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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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तीसरा अध्याय · कथा 24

महमंद तथा लूणकरण को सदुपदेश

वील्होजी उवाचः-हे गुरुदेव! बिश्नोई पंथ स्थापना की कथा आपसे मैंने ध्यानपूर्वक श्रवण की। अब आगे मैं यह जानना चाहता हूँ कि इस बिश्नोई पंथ रूपी बहती हुई पवित्र गंगा में किन-किन लोगों ने स्नान किया और कौन कौन संसार सागर से पार उतर गये? क्योंकि मैं यह समझता हूँ कि यह पंथ तो संसार सागर से पार उतारने की नौका ही है।

नाथोजी उवाचः- हे शिष्य! जिस समय सम्भराथल पर बिश्नोई पन्थ की स्थापना हुई थी, उस समय बीकानेर,जोधपुर, मेड़ता,चित्तौड़, जैसलमेर आदि राज तो सभी हिन्दुओं के थे, किन्तु नागौर,अजमेर एवं दिल्ली में मुसलमान राजाओं का राज था। नागौर का सूबेदार महमद खाँ था, जो दिल्ली के बादशाह के अधीन था। वह वहाँ से कर उगाही करके दिल्ली भेजता था। अन्य हिन्दु राजाओं से भी मेलजोल रखता था। सभी अपने-अपने धर्म में रहकर प्रसन्नचित्त थे। आपस में किसी प्रकार का वैर विरोध नहीं था। किसी भी प्रकार से धर्म में दखलांदाजी नहीं थी।

एक समय महमद अपने काजी को साथ लेकर बीकानेर राज में राजकुमार लूणकरण के पास गया। वहाँ पर जाम्भोजी के बारे में चर्चा चली। तब लूणकरण कहने लगा कि मैं तो जाम्भोजी महाराज की बात ही स्वीकार करता हूँ। उन्हें अपना देव-पीर-गुरु मानता हूँ। प्रथम उनसे पूछकर ही फिर कोई कार्य करता हूँ। अपना कार्य पूरा करके काजी वहाँ से रवाना हुआ। मार्ग में सम्भराथल पड़ता है। काजी ने जाम्भोजी से मिलने का विचार किया। क्योंकि लूणकरण से महिमा सुन रखी थी। काजी सम्भराथल पर जम्भेश्वर जी के पास पहुँचा। श्रीहरि हरी-भरी कंकेहड़ी के नीचे विराजमान थे। वही उनका मण्डप मठ था। कहा भी है-हरि कंकेहड़ी मण्डप मेड़ी, जहाँ हमारा बासा।

काजी बोला-हे साधो! आप हमारे देश नागौर एवं बीकानेर की सीमा पर बैठकर क्यों ठगते हो? क्यों मोहित करने के लिए मायाजाल फैलाया है?

जम्भेश्वरजी कहने लगे-मेरी बात सुनो! मैं अवश्य ही लोगों को मोहित करके ठगता हूँ। किन्तु इन लोगों से मैं क्या ठगता हूँ? इनके पास जो वस्तु होगी, वही मैं ठग सकता हूँ। इस समय तो इन लोगों कह्य पास काम,क्रोध,लोभ,मोह,ईर्ष्या,अन्याय,निन्दा,कुकर्म इत्यादि धन बहुत ही मात्रा में है। इन लोगों ने पोटली बाँध रखी है। मैं शब्द रूपी नगाड़ा बजा करके इनसे यह धन लूटता हूँ।

इसलिए हे काजी! यदि कोई मेरे से मिलने के लिए आयेगा, तो वह अवश्य ही कंगाल हो जायेगा। ऐसा वचन श्री देवजी से काजी ने श्रवण किया। वह तथ्य को समझ तो गया किन्तु अनमना होकर वहाँ से चला गया। नागौर में महमद के पास जाकर सम्भराथल के स्वामी की बात बतलायी। कुछ महिमा का भी बखान किया। महमद ने बात को स्वीकार किया और कभी मिलने की प्रतीक्षा करने लगा।

एक समय महमद खाँ नागौर से चलकर पीपासर आया। पीपासर कुएँ के निकट तम्बू तनवायें। एक तम्बू में हाथी को बाँधकर अन्य तम्बुओं में कुछ अन्य वस्तुओं को छोड़कर सम्भराथल पर जम्भेश्वर जी से मिलने के लिए चला। वैसे तो हाथी को तम्बू में नहीं बाँधा जाता। किन्तु बादशाह की अपनी समझ कौन क्या कहे? पीपासर से चला। पीपासर एवं सम्भराथल के बीच में जंगल आया। बादशाह कुछ दिव्य चमत्कार देखने की लालसा से आगे बढ़ रहा था कि मार्ग में सम्भराथल के निकट ही एक काला हरिण महमद खाँ को दिखलाई दिया। हरिण अति तेजस्वी सुन्दर था। ईश्वर की बनायी हुई कृति का एक जीता जागता सौन्दर्य था। उसे देखकर महमद का मन पलटा खा गया। कहाँ तो देव दर्शन हेतु जाता था किन्तु मार्ग में ही हरिण को मारने की इच्छा बलवती हो गयी। रसना के विषय ने व्याकुल कर दिया। आगे नहीं बढ़ पाया।

तुरन्त महमद ने हरिण को मारने के लिए उपाय प्रारम्भ कर दिया। अन्य अपने सेवकों को साथ लेकर हरिण पर पीछे भागकर तलवार से वार किया। तलवार हाथ से छूटकर हरिण के लग गयी। महमद ने देखा कि शिकार हो गया है। अब मैं पास में जाता हूँ और आगे अपना कार्य करूँगा।

ज्यों ही आगे बढ़ा तो देखा कि वहाँ पर हरिण नहीं था। काला कपड़ा पहने हुए मौलवी बैठा था। महमद घष्रा गया। अहो! ये तो हमारे मौलवी हैं। मैंने मौलवी पर प्रहार कर दिया। हाय! मैंने अनर्थ कर दिया। पुनः कुछ कदम आगे बढ़ा, तो न तो वहाँ पर मौलवी था और न ही हरिण। वहाँ तो सम्भराथल पर जाम्भोजी विराजमान थे।

यह क्या दृश्य महमद को दिखलाया था। इससे उसे क्या कहना चाहते थे? यह तो भगवान् ही जाने, किन्तु महमद खाँ समझ गया। यह तो इनकी ही माया है। ये तो माया के अधिपति अम्बा-ईश्वर हैं। जय अम्बेश्वर जय अम्बेश्वर मैं आपकी शरण में हूँ। आपने मुझे इस पाप से बचा लिया। न जाने आपने वह हरिण एवं मौलवी कहाँ गायब कर दिया और आप यहाँ विराजमान हो गये? क्या आप ही सभी कुछ हैं, हरिण मौलवी आदि।

सम्पूर्ण सृष्टि के कर्त्ता धर्ता स्वयं ईश्वर आप ही हैं? आप ही क्या सर्वज्ञ ईश्वर हैं? घट-घट में व्यापक स्वयं आप ही हैं? सभी के अन्तर्यामी भी आप ही हैं? क्या मुझे ऐसे ही भ्रम तो नहीं हो रहा है? मुझे भी क्या आपने अपनी मायाजाल में तो नहीं डाल दिया है? जिससे मैं यह स्वप्न देख रहा हूँ या सत्य देख रहा हूँ।

यदि आप दूर की वस्तु का दर्शन कर लेते हैं, तो कृपा करके यह बतलाइये कि तम्बू में क्या है? यदि आप देव है, अतर्यामी है तो अवश्य सत्य बतलाओगे? अन्यथा मैं आपको केवल मायावी, तान्त्रिक, पाखण्डी ही मानूँगा।

श्री जम्भेश्वर जी ने कहा-हे महमद! तुम्हारे तम्बू में अन्य वस्तुओं के अतिरिक्त जो तुम जानना चाहता है, वह तो एक भेड़ का बच्चा तुम्हारे तम्बू में खड़ा हुआ कुछ बोल रहा है। हे महाराज! आप क्या कहते हैं? आपको कुछ दिखाई कम ही देता है क्या? इतने बड़े हाथी को भेड़ का बच्चा बतला रहे हैं? तब तो आपकी बात विश्वास करने योग्य कैसे हो सकती है?

हे महमद! मैंने तो जो कह दिया वही होगा। हम तो एक ही बार बोलते हैं। जो कुछ कहते हैं, वही होता है। म्हे भूल न भाख्या थूलूं। हम कभी भूलकर भी व्यर्थ की झूठी बात नहीं बोलते। यदि तुम्हें विश्वास नहीं हो रहा है, तो जाकर देखकर आओ।

महमद खाँ तुरंत घोड़े पर सवार होकर चला। अभी देखकर आता हूँ। जाम्भोजी को झूठा सिद्ध कर देता हूँ। मैं सच्चा हो जाऊँगा। पीपासर में जाकर तम्बू में प्रवेश कर देखता है कि उसमें तो सचमुच ही भेड़ का बच्चा खड़ा था। उसे देखकर महमद के पैरों तले धरती नीचे धंसने लगी। अन्य कुछ भी दिखलाई नहीं दिया। दौड़कर सम्भराथल पर आया और क्षमायाचना करते हुए कहने लगा-

महाराज! मैं तो अज्ञानी जीव हूँ। अब मेरे पर कृपा कीजिये, मेरा सवा लाख का हाथी था। वह तो अब सवा आने का हो गया। जैसा आपने कहा वैसा ही हो गया है। अब तो पुनः जैसा था वैसा ही कर दीजिये। मैं सदा सदा के लिए आपकी आज्ञा का पालन करूँगा। गुरुदेव ने कहा-जो व्यक्ति अहंकार करता है, उसकी यही गति होती है। उसे हाथी भी भेड़ की तरह दिखता है। स्वयं आप ही जीना चाहता है, अन्य जीवों का तो अस्तित्व मिटा देना चाहता है। अपने सामने किसी को कुछ भी नहीं समझता है। ईश्वर की सत्ता भी उसे मान्य नहीं है। इसलिए हे महमद! अब तो अहंकार को छोड़कर जीवों पर दया भाव करे। जीया ने युक्ति और मुवां ने मुक्ति का मार्ग पकड़।

वापिस पीपासर चला जा। जब सत्य धर्म पर चलने का संकल्प करेगा तो वह भेड़ का बच्चा पुनः हाथी बन जायेगा। ईश्वर में भक्ति, विश्वास में सदा सुख शांति संतोष आता है। तब भेड़ अर्थात् अल्पमात्रा भी बहुत अधिक हो जाता है। किन्तु लोभी, कामी को तो हाथी भी भेड़ ही दिखाई देता है। महमद अपने नियमों पर चलने लगा। सतगुरु से सीख ले ली और उनका शिष्य बन गया।

बीकानेर का राजकुमार लूणकरण एक समय भ्रमण करने हेतु सम्भराथल पर आया। श्री देवजी के दर्शन करके पीपासर होते हुए नागौर पहुँचा। वहाँ पर महमद खाँ सूबेदार से भेंटवार्ता हुई। महमद खाँ ने जो घटना घटी थी, उसके बारे में लूणकरण को विस्तार से बतलाया और कहा कि हमारे देश में ऐसे अवलिया पीर आये हैं, मैं तो उनकी ही बात मानता हूँ। उन्हें ही पीर मानता हूँ। वे तो हमारे साक्षात् अल्ला ईश्वर ही हैं, जो इस रूप में आये हैं।

लूणकरण कहने लगा-इसमें तुम्हारे पीर कैसे हो गये? ये तो हमारे हिन्दुओं के देवता हैं। तुम्हारा कुछ भी सीर नहीं है। फिर तुम कैसे कह सकते हो कि हमारे पीर हैं? राजकुमार कहने लगा-ये तो हमारे हिन्दुओं के देवता हैं जैसे-स्नान, संध्या, होम, विष्णु का जप, रजस्वला धर्म, सूतक, अन्न का भोजन, मद, आमख से दूर रहना बतलाते हैं। इसलिए हमारे हिन्दुओं के देवता हैं।

महमदं खां कहने लगा-आप लोग हिन्दू हैं, इसीलिए हो सकता है आपको हिन्दुओं के नियम बतलाते होंगे। किन्तु हमें भी तो हमारे नियम बतलाते हैं-जैसे कलमा पढ़ना, एक ईश्वर अल्ला को याद करना, जीव हत्या का त्याग करना, जीवों पर दया करना, नमाज पढ़ना इत्यादि हमारे नियम भी हमें बतलाते हैं। इसलिए तो हम समझते हैं कि हमारे मुसलमानों के पीर हैं।

इस प्रकार से दोनों में विवाद होने लगा। न जाने किसके देवता हैं या पीर हैं? दोनों ही विवादी अपनी बात पर अड़ह्य रहे। कोई भी हार मानने को तैयार नहीं था। जाम्भोजी क्या हैं, किस समुदाय या धर्म से सम्बन्ध रखते हैं, इसका पता लगाना चाहिये, दोनों का विवाद समाप्त करना चाहिये।

इस विचार ने लूणकरण ने पुरोहित को सम्भराथल पर देवजी के पास भेजा और महमंद ने काजी को श्रीदेवजी के पास भेजा। उनसे कहा-तुम दोनों जाओ और जाम्भोजी से पूछकर आओ कि किसके देवता या पीर हैं, वे स्वय क्या हैं।

जम्भेश्वरजी सम्भराथल पर विराजमान थे। बहुत से साथरिया-सत्संगी पास में ज्ञान श्रवणार्थ उपस्थित थे। श्री देवजी ने कहा- दो विवादी आ रहे हैं। एक तो पुरोहित है, दूसरा काजी है। इन्हें सादर यहाँ मेरे पास बुला लाओ। इन्हें अपनी अज्ञानता की हठधर्मिता परेशान कर रही है, इन्हें शाँत करूँगा। वैसे तो वाद विवाद नहीं करना चाहिये। कहा भी है-वाद विवाद फिटाकर प्राणी, छाडो मनहट मन का भाणो।

सर्वप्रथम श्रीदेवजी ने पुरोहित को बुलाया। पुरोहित ने कहा- हे देवजी! आप सत्य सत्य बतलाना कि आप हिन्दुओं के देवता हैं या मुसलमानों के। आपका सिद्धांत उपदेश किसलिये? स्वयं आप किसके पक्षपाती हैं? श्री देवजी ने कहा-मुझे आप हिन्दू मत कहो, मैं मुसलमान भी नहीं हूँ। जिसका कर्म शुद्ध पवित्र है, उसी का ही मैं हूँ। और मेरा भी वही शिष्य है। केवल जाति का भार ढ़ोने से बड़ा नहीं हो जाता है।

उत्तम कुली का उत्तम न होयबा, कारण किरिया सारूं।

अन्दर बैठी हुई जीवात्मा न तो कोई हिन्दू है और न ही कोई मुसलमान ही है। यह शरीर जिस जाति में जन्मा है, उसकी जाति संस्कार वैसे कर दिये जाते हैं। गुरुदेव ने कहा-यह शरीर तो मेरा अजन्मा है। मैं तो संसार की जन्म प्रक्रिया से अलग हूँ। केवल हिन्दू या मुसलमान होने से कुछ भी कार्य सिद्ध नहीं होगा। ऐसा कहते हुए श्रीदेवजी ने यह शब्द सुनाया-

शब्द-7 ओ३म्- हिन्दू होय के हरि क्यूं ना जंप्यो, कांय दहदिस दिल पसरायो।

सोम अमावस, आदितवारी, कांय काटी बन रायों।

गहण गहंते, बहण बहंतै, निर्जल ग्यारस मूल बहंते।

कांयरे मुरखा तै पालंग सेज निहाल बिछाई।

जा दिन तेरे होम न जाप न तप न किरिया, जान के भागी कपिला गाई।

कूड़ तणों जे करतब कीयो, नातैं लाव न सायों।

भूला प्राणी आल बखाणी, न जंप्यो सुर रायो।

छंदे कहाँ तो बहुता भावै, खरतर को पतियायों।

हिव की बेला हिय न जाग्यो, शंक रह्यो कदरायों।

ठाढी बेला ठार न जाग्यो, ताती बेला तायों।

बिम्बै बैला विष्णु न जंप्यो, ताछै का चीन्हों कछु कमायों।

अति आलस भोला वै भूला, न चीन्हों सुररायो।

पारब्रह्म की सुध न जाणी, तो नागे जोग न पायो।

परशुराम के अर्थ न मूवा, ताकी निश्चै सरी न कायों।

इस शब्द द्वारा हिन्दु का मुख्य कर्तव्य क्या है? यह बतलाया है। जो इस शब्द के अनुसार जीवनयापन करता है। वही असल में हिन्दु कहलाने का हकदार है। केवल हिन्दु के घर जन्म लेने मात्र से हिन्दु नहीं हो जाता।

यह शब्द सुनाकर श्री देवजी ने पुरोहित से कहा-हे पुरोहित! तुम हिन्दु हो, तुम्हारे घर में कोई तुम्हारे जाति वाला भाई तुम्हारे प्रिय मेहमान आ जाये, तो उसकी तुम सेवा करोगे ही। रात्रि में वह तुम्हारे घर से चोरी करके निकल जाये, आप लोग उसे पकड़ने के लिए पीछे जाओ तथा मौके पर पकड़ भी लो, उसी समय ही तुम्हारा कोई विधर्मी भी वहीं पर मिल जाये तो यह बतलाओ कि आप लोग दण्ड उस चोर को दोगे या निरपराध इस विधर्मी मुसलमान को दोगे? यह मुझे विचार करके बतलाओ।

पुरोहित ने कहा-हे देवजी! इसमें जाति-सम्प्रदाय का कोई कारण नहीं है। जो चोरी करेगा, वही पकड़ा जायेगा, वही दण्डित किया जायेगा। चाहे अपने प्रिय धर्म का ही क्यों न हो।

श्री देवजी ने कहा-हे पुरोहित यह न्याय तुमने अपने आप ही कर दिया है। मैं तो उसका ही हूँ जो न्याययुक्त सच्चे मानव धर्म मे विश्वास करता है। साचा सूं पतियायो। जो सच्चे हैं, वे ही मुझे प्रिय हैं। मैं किसी जाति पाति या धर्म के बन्धन में बंधा हुआ नहीं हूँ। मैं सभी कुछ हूँ, या कुछ भी नही हूँ, मेरे बारे में कुछ भी निश्चय करना कठिन है। हे पुरोहित! आप हिन्दु होकर हरि का जाप करो। हिन्दु के नियमों से नाता जोड़ो। जो मैं कहता हूँ, इन्हीं नियमों पर चलोगे तो आप लोग मेरे हैं। मैं आपका हूँ। केवल दिखावे मात्र से कुछ भी होने वाला नहीं है। ऐसा कहते हुए पुरोहित को दूर बिठाया और काजी को पास में बुलाया और काजी के प्रति शब्द सुनाया-

शब्द-8 ओ३म्- सुणरे काजी सुणरे मुल्ला, सुणरे बकर कसाई।

किणरी थरपी छाली रोसो , किणरी गाडर गाई

सूल चुभीजे करक दुहेली, तो हे हे जायो जीव न घाई।

थे तुरकी छुरकी भिस्ती दावो, खायबा खाज अखाजूं।

चर फिर आवे सहज दुहावै, जिसका खीर हलाली।

जिसके गले करद क्यूं सारो, थे पढ़ सुण रहिया खाली।

काजी कहने लगा-हे पीरजी! हमारे किए हुए कर्म हमारे लिए लागू नहीं होते, क्योंकि हम लोग नमाज पढ़ लेते हैं। इससे हमारे सभी पाप कर्म धुल जाते हैं। श्री देवजी ने कहा-जैसा काजी ने जवाब दिया, वैसा ही शब्द जाम्भोजी ने सुनाया-

शब्द-9 ओ३म्-दिल साबत हज काबो नेड़े, क्या उलबंग पुकारो।

भाई नाऊं बलद पियारो, ताकै गले करद क्यूं सारो।

बिन चीन्हे खुदाय बिबरजत, केहा मुसलमानों।

काफर मुकर होयकर राह गुमायो, जोय-2 गाफल करे धिंगाणों।

ज्यूं थे पच्छिम दिशा उलबंग पुकारो, भल जे यों चीन्हों रहमाणों।

तो रुह चलंते पिण्ड पड़ंतै, आवै भिस्त विमाणों।

चढ़ चढ़ भींते मड़ी मसीते, क्या उलबंग पुकारो।

काहे काजे गऊ विणासो, तो करीम गऊ क्यूं चारी।

काहीं लीयों दूधूं दहियूं, काहीं लीयों घीयूं महियूं।

काहीं लीयों हाडूं मांसूं, काही लीयूं रक्तूं रूहियूं।

सुणरे काजी सुणरे मुल्ला, यामै कोण भया मुरदारूं।

जीवां ऊपर जोर करीजे, अंतकाल होयसी भारूं।

इस प्रकार के शब्द को श्रवण करके काजी पुनः कहने लगा- हे पीरजी! हम लोग जब जीवों को मारते हैं, तब बिसमिल्ला का नाम लेकर जीवों को हलाल करते हैं। यही हमारा धर्म है। इससे हमें किसी भी प्रकार से पाप नहीं लगता। इस पर श्रीदेवजी ने शब्द सुनाया-

शब्द-10 ओ३म्- बिसमिल्ला रहमान रहीम, जिंहिं के सदकै भीना भीन।

तो भेटीलो रहमान रहीम, करीम काया दिल करणी।

कलमा करतब कोल कुरांणो, दिल खोजो दरबेस भईलो।

तइया मुसलमाणों। पीरां पूरषां जमी मुसल्लां, कर्तब लेक सलामों।

हम दिल लिल्ला तुम दिल लिल्ला, रहम करे रहमाणों।

इतने मिसले चालो मीयां, तो पावो भिस्त इमाणों।

काजी कहने लगा-हे पीरजी! हम इस्लाम धर्म के अनुयायी हैं। हमारा सबसे बड़ा तीर्थ काबा है। हम वहाँ जाकर हज कर आते हैं। इससे हमारे सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। जाम्भोजी ने काजी के प्रति पुनः शब्द सुनाया-

शब्द-11 ओ३म्-दिल साबत हजकाबो नेड़े, क्या उलबंग पुकारो।

सीने सरवर करो बदंगी, हक्क निवाज गुजारो।

इंहि हेड़े हरदिन की रोजी, तो इसही रोजी सारो।

आप खुदाय बंद लेखो मांगे, रे बिनही गुन्हे जीव क्यूं मारो।

थे तक जाणो तक पीड़ न जाणों, बिन परचैं बाद निवाज गुजारों।

चर फिर आवे सहज दुहावे, जिसका खीर हलाली।

तिसके गले करद क्यूं सारो, थे पढ़ सुण रहिया खाली।

थे चढ़ चढ़ भींते मड़ी मसीते, क्या उलबंग पुकारो।

कारण खोटा करतब हीणा, थारी खाली पड़ी निवाजूं।

किहिं ओजूं तुम धोवो आप, किहिं ओजूं तुम खण्डा पाप।

किहिं ओजूं तुम धरो धियान, किहिं ओजूं चीन्हो रहमान।

रे मुल्ला मन मांहि मसीत नमाज गुजारिये, सुणतां ना क्या खरे पुकारिये।

अलख न लखियो, खलक पिछाण्यो, चांम कटे क्या हुइयों।

हक्क हलाल पिछाण्यों नाहीं, तो निश्चै गाफल दौरे दीयों।

फिर से काजी कहने लगा- हे देवजी! यह तो नमाज पढ़ना, काबै में जाकर हज कर आना, बिसमिल्ला का नाम लेना, यह तो मुहमंद पीरजी ने स्वयं ही फरमाया था। जैसा आप फरमाते हैं वैसा हमारे आदि पीरजी ने भी फरमाया है। हम तो उनके कहने के अनुसार ही जीवन जीते हैं। उनके बताए हुए धर्म पर ही चलते हैं। श्री जाम्भदेवजी ने शब्द सुनाया-

शब्द-12 ओ३म्- महमंद महमंद ना कर काजी, महमंद का तो विषम विचारूं।

महमद हाथ करद जो होती, लोहे घड़ी न सारूं।

महमद साथ पयंबर सीधा, एक लख असी हजारूं।

महमद मरद हलाली होता, तुम ही भए मुरदारूं।

हे काजी! महमंद का नाम लेकर अपने पापों पर पर्दा डालने की कोशिश मत कर। महमंद तो हक की कमाई की बात करते थे, किन्तु तुम लोग मुर्दा खाने वाले हो। तुम्हारे कार्यक्रम एवं विचारों से मुहमंद का विचार भिन्न था।

तुम लोग लोहे की करद लेकर जद्धवों को काटते हो, किन्तु महमद के हाथ में ज्ञान की खड्ग थी। उससे अज्ञानियों के पाप काटते थे। महमद के साथ तो एक लाख अस्सी हजार पैकम्बर पार उतर गये।

किसी भी पक्षपात में धर्म निहित नहीं होता। धर्म की गहराइयों को जानने के लिए तो स्वकीय सम्प्रदाय की भावना से ऊपर उठकर ही जाना जा सकता है। महमद खाँ ने मुस्लिम धर्म की कट्टरता छोड़ दी और लूणकरण ने हिन्दू धर्म की कट्टरता को त्यागकर मध्यमार्ग बिश्नोई पन्थ को स्वीकार किया। जब कभी सेवा में उपस्थित होने लगा। अपने जीवन को सफल बनाने का मार्ग पकड़ा तथा दूसरों के लिए भी प्रेरणा के स्त्रोत बने।