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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह32 / 94

तीसरा अध्याय · कथा 32

महमंद खां के प्रति शब्दोपदेश

वील्होजी उवाचः-हे गुरुदेव! सिकन्दर ने अद्भुत परचा प्राप्त किया, यह मैंने सुना। क्या सिकन्दर जाम्भोजी का शिष्य बन गया था? उन्होंने क्या अपना पुश्तैनी धर्म त्यागकर हिन्दू धर्म अपना लिया था? यदि ऐसा हुआ होगा तो उनके अन्य परिजन एवं काजी मुल्लाओं ने क्या प्रतिक्रिया की थी? ये सभी बातें मैं जानना चाहता हूँ।

नाथोजी उवाचः-सिकन्दर बादशाह ने केवल जाम्भोजी से उपदेश ही लिया था। वह मानवता का उपदेश था। किसी सम्प्रदाय की तरफ झुकने का कोई प्रयोजन भी नहीं था। इसलिए सिकन्दर बादशाह पाहल ग्रहण करके बिश्नोई समाज में सम्मिलित नहीं हुआ था। कवेल शिष्य तक ही सीमित था। सिकन्दर ने अपने परिजनों एवे काजी मुल्लाओं से सम्पर्क नहीं तोड़ा था। सिकन्दर ने मुसलमान धर्म की कट्टरता त्याग दी थी तथा हिन्दू धर्म की कट्टरता से भी परहेज किया था। उसने मध्यमार्ग अपनाया था। वह मार्ग जाम्भोजी महाराज ने दिया था।

वह जीवन की युक्ति बताने वाला और मुक्ति प्रदान करने वाला था। सिकन्दर ने इसलिए ही तो प्रभावित होकर जाम्बा मस्जिद की स्थापना की थी। वह पुण्य की घड़ी सदा स्मरण बनी रहे। वहाँ पर बैठकर प्रार्थना कर सके। ऐसी मस्जिद एकान्त, दूर, सौम्य स्थान में निर्माण करवायी थी। जिसमें हिन्दू मुसलमान दोनों आ सकें। अपने ईश्वर की प्रार्थना कर सकें। इस समय यह यादगार में जामा मस्जिद विद्यमान है। आगे भी खड़ी पवित्र संदेश देती रहेगी। हिन्दु-मुसलमान के प्रेमभाव, भाईचारे की यह पवित्र मिसाल के रूप में सदा-सदा के लिए संदेश देती रहेगी।

सभी का ईश्वर तो एक ही है। नामरूप भिन्न हो सकते हैं। किन्तु मूल सभी का एक ही है। पंडे,पुरोहित,काजी,मुल्ला आदि अपनी-अपनी ढ़पली अलग अलग बजाते हैं। साधारण जनता को भ्रमित करके अपना स्वार्थ सिद्ध करने में ही धर्म की रक्षा समझते हैं। एक-दूसरे में भ्रांति पैदा करके आपस में वैमनस्य फैलाते हैं। ऐसे लोगों से सावधान रहने की आवश्यकता है। हे वील्हा-जब काजी-मुल्लाओं ने सुना कि सिकन्दर बादशाह हिन्दू हो गया है। उन्होंने सम्भराथल पर विराजमान जम्भेश्वरजी से हिन्दू धर्म का ज्ञान प्राप्त कर लिया है। अब तो उनकी ही बात मानता है, हमारी शिक्षा रुवीकार नहीं करता है। उन्होंने सिकन्दर को धर्ममार्ग से हटाने की पुरजौर कोशिश की, किन्तु सिकन्दर के तो रंग चढ़ चुका था।

कुछ काजी मुल्ला नागौर के सूबेदार महमंद खाँ के पास आये और कहने लगे-हम तो हैरान हो गये हैं। बादशाह ने हिन्दू धर्म अपना लिया है। आप उनके प्रतिष्ठित सूबेदार हो। उन्हें वापिस अपने पंथ में कैसे लायें, कोई उपाय बतलाओ।

महमंद कहने लगा-बादशाह से पूर्व तो इस मत-धर्म को मैं भी अपना चुका हूँ। मैं स्वयं ही इस पंथ का अनुगामी एवं जाम्भोजी का शिष्य हूँ। मैं कैसे बादशाह को निवृत्त कर सकता हूँ। मैं तो यह कहता हूँ कि यह मत बहुत ही अच्छा है। जो आपस में प्रेम भाईचारा सिखाता है। आप लोग चले जाइये। इसके बारे में मेरे से कुछ भी नहीं कहना। आप लोग धर्म के मर्म को नहीं जानते।

काजियों ने महमंद से कहा-आप लोग मुसलमान हैं। अपने धर्म को त्याग करके काफिर हो रहे हो। यह अल्ला-खुदा को मंजूर नहीं है। आपसे खुदा रूठ जायेगा। आपको भारी विपत्ति उठानी होगी। अपनी परम्परा से प्राप्त धर्म मत त्यागिये। हमारे कहने से एक बार पुनः विचार कीजिये। जाम्भोजी के पास जाइये। वे तो हमारे मजहब के शत्रु हैं। हिन्दुओं के पक्षपाती हैं। पाखण्डी है। लोगों को बहकाते हैं।

आप तो बादशाह के सूबेदार सर्वसमर्थ हैं। आप तो उनसे कहीं ज्यादा महान हैं। आपके पास तो हाथी-घोड़ा, राज-पाट सभी कुछ हैं। उनके पास तो ये वस्तुएँ कुछ भी नहीं हैं। केवल जंगल में एक कंकेहड़ी के वृक्ष के नीचे बैठे हैं।

काजियों की बात सुनकर महमंद का अहंकार जग गया। वह बहुत से हाथी-घोड़ा आदि सवारी के साधन एवं अपने लाव-लश्कर को साथ लेकर पूरे अहंकार में भर, अंधा होकर सम्भराथल पर पहुँचा। उनके पास जाकर पूछा-हे पीरजी! हमें कर्त्तव्य-कर्म बतलाइये। हमें क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये।? हम राजा हैं। पक्के इस्लाम धर्म के अनुयायी हैं। आपने हमें भ्रम में डाल दिया है और हम क्या करें और क्या न करें, कुछ भी दिखाई नहीं देता।

जम्भेश्वरजी ने कहा-हे राजन्! तू राजा के मद में असलियत को मत भूल। यह तुम्हारा लाव लश्कर केवल तुम्हें अहंकार के वशीभूत कर देगा। तू अज्ञानता में अंधा हो जायेगा। तेरी विवेक बुद्धि भ्रष्ट हो जायेगी। जिस वस्तु, राज्य, हाथी घोड़ा आदि का अहंकार करता है यह तो ओस के पानी की तरह ही है। इससे प्यास मिटने वाली नहीं है। कोहरे के बादल तभी तक स्थिर हैं जब तक कि हवा न चले। हवा चलते ही, सूर्य की किरणें पड़ते ही धुंवर की वर्षा एवं बादल उड़ जायेंगे। ऐसी ही दुर्गति उस धन-दौलत की होगी।

असार वस्तु को ज्यादा बहुमूल्य न समझ। एक दिन तेरा यह जीव हंस उड़ जायेगा। तब तू कुछ भी नहीं रहेगा। तेरा भी कुछ नहीं रहेगा। जिस शरीर का तू अहंकार करता है। यह शरीर तेरा प्राण निकल जाने पर विधवा हो जायेगा। इसके प्राणपति प्रयाण कर जायेंगे। तभी तेरा कोई भी साथ नहीं देगा। इसलिए इस अहंकार के पर्दे को फाड़कर शुद्ध बुद्धि द्वारा देख। तभी तुम्हें असलियत का पता चलेगा। तू किसी दूसरे के बहकावे में आकर अपने जीवन को कौड़ी के बदले में मत नष्ट कर। इस प्रकार से मुहमंद को श्रीदेवजी ने शब्द सुनाया-

शब्द-25 ओ३म् राज न भूलीलो राजेन्द्र, दुनी न बंधै मेरूं।

पवणा झोंले बीखर जैला, धुंवर तणा जै लोरूं।

वोलस आभै तणा लह लोरूं, आडा डम्बर केती बार बिलम्बण

यो संसार अनेहूँ। भूला प्राणी विष्णु न जंप्यो, मरण विसारो केहूँ।

म्हां देखता देव दाणूं सुरनर खीणा, जंबू मंझे राचिन रहिबा थेहूँ।

नदिये नीर न छीलर पांणी, धूंवर तणा जे मेहूँ।

हंस उड़ाणो पंथ विलंब्यो, आसा सास निरास भई लो।

ताछे होयसीं रंड निरंडी देहूँ,

पवणा झोले बीखर जैला गैण विलंबी खेहूँ।