, नित्य प्रति भोजन करने के पश्चात् यह अंगूठी वाला हाथ मुख पर फेर लेना, भूल मत करना। यदि कोई विष दे भी तो शीघ्र ही विष का प्रभाव समाप्त हो जायेगा।
हे रणधीर! यह मुद्रिका तुम ग्रहण करो। इसे सामान्य नहीं समझना। यह वही अंगूठी है जो रामचंद्रजी ने हनुमान को दी थी और लंका में भेजा था। सीता की खोज करने के लिये। तुम्हें आश्चर्य होगा-इसी मुद्रिका के प्रभाव से ही हनुमान जी समुद्र को पार कर गये थे और लंका में सीता की खोज कर ली थी। सीता को विश्वास इसी मुद्रिका से ही दिलाया था। लंका में जाकर सकुशल वापिस लौट आया था। ऐसा ही कार्य तुम्हें भी करना होगा। किन्तु इस बात का भी ध्यान रखना कि तुम्हारी प्रसन्नता से दी हुई यह मुद्रिका चली जायेगी। ऐसा कहते हुए जाम्भोजी ने अपने हाथ की अंगूठी रणधीर को सौंप दी।
रणधीरजी को दिव्य वस्तु सौंपने पर समीपस्थ रहने वाले साथरियों ने हाथ जोड़े-
हे देव! आपने अलग-अलग सभी को दिव्य वस्तुएँ प्रदान की हैं। हमारा भी उद्धार कैसे होगा? यह भी कुछ उपाय करो? अपना हाथ हमारे सिर पर भी धरो। आप तो अपने स्वरूप में लीन हो रहे हो,अब तो हमें पता चल ही गया है। जिस प्रकार से हमारी भी सम्मति हो जावे, ऐसा उपाय हमें भी बता दो। आपके पीछे हमारा उद्धार करने वाला कौन होगा? हम लोग पुण्य दान किसको करें, किसकी उपासना पूजा करें? आप की ही वार्ता हम तो सत्य मानते हैं। आपके सिवा अन्य कोई भी हमारा उद्धारक नहीं है।
ऐसी भक्तों की जिज्ञासा सुन कर के श्री जम्भेश्वरजी कहने लगे-आप लोग एक विष्णु के नाम का ही जप कीजिये, यही सबसे बड़ा धर्म है। इसी धर्म की नौका पर सवार होकर संसार सागर से सहजता से पार उतर जाओगे। विष्णु यह परमपिता का नाम है। इसका उच्चारण कोई भी कर सकता है यहाँ ऊंच-नीच, जाति-पाँति का भेदभाव नहीं है। इसी नाम के प्रताप से मृत्यु को जीता जा सकता है। जो कुछ लेना है, तो नाम ही लीजिये। नाम के प्रभाव से सम्पूर्ण पापों का नाश हो जाता है। जिन्होंने भी एकाग्रता से विष्णु का नाम जप किया है, उन्होंने मानो सभी कुछ कर लिया है। नाम में ही योग,यज्ञ, तप आचार आदि समाहित हो जाते हैं।
श्री देवजी ने कहा-हे शिष्यों! अब मैं तुम्हें पूजा का विधि-विधान बताता हूँ। पूजा के योग्य कौन है? यह भी सुनो। सायं काल में नित्यप्रति विष्णु का गुणगान, साखी-भजन, आरती सभी परिवार के लोग मिल बैठ कर सस्वर गान करो। कण्ठ सुर से गाया हुआ प्रेम गान नौ प्रकार की भक्ति ही है। परमात्मा विष्णु का गुणगान करना, यही पूजा है यह कार्य तुम लोग नित्यप्रति किया करो। नित्य तुम्हारे घर परिवार में जागरण होगा। इससे भगवान् प्रसन्न होंगे।
“सांझे जमो सवेरे थावण” सांयकाल में जमो -जागरण एवं प्रातःकाल हवन करो।
कलश की स्थापना करके पाहल करो,यही ईश्वरीय पूजा है। हे लोगो ! मेरा शिष्य बिश्नोई होगा वह हवन किये बिना रह नहीं सकता। अवश्य ही नित्यप्रति हवन करेगा।
श्री जाम्भोजी ने कहा -हे शिष्यों! हवनीय अग्नि में ही विष्णु का मुख है। यदि आप विष्णु जाम्भोजी का दर्शन करना चाहते हैं, तो अग्नि में ही दर्शन करो। यह दर्शन करना तो नित्य हवन रूपी कार्य से हो सकता है और यदि वार्ता करना चाहते हैं, तो शब्द पढो। उनसे वार्ता भी हो सकेगी।
यदि नित्यप्रति अग्नि की पूजा हवन द्वारा करते रहोंगे तो कभी भी अकाल मृत्यु को प्राप्त नहीं होंगे। घर में सुख शांति बनी द्भहेगी। आने वाली संतान सुपात्र होगी।
जीवन में युक्ति-मुक्ति मिलेगी। इसलिये हवन एवं जागरण करना यह तुम्हारा कर्तव्य कर्म है। इसे निःस्वार्थ भाव से करते रहो। जो मनुष्य नित्य प्रति हवन करता है,देवता विष्णु की पूजा इस प्रकार से करता है, वह तो देव तुल्य ही है। ऐसे बिश्नोई यज्ञ कर्ता का दर्शन भी देव तुल्य कल्याण कारक है।
साथरियों ने हाथ जोड़ कर पूछा-हे देव, आपने जो नित्य प्रति हवन एवं जागरण की बात कही है, यह तो हमेशा होना कठिन है, क्योंकि हम तो गृहस्थ लोग हैं। हमारी बहुत सी जिम्मेवारियाँ है। कैसे निभा पायेगें? यदि इस नियम में कुछ ढील दी जाये, तो हो सकता है यह नियम निभ भी जाये। हे देव! धर्म को आगे चलाने के लिये कठोरता से कार्य नहीं चलेगा। उसमें कुछ लचीला पन तो आना ही चाहिये। इसके बारे में आप जैसा आदेश देंगे, वही मान्य होगा।
श्री जाम्भोजी ने इस प्रकार की समस्या का समाधान करते हुए कहा-यदि आप लोग नित्यप्रति जागरण एवं हवन करने में समर्थ नहीं हो, तो भी यह नियम त्यागने योग्य नहीं है। कुछ विशेष दिनों में तो अवश्य ही जागरण-हवन करो। जैसे -अवतार की जयन्ती-जन्म दिवस,पूर्णमासी, ग्रहण के अवसर पर, जन्म संस्कार, सूतक की शुद्धि के लिये, मृत्यु के तीसरे दिन पातक निकालने के लिये, विवाह के समय, जागरण, गृह प्रतिष्ठा या अन्य उत्सव पर, होली के अवसर पर, सुगरा मन्त्र संस्कार के अवसर पर, अमावस्या के पर्व पर या अन्य किसी भी प्रकार की अशुद्धि दूर करने के लिये ये कुछ समय आते हैं। ऐसे समय पर हवन-यज्ञ अवश्य ही करना चाहिये।
दो महान् पर्व आते हैं। एक अमावस्या दूसरी पूर्णमासी। इन दोनों अवसरों पर तो हवन अवश्य ही करें। आप लोग प्रत्येक गाँव में हवन करने हेतु एक चौकी-मन्दिर की स्थापना अवश्य ही करें। वहाँ पर सभी गाँव के लोग एकत्रित होकर अमावस्या का हवन अवश्य ही करें। आप लोग गोपालन करते हो। एक बिलौने का घी अमावस्या को देव अर्पण अवश्य ही करो। इससे तुम्हें नित्यप्रति हवन का फल मिलेगा।
साथरियों ने पूछा-हे गुरुदेव! आप हवन की बात करते हैं। किन्तु हम लोग तो वेद मन्त्र तो जानते ही नहीं हैं। बिना वेद मन्त्रों के, बिना विधि विधान के यज्ञ कैसे सम्पन्न होगा? इसके लिये नित्य प्रति या प्रति अमावस्या को हम वेदज्ञ पंडित कहाँ से लायेंगे?
श्री देवजी ने कहा-आप लोग मेरे द्वारा उच्चारण किये हुए शब्द तो सुने ही होगें। आपको याद भी अवश्य ही होगें। यदि याद नहीं हैं, तो आपके साथ में नाथो मौजूद है। इसको एक सौ बीस शब्द कण्ठस्थ हैं। इससे सीख लेना। आप लोग हवन करते समय इन शब्दों का सस्वर उच्चारण करो। एक शब्द पूर्ण हो जाने पर“स्वाहा”कह कर के आहुति प्रदान करो।
गुरुदेव ने कहा -“मोरा उपख्यान वेदूं,कण तत भेदू” मैंने जो ये शब्द उच्चारण किये हैं, ये वेद ही हैं। जिस प्रकार वेद मन्त्र ध्वनि से उच्चारण किये जाते हैं, उसी प्रकार से ही ये शब्द भी बोले जाते हैं। जो लाभ वेद मन्त्रों से आपको मिलेगा, वही लाभ इन शब्दों से भी प्राप्त हो जायेगा। वेद मन्त्र तो आपके वश की बात नहीं है। अति दुरूह हैं। कहीं थोड़ी भी यदि उच्चारण के स्वर में गड़बड़ी हो गयी, तो उनका प्रभाव उल्टा हो जायेगा।
स्वर के अपराध से वृत्रासुर मारा गया था और इन्द्र को शक्ति मिली थी। वृत्रासुर के पिता ने अपने बेटे की अभिवृद्धि के लिये और इन्द्र का नाश करने के लिए यज्ञ किया था। उस समय मंत्रों का उच्चारण किया -इन्द्र शत्रों वर्धस्व स्वाहा इन्द्र का शत्रु बढे,यह कहना चाहता था किन्तु वैदिक स्वर के उल्टा हो जाने से इन्द्र की अभिवृद्धि हो गयी। और वृत्रासुर मारा गया था। इसलिये तो ये शब्द मरुभाषा के वेद मन्त्र हैं। इनसे कोई स्वर का अपराध नहीं है। जैसा आप चाहे वैसा उच्चारण करें। वेद मन्त्रों सदृश ध्वनि का प्रसार करें। और स्वाहा कह कर के आहुति प्रदान करें।
श्री देवजी ने कहा -हे शिष्यो! आप लोग जल्दी ही भूल जाते हो। मैंने उनतीस नियमों में एक नियम यह भी बतलाया है कि “होम हित चित प्रीत सूं होय,वास बैकुण्ठा पावो” हवन करे, किन्तु सर्व हिताय। सर्व सुखाय,तथा चित्त-मन लगा कर के करो। एवं प्रेम भाव से भी करे। तो बैकुण्ठ की प्राप्ति होगी। यही विधि और विधान है। जिस यज्ञ में ये तीनों बातें नहीं हैं और अन्य सभी कुछ वेद मन्त्र आदि है, तो ऐसा तुम्हारा यज्ञ करना अव्यवहारिक (अफ ल दायक) है।
यज्ञो वै विष्णुः ”यज्ञ ही विष्णु है। इसके द्वारा ही विष्णु की उपासना है। आप लोग जो कुछ भी कमाई करते हैं, उसका फल देने वाला तो ईश्वर विष्णु ही है। विष्णु द्वारा दिया हुआ फल आप लोग यज्ञ के द्वारा वापिस विष्णु को ही लौटाते हैं और यदि नहीं लौटाते तो आप लोग चोर हैं। आपकी चोरी कब तक चलेगी? एक दिन ऐसा कभी आ जायेगा,जो एक साथ सभी कुछ निकल जायेगा। यज्ञ करने के पश्चात् जो अवशिष्ट बचता है, वह आपका भोजन अमृत तुल्य है। तुम्हारे पापों का नाश करने वाला है। यज्ञ करने से ही वर्षा होती है। वर्षा से ही अन्न पैदा होता है।
अन्न से रजवीर्य बनता है। उससे मावन शरीर बनता है। मानव जीवन का मूल आधार यज्ञ ही है।
साथरियों ने पूछा हे गुरुदेव! हवन के बारे में तो आपने जो कहा, वह हम समझ गये। हवन से पूर्व जागरण के बारे में भी कुछ अवश्य ही बतलाइये? नित्य प्रति जागरण का नियम तो निभना असंभव ही है। श्री विष्णु जाम्भोजी ने कहा -जागरण का अर्थ सत्संगति है। यह “उत्तम संग सू सगूं,उतम रंग सूं रंगू” उत्तम संग तो नित्य करना चाहिये। उत्तम रंग तो सदा ही चढाना चाहिये।
“सांझ आरती गुण गाओ” यह नियम भी जागरण का ही रूप है। शाम को सोने से पूर्व थोड़ी देर के लिये भगवान् के गुणगान करो। यदि आप लोग आरती, साखी, भजन नहीं जानते तो कैसे गा सकते हो? तब अन्य किसी दूसरे गुणी ज्ञानी धर्माचारी पुरुष द्वारा भी जागरण कराया जा सकता है। किन्तु यह तो नित्य प्रति असंभव है। इसलिये एक महिने में अमावस्या आती है। उस दिन अवश्य ही जागरण करवावे। प्रत्येक घर में यदि करवाने की सामर्थ्य नहीं है, तो गाँव के सामुहिक स्थान-देवस्थान में बैठ कर सभी लोग सामूहिक कर सकते हैं।
यदि अमावस्या के दिन में सामूहिक रूप से समिलित नहीं हो सकते, तो अपने घर में ही वर्ष में एक बार तो अवश्य ही जागरण (सत्संग) करवावें। उसको भी पुण्य उतना ही प्राप्त हो जायेगा। इसलिये हे शिष्यो! मैंने तुम्हें हवन और जागरण का माहात्म्य विस्तार से बतला दिया है। मैंने जो भी आपको बतलाया है यें सभी बातें केवल कहने-सुनने की नही हैं। ये तो जीवन का आधार हैं। इनसे आपके जीवन में उन्नति आयेगी। जब तक जिओगे तो सुखी होकर और मृत्यु पर मुक्ति दिलाने वाली ये बातें आप लोग ग्रहण करो।
विशेष रूप से अमावस्या के दिन व्रत करो। तथा हवन विष्णु की उपासना करो। अन्य सांसारिक कार्य से दूर रहना होगा। तो किसी भी प्रकार की विघ्न बाधाएँ, हानि ,अकाल मृत्यु,आदि व्याधियों से बचाव होगा। जागरण सत्संग पशु से मानव बनायेगी। सोये हुए लोगों को जागृत करके उन्हें अंधकार से निकाल कर प्रकाश की ओर ले जाने वाली होगी। यह बिश्नोई एक पन्थ यानि मार्ग है। इस पर जो भी चलेगा, वह विष्णु के पास पहुँच ही जायेगा। इस पंथ को आगे भी बढाना है। यहीं तक के लिये ही नही है, रुकना मत, आगे बढते ही जाना है।
हे शिष्यों! आगे के लिये आप लोग इस मार्ग का प्रसार करना। आप लोगों ने इस मार्ग पर चलकर अनुभव प्राप्त कर लिया है। यदि आपको अच्छा लगा होगा तो आप अपनी संतान को भी बता देना तथा जो भी इस पंथ का अनुयायी हो सके, उन्हें इस पंथ पर चलने के लिए प्रेरित करना। इसी पंथ पर चलकर ध्रुव, प्रह्लाद, हरिश्चन्द्र, युधिष्ठिर आदि अनेक राज,भक्त योगी, ऋषि, अपना कल्याण कर चुके हैं। इस समय इस कलयुग में भद्ध मैं वही प्राचीन मार्ग बताने के लिये इस रूप में आया हूँ। मैंने अब तक इस पंथ के अनुयायी बारह करोड़ बना दिये हैं। इस समय मैं अपना कार्य पूर्ण कर चुका हूँ। बारह थाप घणा न ठाहर” अब मैं ज्यादा दिन नहीं ठहरूँगा।
इस धर्म मार्ग का भार अब मैं आप लोगो के कंधे पर डाल कर जाता हूँ,आप लोग इसे अच्छी प्रकार से निभाएँगे। इस मार्ग को लुप्त नहीं होने देंगे। वैसे तो मेरा कहीं आना या जाना होता ही नहीं है। “गुरु आसन संभराथले”मेरा आसन तो सम्भराथल पर ही अडिग है। आप लोग भूल मत जाना। यदि भूल गये तो दौरे में गिरोगे। जहाँ चिन्हो तहां पायो” आप लोग जहाँ पर भी मुझे याद करोगे, वहीं पर उपस्थित रहूँगा। फिर भी जो तुम्हें यह मेरी देह दिखाई देती है, यह अभी नहीं रहेगी। इस देह से जो कार्य करना था, वह संपन्न हो गया है। अभी अधिक दिन रखने का कुछ भी प्रयोजन नहीं है। “कहै सतगुरु भूल मत जाइयो,पड़ोला अभै दोजखे”
हे वील्ह! सद्गुरु ने पूर्व शब्द में कहा है कि आप लोग भूल मत जाना, यदि भूल गये तो दोजख में गिर जाओगे। अब तक तो नहीं भूले हैं किन्तु समय सभी कुछ भूला देता है। ज्यों-ज्यों समय आगे बढेगा त्यो-त्यों भूल भी बढती जाएगी। इसलिये भूले-भटके लोगों को सचेत करते रहना अपना धर्म है। इस धर्म से हम गुरु शिष्य मुख न मोड़ें। सदा सचेत रह कर इस पंथ रूपी खेत की रखवाली करें। तभी जाम्भोजी के शिष्य बन पायेंगे।
नाथोजी ने अपने शिष्य वील्ह को जाम्भोजी की लीला का बखान करते हुए आगे कहा-जब हम साथरिया लोग जाम्भोजी की तरफ एक टक दृष्टि से देख रहे थे कि आगे क्या आदेश देंगे, इसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। उस समय हमारी मनोभावना को देखकर श्री जाम्भोजी ने गुप्त शंका का समाधान करते हुए इस प्रकार से कहा-
हे साथरियो! हे सज्जनो! आप लोग संसार की मोह माया को त्याग कर आध्यात्मिक मार्ग में प्रवृत्त हो रहे हो। आपका अवश्य ही कल्याण होगा। निवृत्ति मार्ग में आप अवश्य ही चलें। किन्तु प्रवृत्ति मार्ग,परोपकार कार्य भी भुलाने योग्य नहीं है।
जो अब तक मर्यादा मैंने बाँधी है, उसको भी आगे स्थिर रखना है। आप लोग सहयोग की भावना से कार्य करना। किसी विशेष पर्व पर अमावस्या,पूर्णमासी,होली, विवाहोत्सव आदि शुभ अवसरों पर एकत्रित होकर एक दूसरे के दुःख को समझने की कोशिश करो।
यह समाज सहयोग की भावना से ही विकसित हो सकेगा। “संघे शक्ति कलयुगे” इस समय कलयुग व्यतीत हो रहा है। कलयुग में तो एकता,सामूहिकता,में ही शक्ति है। बिखराव में तो तिनका-तिनका होकर उड़ जायेगा। एकता में सभी तिनके मिलकर एक गट्ठर बन जायेगा। वह तोड़ने से नहीं टूटेगा।
यह आपका बिश्नोई समाज अभी नया ही बना है। इसको बाह्य तूफानों से डर रहेगा। आप समाज के अग्रगण्य लोग सचेत रहेंगे, तो ये अन्य धर्मो क तूफान आपके पास आ कर मन्द गति को प्राप्त कर के हवा के रूप में परिवर्तित होकर निकल जायेंगे। यह समाज सुचारू रूप से चले, इसके लिये मैंने साथरियों की स्थापना कर दी है जहाँ तहाँ जो भूमि पवित्र थी, उसी भूमि पर मैं गया हूँ। वहीं पर साथरी बन चुकी हैं। ये साथरियाँ धर्म प्रचार करने हेतु धर्म पीठ हैं। यहाँ पर आप साधु-संत रह कर अपने आस पास के गाँवों में धर्म प्रचार करेंगे।
हे साथरियों! आप लोग भी मेरे साथ थे। हमने वहाँ पर विश्राम किया है। कुछ समय तक ठहरे हैं। आप लोगों ने अवश्य ही वहाँ की भूमि की पवित्रता का अनुभव किया ही होगा। इस समय आप लोग जहाँ, जिस साथरी में जिसको रहना ठीक हो वहीं पर आप लोग जा सकते हो। धर्म का प्रचार होवे, पतित जीवों का उद्धार हो सके, तो यह बहुत ही पुण्य का कार्य होगा। आप लोग धर्मोपदेश देने में भी कभी आलस नहीं करना। विद्या दान ही बहुत बड़ा दान है। इन धार्मिक कार्यो के लिये ये साथरियाँ उपयुक्त स्थान होगी।
मैं जहाँ कहीं भी थोड़ी देर के लिए ठहरा था तथा अपने साथरियाँ साथ में थे वहीं साथरी नाम से कही जाती है और जहाँ में मैंने अधिक समय तक विश्राम किया है, वह धाम कहलायह्यंगे। साथरियाँ तो अनन्त हैं, किन्तु धाम सीमित संख्या में हैं। विशेष रूप से यह सम्भराथल तो मुझे बहुत ही प्रिय स्थल धाम है यहाँ पर तो मैंने जीवन का अधिकांश समय धर्मोपदेश करते हुए तथा गऊ चराते हुए बिताया है। यह सर्व शिरोमणि कैलाश पर्वत है। इस कैलाश पर जो चढ़ जायेगा, वह तो स्वर्ग (मोक्ष धाम) पर भी पहुँच जायेगा। मेरा आसन स्थिर तो सम्भराथल पर ही रहा है। आगे भी रहेगा। मैंने यहाँ ग्वाल-बालों के साथ गउवें चराई हैं, अनेकों दिव्य लीला, कृष्ण चरित्र दिखलाया हैं। बड़े बड़े उद्दण्ड लोगों को मात्र शब्द द्वारा ही उनकी शैतानता को नष्ट कर दिया। जो कार्य मैंने इस जन्म में कर दिखाया है, वह तो मैं पूर्व राम-कृष्ण अवतार में भी नहीं कर पाया हूँ। उन अवतारों में तो मैंने जड़मूल से व्यक्तियों का नाश किया। किन्तु अबकी बार तो उनके पापों का क्षय कर रहा हूँ।
पीपासर यह पास में ही मेरी जन्मभूमि है। जन्म भूमि एवं माँ को कैसे भूला जा सकता है। यह तो स्वर्ग से भी श्रेष्ठ है। वह्य पीपासर के ही बालक थे। जिनके साथ मैंने बहुत खेल खेले हैं। माता-पिता, बुआ आदि सम्बन्धियों को भी आश्चर्य चकित कर दिया करता था। मेरी तो कुछ स्वाभाविक क्रियाएँ ही थी, किन्तु पीपासर वाद्यियों के लिए तो अलौकिक घटनायें बन जाती थी। यह पीपासर भी धाम है।
यहाँ पास में ही उत्तर की तरफ सम्भराथल की सीमा में ही तालवा ग्राम है। इसमें आप देख रहे हैं एक जाल का वृक्ष एवं दो खेजड़े के वृक्ष खड़े हैं। ये तीनों वृक्ष त्रिवेणी हैं। इनके बीचोबीच शिव धूणा हैं। यहाँ तो शिवरात्रि को विशेष पूजा होती आई है। इस समय ये लोग भूल गये हैं। आप खोद कर देखना। एक त्रिशूल तथा धूणा की विभूति यहाँ मिलेगी। यह पवित्र स्थान भी अति निकट ही है। यह शिव धाम तीनों युगों का है। यह भी धाम की कोटि में ही आता है।
आपने देखा होगा कि कपिल सरोवर, जहाँ पर राजा जेतसी ने कमलासन बनाया है तथा स्वच्छ जल से तालाब भरा हुआ शोभायमान हो रहा है। मैंने वहाँ भी जीवन का बहुत समय व्यतीत किया है। वह स्थान पहले से ही तीर्थ तो था और अब यहाँ पर कमलासन की स्थापना हो जाने से धाम भी बन गया। हमारे प्रिय संतों को चाहिए कि आप लोग वहीं पर ही स्थाई निवास करो। तीर्थ स्नान,धाम का दर्शन करके अपने जीवन को सफल बनावो। पाण्डवों ने यहीं पर ही यज्ञ, दान, तप करके महाभारत युद्ध में विजय प्राप्त की थी। आप लोग भी वहीं तपस्या करके मनेन्द्रियों पर विजय हासिल करके सच्चे अर्थों में साधु बनो। इसलिए जाम्भोलाव धाम एवं तीर्थ दोनों ही है।
हे शिष्यो! आप लोग एवं कुछ राजा लोग भी मेरे साथ रोटू गाँव में गये थे। नौरंगी का भात भरा था। वहाँ पर खेजड़ियों का बाग लगाया था। उनके वहाँ अन्न का भण्डार भरा रहने का वचन दिया था। उससे पूर्व भी साणियाँ को रोटू गाँव से निष्कासित किया था। रोटू नगरी मुझे बहुत ही प्यारी है। बार-बार मुझे खींच ले जाती है। इसलिए रोटू गाँव में साथरी बनी है। वह भी धाम कहा जाये, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
मैंने राव दूदा को खाण्डा दिया था। उनका राज्य स्थिर किया था। कुछ समय पूर्व भी मैं मेड़ता गया था। आप लोग भी साथ में ही थे। छोटी बालिका मीरा दूदा की पौत्री को कृष्ण कन्हैया की एक सुन्दर मूर्ति प्रदान की थी। मीरा तो दादा की सुपौत्री भक्ति के रंग में रंग गयी थी। पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। किन्तु मीरा का भाई जगन्नाथ राज्यमद में मस्त हो रहा था। उसको कुछ भी नहीं दिख रहा था। वह अपने दादा के खांडे का सम्मान करना नहीं जानता। इस प्रकार से उस खांडे को अपने पास कब तक रखेगा, कुछ समय पश्चात् ही वह उस पवित्र खांडे का अपमान करेगा, यह मैं देख रहा हूँ।
किसी सम्बन्धी के उलाहने पर फेंक देगा, तब उसका राज्य स्थिर कैसे रहेगा? जो भी होगा, वह होनहार ही होगा अन्यथा कुछ भी नहीं होगा। यह जगन्नाथ तो केवल नाम मात्र का ही जगÔन्नाथ है। उस जगत के नाथ को तो वह कुछ भी नहीं जानता। यह जगन्नाथ अपने सम्बन्धियों के यहाँ पर विवाह में सम्मिलित होने के लिए आसोजाई डूंगरी गाँव में जायेगा। वहाँ पर उसके सम्बन्धी उलाहना देंगे कि “ तू कांई राज करे है, राज तो बाबोजी यालो खांडो करे है” इसी बात पर वह खांडा फेंक देगा। मूठ वहीं पर ही रह जायेगी और वह खांडा केशोजी संत वहाँ से ले आयेंगे और रोटू गाँव में भादुओं के घर पर रख देंगे। कहाँ की वस्तु कहाँ तक पहुँचेगी, यही तो कृष्ण चरित्र है। इसलिए मैं कहता हूँ कि रोटू धाम परम पवित्र, मुझे बहुत ही प्रिय है। यहाँ पर खेजड़ियों का बाग, साथरी, खाण्डा इत्यादि अलौकिक वस्तुएँ होंगी।
पूर्व में लोदीपुर धाम है। वहाँ पर सुरजी देवी के कहने पर एक खेजड़ी का वृक्ष लगाया था। वह वृक्ष अजर अमर है। यह परम पवित्र निशानी सदा सदा ही भक्तों के भाव को पोषित करती रहेगी। पूर्व गंगा पार के लोगों के लिये तो वह सम्भराथल ही होगा। आप लोगों ने भ्रमण के समय अवश्य ही दर्शन किया होगा, आगे भी दर्शन करते रहना।
इधर जोधपुर नगर के समीप ही रामड़ावास धाम है। आसपास के गाँवों के मध्य में ऐसा परम पवित्र धाम है। राम ने जहाँ पर निवास किया था, इसलिये यह तो पूर्व में भी धाम बन चुका था। उसी धाम को ही शिष्यों ने उजागर किया है। मुझे यह भूमि अत्यन्त प्रिय लगी थी। इसलिये मैंने अन्य भूमि को छोड़ कर रामड़ावास में अधिक समय निवास किया था। इन सभी धामो में संत लोग निवास करें। और सोये हुए लोगों को सचेत करें। इन धामों के साथ ही साथ सभी साथरियो में भी अवश्य ही निवास करें।
नाथोजी कहते हैं कि हे वील्ह! इस प्रकार से सभी को अलग-अलग अपनी-अपनी रुचि के अनुसार साथरियो में और धामों में रहने की आज्ञा जाम्भोजी ने प्रदान की थी। उन्हें इच्छित वस्तुएँ भी प्रदान की थी। सम्भराथल पर चाँदनी -तंबू जो कुछ भी था, वही सभी कुछ अन्यत्र स्थानों में बाँट कर दे दिया।
रहने के लिये पवित्र स्थान होना चाहिये। पहनने के लिये वस्त्र एवं भवन भी चाहिये। तथा पेट की भूख मिटाने के लिये अन्न की आवश्यकता होती है। अन्न की पूर्ति के लिये चौबीस जगहों पर श्री देवजी के आज्ञानुसार भण्डारे चलते थे।
आगन्तुक सुभ्यागत की सेवा अड़सठ तीर्थो में स्नान के समान फलदायक होती है। कहा भी है-अड़सठ तीर्थ एक सुभ्यागत,घर आये आदरियो। जहाँ जहाँ पर भी साथरियाँ, धाम हैं, जहाँ पर भी संत लोग निवास करते हैं वहाँ वहाँ पर भोजन -जल आदि की व्यवस्था करना श्री देवजी ने बतलायी थी। अन्त समय में साथरियों को सचेत करते हुए श्री देवजी ने कहा था-
आप लोग यह भण्डारे की व्यवस्था आगे भी चलाये रखोगे। अपनी कमाई का दसवाँ भाग पुण्य दान में खर्च करते रहोगे। यदि ऐसा चलता रहेगा, तो तुम्हारे घर में अन्न, धन, रूप, लक्ष्मी, गुण आदि की कभी कमी नहीं रहेगी।
नाथोजी कहते हैं हे वील्ह! इस प्रकार की बहुत सी बातें श्री देवजी ने अन्तर्धान होने से पूर्व सभी को एकत्रित करके बतलायी थी। ये बातें मैंने श्री मुख से श्रवण की थी। वही बातें मैं तुझे बतला रहा हूँ। ये बातें कोई ज्यादा प्राचीन नहीं है। अभी थोड़े ही वर्षो की तो बात है। मैंने इन बातों को संजोय कर के रखी थी। कोई श्री देवजी का उत्तराधिकारी आयेगा तो मैं उसे बतलाउँगा। अब तुम यहाँ पर सौभाग्य वश आ ही गये हो, तो मैं तुझे बतला देता हूँ।
श्री देवजी की कृपा से ही मैं अब तक जीवित रहा हूँ। मेरे दूसरे साथी तो उनके साथ ही प्रयाण कर गये थे जाम्भोजी ने मुझे स्वयं ही कहा था “नाथियां तूं खड़ी जै मति” संवत् पन्द्रह सौ तिरानवे मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष सप्तमी को श्री जाम्भोजी सम्भराथल छोड़ कर लालासर गाँव के जंगल में एक हरि कंकेहड़ी वृक्ष के नीचे जाकर विराजमान हुए
हे वील्ह! मैं यह तो नहीं कह सकता कि आप अन्तर्यामी सद्गुरु देव वहीं पर ही क्यों विराजमान हुए अवश्य ही कुछ रहस्य उस भूमि का रहा होगा। सदा की भांति सम्भराथल पर आने वाले भक्तों ने सम्भराथल को सूना देखा। पीछे-पीछे लालासर की साथरी पर ही पहुँच गये थे। वहाँ पर उपस्थित होकर न्यात जमात के प्रबुद्ध जनों ने हाथ जोड़ कर श्री देवजी से विनती करते हुए कहा-हे देव!
आप तो अब इस लोक को छोड़ कर चले जायेंगे हम आपके दास अत्यन्त शोक को प्राप्त हो जायेंगे। आप तो पूर्ण ब्रन् अन्तर्यामी हैं। हमको भी साथ ले चलने की कृपा करें। आपके बिना हम यहाँ अकेले कैसे रहेंगे? आपसे बिछुड़ने की पीड़ा हम कैसे सहन करेंगे। हम लोगों को आप छोड़कर जा रहे हैं, हमारा वश भी क्या चलेगा?
वहाँ पर उपस्थित संतों ने हाथ जोड़ते हुए कहा-हे स्वामी! जल बिना मीन नहीं रह सकती, क्योंकि जल ही उसका प्राणाधार है। हम भी तो आपके बिना कैसे रहेंगे? बिना प्राणों के शरीर कैसे रह सकता है? जल बिना मीन,चकोर बिना चंदा कैसे हो सकता है? न जाने आपके मन में क्या आया कि आप इह लोक को त्यागने को तैयार हैं। आपने अपनी सम्पूर्ण /ारोहर लौटा दी है। इससे हमें विश्वास होता है कि आप अब ठहरोगे नहीं, शीघ्र ही चलने की तैयारी कर रहे हैं। हम सत्य कहते हैं कि आपके बिना हम जीवन धारण नहीं कर सकते। ऐसा कहते हुए न्यात-जमात संत भक्त मण्डली चुप हो गयी।
हे वील्ह ! ऐसी ही प्रेम भरी वाणी सुनकर श्री देवजी ने हँसते हुए कहा -आप लोग व्यर्थ में ही चिंता में पड़े हुए हो। यह देह सदा ही स्थिर रहने वाली नहीं है। “देह न जीती जाणो”अब तक कोई भी इस शरीर को जीत नहीं सका है। इसका अन्त तो एक दिन अवश्य ही होने वाला है। यह शरीर धारण करने का अवश्य ही कोई प्रयोजन होता है। बिना किसी कार्य के कोई भी यहाँ मृत्यु लोक में शरीर धारण करके आता नहीं है।
जब कार्य पूर्ण हो जाये, तो फिर यहाँ रहने का कोई प्रयोजन नहीं है। बिना प्रयोजन यदि यहाँ पर करोड़ों साल तक भी रहे, तो भी कुछ होने वाला नहीं है। जब कार्य सिद्ध हो जाये तो देह का प्रयोजन पूर्ण हो जाता है। जिस प्रकार से कोई कार्य वश घर से बाहर जाता है और उसका जब कार्य पूर्ण हो जाता है, तो शीघ्र ही लौट आता है। इसी प्रकार से यह जीव बटाऊ है। इसे तो यहाँ से आगे प्रस्थान करना ही होगा। इस प्रकार से श्री देवजी ने सभी को सीख दी ओर कहा -अब आप लोग अपने अपने स्थान को चले जायें।
एक बात और भी सुनते जाओ। जब मैं यह शरीर त्याग करूँगा तब मैं ओंकार की ध्वनि करूँगा। आप लोग ध्यान से सुनोगे तो तुम्हें सुनाई देगी। उस समय जो प्रेमाधिकता से ओंकार की ध्वनि के साथ ही जो प्राणों का त्याग करेगा, उसको निश्चित ही बैकुण्ठ की प्राप्ति होगी। आप लोगों ने सत्य मार्ग का अनुगमन किया है अन्त समय में यदि ओकांर की ध्वनि सहित प्राणों का त्याग कर दोगे, तो निश्चित ही सम्मति की प्राप्ति होगी। तथा जो लोग मोह ग्रस्त हैं उनको अभी समय लगेगा।
अब आप लोग अपने-अपने घर जाओ। यहाँ संसार से चलने की तैयारी करो। यदि आप लोगों को साथ ही चलना है, तो अवश्य ही चलो। नाथोजी कहते हैं, हे वील्ह! श्री देवजी के प्रत्यक्ष द्रष्टा ही वहाँ पर थे।
उस रात्रि को वहाँ पर हमने एक दिव्य आश्चर्य देखा था। वह मैं तुम्हें बतलाता हूँ। वहाँ पर हमने सूर्य सदृश चार बालकों को देखा था। वे हो सकते हैं सनकादिक ही हों। उस समय सनकादिको नें स्तुति वैदिक छन्दों द्वारा करते हुए कुछ भाव विनल होकर शब्द कहे थे। मैं उन शब्दों का स्पष्ट अर्थ तो नहीं समझ सका था। क्योंकि वह शब्द संस्कृत भाषा के थे। वे मेरी समझ से बाहर थे। किन्तु मैं इतना तो कह सकता हूँ कि वे स्तुति कर रहे थे। उनका स्वर मधुर था। सहसा ही मन को आकृष्ट करने वाला गायन था। उनकी दिव्य स्वर लहरी सुनते हुए मैं अपने आप को तथा समय को भी भूल गया था। इस समय मैं यह कहने में असमर्थ हूँ, कि उन्होंने कितने समय तक स्तुति की थी।
सनकादिक तो स्वयं ब्रह्माजी के मानसिक पुत्र हैं,उनको किसी भी प्रकार की आधी -व्याधि प्रभावित नहीं कर सकती। वे तो काल के भी महाकाल हैं। इसलिये सदैव पाँच वर्ष की अवस्था में बने रहते है। उन्होंने जय -विजय पर थोड़ी भृकुटि टेढी की थी। दोनों भगवान् के द्वारपालों को मृत्यु लोक में राक्षस बन कर आना पड़ा था। वे सनकादिक उस रात्रि में आये थे और विष्णु रूप जाम्भोजी के सामने हाथ जोड़े खड़े थे। मुझे पूर्ण विश्वास हो गया था कि ये जाम्भोजी तो साक्षात विष्णु ही हैं। ये सनकादिक इन्हें वापिस बुलाने के लिये ही आये होगें। ये सनकादिक तो बैकुण्ठ लोक से लेकर मृत्यु लोक पर्यन्त अबाध गति से भ्रमण करते रहते हैं। इन्होंने श्री देवजी के पास आकर प्रार्थना की थी। आपने अब तो सभी जगहों पर देख लिया है। आपके द्वारा दिया हुआ वचन अब पूर्ण हो गया है। अब आप वापिस चलिये। यहाँ कुछ भी प्रयोजन नहीं रहा।
हे वील्ह! ऐसी ही कुछ संभावना मैंने देखी थी। वह मैंने तुझे बतलायी। हे वील्ह! श्री देवजी ने मिगसर का महीना शरीर त्यागने के लिये चुना था। क्योंकि पूर्व कृष्ण अवतार में श्री कृष्ण ने गीता में मिगसर माह की बड़ाई करते हुए ऐसा कहा था ““मासानां मार्गशीर्षो अहम9”” अर्थात् महीनों में मिगसर का महीना मैं हूँ। भगवान् का जन्म कृष्ण पक्ष को प्रस्तुत करने के लिये ही तो आये थे। अष्टमी आठ संख्या में जन्म होना ठीक ही था, क्योंकि अब आगे एक संख्या का विकास होना था। वह संख्या भी सर्वोच्च है। उस संख्या को पूर्ण किया अर्थात् नौ संख्या वाली नवमी को अपना कार्य पूर्ण हो गया। अब तो यहाँ एक क्षण रहना भी असंभव हो गया,कहाँ भी है -“बाराँह थाप घणा न ठाहर”सनकादिक तो हार्दिक वन्दना कर के वहाँ से वापिस चले गये।
उनके पश्चात् हमने देखा कि इन्द्र,कुबेर,गन्धर्व,किन्नर आदि भी स्तुति कर रहे थे। वह रात्रि तो अनेक ज्योतियों से जगमगा रही थी। यदि उस दिन मैं वहाँ पर नहीं होता तो ये आँखें बिना देखे आँख भी नहीं कहलाती। आँखों की दिव्यता तो देखने में ही है। रूप राशि तो उनकी अपूर्व ही थी। ये मेरे शब्द आँखों से देखे हुए दृश्य को नहीं कह सकते। कानों से उनकी स्तुति के वचन सुन कर इन कर्ण इन्द्रियों को सफल किया है।
ये देवता लोग भिन्न भिन्न प्रकार से स्तुति कर के अपने अपने लोक को चले गये।
नाथोजी कहते हैं, हे वील्ह! मैं सम्भराथल वासी श्री देवजी की महिमा कहाँ तक बखान करूँ। उनके दिव्य गुणों का तो कोई पार ही नहीं था। जिन्होंने पिच्चासी वर्षो के जीवन में अधिकतर समय सम्भराथल पर ही व्यतीत किया । न जाने सम्भराथल ही उनको इतना प्यारा क्यों था? शायद उनकी संभर -सोनवी नगरी यहीं पर ही थी। अपने ही ठीक स्थान पर बैठकर उन्होंने अलौकिक लीलाएँ की थी।
मैंने तो यह देखा है कि उनके पास से कोई जीत कर नहीं गया। जो भी आया अहंकार को गिरा कर के गया। उन्होंने हिन्दू मुसलमान दोनों को चेताया था। किसी भी प्रकार के मजहब-धर्म के झूठे पक्षपाती नहीं थे। जो सच्चा था, उन्हें ही अपना मानते थे। उनकी घोषणा थी कि ““जो ज्यूँ आवै,सो त्यूँ थरप्या,साचा सूं सतभायो।”
जहाँ उजाड़ था, वहाँ नगर बसा दिये। स्वयं ही ज्ञान का कथन किया। उन्होंने शब्द कहे। ये शब्द तो मानव जाति की अमूल्य थाती हैं। ये शब्द इनके स्वयं के अनुभूत हैं। किसी अन्य शास्त्र वेद की नकल नहीं हैं। यही तो कारण था कि जो भी पास में आया था, शब्द श्रवण किया, वही उनका हो गया।
लोगों को मार्ग पर लाने के लिये उनके पास कोई शस्त्र नहीं था। “ज्ञान खड़गूं जथा हाथे,कौन होयसी हमारा रिपूं” जिनके हाथ में ज्ञान रूपी खड्ग होगा, उसका शत्रु संसार में कौन हो सकता है? इसलिये श्री देवजी के पास ज्ञान रूपी खड्ग था, तो उनका कोई शत्रु भी नहीं था। वे तो अजात शत्रु थे।
अनेकों काजी पंडित किताब ले लेकर आये। उन्होंने किताब के अनुसार शास्त्रार्थ करने की कोशिश की। श्री देवजी ने कहा -आप लोग तो किताबों में लिखी हुई बात का रटन करते हैं। मैं तो अपनी आँखो देखी बात कहता हूँ। ये बातें हो सकता है, शास्त्रों में लिखी हुई हैं या नहीं, किन्तु मैं जो कहता हूँ वह सत्य कहता हूँ। आप लोगो ने तो राम -रावण के बारे में पढा होगा, किन्तु मैंने तो रावण को देखा है,उसके साथ लंका में यृद्ध किया था। राम का जीवन जीया है,तुम्हारी हमारी क्या बराबरी?
योगी लोग बाह्य दिखावा ही करके अपने को योगी कहते थे। योग क्या है? उसके बारे में तो कुछ जानते ही नहीं थह्य। योग का अर्थ तो जीव ईश्वर का मिलन होता है। किन्तु ये लोग तो परमात्मा से दूर का भी नाता नहीं रखते थे। संसार के रंग में रचे पचे थे। उन को भी योग मार्ग में प्रवृत्त किया। धन्य हैं वे लोग, जो श्री देवजी के संपर्क में आये,और अपने जीवन का उद्धार किया। ज्ञान रूपी खड्ग से संसार को जीता। सभी को अपना माना। ऊँच-नीच, गरीब-अमीर का भेदभाव नहीं रखा।
मैंने तो अपने सº्गुरु भगवान् को कण-कण में देखा है। केवल सम्भराथल पर अकेले खड़े हैं। ऐसी बात नही है। मेरा तो यह अन्तिम जन्म है, क्योंकि भगवान् का वचन ऐसा ही कहता है। बहुत जन्मों के पश्चात् कोई ज्ञानी जन ही भगवान् को प्राप्त होता है। सभी जगह सर्वत्र वासुदेव परमात्मा ही विराजमान हैं। ऐसा देखने वाला महात्मा तो संसार में दुर्लभ ही है। मुझे तो ऐसा ही अनुभव हो रहा है।
हे वील्ह! मैं तो श्री देवजी के पास आकर कृत कृत्य हो गया हूँ। अब मुझे कुछ भी नहीं चाहिये। केवल श्री देवजी की आज्ञानुसार तुम्हारे आने की प्रतीक्षा कर रहा था। अब तुम आ ही गये हो और मेरे पास जो भी ज्ञान की संपत्ति श्री देवजी की धरोहर थी, वह मैंने तुझे दे दी है। अब तुम्हें आगे क्या पूछना है?
वील्हा उवाच-हे गुरुदेव! श्री देवजी के अन्तर्धान होने से पूर्व उन्होंने अन्तिम उपदेश क्या दिया था वह संक्षेप में मुझे बतलाने की कृपा करें। तथा अन्तर्धान होना,तथा उसके पश्चात् क्या क्या घटनाएँ घटित हुई, यह भी बतलाने की कृपा करें। इस समय आपके सिवाय अन्य कोई प्रामाणिक साक्षात् द्रष्टा पुरुष यहाँ नहीं है। नाथोजी उवाच-हे शिष्य! जब श्री देवजी सम्भराथल से लालासर आ गये और नवमी को प्रस्थान का समय अति निकट आया जान कर मेरे जैसे कुछ लोगों ने श्री देवजी से प्रार्थना करते हुए कहा-हे देव! आप तो अपनी ज्योति समेट रहे हैं। आपके बिना यह सत्पंथ कैसे चलेगा? इसमें अनेक विघ्न बाधाएँ आयेंगी।
जब तक आप विद्यमान थे,तब तक तो सभी कुछ ठीक था। अब आगे क्या होगा? इस पंथ का स्वामी किसी को नियुक्त कर के जाइये। हमें क्या करना चाहिये,जिससे हमारा कल्याण होवे ऐसी बात बतलाइये?
श्री देवजी ने कहा-मैंने तुम्हें जो वील्हा नाम बतलाया था, वही इस पंथ का स्वामी होगा। इसमें सन्देह नहीं करना। रेवाड़ी में परसराम सुथार के घर जन्म ले चुका है आठ वर्ष के पश्चात् यहाँ आयेगा। हे वील्ह! वही तुम ही हो। इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण तुम देख ही रहे हो। जाम्भोजी की बात सत्य हो रही है। अब तुम्हें जाम्भोजी के चलाये हुए सत्पंथ को आगे बढाना है। इसमें आने वाली विघ्न बाधाएँ दूर करनी हैं। मैंने तुझे जाम्भोजी द्वारा दी हुई वस्तुएँ भेख और शब्द दे ही दिये। अब इनकी मान मर्यादा रखना तुम्हारा धर्म है।
श्री देवजी ने अन्तिम उपदेश देते हुए कहा था कि इस धर्म से बढकर कोई धर्म नहीं है। आप लोग ठीक तरह से उनतीस नियमों का पालन करो। ये नियम सदा ही शाश्वत (नित्य) हैं। समय परिवर्तन होता जायेगा किन्तु ये नियम मानव जाति के लिये सदैव ही उपयोगी बनते जायेंगे। इन नियमों से जीवन में युक्ति सीखो और मृत्यु पर मुक्ति प्राप्त करो।
हे वील्ह !श्री देवजी ने अपनी प्रतिज्ञानुसार मिगसर कृष्ण पक्ष नवमी के दिन शुभ वेला में ओंकार की ध्वनि करते हुए इस संसार के शरीर को छोड़ कर ज्योति स्वरूप विष्णु से अपनी ज्योति को मिला लिया। ओंकार की ध्वनि के साथ ही बादलों में चमकती हुई विद्युत सदृश शरीर से आत्मा विलग हो गयी। शरीर रूपी बन्धन से आत्मा मुक्त हो कर परमात्मा बन गयी। आत्मा अपने स्वरूप को प्राप्त हो गयी। पीछे संसार के लोगों के दर्शन एवं वार्ता के लिये धारण किया हुआ शरीर ही शेष रह गया।
श्री देवजी तो पूर्ण ही थे और पूर्णता को प्राप्त हो गये। हम लोग कब तक इस शरीर से बंधे रहेंगे? ऐसा मान कर देवजी के साथ ओम की ध्वनि करते हुए, जो जहाँ थे वहीं स्वेच्छा से प्राण त्यागने लगे। न जाने कितने ही लोग, जो भगवान् का वियोग सहन नहीं कर सके उन्होंने भी बैकुण्ठ प्राप्ति की इच्छा से अपने को शरीर,परिवार,धन, दौलत से विलग कर लिया। जो लोग शुद्ध पवित्र हो गये थे। वे ही यह अद्भुत कार्य कर रहे थे। कहा भी है -“साहिल्या हुवा मरण भय भागा,गाफिल मरणे घणा डरे।”
प्रेम की लीला को कैसे बुद्धि की कसौटी पर कसा जा सकता है? यह प्रेम जिसको हो जाता है, वही जानता है। संसार का प्रेम भी तो वियोग सहन नहीं कर सकता। तो जीव ईश्वर का शुद्ध सात्त्विक प्रेम कैसे सहन होगा? जिस प्रकार से सर्प कंचुकी को छोड़ देता है, उसी प्रकार से जीवात्मा शरीर को छोड़ कर अपने पुण्य प्रताप से ज्योति से ज्योति को मिला रहे थे। न जाने कितने वियोग दुःख सहन न करने के कारण शरीर को त्याग कर के गये, यह तो गोविन्द ही जाने।
नाथोजी कहते हैं, हे वील्ह! नवमी के दिन तो हम लोग सभी वही लालासर साथरी में ही रहे। दसमी के दिन प्रातःकाल की बेला में श्री देवजी के शरीर को समाधिस्थ करने हेतु,हमने दिव्य- अलौकिक स्वर्ग से प्राप्त सन्दूक में शरीर को समाधिस्थ करने हेतु हमने दिव्य शरीर को उठाया और वहाँ से चल पड़े। हम लोगों ने शरीर को समाधि देने के लिये सर्वोत्तम स्थान जाम्भोलाव ही चुना था। जहाँ पर श्री देवजी ने कमलासन बनाया था। इसी विचार से लालासर से चल कर पहला पड़वा समभराथल के पास ही गाँव तालवा में लिया था।
उसी दिन ही हमें अतिशीघ्रता से आगे बढना था। रात्रि निवास जागलूं की साथरी पर करना था। किन्तु जो होनहार है, वही होता है। न जाने देवजी की यही इच्छा थी। वहाँ पर ही बीकानेर का राजा जेतसी दर्शनार्थ आया था। जेतसी ने देखा कि हम लोग शरीर को लेकर आगे बढने की तैयारी कर रहे हैं। जेतसी ने कहा - संतो! आप लोग यह स्थान छोड़ कर कहाँ जा रहे हो? यहीं पर वह प्राचीन शिव का परम पवित्र धूणा है, यहीं पर ही समाधि लगाइये।
हमारे देश के देवता अन्य देश में कैसे ले जा सकते है? ऐसा मैं कदापि नहीं होने दूँगा। संतों की इच्छा पर राज इच्छा हावी हो गयी। हमारे में संत शिरोमणि रणधीर ने कहा-वहाँ पर स्वयं श्री जाम्भोजी ने कमल कोश बनाया है। हम लोग वहीं ले जाना चाहते हैं। राजा ने कहा- हे संत जनो! मैं अधिक विवाद नहीं करना चाहता। मेरी प्रार्थना है कि यहीं तालवा गाँव में शिव धाम पर समाधिस्थ कर दो। आप संत लोग मुझे क्षमा कर दो और जरणा करो।
राज आज्ञा संतों ने स्वीकार करी और वहीं पर जाल वृक्ष के नीचे शरीर को संदूक सहित रखा नींव खोदने कार्य एकादशी के दिन प्रारम्भ कर दिया और त्रयोदशी के दिन समाधि दी गयी। वही दिन मंदिर के नींव रखने का भी है। वार शनिवार कृष्ण पक्ष तेरस मिगसर के महिने में मुकाम मंदिर प्रारम्भ हुआ। चौबीस हाथ गहरी नींव समाधि हेतु खोदी गयी थी। हमें यह देखना था कि यहाँ पर शिव का धूणा है या नहीं? इसीलिए चौबीस हाथ की गहराई में हमें शिव धूणा आदि प्राप्त हुए थे ठीक स्थान एवं समय पर श्री देवजी के सुरनर शरीर को समाधिस्थ किया गया।
बीकानेर के राजा जेतसी ने कहा-यहाँ पर अति शीघ्र ही समाधि मंदिर का निर्माण होना चाहिये। आगे आने वाले समय में श्री देवजी की यादगार बनी रहे। जैसा श्री देवजी का दिव्य शरीर एवं जीवन था। उसी अनुरूप ही मंदिर का निर्माण भी होना चाहिये। सदा सदा के लिए प्रेरणा का कोत बना रहे।
हे वील्ह! इस प्रकार की आज्ञा प्रदान कर के स्वयं जेतसी ने समाधि अपने हाथ से देकर वापिस अपने राज्य बीकानेर में पहुँचा। बीकानेर से ही लालपत्थर मंदिर निर्माण हेतु भेजना प्रारम्भ किया। रोल गाँव के सिलावटों को बुलाया गया। आठ सिलावटे पत्थर घड़ने के लिए बुलाये थे। अन्य लोग उनका सहयोग करते थे। मजदूरी रणधीर चुकाते थे। सिलाएं जेतसी द्वारा भेजी जा रही थी।
उस समय हमने एक आश्चर्य देखा था। दिन भर नौ सिलावटे कार्य करते शाम को जब रणधीरजी मजदूरी चुकाते तो आठ की ही चुकती। एक वह नौवाँ न जाने कौन था? उसका कुछ भी पता नहीं चल सका था। वैसे तो ईश्वर की लीला वही जाने, किन्तु हमारा यह अनुमान था कि हो सकता है नौवें स्वयं जाम्भोजी ही थे। या उनका कोई प्रिय देवदूत रहा होगा। वह कोई अलौकिक पुरुष ही था, जिसे हम पहचान नहीं सके ।
इस प्रकार से कार्य लगातार चलता रहा। दिन दूना रात चौगुना कार्य आगे बढता जा रहा था। रणधीर जी सोनवी नगरी से सिलम लाये थे। उसी को काट काट कर के दाम चुका रहे थे। रात्रि में काटते तो प्रातः काल पुनः वैसी ही हो जाती थी। वह तो सिद्धि वाली वस्तु थी। कभी समाप्त होने वाली वस्तु नहीं थी। जेतसी की आज्ञा थी कि जितना हो सके, उतना सुंदर मंदिर बनाया जावे। धन की कमी नहीं आयेगी। वैसे धन हेतु राजा के पास जाकर हाथ फैलाने की आवश्यकता नहीं थी। मंदिर निर्माण का कार्य अबाध गति से चलता रहा। किसी प्रकार की विघ्न बाधाएं नहीं आयीं। मंदिर सुंदर कलाकृति से बन रहा था।
इस प्रकार से छज्जों तक मंदिर बन चुका था। आगे का कार्य गुम्बज बनाने की तैयारी चल रही थी। जैसा प्रारम्भ हुआ था वैसा ही विशाल गुम्बज (शिखर) बनाने के लिए अनेक कलाकारों से सलाह ली जा रही थी।
तालवा गाँव ही श्री देवजी का अंतिम मुकाम हुआ। इस लिये इस स्थल का नाम मुकाम ही हो गया। सदा के लिए अंतिम मुकाम में अवश्य ही कुछ मिलेगा। जैसी जिसकी भावना होगी, वह अवश्य ही प्राप्त होगा। कुछ लोग तो दृष्ट धन की प्राप्ति का प्रयत्न करते हैं, वह तो सांसारिक ही है। तथा कुछ शारीरिक एवं मानसिक तथा कुछ ही जन जो आध्यात्मिक की प्राप्ति हेतु प्रयत्नशील रहते हैं। सांसारिक धन मान प्रतिष्ठा की प्राप्ति की लालसा वाले जन लालच में पड़कर धर्म-अधर्म, नीति-अनीति कुछ भी नहीं देख पाते हैं। कैसे भी मिले मुझे धन मिलना चाहिये।
हालांकि श्री जाम्भोजी ने मरुदेश में अभी ही शांति की वर्षा की थी। लालच, लोभ, ठगाई से लोगों को निवृत्ति दिलाई थी, किन्तु वर्षा होते हुए भी यदि घड़े को उल्टा करले, तो पानी कैसे भरेगा? घट ऊं धे बरसत बहु मेहा, नीर थयों पण ठालूं, उनमें से कुछ लोग ऐसे ही थे।
रणधीर जी सोने की सिलम से दिव्य मंदिर बना रहे थे। सत्रह महीने तक लगातार कार्य चलता रहा था। छज्जों तक मंदिर बन कर के तैयार हो गया था। उसी समय ही चेना नामका एक व्यक्ति जो बिश्नोई समाज का पुरोहित था, उन्होंने देखा कि इस प्रकार से मंदिर का निर्माण साधुओं के द्वारा किया जा रहा है तो इसका चढावा भी वही लेंगे। यह चढावे का तो हमारा जन्म जात अधिकार है। यदि साधु लोग निर्माण करवायेंगे तो पूजा चढावा ये ही लोग लेंगे। अपने हाथ तो कुछ भी नहीं लगेगा। जैसे तैसे मंदिर के पुजारी हम बनें, ऐसा ही कार्य करना चाहिये।
एक दिन चैने ने अपने घर रणधीर को बुलाया और दूध पीने का आग्रह किया। रणधीर जी ने भक्त का आग्रह प्रेम-भाव देख कर दूध पिया। किन्तु चेने ने दूध में जहर मिलाया था । रणधीर जी ने दूध पीकर वह अपना अंगूठी वाला हाथ अपने मुँह पर फेर लिया। विष का कुछ भी असर नहीं हुआ। चैने ने सोचा था कि रणधीर को मार कर सोने की सिलम मैं ले लूँगा। मंदिर का कार्य करवाऊँ गा और पुजारी भी मैं ही बनूँगा। यहाँ पर बहुत ही चढ़ावा आयेगा। मेरी पीढी दर पीढी निहाल हो जायेगी। किन्तु जिस पर जाम्भोजी का वरदहस्त था, वह क्या जाने। इस मारण कार्य में असफ ल हो गया।
एक दिन चैना रणधीर जी की शिष्या रुकमा, बखतू के पास गया और कहने लगा- हे बेटियो! तुम दोनों रणधीर की चेली हो। तुम्हारे हाथ का भोजन रणधीर नित्य प्रति करते हैं। उनके पास क्या सिद्धि है कि उनको विष भी नहीं मार सकता। उन बेटियों ने बतलाया- हे कुल उद्धारक! रणधीर के पास जाम्भोजी की दी हुई मूंदड़ी है। वो भोजन करके अपना मूंदड़ी वाला हाथ अपने मुख पर फेर लेते हैं। इससे जहर कुछ भी असर नहीं करता है।
चैने ने हाथ जोड़े हे पुत्रियो! अपने कुल का उद्धार करो। जिस प्रकार से हम मंदिर का निर्माण करवायें और पूजा अपने हाथ में प्राप्त करें। रुकमा कहने लगी ऐसा आप क्यों सोचते हैं? हमारे तो गुरु साक्षात् हरि के समान हैं। हम कैसे धोखा कर सकती हैं? यह नरक में पड़ने वाला ऐसा कार्य हम तो नहीं करेगी।
चैने ने कहा-मैं कब कहता हूँ कि तुम ऐसा विष प्रयोग कर के मारने का यत्न करो। तुम तो उनसे अंगूठी ले लो। बाकी कार्य मेरा ही है। तुम्हें किसी भी प्रकार का पाप नहीं लगेगा। जो करेगा, वही भरेगा। तुम्हारे पर रणधीर प्रसन्न हैं। जो तुम मांगोगे वही दे देंगे।
नित्य प्रति रुकमा वखतू के रणधीर जी भोजन करते थे। एक दिन रुकमा बक्तू रणधीरजी के पास गयीं और हाथ जोड़े विनती करने लगीं-हे पूर्ण गुरु आप तो परमात्मा के ही रूप हो। हमने आप से कभी माँग नहीं रखी। आज हमारे एक बच्चे के पेट में दर्द हो रहा है। आप अपने हाथ की अंगूठी दीजिये। उसके पेट पर घुमायेंगी और उसका दर्द मिटा कर आपको वापिस दे देंगी। आपकी अंगूठी में सिद्धि है।
रणधीर ने दयालु स्वभाव से ही कुछ नहीं विचारा और अंगूठी प्रसन्न होकर प्रदान कर दी। चैने को पता चला कि आज अंगूठी रणधीर के पास नहीं है। तब वह दौड़ा-दौड़ा रणधीर के पास गया और भोजन की प्रार्थना करने लगा। रणधीर जी ने भोजन का निमंत्रण स्वीकार कर लिया। उस दिन भोजन का निमंत्रण क्या था मौत ही स्वीकार कर ली। उसे ही निमंत्रण देकर बुला ली।
जब काल आ जाता है, तो सभी कुछ भूल जाता है। इसीलिए जाम्भोजी के वचनों को भूल ही गये। प्रेम और अधिक प्रसन्नता में वचन की स्मृति नहीं रहती। और न ही चेने के कपट को समझ सके थे। जो होनहार है, वही होता है, अन्यथा कुछ भी नहीं होता। श्री रणधीर को श्री देवजी ने कहा भी था कि यह सोने की सिला क्या लाया है, यह तो तेरी मौत है इसे तू ले आया।
उनके वचन भी सत्य होने थे। रणधीरजी की आयु समाप्त हो गयी थी। चैने ने विषमय भोजन रणधीर को करवाया और रणधीर के प्राण पंखेरू उड़ गये। चैने की जो योजना थी, वह भी विफल हो गयी। जो जांही की वासना, सो तांही के पास” जो अलौकिक वस्तु सीलम रणधीर के पास रहने वाली थी, वह चैने के पास कैसे रहेगी? वह मूंदड़ी एवं सोने की सिलम, दोनों ही जहाँ की थी वही चली गयी। चैनो खाली हाथ ही रह गया। वहाँ रणधीर का शरीर शव रूप में पड़ा हुआ था। और कुछ भी नहीं मिला।
चैना बीकानेर के राजा के भय से भाग कर दिल्ली चला गया। हे वील्ह! इधर हमारे जैसे कुछ वृद्ध संतों ने रणधीर के शरीर की क्रियाकर्म कर दी और फिर बीकानेर जाकर राजा से पुकार की। जेतसी राजा ने कहा- अब क्या हो सकता है? वह तो मेरे राज्य से बाहर निकल चुका है। आप लोगों ने आने में देर कर दी। रणधीरजी को मारने वाला जा चुका है। आप लोग वापिस चले जाओ और मंदिर का कार्य पूरा करो। व्यर्थ का वाद-विवाद बढाने से कोई लाभ नहीं है। इस प्रकार से विघ्न उपस्थित हो गया। हम भी यही नियति है ऐसा समझ कर शांत हो गये।
हमारे पास धन तो नहीं था। धन के स्वामी रणधीरजी तो जा चुके थे। धन भी उनके साथ ही चला गया। मंदिर छज्जे तक आया था। अब तक गुम्बद नहीं बना था। हम लोगों ने गाँवो में जाकर भिक्षा माँगी और उपर का मंदिर पूर्ण कर के कलश चढाया। संतों की मंडली एवं गाँवो के पंचों का सहयोग था। स्याणों जी गाँव जाँगलू के स्वयं मंदिर बनाने में सहयोग कर रहे थे। हम लोग धन एकत्रित कर रहे थे। ऊपर का गुम्बुद वैसा सुंदर नहीं बन पाया, जैसा नीचे का छज्जों तक का। जैसा प्रारम्भ में बन रहा था, वैसा हम लोग कैसे बना सकते थे? हमारे पास धन का अभाव होने से ऊपर का भाग कच्चा ही बन पाया।
इस प्रकार से समाधी-(ज्योति मंदिर) वि. सं. पन्द्रह सौ सतानवै चेत सुदी सातम को मुख्य मंदिर बन कर तैयार हुआ। और संवत सोलह सौ की कार्तिक पूर्णिमा को बिश्नोइयों की पंचायत एवं साधुओं ने मिलकर कलश चढाया। उसी दिन से ही मंदिर में जो पूजा पाठ हवन प्रारम्भ हो गया था। जो यह चल ही रहा है। इस शुभ कार्य को आगे बढाते रहना। अब तो तुम यहाँ के अधिकारी आ गये हो।
वील्ह उवाच- हे गुरु देव! मैं यहाँ पर देख रहा हूँ, लेकिन मेरी आँखें श्री जाम्भोजी की कोई निशानी देखना चाहती है। किन्तु अब तक मुझे कुछ भी नहीं दिखाई दिया। उनके वस्त्र, पात्र, खडाऊ, आदि कहाँ चले गये? इसी धाम में ये वस्तुएँ सुरक्षित होनी चाहिये थी किन्तु नहीं हैं। इस का कारण क्या है?
नाथोजी उवाच- हे शिष्य! अब मैं तुम्हें बतला रहा था कि रणधीर जी की मृत्यु हो जाने से जब खाली हाथ चैनो भाग कर दिल्ली चला गया था। न तो यहाँ के राजा के पकड़ में आया और न ही समाज के वश में रहा। वह वहाँ दिल्ली में कुछ समय तक रहा था। ऊपर से देखने में तो बहुत ही सुंदर जवान दिखता था, किन्तु उसका दिल काला था। अपना कार्य बनाने में बड़ा ही चतुर था। उसने वहाँ दिल्ली में रहते हुए किसी प्रकार से बादशाह से सम्बन्ध स्थापित कर लिये थे। उसमें एक काजी ने सहायता की थी। इस प्रकार कुछ समय तो में दिल्ली में रह कर समय व्यतीत किया, ऐसा जान कर कि अब तक वहाँ का मामला ठण्डा पड़ गया।
एक दिन चैने ने काजी से कहा कि अब मैं वापिस अपने बागड़ देश में जाना चाहता हूँ। मुझे मेरी मातृभूमि एवं मेरे सम्बन्धी याद आते है। यदि आप मेरी सहायता करें, तो मुझे वापिस अपने कुटुम्ब में मिला सकते हैं। आप बादशाह से एक प्रमाण पत्र बीकानेर राजा के नाम लिखा दो, जिससे मुझे वापिस जाने में कोई खतरा न रहे। यह बात काजी ने बादशाह से कही और उनसे कागज लिखवा कर चैने को दे दिया। दिल्ली बादशाह से प्रमाण पत्र लेकर चैना वापिस अपने देश को चल पड़ा। सर्व प्रथम जसरासर गाँव में प्रवेश किया।
वहाँ पर बिश्नोइयों को बादशाह का फ रमान दिखाया और वहाँ के चौधरी लोगों से कहा- आप मुझे वापिस समाज में सम्मिलित कर लो। चौधरियों ने मुकाम में इस विषय पर विचार करने के लिए सभा बुलायी।
उसी समय यह पता चला कि चैनो वापिस आ गया है, तो उसका छोटा भाई मेहो अपने घर में रखी हुई जाम्भोजी की तीनों चीजें-चोला, टोपी और चींपी पात्र लेकर यहाँ से रवाना हो गया। मेहो ने सोचा कि भाई वापिस आ रहा है। उन्होंने रणधीर को मार डाला। अब तेरी बारी है। ये पूज्य वस्तुएँ लेकर बीकानेर राज्य से बाहर जाम्भोलाव चला जाऊँ। इन पवित्र वस्तुओं पर जो चढावा आयेगा, वह मुझे मिलता रहेगा। अन्यथा यहाँ तो चैनो छीन लेगा।
मेहा यहाँ से चलकर जांगलू तक पहुँच गया था। जांगलू के स्याणोजी वणियाल एवं धनराज भाटी ने मेहोजी को वहीं रोक लिया और कहा -आप आगे न जायें। यहीं पर आप निवास करे। चैने से डरने की आवश्यकता नहीं है। हम तुम्हारे साथ हैं। हर प्रकार से सहयोग करेंगे। इस प्रकार कहते हुए जांगलू में ही मेहो को बसा दिया और तीनों चीजें वहीं पर रखवा दी थी। कुछ दिनों के पश्चात् पंचायत की प्रार्थना पर टोपी तो वापिस मुकाम में पहुँचा दी, अब यहीं उनके घर पर रखी होगी।
चोला और चींपी-पात्र जो सैंसे के घर पर भंग कर दी थी, वह वहीं जांगलू में दर्शनार्थ विद्यमान है। तुम दर्शन करना चाहते हो तो अवश्य ही करो। चेनो को वापिस समाज में सम्मिलित करने या न करने हेतु आस पास के सभी गाँवों के मुखिया लोगों की एक महा पंचायत हुई। उस पंचायत में हे वील्ह !मैं भी उपस्थित था। उस समय उपस्थित पंचायत के सामने चैने ने हाथ जोड़ते हुए इस प्रकार से कहा -
हे पंचों! मैं अपराधी हूँ। आप मुझे क्षमा कर दें। न्यात गंगा के समान पवित्र होती है। मैं अब आप न्यात गंगा में गोता लगा रहा हूँ। अब भी यदि पवित्र नहीं हुआ तो आगे कभी भी नहीं हो सकूँगा। मुझे दिल्ली के बादशाह ने क्षमा करते हुए प्रमाण पत्र दे दिया है। अब मैं आप से क्षमा याचना कर रहा हूँ। आप लोग मुझे वापिस समाज में मिलाने का कष्ट करें।
पंचों ने कहा-क्या करना चाहिये? इसने तो अपराध किया है। किन्तु अपराध का प्रायश्चित भी तो कर लिया है। इतने वर्षो तक बाहर रह कर क्षण-क्षण में दुःखी होकर ,पाप की आग में जलता रहा है। अब तो यह स्वतःही शुद्ध-पवित्र हो गया है।
जाम्भोजी ने तो कहा था -क्षमा करनी चाहिये। हमें तो क्षमा करना चाहिये।
उसी समय वहाँ पर उपस्थित प्रेमो जी साधु ने जाम्भोजी का अनादि मंत्र कलश पूजा बोल कर,कलश की स्थापना करके पवित्र पाहल बनाया और चेनो को पाहल देकर चोखा करलिया। तब से चैनो से चोखा हो गया। हे वील्ह9! जाश्वभोजी का यह व)ात था कि टालो मत \ यदि कोई अपरा/ा रुवीकार करके पश्चात्ताप करता हुआ पंथ में सम्मिलित होना चाहता है तो उसे वापिस मिला लो। पंथ में मिलाने में पुण्य है, टालने में पाप है। यदि एक भी व्यक्ति अपने कुकर्मों को छोड़ कर पुण्य कमाने के लिये तैयार हो जाता है, तो वह बहुत बड़ा पुण्य का कार्य है। इस प्रकार से चैने से चोखा होकर पुनःबिश्नोई पंथ में सम्मिलित हो गया।
नाथोजी अपने शिष्य वील्हो जी को संबोधित करते हुए अपनी अन्तिम इच्छा प्रगट करते हुए कहने लगे -हे वील्ह! मैंने तुमको संवत् सौलह सौ एक तक की प्रमुख घटनाएँ विस्तार से सुनाई हैं। ये बातें सुनते हुए लगभग दस वर्ष हो गये है। इन दस वर्षो में तुमने आत्मोन्नति की बातें सुनी हैं। जाम्भोजी की लीला जो तुम्हें सुननी थी, वह मैं तुम्हें सुना चुका हूँ। जाम्भोजी द्वारा दी हुई सफेद पोशाक, मैंने तुझे प्रदान कर दी थी। वह तो तुम्हारी ब्रह्मचारी दीक्षा थी।
अब तुम ज्ञानी प्रौढ हो चुके हो। मैं तुम्हें जाम्भोजी का भगवां वस्त्र प्रदान करता हूँ और साधु गुरु दीक्षा मन्त्र सुनाता हूँ। इस प्रकार से नाथोजी ने वील्ह को संवत सौलह सौ ग्यारह में साधु दीक्षा मंत्र देकर साधु परपंरा को आगे बढाने का आदेश दिया।
नाथोजी ने अपना अन्तिम उपदेश शिष्य को देते हुए कहा -हे शिष्य ! गुरु शिष्य परंपरा आदि काल से चली आ रही है। मैं तो अब ज्यादा दिन नहीं ठहरूँगा क्योकि मेरा यहाँ से प्रस्थान करने का समय आ चुका है और न ही यहाँ अब रहने का प्रयोजन ही है। मैने अपना सर्वस्व धन विद्या तुम्हें प्रदान कर दी है। इस विद्या धन को सुरक्षित रखते हुए तुम्हें और भी नयी नयी खोज करनी है। सदा ही विद्या प्राप्ति के लिये प्रयत्नशील रहना है। विद्या का कोई अंत नहीं है। मैंने जो कुछ कह दिया है, इतना ही नहीं है। इससे आगे भी बहुत कुछ है।
हे शिष्य! तुम्हारे पास जो भी विद्या है, उसका सदुपयोग करो। दूसरों को देते रहो। विद्या भ्रमण करते हुए ज्ञान,दान,यज्ञ करो। भूले भटके लोगों को सचेत करो। इस बिश्नोई पंथ को आगे बढाओ। अन्य भी जो लोग उत्तम पंथ के अनुनायी बनना चाहते हैं उन्हें बनाओ। अज्ञानान्धकार में भटके हुए लोगों को ज्ञान मार्ग में लाओ।
साखी शब्द हरिजस द्वारा साहित्य की सरंचना करो। साहित्य ही समाज की रीढ है। मैंने तुझे जाम्भोजी का जीवन चरित्र सुनाया है। अब तक तो कण्ठस्थ रखने की ही बात थी, किन्तु आगे कण्ठस्थ रखने की क्षमता क्षीण हो जाएगी। इसलिये इन शब्दो को तथा इन कथाओं को लिपि बद्ध करो। जिससे आनेवाले समय के लिये उपस्थित रह सके।
मैंने तुम्हें गुरु दीक्षा प्रदान की है। इस परंपरा को भी आगे बढाते रहना है। मैं अधिक समय तक नहीं रह सकूँगा। इस पंथ के स्वामी तुम्हीं होंगे। ऐसा ही श्री देवजी की आज्ञा थी। समाज की बाह्य एवं आन्तरिक सुरक्षा करना तुम्हारा कर्तव्य होगा।